पिस रहा हूँ मानसिक दबाब के ….. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

पिस रहा हूँ

मानसिक दबाब के

अनगिनत

पाटों में,

क्या होगा

सहनशीलता का,

गठ्ठर जिंदगी का

भारी होता ही जा रहा है,

अंतहीन सीमाएँ हैं

इस विशाल और विद्रुप

जिंदगी की,

अंतत: भविष्य के

गर्भ में

कुछ है खौफ़नाक

सचेतनता सा,

जिसे मैं

रोक पाने में असमर्थ हूँ !

6 thoughts on “पिस रहा हूँ मानसिक दबाब के ….. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

  1. धैर्य बनाए रखिये, कन्धा भिड़ाये रखिये.
    जब तक आखिरी सांस है अपना बोझ उठाये रखिये.
    कभी हाथ ना फैलाना हो,
    यह सम्मान बनाए रखिये.

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