तिरुपति बालाजी के दर्शन और यात्रा के रोमांचक अनुभव – ८ [चढ़ावे की गिनती, प्रसादम, लड्डू ..] (Hilarious Moment of Deity Darshan at Tirupati Balaji.. Part 8)[Offering Count, prasadam and laddu…]

    वहीं सामने (हुंडी के) एक छोटा सा मंदिर ओर था, जिसमें परिक्रमा के बाद एक पत्थर नीचे टेबलनुमा चीज पर रखा था, जिसपर लोग अपनी मनोकामनाएँ लिख रहे थे, शायद पूरी भी होती होंगी।

    फ़िर वहीं हुंडी के सामने सीढ़ियों पर हम बैठ गये, अच्छी खिली हुई धूप थी, टकलाने के बाद धूप बहुत ही अच्छी लग रही थी, वैसे भी ठंड के मौसम में धूप सेंकने का आनंद बहुत दिनों बाद मिला था, क्योंकि पिछले ४ सालों से मुंबई में रह रहे हैं और ठंड की आदत खत्म हो गयी है। कुल्लू मनाली, रोहतांग और मनिकर्ण साहिब गये थे, तबही ठंड देखे थे।

    फ़िर वापिस मुख्य द्वार से बाहर की ओर निकले, उल्टे हाथ की ओर जाना था, वहीं पर बालाजी के यहाँ आये हुए चढ़ावे की गिनती होती है, ये जेल जैसा एक लंबा सा रास्ते के साथ जाता हुआ गलियरे में बनाया गया है, जिसमें हुंडी में और दानपेटी में आई हुई रकम और आभूषणों को आप देख सकते हैं, कम से कम २५ लोग छँटाई और गिनाई का काम करते हैं, जहाँ आप देख सकते हैं, पहले कुछ लोग केवल नोट सीधा करने का कार्य करते हुए मिलेंगे, फ़िर नोट अलग अलग करेंगे, जैसे १०००, ५००, १००, ५०, २०, १०, ५, २, १। फ़िर आगे वाले लोग उनकी गड्डी बनायेंगे और रखते जायेंगे। कितने ही डॉलर भी थे और कितनी ही अलग अलग करंसी।

    अवधारणा है कि हुंडी में लोग बालाजी का हिस्सा डालते हैं, जी हाँ यह सच है, वहीं के एक व्यक्ति ने मुझे बताया था, कि लोग बालाजी को अपने व्यापार में पार्टनर बनाते हैं, और जितना भी हिस्सा तय होता है, वह बालाजी के पास देने आते हैं, अब भला खुद ही सोचिये जिसके व्यापार के पार्टनर खुद बालाजी हों, उसके व्यापार में भला कभी हानि या परेशानी हो सकती है।

    वहीं आगे लिखा था मुफ़्त प्रसादम, हम भी उधर ही लाईन में लगकर चल दिये। वहाँ पर एक बड़ा सा कमरा जो कि लोहे की राडों से बना हुआ था, और उसमें पीतल के बड़े बड़े बर्तनों में हलुआ, और चावल बने हुए रखे थे, शुद्ध घी ऊपर तैरता हुआ नजर आ रहा था। दोनों तरफ़ एक एक पंडित कागज के दोनों में प्रसाद भक्तों को दे रहे थे। दोने में शुद्ध घी से बने हुए गुड़ में पगे हुए चावल थे, दोने हालांकि छोटे थे, और प्रति व्यक्ति केवल एक ही दोना मिल रहा था, जो भी एक से ज्यादा दोनों के लिये बोल रहे थे, किसी को दे रहा था तो किसी को झिड़क रहा था, नीचे चलते हुए चिपचिप हो रही थी, क्योंकि लोग खाते हुए गिरा भी रहे थे, हमने पूरे मजे लेते हुए वह प्रसाद उदरस्थ किया, और दिल से बालाजी को नमन कर यह अवसर देने के लिये धन्यवाद दिया। वहीं हाथ धोने के लिये बहुत सारे नल लगे हुए हैं, वहीं हाथ धोकर, निकल पड़े मंदिर के परकोटे से बाहर की ओर जहाँ लिखा था, कि लड्डू के लिये टीटीडी देवस्थानाम का रास्ता, हम उधर ही चल पड़े।

    परकोटे से सटा हुआ लंबा सा गलियारा है, जहाँ लोगों की बहुत भीड़ थी, लड्डू लेने जाने वालों की भी और लेकर आने वालों की भी। वहीं पर बालाजी को बेचने वाले ओह माफ़ कीजियेगा उनकी तस्वीरें और किताबें और भी पता नहीं क्या क्या। हम सबको अनदेखा करते हुए लड्डू लेने के लिये चल दिये,  जो कि गलियारा खत्म होते ही दायीं ओर जाने पर सामने एक बड़ा सा हाल दिखता है, जहाँ लिखा हुआ भी है, लड्डू प्रसादम, १० की लाईन अलग, ५० की अलग, ३०० की अलग, वीआईपी की अलग, वाह री माया। सब अलग बैंको के काऊँटर थे, जहाँ लड्डू मिल रहे थे। लड्डू के साथ लड्डू का कवर फ़्री नहीं था, उसके लिये अलग से दो रुपये शुल्क देय है। हमने भी अपनी जेब से दो रुपये शुल्क दिया और कवर में लड्डू रखकर हमें दे दिये गय। पूरे वातावरण में लड्डुओं की महक, मन तो बस लड्डुओं में ही रम गया था। वैसे भी पुरानी कहावत है कि अगर किसी का दिल जीतना है तो “रास्ता पेट से होकर जाता है”। अगर लड्डू अच्छा है तभी तो आप बालाजी वापिस आने का सोचेंगे, भले ही दर्शन के लिये नहीं पर लड्डू के लिये जरुर।

    वापिस आते हुए फ़िर वही गलियारा पड़ा और हमने भी बालाजी की हिन्दी की एक कॉमिक्स और इतिहास की किताब ली। वहीं बायीं ओर बहुत बड़ा कुण्ड है जहाँ पर लोग नहाते भी हैं, फ़िर हम चल दिये मंदिर के बाहर की ओर, बहुत बड़ा मैदान पार करने के बाद, सीढ़ियाँ आईं, वहाँ पर नारियल और कपूर बिक रहा था, वहाँ पर नारियल और कपूर बालाजी को चढ़ाया जाता है, मतलब होम किया जाता है, वहाँ पर बहुत सारे नारियल एक साथ होम हो रहे थे। वह नजारा देखते ही बनता था, चारों ओर कपूर की गंध माहौल में थी।

    हमने फ़िर ड्राईवर अब्दुल को एस.टी.डी. से फ़ोन लगाया कि हम टैक्सी पर पहुँच रहे हैं तुम आ जाओ। बहुत जोर से भूख लगने लगी थी, परंतु यह निश्चय किया गया कि खाना तिरुपति जाकर खायेंगे।

    जब तक अब्दुल आता तब तक हमने फ़िर एक कड़क कॉफ़ी पी, और कुछ धार्मिक खरीददारी की। तब तक ड्राईवर अब्दुल भी आ गया और हम चल दिये तिरुपति की ओर।

    फ़िर घुमावदार सड़कें और चारों ओर हरियाली एक तरफ़ खाई, एक तरफ़ पहाड़ी। आते हुए लोग दिख रहे थे, जो कि पैदल यात्री थे, तिरुपति से पैदल बालाजी आ रहे थे, कुछ फ़ोटो हमने टैक्सी में से लिये, एक जगह हमने टैक्सी रुकवाई कि चलो हम फ़ोटो खींच लें, एक फ़ोटो सेशन हो जाये। देखिये फ़ोटो –

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    आखिरी फ़ोटो में देखिये जैसे ही जैसे तिरुपति नजदीक आने लगा, वहाँ का हमने एक फ़ोटो ले लिया।

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8 thoughts on “तिरुपति बालाजी के दर्शन और यात्रा के रोमांचक अनुभव – ८ [चढ़ावे की गिनती, प्रसादम, लड्डू ..] (Hilarious Moment of Deity Darshan at Tirupati Balaji.. Part 8)[Offering Count, prasadam and laddu…]

  1. यात्रा संस्‍मरण बेहद रोचक ढग से लिखा है और इसे पढते हुए यह लगता है कि हम भी आपके साथ यात्रा कर रहे हैं। ऐसा लेखन अदभुत लगता है जब पढने वाले भी अपने आप को यात्रा स्‍थल पर पाते हैं। ऐसे संस्‍मरणों को आप बाद में पुस्‍तक रुप दे सकते हैं जिनमें यात्रा वृतांत के अलावा अच्‍छे फोटो शामिल किए जा सकते हैं।

  2. हमको भी अपनी तिरूपती यात्रा याद आ गई।लौटते समय घाट पर ड्राईविंग का आनंद आहा हा।गोविंदा गोविंदा।

  3. यात्रा आप की बहुत सुंदर लगी, लेकिन मंदिर वगेरा मै नही जाता, नास्तिक नही लेकिन…भगवान के नाम से दुकान दारी अच्छी नही लगती

  4. यात्रा का रोचक वृतांत अच्छा लगा। कुछ कल पढ़ा कुछ आज्। सच लिख डाला इन पंक्तियों में

    अवधारणा है कि हुंडी में लोग बालाजी का हिस्सा डालते हैं, जी हाँ यह सच है, वहीं के एक व्यक्ति ने मुझे बताया था, कि लोग बालाजी को अपने व्यापार में पार्टनर बनाते हैं, और जितना भी हिस्सा तय होता है, वह बालाजी के पास देने आते हैं, अब भला खुद ही सोचिये जिसके व्यापार के पार्टनर खुद बालाजी हों, उसके व्यापार में भला कभी हानि या परेशानी हो सकती है।

  5. इंसान की फितरत का जवाब नहीं अपने फायदे के लिए वो इश्वर को व्यापार में साझेदार बना लेता है….वो समझता है की इश्वर के संग व्यापार किया तो घाटा तो होगा ही नहीं…आप ही बताईये जो सारे संसार का मालिक है उसको क्या तो घाटा होगा और क्या लाभ? बालाजी की यात्रा का रोचक विवरण दिया है आपने…लेकिन आप फोटो खींचने में कंजूसी कर गए…:))
    नीरज

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