सेन्सेक्स चार्ट पर आधारित प्रवेश शर्मा जी का एक बेहतरीन ब्लॉग

              एक दिन में किसी ब्लॉग के सहारे या गूगल की खोज के सहारे इस ब्लॉग पर पहुँचा और मुझे बहुत अच्छा लगा। प्रवेश जी का विश्लेषण चार्ट पर आधारित है और मैं उनके ब्लॉग को बहुत समय से देख रहा हूँ, उनके इस विश्लेषण का आप भी लाभ उठा सकते हैं।

चटका लगाईये ।

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सभी ब्लॉगर्स बंधुओं से अनुरोध….

सभी ब्लॉगर्स बंधुओं से अनुरोध है कि “यथार्थ” को वोट दें, आपके सहयोग से वह सारेगामापा लिटिल चैम्प जीत सकता है।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३५

प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशो: – इस पर महिमसिंह गणी का कथन है कि – “कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रौ शेषकलामात्रस्य चन्द्रस्य दिड़्मुखे संभव:।” अर्थात कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को चन्द्रमा पूर्व क्षितिज में एक ही कला के रुप में रह जाता है। यहाँ यक्ष-पत्नी की सेज की पूर्व दिशा के क्षितिज

से और यक्ष-पत्नी की कलामात्र शेष चन्द्रमा की मूर्ति से तुलना की गयी है।


विरहमहतीम़् – युवक और युवतियों को अपने प्रथम मिलन के दिनों में दिन और रात क्षण-क्षण के समान छोटे दिखायी पड़ते हैं, किन्तु विरह की अवस्था में उन्हें दिन-रात पहाड़ की तरह विशाल प्रतीत होने लगते हैं। यक्षिणी की भी यही स्थिति है।

पूर्वप्रीत्या – काव्यों में, संयोगवस्था में जो चन्द्रमा प्रियजनों को सुख प्रदान करता है और विरहावस्था में वही चन्द्रमा कष्टप्रद होता है, ऐसा वर्णन अनेक स्थलों पर मिलता है। यक्ष का विचार है कि उसकी प्रिया जब अपने प्रियतम के साथ लेटती थी, उसी अनुभव के आधार पर बड़े उत्साह से उसकी प्रिया चन्द्रमा की किरणों पर दृष्टि डालेगी, किन्तु विरह के कारण वह किरणें दु:ख प्रदान करने वाली होंगी; इसलिए वह उन पर से दृष्टि हटा लेगी।

शुद्धस्नानात़् – यहाँ शुद्ध स्नान से अभिप्राय तैल आदि सुगन्धित द्रव्यों से रहित, उबटन आदि से रहित स्नान से है; क्योंकि वह प्रोषितभर्तृका है, इसलिए पूज आदि करने से पूर्व साधारण स्नान ही कर सकती थी; क्योंकि उसे प्रसाधन का निषेध था।

मत्संभोग – यक्षिणी का प्रियतम उससे दूर है; अत: उससे साक्षात़् संभोग तो सम्भव नहीं है इसलिये यह सोचकर कि उससे स्वप्न में ही संभोग सम्भव हो जाये, इसी विचार से नींद लेने का प्रयास कर रही है, किन्तु आँखों में आँसू आ जाने के कारण निद्रा का अवसर नहीं मिलता।

मयोद्वेष्टनीयाम़् – प्राचीन समय में यह प्रथा थी कि वियोग के अवसर पर पति अपनी पत्नी के बालों को एक वेणी में गूँथता था और वियोग के बाद वही उसे खोलता था।

स्पर्शक्लिष्टाम़् – प्रोषितभर्तृकाएँ जिस वेणी को विरह के दिन गूँथती थीं, उसमें तेलादि न लगाने के कारण वह शुष्क हो जाती थीं जो स्पर्श करने में कष्ट देती थी।

कठिनविषमाम़् – बहुत समय से प्रसाधन न करने के कारण वेणी कठोर और उलझ जाती थी। विषम का अर्थ ऊँचा नीचा होता है, किन्तु यहाँ इसका अर्थ उलझा हुआ अधिक उपयुक्त है।

अयमुतनखेन – प्रोषितभर्तृकाएँ क्योंकि विरहावस्था में प्रसाधन नहीं करती थीं; इसलिए नाखून भी नहीं काटे थे, जिससे यक्षिणी के नाखून लम्बे-लम्बे हो गये थे।

व्यापार करने का भारतीय तरीका (The Indian way of doing Business)

व्हाईट हाऊस की फ़ेन्स वायर को जोड़ने के ठेके के लिये तीन ठेकेदार आये, जिसमें एक जापान से, दूसरा भारत से और तीसरा चीन से था।

तीनों व्हाईट हाऊस की टूटी हुई फ़ेन्स वायर को देखने गये।

whitehouse

जापानी ठेकेदार ने अपना नाप लेने वाले फ़ीता निकाला और उससे कुछ नाप लेने लगा, उसके बाद पेन्सिल लेकर कुछ गणित करने लगा। फ़िर बोला “ठीक है” मैं इस काम को $900 में कर दूँगा। ($400 लगने वाले सामान के, $400 कारीगरों के, $100 मेरा लाभ)

फ़िर चीन के ठेकेदार ने भी उसी तरह से सब नापजोख किया और बोला कि मैं यह काम $700 में कर दूँगा। ($300 लगने वाले सामान के, $300 कारीगरों के, $100 मेरा लाभ)

भारतीय ठेकेदार ने बिना नापजोख किये फ़िर व्हाईट हाऊस के अधिकारी की तरफ़ देखकर बोला “$2700”।

उस अधिकारी को बहुत आश़्चर्य हुआ और बोला कि तुमने इन लोगों की तरह कुछ नापा भी नहीं और कुछ गणित भी नहीं किया फ़िर तुमने ये हिसाब कैसे किया ?

भारतीय ठेकेदार ने चहककर बोला “$1000 मेरे, $1000 आपके, और इस चीन वाले को हम लोग फ़ेन्स वायर जोड़ने के लिये दे देंगे।”

सरकारी अधिकारी का जबाब था “ठीक है, ये ठेका आपका”।

कृपया सभी ब्लॉगर बंधु ऑनलाईन वोट करें “यथार्थ” जी लिटिल चेम्प प्रतियोगी के लिये

बनारस से यथार्थ रस्तोगी जी लिटिल चेम्प में भाग ले रहा है और जो लोग इस प्रोग्राम को देखते होंगे वे तो उसके हुनर से परिचित होंगे ही। इतनी सी उम्र में उसके गले का कमाल, उसकी सुरीली आवाज। आज और कल रात “जी लिटिल चेम्प” पर इसका प्रसारण है रात को ९.३० बजे। आप एक लोगिन से दो बार अपने वोट ऑनलाईन दे सकते हैं,  आप भी देखिये इस जूनियर मास्टर को और सहयोग करें जीतने में। टेलेन्ट तो उसमें बहुत है परंतु वोटिंग का भी उतना ही महत्व है। ज्यादा से ज्यादा वोटिंग करने की अपील करता हूँ।

यहाँ से अपना यूजर आईडी रजिस्टर करें और वोट करें “यथार्थ” के लिये। वोटिंग शुरु होगी आज रात याने २ अक्टूबर, १० बजे से सोमवार याने कि ५ अक्टूबर सुबह १० बजे तक।


सभी ब्लॉगर बंधुओं से सहयोग अपेक्षित है।
रस्तोगी समाज का होने के नाते मैं “यथार्थ” को वोटिंग करने के लिये सबसे जोरदार अपील करता हूँ। आपके एक वोट से वह नन्ही प्रतिभा जीत सकती है बस आप सबका आशीर्वाद चाहिये। आपके आशीर्वाद के इंतजार में लगे हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३४

ह्रदयनिहितारम्भम़् – यक्षिणी अकेले में बैठकर प्रिय के काल्पनिक सहवास से मन बहलाती थी। आचार्य मल्लिनाथ ने यहाँ आरम्भ का अर्थ कार्य किया है, जिसका अर्थ है कि यक्षिणी पति के साथ चुम्बन, अलि़ड़्गन आदि कार्य वाले रति सुख का आन्नद

ले रही है। काम की दश अवस्थायें मानी गयी हैं यहाँ कवि ने तीसरी अवस्था का उल्लेख किया है। यहाँ सड्कल्पावस्था  का वर्णन किया गया है।


सव्यापाराम़् – विरहिणी स्त्रियों का दिन तो किसी न किसी प्रकार काम आदि करते हुए व्यतीत हो जाता है, परन्तु रात्रि में कोई कार्य न होने के काराण उसे रात्रि व्यतीत करना कठिन हो जाता है।

सुखयितुम़् – वियोगिनियों को यदि प्रियतम का सन्देश प्राप्त हो जाये तो अत्यन्त सुख मिलता है।

अवनिशयनम़् – प्रोषितभर्तृका को सती धर्म का पालन करने के लिये पलंग पर सोने का निषेध होने से भूमि पर सोने का विधान है; अत: यक्षिणी भी पृथ्वी पर ही सोती है।
चौथी कामदशा जागरणावस्था होती है।

आधिक्षामाम़् – रोग दो प्रकार के बताये ग्ये हैं – आधि तथा व्याधि । आधि मानसिक तथा व्याधि शारीरिक रोग के लिये आता है, विरहिणी यक्षिणी आधि रोग से पीड़ित है; इसलिये यह अत्यन्त क्षीण हो गयी है।

संनिषण्णैकपार्श्वाम़् – प्राय: विरहिणी स्त्रियाँ रात्रि को करवट बदल-बदलकर व्यतीत करती हैं, किन्तु यक्षिणी एक करवट से पडी हुई रात्रि व्यतीत करती है। इसके दो कारण हो सकते हैं –

(१) यक्षिणी रात्रि में अपने प्रियतम के ध्यान में इतनी मग्न हो जाती है कि उसे अपने शारीरिक कष्ट का ध्यान नहीं रहता और वह करवट तक नहीं बदलती।

(२) वह विरह में इतनी दुर्बल हो गयी है कि करवट बदलने की सामर्थ्य ही उसमें नहीं रही हो; अत: सारी रात एक ही करवट से पड़ी रहती है।

स्वाइन फ़्लू पर एक मस्त कार्टून

आज ही ईमेल से स्वाइन फ़्लू पर एक मस्त कार्टून प्राप्त हुआ है आप भी देखिये –

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३३

भावगम्यम़् – यक्षिणी पत्नी-विरह से युक्त अपने पति की कृशता देख तो नहीं सकती थी, परन्तु अनुमान के द्वारा ही चित्र खींचा करती थी। संस्कृत साहित्य में विरह से पीड़ित के लिए विनोद के चार साधन वर्णित किये गये हैं – १. सदृश वस्तु का अनुभव, २. चित्रकर्म ३. स्वप्न

दर्शन, ४.प्रिय के अंग से स्पृष्ट पदार्थों का स्पर्श करना।


सारिका – प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं के यहाँ तथा कुलीन परिवारों में मनोरञ्ज्न आदि के लिये तोता, मैना, हंस आदि पक्षी पाले जाते थे और उनसे विरह काल में मनोरञ्जन होता था। यक्ष के यहाँ भी पालतू पक्षी थे और यक्ष विचार करता है कि उसकी प्रिया सारिका आदि के साथ बातें करके अपना समय व्यतीत करती होगी।

उद्रातुकामा – क्योंकि यक्ष-पत्नी देवयोनि की थी, इसलिये गान्धार ग्राम में गाने की इच्छा रखती थी, जबकि मनुष्य षड्ज या मध्यम ग्राम में गाते हैं। जैसा कि कहा है –
षड्जमध्यमनामानौ ग्रामौ गायन्ति मानवा:।
न तु गान्धारनामानं स लभ्यो देवयोनिभि:॥
स्वर भेद को ग्राम कहते हैं। ग्राम तीन प्रकार के होते हैं – षड्ज, मध्यम, गान्धार।

तन्त्रीमार्द्राम़् – यक्ष पत्नी कभी-कभी अपने प्रिय के नाम के चिह्नों से युक्त रचे हुए पदों के गाने की इच्छा करती होगी तथा वीणा बजाने के साथ उसे प्रियतम की स्मृति होती होगी जिस कारण आँसू आने से उसके तार भीग जाते होंगे।

मूर्च्छना – स्वरों के आरोह-अवरोह क्रम को मूर्च्छना कहते हैं। संगीतशास्त्र में सात स्वर माने गये हैं – षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। इन स्वरों तथा तीन ग्रामों के मेल से ये मूर्च्छना २१ प्रकार की होती है।

देहलीदत्तपुष्पै: – जिस दिन प्रियतम विदेश जाता है, उसी दिन नायिका देहली की पूजा करती है और वहाँ पुष्प रखती है कि मेरा प्रियतम इतने महीनों के लिये गया है। अत: मास बीतने पर एक पुष्प उठाकर दूसरी ओर रख देती है। उत्कण्ठा के क्षणों में वह पुष्पों को गिनती है कि अब आने के कितने महीने शेष रह गये हैं। यह वियोग के क्षणों में मन बहलाने का साधन है।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३२

गाढोत्कण्ठाम़् – विरह वेदना से उत्पन्न प्रिय या प्रिया से मिलन की उत्कट इच्छा ही उत्कण्ठा कहलाती है। उत्कण्ठा का लक्षण इस प्रकार है –
रागेष्वलब्धविषयेषु वेदना महती तु या।
संशोषणी तु गात्राणां तामुत्कण्ठां विदुर्बुधा:॥
अर्थात जिससे प्रेम हो उसके न मिलने पर मन में ऐसी वेदना होने लगती है कि जिससे शरीर सूखता जाता है, उसे उत्कण्ठा कहते हैं।

बालाम़् –  षोडशी नवयुवती को कहते हैं। स्त्रियाँ १६ वर्ष तक बाला, ३० वर्ष तक

तरुणी, ५० वर्ष तक प्रौढ़ा तथा उससे ऊपर वृद्धा कहलाती है।


शिशिरमथिताम़् – आचार्य मल्लिनाथ ने शिशिर का अर्थ शीत ऋतु लिया है। विश्व कोश में शिशिर का अर्थ पाला भी है जो कि अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि पाला कमलिनी को मार देता है।

अन्यरुपाम़् – यक्ष मेघ को बताता है कि उसकी प्रिया वियोग में इतनी दुर्बल हो गयी होगी कि उसका रुप जो कि पूर्व वर्णित (तन्वी श्यामा आदि) से अत्यन्त बदल गया होगा इसलिए उसे ध्यानपूर्वक देखकर पहिचानना।

असकलव्यक्ति – जैसा कि पीछे बताया गया है कि प्रेषितभर्तृका नायिका श्रृंगार नहीं करती है। अत: यक्षिणी ने भी श्रृंगार नहीं किया होगा तथा बालों को नहीं सँवारा होगा। इस कारण लटकते हुए बालों ने उसके मुख को ढक लिया होगा, जिससे वह पूर्ण रुप से दिखाई नहीं देगा।

बलिव्याकुला – बलि का अर्थ होता है – देवताओं की आरधाना; क्योंकि यक्षिणी का पति शाप के कारण बाहर गया था इसलिए सकुशल लौट आने के लिये सम्भवत: यक्षिणी बलि कार्य करती हो।