Category Archives: अनुभव

मद कौन सा अच्छा भौतिक या श्रीमद…

    मद बहुत अच्छी चीज है, परंतु वह मद कैसा है इस पर निर्भर करता है कि उस मद में चूर होकर व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है। व्यक्ति मद में आकर ही अपना व्यवहार बदलता है।

    भौतिक मद से व्यक्ति की बुद्धि मदमस्त हो जाती है और वह अन्य व्यक्तियों को नुक्सान पहुँचाने लगता है और खुद को भी नुक्सान पहुँचाता है।

    एक है श्रीमद, श्री याने कि राधारानी और मद नशा तो जो कृष्ण जी और राधारानी के मद में डूब गया वह दुनिया को हृदय से देता है क्योंकि वह हृदय से श्रीमद में है।

    कहने के लिये तो बहुत कुछ कहा जा सकता है, परंतु सबकी अपनी अपनी परिभाषाएँ हैं, और मद के बारे में भी ऐसा ही है, जो भौतिक मद में डूबा वह कभी उबर नहीं पाता और न ही खुद निकल पाता है और न ही दूसरों को निकाल पाता है। जो श्रीमद में डुबा वह खुद तो इस भवसागर से तर ही जाता है और दूसरों को भी तार देता है।

तो कोशिश करें कि श्रीमद में डूबे रहें, योगेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबे रहें।

   कहा गया है कि श्रीरामचंद्र जी का जीवन अनुकरणीय है परंतु श्रीकृष्ण जी का जीवन चिंतनीय है ।

जय श्री कृष्ण !

नींद के आलस में “ऐ लेडी, हैप्पी वूमन्स डे”…

    नींद से उठने के बाद, आँख मूँदे बिस्तर पर ही पड़ा हुआ था, बाहर कमरे से जोर जोर से आवाजें आ रही थीं, कुछ अंग्रेजी की स्पेलिंग याद करवाती हुई मम्मी बेटे को। सुनाई तो स्पष्ट दे सकता था, परंतु सुनने की वाकई इच्छा नहीं थी, इसलिये बिना रूई की फ़ाह डाले भी काम हो रहा था। बात कितनी सही है कि अगर किसी काम को करने की इच्छा नहीं हो तो उसके लिये कुछ करना नहीं पड़ता कितना आलस्य छिपा है इन बातों में.. यहीं सोच रहा था कि तकिये के पास रखे मोबाईल से गाना बजने लगा.. जो कि दरअसल मोबाईल की ट्यून है.. स्लमडॉग मिलिनियर की “जय हो”, और देखा तो अपने लंगोटिया यार का दोस्त था, सोचा था कि किसी का भी फ़ोन होगा उठाऊँगा नहीं, भरपूर आलसभाव में था, परंतु सामने स्क्रीन पर विनोद का नाम देखकर बात करने से रोक न सका।

    फ़ोन उठाते ही उधर से आवाज आई “अच्छा तू है क्या ?, अरे तेरा ये नया नंबर है क्या, नंबर बदल लिया ?” इधर से मैंने कहा “अबे ! जब नया नंबर लिया था तब सबको एस.एम.एस. किया तो था” उधर से वह बोला “आया भी होगा तो पता नहीं, मैंने ही ध्यान नहीं दिया होगा, चल और बता क्या चल रहा है, सो रहा था क्या ?” इधर से मैंने कहा “हाँ यार, सो रहा था, बस अब उठने की तैयारी है और अब ऑफ़िस जाना है ?” उधर से उसने कहा “क्यों ? क्या आजकल रात्रि पाली में है क्या ?” इधर से मैंने कहा “हाँ यार” और भी बहुत सारी बातें हुईं, आलस तो अब भी आवाज में था, परंतु अपना पुराना दोस्त था फ़ोन पर तो सब आलस फ़ुर कर दिया।

    बात करते करते बालकनी में घूम रहा था, तो बेटेजी जोर जोर से स्पेलिंग याद कर रहे थे, और हम उनको उनकी भावी सफ़लताओं के लिये देख रहे थे। कि इतने में हमें कमरे में आते देख बेटे जी पलट पड़े अब मेरा मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है, मैं पता नहीं किन ख्यालों में ऐसे ही मुस्करा पड़ा। तो वैसे ही एक आवाज कान में आई “मैं तुम दोनों को बेबकूफ़ नजर आती हूँ, क्या ?”, यह थी बेटे की मम्मी जी की आवाज।

    “पढ़ लो बेटा नहीं तो तुम ही नुक्सान में रहोगे हमारा कोई नुक्सान नहीं होने वाला”, अब जरा सी औलाद को कहाँ फ़ायदे और नुक्सान का गणित समझ में आने वाला था, मैंने पूछा बेटे से कि क्या हुआ तो बोला “आई डोन्न नो !”

    अभी यही सोच रहा हूँ कि पढ़ाई न करने से क्या क्या नुक्सान होते हैं ? क्या पढ़ाई करने से ही जिंदगी अच्छे से कटती है? पैसे कमाये जा सकते हैं ? क्या जिंदगी का ध्येय केवल पैसे कमाना और फ़ायदे, नुक्सान का गणित है ? क्या हमारा मकसद आज के नौजवानों को पढ़ा लिखा कर नौकर बनाने का है? मेरा तो नहीं है, मैं चाहता हूँ कि उसे कम इतना पता होना चाहिये कि पैसे कैसे कमाये जाते हैं, क्योंकि दुनिया में यही एक ऐसा काम है जो कि सबसे सरल भी है और सबसे कठिन भी है।

इतने में बेटे जी मम्मी के पास गये  और बोले “ऐ लेडी, हैप्पी वूमन्स डे” ।

टिप बख्शीश का गणित.. (What about Tip..)

    अभी हाल ही में फ़िल्म “शहंशाह” देखी, जिसमें जे.के. याने के अमरीश पुरी और प्रेम चोपड़ा का एक सीन जहन में अटक गया, दोनों एक होटल में जाते हैं, और शक्ल से ही अमीर लगते tips हैं, जैसे ही रेस्टारेंट में प्रवेश करते हैं, एक वेटर आकर अभिवादन करता है और अमरीश पुरी अपनी जेब से बटुआ निकालकर एक सौ रुपये का नोट उसे वेटर को टिप देते हैं। प्रेम चोपड़ा बहुत ही अजीब तरीके से और आश्चर्यचकित तरीके से अमरीशपुरी को देखते हैं। जब  वे अपनी टेबल पर आते हैं, तो प्रेम चोपड़ा पूछ ही लेते हैं –

    “लोग बिल के बाद टिप देते हैं, और तुम हो कि पहले से ही टिप दिये जा रहे हो !, क्या अजीब आदमी हो, क्यों ?”

अमरीश पुरी जबाब देते हैं –

“बिल के बाद टिप देना तो रिवाज है, हम टिप पहले देते हैं जो कि  अच्छी सर्विस की गारंटी  है।”

    बात तो छोटी सी है पर अमरीश पुरी की बातों में दम लगा, वाकई बिल के बाद टिप देना रिवाज है, सर्विस अच्छी मिले या नहीं परंतु आप टिप दे ही देते हैं। पर अगर जिस जगह पर आप जा रहे हैं और वहाँ आप अक्सर जाते रहते हैं तो शायद पहले टिप देने से अच्छी सर्विस मिल सकती है।

    अब आते हैं अपनी बात पर तो पहले तो हम टिप देने में यकीन ही नहीं रखते, क्योंकि रेस्टोरेंट में खाना ही इतना महँगा होता है कि ऐसा लगता है कि होटल के मालिक के टिप भी इसमें ही जुड़ी रहती है, खैर फ़िर धीरे धीरे कुछ टिप देने का रिवाज समझ में आने लगा और कुछ रुपये टिप देने लगे। टिप को लेकर मुंबई में कई खट्टे मीठे अनुभव हुए, फ़िर धीरे धीरे यह सीख लिया कि अगर खाना अच्छा हो तो ही टिप दो, और सर्विस भी, क्योंकि खाना अच्छा होना न होना तो बनाने वाले शेरिफ़ पर निर्भर करता है, परंतु अगर आप शिकायत करते हैं या कुछ अन्य चीज आप मंगवाते हैं तो उसे कितनी प्राथमिकता के साथ पूरा किया जाता है।

    ऐसी बहुत सारी वस्तुस्थितियाँ होती हैं जो कि यह सुनिश्चित करती हैं कि आप कितनी टिप देते हैं, और वह भी अच्छे मन से या खराब मन से।

    हमने मुंबई में सुना है कि कुछ जगहों पर टिप भी बिल में लगाकर दे दिया जाता है, खैर आजतक तो हमें ऐसा कोई होटल नहीं मिला या यूँ कह सकते हैं कि हम इस तरह के होटल में गये नहीं ! 🙂

    टिप न मिलने पर वेटर की मुखमुद्रा बता देती है कि वह खुश है या नहीं, और तो और जब आप खाना खा रहे होते हैं, तभी वेटर समझ जाता है कि टिप मिलने वाली है या नहीं।

    कुछ वेटर ऐसे भी होते हैं, जब देखते हैं कि कोई टिप नहीं मिल रही है और बिल अदा करके निकले जा रहे हैं, तो भुनभुनाते हैं, या फ़िर इतनी आवाज में बोलते हैं कि कम से कम आपको तो सुनाई ही दे जाये, “क्या कंगले हैं, टिप के पैसे भी जेब से नहीं निकलते हैं”, और कुछ होते हैं जो सीधे पूछ लेते हैं कि “आपने टिप नहीं दी।”

    हमारे एक मित्र हैं उनकी फ़िलोसॉफ़ी है कि बिल का १०% टिप देना चाहिये, हमने कहा कि भई अपने बस की बात नहीं कि १०% टिप अपन अफ़ोर्ड कर पायें, जितनी अपनी जेब इजाजत देती है, अपन तो उतनी ही टिप पूर्ण श्रद्धा भक्ति से दे देते हैं।

कैसे हैं आपके अनुभव टिप के बारे में…

बेचारे बैंगलोर के मच्छर भी ना अपना मच्छरपना नहीं कर पा रहे हैं… और मुंबई के मच्छर उस्ताद हैं (Bangalor & Mumbai Mosquitoes)

    जब से बैंगलोर आये हैं, पता नहीं क्यों मुंबई से तुलना की आदत लग गई है, हरेक चीज में। खैर यह तो मानवीय स्वभाव है, हमें जहाँ रहने की आदत हो जाती है और जब नई जगह जाना पड़ता है तो उस माहौल में ढ़लने वाला जो समय है वह तुलना में ही निकलता है। यह चीज वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने पर भी होती है 🙂 यकीन नहीं होता तो किसी नये नवेले युगल दंपत्ति से पूछ कर देखें। और यह वस्तुस्थिती शादी के ४-५ वर्ष के बाद भी उत्पन्न होती है फ़िर तो दंपत्ति को आदत पड़ जाती है।

    जी तो आज तुलना है मच्छरों की, जी हाँ बैंगलोर के मच्छरों की। मुंबई के मच्छर इतने चालाक हैं, जैसे उनमें भी मुंबई की भाईगिरी के गुण आ गये हों।

    मच्छरों को मारने के उपाय भी बहुत सारे हैं, और हमने सभी अपनाये भी हैं पर साथ ही मुंबई के मच्छरों की चालाकी और धूर्तता भी देखियेगा और बेचारे बैंगलोर के मच्छरों का सीधापन..

१. अब हम तो मच्छर मारने के लिये इलेक्ट्रानिक रेकेट का उपयोग करते हैं।

मुंबई में जब सोने से पहले रेकेट लेकर निकलते थे, (अरे घर में, पूरी सोसायटी में नहीं) तो मच्छरों को या तो गंध लग जाती थी या उन्होंने अपनी आँखों में बढ़िया से लैंस लगवा लिये थे, जैसे ही रेकेट लेकर जाते मच्छर अपनी मच्छरी दिखा जाते और फ़टाक से उडकर छत पर बैठ जाते या फ़िर बिल्कुल छ्त और दीवार के कोने में बैठ जाते और हमें ऐसा लगता कि चिढ़ाते हुए कहते कि आ बेटा अब कैसे भुनेगा हमें, हम भी कभी बिस्तर पर खड़े होकर तो कभी स्टूल पर खड़े होकर तो कभी खिड़की पर खड़े होकर मारने की कोशिश करते पर ये मच्छर उसके पहले ही उड़ी मार जाते। हम मन मसोस कर रह जाते और फ़िर खिड़की खोलकर मारने की कोशिश करते तो बाहर उड़ी मार जाते और खिड़की के बाहर आँखों के सामने स्थिर उडकर हमें हमारे मुँह पर चिढ़ाते। और अगर किसी उड़ते हुए मच्छर को रेकेट से मारने की कोशिश करो तो वह क्या गजब की पलटी मारकर भाग लेता है।

बैंगलोर में बेचारे मच्छर बहुत आलसी हैं, जहाँ बैठे हैं वहीं बैठे रहेंगे, चालाकी और मच्छरी भाव यहाँ के मच्छरों में है ही नहीं। हम रेकेट लेकर घर में निकलते हैं तो बेचारे चुपचाप रेकेट में भुन जाते हैं, अगर कोई उड़ भी रहा है तो सीधा रेकेट में ही घुस लेता है। दीवार पर बैठा है तो यूँ नहीं कि थोड़ा ऊपर बैठे या छत पर बैठे, सीधा सादा सामने ही दीवार पर बैठ जायेगा और अपन भी बहुत ही इत्मिनान से रेकेट से निपटा देते हैं।

रेकेट उपयोग करने का फ़ायदा – सबसे बड़ा फ़ायदा कि हर दीवार या अलमारी पर खून के दाग या मच्छरों के दाग नहीं पड़े होते हैं, आप बैठे हुए आलस करते हुए, कविता करते हुए मच्छरों को और उड़ते हुए कानों में गुन गुन करते हुए मच्छरों को बहुत ही अच्छे तरीके से रेकेट से निपटा सकते हैं, पहले थोड़ी सी प्रेक्टिस की जरुरत होती है, पर जल्दी ही मच्छर अच्छे से प्रेक्टिस करवा देते हैं।

२. ऑल आऊट, गुडनाईट और भी पता नहीं कितने लिक्विड आते हैं, मच्छरों को मारने के लिये पर मुंबई में मच्छरों का जैसे इन सभी कंपनियों के साथ समझौता था और जो भी ये कंपनियों वाले इन लिक्विड में डालते थे तो मच्छरों को उसकी रेसेपी साझा कर देते होंगे जिससे मच्छर पहले ही इनके खिलाफ़ तैयार हो जाये। वैसे बैंगलोर के मच्छर भी कुछ ही ऐसे हैं, वरना तो अधिकतर तो इन लिक्विड के सामने टिक ही नहीं पाते, मच्छरों को सेटिंग करना अपने मुख्यमंत्री से सीख लेना चाहिये। यही हालात वो क्वाईल के साथ भी है।

३. हाथ से ताली बजाकर या मुठ्ठी बंद्कर कर मच्छर मारना – मुंबई में तो  ताली बजाकर मच्छर मारना लगभग नामुमकिन ही था और अगर कोई कोशिश भी करेगा तो ये मच्छर उस बेचारे को ताली पीटने वाला बनाकर छोड़ते हैं, और फ़िर भी मरते नहीं हैं, मुठ्ठी की तो बात ही छोड़ दीजिये, और साथ ही “साला एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है” इस गाने का टेप लेकर चलते हैं।  जो मच्छर अपनी मच्छरी से ताली से नहीं मरता वो मुठ्ठी बंद करने से क्या मरेगा। और इधर बैंगलोर में एक मच्छर एक ताली या एक मुठ्ठी, बस मच्छर खत्म। क्या आलसी मच्छर हैं यहाँ के उड़ते भी ऐसे हैं जैसे अपने पर एहसान कर रहे हों, इतनी आसानी से मार सकते हैं कि देखने की बात है।

तो कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मुंबई के मच्छरों को बैंगलोर में ट्रैंनिग देने की जरुरत है और अच्छे रोजगार की संभावना भी है, साथ ही अच्छा खून भी उपलब्ध है, चूँकि बैंगलोर के मच्छर अपने मच्छरपना कर पाने में अभ्यस्त नहीं हैं तो उनके लिये हर तरह की वैरायटी का स्वच्छ खून उपलब्ध है। आईये मुंबई के मच्छरों आपका स्वागत करने के लिये बैंगलोर के मच्छर राह तक रहे हैं ।

मेरी ९ वीं वैवाहिक वर्षगांठ

कल हमारे विवाह को ९ वर्ष पूर्ण हो गये, अब तो ९ वर्ष मतलब बहुत बड़ा अंक लगने लगा है, ऐसा लगता है कि बुढ़ाने की ओर तेजी से अग्रसर हैं।

कैसे ये ९ वर्ष बीत गये, पता ही नहीं चला। ऐसा लगता है कि जिंदगी का बीता हर पल बस अभी तो बीता है, और अगर संख्या देखी जाये तो ९ हो गई ।

हालांकि वैवाहिक वर्षगांठ हमने शायद चौथी बार साथ में मनाई है, बाकी पाँच बार अकेले अकेले 🙁

कल छत पर चाँद देख रहा था, चाँद पूरा था क्योंकि कल पूर्णिमा थी और इतना सुंदर चाँद बहुत दिनों बाद देख रहा था, समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सा चाँद ज्यादा सुन्दर है, मेरा या सबका 🙂

कटाक्ष तो वैवाहिक जीवन का आम हिस्सा है, जैसे कि अब हम ये संवाद बड़ी ही आसानी से बोल सकते हैं,

“तुम्हें ९ साल से झेल रहा हूँ”

“अब तो आदत हो जानी चाहिये ९ साल से देख रही हो”

वैवाहिक वर्षगांठ पर परिजनों और प्रेमी मित्रों से बात कर दिल गुलजार हो गया।

उम्मीद है कि आगे की वर्षगांठें भी ऐसे ही आनंद से निकलेंगी और प्रेम अमर रहेगा।

आज आप इतने क्यों गोरे लग रहे हो.. फ़ेयर & लवली ? (Colour Complex)

    कल ऐसे ही एक हमारे सहकर्मी ने दोपहर में भोजन के पहले हमसे पूछ डाला कि आज आप कुछ ज्यादा ही गोरे लग रहे हो, आज क्या किया है। हमने मजाक में कहा कि फ़ेयर एन्ड लवली लगाई है। तो वह मुझसे पूछने लगा कि क्या वाकई फ़ेयर एन्ड लवली लगाने से गोरे हो जाते हैं, तो मुझे हँसी छूट गई, अरे भई अगर क्रीम लगाने से ही गोरे हो जाते तो सारी दुनिया गोरी ही होती।

    बेचारे अफ़्रीका वाले कालिये भी कॉम्पलेक्स खाते होंगे वो भी गोरे हो जाते। स्लमडॉग मिलिनियर में दिखाया गया एक सीन अक्सर याद आता है, जब एक काला लड़का फ़ेयर एन्ड लवली क्रीम लगाता है और गोरा नहीं होता तो वह क्रीम उसी पोस्टर पर फ़ेंकता है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण कहते थे “राधा क्यों गोरी, मैं क्यूँ काला”।

    मैंने अपने सहकर्मी से कहा कि तुम अगर गोरे हो भी जाओगे तो उतने अच्छे नहीं लगोगे जितने इस साँवले रंग में लगते हो, रंग से कुछ नहीं होता और साँवले रंग और काले रंग वाले गोरे रंग की काया वालों से ज्यादा अच्छे लगते हैं। रंग से कुछ नहीं होता व्यक्तित्व अच्छा लगना चाहिये। व्यक्तित्व अच्छा होता है, गठीले शरीर से, सौम्य छबि से, खुशी से, आचरण से। आकर्षक व्यक्तित्व वाले व्यक्ति का रंग कैसा भी हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। अधिकतर आकर्षक व्यक्तित्व केवल साँवले रंग वाले लोगों में ही मिलता है, गोरे रंग वालों में नहीं।

    खैर जो दुख उनको होता होगा वह गोरे रंग वाले समझ नहीं सकते क्योंकि वे उस रंग के नहीं हैं। पर मेरा तो मानना यही है कि रंग कैसा भी हो आपको आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होना चाहिये, कुछ गहरे रंग वाले मेरे मित्र भी हैं, पर वे इतने आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी हैं और मुझे लगता है कि अगर इनका रंग गोरा होता तो शायद इनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक नहीं होता।

स्वर्ग में किसको जाने को मिलेगा ब्राह्मण, डॉक्टर या आईटी (IT) पेशेवर को… [Who will get entry in Swarg..]

स्वर्ग के द्वार पर तीन लोग खड़े थे।

भगवान

सिर्फ़ एक ही अंदर जा सकता है।पहला

मैं ब्राह्मण हूँ, सारी उम्र आपकी सेवा की है। स्वर्ग पर मेरा हक है।दूसरा

मैं डॉक्टर हूँ, सारी उम्र लोगों की सेवा की है। स्वर्ग पर मेरा हक है।तीसरा

मैंने आईटी (IT) में नौकरी की है|

भगवान

बस.. आगे कुछ मत बोल.. रुलायेगा क्या पगले ? अंदर आजातेरे फ़ोर्वर्डेड मेल्स, फ़ोलोअप्स, बेंच पर २ साल, नाईटशिफ़्टस, प्रोजेक्ट मैनेजर से पंगा, सीटीसी (CTC) से ज्यादा डिडक्शन्स, पिकअप ड्रॉप का लफ़ड़ा, लड़की ना मिलने की फ़्रस्ट्रेशन, क्लाईंट मीटिंग्स, डिलिवरी डेट्स, वीकेंड्स में काम, कम उम्र में बालों का झड़नासफ़ेद होना, मोटापे का प्रोब्लम, मेरे को सेन्टी कर दिया यार। आजा जल्दी अंदर आजा।

[एक मित्र का चैट पर मैसेज था, आईटी वालों का दर्द समझाने के लिये अच्छा मैसेज है]

कुछ पल मूँगफ़ली के दाने, भेलपुरी और बस का सफ़र, मुंबई और बैंगलोर

    ऑफ़िस से पैदल ही बाहर निकल पड़ा था, आज अकेला ही था, कोई साथ न था, या तो पहले निकल गये थे या फ़िर रुके हुए थे, मैं ही थोड़ा समय के बीच से निकल गया था। पता नहीं इन कांक्रीट के जंगलों में सोचता हुआ चला जा रहा था। आज तो वो मूँगफ़ली वाला ठेला भी नहीं था, जिससे अक्सर मैं पाँच रुपये के मूँगफ़ली के दाने बोले तो टाईमपास लेता था, पाँच रुपये में ४-५ कुप्पी, उसका भी अपना नापने का अलग ही पैमाना है, बिल्कुल फ़ुल बोतल के ढ्क्कन के साईज की कुप्पी है उसकी। अपनी पुरानी आदत जो पिछले ५-६ साल से मुंबई में लग गयी है, चलते हुए ही खा लेना।

    यहाँ तो सब ऐसे घूर घूर कर देखते हैं, कि जैसे चलते चलते खाकर गुनाह कर रहे हों, या फ़िर जैसे मैं उनका अनुशासन तोड़ रहा हूँ। पर अपन भी बिना किसी की परवाह किये अपने नमकीन वाले मूँगफ़ली के दाने टूँगते हुए अपने बस स्टॉप की ओर बड़ते जाते हैं।

     अब मूँगफ़ली वाला नहीं था और भूख भी लग रही थी थोड़ी कुनमुनी सी, जिसमें केवल टूँगने के लिये कुछ चाहिये होता है, वहीं बस स्टॉप के पास के भेलपुरी वाले को देखा था, देखा था क्या रोज ही देखते हैं, सोचा कि चलो आज इसको भी निपटा लिया जाये।

    १५-२० मिनिट चलने के बाद पहुँच लिये उसके पास, टमाटर काट रहा था, वो भी धीरे धीरे, उसको देखकर ही लगगया कि ये व्यक्ति यहीं का है, अगर मुंबई का भेलपुरी वाला होता तो पूछिये ही मत उनकी प्याज, आलू और टमाटर काटने की रफ़्तार देखते ही बनती है, वह भी चाकू से नहीं, एक पत्ती जैसी चीज होती है जिस पर उनका हाथ बैठ चुका होता है।

    सोचा कि चलो काटने दो, अब इसको क्या बोलें। सब समान भेलपुरी का एक स्टील के भगौने में चमचे से मिलाया और कागज की पुंगी बनाकर उसमें दे दिया और साथ ही एक प्लास्टिक का चम्मच, हमने कहा कि भई अपने को तो पपड़ी चाहिये, और पपड़ी लेकर चल पड़े बस स्टॉप की ओर।

    हालांकि भेलपुरी मुंबई की ही फ़ेमस है, परंतु अब तो हर जगह होड़ लगी है, एक दूसरे के पकवान बनाने की, जबकि मुंबई और बैंगलोर में जमीन आसमान का फ़र्क है, यहाँ मिनिटों में लेट होने पर कुछ नहीं होता, पर वहाँ मुंबई मिनिट मिनिट का हिसाब रखती है।

    वहाँ बस स्टॉप पर खड़े होकर बस का इंतजार भी कर रहे थे और साथ में भेलपुरी खाते भी जा रहे थे, तो लोग फ़िर घूर घूर कर देखना शुरु कर दिये जैसे कि मैं कोई एलियन हूँ। बस आई और हम भेलपुरी खाते हुए बस में चढ़ लिये, कंडक्टर टिकट देने आया तो उसके मनोभावों से लग रहा था कि अभी बोलेगा कि बस में भेलपुरी खाना मना है, परंतु वह चुपचाप टिकट देकर और अनखने से निकल लिया, अब बारी आई आसपास वालों की, तो शाम का समय रहता है, सबको हल्की भूख तो लगती ही है, मुंह में पानी भी आ रहा होगा पर करें क्या मांग तो सकते नहीं ना…! 😉  हम चटकार लेकर भेलपुरी खतम किये और वो कागज की पुंगी बेग के साईड जेब में डाली और बोतल निकाल कर पानी पीकर एक अच्छी सी डकार ली।

हालांकि सबके चेहरे अतृप्त लग रहे थे, पर मैं पूर्ण तृप्त था।

हाय, कैसी है तू

“हाय, कैसी है तू”

“मैं भी बढ़िया हूँ, और बता क्या चल रहा है”

“क्या पूना में पड़ी हुई है, आजा तू बैंगलोर शिफ़्ट हो जा”

“यहाँ पर भी अच्छा जॉब मिल जायेगा, वेदर बहुत अच्छा है”

“अरे यार क्या सिटी बस में घर जा रही है, कितनी खड़ खड़ की आवाजें आ रही हैं”

“मैं तो एसी वोल्वो बस में हूँ पहले घर के पास ही ऑफ़िस था अब दूर है, पहले १० मिनिट लगते थे, अब डेढ़ घंटा लगता है”

“अरे क्या कर रही है तू, ड्राईवर को क्यों डाँट रही है, बेचारा रो पड़ेगा, छोड़ दे उसको”

“अरे मुझे पूरा यकीन है कि ड्राईवर रो पड़ेगा, आगे से बेचारा तेरे को ड्रॉप करने कभी नहीं आयेगा”

“याद है जैसे वो वेटर को तूने रुलाया था, बेचारे के आँखों में आँसू भी आ गये थे”

“अरे यार मैं तेरी कुछ मदद कर सकता हूँ, यहाँ पास के फ़्लेट में एक मराठी लड़का रहता है, उससे तेरे लिये बात करता हूँ, और जो मेट्रीमोनी साईट के पैसे बच जायें उससे मुझे पार्टी दे देना”

“लड़का अच्छा है, तू तेरा पोर्ट्फ़ोलियो भेज दे”

“अरे नहीं बाबा तू भेज ना !, फ़िर उसका भी मँगा लेंगे”

“अरे हाँ बाबा रे वो पूना भी शिफ़्ट हो जायेगा, बात कर लेना और क्या”

“अरे पगली, पहले पूना शिफ़्ट करने को बोलकर शादी कर लेगा और बाद में नहीं होगा तो तू कर क्या लेगी”

“बाद में बैंगलोर में आना पड़ेगा, उससे अच्छा है कि अभी आजा”

“तू जिधर रहेगी, वहीं पास में मैं भी फ़्लेट ले लूँगा”

“तेरा पूरा ध्यान रखूँगा, डोन्टवरी”

“तुझे बोर नहीं होने दूँगा”

“हाँ यार पिछले साढ़े पाँच साल से बहुत ऐश में रहा हूँ, अब ऑफ़िस शिफ़्ट हो गया है तो ऐसी घटिया जगह रहने जा रहा हूँ, कि पूछ मत”

“बस ऑफ़िस के पास है, इतना ही नहीं तो इतने पुराने मकान में तो कभी रहने ना जाऊँ”

“अच्छा चल अब मेरा स्टॉप आ रहा है, कल बात होती है, और बेचारे ड्राईवर को डाँटना मत”

“बॉय टेक केयर”

जवानी के दिनों में पॉपकार्न

    कुछ दिन पहले समान लेने हॉपयर सिटी गये थे (हर पाँचवें दिन जाना ही पड़ता है), तो  हमारी पॉपकार्न की विशेषत: ढूँढ़ थी क्योंकि बाहर के पॉपकार्न हमें पसंद नहीं, और घर में बनाने के लिये मकई के दाने नहीं मिले, तो सोचा कि चलो वो कूकर वाले पॉपकार्न ले लिये जायें, पता चला कि अब कूकर वाले कम, और माइक्रोवेव वाले पॉपकार्न ज्यादा चलते हैं, हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि ये माइक्रोवेव वाले पॉपकार्न कैसे होते हैं।

    kettle corn वैसे माइक्रोवेव भी हमने यहाँ बैंगलुरु में आकर मजबूरी में लिया है (यह कहानी फ़िर कभी)। अब दस रुपये में और क्या भगवान चाहिये ? दस रुपये में आज की महँगाई में अच्छे बटर वाले पॉपकार्न। बस पोलिथीन फ़ाड़ी (जैसे फ़टा पोस्टर निकला हीरो), और एक सफ़ेद रंग का लिफ़ाफ़ा निकला, जिसमें पॉपकार्न थे एक तरफ़ से पीले रंग का कुछ कागज सा चिपका था और उसमें लिखा था कि यह माइक्रोवेव में नीचे की तरफ़ रखें, और माइक्रो पर करके २ मिनिट रखें बस आपके पॉपकार्न तैयार, वह लिफ़ाफ़ा पूरी तरह से हवा से फ़ूल चुका था। फ़िर उस लिफ़ाफ़े को फ़ाड़कर पॉपकार्न खाये तो अहा! भाईसाब्ब.. मजा आ गया।

    फ़िर सोचा कि जिसने इतनी आरएनडी (R&D) करी होगी अगले ने क्या दिमाग पाया होगा कि उसने कितनी सुविधाजनक चीज हम आलसियों के लिये बनाई है, कि बस पोलिथीन खोलो और दो मिनिट में माइक्रोवेव में रखने पर ही चरने के लिये पॉपकार्न तैयार।

    अभी तक याद है कि अपनी जवानी के दिनों में जब हम कार्तिक मेले में जाते थे तो २ रुपये में बहुत सारे पॉपकार्न मिलते थे, और हम कवि सम्मेलन सुनते समय २ रुपये वाले ५-६ पैकेट साथ में ही लेकर बैठते थे, कि शायद किसी कवि को हमारे पॉपकार्न ही पसंद आ जाये और हमें स्टेज पर बुला ले, पर कभी ऐसा हुआ नहीं ! 🙁

    खैर शुरु हो जाओ आलसियों और पॉपकार्न के दीवानों केवल २ मिनिट में अपनी हसरतें पूरी करें और यूट्यूब पर कवि सम्मेलन सुनते हुए पॉपकार्न खायें।