चाँद पूर्ण रूप में

चाँद जब रोटी सा गोल होता है, पूर्ण श्वेत, अपने पूर्ण रूप में, उसकी आभा और निखर आती है, मिलते तो रोज हैं छत पर, पर देखना तुम्हें केवल इसी दिन होता है, काश की चाँद हर हफ़्ते पूर्ण हो, महीने में एक बार तुम्हें देखना, फ़िर दो पखवाड़े उसी सुरमई तस्वीर को, सीने से […]
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खोह, वीराने और सन्नाटे

    जिंदगी की खोह में चलते हुए वर्षों बीत चुके हैं, कभी इस नीरव से वातावरण में उत्सव आते हैं तो कभी दुख आते हैं और कभी नीरवता होती है जो कहीं खत्म होती नजर नहीं आती। कहीं दूर से थोड़ी सी रोशनी दिखते ही लपककर उसे रोशनी की और बढ़ता हूँ, परंतु वह रोशनी […]
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मैं तुम और जीवन (मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी)

मैं तुम्हारी आत्मीयता से गदगद हूँ मैं तुम्हारे प्रेम से ओतप्रोत हूँ इस प्यार के अंकुर को और पनपने दो तुममें विलीन होने को मैं तत्पर हूँ।तुम्हारे प्रेम से मुझे जो शक्ति मिली है तुम्हें पाने से मुझे जो भक्ति मिली है इस संसार को मैं कैसे बताऊँ तुम्हें पाने के लिये मैंने कितनी मन्नतें […]
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दिवास्वप्न बुरा या अच्छा … मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी

एक दिवास्वपन आया मुझे एक दिन.. श्री भगवान ने आशीर्वाद दिया, सारे अच्छे लोग देवता रूपी और उनके पास हथियार भी वही, सारे बुरे लोग राक्षस रूपी और उनके पास हथियार भी वही समस्या यह हो गई कि देवता लोग कम और राक्षस ज्यादा हो गये तब श्री भगवान वापिस आये और देवता की परिभाषा […]
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जीवन तूफ़ानी दरिया, शून्यहीन चुप्पी और वीराने… मेरी कविता.. विवेक रस्तोगी

    जीवन कभी कभी तूफ़ानी दरिया लगता है और कभी बिल्कुल शुन्यहीन चुप्पी के साथ थमा हुआ दरिया लगता है। कभी लहरें आती हैं, कभी तूफ़ान आते हैं, कभी सन्नाटे आते हैं, कभी वीरानी आती है। जीवन के ये अजीब रंग सात रंगों से भी अजीब हैं, कौन से ये रंग हैं, कहाँ बनते हैं […]
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तुम्हारे लिये, तुम कभी गुलाब होती थीं…. मेरी कविता… विवेक रस्तोगी

तुम कभी गुलाब होती थीं तुम कभी नरम दिल होती थी तुम कभी बहुत प्यारी होती थी तुम कभी जन्नत होती थी तुम कभी खुशियों का खजाना होती थी तुम कभी शीतल होती थी तुम कभी कुछ और ही होती थी तुम अभी भी कभी जैसी ही हो बस वैसी ही रहना और आगे भी […]
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बस बहुत हुआ… मेरी कविता.. विवेक रस्तोगी

बस बहुत हुआ, जीवन का उत्सव अब जीवन जीने की इच्छा क्षीण होने लगी है जीवंत जीवन की गहराइयाँ कम होने लगी हैं अबल प्रबल मन की धाराएँ प्रवाहित होने लगी हैं कृतघ्नता प्रेम के साथ दोषित होने लगी है
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ओह मुंबई, मेरे अधूरे प्यार … मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

ओह मुंबई, मेरे अधूरे प्यार ऐसी प्रेमिका जिसे प्यार किया पर मजबूरी में वह साथ न रही दरिया के लहरों में उमड़ती तुम्हारी चंचल अंगड़ाइयाँ बलखाती, इठलाती अदाएँ वो मरीन ड्राईव जहाँ सड़क इठलाती है कितने ही रंग के चेहरे रहते हैं घूमते हैं, चूमते हुए रंग बदलते हैं मुंबई रात में अपनी जवानी में […]
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भीगी बरसातों में तुम… मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

ओहो सावन का इंतजार नहीं करना पड़ता है आजकल बरसात को, जब चाहे बरस जाती हो बरसात और किसी अपने की सर्द यादें दिला जाती हो, भीगी बरसातों में तुम कहीं खोयी खोयी सी अपने ही अंदाज में, भिगाती हुई खुद को बरसात भी तुमको भिगोने का आनंद लेती है, सिसकियाँ आँहें भरते हुए लोग […]
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प्रेम दिवस पर दो कविताएँ अपनी प्रेमिका के लिये… मेरी कविता… विवेक रस्तोगी

प्रेम दिवस याने कि प्रेम को दिखाने का दिन, प्रेम के अहसास करने का दिन, और मैं अपनी प्रेमिका के लिये याने के अपनी पत्नी को दो कविताएँ समर्पित कर रहा हूँ, सच्चे दिल से लिखी है, अपनी पीड़ा लिखी है… कृप्या और यह न कहे कि यही तो हम भी कहना चाह रहे थे […]
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