जब आप निवेश करते हैं, तो उसे सरल ही रखें। वही करें जो बिल्कुल सरल और स्पष्ट है, बफ़ेट सलाह देते हैं – जटिल प्रश्नों के लिये जटिल उत्तर देने की कोशिश मत करिये।
| जिस व्यापार को आप नहीं समझते हैं, उसमें कभी भी निवेश न करें। |
जब आप निवेश करते हैं, तो उसे सरल ही रखें। वही करें जो बिल्कुल सरल और स्पष्ट है, बफ़ेट सलाह देते हैं – जटिल प्रश्नों के लिये जटिल उत्तर देने की कोशिश मत करिये।
| जिस व्यापार को आप नहीं समझते हैं, उसमें कभी भी निवेश न करें। |
आदतन आज सुबह नित्यकर्म के पहले घर का दरवाजा खोला, अखबार के लिये और जैसा कि रोज होता है अखबार नहीं आया। आदत है तब भी रोज देखने की आत्मसंतुष्टि के लिये, तो छज्जे पर थोड़ा सा बाहर निकल कर देख लिया, वहाँ किसी के सिसक सिसक कर रोने की आवाज आ रही थी, थोड़ा ध्यान से देखा तो वहीं बिजली के खंभे के पास तिरंगे में लिपटा गणतंत्र था जो कि शायद कोहरा घना होने का इंतजार कर रहा था।
मैं चुपचाप अंदर अपने घर में आ गया, कि कहीं गणतंत्र मेरे पास आकर मेरे पास आकर रोना ना सुनाना शुरु कर दे, मेरी घिग्घी बँधी हुई है, और गणतंत्र के सिसक सिसक कर रोने के कारणों के बारे में सोच रहा हूँ, अगर आप को पता चले कि भारत का बूढ़ा गणतंत्र क्यों सिसक सिसक कर रो रहा है.. तो मुझे अवश्य बताईये।
“प्रविसे नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कौसलपुर राजा…।”
“देखो… मैं अपने पापा के यहाँ स्वतंत्र विचारों से पली-बढ़ी हूँ। मुझे ये दकियानूसी तरीके ठीक नहीं लगते।”
आज की ताजा खबर बैंगलोर में ४ ब्लॉगर्स और एक पाठक का मिलन हुआ ।
४ ब्लॉगर थे –
देव कुमार झा
मनीषा जी
विवेक रस्तोगी
हर्ष रस्तोगी
१ पाठक – हमारी धर्मपत्नी वाणी
बहुत सारे ज्वलंत मुद्दों पर बातें हुईं, और सौहार्दपूर्ण तरीके से बैंगलोर में ब्लॉगर मिलन संपन्न हुआ।
ज्वलंत मुद्दों में शामिल थे –
भाजपा द्वारा कर्नाटक बंद और आम जनता की तकलीफ़
भ्रष्टाचार
मुंबई
उड़नतश्तरी समीर लाल जी की कृति – “देख लूँ तो चलूँ”
दक्षिण भारत में हिन्दी
ए.टी.एम. से पैसे निकालने में हुई गड़बड़ी
ब्लॉग वार्ता
जिन ब्लॉगर्स का जिक्र हुआ इस छोटे से मिलन में वे हैं –
उड़नतश्तरी समीर लाल जी, घुघुती बासुती जी, प्रवीण पाण्डे जी, प्रशांत प्रियदर्शी जी PD, अभिषेक कुमार।
फ़ोटो कल देवकुमार झा जी द्वारा प्रकाशित किया जायेगा तब इस पोस्ट में भी लगा देंगे 🙂
विकृत मानसिकता जिसे मैं साधारण शब्दों में कहता हूँ मानसिक दिवालियापन या पागलपन, वैसे विकृत मानसिकता के लिये कोई अधिकृत पैमाना नहीं है, अनपढ़ और पढ़ेलिखे समझदार कोई भी हो जरूरी नहीं है कि उनकी मानसिकता विकृत नहीं हो।
और ऐसे ही कुछ उदाहरण मैंने हिन्दी ब्लॉगजगत में देखे पोस्ट पढ़कर पहली बार में ही विकृत मानसिकता का दर्जा मैंने दे दिया। अब यहाँ ब्लॉगर भी बहुत पढ़े लिखे हैं, और जिनके पास बड़ी बड़ी डिग्री है, वे हिन्दी ब्लॉगिंग की प्रगति में महति योगदान निभाने में अपनी जीवन ऊर्जा लगा रहे हैं। धन्य हैं वे ब्लॉगवीर और वीरांगनाएँ जो यह सोचते हैं कि वे हिन्दी लिख रहे हैं तो हिन्दी समृद्ध हो रही है, वाह ब्लॉगरी विकृत मानसिकता।
जितना समय दूसरे ब्लॉगर की टांग खींचने उनकी टिप्पणियों में अनर्गल पोस्ट लिखने में लगा रहे हैं उतना समय अगर किसी अच्छे विषय पर या अपनी दिनचर्या से कोई एक अच्छा सा पल लिखने में लगाते तो शायद उससे पाठक ज्यादा आकर्षित होते। परंतु कैसे स्टॉर ब्लॉगर बनें और कैसे ब्लॉगरों की टाँग खींचे ये सब प्रपंच कोई इन विकृत मानसिकता वाले ब्लॉगर्स से सीखें।
अपन तो अपने में ही मगन हैं, किसी की दो और दो चार में अपना कोई योगदान नहीं है, फ़िर भले ही वे दो और दो पाँच ही क्यों हो रहे हों, पर फ़िर भी पढ़े लिखों की विकृत मानसिकता नहीं देखते बनती। इससे अच्छा है कि … (अब भला मैं ये क्यों लिखूँ, वे खुद ही समझ लें।)
दोपहर के भोजन के बाद सभी ब्लॉगर्स इस्कॉन मंदिर के फ़ोटो लेने में लग गये, वैसे एक बात गौर करने लायक थी कि लगभग सभी ब्लॉगर्स के पास DSLR कैमरे थे, कुछ फ़ोटो ब्लॉगर्स भी थे, जो पूरी ब्लॉगर मीट के दौरान फ़ोटो खींचने में ही व्यस्त रहे।
अक्षयपात्र फ़ाऊँडेशन के चैयरमेन श्री मधु दास हमारे सम्मुख थे, और उन्होंने ब्लॉगर्स के योगदान को सराहा और लोगों को इस बारे में बताने के लिये अपने ब्लॉग पर लिखने की अपील की। ब्लॉगर्स के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।
सभी ब्लॉगर्स वापिस से MVT हॉल में आ चुके थे, फ़िर शुरु हुआ एक दूसरे को टिप्पणी देने का सिलसिला, सभी को एक ड्राँईंग शीट अपनी पीठ पर लगाने को दे दी गई, और जैसे हम ब्लॉग पर टिप्पणी देते हैं, वैसे ही एक दूसरे से मिलकर, कैसा लगा और अपने ब्लॉग का पता साझा करने के लिये यह दौर बनाया गया था। बहुत सारे ब्लॉगर्स से मुलाकात हुई, जिसमॆं भारतीय भाषा के एक और ब्लॉगर से मिले जो कि कन्न्ड़ में ब्लॉग लिखते हैं। हमने ब्लॉगर्स को बताया कि हम हिन्दी में ब्लॉग लिखते हैं, तो सबने बहुत सराहा। प्रतिक्रियाएँ भी आई कि हिन्दी कम्प्यूटर पर लिखना क्या इतना आसान है ? हिन्दी में लिखने के कारण फ़िर तो आपके पाठक और पेजलोड भी ज्यादा होंगे इत्यादि बातें हुईं। कुछ ब्लॉगर्स ने बताया कि हिन्दी पढ़ना उन्हें अच्छा लगता है परंतु हिन्दी में यहाँ ज्यादा कुछ उपलब्ध नहीं है, उन्होंने वादा किया कि अब हम हिन्दी ब्लॉग पढ़ा करेंगे, उन्होंने बताया कि हम तो हिन्दी को केवल हिन्दी दिवस के कारण ही जानते हैं, क्योंकि तब विद्यालय में कार्यक्रम होते थे। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि हिन्दी दिवस पर आप लोग तो उत्सव मनाते होंगे, कुछ विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित होते होंगे, हमने उन्हें बताया कि हिन्दी लिखने वालों के लिये तो रोज ही हिन्दी दिवस है, पर हिन्दी दिवस पर बहुत सारे साहित्यिक आयोजन किये जाते हैं।
बहुत सारी टिप्पणियाँ लेने और देने के बाद पूछा गया कि सबसे ज्यादा टिप्पणियाँ किसके पास हैं, और इस प्रकार ज्यादा टिप्पणी पाने वालों को अक्षयपात्र फ़ाऊँडेशन ने बच्चों की तस्वीरें उपहार स्वरूप प्रदान की।
टिप्पणियों के दौर के बाद अब था बहस का दौर, जिसमें चार समूहों में सारे ब्लॉगर्स को बाँटा गया, पहला समूह मोबाईल ब्लॉगिंग और टिप्स, दूसरा समूह ऑनलाईन उत्पीड़न online harassment, तीसरा समूह ब्लॉग के सामाजिक दायित्व और चौथा समूह इंडिब्लॉगर के बारे में जानकारी का था।
इसके बाद आखिरी दौर था इंडिब्लॉगर की टीशर्ट वितरण का जिसमें सभी को अपने साईज के अनुसार टीशर्टें दी गई।
फ़िर वापिस से दिन भर की इस मधुर ब्लॉगर मीट के बाद हम लौट चले अपने घर की ओर..
दिसंबर लगते ही नववर्ष की चहल पहल शुरु हो जाती है, और साथ ही नववर्ष के कैलेण्डर और डायरी का इंतजार भी ।
किसी जमाने में हमारे पास कैलेण्डर और डायरी का अंबार लग जाता था, लोग अपने आप खुद से ही या तो घर पर दे जाते थे, या फ़िर बुला बुलाकर देते थे, हम खुद को बहुत ही गर्वान्वित महसूस करते थे, इन कागज की चीजों को पाकर और अपने अहम को संतुष्ट कर लेते थे।
अब समय के साथ इतना बड़ा अंतर आ गया है कि लोग हमसे इन कागज के कैलेण्डर और डायरी की उम्मीदें करते हैं, हमारे पास होती नहीं है यह अलग बात है। इन कागज की चीजों के तो हम मोहताज ही हो गये हैं, अब उनकी जगह लेपटॉप ने ले ली है।
पहले हम डायरी लिखा करते थे, अब ब्लॉग लिखते हैं। डायरी में बहुत सारी चीजें ऐसी होती थीं जो कि बेहद निजी होती थीं और उस तक केवल अपनी पहुँच होती थी, पर अब ब्लॉग पर लिखे विचार सभी पढ़ते हैं, निजी विचार भी लिखना चाहते हैं, पर अब डायरी में नहीं लिखना चाहते हैं, वैसे ही सभी लोग कागज को बचाने का उपदेश देते रहते हैं, भले ही खुद कागज का कितना ही दुरुपयोग कर रहे हों।
यह विषय संभवत: मुझे कल ऑफ़िस से आते समय बस में मिला, कोई नववर्ष के कैलेण्डर लेकर जा रहा था, तो हमें अपने पुराने दिन याद आ गये और बस कागज की टीस निकल गई।
अब तो हमारे पास एक ही पांचांग होता है लाला रामस्वरूप का पांचांग, कैलेण्डर नहीं, और डायरी अब विन्डोस लाईव राईटर है। पहले इतने कैलेण्डर होते थे कि कई बार तो दीवालों पर नई कीलें ठोंकनी पड़ती थीं, अब वही कीलें हमें याद करती होंगी कि पहले तो कैलेण्डर के लिये ठोंक दिया और अब हम खाली लगी हुई हैं, क्योंकि कील ऐसी चीज है जो हम ठोक तो देते हैं, पर निकालते नहीं हैं। बिल्कुल यह एक हरे जख्म जैसी होती है, जो हमेशा टीस देती रहती है।
अब हम बहुत कम कीलें ठोंकते हैं, जरुरत हो तो भी पहले अपनी जरुरतें कम कर लेते हैं, परंतु कीलों को सोचने पर मजबूर नहीं करना चाहते ।
रही डायरी की बात तो हमने जितनी डायरी लिखी थीं जिसमें हमारी कविताओं की भी डायरी थी, तो जब हम कार्य के लिये घर से बाहर गये हुए थे तो साफ़ सफ़ाई में हमारी डायरी से रद्दी के पैसे आ गये, अब रद्दी वाले भी इतने आते थे कि कौन से रद्दी वाले को पकड़ें, यही समझ में नहीं आया। इसलिये सालों तक हमने उस गम में कविता नहीं लिखी फ़िर सालों बाद लिखना शूरु की, कम से कम अब तो ये रद्दी में कोई बेच नहीं पायेगा।
तो हे नववर्ष अब कभी भी तुम्हारे आने से कैलेण्डर और डायरी का इंतजार नहीं रहेगा।
क्या ५० वर्ष की उम्र के बाद जीवन बीमा करवाना चाहिये..?
यह एक आम प्रश्न नहीं है, अक्सर प्रश्न होता है “५० वर्ष के बाद मुझे कौन सा जीवन बीमा करवाना चाहिये”, पर उसके पहले हमें यह समझना होगा कि क्या ५० वर्ष की उम्र के बाद जीवन बीमा करवाना चाहिये और अगर करवाना चाहिये तो कितना करवाना चाहिये ?
इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिये पहले जीवन बीमा क्यों करवाना चाहिये यह समझना होगा।
जीवन बीमा लिया जाता है आश्रितों की आर्थिक सुरक्षा के लिये, जिससे अगर बीमित व्यक्ति जो कि घर चलाने वाला भी होता है वह परिवार का साथ बीम में ही छोड़ जाये, साधारण शब्दों में उसकी मृत्यु हो जाये, तो आश्रित परिवार उसके बीमित धन से अपनी आगामी जिंदगी उसी प्रकार के जीवन स्तर पर जी सके।
अब एक उदाहरण लेते हैं, रमेश की उम्र है २१ वर्ष और अभी अभी उसकी अच्छी नौकरी लगी है, अब आयकर में बचत के लिये वह जीवनबीमा लेना चाहता है, उसने मुझसे पूछा कि कौन सा जीवनबीमा लेना चाहिये, तो सबसे पहला मेरा प्रश्न था कि तुम पर कितने आश्रित लोग हैं, वह ठगा सा मेरा मुँह देखता रहा, और बोला कि “कोई नहीं”।
फ़िर मैंने कहा तुम्हें जीवन बीमा लेने की जरुरत ही क्या है, जीवन बीमा केवल और केवल उनके लिये होता है जिनके ऊपर परिवार आश्रित होता है।
तो उसका अगला प्रश्न था “मुझे बीमा कब लेना चाहिये ?”
मेरा जबाब था “जब शादी हो जाये तब, जब तुम्हारे बच्चे हो जायें तो उस बीमे का वापिस से मूल्यांकन करके जीवन बीमित राशि और ज्यादा करनी चाहिये”
जीवन बीमा में आपकी बीमा राशि कितनी हो यह उम्र के पड़ाव पर निर्भर करता है, बीमित राशि ज्यादा होना चाहिये जवान होने पर और जैसे जैसे आपके जीवन में स्थिरता आती जाती है, आप अपने वित्तीय लक्ष्य पूरे करते जाते हैं, आपको अपने बीमित राशि को कम करते जाना चाहिये।
किरण की उम्र २५ वर्ष है और अभी नई नई शादी हुई है, उसकी नववधु के लिये अब किरण जिम्मेदार हो गया है, उसको आर्थिक सुरक्षा के लिये अब तुरंत ही जीवन बीमा लेना चाहिये, और इतनी राशि का लेना चाहिये कि अगर आज उसकी मृत्यु भी हो जाये तो उसकी पत्नी उस बीमित धन से अपना पूर्ण जीवन निकाल सके।
जब बच्चे हो जायें तो जीवन बीमा का वापिस से मूल्यांकन करना चाहिये। और फ़िर जैसे जैसे आप जीवन में अपने वित्तीय लक्ष्य प्राप्त करते जायें वैसे वैसे बीमित राशि कम करते जायें। बीमित राशि २५ वर्ष के नौजवान की और ५० वर्ष के व्यक्ति की एक समान नहीं हो सकती। क्योंकि २५ वर्ष की उम्र में व्यक्ति अपना जीवन शुरु करता है, उसके पास कोई बचत नहीं होती और यहाँ वह अपना वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करता है। जबकि ५० वर्ष की उम्र में व्यक्ति अपने कई वित्तीय लक्ष्य प्राप्त कर चुका होता है, जैसे कि कार, घर और अच्छी बचत अपनी सेवानिवृत्ति के लिये, ५० वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति बहुत ही अच्छी वित्तीय अवस्था में होता है, उसका जितना वित्तीय लक्ष्य पूर्ण नहीं हुआ है और जितनी जिम्मेदारी बाकी है, केवल उतना ही जीवन बीमा करवाना चाहिये। और यह हर व्यक्ति का अलग अलग हो सकता है।
इंडिबस हमारे रूट पर नहीं आई तो हम इंडिब्लॉगर मीट में शिरकत करने बैंगलोर के बस परिवहन से इस्कॉन मंदिर पहुंचे। आयोजन एमवीटी (Multi Vision Theatre) में था और अक्षयपात्र एनजीओ जो कि इस्कॉन चलाता है,के द्वारा प्रायोजित था। अक्षयपात्र अभी लगभग १२ लाख से ज्यादा बच्चों को दोपहर का भोजन स्कूल में शिक्षा के लिये देता है, जिससे शिक्षा के लिये गरीब बच्चे प्रोत्साहित हों।
अक्षयपात्र वर्ष २००० में शुरु हुआ था, और करीब १५०० बच्चों को खाना प्रायोजित करने से शुरुआत की थी, वर्ष २०२० तक अक्षयपात्र यह संख्या ५० लाख पहुंचाना चाहता है, और यह भारत का सबसे बड़ा एनजीओ है, कुछ दिनों पहले ही अक्षयपात्र के लिये इंडिब्लॉगर पर प्रतियोगिता थी, जिसमें लगभग १८० ब्लॉगरों ने भाग लिया था, जिससे अक्षयपात्र की वेबसाईट पर बहुत ट्रॉफ़िक बड़ गया और उन्होंने ब्लॉगरों के जरिये अपनी बात जन जन तक पहुंचाने की कोशिश की है। पहले एक महीने में अक्षयपात्र की वेबसाईट पर करीबन १५०० नये लोग आते थे, पर इंडिब्लॉगर पर प्रतियोगिता के बाद अब लगभग रोज ही ४००० नये लोग उनकी वेबसाईट देखते हैं।
इंडिब्लॉगर मीट का समय अपराह्न १२.३० से ४.३० तय किया गया था, पर दोनों इंडिबसें अपने निर्धारित समय से करीब एक घंटा देरी से आने के कारण मीट लगभग १.३० बजे शुरु की गई, अक्षयपात्र के स्वयंसेवकों ने व्यवस्था बहुत ही अच्छे से संभाली हुई थी, अक्षयपात्र का काऊँटर सर्वप्रथम था और वहाँ पर अक्षयपात्र के बारे में जानकारी उपलब्ध करवायी जा रही थी साथ ही एक बैज भी दिया जा रहा था “I Support Akshaypatra Foundation”| ब्लॉगरों के लिये स्वागत पेय और नाश्ता (समोसे) थे, और अंदर हॉल में प्रवेश करते ही इंडिब्लॉगर का काऊँटर था जहाँ तीन लेपटॉप रखे थे, वहाँ अपना पंजीकृत ईमेल आई.डी. लिखना था जिससे पता चले कि आप इंडिब्लॉगर के सदस्य हैं, हॉल में वाईफ़ाई भी उपलब्ध था, करीब हर दूसरा ब्लॉगर अपना लेपटॉप खोलकर बैठा था, और अपने आसपास वाले ब्लॉगरों से मिल रहा था।
इंडिब्लॉगर से अनूप माईक पर थे और मीट की शुरुआत में उन्होंने इस्कॉन के वाईस प्रेसीडेन्ट चंचलपति दास से मुखतिब करवाया, चंचलपति दास ने अक्षयपात्र के बारे में बताया और ब्लॉगरों को अक्षयपात्र के लिये लिखने के लिये प्रोत्साहित किया।
फ़िर शुरु हुआ हॉल ऑफ़ द फ़ेम ३० सेकण्ड का चक्र जिसमें कम्प्यूटर के द्वारा चुने गये ६० ब्लॉगरों को अपना परिचय देना था, सभी ब्लॉगरों का परिचय बहुत मुश्किल था क्योंकि लगभग ३०० ब्लॉगर वहाँ पर उपस्थित थे।
एक ब्लॉगर जो कि पहले ५ वर्षों तक सॉफ़्टवेयर में नौकरी करते थे, फ़िर दुनिया घूमने के लिये नौकरी छोड़कर अपना शौक पूरा करने निकल पड़े और एक वर्ष में लगभग ११ देश घूम आये और अंतत: धन खत्म होते ही वापिस लौट गये और अब फ़िर से नौकरी की तलाश में हैं, ब्लॉग का नाम भी अच्छा लगा – गूगीगोसग्लोबल |
एक अन्य ब्लॉगर थे जो कि कविताएँ लिखते हैं तो उन्होंने अपने ब्लॉग पर मल्लिका सेहरावत पर कविता लिखी थी, और काफ़ी चर्चित भी हुई थी, और उन्हें मल्लिका सेहरावत का फ़ोन भी आया था, पूरा हॉल सीटियों से गूँज उठा था।
एक ब्लॉगर थे अगड़मबगड़म उन्होंने कहा कि मेरे दोस्त मेरी बातें नहीं सुनते थे तो ब्लॉग लिखना शुरु कर दिया अब उन्हें कई लोग पढ़ते हैं।
हॉल ऑफ़ फ़ेम के बाद हुआ भोजन का दौर, भोजन अक्षयपात्र स्कूल के बच्चों को दोपहर में उपलब्ध करवाता है, भोजन में चावल का एक नमकीन व्यंजन एक मीठा व्यंजन और चिवड़ा था, बहुत ही स्वादिष्ट भोजन था।
जारी..