Category Archives: अनुभव

आधुनिक संचार क्रांति एवं संचार के नए आयाम, इंटरनेट, ई-मेल, डॉट कॉम (वेबसाइट) – निबंध

    प्रगति कि पथ पर मानव बहुत दूर चला आया है। जीवन के हर क्षेत्र में कई ऐसे मुकाम प्राप्त हो गये हैं जो हमें जीवन की सभी सुविधाएँ, सभी आराम प्रदान करते हैं। आज संसार मानव की मुट्ठी में समाया हुआ है। जीवन के क्षेत्रों में सबसे अधिक क्रांतिकारी कदम संचार क्षेत्र में उठाए गये हैं। अनेक नये स्रोत, नए साधन और नई सुविधाएँ प्राप्त कर ली गई हैं जो हमें आधुनिकता के दौर में काफ़ी ऊपर ले जाकर खड़ा करता है। ऐसे ही संचार साधनों में आज एक बड़ा ही सहज नाम है इंटरनेट।
    यूँ तो इसकी शुरुआत १९६९ में एडवान्स्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसीज द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कम्प्यूटरों की नेटवर्किंग करके की गई थी। इसका विकास मुख्य रूप से शिक्षा, शोध एवं सरकरी संस्थाओं के लिये किया गया था। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य था संचार माध्यमों को वैसी आपात स्थिती में भी बनाए रखना जब सारे माध्यम निष्फ़ल हो जाएँ। १९७१ तक इस कम्पनी ने लगभग दो दर्जन कम्प्यूटरों को इस नेट से जोड़ दिया था। १९७२ में शुरूआत हुई ई-मेल अर्थात इलेक्ट्रोनिक मेल की जिसने संचार जगत में क्रांति ला दी।
    इंटरनेट प्रणाली में प्रॉटोकॉल एवं एफ़. टी.पी. (फ़ाईल ट्रांस्फ़र प्रॉटोकॉल) की सहायता से इंटरनेट प्रयोगकर्ता किसी भी कम्प्यूटर से जुड़कर फ़ाइलें डाउनलोड कर सकता है। १९७३ में ट्रांसमीशन कंट्रोल प्रॉटोकॉल जिसे इंटरनेट प्रॉटोकॉल को डिजाइन किया गया। १९८३ तक यह इंटरनेट पर एवं कम्प्यूटर के बीच संचार माध्यम बन गया।
    मोन्ट्रीयल के पीटर ड्यूस ने पहली बार १९८९ में मैक-गिल यूनिवर्सिटी में इंटरनेट इंडेक्स बनाने का प्रयोग किया। इसके साथ ही थिंकिंग मशीन कॉर्पोरेशन के बिड्स्टर क्रहले ने एक दूसरा इंडेक्सिंग सिस्सड वाइड एरिया इन्फ़ोर्मेशन सर्वर विकसित किया। उसी दौरान यूरोपियन लेबोरेटरी फ़ॉर पार्टिकल फ़िजिक्स के बर्नर्स ली ने इंटरनेट पर सूचना के वितरण के लिये एक नई तकनीक विकसित की जिसे वर्ल्ड-वाइड वेब के नाम से जाना गया। यह हाइपर टैक्सट पर आधारित होता है जो किसी इंटरनेट प्रयोगकर्ता को इंटरनेट की विभिन्न साइट्स पर एक डॉक्यूमेन्ट को दूसरे को जोड़ता है। यह काम हाइपर-लिंक के माध्यम से होता है। हाइपर-लिंक विशेष रूप से प्रोग्राम किए गए शब्दों, बटन अथवा ग्राफ़िक्स को कहते हैं।
    धीरे धीरे इंटरनेट के क्षेत्र में कई विकास हुए। १९९४ में नेटस्केप कॉम्यूनिकेशन और १९९५ में माइक्रोसॉफ़्ट के ब्राउजर बाजार में उपलब्ध हो गए जिससे इंटरनेट का प्रयोग काफ़ी आसान हो गया। १९९६ तक इंटरनेट की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई। लगभग ४.५ करोड़ लोगों ने इंटरनेट का प्रयोग करना शुरू कर दिया। इनमें सार्वाधिक संख्या अमेरिका (३ करोड़) की थी, यूरोप से ९० लाख और ६० लाख एशिया एवं प्रशांत क्षेत्रों से था।
    ई-कॉम की अवधारणा काफ़ी तेजी से फ़ैलती गई। संचार माध्य के नए-नए रास्ते खुलते गए। नई-नई शब्दावलियाँ जैसे ई-मेल, वेबसाईट (डॉट कॉम), वायरस आदि इसके अध्यायों में जुड़ते रहे। समय के साथ साथ कई समस्याएँ भी आईं जैसे Y2K वर्ष २००० में आई और उससे सॉफ़्टवेयर्स में कई तरह के बदलाव करने पड़े । कई नये वायरस समय-समय पर दुनिया के लाखों कम्प्यूटरों को प्रभावित करते रहे। इन समस्याओं से जूझते हुए संचार का क्षेत्र आगे बढ़ता रहा। भारत भी अपनी भागीदारी इन उपलब्धियों में जोड़ता रहा है।

सिंहपुरी के पास मित्र से वार्तालाप

दृश्य – हम घर से महाकाल अपनी बाईक पर जा रहे थे, गोपाल मंदिर से निकलते ही सिंहपुरी के पास हमारे एक पुराने मित्र मिल गये जो हमारे साथ एम.ए. संस्कृत में पढ़ते थे, अब पंडे हैं ।

मित्र – और देवता क्या हाल चाल हैं ?

हम – ठीक हैं, आप बताओ कैसे क्या चल रिया है ?

मित्र – बस भिया महाकाल की छाँव में गुजार रिये हैं.

हम – अरे भिया असली जीवन के आनंद तो नी आप लूट रिये हो, अपन तो बस झक मार रिये हैं, इधर उधर दौड़ के, रोटी के चक्कर में निकले थे.. और चक्कर बढ़ता ही जा रिया है।

मित्र – अरे देवता असली मजे तो जिंदगी के आप ले रिये हो, कने कहां कहां घूम रिये हो, बड़ी सिटी में रह रिये हो, और अपने को तो ऐसे दृश्य स्वप्न में भी नी दिखाई दे, ऐसे दृश्यों में रह रिये हो

हम – अरे नहीं भई ! बस देखने में लगता है, कम से कम आप महाकाल की छाँव में तो मजे से रह रिये हो, और महाकाल रोजी रोटी का इंतजाम भी कर ही रिये हैं, आपके लिये, अपना क्या है, यहाँ आके तो बेरोजगार ही हैं, आपके जैसे कोई अपण मंत्र थोड़े ही फ़ूँक सकें हैं।

मित्र – हा हा, अरे देवता सबको दूसरे की थाली में ही घी ज्यादा लगे है, आओ कभी घर पर आओ, इतमिनान से बातें होंगी, अब नये घर में शिफ़्ट हो गये हैं, वहीं पुराने घर के पास है, और पुराना घर ठीक करवा दिया है तो अब यजमान वहीं रुकते हैं, तो यजमानों को परेशानी भी नी होती।

हम – सही है, आपका कार्यक्रम

मित्र – किधर जा रिये हो ?

हम – महाकाल जा रिये हैं, सोचे जितने दिन हैं बाबा के दर्शन रोज कर लें, मन को तृप्त कर लें

मित्र – चलो मैं भी उधर ही जा रिया हँ, वो पंडित गुरू से मिलवा दूँगा तो दर्शन में कोई समस्या नहीं होगी, रोज वीआईपी जैसे आओ और वीआईपी जैसे ही निकल जाओ

हम – मित्र हम वीआईपी नहीं हैं, भगवान के सामने तो सब एक जैसे हैं, ये ऊआईपी और वीआईपी तो अपण लोग माने हैं, जब भगवान के घर जाने का नंबर आये नी तो ये ही वीआईपी लोग लाईन तोड़कर पीछे भागेंगे कि अभी इतनी जल्दी भगवान के घर नी जाना

मित्र – देवता तुम सुधरोगे नी.. देख लो भीड़ ज्यादा है

हम – जय महाकाल !! जैसी बाबा की इच्छा.. फ़िर मुलाकात होगी

और हम बाईक चालू करके फ़िर निकल लिये ।

———————————————————————————

सिंहपुरी – उज्जैन में एक स्थान जहाँ अधिकतर कट्टर ब्राह्मण रहते हैं और धर्म की रक्षा के लिये तन मन धन से समर्पित हैं ।

देवता – संबोधन है, सम्मान के लिये

वर्षा ऋतु – बच्चों के लिये निबंध

    भारत में वर्षा ऋतु एक महत्वपूर्ण ऋतु है। यह ऋतु आषाढ़, श्रावण और भादो मास में मुख्य रूप में विराजमान रहती है। वर्षा ऋतु हमें भीषण गर्मी से राहत दिलाती है। यह मौसम भारतीय किसानों के लिये बहुत हितकारी है।    फ़सलों के लिये पानी मिलता है तथा सूख गये कुएँ तालाब नदियाँ आदि फ़िर से भर जाते हैं। इस मौसम में ग्रामवासियों को सुख भी प्राप्त होता है और दुख भी। गाँवों में बरसात का पानी भर जाता है। अधिक वर्षा से फ़सलें खराब हो जाती हैं। बाढ़ आने से शहर और गाँव दोनों में ही बहुत हानि होती है। मच्छर-मक्खियों का प्रकोप बढ़ जाता है।वर्षा ऋतु
इस मौसम में छोटे-छोटे जीव-जंतु जो गर्मी के मारे जमीन के नीचे छिप जाते हैं, बाहर निकल जाते हैं। मेंढ़क की टर्र-टर्र की आवाज सुनाई पड़ने लगती है। आकाश में प्राय: बादल छाये रहते हैं।

वित्तगुरु वित्तीय जानकारियाँ हिन्दी भाषा में

वर्षा ऋतु का आनंद लेने के लिये लोग पिकनिक मनाते हैं। गाँवों में सावन के झूलों पर युवतियाँ झूलती हैं। वर्षा ऋतु में ही रक्षा बंधन, तीज आदि त्योहार आते हैं। इस ऋतु में अनेक बीमारियाँ भी फ़ैल जाती हैं।

आधुनिक श्रम में पिछड़ते कर्मचारी

    प्रदेश की मुख्य सहकारी बैंक (अपेक्स बैंक) में KYC के कारण जाना हुआ, अब हमारे पिताजी चूँकि बात कर रहे थे, इसलिये हमने आगे रहकर बात करना उचित नहीं समझा। KYC के लिये जब पिताजी बात करके कर्मचारीआये तो उसने साफ़ मना कर दिया और कहा कि अगले महीने आईये, उन्होंने जोर दिया तो उसने मैनेजर के केबिन की ओर इशारा कर दिया । हम चल दिये पिताजी के साथ, उनका भी वही जबाब था, कि अगले महीने आईये अभी KYC नहीं हो पायेगा । अब हम आगे आये और हमने कहा KYC अभी लेने में क्या समस्या है, तो उनका पारा चढ़ गया, फ़िर हम चुप हो गये, क्योंकि पिताजी इस बैंक के बहुत पुराने ग्राहक हैं। फ़िर से हमने कहा अच्छा अभी आप KYC नहीं ले रहे हैं तो कम से कम KYC का फ़ॉर्म तो दे दीजिये, तब जाकर उन्होंने चपरासी को घंटी बजाकर बुलाया और अहसान कर देने वाले अंदाज में कहा कि इन्हें KYC का फ़ॉर्म दे दीजिये । हमारी इच्छा तो हो रही थी कि इन मैनेजर साहब को अच्छे से बैंकिंग के नियम और कानून सिखा दिये जायें, परंतु फ़िर भी चुप रहे.. सोचा हम तो इनको नियम सिखा जायेंगे, फ़िर ये पीछे पिता जी को पता नहीं कौन कौन से नियम बताकर तंग करेंगे।

    वहीं पीछे सारा लिपिक स्टॉफ़ कंप्यूटर से मगजमारी कर रहा था और उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, हरेक लिपिक और अधिकारी के साथ एक जवान लड़का बैठा था जो कि उनके बैकअप जैसा काम कर रहा था, क्षमता प्रदर्शनअधिकारी और क्लर्क तो केवल कुर्सी पर बैठे थे और वे स्टूल पर बैठे लड़के उनका काम कर रहे थे और उनको समझाते जा रहे थे कि हो क्या रहा है। आज की इस तरह की स्थिती देखकर उन पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों की याद आई जो इधर उधर मारे मारे फ़िर रहे हैं, उनमें ये सारे स्किल डेवलप किये जा सकते हैं, परंतु उनको कोई मौका नहीं मिल रहा है क्योंकि इन अधिकारियों और लिपिकों को भी तो नहीं हटाया जा सकता है, संस्थाओं को भी थोड़ा स्ट्रिक्ट बनना होगा, जिससे ऐसे कर्मचारियों के स्किल डेवलप किये जा सकें और उन्हें अच्छी तरह से उपयोग में लिया जा सके । नहीं तो इस तरह के मानवीय श्रम की आवश्यकता वाकई में अब नहीं है, कहने में अच्छा नहीं लगता परंतु बेहतर है कि अगर ये लोग जिस तरह का कार्य करने के लिये रखे गये हैं और नहीं कर पा रहे हैं तो ऐसे लोगों के प्रति संस्था को अच्छे स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम समय समय पर चलाने चाहिये।

    निकालना कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि जो आधारभूत स्किल्स उनके विकासपास हैं वह हम नई पीढ़ी में नहीं मिल सकते, उनसे केवल तकनीकी दक्षता की उम्मीद की जा सकती है, पर जो आधारभूत स्किल्स हैं, वे अनुभव और कठोर परिश्रम से ही प्राप्त किये जा सकते हैं । संस्थाओं को अपने कर्मचारियों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम और भी परिष्कृत करने की आवश्यकता है।

    अब डाकघर की १,५५,००० शाखाएँ कोर बैंकिंग से जुड़ने वाली हैं, यह परियोजना शुरू हो चुकी है, और यह विभिन्न क्षैत्रों में शुरू भी हो चुकी है। अब देखना यह है कि डाकघर स्किल डेवलपमेंट की समस्या से कैसे निपटेगा ।

बैंकों को चूना कौन लगा रहा है.. बड़े बकायेदार या होम लोन और शिक्षा लोन वाले..

    आज एक समाचार देखा निजी बैंक को एक कंपनी ने फ़र्जीवाड़े प्रोजेक्ट में ३३० करोड़ का चूना लगाया, उस कंपनी ने बैंक को एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट दी कि हम बीबीसी के सारे वीडियो २ डी से ३ डी करने वाले हैं तो उसके लिये हमें उपकरण खरीदने हैं । कंपनी वाले बंदे ने एक बीबीसी वाले बंदे से बैंक को मिलवा भी दिया और बैंक इस प्रोजेक्ट के लिये फ़ायनेंस करने को तैयार हो गया। अब बैंक ने पुलिस को रिपोर्ट किया कि फ़लानी कंपनी ने उन्हें ३३० करोड़ का चूना लगा दिया। अब अपने गले तो यह बात उतरी नहीं क्योंकि बैंक जब भी फ़ाईनेंस देता है तो सारी जानकारी कंपनी से संबंधित ले लेता है, और भले ही आदमी कितने फ़र्जी दस्तावेज बना ले पर कहीं न कहीं पकड़ा ही जाता है।

    अगर सरकारी बैंक होता तो शायद यह कह सकते थे कि हाँ  भई इसके समझ में नहीं आया होगा परंतु बैंक के दिये गये टार्गेट पूरे करने के चक्कर में या कहें किसी अधिकारी ने अपनी सक्षमता दिखाने के उद्देश्य से यह सब कर दिया। अब बाद में पुलिस ने जब जाँच की तो पाया कि अरे यह तो एक नजर में देखने पर ही फ़र्जी कार्यक्रम लग रहा है । अब यह समझ में नहीं आता कि यह फ़र्जी बातें बैंक को क्यों समझ में नहीं आयीं। उस समय तो शायद अधिकारी या तो ऊपर से फ़ाइनेंस करने के दबाब में आ गये या फ़िर अपना फ़ायदा भी देख लिया।

    ऐसे ही बड़े बड़े लूट वाले फ़ाइनेंस बहुत हो रहे हैं, अगर आम आदमी फ़ाइनेंस लेने जायेगा तो उसे फ़ाइनेंस लेने में अपने पुरखे याद आ जायेंगे, परंतु ये कंपनी वाले लोग बड़ी आसानी से इनके साथ “सैटिंग” करके सब ले जाते हैं।

    सरकार कहती है कि जिन लोगों ने ऋण नहीं चुकाया है उन पर कार्यवाही होगी, उनके नाम उजागर होंगे, चौराहों पर बोर्ड पर नाम लगवा दिये जायेंगे, मुनादी करवायी जायेगी। ये होते हैं छोटे लोन वाले लगभग १ से १० लाख जिनके ऊपर बकाया है, परंतु जो बड़े बकायेदार हैं उनके ऊपर इस तरह की कार्यवाही करने से हर कोई डरता है, उनको भी तो ऐसे ही बदनाम करना चाहिये, जिससे आम जनता को पता चले कि कितना पैसा कितने बड़े बड़े लोग खाकर बैठे हैं।

    बैंकिग में ऋण बकायेदारी रकम में अगर देखें तो लगभग ९०% ऋण इस तरह के  बड़े बड़े फ़ाइनेंस की हैं और बाकी आम आदमी जो शिक्षा ऋण, गृह ऋण, कार ऋण, निजी ॠण इत्यादि जो बैंक बड़ी मुश्किल से देते हैं, उनका १०% होता है, परंतु बैंक इस १०% के चक्कर में पड़ा रहता है, अगर उतनी ही मेहनत ये ९०% ऋण वालों के साथ की जाये तो वहाँ से बैंक को ज्यादा वसूली हो सकती है।

जन्मदिन के बहाने.. अनुभव की कीमत..

तीन दिन पहले जन्मदिन था, दुख था कि जीवन का एक वर्ष कम हो गया और खुशी इस बात की कि आने वाला कल सुहाना होगा । कुछ लिखने की इच्छा थी परंतु समयाभाव के कारण लिखना मुमकिन नहीं हुआ, फ़ेसबुक पर जन्मदिन की शुभकामनाओं के इतने मैसेज मिले कि दिल प्रसन्न हो गया, इतने लोगों की शुभकामनाओं से दिल खुशियों से लबरेज हो गया।

आज फ़ेसबुक के जमाने में आमने सामने बधाई देने वाले तुलनात्मक रूप से कम होते हैं, परंतु इस बार ऐसा नहीं रहा, यह भी एक बहुत सुखांत क्षण था कि जितने फ़ेसबुक दोस्तों ने जन्मदिन की बधाई दी उससे ज्यादा हमें परोक्ष रूप से दोस्तों की शुभकामनाएँ मिलीं, बाकी फ़ोन और चैटिंग वाले दोस्त भी शुभकामनाएँ देने वालों में रहे ।

मन में सुबह से ही नई उमंग और जीवन के लिये नई तरंग थी, सोचे हुए तरीके से पूरा दिन व्यतीत हुआ, मन में अजब संतोष भी था कि इस वर्ष की जीवन की बाधाओं को अच्छे से महसूस किया और सही तरीके से चुनौतियों का सामना किया ।

अगले वर्ष की जीवन की बाधाओं से लड़ने के लिये पिछले एक वर्ष का अनुभव बहुत काम आयेगा, पकी उम्र का अनुभव पुराने अनुभवों पर भारी पड़ता है, यह अनुभव भी बीते वर्ष हमने महसूस किया, पकी उम्र के अनुभव की कीमत ज्यादा होती है और इस अनुभव को क्रियान्वयन में लाने के लिये कीमत भी ज्यादा चुकाना होती है।

एक बात और सीखी है कि जो अनुभव या उपयोग में आने वाली छोटी छोटी बातें होती हैं वह हर किसी के लिये उतनी ही छोटी नहीं होतीं, वही छोटी बातें किसी और के लिये बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण होती हैं, तो जीवन की सीख है कि हरेक चुनौती को महत्व देना चाहिये, और उसे जितने अच्छे से सुलझा सकें उतना ही अनुभव का रंग गाढ़ा होने लगता है।

महाकाल और ऑनलाईन में होने वाली साईट की अनियमितता

आज सुबह सोचा कि चलो अगले सप्ताह घर पर होंगे तो भस्मारती में शामिल होने के लिये ऑनलाईन दर्शन का टिकट बुक कर लें, साईट पर पहुँचे तो वहाँ जैसे ही वेबपेज पर कर्सर घुमाया, तो यह निम्न चित्र नजर आया । उस पर हमने क्लिक करके देखा तो उस विज्ञापन से हम एक अश्लील वेबसाईट (Prone Website) पर पहुँच गये|

image

मुख्यमंत्री के हाथों १-२ महीने पहले ही इस वेबसाईट का उद्घाटन किया गया था, उसके बाद से पता नहीं यह वेबसाईट काम भी करती है या नहीं ? आज ३० अप्रैल तक की बुक करने की सुविधा उपलब्ध है, परंतु हमने जब ८ अप्रैल के लिये अपनी बुकिंग करवाने की सोची तो पता चला कि बुकिंग “उपलब्ध नहीं है”, फ़िर अगले एक सप्ताह तक का देखा तो पता चला कि अगले सप्ताह में भी बुकिंग उपलब्ध नहीं है, बाद में देखा तो ३० अप्रैल तक बुकिंग उपलब्ध नहीं है ।

बुकिंग के पहले सारी जानकारी भरना पड़ती है, यहाँ तक कि अपना फ़ोटो और आई.डी.कार्ड भी स्कैन करके अपलोड करना पड़ता है, उसके बाद उपलब्धता पता चलती है । यह उपलब्धता पता करने का ऑप्शन पहले होना चाहिये। इस बारे में मुझे माँ वैष्णोदेवी की वेबसाईट बहुत अच्छी लगी, बहुत ही मित्रवत वेबसाईट है ।

काश कि जिम्मेदार अधिकारी इस और ध्यान दें और इस तरह कि विसंगतियों को दूर करें ।

आपने एबीएन अमरो बैंक से लोन लिया था

    आज दोपहर छुट्टी होने पर भी कार्यालय के एक कॉन्फ़्रेंस कॉल पर थे, तभी घर के बीएसएनएल फ़ोन पर घंटी आना शुरू हो गई, हमने अपनी कॉल को म्यूट पर कर के लैंडलाईन उठाया तो सामने से बंदा कहता है कि “मैं चैन्नई से बोल रहा हूँ, मेरा नाम रमेश है” ।

    इसी बीच मैंने उसे कहा एक मिनिट होल्ड करो, और मैं अपनी कॉन्फ़्रेंस कॉल में व्यस्त हुआ, २ मिनिट बाद फ़्री होने के बाद फ़िर चैन्नई वाले बंदे से मुखतिब हुआ, कुछ लोन की बातें करने लगा, तो मैंने उसे टरकाना चाहा कि भई हमें लोन वोन नहीं चाहिये ।

    सामने से बंदा कहता है कि नहीं सर हम लोन नहीं दे रहे हैं, आपने एबीएन अमरो बैंक से लोन लिया था, हमने उसके लिये फ़ोन किया है, हमने तत्काल अपने बेटे को कहा “जरा कागज और पैन देना, इसकी जन्मकुंडली लिख लें” । जब कागज कलम आये तो हमने उससे पूछा कि “हाँ भाई अब आप अपना पूरा नाम बतायें”,

वह बोला “मेरा नाम रमेश ही है”,

मैंने कहा “अपना सरनेम भी बतायें”,

वह बोला “नहीं सर, केवल रमेश ही है”,

मैंने कहा “अच्छा तुमको किसी ने सरनेम नहीं दिया क्या ?”

अब तक वह घबरा चुका था, फ़िर हमने कहा “अच्छा ठीक है रमेश, अब अपना फ़ोन नंबर और पता बताओ” ।

वह बोला “सर आपने एबीएन अमरो बैंक से लोन लिया था, उसी के लिये आपको फ़ोन लगाया है”,

हमने कहा “तभी तो भैया आपका नाम पता ले रहे हैं, क्योंकि हम पहले ही आरबीएस बैंक से बहुत मगजमारी कर चुके हैं और अब तुमने फ़ोन किया है, तो अब बैंक और तुमको दोनों को हम कोर्ट में घसीटेंगे”,

वह बोला “सर एबीएन अमरो बैंक तो बंद हो चुका है, हम तो कोटक महिन्द्रा बैंक से बोल रहे हैं”

हमने कहा “अच्छा, तो हमारा लोन कोटक को बेच दिया गया है ?”

वह बोला “सर हम तो लोन की रिकवरी के लिये फ़ोन लगाये हैं”

हमने कहा “हम आपके ऑफ़िस में आकर लोन के रूपये देंगे, बस आप अपना और अपने ऑफ़िस का पता बता दीजिये”

वह बोला “सर हम आपके घर आ जायेंगे”

हमने कहा “बेटा अगर घर आ गये तो सीधे कृष्णजन्मभूमि पहुँचोगे”

अब वह और घबरा गया था ।

फ़िर हमने कहा “कि कितना लोन लिये हैं हम ?”

वह बोला “सर आपसे कुछ बातें पहले वेरिफ़ाय कर लेते हैं”

हमने कहा “बिल्कुल नहीं, पहले तो आपने फ़ोन लगाकर हमें डिस्टर्ब किया और अब वेरिफ़िकेशन करना है, आपने फ़ोन कैसे लगाया, पहले आपको व्यक्ति का वेरिफ़िकेशन करना चाहिये, उसके बाद फ़ोन लगाना चाहिये, इसका मतलब यह तो नहीं कि दुनिया में जितने भी विवेक रस्तोगी ने लोन लिये हैं, उसका मैं अकेला देनदार हूँ”

वह बोला “सर आप कभी कॉस्को कंपनी में काम किये हैं”

हमने कहा “बिल्कुल नहीं”

वह बोला “सर आप छ: साल पहले इस कंपनी में बैंगलोर में थे ?”

हमने कहा “भई, हम तो पहले मुँबई में थे”

वह बोला “सॉरी सर, गलती हो गई” और फ़ोन रख दिया ।

    अब हम इस मामले को अभी यहीं रफ़ा दफ़ा कर रहे हैं, और अगर अगली बार फ़िर ऐसा कोई फ़ोन आया तो उसको पता नहीं कहाँ कहाँ लेकर जायेंगे, वह सोच भी नहीं पायेगा ।

“राष्ट्र हित में आप भी जुड़िये इस मुहिम से …”

सन 1945 मे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तथाकथित हवाई दुर्घटना या उनके जापानी सरकार के सहयोग से 1945 के बाद सोवियत रूस मे शरण लेने या बाद मे भारत मे उनके होने के बारे मे हमेशा ही सरकार की ओर से गोलमोल जवाब दिया गया है उन से जुड़ी हुई हर जानकारी को “राष्ट्र हित” का हवाला देते हुये हमेशा ही दबाया गया है … ‘मिशन नेताजी’ और इस से जुड़े हुये मशहूर पत्रकार श्री अनुज धर ने काफी बार सरकार से अनुरोध किया है कि तथ्यो को सार्वजनिक किया जाये ताकि भारत की जनता भी अपने महान नेता के बारे मे जान सके पर हर बार उन को निराशा ही हाथ आई !

मेरा आप से एक अनुरोध है कि इस मुहिम का हिस्सा जरूर बनें … भारत के नागरिक के रूप मे अपने देश के इतिहास को जानने का हक़ आपका भी है … जानिए कैसे और क्यूँ एक महान नेता को चुपचाप गुमनामी के अंधेरे मे चला जाना पड़ा… जानिए कौन कौन था इस साजिश के पीछे … ऐसे कौन से कारण थे जो इतनी बड़ी साजिश रची गई न केवल नेता जी के खिलाफ बल्कि भारत की जनता के भी खिलाफ … ऐसे कौन कौन से “राष्ट्र हित” है जिन के कारण हम अपने नेता जी के बारे मे सच नहीं जान पाये आज तक … जब कि सरकार को सत्य मालूम है … क्यूँ तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जाता … जानिए आखिर क्या है सत्य …. अब जब अदालत ने भी एक समय सीमा देते हुये यह आदेश दिया है कि एक कमेटी द्वारा जल्द से जल्द इस की जांच करवा रिपोर्ट दी जाये तो अब देर किस लिए हो रही है ???
आप सब मित्रो से अनुरोध है कि यहाँ नीचे दिये गए लिंक पर जाएँ और इस मुहिम का हिस्सा बने और अपने मित्रो से भी अनुरोध करें कि वो भी इस जन चेतना का हिस्सा बने !
Set up a multi-disciplinary inquiry to crack Bhagwanji/Netaji mystery

यहाँ ऊपर दिये गए लिंक मे उल्लेख किए गए पेटीशन का हिन्दी अनुवाद दिया जा रहा है :-

सेवा में,
अखिलेश यादव,

माननीय मुख्यमंत्री

उत्तर प्रदेश सरकार

लखनऊ

प्रिय अखिलेश यादव जी,

इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, आप भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री इस स्थिति में हैं कि देश के सबसे पुराने और सबसे लंबे समय तक चल रहे राजनीतिक विवाद को व्यवस्थित करने की पहल कर सकें| इसलिए देश के युवा अब बहुत आशा से आपकी तरफ देखते हैं कि आप माननीय उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के हाल ही के निर्देश के दृश्य में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाग्य की इस बड़ी पहेली को सुलझाने में आगे बढ़ेंगे|

जबकि आज हर भारतीय ने नेताजी के आसपास के विवाद के बारे में सुना है, बहुत कम लोग जानते हैं कि तीन सबसे मौजूदा सिद्धांतों के संभावित हल वास्तव में उत्तर प्रदेश में केंद्रित है| संक्षेप में, नेताजी के साथ जो भी हुआ उसे समझाने के लिए हमारे सामने आज केवल तीन विकल्प हैं: या तो ताइवान में उनकी मृत्यु हो गई, या रूस या फिर फैजाबाद में | 1985 में जब एक रहस्यमय, अनदेखे संत “भगवनजी” के निधन की सूचना मिली, तब उनकी पहचान के बारे में विवाद फैजाबाद में उभर आया था, और जल्द ही पूरे देश भर की सुर्खियों में प्रमुख्यता से बन गया| यह कहा गया कि यह संत वास्तव में सुभाष चंद्र बोस थे। बाद में, जब स्थानीय पत्रकारिता ने जांच कर इस कोण को सही ठहराया, तब नेताजी की भतीजी ललिता बोस ने एक उचित जांच के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उस संत के सामान को सुरक्षित रखने का अंतरिम आदेश दिया।

भगवनजी, जो अब गुमनामी बाबा के नाम से बेहतर जाने जाते है, एक पूर्ण वैरागी थे, जो नीमसार, अयोध्या, बस्ती और फैजाबाद में किराए के आवास पर रहते थे। वह दिन के उजाले में कभी एक कदम भी बाहर नहीं रखते थे,और अंदर भी अपने चयनित अनुयायियों के छोड़कर किसी को भी अपना चेहरा नहीं दिखाते थे। प्रारंभिक वर्षों में अधिक बोलते नहीं थे परन्तु उनकी गहरी आवाज और फर्राटेदार अंग्रेजी, बांग्ला और हिंदुस्तानी ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिससे वह बचना चाहते थे। जिन लोगों ने उन्हें देखा उनका कहना है कि भगवनजी बुजुर्ग नेताजी की तरह लगते थे। वह अपने जर्मनी, जापान, लंदन में और यहां तक कि साइबेरियाई कैंप में अपने बिताए समय की बात करते थे जहां वे एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की एक मनगढ़ंत कहानी “के बाद पहुँचे थे”। भगवनजी से मिलने वाले नियमित आगंतुकों में पूर्व क्रांतिकारी, प्रमुख नेता और आईएनए गुप्त सेवा कर्मी भी शामिल थे।

2005 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थापित जस्टिस एम.के. मुखर्जी आयोग की जांच की रिपोर्ट में पता चला कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 1945 में ताइवान में नहीं हुई थी। सूचनाओं के मुताबिक वास्तव में उनके लापता होने के समय में वे सोवियत रूस की ओर बढ़ रहे थे।

31 जनवरी, 2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ललिता बोस और उस घर के मालिक जहां भगवनजी फैजाबाद में रुके थे, की संयुक्त याचिका के बाद अपनी सरकार को भगवनजी की पहचान के लिए एक पैनल की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देशन दिया।

जैसा कि यह पूरा मुद्दा राजनैतिक है और राज्य की गोपनीयता के दायरे में है, हम नहीं जानते कि गोपनीयता के प्रति जागरूक अधिकारियों द्वारा अदालत के फैसले के जवाब में कार्यवाही करने के लिए किस तरह आपको सूचित किया जाएगा। इस मामले में आपके समक्ष निर्णय किये जाने के लिए निम्नलिखित मोर्चों पर सवाल उठाया जा सकता है:

1. फैजाबाद डीएम कार्यालय में उपलब्ध 1985 पुलिस जांच रिपोर्ट के अनुसार भगवनजी नेताजी प्रतीत नहीं होते।

2. मुखर्जी आयोग की खोज के मुताबिक भगवनजी नेताजी नहीं थे।

3. भगवनजी के दातों का डीएनए नेताजी के परिवार के सदस्यों से प्राप्त डीएनए के साथ मेल नहीं खाता।

वास्तव मे, फैजाबाद एसएसपी पुलिस ने जांच में यह निष्कर्ष निकाला था, कि “जांच के बाद यह नहीं पता चला कि मृतक व्यक्ति कौन थे” जिसका सीधा अर्थ निकलता है कि पुलिस को भगवनजी की पहचान के बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला।

हम इस तथ्य पर भी आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग की जांच की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकला है कि “किसी भी ठोस सबूत के अभाव में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भगवनजी नेताजी थे”। दूसरे शब्दों में, आयोग ने स्वीकार किया कि नेताजी को भगवनजी से जोड़ने के सबूत थे, लेकिन ठोस नहीं थे।

आयोग को ठोस सबूत न मिलने का कारण यह है कि फैजाबाद से पाए गए भगवनजी के तथाकथित सात दातों का डी एन ए, नेताजी के परिवार के सदस्यों द्वारा उपलब्ध कराए गए रक्त के नमूनों के साथ मैच नहीं करता था। यह परिक्षण केन्द्रीय सरकार प्रयोगशालाओं में किए गए और आयोग की रिपोर्ट में केन्द्र सरकार के बारे मे अच्छा नहीं लिखा गया। बल्कि, यह माना जाता है कि इस मामले में एक फोरेंसिक धोखाधडी हुई थी।

महोदय, आपको एक उदाहरण देना चाहेंगे कि बंगाली अखबार “आनंदबाजार पत्रिका” ने दिसंबर 2003 में एक रिपोर्ट प्रकाशित कि कि भगवनजी ग्रहण दांत पर डीएनए परीक्षण नकारात्मक था। बाद में, “आनंदबाजार पत्रिका”, जो शुरू से ताइवान एयर क्रेश थिओरी का पक्षधर रहा है, ने भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष स्वीकार किया कि यह खबर एक “स्कूप” के आधार पर की गयी थी। लेकिन समस्या यह है कि दिसंबर 2003 में डीएनए परीक्षण भी ठीक से शुरू नहीं किया गया था। अन्य कारकों को ध्यान में ले कर यह एक आसानी से परिणाम निकलता है कि यह “स्कूप” पूर्वनिर्धारित था।

जाहिर है, भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश, एम.के. मुखर्जी ऐसी चालों के बारे में जानते थे और यही कारण है कि 2010 में सरकार के विशेषज्ञों द्वारा आयोजित डी एन ए और लिखावट के परिक्षण के निष्कर्षों की अनदेखी करके,उन्होंने एक बयान दिया था कि उन्हें “शत प्रतिशत यकीन है” कि भगवनजी वास्तव में नेताजी थे।यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि सर्वोच्च हस्तलेख विशेषज्ञ श्री बी लाल कपूर ने साबित किया था कि भगवनजी की अंग्रेजी और बंगला लिखावट नेताजी की लिखावट से मेल खाती है।

भगवनजी कहा करते थे की कुछ साल एक साइबेरियाई केंप में बिताने के बाद 1949 में उन्होंने सोवियत रूस छोड़ दिया और उसके बाद गुप्त ऑपरेशनो में लगी हुई विश्व शक्तियों का मुकाबला करने में लगे रहे। उन्हें डर था कि यदि वह खुले में आयेंगे तो विश्व शक्तियां उनके पीछे पड़ जायेंगीं और भारतीय लोगो पर इसके दुष्प्रभाव पड़ेंगे। उन्होंने कहा था कि “मेरा बाहर आना भारत के हित में नहीं है”। उनकी धारणा थी कि भारतीय नेतृत्व के सहापराध के साथ उन्हें युद्ध अपराधी घोषित किया गया था और मित्र शक्तियां उन्हें उनकी 1949 की गतिविधियों के कारण अपना सबसे बड़ा शत्रु समझती थी।

भगवनजी ने यह भी दावा किया था कि जिस दिन 1947 में सत्ता के हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाएगा, उस दिन भारतीय जान जायेंगे कि उन्हें गुमनाम/छिपने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा।

खासा दिलचस्प है कि , दिसम्बर 2012 में विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय, लंदन, ने हम में से एक को बताया कि वह सत्ता हस्तांतरण के विषय में एक फ़ाइल रोके हुए है जो “धारा 27 (1) (क) सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (अंतरराष्ट्रीय संबंधों) के तहत संवेदनशील बनी हुई है और इसका प्रकाशन संबंधित देशों के साथ हमारे संबंधों में समझौता कर सकता है” ।

महोदय, इस सारे विवरण का उद्देश्य सिर्फ इस मामले की संवेदनशीलता को आपके प्रकाश में लाना है। यह बात वैसी नहीं है जैसी कि पहली नजर में लगती है। इस याचिका के हस्ताक्षरकर्ता चाहते है कि सच्चाई को बाहर आना चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि भगवनजी कौन थे। वह नेताजी थे या कोई “ठग” जैसा कि कुछ लोगों ने आरोप लगाया है? क्या वह वास्तव में 1955 में भारत आने से पहले रूस और चीन में थे, या नेताजी को रूस में ही मार दिया गया था जैसा कि बहुत लोगों का कहना है।

माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति वीरेन्द्र कुमार दीक्षित, भगवनजी के तथ्यों के विषय में एक पूरी तरह से जांच के सुझाव से काफी प्रभावित है। इसलिए हमारा आपसे अनुरोध है कि आप अपने प्रशासन को अदालत के निर्णय का पालन करने हेतू आदेश दें। आपकी सरकार उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञों और उच्च अधिकारियों की एक टीम को मिलाकर एक समिति की नियुक्ति करे जो गुमनामी बाबा उर्फ भगवनजी की पहचान के सम्बन्ध में जांच करे।

यह भी अनुरोध है कि आपकी सरकार द्वारा संस्थापित जांच –

1. बहु – अनुशासनात्मक होनी चाहिए, जिससे इसे देश के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति को शपथ लेकर सूचना देने को वाध्य करने का अधिकार हो । और यह और किसी भी राज्य या केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से सरकारी रिकॉर्ड की मांग कर सके।

2. सेवानिवृत्त पुलिस, आईबी, रॉ और राज्य खुफिया अधिकारी इसके सदस्य हो। सभी सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों, विशेष रूप से उन लोगों को, जो खुफिया विभाग से सम्बंधित है,उत्तर प्रदेश सरकार को गोपनीयता की शपथ से छूट दे ताकि वे स्वतंत्र रूप से सर्वोच्च राष्ट्रीय हितों के लिए अपदस्थ हो सकें।

3. इसके सदस्यों में नागरिक समाज के प्रतिनिधि और प्रख्यात पत्रकार हो ताकि पारदर्शिता और निष्पक्षता को सुनिश्चित किया जा सके। ये जांच 6 महीने में खत्म की जानी चाहिए।

4. केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा आयोजित नेताजी और भगवनजी के बारे में सभी गुप्त रिकॉर्ड मंगवाए जाने पर विचार करें। खुफिया एजेंसियों के रिकॉर्ड को भी शामिल करना चाहिए। उत्तर प्रदेश कार्यालयों में खुफिया ब्यूरो के पूर्ण रिकॉर्ड मंगावाये जाने चाहिए और किसी भी परिस्थिति में आईबी स्थानीय कार्यालयों को कागज का एक भी टुकड़ा नष्ट करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

5.सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भगवनजी की लिखावट और अन्य फोरेंसिक सामग्री को किसी प्रतिष्ठित अमेरिकन या ब्रिटिश प्रयोगशाला में भेजा जाये.

हमें पूरी उम्मीद है कि आप, मुख्यमंत्री और युवा नेता के तौर पर दुनिया भर में हम नेताजी के प्रसंशकों की इस इच्छा को अवश्य पूरा करेंगे |

सादर

आपका भवदीय

अनुज धर

लेखक “India’s biggest cover-up”

चन्द्रचूर घोष

प्रमुख – www.subhaschandrabose.org और नेताजी के ऊपर आने वाली एक पुस्तक के लेखक

ट्रेड यूनियन पर एक संवाद फ़ेसबुक से


Vivek Rastogi

Yesterday at 8:03am ·

  • ये हड़ताल अपने समझ में नहीं आती, ये सब लोग ज्यादा काम करके ज्यादा कमाई करवायें संस्थानों की फ़िर बोलें अब हमारा वेतन बढ़ाओ भत्ते बढ़ाओ

    Like · · Unfollow Post · Share · Promote

    • Arpit Singh Pandya, Dhyanshree Shailesh Vyas and 2 others like this.

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी संस्‍थान कभी लाभ में नहीं आते… क्‍या आप कॉर्पोरेट को नहीं जानते…

      Yesterday at 8:28am · Unlike · 2

       

    • Vivek Rastogi संस्थान लाभ में आते हैं, पर इसके लिये पहले कर्मचारी को सोचना चाहिये, वैसे हमें लगता नहीं कि कार्पोरेट में ट्रेड यूनियन भी चलती हैं, और अगर चलती हैं तो वे सही तरह से काम नहीं करतीं, जो ट्रेड यूनियन के नेता लोग होते हैं वो तो होते ही अकर्मण्य हैं और दूसरों को भी वैसा ही करने की कोशिश करते हैं

      Yesterday at 8:32am · Like · 1

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी कोई लाभकारी संस्‍थान बता पाएंगे, जो अपने कर्मचारियों, श्रमिकों को पूरा लाभ देता है…

      23 hours ago · Unlike · 1

       

    • Vivek Rastogi हमने तो ऐसे बहुत सारे संस्थान देखे हैं

      23 hours ago · Like

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी चलिए कोई एक बता दीजिए, फिर शायद मेरे भी विचार बदल जाएं…

      23 hours ago · Unlike · 1

       

    • Vivek Rastogi क्योंकि हमने तो इसमें से एक में काम भी किया है, नाम बताना ठीक नहीं होगा

      23 hours ago · Like

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी निश्‍चय की आपकी कंपनी ने मुनाफा लेकर उसे सभी कार्मिकों में बराबर बांट दिया होगा और मालिक आज भी अपने कार्मिकों के स्‍तर का ही जीवन यापन कर रहा होगा। आप लकी हैं… जो आपको ऐसा संस्‍थान मिला।

      23 hours ago · Unlike · 1

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी अब यह मत कहिएगा कि जिसकी जितनी योग्‍यता थी, उसे उतना दिया गया। योग्‍यता का पैमाना बनाने का अधिकार कुछ लोग अपने पास सुरक्षित रखते हैं, ताकि उस लाठी से बड़े वर्ग को हांका जा सके…

      23 hours ago · Unlike · 1

       

    • Vivek Rastogi वेतन कभी भी बराबर नहीं बाँटा जा सकता है, वेतनवृद्धी भी कर्मचारी के काम करने के ऊपर निर्भर करती है, परंतु बाजार से अधिक वेतन और सुविधाएँ देना ही मुनाफ़ा बाँटना कहलाता है, योग्यता के अनुसार ही वेतन होता है, क्योंकि कोई व्यक्ति एक काम जो ७ दिन में कर सकता …See More

      23 hours ago · Like

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी हूंम्। एक व्‍यक्ति एक संस्‍थान में काम करता है और तीस हजार रुपए महीने तनख्‍वाह पाता है। फिर वह संस्‍थान को छोड़ देता है और उसी संस्‍थान को ठेके पर काम करके देता है और तीन लाख रुपए महीने के कमाता है। पहले कर्मचारी था फिर व्‍यवसायी हो गया। योग्‍यता में अंतर कहां आया?

      23 hours ago · Like

       

    • Vivek Rastogi यही तो योग्यता में अंतर है, कि कंपनी उसकी योग्यता नहीं समझ पायी या कंपनी समझ भी पाई मगर कंपनी के पास उसके लिये उस स्तर की जगह नहीं होगी, क्योंकि हर स्तर पर निर्धारित संख्या होती है, योग्यता के आधार पर संख्या कम या ज्यादा नहीं की जा सकती क्योंकि इससे उत्पादकता पर अंतर पड़ता है और उस व्यक्ति ने रिस्क लेकर अपना खुद का काम शुरू कर दिया तो वह अपनी योग्यता का भरपूर इस्तेमाल कर सकता है ।

      23 hours ago · Like · 1

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी जब कंपनी योग्‍यता को समझ नहीं पाती तो मुनाफा कैसे कमाती है >

      23 hours ago · Like

       

    • Vivek Rastogi मुनाफ़ा अगर नहीं होगा तो यह मानकर चलिये कि कोई भी धरम करने नहीं बैठा है, कंपनीं अगले दिन ही बंद हो जायेगी, कंपनी सब समझती है, अगर कर्मचारी को लगता है कि उसकी योग्यता की पूछ यहाँ नहीं है तो दूसरी कंपनी में अपनी योग्यता अनुसार पद के लिये देखे उस कंपनी से निकल ले और अपनी योग्यता का भरपूर दोहन करे, इसमें सबका लाभ है, नये लोगों को मौका भी अच्छा मिलता है और व्यक्ति को अपनी योग्यता को समझने का भी।

      23 hours ago · Like · 1

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी यही कैपिटलिज्‍म है.. इसी का विरोध हो रहा है। यह विरोध विचारधाराओं का है…

      23 hours ago · Like

       

    • Vivek Rastogi हमें तो इसमें कुछ गलत नहीं लगता है, बात सही है कि विरोध विचारधाराओं का है पर कम परिश्रम और अधिक परिश्रम का पारिश्रमिक अलग अलग तो होना ही चाहिये। अगर दो मजदूर एक चौराहे पर खड़े हैं और आपको कोई काम करवाना है जो १ दिन का है, परंतु पहला मजदूर १ दिन में ठीकठाक परिश्रम करके कार्य पूर्ण कर देगा और दूसरा थोड़ा ढ़ीला है और आराम से कार्य करते हुए २ दिन में पूरा करेगा, तो आप किसको कार्य करने का काम देंगे। बिल्कुल योग्यता वाले को ही देंगे, आप उसी काम का दोगुना मेहनताना क्यों देना चाहेंगे जब वही काम दूसरा व्यक्ति एक दिन में कर रहा है, तो बाजार में रहना है तो पूरी मेहनत और परिश्रम के साथ अच्छे से कार्य पूर्ण करना भी व्यक्ति की जिम्मेदारी है, और अगर इसका विरोध हो रहा है तो मैं तो कहूँगा कि बेहतर है कि सभी को बाहर का रास्ता दिखा दें और नये सिरे से कर्मियों को लेकर काम शुरू किया जाये।

      23 hours ago · Like

       

    • सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी श्रमिक और मजदूर की योग्‍यता के पैमाने अलग अलग हैं। मालिक ने कितना रिस्‍क लिया, यह उसकी योग्‍यता है, श्रमिक ने कितना काम किया, यह श्रमिक की योग्‍यता है। रिस्‍क लेने पर मालिक केवल दिवालिया तक होता है, जबकि श्रमिक की काम के दौरान दुर्घटना से मृत्‍यु तक हो सकती है…
      आप पूर्व निर्धारित पैमानों पर दोनों को कस रहे हैं। दोनों के लिए एक पैमाना बनाने के साथ ही आपकी दृष्टि बदल सकती है…

      22 hours ago · Like

       

    • Arpit Singh Pandya Nice discussion……..good to know few things….

      19 hours ago via mobile · Unlike · 1

       

    • Vivek Rastogi मालिक रिस्क लेता है तभी तो वह मालिक है, अगर श्रमिक रिस्क लेता तो वह मालिक ना होता, क्योंकि इतने सारे संसाधनों को इकट्ठा करके चलाना मालिक के बस का काम है और श्रमिक तो केवल मालिक के आदेशों का पालन करता है। सबकी रिस्क के अलग अलग मायने होते हैं, यह तो श्रमिक की पसंद है कि वह काम के दौरान ऐसे काम करना पसंद करता है या नहीं कि जिसमें दुर्घटना का अंदेशा है, तो यह उसकी मजबूरी है कि वह उस कार्य के अलावा और कोई कार्य नहीं कर सकता और अगर श्रमिक को पहले से यह सब पता है तो इसमें मालिक ने उसका उपयोग नहीं किया वरन उसे बराबर पारिश्रमिक देकर उसके परिश्रम को खरीदा है।

      18 hours ago · Like · 1