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बफ़ेट के निवेश सिद्धांत “जटिलता की जगह सरलता को चुनें”

     जब आप निवेश करते हैं, तो उसे सरल ही रखें। वही करें जो बिल्कुल सरल और स्पष्ट है, बफ़ेट सलाह देते हैं – जटिल प्रश्नों के लिये जटिल उत्तर देने की कोशिश मत करिये।

    अधिकतर लोगों की यह धारणा है कि शेयर बाजार में निवेश करना बहुत जटिल, रहस्यों से भरा और जोखिम भरा होता है इसलिये इसे इसके पेशेवरों को ही करना चाहिये। यह हम सबकी मानसिकता और एक आम धारणा है कि आम आदमी सफ़ल निवेशक नहीं बन सकता क्योंकि निवेश में सफ़लता के लिये उन्नत व्यावसायिक डिग्री, कठिन गणितीय सूत्रों में महारत, जटिल कम्पयूटर प्रोग्राम का आपके पास होना जो कि शेयर बाजार का हाल बतायें और इतना सारा समय कि आप शेयर बाजार, चार्ट, मात्रा, आर्थिक रूझान आदि पर ध्यान दे पायें।
 
    वारेन बफ़ेट ने बता दिया कि यह सब मात्र मिथक है।
 
    बफ़ेट ने शेयर बाजार में सफ़लता के लिये जो राह खोजी वह बहुत जटिल नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो सामान्य बुद्धि रखता हो वह सफ़ल निवेशक बनने की काबिलियत रखता है, किसी भी पेशेवर की सहायता के बिना, क्योंकि निवेश के सिद्धांत समझने के लिये बहुत ही आसान हैं।
 
    बफ़ेट केवल ऐसे व्यापारों के शेयरों में निवेश करते हैं, जो आसानी से समझा जा सके, मजबूत, ईमानदार और टिकाऊ व्यापार हो, जिसकी सफ़लता की व्याख्या बहुत सरल हो, और वे कभी भी ऐसे व्यापार में निवेश नहीं करते हैं जिसे वे नहीं समझते हैं।
 
    बफ़ेट के निवेश सिद्धांतों का सार और अच्छी बात केवल सरलता ही है।  इसके लिये आपको जटिल गणित, वित्तीय पृष्ठभूमि, अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी और शेयर बाजार भविष्य में कैसे होंगे, इनकी जानकारी होना आवश्यक नहीं है। यह सामान्य बुद्धि से आदर्श, धीरज और साधारण मूल्यों पर आधारित है, जो कि कोई भी निवेशक आसानी से समझ कर अपना सकता है। जबकि बफ़ेट की धारणा है कि निवेशक गणितीय सूत्रों, शार्टटर्म बाजार के भविष्य और चाल, बाजार और वोल्यूम पर आधारित चार्ट्स को देख कर अपने को ही मुश्किल में डालते हैं।
 
    वस्तुत:  बफ़ेट कहते हैं कि जटिलता आपको सफ़लता से दूर करती है। खुद को निवेश के नये सिद्धांतो में उलझाने की कोशिश न करें, जैसे कि ऑप्शन्स प्राईसिंग या बीटा। बहुत सारे मामलों में आप नयी तकनीकी में खुद को बेहतर स्थिती में नहीं पायेंगे। बफ़ेट ने अपने गुरु से एक बात सीखी कि “आपको असाधारण नतीजों के लिये असाधारण साहस की जरुरत नहीं होती है”।
 
    हमेशा खुद को साधारण रखें। लक्ष्य कैसे चुनें –  अच्छी कंपनी के शेयर खरीदें, जो कि ईमानदार और काबिल लोगों द्वारा चलायी जा रही हो। आप अपने शेयर के लिये कम भुगतान कीजिये, भविष्य में उसकी अर्जन क्षमता को पहचानें। फ़िर उस शेयर को लंबे समय तक अपने पास रखें और बाजार को आपके द्वारा किये गये निर्णय पर मुहर लगाने दीजिये।
 
    बफ़ेट के निवेश सिद्धांत में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत “सरलता” है। जो बफ़ेट की अविश्वसनीय उपलब्धियों के बारे में बताती है। इसी से पता चलता है कि कैसे बफ़ेट ने वाशिंगटन पोस्ट शेयर के निवेश में १.६ करोड़ से १ अरब बनाये, कैसे कोका-कोला में १ अरब के निवेश से ८ अरब बनाये, और उन्होंने ४.५ करोड़ के गीको बीमा कंपनी के शेयर खरीदे और आज उसकी कीमत १ अरब से ज्यादा है।
 
जिस व्यापार को आप नहीं समझते हैं, उसमें कभी भी निवेश न करें।
 
    बफ़ेट ने अपने साधारण नियम और सिद्धांतों से बार्कशायर हाथवे को १०० करोड़ से ज्यादा की कंपनी बना दिया। जब भी शेयर बाजार में निवेश करना होता, तो वे अपना धन ऐसे व्यापार में लगाते जो कि समझना आसान हो, ठोस और मजबूत व्यापार, स्थायी और नीतिपरक प्रबंधन हो। वे बहुत सारे शेयर लॉट में खरीद लेते हैं, जब बाजार में लोग सस्ते दामों में बेच रहे होते हैं। संक्षेप में कहें तो यही उनकी सफ़लता का राज है।
 
    शेयर का भविष्य बताने वाले सॉफ़्टवेयरों के बारे में भूल जायें जो कि शेयर की कीमतों का इतिहास, अस्थिरता और बाजार की चाल बताते हैं। बफ़ेट कम्प्यूटर का उपयोग करते हैं, परंतु ब्रिज खेलने के लिये न कि शेयर का उतार चढ़ाव देखने के लिये। आपके निवेश का लक्ष्य भी बफ़ेट के जैसा ही होना चाहिये, उन्हीं व्यापार में निवेश करना चाहिये जो कि आपको समझने में आसान हो, जिस व्यापार को आप समझते हैं, और आपको लगता हो कि भविष्य में यह कंपनी बहुत अच्छा करेगी, तो मुनसिब समय का इंतजार करें और यथोचित भाव आने पर खरीदें।
 
हमेशा अपने निवेश पर फ़ैसलों के लिये तीन सिद्धांतों पर चलें –
 
१. हमेशा निवेश सरल रखें – कभी भी अपने निवेश को जटिल न बनायें, और हमेशा अपनी जानकारी के अनुसार खरीदे गये व्यापार को ही खरीदें और उस पर अड़िग रहें। जिस निवेश में जटिलता हो, उसमें निवेश करने से बचें।
 
२. अपने निवेश के फ़ैसले खुद लें – अपने निवेश के सलाहकार खुद बनें। उन ब्रोकर्स और बेचने वाले लोगों से बचें जो कि किसी एक शेयर या म्यूच्यल फ़ंड को तरजीह देकर खरीदने के लिये प्रेरित करते हैं, क्योंकि उस पर उन्हें मोटी कमाई होती है। स्पष्टत: ये लोग दिल से आपको अच्छे निवेश नहीं दिलवाते हैं।
 
३. उसे पढ़ो जिसने बफ़ेट को पढ़ाया – वह आदमी जिसका जबरदस्त प्रभाव बफ़ेट पर है उनके पिता के अतिरिक्त, वह हैं हार्वर्ड के बेंजामिन ग्राहम, जिन्हें नीति निवेश का पितामह भी कहा जाता है। जिन्होंने वर्षों पहले बफ़ेट को पढ़ाया कि निवेश में सफ़लता सरलता में है जटिलता में नहीं। और वाकई ग्राहम को पढ़ना बहुत अच्छा है।
 
बफ़ेट के साधारण कूटनीतियों को मत भूलिये जो कि उन्हें असाधारण नतीजों की ओर ले गया।

भारत का गणतंत्र सिसक सिसक कर रो रहा है… और मैं अंदर बैठकर उसके बारे में लिख रहा हूँ (Republic India !)

आदतन आज सुबह नित्यकर्म के पहले घर का दरवाजा खोला, अखबार के लिये और जैसा कि रोज होता है अखबार नहीं आया। आदत है तब भी रोज देखने की आत्मसंतुष्टि के लिये, तो छज्जे पर थोड़ा सा बाहर निकल कर देख लिया, वहाँ किसी के सिसक सिसक कर रोने की आवाज आ रही थी, थोड़ा ध्यान से देखा तो वहीं बिजली के खंभे के पास तिरंगे में लिपटा गणतंत्र था जो कि शायद कोहरा घना होने का इंतजार कर रहा था।

मैं चुपचाप अंदर अपने घर में आ गया, कि कहीं गणतंत्र मेरे पास आकर मेरे पास आकर रोना ना सुनाना शुरु कर दे, मेरी घिग्घी बँधी हुई है, और गणतंत्र के सिसक सिसक कर रोने के कारणों के बारे में सोच रहा हूँ, अगर आप को पता चले कि भारत का बूढ़ा गणतंत्र क्यों सिसक सिसक कर रो रहा है.. तो मुझे अवश्य बताईये।

एक कहानी “दूध की बोतल” जिसने मुझे हिला दिया.. बोधिपुस्तक पर्व

    बोधिपुस्तक पर्व की एक कहानी की पुस्तक, नाम है “गुडनाईट इंडिया” और लेखक हैं प्रमोद कुमार शर्मा, इसमें लेखक ने एक से एक बढ़कर कहानियाँ दी हैं, जो कि भारत के सामाजिक तानेबाने की गहन तस्वीरें दिखाती हैं, अमूमन तो पढ़ने का समय मिल नहीं पाता, परंतु रोज घर से कार्यस्थल आते समय बस में मिलने वाला समय अब पढ़ने में लगाते हैं, पहले सोचा था कि पतली सी किताब है जल्दी ही खत्म हो जायेगी, परंतु एक कहानी के बाद दूसरी कहानी में जाना सरल नहीं, उस कहानी के मनोभाव में डूबकर नयी कहानी के मनोभावों में जाना बहुत ही कठिन प्रतीत होता है, कल यह कहानी पढ़ी थी कहने को तो छोटी कहानी है। लेखक ने अपने पात्रों को सुघड़ और सामाजिक परिवेश में रचा बसा है कि ऐसा लगता ही नहीं कि यह मुझसे दूर कहीं ओर की कहानी है।
    “दूध की बोतल” जैसा कि कहानी के नाम से ही प्रतीत होता है, कि यह कहानी दूध की बोतल पर लिखी गई है, इसमें एक छोटा सा परिवार पात्र है जो कि ग्राम्य परिवेश में रहता है और घर में बच्ची होने के बाद अपनी कुलदेवी को धोक देने कुलदेवी के स्थान जा रहा है। परिवार में माता पिता पुत्र बहू और छोटी सी पोती जो कि कुछ ही माह की है, बड़ी मुश्किल से पोती हुई है उसके लिये जातरा बोली थी, इसलिये वो कुलदेवी के स्थान जा रहे हैं।
    परिवार मध्यमवर्गीय है, पर बहू भारत की आधुनिक विचारों वाली नारी है जो कि अच्छे और बुरे का अंतर अपने हिसाब से करती है, शादी के कुछ दिन बाद ही उसके पैर भारी हो जाते हैं, तो वह अपने पति से कहती है कि वह बच्चे को दूध नहीं पिलायेगी, बच्चे को ऊपर का दूध दूँगी। नहीं तो मेरी छातियाँ लटक जायेंगी, पति उसे बहुत समझाने की कोशिश करता है कि बच्चे के लिये तो माँ का दूध अमृत समान होता है और माँ को दूध पिलाने पर अद्भुत संतोष मिलता है, परंतु वह अपने आधुनिक विचारों में पढ़े लिखे होने और अपनी परवरिश का हवाला देकर बिल्कुल जिद पकड़ लेती है, पति भी अपनी आधुनिक युग की सोच वाली पत्नी को मना नहीं पाता।
    बच्चा मुश्किल से होता है, जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं, पर माँ को दूध ही नहीं उतरता। कुलदेवी की जातरा जाने के लिये पिताजी ने जीप कर ली है, और चल पड़े हैं कुलदेवी को धोक देने के लिये, बीच में बच्ची रोती है तो पिताजी कहते हैं कि बेटा जरा पोती को दूध पिला दो, तो बेटा थैलों में बोतल ढूँढ़ता है पर बोतल नहीं मिली, वह कहता है कि बोतल तो घर पर ही छूट गई, तो ड्राईवर कहता है कि कुलदेवी के स्थान पहुँचने में और १ घंटा लगेगा, वहाँ कटोरी चम्मच से दूध पिला देना। पिताजी कहते हैं कि बच्ची भूख से बेहाल है और गरमी भी इतनी हो रही है, थोड़ा पानी ही पिला दो, थोड़ा पानी पिलाने के बाद बच्ची चुप हो जाती है, रास्ता खराब है, पर थोड़ी देर के बाद ही हाईवे आ जाता है, थोड़ी आगे जाने के बाद ही जीप खराब हो जाती है, और ड्राईवर और बेटा पास के गाँव में पार्ट लेकर ठीक करवाने जाते हैं। पीछे बच्ची की हालत भूख और गर्मी के मारे खराब होती जा रही थी, पर वह मन ही मन अपने को दिलासा भी देती जा रही थी कि अरे मरेगी थोड़े ही.. (माँ ऐसा भी सोच सकती है !!) तभी उसकी ममता जाग उठती है और वह जोर से अपनी छाती से बच्ची को लगा लेती है, तो उसे अचानक महसूस होता है कि उसकी छातियों में दूध उतर आया है, वह पिलाने ही जा रही होती है कि तभी उसके मन में विचार आया कि “क्या कर रही है, अभी जो बच्ची को दूध पिला दिया तो रोज की आफ़त हो जायेगी”, बच्ची रोते रोते सो गई।
    डेढ़ घंटे बाद ड्राईवर बेटे के साथ आ गया तो बोला कि बड़ी मुश्किल से बोतल मिली है, लो निपल लगाओ बच्ची के मुँह में, पर बच्ची निपल मुँह में नहीं ले रही, जबरदस्ती मुँह में निपल को ठूँसा तो देखा कि धार मुँह से बाहर निकलने लगी, पिताजी जोर से चिल्लाये कि “अरे बच्ची ठीक तो है !! देखो दूध क्यों नहीं पी रही”, अन्तत: ड्राईवर बोला “साहब वापस चलते हैं, बच्ची अब नहीं रही।” ड्राईवर की बात सुनते ही बहू चीख मारकर बेहोश हो गई। पूरा परिवार शोकाकुल हो गया, केवल ड्राईवर ही होश में था और उसे पूरा विश्वास था कि वह दुख की इस घड़ी में परिवार की मदद कर सकेगा।
संवाद जो बहुत दिन बाद पढ़े –
“प्रविसे नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कौसलपुर राजा…।”
“देखो… मैं अपने पापा के यहाँ स्वतंत्र विचारों से पली-बढ़ी हूँ। मुझे ये दकियानूसी तरीके ठीक नहीं लगते।”
    इस कहानी को पढ़ने के बाद मुझे भी अवसाद ने जकड़ लिया, और उसके बाद कुछ भी सोचने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी, लेखक ने अपने पात्रों के साथ बराबर न्याय किया और पाठक तक बात पहुँचाने में सक्षम भी रहा। लेखक ने अवसाद को अपनी कलम से खूब लिखा है। मैंने घर पहुँचकर अपनी घरवाली को बोला कि आज एक कहानी पढ़ी थी तो उसके बाद से मुझे अवसाद ने घेर लिया, और जैसे ही मैंने कहानी का नाम लिया “दूध की बोतल”, तो बोली हाँ मैंने भी पढ़ी थी और उस कहानी के बाद उसके आगे की कहानियाँ पढ़ने की हिम्मत ही नहीं हुई, और अभी तक कोई किताब पढ़ भी नहीं पाई। लेखक के लेखन से मैं मुग्ध हूँ।
    आप भी ये किताबें मँगा सकते हैं, मात्र १०० रुपये में बोधिपुस्तक पर्व की किताबें उपलब्ध हैं, जिसमें हिन्दी की १० किताबें हैं। सब एक से बढ़कर एक।
१०० रुपये का मनीऑर्डर भेजने पर वे घर पर भेज देते हैं –
पता – बोधि प्रकाशन, एफ़- ७७, सेक्टर ९, रोड नं ११, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम ,जयपुर, – ३०२००६
दूरभाष – 0141 – 2503989, 98290-18087

बैंगलोर में ४ ब्लॉगरों और एक पाठक का मिलन (4 Blogger’s and 1 Blog Reader Meet at Bangalore)

आज की ताजा खबर बैंगलोर में ४ ब्लॉगर्स और एक पाठक का मिलन हुआ ।

४ ब्लॉगर थे –

देव कुमार झा

मनीषा जी

विवेक रस्तोगी

हर्ष रस्तोगी

१ पाठक – हमारी धर्मपत्नी वाणी

बहुत सारे ज्वलंत मुद्दों पर बातें हुईं, और सौहार्दपूर्ण तरीके से बैंगलोर में ब्लॉगर मिलन संपन्न हुआ।

ज्वलंत मुद्दों में शामिल थे –

भाजपा द्वारा कर्नाटक बंद और आम जनता की तकलीफ़

भ्रष्टाचार

मुंबई

उड़नतश्तरी समीर लाल जी की कृति – “देख लूँ तो चलूँ”

दक्षिण भारत में हिन्दी

ए.टी.एम. से पैसे निकालने में हुई गड़बड़ी

ब्लॉग वार्ता

जिन ब्लॉगर्स का जिक्र हुआ इस छोटे से मिलन में वे हैं –

उड़नतश्तरी समीर लाल जी, घुघुती बासुती जी, प्रवीण पाण्डे जी, प्रशांत प्रियदर्शी जी PD, अभिषेक कुमार।

फ़ोटो कल देवकुमार झा जी द्वारा प्रकाशित किया जायेगा तब इस पोस्ट में भी लगा देंगे 🙂

बैंगलोर का भारी पानी और बिना मतलब का एक्वागार्ड (Hard Water and Aquaguard Fail…)

बैंगलोर में आकर बहुत सारा सामान्य ज्ञान बढ़ा, जिसमें से एक है हार्ड वाटर याने कि भारी पानी।
    मुंबई से बैंगलोर शिफ़्ट होने के बाद अपना एक्वागार्ड लगवाने का समय नहीं मिल पाया, एक प्लंबर को बुलाकर एक्वागार्ड संस्थापित तो करवा लिया, परंतु मुंबई से परिवहन के दौरान उसमें कुछ समस्या हो गई थी इसलिये वह शुरु ही नहीं हो रहा था। एक्वागार्ड के ग्राहक सेवा केन्द्र को फ़ोन लगाकर अपनी शिकायत भी दर्ज करवाई, जब ७ दिन तक एक्वागार्ड वाला नहीं आया तो वापिस से उनको फ़ोन करके कहा कि बैंगलोर में क्या सारी कंपनियाँ ऐसी ही हैं, जो कि अपने ग्राहकों का ध्यान नहीं रखती हैं। तो हमें कहा गया कि ठीक करने वाला बंदा २ दिन में पहुँच जायेगा। खैर हम तो एक्वागार्ड की घटिया सेवा से परेशान हो चुके थे।
    इसी दौरान एक सुबह एक्वागार्ड बेचने वाले ने हमारे घर पर दस्तक दी, तो हमने पहले पूछा कि ठीक करने आये हो, उसने जबाब दिया “नहीं”, हम तो बेचने आये हैं, पहले तो हमने जबरदस्त फ़टकार लगाई कि क्या ग्राहकों को सेवाएँ देते हो, ७ दिन पूरे होने के बाबजूद अभी तक कोई ठीक करने नहीं आया, क्या बकबास कंपनी है, और भी बहुत कुछ उसे गरिया दिया।
    पर वह भी पक्का बेचनेवाला था, बोला कि अगर आप इजाजत दें तो मैं आपके यहाँ का पानी जाँच लूँ, मैंने कहा कि चलो भई देख लो, क्योंकि हमने भी सुना था कि यहाँ बैंगलोर का पानी भारी है। उसने जाँच की और हमें बताया कि देखिये ४८५ है और बिसलरी का ७२, पीने लायक पानी होता है ५०-१०० अब क्या मानदण्ड होता है, पता नहीं । उससे हमने पूछा कि भारी पानी पीने से क्या नुक्सान होता है वह हमें बता नहीं पाया पर बोला कि RO वाला मॉडल आपको खरीदना होगा तभी यह भारी पानी पीने लायक होगा, हमने कहा अभी तो हम बिसलरी पी रहे हैं, पर जल्दी ही कुछ तो लेना ही होगा अगर हमारा साधारण एक्वागार्ड काम नहीं आयेगा।
    उस समय हमारे पास इंटरनेट था नहीं, और ऑफ़िस में थोड़ा बहुत पढ़ा तो सब सिर के ऊपर से निकल गया, तो पास के एक मॉल में गये जहाँ Water purifier के सभी कंपनियों के उत्पाद थे, हमने पहले उससे कहा कि पहले हमें जानकारी दीजिये कि भारी पानी से क्या होता है, तो वह भी हमें केवल इतना ही बता पाया कि जब बहुत प्यास लगती है तभी पी पायेंगे, ज्यादा पानी पीने की इच्छा नहीं होगी। नुक्सान कुछ भी नहीं है। हमें वहाँ व्हर्लपूल कंपनी का RO वाला उत्पाद अच्छा लगा, और हम तय कर चुके हैं कि एक्वागार्ड जैसी घटिया ग्राहक सेवा देने वाली कंपनी से तो उनका उत्पाद नहीं खरीदेंगे वह भी कम से कम बैंगलोर में तो बिल्कुल नहीं।
    अगर आप में से किसी के पास इस बारे में जानकारी हो तो लिंक साझा करें या फ़िर टिप्पणी में ज्ञान प्रदान करें, तो हम नया RO Water Purifier ले पायें।
१. भारी पानी के नुक्सान क्या हैं ?
२. RO वाला कौन सा Water purifier लें ?
३. भारी पानी के उपचार के और कौन से तरीके हैं ?

ब्लॉगरी में भी विकृत मानसिकता… (Blogger’s Distorted mindset..)

    विकृत मानसिकता जिसे मैं साधारण शब्दों में कहता हूँ मानसिक दिवालियापन या पागलपन, वैसे विकृत मानसिकता के लिये कोई अधिकृत पैमाना नहीं है, अनपढ़ और पढ़ेलिखे समझदार कोई भी हो जरूरी नहीं है कि उनकी मानसिकता विकृत नहीं हो।

    और ऐसे ही कुछ उदाहरण मैंने हिन्दी ब्लॉगजगत में देखे पोस्ट पढ़कर पहली बार में ही विकृत मानसिकता का दर्जा मैंने दे दिया। अब यहाँ ब्लॉगर भी बहुत पढ़े लिखे हैं, और जिनके पास बड़ी बड़ी डिग्री है, वे हिन्दी ब्लॉगिंग की प्रगति में महति योगदान निभाने में अपनी जीवन ऊर्जा लगा रहे हैं। धन्य हैं वे ब्लॉगवीर और वीरांगनाएँ जो यह सोचते हैं कि वे हिन्दी लिख रहे हैं तो हिन्दी समृद्ध हो रही है, वाह ब्लॉगरी विकृत मानसिकता।

    जितना समय दूसरे ब्लॉगर की टांग खींचने उनकी टिप्पणियों में अनर्गल पोस्ट लिखने में लगा रहे हैं उतना समय अगर किसी अच्छे विषय पर या अपनी दिनचर्या से कोई एक अच्छा सा पल लिखने में लगाते तो शायद उससे पाठक ज्यादा आकर्षित होते। परंतु कैसे स्टॉर ब्लॉगर बनें और कैसे ब्लॉगरों की टाँग खींचे ये सब प्रपंच कोई इन विकृत मानसिकता वाले ब्लॉगर्स से सीखें।

    अपन तो अपने में ही मगन हैं, किसी की दो और दो चार में अपना कोई योगदान नहीं है, फ़िर भले ही वे दो और दो पाँच ही क्यों हो रहे हों, पर फ़िर भी पढ़े लिखों की विकृत मानसिकता नहीं देखते बनती। इससे अच्छा है कि … (अब भला मैं ये क्यों लिखूँ, वे खुद ही समझ लें।)

इंडिब्लॉगर मीट बैंगलोर ब्लॉगरों की ताकत – 2 (IndiBlogger.in Meet Bangalore – 2)

इंडिब्लॉगर मीट बैंगलोर ब्लॉगरों की ताकत (IndiBlogger.in Meet Bangalore)

दोपहर के भोजन के बाद सभी ब्लॉगर्स इस्कॉन मंदिर के फ़ोटो लेने में लग गये, वैसे एक बात गौर करने लायक थी कि लगभग सभी ब्लॉगर्स के पास DSLR कैमरे थे, कुछ फ़ोटो ब्लॉगर्स भी थे, जो पूरी ब्लॉगर मीट के दौरान फ़ोटो खींचने में ही व्यस्त रहे।

श्री मधु दास     अक्षयपात्र फ़ाऊँडेशन के चैयरमेन श्री मधु दास हमारे सम्मुख थे, और उन्होंने ब्लॉगर्स के योगदान को सराहा और लोगों को इस बारे में बताने के लिये अपने ब्लॉग पर लिखने की अपील की। ब्लॉगर्स के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

    सभी ब्लॉगर्स वापिस से MVT हॉल में आ चुके थे, फ़िर शुरु हुआ एक दूसरे को टिप्पणी देने का सिलसिला, सभी को एक ड्राँईंग शीट अपनी पीठ पर लगाने को दे दी गई, और जैसे हम ब्लॉग पर टिप्पणी देते हैं, वैसे ही एक दूसरे से मिलकर, कैसा लगा और अपने ब्लॉग का पता साझा करने के लिये यह दौर बनाया गया था। बहुत सारे ब्लॉगर्स से मुलाकात हुई, जिसमॆं भारतीय भाषा के एक और ब्लॉगर से मिले जो कि कन्न्ड़ में ब्लॉग लिखते हैं। हमने ब्लॉगर्स को बताया कि हम हिन्दी में ब्लॉग लिखते हैं, तो सबने बहुत सराहा। प्रतिक्रियाएँ भी आई कि हिन्दी कम्प्यूटर पर लिखना क्या इतना आसान है ? हिन्दी में लिखने के कारण फ़िर तो आपके पाठक और पेजलोड भी ज्यादा होंगे इत्यादि बातें हुईं। कुछ ब्लॉगर्स ने बताया कि हिन्दी पढ़ना उन्हें अच्छा लगता है परंतु हिन्दी में यहाँ ज्यादा कुछ उपलब्ध नहीं है, उन्होंने वादा किया कि अब हम हिन्दी ब्लॉग पढ़ा करेंगे, उन्होंने बताया कि हम तो हिन्दी को केवल हिन्दी दिवस के कारण ही जानते हैं, क्योंकि तब विद्यालय में कार्यक्रम होते थे। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि हिन्दी दिवस पर आप लोग तो उत्सव मनाते होंगे, कुछ विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित होते होंगे, हमने उन्हें बताया कि हिन्दी लिखने वालों के लिये तो रोज ही हिन्दी दिवस है, पर हिन्दी दिवस पर बहुत सारे साहित्यिक आयोजन किये जाते हैं।

    बहुत सारी टिप्पणियाँ लेने और देने के बाद पूछा गया कि सबसे ज्यादा टिप्पणियाँ किसके पास हैं, और इस प्रकार ज्यादा टिप्पणी पाने वालों को अक्षयपात्र फ़ाऊँडेशन ने बच्चों की तस्वीरें उपहार स्वरूप प्रदान की।

    टिप्पणियों के दौर के बाद अब था बहस का दौर, जिसमें चार समूहों में सारे ब्लॉगर्स को बाँटा गया, पहला समूह मोबाईल ब्लॉगिंग और टिप्स, दूसरा समूह ऑनलाईन उत्पीड़न online harassment, तीसरा समूह ब्लॉग के सामाजिक दायित्व और चौथा समूह इंडिब्लॉगर के बारे में जानकारी का था।

    इसके बाद आखिरी दौर था इंडिब्लॉगर की टीशर्ट वितरण का जिसमें सभी को अपने साईज के अनुसार टीशर्टें दी गई।

    फ़िर वापिस से दिन भर की इस मधुर ब्लॉगर मीट के बाद हम लौट चले अपने घर की ओर..

नववर्ष के कैलेण्डर और डायरी… (New Year Calendars and Diary)

    दिसंबर लगते ही नववर्ष की चहल पहल शुरु हो जाती है, और साथ ही नववर्ष के कैलेण्डर और डायरी का इंतजार भी ।

    किसी जमाने में हमारे पास कैलेण्डर और डायरी का अंबार लग जाता था, लोग अपने आप खुद से ही या तो घर पर दे जाते थे, या फ़िर बुला बुलाकर देते थे, हम खुद को बहुत ही गर्वान्वित महसूस करते थे, इन कागज की चीजों को पाकर और अपने अहम को संतुष्ट कर लेते थे।

Calendar-2011-New-Year diary

    अब समय के साथ इतना बड़ा अंतर आ गया है कि लोग हमसे इन कागज के कैलेण्डर और डायरी की उम्मीदें करते हैं, हमारे पास होती नहीं है यह अलग बात है। इन कागज की चीजों के तो हम मोहताज ही हो गये हैं, अब उनकी जगह लेपटॉप ने ले ली है।

    पहले हम डायरी लिखा करते थे, अब ब्लॉग लिखते हैं। डायरी में बहुत सारी चीजें ऐसी होती थीं जो कि बेहद निजी होती थीं और उस तक केवल अपनी पहुँच होती थी, पर अब ब्लॉग पर लिखे विचार सभी पढ़ते हैं, निजी विचार भी लिखना चाहते हैं, पर अब डायरी में नहीं लिखना चाहते हैं, वैसे ही सभी लोग कागज को बचाने का उपदेश देते रहते हैं, भले ही खुद कागज का कितना ही दुरुपयोग कर रहे हों।

    यह विषय संभवत: मुझे कल ऑफ़िस से आते समय बस में मिला, कोई नववर्ष के कैलेण्डर लेकर जा रहा था, तो हमें अपने पुराने दिन याद आ गये और बस कागज की टीस निकल गई।

    अब तो हमारे पास एक ही पांचांग होता है लाला रामस्वरूप का पांचांग, कैलेण्डर नहीं, और डायरी अब विन्डोस लाईव राईटर है। पहले इतने कैलेण्डर होते थे कि कई बार तो दीवालों पर नई कीलें ठोंकनी पड़ती थीं, अब वही कीलें हमें याद करती होंगी कि पहले तो कैलेण्डर के लिये ठोंक दिया और अब हम खाली लगी हुई हैं, क्योंकि कील ऐसी चीज है जो हम ठोक तो देते हैं, पर निकालते नहीं हैं। बिल्कुल यह एक हरे जख्म जैसी होती है, जो हमेशा टीस देती रहती है।

    अब हम बहुत कम कीलें ठोंकते हैं, जरुरत हो तो भी पहले अपनी जरुरतें कम कर लेते हैं, परंतु कीलों को सोचने पर मजबूर नहीं करना चाहते ।

    रही डायरी की बात तो हमने जितनी डायरी लिखी थीं जिसमें हमारी कविताओं की भी डायरी थी, तो जब हम कार्य के लिये घर से बाहर गये हुए थे तो साफ़ सफ़ाई में हमारी डायरी से रद्दी के पैसे आ गये, अब रद्दी वाले भी इतने आते थे कि कौन से रद्दी वाले को पकड़ें, यही समझ में नहीं आया। इसलिये सालों तक हमने उस गम में कविता नहीं लिखी फ़िर सालों बाद लिखना शूरु की, कम से कम अब तो ये रद्दी में कोई बेच नहीं पायेगा।

तो हे नववर्ष अब कभी भी तुम्हारे आने से कैलेण्डर और डायरी का इंतजार नहीं रहेगा।

क्या ५० वर्ष की उम्र के बाद जीवन बीमा करवाना चाहिये..? (Life Insurance required after 50 …?)

क्या ५० वर्ष की उम्र के बाद जीवन बीमा करवाना चाहिये..?

यह एक आम प्रश्न नहीं है, अक्सर प्रश्न होता है “५० वर्ष के बाद मुझे कौन सा जीवन बीमा करवाना चाहिये”, पर उसके पहले हमें यह समझना होगा कि क्या ५० वर्ष की उम्र के बाद जीवन बीमा करवाना चाहिये और अगर करवाना चाहिये तो कितना करवाना चाहिये ?

इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिये पहले जीवन बीमा क्यों करवाना चाहिये यह समझना होगा।

जीवन बीमा लिया जाता है आश्रितों की आर्थिक सुरक्षा के लिये, जिससे अगर बीमित व्यक्ति जो कि घर चलाने वाला भी होता है वह परिवार का साथ बीम में ही छोड़ जाये, साधारण शब्दों में उसकी मृत्यु हो जाये, तो आश्रित परिवार उसके बीमित धन से अपनी आगामी जिंदगी उसी प्रकार के जीवन स्तर पर जी सके।

अब एक उदाहरण लेते हैं, रमेश की उम्र है २१ वर्ष और अभी अभी उसकी अच्छी नौकरी लगी है, अब आयकर में बचत के लिये वह जीवनबीमा लेना चाहता है, उसने मुझसे पूछा कि कौन सा जीवनबीमा लेना चाहिये, तो सबसे पहला मेरा प्रश्न था कि तुम पर कितने आश्रित लोग हैं, वह ठगा सा मेरा मुँह देखता रहा, और बोला कि “कोई नहीं”।

फ़िर मैंने कहा तुम्हें जीवन बीमा लेने की जरुरत ही क्या है, जीवन बीमा केवल और केवल उनके लिये होता है जिनके ऊपर परिवार आश्रित होता है।

तो उसका अगला प्रश्न था  “मुझे बीमा कब लेना चाहिये ?”

मेरा जबाब था “जब शादी हो जाये तब, जब तुम्हारे बच्चे हो जायें तो उस बीमे का वापिस से मूल्यांकन करके जीवन बीमित राशि और ज्यादा करनी चाहिये”

जीवन बीमा में आपकी बीमा राशि कितनी हो यह उम्र के पड़ाव पर निर्भर करता है, बीमित राशि ज्यादा होना चाहिये जवान होने पर और जैसे जैसे आपके जीवन में स्थिरता आती जाती है, आप अपने वित्तीय लक्ष्य पूरे करते जाते हैं, आपको अपने बीमित राशि को कम करते जाना चाहिये।

किरण की उम्र २५ वर्ष है और अभी नई नई शादी हुई है, उसकी नववधु के लिये अब किरण जिम्मेदार हो गया है, उसको आर्थिक सुरक्षा के लिये अब तुरंत ही जीवन बीमा लेना चाहिये, और इतनी राशि का लेना चाहिये कि अगर आज उसकी मृत्यु भी हो जाये तो उसकी पत्नी उस बीमित धन से अपना पूर्ण जीवन निकाल सके।

जब बच्चे हो जायें तो जीवन बीमा का वापिस से मूल्यांकन करना चाहिये। और फ़िर जैसे जैसे आप जीवन में अपने वित्तीय लक्ष्य प्राप्त करते जायें वैसे वैसे बीमित राशि कम करते जायें। बीमित राशि २५ वर्ष के नौजवान की और ५० वर्ष के व्यक्ति की एक समान नहीं हो सकती। क्योंकि २५ वर्ष की उम्र में व्यक्ति अपना जीवन शुरु करता है, उसके पास कोई बचत नहीं होती और यहाँ वह अपना वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करता है। जबकि ५० वर्ष की उम्र में व्यक्ति अपने कई वित्तीय लक्ष्य प्राप्त कर चुका होता है, जैसे कि कार, घर और अच्छी बचत अपनी सेवानिवृत्ति के लिये, ५० वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति बहुत ही अच्छी वित्तीय अवस्था में होता है, उसका जितना वित्तीय लक्ष्य पूर्ण नहीं हुआ है और जितनी जिम्मेदारी बाकी है, केवल उतना ही जीवन बीमा करवाना चाहिये। और यह हर व्यक्ति का अलग अलग हो सकता है।

इंडिब्लॉगर मीट बैंगलोर ब्लॉगरों की ताकत (IndiBlogger.in Meet Bangalore)

    इंडिबस हमारे रूट पर नहीं आई तो हम इंडिब्लॉगर मीट में शिरकत करने बैंगलोर के बस परिवहन से इस्कॉन मंदिर पहुंचे। आयोजन एमवीटी (Multi Vision Theatre) में था और अक्षयपात्र एनजीओ जो कि इस्कॉन चलाता है,के द्वारा प्रायोजित था। अक्षयपात्र अभी लगभग १२ लाख से ज्यादा बच्चों को दोपहर का भोजन स्कूल में शिक्षा के लिये देता है, जिससे शिक्षा के लिये गरीब बच्चे प्रोत्साहित हों।

    अक्षयपात्र वर्ष २००० में शुरु हुआ था, और करीब १५०० बच्चों को खाना प्रायोजित करने से शुरुआत की थी, वर्ष २०२० तक अक्षयपात्र यह संख्या ५० लाख पहुंचाना चाहता है, और यह भारत का सबसे बड़ा एनजीओ है, कुछ दिनों पहले ही अक्षयपात्र के लिये इंडिब्लॉगर पर प्रतियोगिता थी, जिसमें लगभग १८० ब्लॉगरों ने भाग लिया था, जिससे अक्षयपात्र की वेबसाईट पर बहुत ट्रॉफ़िक बड़ गया और उन्होंने ब्लॉगरों के जरिये अपनी बात जन जन तक पहुंचाने की कोशिश की है। पहले एक महीने में अक्षयपात्र की वेबसाईट पर करीबन १५०० नये लोग आते थे, पर इंडिब्लॉगर पर प्रतियोगिता के बाद अब लगभग रोज ही ४००० नये लोग उनकी वेबसाईट देखते हैं।

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    इंडिब्लॉगर मीट का समय अपराह्न १२.३० से ४.३० तय किया गया था, पर दोनों इंडिबसें अपने निर्धारित समय से करीब एक घंटा देरी से आने के कारण मीट लगभग १.३० बजे शुरु की गई, अक्षयपात्र के स्वयंसेवकों ने व्यवस्था बहुत ही अच्छे से संभाली हुई थी, अक्षयपात्र का काऊँटर सर्वप्रथम था और वहाँ पर अक्षयपात्र के बारे में जानकारी उपलब्ध करवायी जा रही थी साथ ही एक बैज भी दिया जा रहा था “I Support Akshaypatra Foundation”| ब्लॉगरों के लिये स्वागत पेय और नाश्ता (समोसे) थे, और अंदर हॉल में प्रवेश करते ही इंडिब्लॉगर का काऊँटर था जहाँ तीन लेपटॉप रखे थे, वहाँ अपना पंजीकृत ईमेल आई.डी. लिखना था जिससे पता चले कि आप इंडिब्लॉगर के सदस्य हैं, हॉल में वाईफ़ाई भी उपलब्ध था, करीब हर दूसरा ब्लॉगर अपना लेपटॉप खोलकर बैठा था, और अपने आसपास वाले ब्लॉगरों से मिल रहा था।

    इंडिब्लॉगर से अनूप माईक पर थे और मीट की शुरुआत में उन्होंने इस्कॉन के वाईस प्रेसीडेन्ट चंचलपति दास से मुखतिब करवाया, चंचलपति दास ने अक्षयपात्र के बारे में बताया और ब्लॉगरों को अक्षयपात्र के लिये लिखने के लिये प्रोत्साहित किया।

    फ़िर शुरु हुआ हॉल ऑफ़ द फ़ेम ३० सेकण्ड का चक्र जिसमें कम्प्यूटर के द्वारा चुने गये ६० ब्लॉगरों को अपना परिचय देना था, सभी ब्लॉगरों का परिचय बहुत मुश्किल था क्योंकि लगभग ३०० ब्लॉगर वहाँ पर उपस्थित थे।

    एक ब्लॉगर जो कि पहले ५ वर्षों तक सॉफ़्टवेयर में नौकरी करते थे, फ़िर दुनिया घूमने के लिये नौकरी छोड़कर अपना शौक पूरा करने निकल पड़े और एक वर्ष में लगभग ११ देश घूम आये और अंतत: धन खत्म होते ही वापिस लौट गये और अब फ़िर से नौकरी की तलाश में हैं, ब्लॉग का नाम भी अच्छा लगा – गूगीगोसग्लोबल |

    एक अन्य ब्लॉगर थे जो कि कविताएँ लिखते हैं तो उन्होंने अपने ब्लॉग पर मल्लिका सेहरावत पर कविता लिखी थी, और काफ़ी चर्चित भी हुई थी, और उन्हें मल्लिका सेहरावत का फ़ोन भी आया था, पूरा हॉल सीटियों से गूँज उठा था।

    एक ब्लॉगर थे अगड़मबगड़म उन्होंने कहा कि मेरे दोस्त मेरी बातें नहीं सुनते थे तो ब्लॉग लिखना शुरु कर दिया अब उन्हें कई लोग पढ़ते हैं।

    हॉल ऑफ़ फ़ेम के बाद हुआ भोजन का दौर, भोजन अक्षयपात्र स्कूल के बच्चों को दोपहर में उपलब्ध करवाता है, भोजन में चावल का एक नमकीन व्यंजन एक मीठा व्यंजन और चिवड़ा था, बहुत ही स्वादिष्ट भोजन था।

जारी..