Tag Archives: मेरी पसंद

ब्रजक्षैत्र के भोजन का आनंद और बच के रहें ब्रज के ठगों से भी..

    वृन्दावन में चाट और लस्सी का स्वाद अद्वितिय है, और ब्रजक्षैत्र का भोजन आज भी बेहद स्वादिष्ट होता है। हमने तकरीबन ३-४ बार लस्सी पी, जिसमें ऊपर से मलाई भी डाली जाती है और वह भी कुल्हड़ के गिलास में।

    जब निधिवन की ओर जाते हैं तो वहीं गोल चक्कर पर बहुत से गाईडनुमा लोग मिलते हैं, जो कि आपको बोलते हुए मिलेंगे कि आपको ३० रुपये मॆं ४ मंदिरों के दर्शन करवायेंगे, जिसमें से एक मंदिर में ये ठग ले जाते हैं। टाईल्स और चारों धाम के पुण्यों के नाम पर नकली रसीद और मीरा के भजनों के नाम पर लूटते हैं, इनसे सावधान रहें। हमसे भी यही कहा गया तो हमने १०० रुपये में अपना पीछा छुड़ाया, नहीं तो उनका तो कम से कम भाव ही १५००-१६०० रुपये का है, और कहते हैं कि जीवनभर एक घंटा आपके नाम का भजन होता रहेगा, यहाँ लगभग ३००० से ज्यादा मीराबाईयाँ रहती हैं, जो गाईड हमें मिला था वह तीन मंदिरों में दर्शन के बाद हमसे पैसा मांगकर भागने के चक्कर में था तो हमने उससे कहा कि भई चार मंदिर का बोला है, और जब तक चौथे मंदिर के दर्शन नहीं करवाते हम पैसे नहीं देंगे, ऐसे धार्मिक आस्था के खिलवाड़ करने वाले लुटेरों को उज्जैन मॆं भी देखते आ रहे हैं।

दक्षिण भारतीय शैली में मंदिरसेठ द्वारा बनवाया गया मंदिर का लकड़ी नक्काशी जैसा द्वार

परकोटे में मंदिरनक्काशी द्वार पर

बैकुण्ड द्वारमंदिर का लंबा गलियारा

मंदिर का बड़ा सा गलियारायह खंबा भी सोने का है

यह भी सोने का हैये भी सोने का है

विष्णुजी के दर्शन के पश्चातसोने का हाथी

हर्ष की कुछ शैतानियाँ

    हाँ यहाँ के बात और हर बात के बाद ये लोग बोलेंगे ताली बजाकर हँसिये तो जीवन भर हँसेंगे।

    जब मंदिरों के दर्शन हो गये और वक्त लगभग ११.३० हो चुका था, दोपहर की गर्मी से बेहाल थे, इतने बेहाल थे कि पैदल चलने की सोच भी नहीं पा रहे थे। इसलिये फ़िर से रिक्शे का सवारी के तौर पर उपयोग किया गया। पूरे वृन्दावन में बंदरों से सतर्क रहें, वे जूते, चप्पल, घड़ी, चश्मा, प्रसाद किसी पर भी हमला करके उसका भरपूर आनंद लेते हैं।

    एक ढ़ाबे पर चना मसाला, दाल और तंदूरी रोटियों का आनंद लिया गया, बहुत वर्षों बाद बाहर कहीं इतना स्वादिष्ट खाना खाया था। और उसके बाद फ़िर एक एक लस्सी का आनंद लिया गया। वक्त लगभग हो चला था दोपहर के १२ । हमारा मन मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के दर्शन करने का भी था पर १२ बजे से २ बजे तक जन्मभूमि के दर्शन बंद रहते हैं, और हमें आगरा में खरीदारी भी करनी थी और पारिवारिक मित्र के साथ मिलना भी था, तो हमने सोचा कि चलो अब सीधे आगरा चला जाये।

    गर्मी अपने भरपूर उफ़ान पर थी, और रास्ते में ऐसे बहुत सारे यातायात के साधन देखने को मिले जो वर्षों बाद देखे, जैसे कि जुगाड़, बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी।

सुबह ही हाइवे पर जाम, बांके बिहारी जी और निधि वन के दर्शन.. (Darshan of Banke Bihari ji, Vrindavan)

    २९ तारीख का कार्यक्रम पहले से ही तय था, वृन्दावन, मथुरा और आगरा और आगरा से मालवा एक्सप्रेस से उज्जैन। सुबह ५ बजे ही टैक्सी को बुला लिया गया था और तय किया गया था कि भोर ठंडे ठंडे वृन्दावन पहुँच जायेंगे, क्योंकि आजकल धौलपुर का तापमान ४५ डिग्री के ऊपर ही चल रहा है और पत्थरों का क्षैत्र है इसलिये झुलसा देने वाली हवाएँ खूब चलती हैं। दोपहर को वहाँ यह हालत होती है कि जिसको जरूरत होती है वह भी बाहर नहीं निकलता है।

धौलपुर बस स्टैंडचंबल के बीहड़ चंबल बीहड़धौलपुर के जाम में

    घर से टैक्सी में बैठे और जैसे ही हाइवे पर पहुँचे तो देखा कि वहाँ तो जाम लगा हुआ है, यहाँ फ़ोर लेन का काम चल रहा है मगर सरकारी गति से, वहाँ पर ड्राईवर ने किसी से पूछा जाम कब से है और कहाँ तक है, तो उत्तर मिला जाम तो पिछले २-३ घंटे से है और एक भी गाड़ी आगे नहीं जा पाई है, और जाम खुलने में कम से कम ३-४ घंटे और लग जायेंगे। ड्राईवर ने वहीं पर फ़ुर्ती से गाड़ी घुमाई और चल दिया दूसरे रास्ते की ओर, गाड़ी घुमाने के दौरान एक बाहर की गाड़ी भी वहीं जाम में फ़ँसी हुई थी, उसने पूछा कि क्या कोई और रास्ता भी है, ड्राईवर बोला कि आगरा जा रहे हैं, आना है तो पीछे हो लो, परंतु वह परिवार नहीं आया, एक कारण क्षैत्रकाल का भी हो सकता है, क्यूँकि वह चंबल क्षैत्र है जहाँ के नाम से ही बाहर के लोगों की पुँगी बजी रहती है। खैर हमारी गाड़ी कच्चे रास्तों को पार करते हुए लगभग १० मिनिट में ही हाईवे पर पहुँच गई और 80-100 की रफ़्तार से बातें करने लगी।

कच्चा रास्ता धौलपुर का ६कच्चा रास्ता धौलपुर का कच्चा रास्ता धौलपुर का १कच्चा रास्ता धौलपुर का २ कच्चा रास्ता धौलपुर का ३कच्चा रास्ता धौलपुर का ४ कच्चा रास्ता धौलपुर का ५फ़ोटो सतीश पंचम श्टाईल में

    हम सीधे वृन्दावन जा रहे थे, इसलिये न आगरा रुके और ना ही मथुरा। सुबह लगभग 8.30 बजे हम वृन्दावन पहुँच गये, सबसे पहले गये बांके बिहारी जी के मंदिर वहाँ बांके बिहारी की छटा देखते ही बनती है। वहाँ प्रसाद चढ़ाया और दर्शनों का आनंद लिया। कई महिलायें बांके बिहारी के भजन गा रही थीं, मन भावभिवोर हो उठा था, जैसे वे महिलायें नाच रही थीं और बांके बिहारी को मना रही थीं, हम भी भजन में मगन थे और सामने बांके बिहारी के दर्शन थे, बांके बिहारी इतने सुन्दर हैं कि वहाँ से जाने की कभी इच्छा ही नहीं होती। प्रसाद में छोटे कुल्लड़ में खुरचन होती है जो कि बांके बिहारी का असली प्रसाद है।

बांके बिहारी के दर्शन के बाद लस्सी के साथबांके बिहारी के दर्शन के बाद

    दर्शनों के बाद गलियों में ही चाट पकौड़ी और लस्सियों की कतार से दुकानें हैं, कहीं भी खा लीजिये स्वाद सबका एक जैसा शुद्ध खालिस देसी घी का बना हुआ। हमने एक टिक्की ली और एक फ़ुल लस्सी, ब्रजक्षैत्र के खाने का तो गजब ही आनंद है, जहाँ माखनचोर खुद रहते हों वहाँ भला स्वाद की कोई कमी होगी, और दोगुना स्वाद होगा।

    वृन्दावन में मंदिरों की कमी नहीं है, हमने २-३ मंदिरों के दर्शन और किये और फ़िर हम चल दिये निधि वन की तरफ़. जहाँ संत हरदास ने बांके बिहारी जी की प्रतिमा को प्रकट किया था । निधिवन बांके बिहारी जी का प्रगट स्थल है, जहाँ पर वृन्द (तुलसी) और कदंब      के पेड़ आज भी हैं और पूरा वन क्षैत्र है। यहाँ पर जिस स्थान पर बांके बिहारी जी प्रगट हुए थे, उस जगह पलंग और उस पर बिस्तर है, जहाँ कहा जाता है कि आज भी रासबिहारी कृष्ण राधा रानी के साथ रास करते हैं, इस बात की पुष्टि मंदिर के पुजारी ने भी की, और बताया कि रात को यहाँ कोई नहीं रुकता न पंछी ना जानवर और ना आदमी, और अगर कोई रुकता भी है तो वह अगले दिन सुबह इस स्थिती में नहीं रहता कि किसी को कुछ बता सके, वह या तो मोक्ष को प्राप्त हो जाता है या फ़िर अंधा, बहरा या गूँगा हो जाता है। आज भी उस बिस्तर पर फ़ूल बिछाये जाते हैं जो कि सुबह दबे हुए मिलते हैं, जिससे ऐसा लगता है कि कोई उस बिस्तर पर आया था। हमने जोश जोश में यहाँ का फ़ोटो खींच लिया था और वहाँ कहीं लिखा भी नहीं था कि फ़ोटो लेना मना है, तो पुजारी ने बड़े प्रेम से बोला कि भैयाजी यह फ़ोटो काट दीजिये आप ही की भलाई के लिये बोल रहा हूँ, उस पुजारी ने इतने प्रेम से बोला और बांके बिहारी से जुड़ी बात थी तो हमने फ़ट से फ़ोटो अपने मोबाईल से हटा दिया मतलब काट दिया। लगभाग सभी मंदिरों में फ़ोटोग्राफ़ी वर्जित है।

निधिवन १निधिवन २ निधिवन ३निधिवन ४ निधिवन मेंनिधिवन राजक्षैत्र   बैकुण्ड द्वार लकड़ी दरवाजा वृन्दावन के एक मंदिर में वृन्दावन की गलियों में रिक्शे पर वृन्दावन में वृन्दावन में १ वृन्दावन में २ हाईवे पर

आगे का विवरण अगली पोस्ट में, लंबी होने से बोझिल होने लगेगी..

॥ बांके बिहारी लाल की जय॥

३७ घंटे का लंबा सफ़र और अब बांके बिहारी के दर्शन

    आखिरकार ३७ घंटे का लंबा सफ़र कल सुबह खत्म हुआ और थकान तो बिल्कुल थी ही नहीं, बिल्कुल भी नहीं। शायद बहुत वर्षों बाद इतना सोये और आत्मचिंतन का समय मिला। एक तरह से इसके लिये रेल्वे की कर्नाटक एक्सप्रेस के ए.सी. २ के उस डिब्बे को भी धन्यवाद ज्ञापित होना चाहिये अगर उसके प्लग में पॉवर आती तो पूरा समय हम लेपटॉप पर ही बिता देते। अच्छा हुआ कि पॉवर नहीं थी।

    और इतने आराम के बाद भरपूर ऊर्जा का एहसास हुआ, जैसा कि आमतौर पर होता है कि हर सफ़र के बाद जिंदगी के कुछ पाठ सीखने को मिलते हैं, इस बार भी मिले। वह अब अगली किसी पोस्ट में लिखेंगे, भरपूर ऊर्जा से युक्त जब हमने अपने ट्रेन के सफ़र का अंत ग्वालियर में किया और बस स्टैंड की तरफ़ बड़े तो गर्मी के तलख मिजाज का अहसास हो गया, हालांकि उस समय सुबह के ५.३० बजे थे और गर्मी के तेवर देखते ही बन रहे थे, हम ए.सी. से निकलने के बाद पसीने में तर हो रहे थे। बस स्टैंड पहुँचते ही चंबल के लोगों की तल्खी का अंदाज दिखने लगा।

    दिल्ली जाने वाली बस में धौलपुर के लिये बैठे, बस थी एम.पी. रोडवेज की जो कि बहुत ही ज्यादा घाटॆ में चल रही है और या तो बंद होने वाली है या हो चुकी है, पूरी जानकारी नहीं है। सरकारें कोई सी भी आ जायें पर घाटे में चलने वाले उपक्रमों का हाल वही रहता है, कोई रेड इंक को बदलना ही नहीं चाहता है।

    हम भी एम.पी. रोडवेज की बस में ही चढ़ लिये पीछॆ ही राजस्थान रोडवेज की बस थी, दोनों बसों में देखते ही जमीन आसमान का अंतर पता चल रहा था, कहाँ एम.पी. की खटारा बस और कहाँ राजस्थान की ए.वन. नई दुल्हन सी चमचमाती मोटर। खैर एम.पी. का सपोर्ट करते हुए हम चढ़ लिये। और एक घंटे की जगह दो घंटे में धौलपुर पहुँच गये।

आज बांके बिहारी के दर्शन के लिये निकल रहे हैं, वृन्दावन धाम।

॥ जय बांके बिहारी लाल की ॥

दस दिन की यात्रा पर निकल रहे हैं धौलपुर (राजस्थान), वृन्दावन, मथुरा, आगरा, इंदौर और उज्जैन

    आज हम दस दिन की यात्रा पर निकल रहे हैं, और इस दौरान हम धौलपुर (राजस्थान), वृन्दावन, मथुरा, आगरा, इंदौर और उज्जैन शहर की यात्राएँ करेंगे।
    आज २६ मई को हम कर्नाटक एक्सप्रेस से ग्वालियर के लिये निकल रहे हैं और फ़िर आगे का सफ़र बस से जो कि धौलपुर का एक घंटे का है।
    वैसे तो कई बार लंबी यात्राएँ कर चुके हैं, परंतु इतनी लंबी यात्रा बहुत दिनों बाद हो रही है, देखते हैं कि क्या क्या अनुभव होते हैं, कैसे यात्री मिलते हैं।
    जिंदगी अब इस मोड़ पर है कि अब जिंदगी के कुछ अहम निर्णय भी लेना हैं।
    वृन्दावन में द्वारकाधीश (ठाकुरजी), मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के दर्शन का लाभ लेंगे और उज्जैन में तो हर मंदिर के दर्शन का लाभ लेंगे।
    इस दौरान सफ़र में पढ़ने के लिये काफ़ी समय रहेगा, वैसे तो हमने बी.एस.एन.एल. का डाटा कार्ड ब्राडबैंड लिया है, अगर सिग्नल बराबर मिलते रहे तो इस बार अधिकतम ब्लॉगों को पढ़ने की योजना है और एक किताब जो अभी हम पढ़ रहे हैं, वह भी साथ ही रहेगी।
    इस प्रकार वापसी ४ जून की सुबह भोपाल से राजधानी एक्सप्रैस से बैंगलोर के लिये होगी जो कि बैंगलोर ५ जून प्रात: पहुँचेगी।
    आशा है और उम्मीद है कि यात्रा सुखद होगी और भरपूर ताजगी छुट्टियों के दौरान मिलेगी ।
* *** जय महाकाल *** *

टाटा ने सुनाई फ़िरंगियों को खरी खरी, अंतर है मानसिकता का, विकसित और विकासशील राष्ट्र का… (Tata in london)

    टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा ने कल लंदन में फ़िरंगियों को खरी खरी सुनाई, कि फ़िरंगी लोग ज्यादा काम नहीं करना चाहते और काम करने की इच्छाशक्ति की कमी है।

    अगर शाम को मीटिंग चल रही है और वह छ: बजे तक चलने वाली है तो लोग ५ बजे यह कहकर निकल लेंगे कि हमारी ट्रेन का समय हो गया है और अब हमें घर जाना है, यह घर जाने का समय है।

    सिंगूर का उदाहरण देते हुए बताया कि लगभग ८५% प्लांट तैयार था पर समस्या को देखते हुए गुजरात में नैनो कार का प्लांट लगाया गया और सारे उपकरणों को भी सिंगूर से गुजरात लाया गया और समय पर उत्पादन शुरू किया गया। सारी कानूनी कागजी कार्यवाही भी समय से कर ली गई। अगर यही बात लंदन में की जाये कि प्लांट की जगह समस्या के कारण आखिरी समय पर बदलना है तो यहाँ के प्रबंधन के हाथ पैर फ़ूल जायेंगे और कानूनी कागजी कार्यवाही का हवाला देकर जगह नहीं बदल पायेंगे। फ़िरंगियों की काम करने की इच्छाशक्ति में कमी है और बहुत गहरी निराशा फ़िरंगियों में भरी हुई है।

    ये तो समाचार था परंतु इसके पीछे क्या कारण हैं, वे टाटा ने नहीं सोचे होंगे क्योंकि उनको तो भारत के कर्मचारियों के साथ काम करने की आदत है जो कि वक्त पड़ने पर लगातार अपने काम के समय से भी ज्यादा काम कर सकते हैं। और वाकई कई बार उत्पादन कंपनियों में इसकी जरूरत भी होती है।

    इसके पीछे मानसिकता का बहुत बड़ा अंतर है, भारत विकासशील राष्ट्र है, भारत में बेरोजगारी है, और भारतीय रुपये का मूल्य जानते हैं, उन्हें पता है कि अगर काम ठीक चलेगा तो सब ठीक चलेगा और अगर काम ठीक नहीं चलेगा तो कुछ ठीक नहीं चलेगा।

    पर फ़िरंगियों का देश विकसित देशों की श्रेणी में आता है और उन्हें ज्यादा काम करने की आदत भी इसीलिये नहीं है और करना भी नहीं चाहते हैं क्यूँकि उनको इसकी जरूरत नहीं है, फ़िरंगी लोग Work Life Balance का फ़ार्मुला अपनाते हैं, कि सबको बराबर समय दिया जाये, और अपने समय का सही तरीके से उपयोग करते हैं।

    भले ही टाटा ने फ़िरंगियों की दो बड़ी कंपनियों को खरीद लिया है परंतु उनके प्लांट में काम तो उनसे ही करवाना है, इसलिये टाटा को शायद उनकी इन आदतों को भी स्वीकारना होगा और भारतियों से उनकी तुलना करना बंद करनी होगी। अभी भारत को विकसित देश की श्रेणी में आने के लिये भारी मश्क्कत का सामना करना है।

    विकसित देश की श्रेणी में आने के लिये राजनैतिक इच्छाशक्ति चाहिये जो कि भारत की सरकार में नहीं है, उद्योंगों को बढ़ावा देने के लिये सरकार को नियम शिथिल करना होंगे और भ्रष्टाचार का खात्मा करना होगा।  अगर इतना ही हो गया तो भारत के विकसित देशों की श्रेणी में आने से कोई नहीं रोक सकता।

     हमारी अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है और भारत दुनिया में बहुत बड़ा बाजार है, तभी तो अमेरिका की कंपनियाँ भारत में अपनी दुकानें खोलने को मरी जा रही हैं, पर भारत को अभी अमेरिकी दुकानों की जरूरत नहीं है, पहले भारत अंदर से अपने को सुधार ले फ़िर हालात यह होंगे कि फ़िरंगियों और अमेरिकी धरती पर भारतीय दुकानों के परचम लहरायेंगे।

अब स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com का क्या होगा ? लालच की पराकाष्ठा कर दी ।

पहली पोस्ट – स्पीक एशिया ऑनलाईन संभावित बड़ा घोटाला तो नहीं (Probable Scam SpeakAsiaOnline.com !!)

    मेरी पहली पोस्ट स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com पर १७ अप्रैल को थी, इससे पहले तो मैंने इस कंपनी के बारे में कुछ सुना भी नहीं था। खैर अब मछली मगरमच्छ हो गई है और अब सब उसका क्रेडिट लेने में लगे हैं।

    जबकि अक्टूबर में मनीलाईफ़ पत्रिका ने इनके व्यवसाय के बारे में आपत्ति जताते हुए लिखा था कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया, आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो क्या सो रहे हैं ?

    खैर अब तो सबके सामने सच आ ही गया है, १ महीने पहले इस कंपनी के पास ९ लाख लोग थे और १ महीने में ही १० लाख लोगों को जोड़ लिया है। सोचिये अब यह संख्या बढ़कर १९ लाख हो गई है।यह तो लालच और बिना कुछ करे कमाने की हम भारतियों की पराकाष्ठा है।

    कई ऐसे लोगों को देखा जो कि ४-५ हजार की निजी नौकरी कर रहे थे और जैसे तैसे अपना घर चला रहे थे, उन्होंने लाख रुपये स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com में लगाकर ४० हजार कमाने के ख्बाब देखे और अब कंपनी के ऊपर मीडिया और सरकार का दबाब पड़ने लगा है, अगर स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com गायब हो गई तो इन लोगों के लाख रुपये कौन लौटायेगा और सबसे बड़ी बात क्या इनको आसानी से वापिस नौकरी मिल पायेगी। आज यह घोटाला लगभग 1900 करोड़ रुपये का हो चुका है।

    और जो लोग इससे कमा रहे हैं, वे मीडिया और सरकार का विरोध कर रहे हैं, कि स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com एक तो भारत के बेरोजगारों को रोजगार दे रहा है और सभी लोग उसे बंद करवाने के पीछे पड़े हैं, और इन बेरोजगारों और लालची लोगों को क्या यह बात समझ में नहीं आती है,  कि ये मीडिया और सरकार केवल स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के पीछे ही क्यों पड़े हैं, और किसी कंपनी के पीछे क्यों नहीं। अगर स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com बताये कि उनकी आमदनी का क्या जरिया है, और अपनी बैलेन्स शीट सबके सामने रखे तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।

    अगर नेट और सर्वे से पैसे कमाना इतना ही आसान होता तो शायद नेट का उपयोग करने वाले लोग करोड़पति अरबपति हो चुके होते।

    अभी कुछ दिन पहले २ लाख लोगों को स्टॉकगुरुइंडिया ५०० करोड़ का चूना लगाकर गायब हो चुकी है, उनका व्यापार भी कुछ इनकी तरह से ही था।

    वैसे भी हिन्दुस्तान टाईम्स सिंगापुर जाकर स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के ऑफ़िस की पड़ताल आज कर चुका है, और वहाँ कुछ भी नहीं मिला है। और अब आयकर विभाग की भी आँख खुली है (चलो देर से ही सही, जब जागो तब सवेरा)।

संगीत विज्ञान के बारे में …

    संसार मे संगीत विज्ञान की सबसे पहली जानकारी सामवेद में उपलब्ध है। भारत में संगीत, चित्रकला एवं नाट्यकला को दैवी कलाएँ माना जाता है। अनादि-अनंत त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और शिव आद्य संगीतकार थे। शास्त्र-पुराणों में वर्णन है कि शिव ने अपने नटराज या विराट-नर्तक के रूप में ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और लय की प्रक्रिया के नृत्य में लय के अनंत प्रकारों को जन्म दिया। ब्रह्मा और विष्णु करताल और मृदंग पर ताल पकड़े हुए थे।

    विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को सभी तार-वाद्यों की जननी वीणा को बजाते हुए दिखाया गया है। हिंदू चित्रकला में विष्णु के एक अवतार कृष्ण को बंसी-बजैया के रूप में चित्रित किया गया है; उस बंसी पर वे माया में भटकती आत्माओं को अपने सच्चे घर को लौट आने का बुलावा देने वाली धुन बजाते रहते हैं।

    राग-रागिनियाँ या सुनिश्चित स्वरक्रम हिन्दू संगीत की आधाराशिलाएँ हैं। छह मूल रागों की १२६ शाखाएँ-उपशाखाएँ हैं जिन्हें रागिनियाँ (पत्नियाँ) और पुत्र कहते हैं। हर राग के कम-से-कम पाँच स्वर होते हैं: एक मुख्य स्वर (वादी या राजा), एक आनुषंगिक स्वर (संवादी या प्रधानमंत्री), दो या अधिक सहायक स्वर (अनुवादी या सेवक), और एक अनमेल स्वर (विवादी या शत्रु)।

    छह रागों में से हर एक राग की दिन के विशिष्ट समय और वर्ष की विशिष्ट ॠतु के साथ प्राकृतिक अनुरूपता है और हर राग का एक अधिष्ठाता देवता है जो उसे विशिष्ट शक्ति और प्रभाव प्रदान करता है। इस प्रकार (१) हिंडोल राग को केवल वसन्त ऋतु में उषाकाल में सुना जाता है, इससे सर्वव्यापक प्रेम का भाव जागता है; (२) दीपक राग को ग्रीष्म ऋतु में सांध्य बेला में गाया जाता है, इससे अनुकम्पा या दया का भाव जागता है; (३) मेघ राग वर्षा ऋतु में मध्याह्न काल के लिये है, इससे साहस जागता है; (४) भैरव राग अगस्त, सितंबर, अक्तूबर महीनों के प्रात:काल में गाया जाता है, इससे शान्ति उत्पन्न होती है; (५) श्री राग शरद ऋतु की गोधुली बेला में गाया जाता है, इससे विशुद्ध प्रेम का भाव मन पर छा जाता है; (६) मालकौंस राग शीत ऋतु की मध्यरात्रि में गाया जाता है; इससे वीरता का संचार होता है।

बस में हमने सुनी दो टूटे दिलों की दास्तान…

    ऑफ़िस से आते समय रोज ही कोई न कोई नया वाकया पेश आता है और वह अपने आप में जिंदगी का बड़ा अनुभव होता है।

    पहले तो सामने वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी, जो कि मोबाईल पर किसी से चहक कर बातें कर रही थी, उसके पास लेनोवो का IDEALPAD नाम का लेपटॉप का कवर और उसका बैग था, लेपटॉप अपनी नई पैकेजिंग में था और उसके ऊपर के टैग अभी तक उसी पर झूल रहे थे, वह लड़की अपने लेपटॉप के बारे मॆं ही किसी को बता रही थी, जो कि शायद उसका बहुत करीबी होगा जिससे वह खुशी बांट सकती थी। “देख एक समय वो था और एक समय यह है कि अब मैंने लेपटॉप तक ले लिया है, अच्छे दिन आ गये हैं, और मैं इस बात से बहुत खुश हूँ।”

    थोड़ी देर बात करने के बाद उस लड़की ने अपना आई.पोड कान में लगाया और अगले ही स्टॉप पर उतर गई।

    उसके बाद दोनों सीट खाली हों गई क्योंकि एक सीट पर तो वह लड़की खुद बैठी थी और दूसरी सीट पर उसका समान ।

    उसी स्टॉप से एक लड़का और लड़की चढ़े, दोनों संभ्रांत घर से लग रहे थे, और लड़की बहुत सुन्दर थी (सुन्दर लड़की की तारीफ़ करना कोई बुरी बात तो नहीं, मतलब कि सुन्दर कहना)। दोनों ने आकर्षक कपड़े पहने हुए थे, और उनकी बातें शुरु हुईं।

    पहले लड़का बोला कि “मैं पहले ३ हजार रुपये कमाता था और पंद्रह सौ रुपये जमाकर बाकी पंद्रह सौ से घर चलाता था और उसी समय वह मेरी जिंदगी में आई और मेरी जिंदगी में इस कदर शामिल हो गई, जैसे जिस्म से साँस । तभी उसकी जिंदगी में एक लड़का आया और उसके पास वह सब कुछ था जो मेरे पास नहीं था और वह उसके पास चली गई, मेरे दोस्तों ने मुझे बहुत समझाया था कि लड़कियों के चक्कर में मत पड़, पर जब आदमी का दिल मजबूर होता है तो  दिमाग चलना बंद हो जाता है।”

    लड़की ने ठंडी सांस भरी और कहा “ओह्ह्ह्ह”

    अब लड़की बोली “मैं और वह करीबन ४ साल पहले मिले थे और बहुत अच्छे मित्र थे, धीरे धीरे कब इतने पास आ गये पता ही नहीं चला, उसकी अच्छी नौकरी लग गई और वह टोरोंटो चला गया और मुझे बिसरा दिया, मुझे उसने अपनी जिंदगी से हर तरह से ब्लॉक कर दिया, अपने हर कॉन्टेक्ट को मिटा दिया, जो हमारे कॉमन फ़्रेंड्स थे उन तक को उसने ब्लॉक कर दिया और अपना नया मोबाईल नंबर नहीं दिया।””

    “पता नहीं किस बात पर वह मुझसे उखड़ा था और अगर ब्रेकअप करना ही था तो कम से कम मुझे बोला तो होता तो मैं भी मानसिक रुप से तैयार रहती, लेकिन उसने अपने लिये रास्ता खुला रखा और मुझे पता है कि जब जिंदगी में उसे कहीं भी मेरी जरूरत होगी तो वह फ़िर कोई नई अच्छी सी कहानी लेकर मेरे पास आयेगा और मनाने की कोशिश करेगा,  आखिरकार मैंने भी फ़ैसला लिया कि अब ब्रेकअप ही सही, और मैंने भी अपने सारे कॉन्टेक्ट्स उसके लिये ब्लॉक कर दिये हैं, अपना जीमैल का पता भी बदल दिया, पर ऐसा मेरी किस्मत में ही क्यूँ लिखा था”।

    दोनों बहुत ही रुआँसे और मायूस नजर आ रहे थे, वे बहुत धीमे बातें कर रहे थे परंतु फ़िर भी उनकी बहुत ही गोपनीय बातें सुन ही लीं, यह मेरी गलती है और वे दोनों बातें करते हुए सकुचा भी रहे थे, क्यूँकि वाकई अगर कोई परिचित सुन ले तो अच्छा नहीं लगेगा। उन दोनों की बातें इतनी दर्द से भरी हुईं थीं कि उनकी बातें न सुनने का निर्णय मेरे लिये असाध्य रहा।

    खैर मेरा बस स्टॉप आ गया और मैं उतर गया, उन दोनों को वोल्वो के काँच से देखते हुए उनके लिये दुआ करते हुए कि भगवान इन दुखी दिलों पर रहम की बारिश कर और उनके ऊपर कृपा कर।

ज्ञान, क्रोध और ईश्वर ….. योगी कथामृत .

ज्ञान –

“छोटे योगी, मैं देख रहा हूँ कि तुम अपने गुरु से दूर भाग रहे हो। उनके पास वह सब कुछ है जिसकी तुम्हें आवश्यकता है; तुम्हें उनके पास लौट जाना चाहिये।” आगे उन्होंने कहा, “पर्वत तुम्हारे गुरु नहीं बन सकते” – दो दिन पहले श्रीयुक्तेश्वरजी द्वारा प्रकट किया गया वही विचार।

“सिद्ध जन केवल पर्वतों में ही निवास करें, ऐसा कोई विधि का विधान नहीं है।” मेरी ओर रहस्यपूर्ण दृष्टि से देखते हुए वे कहते जा रहे थे : “भारत और तिब्बत के हिमालय शिखरों का सन्तों पर कोई एकाधिकार नहीं है। जिसे अपने अन्दर पाने का कष्ट न किया जाय, उसे शरीर को यहाँ -वहाँ ले जाने से प्राप्त नहीं किया जा सकता। जैसे ही साधक आध्यात्मिक ज्ञानलाभ के लिये विश्व के अंतिम छोर तक भी जाने को तैयार हो जाता है, उसक गुरु उसके पास ही प्रकट हो जाता है।”

मन ही मन मैं इस बात से सहमत हो गया।

“क्या तुम एक ऐसे छोटे-से कमरे की अपने लिये व्यवस्था कर सकते हो जिसका दरवाजा बंद कर तुम अन्दर एकान्त में रह सको ?”

“जी, हाँ ।” मेरे मन में यह विचार उभर आया कि ये सन्तवर इतनी विलक्षण गति से सामान्य स्तर की बातों से व्यक्तिगत स्तर पर उतर आते हैं।

“तो वही तुम्हारी गुफ़ा है।” योगिराज ने ज्ञान जगा देने वाली एक ऐसी दृष्टि मुझ पर डाली कि मैं उसे आज तक नहीं भूल पाया। “वही तुम्हारा पावन पर्वत है। वहीं तुम्हें ईश्वर की प्राप्ति होगी।”

उनके इन सरल शब्दों ने हिमालय के लिये मेरे मन में बैठी तीव्र आसक्ति एक पल में समाप्त कर दी। धान के एक दाहक खेत में मैं पर्वतों और अनंत बर्फ़ के स्वप्न से जाग गया।

क्रोध –

क्रोध केवल इच्छा के अवरोध से उत्पन्न होता है। मैं कभी दूसरों से कोई उपेक्षा नहीं रखता, इसलिये उनका कोई भी कार्य मेरी इच्छाओं के विपरीत नहीं हो सकता। मैं अपने किसी स्वार्थ के लिये तुम्हारा उपयोग कई नहीं करता; मैं तो केवल तुम्हारे सच्चे सुख में ही खुश हूँ।”

ईश्वर –

“इहलौकिक सुखों से हम कितनी जल्दी ऊब जाते हैं  ! भौतिक सुखों की कामनाओं का अन्त नहीं है; मनुष्य कभी पूर्ण तृप्त नहीं होता और एक के बाद दूसरे लक्ष्य के पीछे दौड़ता ही रहता है। सुख के लिये वह जिस “कुछ और” की खोज करता रहता है वह ’कुछ और’ ईश्वर ही है और केवल वही शाश्वत आनन्द प्रदान कर सकता है।

“बाह्य इच्छाएँ हमें अभ्यनतर के ’स्वर्ग’ से बाहर खींच लाती हैं; वे मिथ्या आनन्द देती हैं जो आत्मिक आनन्द का छद्म आभास मात्र है। खोया हुआ आनतरिक स्वर्ग दिव्य ध्यान के द्वारा शिघ्र ही पुन: प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर अकल्पित नित्य-नूतनता है, अत: हम कभी उससे ऊब नहीं सकते। परमानन्द अनन्त काल तक सदा के लिये आह्लादक विविधताओं से भरा हो उससे क्या कभी किसी का मन भर सकता है ?”

“अब समझ में आया गुरुदेव, कि सन्तों ने ईश्वर को अगाध क्यों कहा है। अमर जीवन भी ईश्वर को समझने के लिये पर्याप्त नहीं है।”

व्यक्ति के दिमाग का फ़ितूर और कैसे छोटी छोटी चीजें हमारा जीवन हमारी आदत बदल देती हैं ।

    व्यक्ति के दिमाग में अगर कोई बात बैठ जाये तो उसे निकालना बहुत ही मुश्किल होती है, और हमें वह बात पता नहीं कहाँ से हर समय याद आ जाती है।

    मसलन थोड़े समय पहले हमने आयुर्वेद की एक किताब में पढ़ा था कि नहाते वक्त सीधे सर पर पानी नहीं डालना चाहिये पहले पैर पर फ़िर धड़ पर और फ़िर अंत में सिर पर पानी डालना चाहिये, इससे शरीर अनुकूल होता जाता है और बीमारियों से बचाव भी होता है। और कुछ हुआ हो या ना हुआ हो, आज तक वही याद रहता है और उसी तरह से नहा रहे हैं व कभी अगर गलती से भी गलती करने की कोशिश होती है तो फ़ौरन सुधार देते हैं, यह बात पता नहीं दिमाग में हमेशा याद रहती है कि कहीं कोई अनिष्ट ना हो जाये।

    ऐसे ही थोड़े दिन पहले एक ईमेल आया कि अगर बटुआ आप जेब में रखते हैं तो रीढ़ की हड्डी ९० डिग्री से कुछ डिग्री झुक जाती है, क्योंकि एक और बटुआ होने से व्यक्ति एक तरफ़ झुक जाता है, बात तो सही है, पता नहीं कितनी सही और कितनी गलत परंतु हाँ अब बटुआ पीछे से निकल जा चुका है, बटुआ रखने का स्थान बदल दिया गया है।

    अब अगर बटुआ पीछे पैंट की जेब में रखा भी हो तो एकदम से वह ईमेल याद आ जाता है, और अपनी रीढ़ की हड्डी की फ़िक्र में बटुए की जगह बदल देते हैं। हालांकि यह ईमेल खोजा परंतु मिला नहीं अगर कभी मिला तो जरूर पोस्ट पर लगाऊँगा।

    पहले मोबाईल शर्ट की ऊपर की जेब में रखते थे तो सबने मना कर दिया और न्यूज चैनल वालों ने तो हल्ला ही मचा दिया था, बस वह आदत जो छूटी है आज तक छूटी ही है, और अगर कभी गलती से कभी शर्ट में मोबाईल रख भी लिया तो जल्दी से निकाल कर हाथ में ले लेते हैं, नहीं तो ऐसा लगता है कि जिन लोगों ने मना किया था वे सब अपनी आँखें बस मुझ पर ही गड़ाये हुए हैं।

इस तरह की छोटी छोटी चीजें हमारा जीवन हमारी आदत बदल देती हैं।