सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४१ [कर्ण के गुरु और चम्पानगरी जाने की उत्कण्ठा… ]

   बहुत दिन हो गये थे। मैं जब से हस्तिनापुर आया था, तब से केवल एक बार ही चम्पानगरी गया था। वह भी उस समय जब गुरुदेव द्रोण ने अपने शिष्यों की परीक्षा ली थी। उसके बाद पाँच वर्ष बीत गये थे। इच्छा होने पर भी इन पाँच वर्षों में मैं एक भी बार चम्पानगरी को नहीं जा पाया था। क्योंकि यहाँ मैं एक विद्यार्थी के रुप में आया था।

    सौभाग्य से मुझको अपने गुरु बहुत अच्छे मिले थे। जिनको गुरुओं का गुरु कहा जाता है, ऐसे ही थे वे। साक्षात सूर्यदेव मेरे गुरु थे। हस्तिनापुर के अखाड़े में पत्थर के चबूतरे पर खड़े होकर मन ही मन निश्चय कर मैंने उनका शिष्यत्व अंगीकार किया था। उन्होंने भी अबतक मेरे साथ अपने प्रिय शिष्य का सा व्यवहार किया था। छह वर्षों के इस कालखण्ड में उन्होंने कितने दुर्लभ रहस्य मुझको बताये थे, वे किस भाषा में बताते थे, यह तो मैं कह नहीं सकता। परन्तु उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वह मैंने तुरन्त ही ग्रहण कर लिया था। क्या नहीं सिखाया था उन्होंने मुझको ! बाणों के दुष्कर प्रक्षेप, द्वन्द्व के कठिन हाथ; घोड़ा, हाथी और ऊँटों की उच्छ्श्रंखल प्रवृत्तियों को वश करने की कलाएँ। सब बातें उन्होंने मेरे कानों में कही थीं। चुपचाप ! मौन-भाषा में।

    प्रतिदिन प्रात: अपनी कोमल किरणों से असंख्य कलियों के मुँदे पलक खोलते हुए वे मुझसे कहते थे, “कर्ण, तुझको भी ऐसा ही बनना चाहिए। अपना सर्वस्व मुक्त-हस्त से जो कोई माँगे उसको देकर अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों का जीवन तुमको ऐसे ही खिलाना चाहिए।“

    कितने श्रेष्ठ थे मेरे गुरु ! संसार के किसी गुरु ने अपने शिष्य को इतनी छोटी-छोटी बातों से इतना उदात्त उपदेश कभी क्या दिया है ? अब एक बार चम्पानगरी में जाकर उन गुरु के चरण गंगा के स्वच्छ जल से अवश्य धोने चाहिए। अब मैं गंगामाता नहीं कहता हूँ, गंगा कहता हूँ। क्योंकि शैशवावस्था की श्रद्धा व्यावहारिकता के पाषाण से भोंथरी हो गयी थी। माँ एक ही होती है। जो जन्म देती है और पालन-पोषण करती है वह। नदी तो नदी है। वह माता कैसे हो सकती है ? मेरी माता एक ही थी – राधामाता ! उससे मिले भी बहुत दिन हो गये थे। वह अब मुझको देखेगी तो क्या सोचेगी, मुझको पूरा विश्वास था कि मेरे जाने पर वह सबसे पहले मुझसे यही पूछेगी, “कितना लट गया है रे वसु तू ? और तू गंगा के पानी में तो नहीं गया न कभी ?” क्योंकि पुत्र कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये, माता की दृष्टि में वह सदैव बालक ही रहता है। माता ही विश्व में एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जिसके प्रेम को व्यवहार की तुला का बिलकुल ज्ञान ही नहीं होता। वह जानती है अपने पुत्र पर केवल वास्तविक प्रेम करना।

    मैंने शोण को बुलाकर कहा, “शोण ! यात्रा की तैयारी करो। कल चम्पानगरी चलना है।“ उसका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। शाल वृक्ष की तरह लम्बे-तड़ंगे होकर अनेक वर्षों के बाद, पहली बार हम चम्पानगरी की ओर जा रहे थे। अपनी जन्मभूमि की ओर ।

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  1. बहुत बढ़िया..आभार.

    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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