Tag Archives: मेरी पसंद
भोरकालीन वातावरण और प्रकृति के अप्रितम रंग
सुबह जल्दी उठकर प्रकृति का आनंद लेना, मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा है, प्रकृति के इस रम्य वातावरण को देख मन आह्लादित हो उठता है। जो प्रसन्नता मन को भोरकालीन वातावरण में मिलती है, वह अवर्णनीय है। सुबह पंक्षियों का कलरव, मंद गति से बहती शीतल हवा, बयार में शांत पेड़ पौधे अपने अप्रितम सौंदर्य का दर्शन देते हैं, दैनिक जीवन की शुरूआत से पहले बिल्कुल शांत और निर्वाण रूप होता है सुबह का।
पक्षी स्वच्छन्दता से अपने पंखों से उड़ रहे होते हैं और डैने फ़ैलाकर
आकाश में क्रीड़ा कर रहे होते हैं। पक्षियों की इस क्रीड़ा को देखने से मन ऊर्जास्फ़ुरित हो उठता है। कुछ पक्षी उड़ान के अपने नियम बनाते हैं और कुछ पक्षी अनुशासन में एक के पीछे एक पंक्ति में उड़ान भरते नजर आते हैं। इन पक्षियों को देखकर ही विचार मुखरित हो उठते हैं और हृदय को मिलने वाली प्रसन्नता शब्दों में कह पाना कठिन होता है।
पौधे अपने निर्विकार रूप में खडे होते हैं, पेड़ पौधों में जान होती है परंतु वे स्व से अपने पत्तियों को खड़का नहीं सकते, वे तो प्रकृति प्रदत्त वातावरण पर आश्रित होते हैं। भोर में पेड़ पौधों पर पड़ी ओस, मोती सा आभास देती है, और जलप्लवित पत्तियों से ऊर्जा संचारित होती है, वह ऊर्जा लेकर हम अपने जीवन की शुरूआत करते हैं।
कुछ समय पूर्व रंगों के त्यौहार पर इस बागीचों के शहर में पंक्तिबद्ध रंगबिरंगे फ़ूलों के बड़े बड़े पेड़ों को देखते ही बनता था, प्रकृति प्रदत्त इन रंगीन फ़ूलों को देखकर ही लगता था कि रंगों का त्यौहार आ चुका है, सड़क किनारे कच्ची पगडंडियों पर गिरे इन फ़ूलों का अप्रितम सौंदर्य देखते ही बनता है। विभिन्न रंगों के फ़ूल जीवन के विभिन्न रंगों को प्रदर्शित करते हुए, गीत गाते हुए जीवन को नया राग देते हैं।
प्रकृति की इस मौन भाषा को देखकर और अहसास से ही समझा जा सकता है, भोर के इस थोड़े से समय बाद जीवन की भागदौड़ में ये भोरकालीन मंच अपने आप पर पर्दा गिराकर फ़िर से दिनभर के लिये लुप्त हो जाता है। यह भोरकालीन मंच का आनंद लें और अपने जीवन को खुशियों में प्रकृति संग बितायें।
भोरकालीन कुछ और चित्र जिन्हें देखकर मन आनंद की सीमाओं के परे दौड़ पड़ता है।
आम आदमी बेबस और उसका लक्ष्य !
कल ऑफ़िस से वही देर से आये, रात्रिभोजन और टहलन के पश्चात १० मिनिट टीवी के लिये होते हैं और फ़िर शुभरात्रि का समय हो जाता है। कल जब टीवी देखना शुरू किया तो फ़िल्म “शूल” आ रही थी, और यह मेरी मनपसंदीदा फ़िल्मों में से एक है।
मनपसंदीदा फ़िल्म इसलिये है कि आदमी की बेबसी और उसके द्वारा तय किया गया लक्ष्य कैसे प्राप्त किया गया, इसका बेहतरीन चित्रण है।
आम आदमी बेबस और कमजोर नहीं होता, केवल परिवार के कारण भयभीत होता है, अगर आम आदमी भयभीत होना छोड़ दे तो सारा तंत्र एक दिन में सही हो जाये, परंतु आम आदमी बेबस ठहरा। कहीं भी हो किसी भी तरह की संस्था में हो, गलत का साथ देना या आँख मूँदकर गलत होने देना केवल बेबसी के कारण करता है, अगर गलत का विरोध करेगा तो जितना भय और गलत लोगों से उसे खतरा होगा वह आम आदमी टालना चाहता है।
इसके उदाहरण बहुत सारे हैं, जिन्होंने अपनी जान गँवाई है फ़िर वो किसी एनजीओ के कार्यकर्ता हों या फ़िर पत्रकार या फ़िर और कोई इंजीनियर, ये सब भी बेबस थे परंतु निर्भीक थे और तंत्र से लड़ना चाहते थे, सो तंत्र ने उन्हें गहरी नींद सुला दिया।
लक्ष्य अधिकतर फ़िल्मों में ही मिलता है, क्योंकि आम जीवन में तंत्र इतना प्रभावशील होता है कि उसमें रीटेक की कोई गुंजाईश ही नहीं होती।
बीबी को नई चप्पल
श्रीमतीजी याने की बीबी को नई चप्पल लेनी थी सो बाटा की बड़ी दुकान घर के पास है वहीं जाना हुआ, अब एक बार बड़ी दुकान में घुस जायें तो सारी चीजें न देखें मजा नहीं आता, और खासकर इससे थोड़ी सामान्य ज्ञान में वृद्धि होती है, खरीदें या ना खरीदें वो एक अलग बात है।
चप्पल तो ले ली और हम भी अपने लिये देखने लग गये, वैसे हमेशा यही ऐतराज होता है आते हमारे लिये हैं और खरीददारी खुद के लिये होती है, खैर शिकायतें तो कोई न कोई रहती ही हैं।
जब हम अपने लिये एक सैंडल देख रहे थे तभी एक और व्यक्ति पास में से अपनी पत्नीजी को अंग्रेजी में बोलता हुआ गुजरा “तुम हमेशा मुझे वही चीज खरीदने पर मजबूर करती हो, जो मुझे नहीं खरीदनी है।”, हमारी जबान भी फ़िसल गई “अबे ढ़क्कन खरीदता क्यों है”, अब वो हमारे पीछे ही खड़ा था, और उसे हिन्दी भी समझ आती थी, उसके बाद वो हमें घूरने लगा। अनायास ही अपने एक बुजुर्ग मित्र बात समझ में आने लगी “जो व्यक्ति बीबी से डरता है, वही बाहर शेर बनकर दहाड़ता है, भले ही उसकी दहाड़ में दम हो या ना हो”।
और उधर ही एक विज्ञापन भी याद आ गया पुराना है मगर सबकी जबां पर था – “जो बीबी से करे प्यार वो प्रेस्टीज से कैसे करे इंकार”।
खैर फ़िर हमने उस दुकान में चमड़े के बैग देखे, पॉलिश और बेल्ट देखी, मगर एक निगाह अपने ऊपर घूमती हुई महसूस हुई, जो कुछ बोल नहीं पा रही थी। लगता है कि अपनी टिप्पणी केवल ब्लॉग के लिये है, जीवंत टिप्पणी किसी को अच्छी नहीं लगती है।
आज वैलंटाईन डे है, सबको प्यार भरी शुभकामनाएँ, यह वर्ष प्यार भरा रहे।
गूगल का वैलंटाईन डे पर डूडल देखिये –
प्राकृतिक संसाधनों के लिये जवाबदेही
प्राकृतिक संसाधन क्या होते हैं, जो हमें प्रकृति से मिलते हैं, प्रकृति प्रदत्त होते हैं। हमें इसका उपयोग बहुत ही सावधानीपूर्वक करना चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं है।
इस विषय के संबंध में कल अपने केन्टीन में एक पोस्टर देखा था जिसमें दिखाया गया था कि एक गाजर को तैयार होने में लगभग ६ माह लगते हैं और उसको जमीन से निकालकर पकाने तक मात्र कुछ ही मिनिट लगते हैं, और हम कई बार सलाद या सब्जी फ़ेंक देते हैं, जिसमें केवल कुछ सेकण्ड ही लगते हैं, यह प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग ही तो है जिसे केवल जिम्मेदारी से आम व्यक्ति ही रोक सकता है। गाजर तो केवल एक उदाहरण है ऐसी कई वस्तुएँ हैं जिनका हम धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं।
इसके बाद एक ट्रेनिंग में जाना हुआ जो कि बैंकिंग की थी, उसमें भी बताया गया कि कैसे वित्तीय संस्थाएँ प्राकृतिक संसाधनों को बचाने में अहम योगदान कर रही हैं, जो कि हर राष्ट्र के लिये बहुत ही अहम है, वित्तीय संस्थाएँ एवं नियामक देश की विदेशी मुद्रा को जाने से रोकते हैं, जो कि राष्ट्र के लिये संसाधन है।
आज सुबह अखबार में एक कहानी पढ़ रहे थे जो कि इस प्रकार थी – एक गुरूजी अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिये प्रेरित करते थे परंतु शिष्य केवल सुनते थे उस पर अमल नहीं करते थे, एक दिन गुरू जी ने व्रत रखा और शाम को अपने एक शिष्य को कहा व्रत तोड़ने के लिये मुझे नीम की दो पत्तियों की जरूरत है जाओ ले आओ। थोड़ी देर बाद शिष्य आया और उसके हाथ में नीम की पूरी टहनी देखकर गुरूजी रुआंसे हो गये और उन्होंने कहा कि मुझे केवल दो पत्तियों की जरूरत थी पूरी टहनी की नहीं, यह आदेश मैंने तुम्हें दिया था तो इस प्राकृतिक संसाधन के दुरुपयोग का जिम्मेदार में हुआ इसलिये अब इसका प्रायश्चित स्वरूप आज मैं व्रत नहीं तोड़ूँगा। शिष्यों को बहुत दुख हुआ।
काश कि सब प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अपनी जवाबदेही समझें। जैसे सब्जी लेने जायें या बाजार कुछ भी समान लेने जायें तो अपने थैले साथ ले जायें जिससे पोलिथीन का कम से कम उपयोग करके हम प्रकृति को नुकसान से बचा सकें।
बिहार की लिट्ठी ऑन व्हील्स बैंगलोर में (Littionwheels.com in Bangalore)
आई.टी. वालों का दर्द उनकी ही जबानी..वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन… (Pain of IT guys.. by there own..)
शाम को बस में बैठते लोगों की दिन भर की भड़ास सुनने को मिलती है, अगर दो लोग हैं तो आपस में चिकिर चिकिर और और अगर अकेला है तो फ़ोन पर या फ़िर मन ही मन में पर भड़ास तो निकलती ही रहती है।
कल भी कुछ ऐसा ही हुआ, दो बंदे आई.टी. कंपनी के थे और धड़ाधड़ चिकिर चिकिर कर रहे थे।
यार आज मेरा मैनेजर पूरा माथा खा गया पूरे दो घंटे रेंटिंग पर डिस्कसन कर रहा था, अच्छा भला वर्क फ़्रोम होम कर रहा था, पर ये रेटिंग के डिस्कसन के कारण ऑफ़िस आना पड़ रहा है, जिंदगी में पहले बार २ घंटे का कम्यूटिंग कर रहा हूँ, ऑफ़िस आओ तो काम तो होता नहीं है, मैनेजर से डिस्कसन में ही टाईम निकल जाता है। मुझे बोलता है कि थोड़ी देर बाद फ़िर डिस्कसन के लिये बैठते हैं, मैंने तो कह दिया मेरा एक अर्जेंट कॉनकाल है, मैं नहीं आ पाऊँगा, तो बोलता है कि चलो कल आओगे तो ब्रेन स्टोर्मिंग करेंगे, मैंने तुरत फ़ुरत कह दिया, बोस कल मैं ऑफ़िस नहीं आ रहा हूँ, कल मैं वर्क फ़्रॉम होम कर रहा हूँ। यहाँ ऑफ़िस आकर काम नहीं होता केवल डिस्कसन होता है।
दूसरे ने पूछा डिस्कसन में क्या बोला मैनेजर – तो पहला बोला अरे भाई साल भर की जो ऐसी तैसी करी है, उसकी बाल की खाल खींचते हैं, अगर अच्छा काम करो तो बोलते हैं कि ऐसा करते तो और अच्छा होता और अगर कोई काम समय पर नहीं होता है तो बस बंबू, कैसे भी करके मैनेजर खरीखोटी सुनायेगा। उसे ज्यादा रेटिंग नहीं देना है क्योंकि उसके पास भी टार्गेट होता है और उसके लिये तो उसे बकरा फ़ँसाना ही होता है।
ये अच्छा है कि एक बंदे को हायर करो और फ़िर उसे तीन चार लोगों के वर्कलोड से लोड कर दो और उसकी अच्छी बैंड बजाओ, जब हायर करो तब बोलो कि वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन, तो मैंने उनको बोल दिया था कि आई नीड वन मंथ लीव, आई हैव टू गो माई नैटिव, तो ये बोले थे कि ज्वॉईन कर लो, प्रोजेक्ट लो और नैटिव से ही काम कर लेना, नो नीड टू कम टू ऑफ़िस, मैंने उनको कह दिया सर देयर इस कनेक्टिविटी प्रॉब्लम सो इट विल नॉट बी पॉसिबल।
अब यह हालत है कि ऑफ़िस आओ तो पूरे ५ घंटे बर्बाद होते हैं दिन के, और पर्सनल लाईफ़ की तो बैंड बज गई है। दस बजे ऑफ़िस आओ तो साढ़े दस तक तो सैटल ही हो पाते हैं फ़िर थोड़ा काम करो, और साथ में ऑफ़िस आये हैं तो कुछ कलीग्स मिलने आ जाते हैं, कभी कोई अपनी स्क्रिप्ट की प्रॉब्लम लेकर आ जाता है और कभी अपन किसी के पास डिस्कसन के लिये चले जाते हैं, कब दो बज जाते हैं पता ही नहीं चलता है, फ़िर लंच के लिये चले जाओ और फ़िर आने के बाद छ: बजे तक जितना काम होता है बस उतनी ही प्रोडक्टिविटी होती है, घर से काम करो तो प्रोडक्टिविटी बराबर रहती है।
प्रोजेक्ट मैनेजर को बिल्ड की डिलिवरी हमेशा २ वीक पहले चाहिये होती है और उसके एक वीक पहले से जान खाना शुरू देता है, जब उसको बोलो कि आईपी सेटअप करने में ही एक दिन चला गया था, क्लाईंट की कनेक्टिविटी नहीं थी, तो उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बस उसको उसकी डिलीवरी टाईम पर चाहिये, ये नहीं कि क्लाईंट को ब्लैम करके डिलीवरी डेट आगे बढ़ा ले, बस जो काम करे उसकी तबियत बजाओ बैंड, यह तो सोच लिया और दिमाग में सैट हो गया है कि ऐसा ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है और जिस दिन अपना दिमाग सटक गया उसी दिन पेपर डाल दूँगा, फ़िर भले ही हाथ में दूसरा ऑफ़र हो या नहीं हो, फ़िर बाद में आई विल सर्च इन मार्केट, लेकिन इनको झेलना मुश्किल है।
बातें तो बहुत सारी हुईं, जितनी याद रही लिख दी, वैसे हर आई.टी. वाले का अपना दर्द होता है जो आई.टी. वाला ही अच्छे से समझ सकता है। वहीं बस के टेप में गाना बज रहा था –
“पहला नशा पहला खुमार,
नया प्यार है नया इंतजार,
कर लूँ मैं क्या अपना हाल ऐ दिले बेकरार….”
इतना तो साफ़ है सरकार नौकरशाहों की फ़िक्रमंद है..
लोकपाल के ड्राफ़्ट के सामने आते ही तरह तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगी हैं, अन्ना एवं टीम वापस अनशन पर जाने के लिये तैयार हो गये हैं, सबने कमर कस ली है। सरकार ने भी अपनी कमर कस ली है और संदेश दिया है कि नौकरशाहों की उन्हें बहुत चिंता है, कैसे उनकी कमाई पर हाथ साफ़ कर दें, कैसे उनकी होने वाली कमाई को रोक दें, इसलिये प्रधानमंत्री द्वारा किये गये वादे भी भुला दिये गये।
प्रधानमंत्री के तीन वादे जो चिठ्ठी लिखकर अन्ना को किये गये थे, अब कांग्रेस की सरकार ने उस चिठ्ठी का मजाक बना दिया है, सरकार का मंत्री जो मुँह में आता है उलूल जुलूल बके जा रहा है और हो वही रहा है जो अंधेर नगरी का चौपट राजा चाह रहा है। देखते हैं कि देश में कब तक यह अंधेरगर्दी चलती है।
सरकार ने छोटे बाबुओं को लोकपाल से दूर रखकर उन्हें संदेश दिया है कि आप कमाई करते रहो और जैसे सालों से ऊपर हफ़्ता, महीना देते रहे हो, देते रहो। छोटे बाबु साहब आप लोग चिंता मत करो, आपके लिये तो हम देश की जनता से भी टकरा जायेंगे, भुलक्कड़ जनता है वोट डालकर सब भूल जाती है और जो वोट नोट में बिकते हैं नोट से खरीद लेते हैं, क्योंकि उन्हें अपने वोट की कीमत पता है और पढ़े लिखे गँवार लोग जिन्हें अपने वोट की कीमत बहुत अच्छे से पता है, बिना नोट के वोट दे देते हैं।
तो छोटे बाबू साहब लोग आप तो इन पढ़े लिखे गँवार और असली गँवारों से नोट बटोरते रहो और मजे करते रहो, चिंता मत करो कानून भी सरकार ही बनाती है और सरकार ही मिटाती है। छोटे बाबू साहबों के होंसले इतने मस्त है कि आम जनता पस्त है। अब तो खुलेआम कहते हैं तुम्हारे अन्ना ने क्या कर लिया ? हमारे ऊपर कोई लगाम नहीं लगा सकता क्योंकि हमारे आका जो ऊपर बैठे हैं, उन्हें हमारी बहुत चिंता है।
पर जैसे कि एक खबर कल अखबार में पढ़ी थी एक सँपेरे ने अपने साँप तहसील कार्यालय में छोड़ दिये क्योंकि उससे छोटे बाबू साहब लोग ’कुछ’ लेना चाहते थे, तो सँपेरे ने उनके कार्यालय में दस साँप छोड़ दिये। मतलब कि संदेश साफ़ है कि अगर आपको नहीं देना है तो सँपेरे से दोस्ती गांठ लो, सारे छोटे बाबू लोग टेबल पर चढ़े नजर आयेंगे।
छोटे बाबू साहब लोग आप समझ जाओ जब आप लोग टेबल पर चढ़ेगे तो सरकार कितनी बार आपको इन साँप जैसे जीवों से बचाने आयेगी, शायद इन बाबुओं को पता नहीं होगा कि साँप टेबल पर भी चढ़ जाते हैं। अब छोटे बाबू साहब लोग अगर सब अपने अपने हथियार लेकर आ जायें तो टेबल से तो आपका बचाव नहीं होगा . . . .
मल्टी ब्रांड रिटेल पर इतना घमासान क्यों ? (Why protestation against Multi Brand FDI ?)
सरकार ने ५१ फ़ीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी, इस पर सरकार से विपक्ष और पक्ष के लोग बहुत नाराज हैं। क्या कारण है कि वे नाराज हैं –
१. खुदरा व्यापारियों को नुक्सान होगा ।
२. जो उनके यहाँ काम कर रहे हैं वे लोग बेरोजगार हो जायेंगे।
और भी बहुत से कारण हैं, परंतु उपरोक्त २ कारण ही मुख्य हैं।
जबकि सरकार ने साफ़ साफ़ कहा है कि ये खुदरा विदेशी दुकानें दस लाख से ज्यादा वाली आबादी में ही खुलेंगी।
अब अगर देखा जाये तो दस लाख से ज्यादा आबादी वाली जगहों पर आज बड़ी दुकानों जैसे हॉयपर सिटी, रिलायंस, बिग बाजार इत्यादि का कब्जा है । तो अभी भी तो वहाँ खुदरा व्यापारियों के लिये मुश्किल है। अगर मल्टी ब्रांड विदेशी खुदरा दुकानें आती हैं तो असली प्रतियोगिता तो बड़ी देशी खुदरा दुकानों और विदेशी खुदरा दुकानों के मध्य होगी। छोटे खुदरा व्यापारियों पर तो कोई असर नहीं पड़ने वाला है।
अभी बड़े देशी खुदरा दुकानों पर सभी सामान जरूर मिलता है, परंतु ये दुकानें अच्छी खासी कमाई कर रही हैं, और उपभोक्ताओं को कीमत मॆं कोई राहत नहीं है, उपभोक्ता को तो सामान छपी हुई कीमत पर ही मिलता है। जबकि ये देशी खुदरा दुकानें सामान सीधे कंपनियों से खरीदते हैं तो इनका डिस्ट्रीब्यूटर और डीलर इत्यादि मार्जिन भी बचता है, ट्रांसपोर्टेशन शुल्क में बचत होती है, कर में बचत होती है। जब ये देशी खुदरा दुकानें खुली थीं तब दावा किया गया था कि वस्तुएँ सीधे उपभोक्ता तक पहुंचेंगी और उपभोक्ता को कीमत में भारी फ़ायदा होगा, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। यही दावा अब विदेशी खुदरा दुकानें वालमार्ट, कैश एंड कैरी, केरफ़ोर इत्यादि कर रहे हैं। जब ये विदेशी खुदरा दुकानें आयेंगी तभी पता चलेगा कि उपभोक्ता को कितना फ़ायदा होता है।
बड़े देशी खुदरा दुकानों की बात की जाये तो मालवा (इंदौर, उज्जैन) में पाकीजा का एक तरफ़ा कब्जा है, जबकि वहाँ पर सभी बड़े देशी खुदरा दुकानदार मौजूद हैं। उसका मूल कारण है कि वे उपभोक्ता को सीधे कीमत में लाभ देते हैं, वे बात नहीं करते, उपभोक्ता को फ़ायदा देते हैं। उसका परिणाम यह हुआ कि अधिकतर लोग अब पाकीजा रिटेल से खरीदारी करने लगे हैं और वहाँ है असली समस्या छोटे खुदरा व्यापारियों की, तो अब वे भी उपभोक्ताओं को विभिन्न स्कीमों का प्रलोभन दे रहे हैं। वैसे वाकई बड़े खुदरा व्यापारियों को पाकीजा की उपभोक्ता नीतियों का अध्ययन करना चाहिये, जो उनके लिये बहुत फ़ायदेमंद साबित हो सकता है।
ये तो भविष्य में उपभोक्ता ही तय करेगा कि कौन खुदरा बाजार पर राज करेगा मल्टी ब्रांड विदेशी खुदरा दुकानें या देशी खुदरा दुकानें, यह तो तय है कि जो भी उपभोक्ता को ज्यादा फ़ायदा देगा वही बाजार में सिरमौर होगा।





