All posts by Vivek Rastogi

About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २३ [कर्ण, कृपाचार्य, दु:शासन…]

    चबूतरे की सीढ़ियाँ उतरने लगे। मेरा मन अब शान्त हो गया था। सामने गुरुदेव द्रोण और युवराज अर्जुन चबूतरे की ओर आ रहे थे। अर्जुन मेरी ओर देखकर हँसा, लेकिन मुझको हँसी नहीं आयी। मुझको ऐसा लगा जैसे उसके हँसने में भी एक प्रकार का व्यंग्य है।

    मुझको पितामह भीष्म की याद आयी। इस अर्जुन के पितामह थे वे। लेकिन दोनों में कहीं समानता नहीं थी। दोनों के स्वभाव और व्यवहार में कितना अन्तर था। जाते-जाते कुछ पूछने के विचार से अर्जुन ने मुझसे पूछा, “यह कौन है ?”

“मेरा छोटा भाई !” मैंने अभिमानपूर्वक कहा।

“यह भी इस शाला में आयेगा क्या ?” गुरुदेव द्रोण ने पूछा।

“जी हाँ ।“ मैंने उत्तर दिया।

“जाओ उस ओर कृप हैं, उनके पथक में सम्मिलित हो जाओ।“

     मैंने कुछ भी न कहा। उनको नमस्कार करने की भी मेरी इच्छा न हुई। जाते-जाते मैंने अर्जुन की ओर मुड़कर देखा। वह तो आश्चर्य से मेरे कानों के कुण्डलों की ओर एकटक देख रहा था।

    हम कृपाचार्य के पथक में आये। कृपाचार्य द्रोणाचार्य जी के साले थे। उनकी देख-रेख में अनेक युवक धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। क्षण-भर के लिए मेरे मन में यह विचार आया कि ये ढ़ेर सारे राजकुमार क्यों जहाँ-तहाँ अपनी अकड़ दिखा रहे हैं ? उस दुर्योधन का सा रोब एक में भी है क्या ? एक भी ऐसा है क्या, जिसकी चाल दुर्योधन की चाल की तरह शानदार हो ? है कोई ऐसा माई का लाल जिसकी दृष्टि उसकी दृष्टि की तरह भेदक हो ?

    इतने में युवराज दुर्योधन ही सामने से आता हुआ मुझको दिखाई दिया। उसके पास जायेंगे तो निश्चय ही हमारी कुशल-क्षेम पूछेगा – यह सोचकर मैं उसकी ओर चलने लगा। उसके पास भी गया, लेकिन युवराज दुर्योधन नहीं था। उसमें और दुर्योधन में अद्भुत समता थी। उसकी देह पर जो वस्त्र थे उससे यह तो निश्चित था कि वह युवराज था। लेकिन युवराज किनमें से था कौरवों में से या पाण्डवों में से, चूँकि दुर्योधन में और इसमें बड़ी समता है, इसलिए यह कौरवों में से ही होगा, लेकिन कौरवों मे से यह कौन है ? इतने में ही कृपाचार्य ने उसको पुकारा, “दु:शासन !” वह भी जल्दी-जल्दी उनकी ओर चला गया। तो वह दु:शासन था ? अहा, दुर्योधन में और उसमें कितनी समानता थी। एक को छिपाइये और दूसरे को दिखाइए। युवराज दुर्योधन और युवराज दु:शासन। दोनों की चाल में वही शान थी। दोनों की दृष्टि में वही भेदकता थी। कहीं दु:शासन दुर्योधन की प्रतिच्छाया ही तो नहीं था ?

अवसर… मौका… जो पहला मिले छोड़ो मत…

एक जवान आदमी किसान की खूबसूरत लड़की से शादी करना चाहता था, वह किसान के पास शादी की अनुमति लेने गया।

किसान ने उस जवान की ओर देखा और बोला जाओ उस खेत में खड़े हो जाओ। मैं एक एक करके तीन सांडों को छोडूँगा। अगर तुमने एक भी सांड की पूँछ पकड़ ली तो तुम मेरी बेटी से शादी कर सकते हो।

जवान आदमी खेत में जाकर खड़ा हो गया और पहले सांड के आने का इंतजार करने लगा। खलिहान का दरवाजा खोला गया पहला सांड बाहर आया, बहुत ही भीमकाय शरीर वाला उसने पहली बार इतना बड़ा सांड देखा था। उसने सोचा कि अगला सांड इससे बेहतर विकल्प होगा, इसलिए वह एक ओर भाग लिया और वह सांड उसके सामने से निकल गया।

खलिहान का दरवाजा वापिस से खोला गया, देखकर यकीन नहीं हुआ। इतना बड़ा और भयंकर सांड उसने पहली बाद देखा था, उसे देखकर तो वह जड़ हो गया। उसने सोचा कि  अच्छा है कि मेरा  अगले सांड का इंतजार करना ठीक रहेगा और अगला सांड एक बेहतर विकल्प होगा। इसलिए वह एक ओर भाग लिया और वह सांड उसके सामने से निकल गया।

खलिहान का दरवाजा तीसरी बार खोला गया, उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी, यह सबसे कमजोर सांड था, इससे कमजोर सांड उसने आज तक नहीं देखा था। उसने अपने आप से कहा यही तो मेरा सांड है, जिसका मैं इंतजार कर रहा था। वह सांड दौड़ा चला आ रहा था और इस जवान ने अपनी स्थिती ठीक की और सांड की पूँछ पकड़ने के लिये तैयार हो गया, और कूद पड़ा, लेकिन यह क्या उस सांड की तो पूँछ ही नहीं थी।

नैतिक शिक्षा – जीवन अवसरों से भरा पड़ा है, जो भी अवसर पहले मिले उसे ले लो, छोड़ो मत।

परिवर्तन के बिना प्रगति असंभव है, और जो अपना मन नहीं बदल सकते, वे कुछ नहीं बदल सकते।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २२ [कर्ण के नये गुरु, जो खुद कर्ण ने बनाये..]

     जैसे ही मैं राजभवन पहुँचा, पिताजी ने मुझको तैयार रहने को कहा। क्योंकि युद्धशाला में जाना था, इसलिए मैं तुरन्त ही तैयार हो गया। माँ ने जो पेटिका दी थी, वह मैंने एक आले में सँभालकर रख दी थी । उस पर पारिजात के चार पुष्प चढ़ाये। उसको वन्दन कर मैं धीरे से बोला, “माँ ! मुझको आशीर्वाद दो । तुम्हारा वसु जीवन के मार्ग पर एक महत्वपूर्ण मोड़ आज ले रहा है । युद्धशाला में जाने का आज पहल दिन है ।“

पिताजी ने बाहर से ही पुकारा, “कर्ण ! शोण ! जल्दी चलो।“

    हम तीनों युद्धशाला में आये । कल की अपेक्षा आज तो वहाँ बहुत अधिक युवक एकत्रित थे। वे सभी मध्य में स्थित उस चबूतरे के चारों ओर शान्तिपूर्वक बैठे हुए थे। सबके सम्मिलित शान्त और गम्भीर स्वर सुनाई पड़ रहे थे। शायद प्रात:काल की प्रार्थना हो रही थी।

    “ऊँ ईशावास्यम इदम सर्वम…” । प्रार्थना बहुत देर तक चलती रही। मैंने पिताजी को वापस जाने को कहा।

“अनुशासन रखना।“ यह कहकर वे लौट गये।

    बीच में बैठे हुए गुरुदेव द्रोण शान्तिपूर्वक उठकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने दोनों हाथ उठाकर अपने सभी शिष्यों को आशीर्वाद दिया। मैं शोण को लेकर आगे बढ़ा । हम दोनों ने झुककर गुरुदेव को प्रणाम किया। मुझको आशा थी कि अपना हाथ उठाकर वे हमको भी आशीर्वाद देंगे। लेकिन इतने में ही अर्जुन उनके सामने आ गया और वे अर्जुन के कन्धे पर हाथ रखकर उससे कुछ बातें करते हुए वहाँ से चले गये।

     मैंने सदैव की तरह पूर्व दिशा में आकाश की ओर देखा । तप्त लाल लोहे के गोले की तरह सूर्यदेव आकाश की नीली छत को जला रहे थे। मेरी निराशा क्षण-भर में नौ-दो ग्यारह हो गयी। बस, महासामर्थ्यशाली उस तेज के अतिरिक्त अधिक योग्य गुरु इस त्रिभुवन में दूसरा कौन होगा ? किसी अन्य के आशीर्वाद की भीख माँगने की आवश्यकता ही क्या है ? आज से मेरे वास्तविक गुरु ये ही हैं। आज से बस इन्हीं की पूजा, आज से इन्हीं की आज्ञा। तत्क्षण मैं पत्थर के उस चबूतरे पर चढ़ गया। वहाँ पुष्पों से सजा हुआ धनुष रखा था। वह मैंने हाथ में उठा लिया और जितना ऊँचा उठा सकता था, उतना ऊँचा उठाकर मैं बोला, “संसार के समस्त अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्यदेव ! आज से मैं तुम्हारा शिष्य हूँ। मुझको आशीर्वाद दो। मुझको मार्ग दिखाओ।“ उस धनुष को मस्तक से लगाकर मैंने झुककर उस तेज को प्रणाम किया।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २१, भीष्म पितामह से संवाद और कर्ण के विचार ।

    एक विशाल वटवृक्ष के सम्मुख घास के छोटे-से तृण की तरह मैं खड़ा था। क्या करुँ, यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। तुरन्त ही जैसे-तैसे अपने को सँभालकर मैंने झुककर उनको अभिवादन किया। उन्होंने तत्क्षण मुझको ऊपर उठाया। अत्यन्त मृदु स्वर में बोले, “तुम अपनी पूजा में लीन थे। मैंने तुमको जगा दिया, इसलिए तुम क्षुब्ध तो नहीं हो गये ?”

“नहीं ।” मैं बोला।

“सचमुच वत्स, तुमको जगाने की इच्छा मैं रोक नहीं सका।“

    मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा। थोड़ी देर बाद वे बोले, “आज तीन दशाब्दियाँ हो गयीं। प्रतिदिन नियमित रुप से मैं इस समय गंगा के घाट पर आता हूँ, लेकिन इस हस्तिनापुर का एक भी व्यक्ति कभी मुझसे पहले यहाँ नहीं आया, मैंने किसी को नहीं देखा। तुम वह पहले वयक्ति हो, जिसको मैं आज देख रहा हूँ।“

“मैं ?” मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या कहूँ।

    “हाँ ! और इसीलिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद अन्त में तुमको जगाया ।“ मेरे कानों के कुण्डलों की ओर देखते हुए वे बोले, “इन कुण्डलों के कारण तुम बहुत ही अच्छे लग रहे हो।“

“ये जन्मजात हैं।“ मैंने कहा ।

     “इनका सदैव ध्यान रखना ।” धीरे धीरे पैर रखते हुए वे घाट की सीढ़ियों पर उतरने लगे। पर्वत की तरह भव्य दिखने वाला उनका वह लम्बा शरीर ओझल होने लगा। गले तक पानी में जाकर वे खड़े हो गये। उनके सिर के बाल पानी के साथ तैरने लगे। मैं जहाँ खड़ा था, वहीं से मैंने उनको वन्दन किया। आर्द्र उत्तरीय कन्धे पर डालकर मैं राजभवन की ओर लौटा।

    उस विचित्र संयोग पर मुझे आश्वर्य हुआ। जिन पितामह भीष्म को देखने के लिए मैं कल दिन-भर विचार करता रहा था, वे स्वयं ही आज मुझको मिल गये थे – वे भी अकेले, गंगा के तट पर और प्रात:काल की इस रमणीय बेला में। कितने मधुर हैं उनके स्वर ! मन्दिर के गर्भगृह की तरह उनकी मुखाकृति कितनी शान्त और पवित्र है ! मुझ जैसे एक साधारण सूतपुत्र की कोई बात उनको अच्छी लगती है ! कौरवों के ज्येष्ठ महाराज मुझ-जैसे सूतपुत्र के कन्धे पर हाथ रखकर स्नेह से पूछताछ करते हैं ! सचमुच ही वीर पुरुष यदि अभिमानरहित हो, तो वह कितना महान लगने लगता है ! जिस कुरुकुल में पितामह जैसे वीर और गर्वरहित श्रेष्ठ पुरुष ने जन्म लिया है, वह कुल निश्चय ही धन्य है। मैं भी कितना भाग्यशाली हूँ, जो ऐसे राजभवन में रहने का सौभाग्य मुझको प्राप्त हुआ है। अब तो बार-बार इन पुरुष-श्रेष्ठ के दर्शन मुझको हुआ ही करेंगे। वे दो शान्त और तेजस्वी आँखें मुझपर भी कृपा-दृष्टि रखेंगी। अपने जीवन में जिन तीन व्यक्तियों पर मेरा प्रेम था, उनमें एक व्यक्ति और बढ़ गया था ! पितामह भीष्म !

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २० [गंगा तट पर भीष्म पितामह से मुलाकात]

     संसार के तीन व्यक्तियों से मुझको अत्यन्त प्रेम था। एक अपनी माँ से, दूसरा पिताजी से और तीसरा शोण से। उसी तरह तीन बातों के प्रति मुझमें आकर्षण था। एक थी अपनी असंख्य लहरों के असंख्य मुखों से मुझसे घंटों तक बात करने वाली गंगामाता, दूसरे थे मेरे लिए सदैव उत्साह का प्रचण्ड प्रवाह लेकर आनेवाले आदित्यनारायण और तीसरी यह माँ की दी हुई एक छोटी-सी निशानी चाँदी की पेटिका। इस पेटिका के कारण मुझको चम्पानगरी की याद आयी। मेरे मन का बछड़ा मातृभूमि के थनों पर आघात करने लगा। उनसे स्मृतियों की अनेक मधुर दुग्धधाराएँ बहने लगीं उनकी मधुरता चखते-चखते मैं न जाने कब सो गया।

    प्रत्युषा में पक्षियों की चहचहाहट से मैं जागा। क्षितिज की रेखाओं से अन्धकार हटने लगा था। समस्त हस्तिनापुर धीरे-धीरे जागृत हो रहा था। दूसरा एक सूखा उत्तरीय लेकर मैं कक्ष से बाहर निकला। इस समय वहाँ कोई न होगा, अत: गंगा के पानी में जी भर स्नान कर आऊँ, यह सोचकर मैं घाट की ओर चलने लगा। विचारों में डूबा मैं गंगा के घाट पर आ पहुँचा। मैंने उस अथाह पात्र को आदरपूर्वक नमस्कार किया और फ़िर दोनों हाथ आगे कर सिर के बल मैं पानी में कूद पड़ा। लगभग घण्टा-भर तक मैं उस पानी में मनमानी डुबकियाँ लगाता रहा। मैं पानी में से घाट की ओर पानी काटता हुआ आया। भीगा हुआ अधरीय बदला। भीगा वस्त्र पानी में डूबाकर, फ़िर निचोड़कर मैंने सीढ़ी पर रख दिया। दूर आकाश में सूर्यदेव धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे थे। उनकी कोमल किरणें गंगा के पानी को गुदगुदाकर जगा रही थीं। अंजलि में पानी भरकर भक्तिभाव से उसका अर्ध्य मैंने सूर्यदेव को दिया।

    शायद किसी ने मेरे कन्धों को स्पर्श किया। मेरे कन्धों को जोर से हिला रहा था। मैंने धीरे से आँख खोलीं और मुड़कर देखा। अत्यन्त शांत मुखाकृतिवाले एक वृद्ध मेरी ओर देख रहे थे। उनकी दाढ़ी के, सिर के और भौंहों के सभी केश सफ़ेद बादल की तरह श्वेत-शुभ्र थे। भव्य मस्तक पर भस्म की लम्बी रेखाएँ थीं। उनका हाथ मेरे कन्धे पर अब भी ज्यों का त्यों था। कौन है यह वृद्ध ? तत्क्षण मैं प्रश्नों के बाण मन के धनुष पर चढ़ाने लगा। लेकिन नहीं, मैंने इनको कहीं नहीं देखा।

अत्यन्त स्नेहासिक्त, स्वर में उन्होंने मुझसे पूछा, “वत्स, तुम कौन हो ?”

“मैं सूतपुत्र कर्ण ।“

“सूतपुत्र ! कौन-से सूत के पुत्र हो तुम ?”

“चम्पानगरी के अधिरथजी का ।“

“अधिरथ का ?”

“जी । लेकिन आप ?” मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।

“मैं भीष्म हूँ ।“ उनकी दाढ़ी के बाल हवा के झोंकों से लहरा रहे थे।

भीष्म ! पितामह भीष्म ! कौरव-पाण्डवों के वन्दनीय भीष्म ! गंगा-पुत्र भीष्म ! कुरुवंश के मन्दिर के कलश भीष्म ! योद्धाओं के राज्य के ध्वज भीष्म ! क्षण-भर मेरा मन विमूढ़ हो गया। कुरुवंश का साक्षात पराक्रम मेरे सामने गंगा के किनारे खड़ा था।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १९, कुछ अनसुलझे प्रश्न !!

      मैं उस भीड़ के बाहर हो आया । चारों ओर अखाड़े को ध्यान से देखने लगा। क्योंकि कल से मुझको यहाँ शिक्षा प्राप्त करनी थी। लेकिन एक ही प्रश्न बार-बार मेरे मन में चक्कर काट रहा था। मैं युवराजों के साथ क्यों नहीं शिक्षा प्राप्त कर सकता ? थोड़ी देर पहले गुरुदेव ने कहा था कि युद्धविद्या केवल क्षत्रियों का कर्तव्य है। क्षत्रिय का अर्थ आखिर क्या है ? मैं क्या क्षत्रिय नहीं हूँ ? और यदि नहीं हूँ तो क्या हो नहीं सकता हूँ ?

    अपना नाम शाला में लिखवाकर हम उस भव्य महाद्वार से बाहर आये। मैंने पिताजी से पूछ ही लिया “पिताजी, मैं क्यों नहीं राजकुमारों के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकता हूँ ?”

“क्योंकि तुम क्षत्रिय नहीं हो, वत्स !” वो बोले।

“क्षत्रिय ! क्षत्रिय का क्या अर्थ है ?”

“जो राजकुल में जन्म लेता है, वह क्षत्रिय । तुमने एक सूतकुल में जन्म लिया है, वत्स !”

“कुल ! राजकुल में जन्म लेनेवालों के क्या सहस्त्र हाथ होते हैं ? उन्हीं को इतना महत्व क्यों ?”

“यह तुम नहीं समझ पाओगे। कल से नियमित रुप से इस शाला में आया करना । जो-जो शिक्षा दी जाये, वह ग्रहण करना ।“

हम लोग राजप्रसाद लौटे । शोण उसी तरह कक्ष में बैठा हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके पास ही अमात्य वृषवर्मा खड़े थे।

“सूतराज क्या हुआ ? तुम्हारे पुत्र का नाम लिख गया न ?” अमात्य ने विश्वास के साथ पूछा।

“हाँ ।“ पिताजी ने इतना ही उत्तर दिया।

“ठीक है । जब किसी वस्तु की आपको आवश्यकता हो, उसकी सूचना बाहर के सेवक को दे दीजियेगा। मैं जाता हूँ अब।“ अमात्य चले गये।

    मेरा मन यों ही अभ्यासवश युवराज दुर्योधन और अर्जुन, महाराज धृतराष्ट्र और गुरुदेव द्रोण, विदुर और युधिष्ठिर – इनकी तुलना करने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन उनमें से किसी की भी एक-दूसरे से तुलना नहीं हो पा रही थी। सबों का अपना स्वतन्त्र और एकदम भिन्न अस्तित्त्व दिखा। इस संसार में कितने प्रकार और कैसे-कैसे स्वाभाव के लोग हैं, भगवान जानें ! किसकी कल्पना से उनका निर्माण होता है ? किस लिए उनका निर्माण होता है ? इस जगत का वह चतुर कारीगर अन्तत: है कौन ? उसने इतने सारे नमूने किस उद्देश्य से बनाये हैं ? क्योंकि यहाँ एक-जैसा दूसरा दिखाई नहीं देता है, और दिखाई दे भी जाये तो वह उस-जैसा होता नहीं है। छि:, इन प्रश्नों का तर्कसंगत उत्तर शायद कोई कभी नहीं दे पायेगा।