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सॉफ़्टवेयरों सावधान बयान देने पर अवमानना का नोटिस मिल सकता है

पिछली  पोस्ट आखिरकार कम्प्यूटर से वायरस निकलने को सहमत हुए   के बाद सदन हरकत में आ गया और जैसे ही कम्प्यूटर को बिजली मिली और बूट हुआ, वैसे ही रैम ने ऑफ़िस सॉफ़्टवेयर पर आरोप लगाया कि कार्य धीमा होने का कारण रैम को करार दिया जा रहा है, जबकि रैम ने आरोप लगाया है कि ऑफ़िस सॉफ़्टवेयर का धीमा प्रदर्शन चलने का कारण वायरस है जो कि उसके अंदर घुसपैठ कर गया है और इसके लिये एन्टीवायरस की जरूरत है।

रैम ने अपने ऊपर आरोप लगाने पर सदन में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा और सदन में उसे पारित कर दिया गया नहीं तो कल नोटपैड और वर्डपैड्र जैसे छोटे सॉफ़्टवेयर जो कि खुद के ही घर के हैं वे भी आरोप लगाने लगेंगे।

तो सारे सॉफ़्टवेयरों सावधान, अगर किसी ने भी हार्डवेयर पर आरोप लगाया तो सदन में विशेषाधिकार का प्रस्ताव पारित किया जा सकता है।

ये अलग बात है कि कैश मैमोरी ने प्रोसेसर की कूलिंग पर ही सवाल खड़े कर दिये हैं, ज्ञात रहे कि प्रोसेसर कम्प्यूटर राष्ट्र के प्रथम नागरिक हैं, परंतु रैम की इतनी हिम्मत कहाँ कि कैश मेमोरी के खिलाफ़ प्रथम नागरिक को सफ़ेद हाथी कहने पर विशेषाधिकार हनन कर सदन में अवमानना का नोटिस जारी करने की हिम्मत हो।

आखिरकार कम्प्यूटर से वायरस निकलने को सहमत हुए

    पिछले ६४ वर्षों से कम्प्यूटर में वायरसों ने अपनी पैठ बना ली थी और घूस तंत्र जबरदस्त तरीके से तैयार कर लिया था, पर आखिर कार आम सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर की जबरदस्त माँग और अनशन के मद्देनजर सभी घूसखोर डिवाईसों ने आश्वासन दिया है कि इसके लिये एक एन्टीवायरस तैयार किया जायेगा।

     जब कम्प्यूटर बनाया गया था तब उसमें बहुत कम चीजें थीं पर जैसे जैसे जरूरत पड़ती गई, वैसे वैसे नई डिवाइसों के अविष्कार होते गये जैसे सीडी, डीवीडी, पेनड्राईव, माऊस इत्यादि। अविष्कार तो इनका किया गया था कि ये आम आदमी की जरूरतों को पूरा करेंगे और कम्प्यूटर को पूर्ण सहयोग करेंगे, उस समय यह न सोचा गया था कि ये सभी घूस नामक वायरस से प्रभावित हो जायेंगे। सोचा गया था कि कोई सा भी ऑपरेटिंग सिस्टम होगा उनके साथ सहयोग करेंगे।

    परंतु कालांतर में घूसखोरी बड़ती गई और अब ये हालात हो गये थे कि सीडी ड्राईव रीड करने के पहले घूस मांगती है, डीवीडी ड्राईव सीडी रीड करने से मना कर देती है, कह देती है कि लैंस ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, परंतु घूस पकड़ाते ही सारे लैंस अपने आप ठीक हो जाते हैं और फ़्लॉपी भी रीड करने को तैयार करने को हो जाती है ये डीवीडी ड्राईव । भले ही फ़्लॉपी लगाने की जगह नहीं हो परंतु फ़्लॉपी रीड करने का भी वादा कर लेगी ये डीवीडी ड्राईव। पेनड्राईव ने डाटा कॉपी करने से मना कर दिया, पेनड्राईव कहती है कि पहले घूस दो नहीं तो मैं कम्प्य़ूटर को करप्ट दिखने लगूँगी, तो हम कहते चिंता मत कर हम तुझे फ़ोर्मेट कर देंगे, तो पेनड्राइव हँसकर बोली कि तुम्हारा डाटा चला जायेगा जो पहले से तुमने मेरे अंदर स्टोर कर रखा है, चुपचाप घूस दे दो और अपना काम करो, नहीं तो करना फ़िर मेहनत, फ़िर डाटा के लिये भागते रहना इधर उधर।

    वो तो भला हो रैम का जो आजकल घूस नहीं मांगती, रैम बेचारी को विन्डोज के भारीभरकम सॉफ़्टवेयरों ने इतना काम दे दिया है कि उसे सर उठाने की फ़ुरसत ही नहीं मिलती। यही हाल प्रोसेसर का है, बेचारा भाग भागकर कैलकुलेशन करता रहता है, और घूस के चक्कर में सोच ही नहीं पाता है, वैसे सही भी है जो मेहनत ज्यादा करता है उसी को ज्यादा काम भी दिया जाता है जिससे कम से कम संस्था की साख बची रहती है, ये तो मानेंगे कि रैम और प्रोसेसर के दम पर ही कम्प्यूटर संस्था की साख बची हुई है।

    सबसे जबरद्स्त घूसखोर थी 1.44” की फ़्लॉपी ड्राईव, इतनी जबरदस्त कि अगर घूस न दी तो बिल्कुल काम ही नहीं करती थी यहाँ तक कि फ़्लॉपी अंदर तक लेने से मना कर देती थी, और तो और आलम यह था उसकी घूसखोरी का कि घूस खाने के बाद भी फ़्लॉपी पर रीड और राईट करने का अधिकार उसी का था, मर्जी होगी तो करेगी नहीं तो नमस्ते, पैसे भी गये और डाटा भी।

    आखिरकार रैम और प्रोसेसर ने दम दिखाया और एकता जगाई और कम्प्य़ूटर के सारे आम पार्ट्स इकट्ठा हुए और उन्होंने अनशन शुरू कर दिया, परंतु कम्प्यूटर ने उनकी सुनने से मना कर दिया कह दिया कि हमारे पास एक्स्ट्रा रैम नहीं है हार्ड डिस्क नहीं है हम आपकी माँगे नहीं मान सकते और छोटे ब्यूरोक्रेट्स की तो बिल्कुल भी नहीं, पर कम्प्यूटर के आम पार्ट्स मानने को तैयार नहीं थे और उन्होंने मदरबोर्ड पर ही धरना देना शुरू कर दिया। कम्प्यूटर को लगा कि ये मान जायेंगे परंतु जब देखा कि प्रोसेसर से रैम तक निकलने वाले घूसखोरी मुहीम के आंदोलन में आम पार्ट्स की संख्या बड़ती ही जा रही है, तब जाकर कम्प्यूटर को चिंता हुई और उन्होंने अपने सदन को बुलाया और अनशनकारियों से बात करना शुरू की, तो कीबोर्ड और माऊस जो कि कम्प्यूटर की तरफ़ से बातें कर रहे थे वे जब मर्जी होती अनशनकारियों से बातचीत में धोखा देते, पर आम पार्ट्स के आंदोलनकारियों की संख्या देखकर आखिरकार कम्प्यूटर को झुकना ही पड़ा।

    इसी बीच कई मध्यस्थ आये बहुत सारे व्यवसायी अपने अपने एन्टिवायरस लेकर आये परंतु अनशनकारियों की माँग थी कि ऐसा एन्टीवायरस बने जो कि किसी भी प्रकार के घूस के वायरस से निपटने में सक्षम हो, और आखिरकार कम्प्य़ूटर सदन में ध्वनिमत से घूस के एन्टीवायरस के लिये प्रस्ताव पारित हो गया है। अनशनकारियों का आंदोलन खत्म हो गया है। और चारों तरफ़ खुशियों का माहौल है, विन्डोज के सारे वर्शन खुश हैं कि अब मुझे काम करने के लिये ज्यादा जगह मिलेगी और इसी खुशी में विन्डोज ने अपना स्क्रीनसेवर चला दिया है जिसमें से रंगबिरंगी आतिशबाजी चालू है।

    परंतु घूसखोरी चालू है, क्योंकि अभी तो एन्टीवायरस कौन सा हो और कैसे काम करेगा इस पर आखिरी मोहर कीबोर्ड और माऊस की समिती को लगाना है जो कि चारा, कैश रकम देना और २ जी जैसे बड़े बड़े घोटालों में लिप्त हैं। अब देखते हैं कि कौन सा एन्टीवायरस लाया जाता है और इस घूसतंत्र से निपटने में कितनी आसानी होती है और कम्प्यूटर अच्छी तरह से काम करने लगता है।

बच्चों की बाल सुलभ हरकतें और मानवीय संवेदनाएँ

    बच्चों की बाल सुलभ हरकतें सभी को लुभाती हैं, आज घर वापिस आते समय सामने की सीट पर एक बालक था अपने मम्मी पापा की गोद में, और लगभग ६-८ माह का बालक होगा जो कि खुशी की किलकारियाँ मार रहा था, सभी के मन हर्ष से आह्लादित थे।

    एक अन्जाने बालक के लिये अचानक ही इतने सारे लोगों के मन में प्यार उमड़ आना एक स्वाभाविक मानवीय क्रिया है। कभी बालक वोल्वो के काँच पर हाथ लगाकर खुश होता तो कभी माँ की गोदी में तो कभी पिता के हाथों में।

    पास ही एक कार जा रही थी जिसे एक लड़की चला रही थी, और बस भी सिग्नल पर रुकी हुई थी, तो बह लड़की भी उस बालक की बाल सुलभ हरकतों को देखकर पुलकित हो रही थी, अचानक ही ताजगी की बयार बहने लगती है।

    बस में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी और बस का ए.सी. भी अब थोड़ा कम लगने लगा था, तो बस का माहौल भी गरम और दमघोंटू होने लगा, इसी गरमी और दमघोंटू माहौल को उस बालक ने भांप लिया और जोर जोर से रोने लग गया, तो पिता अपनी गोदी में लेकर खड़े हो गये और बालक को ऊपर का डंडा पकड़ा दिया, नयी चीज के मिलते ही वह थोड़ा कुनमुनाया और फ़िर चुप हो गया, परंतु फ़िर २ मिनिट में ही वापिस से रोना शुरू हो गया, खैर उनका बस स्टॉप आ गया और वे उतर गये।

    पर हाँ जब बालक रोने लगा था तो बस के लगभग सभी यात्रियों को समझ में आ रहा था कि उसके रोने का क्या कारण है, और अभिभावकों की परेशानी सभी समझ रहे थे। इस दौर से मैं भी कई बार गुजर चुका हूँ और आज भी कई बार जब बेटेलाल जिद पर उतर आते हैं, तो बस!! अभी पिछली बार उनके साथ पूरे सफ़र में खेलते हुए समय निकला तो आसपास के सभी लोग आनंदित हो रहे थे।

     इस मानवीय आत्मीयता और संवेदना को आज देखकर बहुत अच्छा लगा। काश कि ये मानवीय संवेदना सभी के दिल में सभी के लिये हमेशा जीवित रहे और संवेदनहीनता खत्म हो जाये।

दो वयस्क फ़िल्में “देहली बेहली” और “मर्डर २”, हमारी अपनी समीक्षा (Two Adult Movies “Delhi Belly” and “Murder 2” My Review)

    पिछले दो दिनों में दो वयस्क फ़िल्में देख लीं, जो कि बहुत दिनों से देखने की सोच रहे थे और ऐसे महीनों निकल जाते हैं फ़िल्में देखे हुए।  पहली “देहली बेहली” और दूसरी “मर्डर २”। दोनों ही फ़िल्में अलग अलग कारणों से वयस्क दी गई होंगी। जहाँ “देहली बेहली” एक व्यस्क हास्य फ़िल्म है वहीं “मर्डर २” में  गरम दृश्य, थोड़ी बहुत गालियाँ और हिंसक दृश्य हैं ।

    अगर गरम दृश्यों की बात की जाये तो “देहली बेहली” में कुछ दृश्य ऐसे हैं जो कि लोगों को आपत्तिजनक लग सकते हैं मगर आजकल की पीढी इसे आपत्तिजनक नहीं मानती और इसे हास्यदृश्य ही मानेगी, तो यहाँ पीढ़ियों के अंतर की बात आ जाती है, और वहीं “मर्डर २” में गरम दृश्यों की जरूरत न होने पर भी ठूँसा गया है जो कि बोझिल से लगते हैं, परंतु उत्तेजना पैदा करने में कामयाब हुए हैं।

 मर्डर २

    अगर गालियों की बात की जाये तो “मर्डर २” में शायद ३-४ गालियों से ज्यादा नहीं हैं, और वे भी बिल्कुल सही तरीके से उपयोग की गई हैं, कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि गालियों को जबरदस्ती ठूँसा गया है या कम गालियों में काम चला लिया गया है। अब जब वयस्क फ़िल्म का सर्टिफ़िकेट लिया ही था तो कुछ गालियों का उपयोग तो कर ही सकते थे, और वह उन्होंने किया।

देहली बेहली के लिये मैंने फ़ेसबुक पर नोट लिखा था वही यहाँ चिपका रहा हूँ।

देहली बेहली

कल “डैली बैली” ए सर्टीफ़िकेट फ़िल्म देखी, तो लगा कि कई जगह जान बूझकर गाली कम दी गई है, जहाँ ज्यादा गालियाँ होनी चाहिये वहाँ केवल एक ही गाली से काम चला लिया गया है, अगर सही तरीके से गालियों का विज्ञान समझ लिया जाता तो यह संभव था, इसके लिये विशेष रूप से स्कूल और कॉलेज में जाकर समझा जा सकता है। या फ़िर वे लड़के जो होस्टल में रहते हैं, या अपने घर से अलग रहते हैं, उनका रहन सहन और गालियों का उपयोग बकायदा व्याकरण के तौर पर किया जाता है। वैसे आजकल हमारा गालियाँ देना काफ़ी कम हो गया है, परंतु हाँ अपने पुराने मित्रों के साथ आज भी बातें करते हैं तो बिना गालियों के बातें करना अच्छा नहीं लगता है, उसमें आत्मीयता लगती है। हालांकि किसी तीसरे सुनने वाले को यह गलत लग सकती है परंतु अगर व्याकरण का उपयोग नहीं किया जाये तो बात का मजा ही नहीं आता।

अब एक बात और है, जो सभ्य (मतलब कहने के लिये नहीं वाकई सभ्य, जिन लोगों ने अपने जीवन में कभी गालियाँ नहीं दीं) हैं, तो यह फ़िल्म वाकई उन लोगों के लिये नहीं है। यह हम जैसे सभ्यों (हम ऐसे सभ्य हैं, कि समय पड़ने पर इतनी गालियाँ दे सकते हैं और ऐसी ऐसी गालियाँ दे सकते हैं, कि अच्छे अच्छों के पसीने छूट जायें, पर देते नहीं हैं) के लिये है। खासकर युवावर्ग इसे बहुत पसंद करेगा।

    हिंसक दृश्यों की बात की जाये तो “मर्डर २” में हिंसक दृश्य अपना पूर्ण प्रभाव नहीं छोड़ पाये, वयस्क सर्टिफ़िकेट था तो हिंसक दृश्य को और बेहतर बनाया जा सकता था, हालांकि प्रशांत नारायन ने अपनी और से कोई कसर नहीं छोड़ी है, हिजड़ा बनने का दृश्य बहुत प्रभावी हैं और जो दृश्य पूर्व में आशुतोष राणा ने निभाये हैं, उनकी टक्कर के हैं। वैसे भी महेश भट्ट की फ़िल्म में अगर हिजड़ा ना हो तो उनकी फ़िल्म पूरी नहीं होती।

    “देहली बेहली” में हिंसक दृश्य प्रभावी बन पड़े हैं, जैसे कि अमूमन दृश्य में संवाद बनाये हैं, उससे वे दृश्य प्रभावी बन पड़े हैं, परंतु कुछ दृश्य हास्य पैदा करते हैं।

    कुल मिलाकर “देहली बेहली” बहुत अच्छी फ़िल्म लगी और “मर्डर २” ठीक ठाक, मतलब बहुत अच्छी नहीं। अच्छी बात यह है कि दोनों ही फ़िल्मों की पटकथा अच्छी कसी हुई है और अपने से दूर नहीं होने देती है।

अब जल्दी ही “चिल्लर पार्टी” देखने की इच्छा है।

कारे कारे घनघोर बादल, ये कारा कारा तुम्हारा प्यार

    सुहानी शाम हो रही थी, बादल पूरे शहर पर घिर से आये थे, ऋत एकदम बदल गयी थी, घनघोर काले बादल ऐसे उमड़ पड़े थे जैसे कि तुम मुझपर अपना प्यार लेकर उमड़ पड़ती हो, और तुम्हारा प्यार भी घनघोर काले बादलों जैसा ही निश्चल और निष्कपट होता है, अपना प्यार की बारिश करती रहती हो जैसे ये कारे बादल तुम्हारे प्यार के सम्मोहन में ही बँधे हुए हैं, और तुमसे ही सीख लेकर बरसने निकल पड़ते हैं, पर देखो ना ये निगोड़े बादल अपनी काली छब में अपना प्यारा रूप लिये हवा से ही हिल जाते हैं, और हवा के साथ अठखेलियाँ खेलते हुए झमझम राग सुनाते हैं।

    उलाहना मत समझो, तुम्हारा ये कारा कारा प्यार कभी तुम्हें काला नहीं होने देता है, दिन ब दिन तुम पर निखार ही लाता रहा है, इन बादलों को तो बरसने के लिये सावन का इंतजार करना पड़ता है, और एक तुम हो कि तुम्हारा तो बारह महीने सावन चलता है, जब देखो तब तुम बादलों को कारा कर देती हो और बरस लेती हो।

    तुम्हें पता है जब बारिश की बूँदे, सड़क के गड्ढे में बने छोटे से पोखर में गिरती हैं, तो कोई आवाज नहीं होती किंतु अगर इसे ३-४ मंजिल ऊपर से देखो तो इसका सौदर्य देखते ही बनता है, यहाँ तक कि रेत पर भी बारिश की बूँदें गिरती हैं तो रेत अपनी थोड़ी सी जगह छोड़कर उन बूँदों को अपने ऊपर बरसने देती हैं, अपने अंदर ले लेती हैं, जैसे रेत को पता है कि बारिश की बूँद उसके पास आने वाली है और उसे आत्मसात करना है। यह प्रकृति का नैसर्गिक गुण है।

    सुबह उठो और अगर घनघोर बारिश का मौसम हो रहा हो, और पास के पेड़ पर कोयल अपनी मीठी बोली से कानों को राग दे रही हो तो ऐसा लगने लगता है कि ये सब प्यार के नये राग हैं जो इस प्रकृति से तुमको सीखने होंगे, वैसे भी प्यार की प्रकृति इतनी अलग अलग तरह की होती हैं, कि उसे समझना और व्यक्त करना बहुत ही कठिन है।

    जब भी प्यार करो तो कारे कारे बादल और कोयल की बोली को ध्यान रखो और अपना हदय द्रवित कर कारे होने की कोशिश करो। देखो फ़िर कारे कारे घनघोर बादल छाने लगे हैं ..

बहिन जी विज्ञापनों से खबरी चैनलों की बोलती बंद की ? या अपराध खत्म हो गये ?

    कुछ दिनों पहले IBN7 के दो पत्रकारों को बहिनजी के दो कानूनी रक्षकों ने अंदर कर दिया था और देख लेने की धमकी दी थी, जैसे ही मीडिया में मामला उछला वैसे ही आला अफ़सर सफ़ाई देने पहुँच गये कि यह उनका निजी मामला था, इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं है।

    इसके पहले भी मीडिया के साथ इस तरह के मामले हो चुके हैं, परंतु उस समय मीडिया इतना संगठित नहीं था और यह भी कह सकते हैं कि व्यावसायिक मामलों के मद्देनजर कभी खुलकर नहीं बोल पाते थे। परंतु इस बार मीडिया ने हिम्मत करी और खुलकर सभी चैनलों ने इसका विरोध किया तो खुद बहिनजी और प्रधानमंत्रीजी को मीडिया से मुखतिब होने के लिये आना पड़ा। यह भी कह सकते हैं कि अब मीडिया परिपक्व हो चुका है और अब उसके पास व्यावसायिक विज्ञापनों की कमी नहीं है।

    जब से यह मामला हो गया है, उसके बाद उन दोनों कानूनी रक्षकों को सस्पेंड कर दिया गया परंतु अब उनका क्या हुआ उसकी कोई खबर नहीं है। शायद मामले को रफ़ा दफ़ा कर दिया गया होगा।

    अब लगभग हर खबरी चैनल पर बहिनजी के विज्ञापन की भरमार है, या तो बहिनजी की सरकार मजबूर है विज्ञापन देने के लिये, या फ़िर बहिनजी अपनी जनता की खून पसीने की कमाई को सम्मान नहीं देती हैं और इस तरह विज्ञापन में पैसा बहा रही हैं।

    अब उत्तरप्रदेश में हो रहे अपराधों का इन खबरी चैनलों ने प्रसारण कम कर दिया है, आखिर खबरी चैनलों को अच्छे खासे पैसों से बहिन जी ने खरीद जो लिया है, नहीं तो पहले यह हालत थी कि १-२ चैनलों पर ही विज्ञापन दिखते थे, और बहिन जी के प्रदेश के अपराधों का समाचार चल रहा है जिसमें उनके खुद के मंत्री तक लिप्त थे और ब्रेक में बहिन जी के प्रदेश के विका का विज्ञापन आता था।

    खैर अब यह तो खबरी चैनल ही बता सकते हैं कि अपराध खत्म हो गये या मिलने वाले बोनस से उनके कैमरों ने उधर देखना बंद कर दिया है।

नौकरी है टैलेन्ट नहीं

    आज सीएनबीसी पर यह कार्यक्रम “नौकरी है टैलेन्ट नहीं” देख रहे थे। वाकई सोचने को मजबूर थे कि आज बाजार में नौकरी है परंतु सही स्किल के लोग उपलब्ध नहीं हैं, सबसे पहले मुझे लगता है इसके लिये विद्यालय और महाविद्यालय जिम्मेदार हैं, जहाँ से पढ़ लिखकर ये अनस्किल्ड लोग निकलते हैं।

    आज जग प्रतियोगी हो चला है। अगर इस प्रतियोगिता में आना भी है तो भी उसके लिये प्रतियोगी को कम से कम थोड़ा बहुत स्किल्ड होना चाहिये। जो कि पढ़ाई के वातावरण पर निर्भर करता है।

    आज इंडस्ट्री में ० से २ वर्ष तक के अनुभव वाले लोगों में स्किल की खासी कमी है, कंपनियों को भी अपने यहाँ काम करने वाले अनस्किल्ड वर्कर्स को प्रशिक्षण पर जोर देना होगा, और इसके लिये कंपनियों को बजट भी रखना होगा।

    अगर काम करने वाले स्किल्ड होंगे तो वे ज्यादा अच्छे से और ज्यादा बेहतर तरीके से अपना काम कर पायेंगे, जिससे कंपनी और कंपनी के उपभोक्ताओं को तो सीधे तौर पर फ़ायदा होगा ही और समाज को अप्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा होगा।

    अच्छे स्किल्ड वर्कर होने से बेहतर कार्य कम लागत में पूर्ण हो पायेगा। इसके लिये आजकल कंपनियाँ आजकल अपने वर्कर्स को स्किल्ड बनाने के लिये विशेष कार्यक्रमों का आयोजन भी कर रही हैं और जिन कंपनियों के लिये आंतरिक रूप से यह संभव नहीं है, वे इस प्रोसेस को आऊटसोर्स कर रही हैं।

    खैर कंपनियाँ इस बात पर ध्यान दे रही हैं, यह सभी के लिये अच्छी है।

लड़कियों का सिगरेट पीना और शराब पीना समाज को स्वीकार करना चाहिये, समाज को बदलना होगा

    जब मैंने पहली बार प्रगति मैदान और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बाहर सिगरेट पीती हुई लड़कियों को देखा था, बड़ा अजीब लगा था कि लड़कियाँ भी सिगरेट पीती हैं। यह बात लगभग १४-१५ वर्ष पुरानी है। अब जब आज अपने आसपास देखता हूँ तो स्थितियाँ बहुत ही तेजी से बदलती जा रही हैं।
    अधिकतर स्मोकिंग जोन लंच के बाद भरेपूरे पाये जाते हैं, और इतने खचाखच होते हैं कि पैर रखने की जगह नहीं होती, अगर वहाँ कोई पैसिव स्मोकर हो तो पैसिव रहने से अच्छा है कि उसे खुद स्मोक शुरु कर देना चाहिये।
    लगभग पिछले ६ वर्षों से महानगरीय स्वरूप देख रहा हूँ। पहले दिल्ली में जहाँ कनॉट प्लेस, करोल बाग, इंडिया गेट हो या लाजपत नगर, डिफ़ेंस कॉलोनी, साऊथ एक्स. कोई भी जगह ले लो, लड़कियाँ समूह में खड़ी देख जायेंगी और उनको मजे से छल्ले उड़ाते हुए देखा जा सकता है।
    वैसे ही मुंबई में हालात ऐसे हैं कि वहाँ पर तो जहाँ मेरा कार्यालय था वहाँ लड़कों से ज्यादा स्मोकर लड़कियाँ थीं, और अगर समूह भी होते तो लड़कियाँ ज्यादा और लड़के कम और शेयर करके सिगरेट पीते हुए देखा जा सकता है। लड़कियाँ यहाँ शराब की दुकान से शराब भी खरीदते हुए देखी जा सकती हैं।
    अब आये बैंगलोर तो यहाँ तो ७०% जनता जवान है और उनकी जवानियों की अंगड़ाईयाँ यत्र तत्र सर्वत्र देखी जा सकती है, अभी जहाँ मेरा कार्यालय है वहाँ दोपहर में स्थिती देखने लायक होती है, सिक्योरिटी वाले बेचारे स्मोकर्स को चेताते चेताते परेशान हो जाते हैं, कि ये कृप्या यहाँ स्मोक न करें यह वर्जित क्षैत्र है, परंतु मजाल कि कोई सुन ले, और एक बात कि बैंगलोर में लगभग ७०% लोग कन्नड़ भाषा नहीं जानते क्योंकि वे सब उत्तर भारत से हैं। मैंने यहाँ बहुत सी लड़कियाँ देखी हैं जो कि चैन स्मोकर्स हैं। और अधिकतर स्मोकर्स लड़कियाँ वही हैं जो कि घर से बाहर रहती हैं।
    अभी थोड़े दिन पहले ही शुक्रवार को  देखा जब हम हायपर सिटी में हमारे आगे कुछ लड़कियाँ बिलिंग करवा रही थीं, व्हिस्की रम और वोद्का ले जा रही थीं और पेप्सी और कंडोम्स की बिलिंग करवा रही थीं, हमने अपनी घरवाली से कहा देखो इन लड़कियों ने सप्ताहांत पर रिलेक्स होने का पूरा इंतजाम कर लिया है, उनको भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा क्योंकि महानगर में रहकर सोच बदल ही जाती है, खैर हमें भी अपनी सोच बदलनी होगी।
    आखिर लड़कियाँ भी कमा रही हैं आजाद हैं, स्वतंत्र हैं, घर से बाहर रहते हुए वे अपनी स्वतंत्रता का पूरा फ़ायदा उठाती हैं। यह आधुनिक सोच है और हम तो इसे मान चुके हैं कि जिसे जैसा रहना है वैसा रहे इसलिये अब कहीं कोई लड़की सिगरेट या शराब पीती हुई दिखती भी है तो हमें सामान्य जैसा ही लगता है, समाज को अब बदलना चाहिये वक्त आ गया है कि समाज को यह सच भी स्वीकार करना चाहिये कि लड़कियाँ भी लड़कों की तरह ही स्वतंत्र हैं और उनके यह अधिकार हैं अगर लड़कों के पास सारे अधिकार हैं तो। क्या हमें अपनी पुरातन मानसिकता की बेढ़ी से बाहर नहीं निकलना होगा ?

रेलयात्रा में अनजाने लोगों से यादगार मुलाकातें और उनकी ही सुनाई गई एक कहानी… (My Railway Journey..)

    रेलयात्रा करते हुए अधिकतर अनजाने लोगों से अलग ही तरह की बातें होती हैं, जिसमें सब बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं, और लगभग हर बार नयी तरह की जानकारी मिलती है।

    इस बार कर्नाटक एक्सप्रेस से जाते समय एक स्टेशन मास्टर से मुलाकात हुई जो कि अपने परिवार के साथ ७ दिन की छुट्टी के लिये अपने गाँव जा रहे थे। घर में सबसे बड़े हैं और अपने चचेरे भाईयों को उनके भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण राय देते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके भाई उनके मार्गदर्शन को मानते भी हैं और उनके मार्गदर्शन पर चलते हुए दो भाई सरकारी नौकरी में भी लग गये हैं, अब उन्हें तीसरे की चिंता है।

    ऐसे ही बातें चल रहीं थीं तो उन्होंने एक बहुत ही अच्छी छोटी सी कहानी सुनाई, कि अच्छे लोगों के साथ ही हमेशा बुरा क्यों होता है और हम यह भी सोचते हैं कि फ़लाना कितने बुरे काम करता है परंतु भगवान उसको कभी सजा नहीं देते।

    एक गाँव में दो दोस्त रहते थे और शाम के समय पगडंडी पर घूम रहे थे, पहला वाला दोस्त बहुत ईमानदार और नेक था और दूसरा दोस्त बेहद बदमाश और बुरी संगत वाला व्यक्ति था। तभी एक मोटर साईकिल से एक आदमी निकला तो उसकी जेब से एक १००० रूपये का नोट गिर गया। तो पहला दोस्त दूसरे से बोला कि चलो जिसका नोट गिरा है उसे मैं जानता हूँ, उसे दे आते हैं। दूसरा दोस्त बोला कि अरे नहीं बिल्कुल भी नहीं ये हमारी किस्मत का है इसलिये यहाँ उस आदमी की जेब से गिरा है, यह नोट उस आदमी की किस्मत में नहीं था, हमारी किस्मत में था, चल दोनों आधा आधा कर लेते हैं, ५०० रूपये तुम रखो और ५०० रूपये मैं रखता हूँ।

    पहले दोस्त ने मना कर दिया कि मैं तो ऐसे पैसे नहीं रखता तो दूसरा दोस्त बोला कि चल छोड़ मेरी ही किस्मत में पूरे १००० रूपये लिखे हैं, पर फ़िर भी पहला दोस्त उसे समझाता रहा कि देखो ये रूपये हमारे नहीं हैं, हम उसे वापिस लौटा देते हैं। परंतु दूसरा दोस्त मानने को तैयार ही नहीं होता है।

    चलते चलते अचानक पहले वाले दोस्त को पैर में कांटा लग जाता है और वह दर्द से बिलबिला उठता है। और दूसरा दुष्ट दोस्त १००० रूपये का नोट हाथ में लेकर नाचता रहता है।

    पार्वती जी शिव जी के साथ यह सब देखती रहती हैं। और शिव जी से शिकायत करती हैं कि यह कैसा न्याय है प्रभु, जो सीधा साधा ईमानदार है उसको मिला कांटा और जो दुष्ट और पापी है उसे मिला १००० रूपया। शिव जी पार्वती जी को बोलते हैं, ये सब मेरे हाथ में नहीं है, इसका हिसाब किताब तो चित्रगुप्त के पास रहता है। पार्वती जी कहती है कि प्रभु मुझे इनके बारे में जानना है आप चित्रगुप्त को बुलवाईये। चित्रगुप्त को बुलाया जाता है, और प्रभु उनसे कहते हैं, बताओ चित्रगुप्त इन दोनों दोस्तों के बारे में पार्वती जी को बताओ।

    चित्रगुप्त कहते हैं पहला दोस्त जो कि इस जन्म में पुण्यात्मा ईमानदार है, पिछले जन्म में महापापी दुष्ट था, इसकी तो बचपन में ही अकालमृत्यु लिखी थी, परंतु अपने कर्मों के कारण इसके बुरे कर्मों के फ़लों का नाश हो गया और आज जो इसे कांटा चुभा है वह इसके पिछले जन्मों में किये गये बुरे कर्मों का अंत था, अब इसके पुण्य इसके साथ ही रहेंगे।

    पार्वती जी बोलीं – चित्रगुप्त जी दूसरे दोस्त के बारे में बताईये। चित्रगुप्त कहते हैं दूसरा दोस्त पिछले जन्म में बहुत पुण्यात्मा और ईमानदार था परंतु इस जन्म में महापापी दुष्टात्मा है, अगर यह इस जन्म में भी पुण्यात्मा होता तो इसे तो राजगद्दी पर बैठना था, परंतु दुष्ट है इसलिये आज इसका पिछले जन्मों का पुण्य खत्म हो गया और इसे राजगद्दी की जगह १००० रूपयों से ही संतोष करना पड़ रहा है। और अब इसके पाप इसके खाते में लिखे जायेंगे।

रेल्वे द्वारा तकनीक के इस्तेमाल और कुछ खामियाँ सेवाओं में.. (Technology used by Railway… some problems in services)

    पिछले महीने हमने अपनी पूरी यात्रा रेल से की और विभिन्न तरह के अनुभव रहे कुछ अच्छे और कुछ बुरे। कई वर्षों बाद बैंगलोर रेल्वे स्टेशन पर गये थे, हमारा आरक्षण कर्नाटक एक्सप्रेस से था और सीट नंबर भी कन्फ़र्म हो गया था। तब भी मन की तसल्ली के लिये हम आरक्षण चार्ट में देखना उचित समझते हैं, इसलिये आरक्षण चार्ट ढूँढ़ने लगे, तो कहीं भी आरक्षण चार्ट नहीं दिखा। ५-६ बड़े बड़े टीवी स्क्रीन लगे दिखे जिसपर लोग टूट पड़े थे, हमने सोचा चलो देखें कि क्या माजरा है। पता चला कि आरक्षण चार्ट टीवी स्क्रीन पर दिखाये जा रहे हैं, हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि रेल्वे तकनीक का इतना अच्छा इस्तेमाल भी कर सकता है। बहुत ही अच्छा लगा कि रेल्वे ने तकनीक का उपयोग बहुत अच्छे से किया जिससे कितने ही कागजों की बर्बादी बच गई।

    बैंगलोर रेल्वे स्टेशन पर तकनीक का रूप देखकर रेल्वे के बदलते चेहरे का अहसास हुआ। बस थोड़ी तकलीफ़ हुई कि ट्रेन कौन से प्लेटफ़ॉर्म पर आयेगी यह कहीं भी नहीं पता चल रहा था, हालांकि टीवी पर आने और जाने वाली गाड़ियों का समय के साथ प्लेटफ़ार्म नंबर दिखाया जा रहा था, परंतु हमारी गाड़ी के बारे में कहीं कोई जानकारी नहीं थी। खैर पूछताछ करके पता चला कि ट्रेन एक नंबर प्लेटफ़ार्म पर आने वाली है। पूछताछ खिड़्की भी केवल एक ही थी, जिस पर लंबी लाईन लगी हुई थी और लोग परेशान हो रहे थे। हम चल दिये एक नंबर प्लेटफ़ार्म की और, जैसे ही घुसे ट्रेन सामने ही थी अब डब्बे का पता नहीं चल रहा था क्योंकि पूरी ट्रेन की लोकेशन बाहर नहीं लगी थी, तो वहीं प्रवेश द्वार पर बैठे टी.सी. महोदय से पूछा कि डिब्बा किधर आयेगा, और उन्होंने तत्परता से बता भी दिया ( जो कि हमारी उम्मीद के विपरीत था )।

    खैर डब्बे में पहुँचे तो तप रहा था क्योंकि ए.सी. चालू नहीं किया गया था, थोड़ी देर बाद ए.सी. चालू किया तब जाकर राहत मिली। हमने सोचा कि द्वितिय वातानुकुलित यान में पहले के जैसी अच्छी सुविधाएँ मौजूद होंगी और पॉवर बैकअप होता ही है, तो बहुत दिनों से छूटे हुए ब्लॉग पोस्ट पढ़ लिये जायेंगे । पहले तो हमने अपना जरूरी काम किया तो अपने लेपटॉप की बैटरी नमस्ते हो ली, अब चाहिये था बैटरी चार्ज करने के लिये पॉवर, बस यहीं से हमारा दुख शुरु हो गया। १० मिनिट बाद ही पॉवर गायब हो गया, तो इलेक्ट्रीशियन को पकड़ा गया उसने वापस से रिसेट किया परंतु फ़िर वही कहानी १० मिनिट मॆं फ़िर पॉवर गायब हो गया। उसके बाद जब हम फ़िर से इलेक्ट्रीशियन को ढूँढ़ते हुए पहुँचे तो हमें बताया गया कि इससे आप लेपटॉप नहीं चला पायेंगे केवल मोबाईल रिचार्ज कर पायेंगे। लोड ज्यादा होने पर डिप मार जाती है। कोच नया सा लग रहा था तो पता चला कि रेल्वे ने पुराने कोच को ही नया बनाकर लगा दिया है। खैर यह समस्या हमने मालवा एक्सप्रेस में भी देखी परंतु आते समय राजधानी एक्सप्रेस में यह समस्या नहीं थी। अब क्या समस्या है यह तो रेल्वे विभाग ही जाने। परंतु लंबी दूरी की गाड़ियों में यह सुविधा तो होनी ही चाहिये, आजकल सबके पास लेपटॉप होते हैं और सभी बेतार सुविधा का लाभ लेते हुए अपना काम करते रहते हैं।

    द्वितिय वातानुकुलन यान की खासियत हमें यह अच्छी लगती है कि केबिन में सीटें अच्छी चौड़ी होती हैं, परंतु इस बार देखा तो पता चला कि सीटें साधारण चौडाई की थीं। और यह हमने तीनों गाड़ियों में देखा।

    जब आगरा में थकेहारे रेल्वे स्टेशन पर पहुँचे तो गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी, और ट्रेन आने में लगभग १ घंटा बाकी था, हमने वहाँ उच्चश्रेणी प्रतीक्षालय ढ़ूँढ़ा तो मिल भी गया और ऊपर से सबसे बड़ी खुशी की बात कि ए.सी. भी चल रहे थे, मन प्रसन्न था कि चलो रेल्वे अपने यात्रियों को कुछ सुविधा तो देता है। बस सोफ़े नहीं थे उनकी जगह स्टील की बैंचे डाल रखी थीं जिस पर यात्री ज्यादा देर तक तो बैठकर प्रतीक्षा नहीं कर सकता। आते समय भोपाल में भी हमने रात को ४ घंटे प्रतीक्षालय में बिताये वहाँ पर भी सुविधा अच्छी थी।

    जाते समय कर्नाटक एक्सप्रेस का खाना निहायत ही खराब था, केवल खाना था इसलिये खाया, ऐसा लग रहा था जैसे कि रूपये देकर जेल में मिलने वाला खाना खरीद कर खा रहे हैं (वैसे अभी तक जेल का खाना चखा नहीं है), वैसे हमें ऐसा लग रहा था तो हम अपने साथ बहुत सारा माल मत्ता अपने साथ लेकर ही चले थे, तो सब ठीक था। आते समय राजधानी एक्स. का खाना भी कोई बहुत अच्छा नहीं था, पहले जो क्वालिटी खाने की राजधानी एक्स. में मिलती थी अब नहीं मिलती। आते समय तो दाल कम पड़ गई होगी तो उसमें ठंडा पानी मिलाकर परोस दिया गया, लगभग सभी यात्रियों ने इसकी शिकायत की, टी.सी. को बोलो तो वो कहते हैं यह अपनी जिम्मेदारी नहीं और पूछो कि किसकी जिम्मेदारी है तो बस बगलें झांकते नजर आते ।

    खैर अब सभी चीजें तो अच्छी नहीं मिल सकतीं, पर कुल मिलाकर सफ़र अच्छा रहा और अब आगे रेल्वे की सुविधा का उपयोग केवल मजबूरी में ही किया जा सकेगा क्योंकि एक तो ३६-३९ घंटे की यात्रा थकावट से भरपूर होती है और उतना समय घर पर रहने के लिय भी कम हो जाता है। अगर रेल्वे थोड़े सी इन जरूरी चीजों पर ध्यान दे तो यात्रियों को बहुत सुविधा होगी।

    अगर पाठकों को पता हो कि इन खामियों की शिकायत कहाँ की जाये, जहाँ कम से कम सुनवाई तो हो, तो बताने का कष्ट करें।