Category Archives: विश्लेषण

दुनिया में किसी पर भी विश्वास करने से पहले बेहतर है कि परख लिया जाये। (Trust)

   दुनिया में जब तक आप किसी पर विश्वास (Trust) न करें तब तक किसी भी कार्य का संपादन होना मुश्किल ही नहीं वरन नामुमकिन है, सारे कार्य खुद नहीं कर सकते और मानवीय मन अपनी बातों को किसी को बताने के लिये हमेशा ही उद्यत रहता है। हर किसी को अपने मन और दिल की बात बताना भी बहुत भारी पड़ सकता है, पता नहीं कब कैसे कहाँ वह आपके विश्वास करने की सदाशयता पर घात लगा दे। और आपको अपने उस पल पर जिसमें आपने अपनी बातों को बताने का फैसला किया था, हमेशा जीवन भर सालता रहेगा। आपको हमेशा दूसरे व्यक्ति पर ही गुस्सा आयेगा जिसने आपके विश्वास को तोड़ा होगा, परंतु वाकई में आप खुद उसके लिये जिम्मेदार हैं। क्या कभी इस बारे में सोचा है ? नहीं न! जी हाँ हम खुद पर कभी गुस्सा करना ही नहीं चाहते हैं, हमेशा ही किसी दूसरे व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराते हैं।

   विश्वास करने की शिक्षा हमें कहीं किसी किताब से नहीं मिलती है, यह हमें हमेशा अपने खुद के अनुभवों से मिलती है। हम कभी किसी के अनुभवों से कोई भी व्यवहार नहीं सीखते हैं, जब तक कि अपना खुद का अनुभव न हो तब तक हम ऐसे किसी अनुभव को याद ही नहीं रख पाते हैं, शायद ईश्वर ने ही हमारी मानसिक स्थिती ऐसी बनाई हुई है। हमारे में अगर किसी और के अनुभवों की सीख से अपनाने का गुण आ जाये तो एक अलग बात है, पर आज के इस आत्ममुग्ध संसार में यह लगभग असंभव है और इस गुण को अपने आप में लाने के लिये आपको आत्मकेंद्रित होना पड़ता है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि इंसान हमेशा सफल आदमी से ही प्रेरित होता है और हमेशा उनके जैसा ही बनने की कोशिश करता है। कभी भी इंसान अपने दम पर अलग से खुद को स्थापित करने की सफल कोशिश नहीं करता है। आजकल के इंटरनेटयुगीन रिश्तों के युग में किसी को भी जानना बहुत आसान हो गया है पर आप केवल उसके विचार जान सकते हैं, उसके पीछे की भावनाओं को समझने के लिये आपको हमेशा ही उस व्यक्तित्व के संपर्क में आना होता है।

   संपर्क में आने पर ही आप देख पायेंगे कि व्यक्तित्व में विचारों (जिससे आप प्रभावित हुए) और उनके जीवनचर्या में अक्सर ही जमीन आसमान का अंतर होता है। यह अलग बात है कि आप कभी यह निश्चय नहीं कर पायेंगे कि उस व्यक्तित्व ने भी आपसे कुछ बातें ग्रहण की हैं, यह मानवीय स्वभाव है। हम किसी और के द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को दोहराने की चेष्टा करते हैं क्योंकि हम सोचते हैं कि अगर वही शारीरिक क्रियाएँ हम दोहरायेंगे तो शायद हम भी वैसे ही किसी विचार को पा सकते हैं।

   जब आप ऐसे किसी भी व्यक्ति के संपर्क में आते हैं जिससे आप प्रभावित हैं तो मुझे लगता है कि हमें ध्यान रखना चाहिये – जो व्यक्ति अभी भी उनसे संपर्क में हैं या निकट हैं या उनका कार्य करते हैं, उन पर हमें विश्लेषण करना चाहिये जिससे आप खुद ही अपने आप निष्कर्ष पर पहुँच जायेंगे। आपको किसी और व्यक्ति से मशविरा करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी । खुद ही विश्लेषक बनना अपने जीवन को आसान बनाना होता है, किसी और पर निर्भरता हमेशा ही हमें गलत राह पर ले जाती है। अपने मनोमष्तिष्क को दूसरे पायदान पर ले जाने के लिये हमें खुद के लिये बहुत ही मेहनत करनी होगी।

ब्लॉगिंग (Blogging) के 10 वर्ष पूर्ण.. बहुत सी बातें और बहुत सी यादें

    आज से ठीक पाँच वर्ष पूर्व हमने अपने पाँच वर्ष पूर्ण होने पर यह पोस्ट लिखी थी और अब हमें ब्लागिंग (Blogging) में दस वर्ष पूरे हो गये हैं, आज यह  1100 वीं पोस्ट है और हमारे लिये यह जादुई आँकड़ा है, और उससे कहीं ज्यादा प्रतिक्रियाएँ मिली हैं। ब्लॉगिंग जब शुरू की थी तब हिन्दी कंप्यूटर पर लिखना इतना मुश्किल नहीं था पर हाँ सीमित साधनों के चलते वेबसाईट पर लिखना बहुत ही कठिन था । पर आज ये देखकर खुशी होती है कि हिन्दी में लिखने के लिये बहुत सारे साधन उपलब्ध हैं यहाँ तक कि अब तो मोबाईल पर हिन्दी को बोलकर भी टाइप किया जा सकता है, तो जिसको टाइप करना न भी आता हो वह भी अब ब्लॉगिंग कर सकता है।
    समय की कमी बहुत ही तेजी से होती जा रही है, पहले हम कंप्यूटर पर इंटरनेट बंद रखते थे कि ब्लॉग लिखना है नहीं तो अपना दिमाग किसी और तरफ चला जायेगा, पर अब मोबाईल ने तो जीवन का अधिकतम समय ले लिया है, हम अपना अधिकतम समय मोबाईल को देते हैं और कई कार्यों को करने से छोड़ देते हैं, ब्लॉगिंग के लिये लेखन के लिये समर्पित होना पड़ता है और अपने तात्कालिक प्रतिक्रिया वाली मनोदशा से बाहर आना पड़ता है।
कुछ अनुभव जो हमने 2 वर्ष पहले ब्लॉगिंग के लिये लिखे थे, हालांकि ये भी अधूरे ही रहे –

ब्लॉगिंग (Blogging) की शुरूआत के अनुभव (भाग १)

ब्लॉगिंग (Blogging) की शुरूआत के अनुभव (भाग २)

ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग ३)

कुछ और पोस्टें मैंने ब्लॉगिंग पर लिखी हैं तो वे ब्लॉगर या ब्लॉग लेबल पर क्लिक करके पढ़ी जा सकती हैं।
हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षैत्र में एक से एक धुरंधर ब्लॉगर थे पर मैंने देखा है कि अधिकतर पुराने ब्लॉगर अपने ब्लॉग से थोड़ी दूरी बना चुके हैं या फिर फेसबुक पर अपने तात्कालिक विचारों को रखकर ही इति कर लेते हैं, जैसे कि पहले ब्लॉग में चिंतन मनन करके लिखा जाता था, कुछ या बहुत कुछ तात्कालिक लेखन भी होता था, आजकल बहुत ही कम दिखता है, ब्लॉग पढ़ने वाले पहले केवल ब्लॉगर थे, और सोचते थे कि बहुत सारे पाठक गूगल या किसी और सर्च इंजिन से हमारे ब्लॉग पर कभी न कभी तो आयेंगे । अब ब्लॉग लिखो तो ब्लॉगरों के पास पढ़ने का समय नहीं है या उनकी रूचि खत्म हो चुकी है या फिर ब्लॉग पर टिप्पणी करना उनको ठीक नहीं लगता है, जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ है और हम प्रगति करते जा रहे हैं वैसे ही यहाँ की भी हालत हो गई होगी, हम यही सोचते हैं।
    हिन्दी ब्लॉगिंग ने दम तो नहीं तोड़ा है, हिन्दी ब्लॉग अच्छी खासी मात्रा में अब उपलब्ध हैं। एक और बात है कि हमारे हिन्दी ब्लॉगिंग में ब्लॉगर ऐसी कोई तकनीक का उपयोग नहीं करते हैं जिससे सर्च इंजिन को ढ़ूँढ़ने में आसानी हो, और ब्लॉग पढ़ने वाले पाठकों की आवृत्ति बढ़े। कुछ ही गिने चुने ब्लॉगर नई तकनीकों का उपयोग कर पा रहे हैं, या तो समय की उपलब्धता न होने के कारण या फिर कम तकनीकी ज्ञान । बहुत सारे ब्लॉगर किसी एस.ई.ओ. टूल का उपयोग नहीं करते हैं, शौक शौक में अपनी वेबसाईट तो हमने भी खरीद ली पर अभी तक अपने इस ब्लॉग को नहीं ले जा पाये हैं, कई बार कोशिश करी, कभी किसी तकनीकी उलझन में उलझ गये या फिर कभी हमारे ब्रॉडबैंड ने धोखा दे दिया। कई नये और पुराने ब्लॉगर अपनी अपनी वेबसाईट पर चले जरूर गये हैं पर बहुत ही कम ब्लॉगरों ने अपनी होस्टिंग अच्छे से की हुई है, जिससे उनका लिखा हुआ सर्च इंजिन में अवतरित हो। अधिकतर ने केवल अपने ब्लॉग रिडाइरेक्ट किये हुए हैं, जिससे केवल उनका पता बदला है पर अंदर से घर वही पुराना है।
हिन्दी में ब्लॉगिंग के बहुत सारे सितारे हैं और कई सितारों से या तो मैं मिल चुका हूँ या फिर फोन पर तो बात हो ही चुकी है। हिन्दी ब्लॉगिंग के कारण संसार के कई लोगों से इस आभासी और अप्रत्यक्ष दुनिया के माध्यम से मिल चुका हूँ, और हिन्दी माध्यम होने के कारण बहुत से ब्लॉगरों से आत्मीय संबंध भी स्थापित हुए और अभी तक हैं। अपने फेसबुक पर या गूगलप्लस पर अधिकतर मित्र ब्लॉगिंग क्षैत्र से ही हैं और शायद वे ही लिखी गई अधिकतर पोस्टों को लाईक करने वाले या फिर टीप देने वाले होते हैं।
    जब मैंने ब्लॉगिंग शुरू की थी तब मैं उज्जैन में था, फिर दिल्ली, मुँबई, बैंगलोर, चैन्नई, हैदराबाद और अब गुड़गाँव में हैं, मैंने इस दौरान लगभग सभी जगह ब्लॉगरों से मुलाकात भी की, कुछ ब्लॉगर बहुत ही मिलनसार होते हैं और कुछ नहीं मिलना चाहते हैं, यह व्यक्तिगत मामला है। खैर मैंने तो बहुत से ब्लॉगरों को अपने विचारों के साथ ही खड़ा पाया और जो नहीं भी थे उनसे भी प्यार और सम्मान पाया। पता नहीं इतना प्यार और सम्मान के लिये मैं कैसे आभार प्रकट करूँ।
    मैंने इस दौरान कई तरह के विषयों पर लेखन किया पर कभी अपने ब्लॉग को एक ही विषय का नहीं बना पाया, बस एक ही बात उल्लेखनीय है कि किसी भी विषय पर लिखा हिन्दी भाषा में लिखा। यह पोस्ट लिखते हुए भी बहुत सारे खलल हैं पर लिखना ही है तो भी जीवन के अशांतिपूर्ण वातावरण से थोड़ा सा समय शांतिपूर्वक ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिये निकाल ही लिया। मैं जानता हूँ कि बहुत सी बातें यहाँ मैं करने से चूक रहा हूँ पर मैं वे सब बातें भी लिखना चाहता हूँ, अगर अगले कुछ दिनों में समय मिला तो जरूर इस पर बहुत कुछ लिखने की इच्छा रखता हूँ।

आइसक्रीम वाले ने बताया कि उसके पापा नहीं हैं

घर से फरमाइश थी कि ऑफिस से आते समय आइसक्रीम लेते आना, तो कल हम थोड़ी से देर हो गई, वैसे शाम को साढ़े छ: तक घर पहुँच जाते हैं पर कल साढ़े नौ बज गये। हम हमेशा जिस साईकिल रेहड़ी वाले से आइसक्रीम लेते हैं, उसके पास पहुँचे और बात करने लगे, कहा कि दो आइसक्रीम घर के लिये दे दो।

 

हमारे पहले बाईक पर एक बंदा हेलमेट लगाये हुए बैठा हुआ था जिसके पीछे एक प्यारा से बच्चा बैठा हुआ था, जो कि लगभग 6-7 वर्ष का लग रहा था। वह आइसक्रीम वाले से दो आइसक्रीम लेकर पूछ रहा था जिसमें एक जिगली जैली और दूसरी कोला ब्लॉस्ट थी तो वह बच्चा आइसक्रीम वाले को बोल रहा था कि भैया यह कितने की है, आइसक्रीम वाले ने बताया कि यह 10 रू. की है, तो वह बोला ठीक है हमें एक आइसक्रीम दिखाते हुए बोला कि हमें यह वाली दो आइसक्रीम दे दीजिये। आइसक्रीम वाले ने बच्चे के हाथ से आइसक्रीम लिये बिना ही अपने आइस बॉक्स में हाथ डालकर वही वाली दो आइसक्रीम निकाली, तो बच्चा बोलने लगा कि अंकल हमें तीन नहीं चाहिये हमें दो ही चाहिये, आइसक्रीम वाले ने बोला कि हाँ हम दो ही दे रहे हैं, और यह कहते हुए बच्चे के हाथ से वो एक आइसक्रीम ले ली। तो बच्चा भोलेपन से बोला कि भैया एक पोलीथीन में रख दीजियेगा नहीं तो हम घर कैसे ले जायेंगे। तो आइसक्रीम वाले ने बोला कि हाँ हम पोलीथीन में ही रखकर दे रहे हैं। और उसने वो पोलीथीन बच्चे को पकड़ा दी। बाईक वाला इतनी देर मौन बना रहा, उसने चुपचाप 20 रू. दिये, बाईक को ऑटोस्टार्ट बटन से स्टार्ट किया और चल दिया।

 

बच्चों की बातें सुनकर मन पुलकित हो जाता है, और दिनभर की थकान भी उतर जाती है। तभी आइसक्रीम वाले ने हमें बोला कि ये जो बच्चा था, उसके पापा नहीं हैं, हम थोड़े दिन पहले ऐसे ही पूछ लिये थे कि आज पापा कहाँ है, तो बच्चे ने बताया था कि हमारे पापा नहीं है, वो तो दुर्घटना के कारण भगवान के पास पहुँच गये।

 

हम अब तक वो बाईक वाले को ही बच्चे का पापा समझ रहे थे, और शायद हर कोई यही समझता। पर बच्चा जो कि समय से पहले ही बड़ा हो गया था, जिसे पता था कि पापा नहीं हैं और उम्र से पहले ही समझदार हो गया होगा। उसने अपने बचपन को खोकर इतना भयावह सत्य देख लिया। मेरे मन में पता नहीं बहुत सी बातें घुमड़ने लगीं, बच्चे का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम रहा था। साथ ही सोच भी रहा था कि मैंने पहले वित्तीय  योजना और बीमा पर इतनी ब्लॉग पोस्टें लिखी हैं, उसका शायद यहीं महत्व है, पता नहीं उनका परिवार किन परिस्थितियों से गुजर रहा होगा। बस मन में यही आया कि भगवान उनके परिवार को यह दुख सहने का सामर्थ्य दे और उनके परिवार को अच्छे से चलाने लायक अच्छी आमदनी भी दे जिससे बच्चा कभी अपने पापा को बहुत ज्यादा याद न करे कि पापा जल्दी चले गये और आर्थिक तंगी के कारण उसकी पढ़ाई अच्छे से नहीं हो पाई।

 

मैं यही सोचता हुआ अपनी दो आइसक्रीम पोलीथीन में लेकर अपने घर की और बढ़ चला।

 

That is how I can say about the importance of Term insurance of individual life. Everyone should take Term insurance and Personal Accidental Policy, it will help family to get survive behind them.

 

कुछ मधुमेह के बारे में – मधुमेह रोगी आम भी खा सकते हैं

कल एक पोस्ट लिखी थी रेडियो पर दिये जा रहे भद्दे से कार्यक्रमों के बारे में, दरअसल रेडियो के बारे में लिखने बैठा था कुछ और पर लिख कुछ और ही गया। जब लिखने बैठो तो ऐसा ही होता है, खैर आज बात मैं करूँगा सही मुद्दे की, दो दिन पहले ऑफिस से जल्दी निकलना हुआ तो विविध भारती स्टेशन पर डॉक्टर से मिलिये कार्यक्रम आ रहा था जिसमें वे मधुमेह के बारे में बात कर रहे थे, आजकल मेरी कार के एफ.एम. सिस्टम में विविध भारती स्टेशन ही बाई डिफॉल्ट होता है। Continue reading कुछ मधुमेह के बारे में – मधुमेह रोगी आम भी खा सकते हैं →

लंबी पीड़ा से गुजरकर सुख में जाने की अभिव्यक्ति

दर्द का सुख

 

दर्द जिसे पीड़ा भी कहते हैं, दर्द हमेशा हमारे शरीर और मन को तकलीफ ही देता है, पर वह तकलीफ हमेशा ही किसी सुख की और बढ़ने का पहला कदम होता है। कोई भी हो हमेशा ही दर्द में कराहता ही है, कोई रोता है, कोई दर्द को आँसुओं में बहा देता है। काश कि आँसुओं के साथ हमारा दर्द भी बह जाता या जितने आँसु बाहर निकले, जितने दर्द से हम कराहें उतना दर्द कम होता जाये।

 

काश कि यह दर्द हम किसी को उधार दे सकते और हमारे आगे उधार लेने वालों की भीड़ लगी होती, अब तो सुख लेने के लिये भी भीड़ नहीं मिलती, लोग खुद सोचने पर मजबूर हैं कि यह सुख या दुख क्यों दे रहा है, जरूर इसमें मिलावट होगी नहीं तो कोई भी अपनी किसी भी चीज को ऐसे ही नहीं बाँट देता है।

 

दर्द से जब शरीर कराहता है तो सबके कराहने की भी अपनी अपनी वजहें होती हैं, कोई उसी दर्द में कम तो कोई अधिक कराहता है, सबकी दर्द सहने की क्षमता अलग अलग होती है, वैसे ही शरीर की पीड़ा जाने का सुख कोई हँसकर लेता है तो कोई अपनी आदत के अनुसार ही कराहता ही रहता है, किसी को इस सुख की वास्तविकता में अहसास होता है और किसी को केवल आभास होता है परंतु वह पीड़ा निरंतर ही बनी रहती है।

 

शरीर के दर्द की पीड़ा से भी जबर पीड़ा होती है मन की, जो घाव या जख्म किसी को दिखाई भी नहीं देते और न ही आदमी कराहता दिखाई देता है, बस वह तो अपनी ही दुनिया में खोया रहता है, चाहे कैसे भी सब तरफ से वह दर्द को हटाने के प्रयास करे पर अगर दर्द न हट पाने की स्थिती जैसा है तो फिर वह एक रोग जैसा हो जाता है। यह दर्द आदमी के जाने के साथ ही जाता है, जब तक दर्द मन में रहता है, मन को सालता रहता है, जख्म गहरे होते रहते हैं और तन प्रयाण के साथ ही यह पीड़ा खत्म होती है ।

 

मन के दर्द की पीड़ा अगर खत्म हो जाये तो उस दर्द का सुख देखते ही बनता है, मन और तन उत्सव करते हैं। पीड़ा चाहे मन की हो या तन की बस लंबी न हो और जल्दी ही वह पीड़ा खत्म होकर सुख प्रदान करे, यही हमारे मन की इच्छा है। लंबी पीड़ा से गुजरकर सुख में जाने की अभिव्यक्ति है यह।

जीवनशैली को प्रभावित करने वाले तीन बेहतरीन फीचर

जब से नयी तकनीक हमारे जीवन में आयी हैं फिर भले ही वे मनोरंजन के लिये हो या कार्य के लिये परंतु हमारे जीवन में निखार आया है। हमारे जीवनशैली भी तकनीक के अनुरूप बदल गयी है। पहले जिन चीजों की जरूरत हमें नहीं होती थी, वे सारी चीजें अब हमारे जीवन के लिये बेहद ही महत्वपूर्ण हो गयी हैं। अब उन तकनीकी चीजों के कार्य में बने रहने के लिये भी हमें उनसे जुड़ी बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जैसे कि डी.टी.एच. रिजार्ज करवाना, मोबाईल रिचार्ज करवाना, या फिर अपने पोस्टपैड मोबाईल से कितने कॉल कर लिये हैं और कितने फ्री बचे हैं और कितना उपयोग कर सकते हैं। यह सब आधुनिक तकनीक ने जादुई छड़ी जैसा एक एप्प हमें दे दिया है, जिससे हम ये सारी चीजें कहीं भी याने कि घर, ऑफिस, बाजार या संडास कहीं पर भी बैठकर रिचार्ज कर सकते हैं, अपने मोबाईल कॉलिंग के उपयोग देख सकते हैं।

 

पहले जब टीवी आया था, तब हम लोग एँटीने को हिला हिलाकर छत से चिल्लाते थे, अब साफ दिखाई दे रहा है, पर तब भी कई बार हमें टीवी साफ दिखाई नहीं देता था, और चैनल एक ही आता था वो था दूरदर्शन । फिर धीरे धीरे अस्तित्व में केबल वाले आये और अपने साथ लाये चैनलों से उन्होंने सैंकड़ा पार कर दिया, हम एक चैनल वालों को सौ चैनल देखने को मिल जाये तो फिर क्या बात है, पर सबसे बड़ा भ्रम यही होता था कि कौन सा चैनल देखें, पता नहीं कितनी ही फिल्में हमने कितनी बार रिपीट की हैं, हमें लगता है कि हमने जिस बदलते तकनीकी युग को देखा है, जिया है, जो कि हमारे जीवन शैली को प्रभावित करता है, वह शायद ही अब आगे की पीढ़ी देख पायेगी, ऐसा नहीं है कि अब बदलाव नहीं है, बदलाव है, परंतु अब लगभग बहुत कुछ स्थिर सा हो चुका है, ठहर चुका है।

 

मोबाईल और डी.टी.एच. के लिये एयरटेल ने नई एप्प गूगल प्ले स्टोर पर लोकार्पण की है, यह एप्प अभी केवल एन्ड्रॉयड के लिये उपलब्ध होगी, आई फोन के आई ओएस के लिये अभी इसे आने में समय है। ज्यादा जानकारी यहाँ http://www.airtel.in/myairtel से भी ली जा सकती है।

 

सबसे पहले तो इस एप्प में अपना एयरटेल का नंबर रजिस्टर करवाना पड़ता है और फिर हम एप्प के अंदर पहुंच पाते हैं। मुझे ये तीन फीचर्स एप्प के बहुत अच्छे लगे जो कि मेरी लाईफ स्टाईल को सूट भी करती है –

 

  1. डी.टी.एच. रिचार्ज करवाना – जब मैंने डी.टी.एच. लिया था तब ऑनलाईन की भी सुविधा उपलब्ध नहीं थी, मोबाईल से रिचार्ज की तो बात ही छोड़ दें, तब बाजार से स्क्रेच कार्ड लाकर रिचार्ज करवाना होता था। अब इस एप्प से चुटकी में डी.टी.एच. रिचार्ज हो जाता है।
  2. मोबाईल रिचार्ज करवाना या बिल भरना – मेरे जीवन में सबसे बड़ी समस्या यही है कि एक पोस्टपैड और एक प्रीपैड नंबर है मेरे पास, और बस उनके बिल या रिचार्ज के दिन याद रखो, इस एप्प से अब मैं कम से कम मोबाईल से ही यह सारे काम कर सकता हूँ।
  3. अपने उपयोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करना – पहले तो केवल अपने उपयोग तभी पता चलते थे जब बिल आता था, अब हमें इस एप्प से ही जानकारी मिल जाती है।

शादी में माँ के प्राकृतिक काले रंगे बाल

मैं माँ को बचपन से ही देखता आ रहा हूँ, हमेशा माँ अपने बालों का ख्याल बहुत अच्छे से ऱखती आती है, पहले शिकाकाई और आँवला के पावडर से बाल धोती थी, फिर शिकाकाई का साबुन आने लगा तो शिकाकाई के साबुन का उपयोग करने लगी, और फिर धीरे धीरे माँ के बालों का कालापन जाता रहा, और उम्र अपना रंग धीरे धीरे छोड़ने लगी, बाल भी पकने लगे, और फिर बालों में लगने वाली चीजों में भी बदलाव आने लगा। कभी जंगली मेंहदी तो कभी काली मेंहदी, और फिर हमेशा ही रिसर्च की जाने लगी कि बालों के लिये अच्छा क्या है।

मेंहदी लगाने से बालों का रंग काला तो नहीं होता था, परंतु लाल जरूर हो जाता था, जो कि देखने में ही अच्छा नहीं लगता था, फिर माँ ने बालों पर मेंहदी लगाना बंद कर दी और सफेद बाल माँ की उम्र को और बढ़ाकर बताने लगे, हम भी माँ को सफेद बालों में ही देखते रहते।

छोटे भाई की शादी के पहले ही हमने कह दिया था कि माँ अब तुमको बालों को रंगना ही होगा, तो मेंहदी लगाने के लिये तैयार हुईं, तो हमने मना कर दिया कि माँ हम लाल बालों में आप को देख नहीं पायेंगे, और मेंहदी से प्राकृतिक रंग भी नहीं आ पायेगा, तो अब आप कलर लगा लो, कलर से बिल्कुल प्राकृतिक रंग आ जायेगा और सबको भायेगा, आप सबके साथ फोटो में बहुत जँचोगी, जिससे यह शादी सबके लिये यादगार हो जायेगी, वैसे भी शादी का मौका बारबार कहाँ आता है, और फिर कब कहाँ फोटो खिंचाने वाले हैं, बस अब आप जल्दी से प्राकृतिक रंग जैसे काले बाल कर लो, मेरी पत्नी जी ने जैसे ही आज्ञा मिली, वैसे ही रंग लगाना शुरू कर दिया, इससे पहले कि माँ का मूड बदल जाये, और मात्र आधे घंटे में ही माँ का बुढ़ापा छिप गया था, माँ वापिस से अपनी उम्र से बहुत कम लगने लगी थी, हम सब बहुत खुश थे।

रिश्तेदारी से लोग आने लगे थे, माँ को देखकर सब बहुत ही खुश हो रहे थे, हमको भी माँ पर बहुत लाड़ प्यार आ रहा था, माँ ने हमारी बात जो मानकर अपने बालों को प्राकृतिक रंग में रंग लिया था, हमारा मान रख लिया था। हम हमेशा ही माँ के प्यार में रंगे रहते हैं, पर उस दिन माँ प्राकृतिक काले रंग के बालों में रंगी अलग ही आभा बिखेर रही थी ।

शादी के सारे कार्यक्रम अच्छे से हो गये, और माँ को भी काले बालों में अच्छा लगने लगा, माँ हमेशा ही अब अपने बालों का प्राकृतिक काले रंगों में रंगे रखती है, जिससे माँ को हम अपने आँखों से ही बुढ़ापे से वापिस आते देख रहे हैं। जब भी माँ अब कलर लगाने के लिये बैठती है, तो हमें वह शादी का दिन याद आ जाता है।

आजकल काले घने बालों के लिये एकबार का कलर भी आने लगा है, जो कि आप http://godrejexpert.com/single_used_pack.php यहाँ भी देख सकते हैं ।

कपिल देव की EKNAYILEAGUE

भारत में त्योहार तो बहुत होते हैं, पर क्रिकेट एक ऐसा त्योहार है जो कि भारत में लगभग हरेक दिन मनाया जाता है और भारत में क्रिकेट और कपिल देव के दीवानों की कमी नहीं है, भारत में क्रिकेट हर गली मोहल्ले में मिल जाता है। हर भारतीय का सपना होते है कि वह भारत की टीम के लिये क्रिकेट खेले, खैर हर किसी का सपना भी पूरा नहीं होता है। पर जब से अब IPL और ICL शुरू हुए हैं, तब से अधिक खिलाड़ियों को मौका मिलने लगा है। क्रिकेट की दीवानगी इस हद तक है कि लोग क्रिकेट के लिये कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं।कपिल देव भारत के एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने भारत को क्रिकेट विश्वकप जिताकर हर भारतीय को जैसे एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचा दिया था। भारत के लिये कपिल देव पहले ऐसे कप्तान थे, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट का परचम पूरे विश्व में फैला दिया था। कपिल देव हाल ही में ट्विटर पर आये हैं और http://www.eknayileague.com/ वेबसाईट शुरू की है जिसमें कपिल ने अपने वीडियो के माध्यम से मैसेज भी दिया है कि उनके ट्विटर हैंडल को फॉलो करें और ज्यादा से ज्यादा नई लीग के बारे में जानकारी पायें, कपिल देव ने ट्विटर पर कप्तान धोनी को बधाई दी है, सानिया मिर्जा, मार्टिना हिंगिस से भी ट्विटर पर मैसेज संप्रेषित किया है और बधाई भी दी है, वैसे ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को भी उनके नेपाल भूकंप में सराहनीय मदद के लिये बधाई दी है।कपिल देव ने वीडियो में कहा भी है कि यह लीग दिल से खेलोगे तो हिट विकेट हो जाओगे, तो वे साफ बता रहे हैं कि यहाँ दिल से नहीं खेलना है, इस लीग में दिमाग से खेलना है, इस लीग में ट्विटर में उनके हैंडल और एक नई लीग के ट्विटर हैंडल #EKNAYILEAGUE @eknayileague का महत्वपूर्ण रोल होगा, शायद इस लीग में ट्विटर के जरिये हम यह लीग खेल पायेंगे, जिसमें कुछ सवालों के जबाब माँगे जायेंगे, और पूरे विश्व को उसमें खेलने की छूट होगी, यह एक तरह की ऑनलाईन लीग होनी चाहिये जिसमें कि लोग अपने रन अपने जबाबों से बना पायेंगे और जो जितने ज्यादा रन बनायेगा वह उस मैच में जीत जायेगा, यह रन उनके सवालों के जबाब पर निर्भर होना चाहिये।

कपिल देव ने कहा है कि क्रिकेटर कभी रिटायरमेंट नहीं लेता है, वह हमेशा खेलता रहता है, इससे भी लगता है कि वे और भी रिटायर्ड क्रिकेटरों को अपने साथ लेंगे और यह एक मजेदार खेल के रूप में पूरे विश्व की जनता के सामने आना चाहिये। हम तो केवल अंदाजा लगा सकते हैं अब तो कपिल देव ही बतायेंगे कि वाकई @eknayileague लीग क्या है, क्योंकि उन्होंने लगभग हर वीडियों में चुटीले अंदाज में कहा है, कि अगर आप दिल से खेलेंगे तो आप निश्चित ही हिट विकेट हो जायेंगे। हम भी इस नई लीग के लिये तैयार हैं और एक नई लीग के वेबसाईट पर जाकर अगर बता दे कि इस लीग में वाकई क्या होगा तो वह एक लाख रूपया जीत सकता है, कल ही कपिल देव से पाँच लोगों के मिलने का मौका मिला है, और साथ ही डिनर का भी, ऐसे मौके अविस्मरणीय होते हैं।

धर्म वैज्ञानिकों की मशीनों से मधुमेह को काबू में किया गया

धर्म वैज्ञानिकों के द्वारा किये जा रहे मधुमेह, कोलोस्ट्रोल, उच्च रक्तचाप की पिछली पोस्ट के बाद मुझसे कई मित्रों और पाठकों ने द्वारका आश्रम का पता और फोन नंबर के बारे में पूछा, मैं आश्रम गया जरूर था पर पता मुझे भी पता नहीं था, आज हमारे पास पता भी आ गया है और फोन नंबर भी उपलब्ध है।

 

उसके पहले एक बात और मैं साझा करना चाहूँगा कि हमारे मित्र मधुमेह के लिये आश्रम नियमित तौर से जा रहे थे और उन्हें काफी आराम भी है, पहले उनकी शुगर 180 के आसपास रहती थी, और कई बार की कोशिश के बाद ज्यादा से ज्यादा 145-148 तक आती थी, साधारणतया शुगर की मात्रा 140 होती है, आज उनकी शुगर 132 आयी तो वे भी बहुत खुश थे, हालांकि अभी दवाई भी जारी है, जहाँ तक मुझे याद है गुरू जी ने बताया था कि धीरे धीरे दवाई की मात्रा कम करते जायेंगे। फेसबुक पर भी एक टिप्पणी थी कि अगर कोई इंसुलिन वाला मरीज ठीक हुआ हो तो उसके बारे में बतायें, तो मैं मेरे मित्र चित्तरंजन जैन से आग्रह करूँगा कि वे इस बारे में पता कर सूचित करें।

 

इसी बाबद मेरे ऑफिस में एक सहकर्मी से स्लिप डिस्क की बात हो रही थी, कि उनकी बहिन को यह समस्या लगभग 2 वर्ष से है और पहले तो वे बिल्कुल भी पलंग से उठ भी नहीं पाती थीं, पर फिर उन्हें किसी से पता चला कि सोहना (हरियाणा में, गुड़गाँव से 40 कि.मी.) में कोई व्यक्ति देशी दवा से इलाज करता है और वो पैर की कोई नस वगैराह भी दबाता है, तो उनकी बहिन को कुछ ही दिन में बहुत आराम मिल गया, वे बता रही थीं कि उनकी बहिन अब घर में अपने सारे काम खुद ही कर लेती हैं, उनके लिये भी हमने पता किया था, तो हमें मित्र द्वारा सूचना दी गई कि स्लिप डिस्क वाली समस्या में भी किसी मरीज को काफी लाभ हुआ है।

 

बात यहाँ मानने या न मानने की तो है ही, क्योंकि जो लोग ईश्वर को नहीं मानते वे इसे वैज्ञानिक पद्धति का इलाज मानकर करवा सकते हैं, और जो ईश्वर को मानते हैं वे इस ईलाज के लिये बनाई गई मशीनों के लिये अपने वेद और पुराणों में वर्णित प्राचीन पद्धति को धन्यावाद दे सकते हैं।

 

द्वारका आश्रम का पता इस प्रकार से है –

 

धर्म विज्ञान शोध ट्रस्ट

“द्वारिका”, नीलगंगा रोड,

लव-कुश कॉलोनी,

नानाखेड़ा,
उज्जैन (म.प्र)

Phone – धर्म वैज्ञानिक उर्मिला नाटानी – 0734 – 42510716

 

Dharma Vigyan Shodh Trust

“Dwarika”, Neelganga Road,

Lav-Kush Colony,

Nanakheda, Ujjain (M.P.)

Phone – Religious Scientist 0734 – 42510716

धर्म वैज्ञानिक जो बिना किसी दवा के मधुमेह, कोलोस्ट्रोल, उच्च रक्तचाप को ठीक कर रहे हैं

धर्म वैज्ञानिक नाम ही कुछ अजीब लगता है न, लगना भी चाहिये हमारे पूर्वज, ऋषि, महर्षियों ने जो भी नियम हमारे लिये बनाये थे, उन सबके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण जरूर होता है, बस उन कारणों को लोगों को नहीं बताया गया, केवल रीत बना दी गई और डर भी बैठा दिया गया कि अगर ऐसा नहीं करोगे तो अच्छा नहीं होगा। जो धर्म पर अध्ययन कर उसके पीछे वैज्ञानिक तथ्यों को ढ़ूँढ़ते हैं, इस बार के उज्जैन प्रवास के समय हमारे मित्र चित्तरंजन जैन ने हमें इस नई संस्था से अवगत करवाया, हम उन्हें बहुत ही अच्छी तरह से जानते हैं, जब तक कि वे खुद किसी चीज से संतुष्ट नहीं होते जब तक वे न तो किसी को कुछ बताते हैं और न ही दिखाते हैं।
इस बार हम शाम के समय उनकी दुकान पर बैठे हुए थे, तो उन्होंने हमसे पूछा कि अगर आप एक घंटा फ्री हों तो हम आपको नई जगह ले चलते हैं, जहाँ मैंने भी पिछले 7 दिन से जाना शुरू किया है, इस जगह आश्रम का नाम है द्वारिका, हम उनके साथ चल दिये, कि चलो हमारे पास एक घंटा है, और हम भी कुछ ज्यादा जानें इस आश्रम के बारे में। जाते जाते हमें हमारे मित्र ने बताया कि आपको तो पता ही है कि हमें मधुमेह की बीमारी है और यहाँ पर मात्र 30 दिन में मधुमेह को हमेशा के लिये खत्म करने की बात कही जाती है, कि उसके बाद कभी भी आपको मधुमेह के लिये दवाई लेनी ही नहीं होगी। उनके ईलाज की पद्धति चार चीजों पर आधारित है, चुँबक, प्रकाश, आकृति और मंत्र। आश्रम में खाने के लिये कोई दवाई नहीं दी जाती है, केवल उपरोक्त चार चीजों पर ही बीमारियों का ईलाज किया जाता है।
हमारे मित्र के साथ हम आश्रम में पहुँचे, वहाँ प्रथम तल पर सामने ही गुरू जी बैठे हुए थे, उनके पास ही हमारे पुराने मित्र मुन्नू कप्तान भी बैठे हुए थे, हमने सबको राम राम की, हमारे मित्र ने हमें कहा कि हम तो ईलाज के लिये जा रहे हैं, आपको भी अगर आजमाना है तो आ जाओ, हमें आजमाना तो नहीं था, परंतु देखना जरूर था, हम उनके साथ कमरे में गये वहाँ तीन पलंग लगे हुए थे, हरेक पलंग की छत पर कुछ आकृतियाँ बनायी हुईं थीं, जैसे कि पिरामिड, त्रिकोण इत्यादि और साथ ही वहाँ विभिन्न तरह के बल्ब लगाकर प्रकाश की व्यवस्था की गई थी, हमारे मित्र ने वहीं पर दीदी जी जो कि वहाँ सेवा देती हैं, उनसे एक थाली ली, जिसमें से कुछ काला सा तिलक अपनी नाभि मे लगाया और 7 तुलसा जी की पत्ती खाईं और फिर चुँबकीय बेल्ट अपनी कमर पर नाभि के ऊपर कस कर लेट गये, उन्हें 15-20 मिनिट अब उसी अवस्था में लेटे रहना था, पूरे आश्रम में मंत्र ध्वनि गुँजायमान थी। तो हम बाहर आकर गुरू जी के पास बैठ गये और उनसे बातचीत कर अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करने लगे।
गुरूजी ने हमें पूरे आश्रम की मशीनों से अवगत करवाया, जिन्हें उन्होंने 31 वर्षों के शोध के बाद खुद ही तैयार किया था, और लगभग सभी मशीनें लकड़ी की ही बनी हुई था, जिसमें छत पर अलग अलग आकृतियाँ थीं, गुरूजी ने हमें मधुमेह, कोलोस्ट्रोल, उच्च रक्तचाप जैसी मशीनों के बारे में जानकारी दी, कि ये सब बीमारी हम केवल एक महीने में ठीक कर देते हैं, एक बार ठीक होने के बाद उन्हें कभी भी जीवनभर किसी दवाई का सेवन भी नहीं करना होगा। किसी को बुखार हो तो हम उसे केवल 15 मिनिट में ठीक कर देते हैं। किसी को तनाव है तो उसके लिये भी उनके लिये अलग मशीन है और उसके लिये भी मात्र 15 मिनिट लगते हैं। दोपहर बाद हमें भी तनाव तो था ही, परंतु वहाँ के माहौल से और मंत्रों से हमारा तनाव 5 मिनिट में ही दूर हो गया। 
हीमोग्लोबीन अगर कम है तो उसके लिये भी एक अलग यंत्र है, जिसके बारे में हमें बताया गया कि उसमें भी रोगी को रोज 15 मिनिट बैठना होता है और आश्चर्यजनक रूप से 2-4 दिन में ही लाभ दिखने लगता है, इसके पीछे गुरूजी ने बताया कि हमारी अस्थिमज्जा को ब्रह्मंडीय ऊर्जा के संपर्क से ठीक करते हैं, और उनकी सारी मशीनें व यंत्र इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं।
ईलाज के लिये कोई फीस नहीं है, बिल्कुल निशुल्क है, आश्रम की यह सुविधा मुख्य रूप से उज्जैन में ही उपलब्ध है, उज्जैन के अलावा उनके आश्रम इंदौर और इलाहाबाद में भी हैं। पिछले सप्ताह ही मित्र से बात हुई तो उन्होंने हमें बताया कि मधुमेह की जाँच में पता चला कि 15 प्रतिशत का फायदा है, और अब मानसिक शांति पहले से ज्यादा है, साकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह ज्यादा है।

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