2026 में कोई एक बड़ी वित्तीय संस्थान डूबेगी

2026 में कोई एक बड़ी वित्तीय संस्थान डूबेगी और उसे rbi तारेगी।

यह सब होगा पर्सनल लोन के कारण, लोग लाइफ स्टाईल मेंटेन करने के लिये भी लोन ले रहे हैं, और महंगाई लगभग 10% की दर से बढ़ रही है, तो महंगाई 6 साल में डबल हो रही है। जबकि सैलेरी एवरेज लगभग 5% प्रतिवर्ष बढ़ रही है, तो मुख्यतः हो यह रहा है कि सैलेरी आपकी श्रिंक ही रही है, जबकि खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं।

और 2026-27 में रुपया डॉलर के मुकाबले में शतक मारने वाला है, तो महंगाई और बढ़ेगी। और इसके लिये लोग पर्सनल लोन ज्यादा ले रहे हैं और लेंगे। और वे डिफ़ॉल्ट होना शुरू हो चुके हैं, रुझान आने लगे हैं।

बड़े शहरों में रहना मुश्किल हो रहा है, और मुश्किल होता जायेगा। डिफ़ॉल्ट के कारण ही कोई बड़ा वित्तीय संस्थान डूबेगा, सरकार या तो इस फरवरी में या इस वर्ष के मध्य तक आयकर में और राहत देगी, यह सरकार की मजबूरी है। वहीं rbi लगभग 1% रेट कट करेगा।

जो भारतीय बाहर जय जयकार करते थे, ट्रंप ने उनको इतना बड़ा डंडा कर दिया है, कि बेचारे अब कुछ बोल नहीं पा रहे हैं, अमेरिका के टैरिफ के बाद अब चीन भी 2026 में भारत के साथ गड़बड़ करेगा, कैसे करेगा यह तो वक्त बतायेगा, क्योंकि जब कोई किसी एक से दबता है, तो दूसरा भी आकर बजाता ही है। इसका मुख्य कारण केवल एक है कि हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति बहुत कमजोर है।

हमारे यहाँ से धनाढ्य लोग दुबई सिंगापुर जा रहे हैं और उनको पता है कि इन भारतीयों को क्या चाहिये, इनका पैसा सुरक्षित रहना चाहिये, और अच्छी लाईफ स्टाइल चाहिये। भारत का युवावर्ग जो अब तक बहुत बड़ी शक्ति था, अब वही AI के आने के बाद किसी काम का नहीं रहेगा, वही लायबिलिटी होगा।

सहमत या असहमत होने की जरूरत नहीं, क्योंकि जो होगा, उसका गवाह वक्त होगा। बाकी कभी ओर लिख देंगे।

पुश्तैनी दौलत बनाम IIT-IIM की डिग्री: एक कड़वा सच? 🤯

​हाल ही में मेरी आँखों के सामने एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
​दो लोग थे: दोनों दोस्त थे और दारू पीने के बाद बात कर रहे थे –

1️⃣ पहला (23 साल): जिसके पास मजबूत पारिवारिक बैकग्राउंड है (विरासत में मिली जमीन + म्यूचुअल फंड्स), कुल नेटवर्थ ₹15-18 करोड़ और खुद की कमाई ₹13-15 लाख सालाना।

2️⃣ दूसरा (24 साल): एक IIT-IIM ग्रेजुएट, जिसकी खुद की मेहनत की कमाई (पैकेज) ₹45 लाख सालाना है।

​बातों-बातों में जब बहस बढ़ी, तो अमीर बैकग्राउंड वाले लड़के ने IIT ग्रेजुएट से एक बात कही:
“तू जितना भी घिस ले, इतना पैसा तू कभी कमा ही नहीं पाएगा।”

​अगर हम अहंकार को साइड में रख दें, तो क्या वह वाकई कैलकुलेशन के रूप से सही था? मुझे महसूस हुआ कि टॉप एजुकेशन और हाई सैलरी पाने वालों के लिए भी ‘वेल-इन्वेस्टेड जनरेशनल वेल्थ’ (Well-invested Generational Wealth) को पछाड़ना कितना मुश्किल है, जब तक कि वो कोई बहुत बड़ा स्टार्टअप या बिजनेस न खड़ा कर दें।

​₹45 लाख का पैकेज बहुत शानदार है, लेकिन ₹15 करोड़ की संपत्ति का ‘कंपाउंडिंग’ (Compounding) अलग ही लेवल पर खेलता है।

👉 ₹45 लाख कमाने वाले को टैक्स और खर्चे काटने के बाद ₹15 करोड़ जमा करने में शायद 20-25 साल लग जाएंगे।

👉 वहीं ₹15 करोड़ की दौलत वाला अगर कुछ न भी करे, तो भी सिर्फ ब्याज/रिटर्न से ही सालाना करोड़ों कमा सकता है।

अगर हम भावनाओं को किनारे रखकर सिर्फ गणित (Maths) देखें, तो वह लड़का शायद सही था।

​एक मोटा-मोटा हिसाब लगाया:

​👉 IIT-IIM वाला लड़का: ₹45 लाख का पैकेज। टैक्स कटने और मेट्रो सिटी में एक अच्छी लाइफस्टाइल जीने के बाद, वह साल में मुश्किल से ₹15-20 लाख बचा पाएगा।

​👉 पुश्तैनी दौलत वाला लड़का: उसके पास ₹15 करोड़ का बेस है। अगर वह इसे किसी सुरक्षित जगह पर भी इन्वेस्ट करे और उसे सिर्फ 8% का सालाना रिटर्न मिले, तो वह बिना कोई काम किए साल का ₹1.2 करोड़ (हर महीने ₹10 लाख) कमा रहा है।

​फर्क साफ़ है: एक अपनी मेहनत से साल के 20 लाख बचा रहा है, और दूसरा अपनी दौलत के ब्याज से ही साल के 1 करोड़ 20 लाख कमा रहा है।

​यही कंपाउंडिंग की असली ताकत है, जो सैलरी क्लास को कभी जीतने नहीं देती।

​भारत में यह हम मिडिल क्लास वालों के लिए एक चुभने वाली हकीकत है।


​#GenerationalWealth #IITIIM #RealityCheck #MoneyMindset #India #WealthGap

पता नहीं पर क्यों मुझे हर नियम मानने हैं।

कई बार मैं खुद ही खुद बेवकूफ लगने लगता हूँ, पता नहीं पर क्यों मुझे हर नियम मानने हैं।

पहला किस्सा –

अभी 2 दिन पहले एक सिग्नल पर क्रॉसिंग में था, ग्रीन से ऑरेंज हो गई थी, तो हमने धीमी कर ली, और रेड भी हो गई तो ब्रेक मार दिये, पर भाईसाहब पीछे वाला गाड़ी में ठुकते बचा ओर अगल बगल वाले तो निकल चुके थे, जो साइड में खड़े थे, वे मुझे घूर घूरकर देख रहे थे।

दूसरा किस्सा –

मैं मंदिर जब भी जाता हूँ, तो जो नियम लिखे रहते हैं, पालन करता हूँ, वहाँ लिखा है कि मोबाईल फोन से फोटो वीडियो बनाना प्रतिबंधित है, पर देखता हूँ, लोग फिर भी मानते नहीं। ऐसे ही सुबह महाकाल का किसी का वीडियो देख रहा था, यो वहाँ पर भी मोबाईल फोन प्रतिबंध का बड़ा सा बोर्ड लगा है, पर सभी उपयोग कर रहे हैं। अब उनको क्या ही पुण्य मिलेंगे, जब वे सामने देखते हुए भी ऐसे कृत्य कर रहे हैं।

तीसरा किस्सा –
हमारे लेआउट में वाहन की गति सीमा 20 या 10 है, हम उस पर ही चलाते हैं, पर कई लोग खाली रोड देखकर 50 पर चलाते हैं, गति सीमा का सम्मान करना चाहिये क्योंकि बच्चे अचानक ही कहीं से छोटी साइकिल या पैदल, दौड़ते हुए आ जाते हैं, लेआउट को सुरक्षित बनाना भी हमारी अपनी जिम्मेदारी है।

चौथा किस्सा –
बेटेलाल कल दोस्त से मिलने शाम को माराथहल्ली गये, पहली बार बाईक से खुद अकेले इतनी दूर गये थे, दूर मतलब 6 km के आसपास, उनको अपना हेलमेट दिया, हेलमेट लगाने के पहले सर पर कैप पहनने को दी, बताया इससे हेलमेट में बालों की स्मेल नहीं जाती और हाइजीनिक दृष्टि से भी अच्छी होती है, रात को वे कहीं आगे दोस्त के साथ चले गये थे, पिलियन राइडर के लिये एक एक्स्ट्रा हेलमेट लेकर गये थे, तो मुझसे कॉल करके पूछा कि सर्विस रोड पर रॉंग साइड आ सकते हैं क्या? मैंने समझा कि वे कहाँ हैं और किधर से आने की बात कर रहे हैं, तो बोला जो गूगल मैप बता रहा है, वैसे ही आओ, वे बोले 4 km घूमकर बता रहा है, हमने कहा तो घूमकर आओ, पर इससे तुम सुरक्षित रहोगे, और फालतू के किसी ऐसे कार्य को क्यों करना, जो गलत है और दूसरों को तकलीफ देता है, हमें सहयोग देना चाहिये।

बातें छोटी छोटी हैं, पर काम की हैं, ये सब भारतीयों को सीखनी ही चाहिये।

RBI का ‘.bank.in’ डोमेन माइग्रेशन

RBI का ‘.bank.in’ डोमेन माइग्रेशन: जानिए कब हुआ और ग्राहकों को क्यों नहीं बताया गया।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डिजिटल बैंकिंग की सुरक्षा को मजबूत करने और साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। 31 अक्टूबर 2025 को, देश के सभी बैंकों ने अपनी वेबसाइटों को नए और सुरक्षित ‘.bank.in’ डोमेन पर स्थानांतरित कर दिया।

कब और कैसे हुई यह घोषणा?
RBI ने 22 अप्रैल 2025 को एक आधिकारिक सर्कुलर (RBI/2025-26/28) जारी किया था, जिसमें सभी वाणिज्यिक बैंकों, प्राथमिक शहरी सहकारी बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों को निर्देश दिया गया था कि वे 31 अक्टूबर 2025 तक अपने मौजूदा डोमेन (.com, .co.in, .org.in आदि) को ‘.bank.in’ डोमेन में स्थानांतरित कर दें।

इस पहल की पहली घोषणा 7 फरवरी 2025 को RBI की विकासात्मक और नियामक नीतियों के वक्तव्य में की गई थी, जिसमें डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं का हवाला देते हुए ‘.bank.in’ और ‘.fin.in’ (गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं के लिए) डोमेन शुरू करने का निर्णय लिया गया था।

यह कदम क्यों उठाया गया?साइबर सुरक्षा खतरों में वृद्धि: अप्रैल-सितंबर 2024 के दौरान, इंटरनेट और कार्ड धोखाधड़ी कुल धोखाधड़ी राशि का लगभग 20% और कुल मामलों की संख्या का लगभग 84% थी।

FY24 की पहली छमाही में, भारत में 18,461 बैंकिंग धोखाधड़ी की घटनाएं हुईं, जिनकी कुल राशि ₹21,367 करोड़ थी।

फिशिंग और स्पूफिंग हमले: धोखेबाज आसानी से बैंकों के नाम से मिलती-जुलती वेबसाइटें बना लेते थे (जैसे “O” की जगह “0” का इस्तेमाल करना), जिससे ग्राहकों को असली और नकली वेबसाइट में फर्क करना मुश्किल हो जाता था।

विश्वसनीयता बढ़ाना: ‘.bank.in’ डोमेन केवल RBI-विनियमित बैंकों को ही दिया जाएगा, जिससे ग्राहक आसानी से असली बैंक वेबसाइट की पहचान कर सकेंगे।

माइग्रेशन कैसे हुआ?Institute for Development and Research in Banking Technology (IDRBT) को National Internet Exchange of India (NIXI) और Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) के तहत इस डोमेन के लिए विशेष रजिस्ट्रार के रूप में नियुक्त किया गया।

IDRBT ने बैंकों को पंजीकरण प्रक्रिया, तकनीकी सेटअप, और माइग्रेशन में मार्गदर्शन प्रदान किया।

प्रमुख बैंकों के नए URL:
State Bank of India: https://sbi.bank.inHDFC Bank: https://www.hdfc.bank.inICICI Bank: https://www.icici.bank.inAxis Bank: https://www.axis.bank.inPunjab National Bank: https://pnb.bank.inKotak Mahindra Bank: https://www.kotak.bank.in

ग्राहकों को क्यों नहीं बताया गया?यह सवाल कई ग्राहकों के मन में उठा है, और इसके पीछे कई कारण हैं:सीमित जन जागरूकता अभियान: हालांकि RBI ने ‘RBI Kehta Hai’ पहल के तहत विभिन्न माध्यमों से जागरूकता अभियान चलाए हैं, लेकिन ‘.bank.in’ माइग्रेशन के बारे में विशेष रूप से बड़े पैमाने पर ग्राहक-केंद्रित संचार अभियान की कमी दिखाई दी।

बैंकों की सीमित पहल: अधिकांश बैंकों ने तकनीकी माइग्रेशन पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन ग्राहकों को व्यक्तिगत रूप से SMS, ईमेल या शाखा नोटिस के माध्यम से सूचित करने की व्यवस्थित प्रक्रिया सीमित रही।

स्वचालित रीडायरेक्शन: बैंकों ने सुनिश्चित किया कि पुराने URL स्वचालित रूप से नए ‘.bank.in’ डोमेन पर रीडायरेक्ट हो जाएं, ताकि ग्राहकों को कोई असुविधा न हो। इसलिए, कई बैंकों ने महसूस किया कि विस्तृत सूचना की आवश्यकता नहीं है।साइबर सुरक्षा चिंताएं: RBI और बैंक नियमित रूप से फर्जी SMS और ईमेल के बारे में चेतावनी जारी करते हैं।

ग्राहकों को भ्रमित करने और धोखाधड़ी के नए अवसर देने के डर से, संभवतः व्यापक संचार सीमित रखा गया।धीरे-धीरे माइग्रेशन: कई बैंकों ने अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच धीरे-धीरे माइग्रेशन किया। Punjab National Bank ने अगस्त 2025 में खुद को पहला सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक बताया जिसने कॉर्पोरेट वेबसाइट माइग्रेट की, जबकि HDFC और Yes Bank ने पहले ही स्विच कर लिया था।

ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

URL की जांच करें: अब से हमेशा सुनिश्चित करें कि आपके बैंक की वेबसाइट ‘.bank.in’ से समाप्त होती है।

बुकमार्क अपडेट करें: अपने ब्राउज़र में सेव किए गए पुराने बैंक URL को नए ‘.bank.in’ URL से बदल दें।

संदिग्ध लिंक से सावधान रहें: SMS, WhatsApp या ईमेल में प्राप्त अज्ञात लिंक पर क्लिक न करें। हमेशा सीधे बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।

OTP साझा न करें: याद रखें कि UPI के माध्यम से पैसे प्राप्त करने के लिए PIN/पासवर्ड दर्ज करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ग्राहक सेवा नंबर की पुष्टि करें: ग्राहक सेवा नंबर कभी भी मोबाइल नंबर के रूप में नहीं होते।भविष्य की योजनाRBI ने घोषणा की है कि जल्द ही एक नया विशेष डोमेन ‘fin.in’ लॉन्च किया जाएगा, जो विशेष रूप से गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (NBFCs) और अन्य वित्तीय सेवा प्रदाताओं के लिए होगा।

निष्कर्ष

यह पहल भारत की डिजिटल वित्तीय प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि ग्राहक संचार में कमी रही, लेकिन यह सुरक्षा उपाय दीर्घकालिक रूप से ग्राहकों को साइबर धोखाधड़ी से बचाएगा और डिजिटल बैंकिंग में विश्वास बढ़ाएगा।

ग्राहकों को अब अधिक सतर्क रहना चाहिए और केवल ‘.bank.in’ डोमेन वाली वेबसाइटों पर ही बैंकिंग करना चाहिए।

NVIDIA की कहानी

NVIDIA दुनिया की पहली 4 ट्रिलियन डॉलर की कंपनी बन गई है! जी हाँ, यह वही कंपनी है जिसकी शुरुआत 1993 में एक छोटे से गेमिंग ग्राफिक्स स्टार्टअप के तौर पर हुई थी, और आज यह ऐपल, गूगल और मेटा जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ चुकी है। इस सफलता के पीछे हैं इसके को-फाउंडर और सीईओ जेन्सन हुआंग, जिनकी यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।

ये वो दो तस्वीरें हैं—एक पुरानी, जिसमें वे एक साधारण इंजीनियर की तरह काम करते दिख रहे हैं, और दूसरी हाल की, जिसमें वे आत्मविश्वास से भरे स्टेज पर खड़े हैं, उनके हाथ पर NVIDIA का टैटू गर्व से नजर आ रहा है।

1993 में, जेन्सन और उनके दोस्तों ने एक डेनी’s रेस्टोरेंट में मिलकर इस कंपनी की नींव रखी, बिना किसी बड़े कनेक्शन या फंडिंग के। शुरुआत में तो उनका पहला प्रोडक्ट फेल हो गया, और कंपनी 30 दिन के अंदर दिवालिया होने वाली थी। लेकिन जेन्सन ने हार नहीं मानी—उन्होंने आधी टीम को निकालकर जोखिम उठाया और एक नई ग्राफिक्स चिप, RIVA 128, पर दांव लगाया। यह दांव चल गया और बाकी इतिहास है!

लेकिन असली खेल तब शुरू हुआ जब जेन्सन ने AI के भविष्य को देखा। उन्होंने CUDA नामक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म बनाया, जो गेमिंग चिप्स को साइंटिफिक सुपरकंप्यूटर में बदल देता था। शुरुआत में इस पर कोई कमाई नहीं हुई, और निवेशक नाराज थे, लेकिन जेन्सन ने 10 साल तक मेहनत की। आज, अमेजन, गूगल, मेटा और टेस्ला जैसी कंपनियाँ NVIDIA के चिप्स पर निर्भर हैं, क्योंकि हर बड़ी AI सफलता CUDA पर बनी है।

NVIDIA में $1000 का निवेश 2015 में आज $350,000 हो गया है—35,000% की ग्रोथ!

केरल के दो ड्राइवरों ने एम्बुलेंस से 3500 किमी की यात्रा, बेडरिडन नेपाली मरीज को पहुंचाया घर!

केरल के कोट्टायम के दो एम्बुलेंस ड्राइवरों ने 45 साल के नेपाली मरीज गणेश बहादुर और उनके बेटे को उनके गाँव तक पहुंचाने के लिए 3500 किलोमीटर की यात्रा सिर्फ तीन दिन में पूरी की।

गणेश बहादुर, जो कंजीरापल्ली में एक रबर फैक्ट्री में काम करते थे, 24 मई को दिल का दौरा पड़ने के बाद अचानक गिर पड़े। एक निजी अस्पताल में उनकी सर्जरी हुई, लेकिन हालत ऐसी थी कि वे बेडरिडन हो गए। उनकी हालत को देखते हुए, उन्हें उनके नेपाली गाँव वापस ले जाना जरूरी था। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। 3500 किलोमीटर की दूरी, अनजान रास्ते, जंगली रास्तों की चुनौतियाँ, पुलिस की परेशानियाँ।

लेकिन इन दो ड्राइवरों ने हिम्मत नहीं हारी। अभय इमरजेंसी सर्विस के तहत, उन्होंने गणेश और उनके बेटे को सुरक्षित उनके घर पहुंचाने का बीड़ा उठाया।

उन्होंने बताया कि वे रास्ते में केवल ईंधन भरवाने, खाने और मरीज को फीड करने के लिये ही रुके, एक ड्राइवर एम्बुलेंस चलाता तो दूसरा आरमा करता।

उन्होंने अपने कटु अनुभव भी बताए कि जब उत्तरप्रदेश में एंट्री करी तो एम्बुलेंस की इमरजेंसी लाईट चालू होने के बावजूद पुलिस ने रोका और उनके नाम पता, पिता का नाम इत्यादि पूछने लगे, तब इन्हें समझ आया कि ये धर्म जानने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्होंने ₹500 की रिश्वत देकर आगे बढ़ने में भलाई समझी, क्योंकि उनके पास समय नहीं था।

ऐसा ही एक और अनुभव उत्तरप्रदेश का ही बताया कि किसी गाड़ी पर उनकी एम्बुलेंस से स्क्रैच आ गया, 5ओ इन्होंने एम्बुलेंस रोककर उसकी गाड़ी के स्क्रैच साफ करके बताया कि कुछ ज्यादा नहीं हैं, पर थोड़ी आगे जाने पर वो अपने कई साथियों के साथ आकर एम्बुलेंस को घेर कर पैसा माँगने लगे, तो इन्होंने एम्बुलेंस की इमरजेंसी लाईट जलाई, जिससे लोकल लोगों को पता चला कि इसमें तो मरीज भी है, तो वे सब वहाँ से भाग गये।

उत्तरप्रदेश ने गजब नाम कमाया है। खैर जब मरीज को घर पहुँचा दिया तो दोनों ड्राइवरों ने बस तैयार होने और खाने का समय लियाँ और वापिस 20 जून को केरल पहुँच गये। इसमें लगभग 2 लाख का खर्चा आया जो कि फेक्ट्री ने वहन किया।

जर्मनी ने माइक्रोसॉफ्ट टीम को किया अनइंस्टॉल

जर्मनी का श्लेसविग-होल्सटीन राज्य ने माइक्रोसॉफ्ट टीम (Microsoft Teams) को अनइंस्टॉल करने का फैसला लिया है! 😮 जी हाँ, ये कोई छोटी बात नहीं है। ये निर्णय डेटा गोपनीयता और साइबर सुरक्षा को लेकर लिया गया है।

जर्मन सरकार का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट का डेटा प्रबंधन यूरोपीय संघ के सख्त गोपनीयता नियमों (GDPR) के अनुरूप नहीं है। 🛡️इस कदम के पीछे वजह है डेटा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएँ।

माइक्रोसॉफ्ट टीमें पर निर्भरता के बावजूद, श्लेसविग-होल्सटीन अब ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर की ओर बढ़ रहा है, ताकि स्थानीय नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। 📊 ये कदम न केवल तकनीकी बदलाव है, बल्कि ये दिखाता है कि डेटा गोपनीयता अब कितनी बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है।

लेकिन सवाल ये है – क्या ये फैसला अन्य देशों और कंपनियों को भी प्रेरित करेगा? 🤔 भारत में भी हम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इतना निर्भर हैं, लेकिन क्या हम अपने डेटा की सुरक्षा को लेकर उतने सजग हैं? माइक्रोसॉफ्ट टीम जैसे टूल्स हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं, पर क्या हमें भी ओपन-सोर्स विकल्पों की ओर देखना चाहिए?

क्या हम भारत के लोग डाटा सिक्योरिटी को लेकर सीरियस भी हैं?

2030 की तूफानी रैली के लिये तैयार हैं आप?

अगर अभी तक आपने अपने निवेश को शेयर बाजार या म्युचुअल फंड्स से दूर रखा है, तो आप आने वाली तूफानी रैली को मिस करने जा रहे हैं, मेरे विश्लेषण के मुताबिक बहुत सी कंपनियों की असली वैल्यू अनलॉक ही नहीं हुई है।

या यूँ कहें कि बैलेंस शीट में बहुत सी चीजें जुड़ने वाली हैं, जो कंपनियों के शेयर में तूफानी रैली लाने वाले हैं। मैं किसी सेक्टर पर बात नहीं कर रहा, यह एक ओवरऑल बड़ा रैला आने वाला है।

तो अभी भी सही समय है, आपको निवेश करने के लिये, जो मैं देख पा रहा हूँ, उसके मुताबिक रियल एस्टेट का बाजार बहुत ज्यादा बूम कर चुका है, अब यहाँ से 20-30% भाव अगले 4-5 साल में अलग अलग कारणों से गिरेंगे।

2030 में nifty50 बहुत ही कंजरवेटिव एप्रोच के साथ मैं 35000 के आसपास देखता हूँ, और खुले दिल से लगभग 48 से 50 हजार के आसपास। अगर जो आज इस गाड़ी में बैठ गया, यकीन मानिये कि पछतायेंगे नहीं।

शेयर कौन से लेना है पूछने की जरूरत नहीं nifty 100 के सारे शेयर निवेश के लायक हैं, शेयर समझ नहीं आता तो top 100 nifty या index फंड्स में निवेश कर सकते हैं। मैं हमेशा small व midcap पर बुलिश रहता हूँ, क्योंकि जो कंपनियां 200 करोड़ की हैं, वे 5 साल में 2000 करोड़ की हो सकती हैं। ऐसे कई उदाहरण पिछले 5 साल के हैं, पकी पकाई मैं नहीं देने वाला, बस बाजार में बिलबोर्ड देखिये, आंखें कान खुले रखिये, सब सामने दिखता है। छुपा हुआ कुछ नहीं।

#sharemarket

भारत के युवा जापानी भाषा सीखकर अपराध कर रहे हैं।

क्या आपने कभी सोचा कि भाषा सीखने की चाहत भी किसी को अपराध की राह पर ले जा सकती है? एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसमें दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ युवा, जो जापानी भाषा सीख रहे थे, जापान के बुजुर्गों को निशाना बनाकर साइबर ठगी के जाल में फंस गए। यह खबर न सिर्फ हैरान करने वाली है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि तकनीक का दुरुपयोग कितना खतरनाक हो सकता है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने नोएडा और वाराणसी में छापेमारी कर छह लोगों को गिरफ्तार किया है। ये सभी 20-30 साल की उम्र के युवा हैं, जिनमें से ज्यादातर जापानी भाषा सीखने वाले छात्र हैं। इन्होंने जापान के बुजुर्गों को निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की ठगी की। यह गिरोह फर्जी टेक सपोर्ट स्कैम चला रहा था, जिसमें वे बुजुर्गों के कंप्यूटर पर फर्जी वायरस अलर्ट और फिशिंग पॉप-अप दिखाते थे। इन पॉप-अप में डरावने संदेश होते थे, जैसे कि “आपका कंप्यूटर वायरस से संक्रमित है” या “तुरंत इस नंबर पर कॉल करें”।जब बुजुर्ग डर के मारे दिए गए नंबर पर कॉल करते, तो ये ठग रिमोट एक्सेस टूल्स की मदद से उनके कंप्यूटर का नियंत्रण ले लेते और उनकी संवेदनशील वित्तीय जानकारी चुराकर ठगी करते। सीबीआई को सूचना मिली थी कि भारत से संचालित एक संगठित साइबर अपराध नेटवर्क जापान के लोगों को निशाना बना रहा है। इस मामले में जापानी अधिकारियों को भी सूचित किया गया है, और उन्होंने भारत सरकार के साथ इस मुद्दे को उठाया है।

इन ठगों को पकड़ने में उनकी टूटी-फूटी जापानी भाषा और कॉल के दौरान हिंदी में होने वाली पृष्ठभूमि की बातचीत ने अहम भूमिका निभाई। जापानी नागरिकों को कॉल करने वालों की भाषा सहज प्रवाह में नहीं थी, जिसने संदेह पैदा किया। इसके अलावा, कॉल करने वाले नंबर भारतीय देश कोड (+91) के साथ आ रहे थे, जिससे यह साफ हो गया कि ये कॉल भारत से किए जा रहे हैं।

सीबीआई ने इन फर्जी पॉप-अप के लिए इस्तेमाल होने वाले मैलिशियस यूआरएल और आईपी पतों का विश्लेषण किया, जो भारत में ही ट्रेस हुए।गिरफ्तार किए गए लोगों में संदीप गखर, गौरव मौर्या, और शुभम जायसवाल जैसे नाम शामिल हैं। संदीप पर फंड प्राप्त करने, गौरव पर पॉप-अप बनाने, और शुभम पर कॉल करने का आरोप है। इसके अलावा, दिल्ली के आरके पुरम के रहने वाले मनमीत सिंह बसरा और छतरपुर एनक्लेव के जितेन हरचंद इस रैकेट के मुख्य संचालक बताए जा रहे हैं। ये लोग स्काइप के जरिए जापानी नागरिकों से संपर्क करते थे और ठगी के लिए लीड जनरेट करते थे।

इस रैकेट का तरीका बेहद सुनियोजित था। ठग माइक्रोसॉफ्ट एज्यूर सर्वर पर होस्ट किए गए मैलिशियस यूआरएल के जरिए फर्जी पॉप-अप बनाते थे। ये पॉप-अप जापानी नागरिकों के कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाए जाते थे, जो ज्यादातर बुजुर्ग थे और तकनीक के मामले में कम जागरूक। इन पॉप-अप में डराने वाले संदेश होते थे, जो लोगों को तुरंत कॉल करने के लिए मजबूर करते। कॉल करने पर ठग रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर के जरिए कंप्यूटर का नियंत्रण लेते और बैंक खातों से पैसे उड़ा लेते।सीबीआई ने चार विशिष्ट मामलों का जिक्र किया है, जिनमें जापानी नागरिकों को ठगा गया।

उदाहरण के लिए, जापान के ह्योगो प्रांत के रहने वाले 57 वर्षीय सकाई ताकाहारु को एक फर्जी पॉप-अप के जरिए ठगा गया। उनके कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखा कि उनका सिस्टम वायरस से संक्रमित है और उन्हें तुरंत एक नंबर पर कॉल करना होगा। इस तरह की ठगी में सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया गया, जो लोगों को डराकर उनकी जानकारी हासिल करने का एक आम तरीका है।

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें शामिल ज्यादातर युवा पहली बार अपराध करने वाले हैं। ये लोग पढ़े-लिखे हैं और जापानी भाषा सीख रहे थे, जो आमतौर पर बेहतर करियर की तलाश में लिया जाता है। लेकिन, आसान पैसा कमाने की लालच ने इन्हें अपराध की दुनिया में धकेल दिया। यह न सिर्फ इन युवाओं के भविष्य के लिए खतरनाक है, बल्कि भारत और जापान के रिश्तों पर भी असर डाल सकता है।साइबर अपराध आज एक वैश्विक समस्या बन चुका है। भारत में पहले मेवात और जामतारा जैसे क्षेत्र साइबर ठगी के लिए कुख्यात थे, लेकिन अब यह समस्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल रही है। जापान की नेशनल पुलिस एजेंसी और माइक्रोसॉफ्ट कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर सीबीआई ने इस रैकेट को तोड़ा, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या हमारी युवा पीढ़ी को सही दिशा दिखाने में हम कहीं चूक रहे हैं? क्या हम जॉब क्रिएट कर पा रहे हैं।

Dell की मजेदार कहानी: एक गैरेज से ग्लोबल टेक दिग्गज तक

क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटा सा कमरा, कुछ पुराने कंप्यूटर पार्ट्स, और एक 19 साल के लड़के का जुनून दुनिया को बदल सकता है?

शुरुआत: गैरेज का जादूगर

1984 की बात है, टेक्सास के ऑस्टिन में एक कॉलेज स्टूडेंट माइकल डेल अपने हॉस्टल के कमरे में बैठा सोच रहा था, “यार, ये कंप्यूटर कंपनियां इतने महंगे पीसी क्यों बेचती हैं? मैं तो इससे बेहतर और सस्ता बना सकता हूँ!” माइकल कोई सुपर जीनियस नहीं था, बस एक ऐसा लड़का था जो कंप्यूटर के पुर्जों को देखकर वैसा ही उत्साहित हो जाता था, जैसे हम लोग नई नेटफ्लिक्स सीरीज देखकर! उसने अपने हॉस्टल के कमरे में पुराने कंप्यूटर पार्ट्स जोड़कर कस्टम पीसी बनाना शुरू किया। उसका मंत्र था: “सीधे ग्राहक को बेचो, बीच में कोई दुकानदार नहीं!”

माइकल ने अपनी कंपनी शुरू की, नाम रखा PC’s Limited। लेकिन भाईसाहब, शुरू में तो हालत ऐसी थी कि वो अपने दोस्तों को फोन करके कहता, “ब्रो, मेरे पास एक कूल पीसी है, खरीद ले!” और इस तरह गैरेज से शुरू हुआ ये कारोबार धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

नाम बदला, गेम बदला

1988 में माइकल ने सोचा, “PC’s Limited तो बड़ा बोरिंग नाम है, कुछ स्टाइलिश चाहिए!” और बस, कंपनी का नाम बदलकर हो गया Dell Computer Corporation। अब माइकल का आइडिया था कि कंप्यूटर को ऑर्डर पर बनाओ, ग्राहक जैसा चाहे वैसा बनाकर सीधे उनके घर भेजो। ये उस समय की बात है जब लोग दुकानों में जाकर तैयार कंप्यूटर खरीदते थे, और कस्टमाइजेशन का मतलब सिर्फ़ वॉलपेपर बदलना था!

Dell ने इस डायरेक्ट-टू-कस्टमर मॉडल से तहलका मचा दिया। लोग फोन पर ऑर्डर देते, और माइकल की टीम उनके लिए वैसा ही पीसी बनाती जैसा वो चाहते थे। ये थोड़ा ऐसा था जैसे आप पिज्जा ऑर्डर करें और कहें, “भाई, एक्स्ट्रा चीज़ डाल दे, मशरूम हटा दे!” बस, Dell ने टेक्नोलॉजी का पिज्जा बनाना शुरू कर दिया।

वो लम्हा जब Dell ने उड़ान भरी

1990 के दशक में Dell ने इंटरनेट का फायदा उठाया। जब बाकी कंपनियां अभी भी दुकानों में अपने कंप्यूटर बेच रही थीं, Dell ने अपनी वेबसाइट लॉन्च कर दी। अब लोग ऑनलाइन जाकर अपने पीसी को कस्टमाइज कर सकते थे। स्क्रीन साइज़, प्रोसेसर, रैम—सब कुछ अपनी मर्जी से! ये उस समय का ई-कॉमर्स क्रांति थी, जब अमेज़न अभी डायपर में था!

1996 में Dell की वेबसाइट रोज़ाना 1 मिलियन डॉलर की सेल करने लगी। सोचिए, उस समय लोग ऑनलाइन शॉपिंग से डरते थे, लेकिन Dell ने ग्राहकों का भरोसा जीत लिया। माइकल डेल अब टेक्नोलॉजी का रॉकस्टार बन चुका था।

उतार-चढ़ाव: हर कहानी में ट्विस्ट होता है

लेकिन हर कहानी में थोड़ा ड्रामा तो बनता है, है ना? 2000 के दशक में Dell को कड़ी टक्कर मिली। HP, Lenovo, और Apple जैसी कंपनियां मार्केट में छा रही थीं। Dell के लैपटॉप और डेस्कटॉप अब भी अच्छे थे, लेकिन लोग अब डिज़ाइन और ब्रांडिंग के पीछे भाग रहे थे। माइकल ने सोचा, “चलो, कुछ नया करते हैं!”

2013 में माइकल ने एक बड़ा दांव खेला—उन्होंने Dell को प्राइवेट कंपनी बना लिया। मतलब, अब वो शेयर मार्केट के चक्कर में नहीं फंसेंगे। इस कदम से Dell ने फिर से इनोवेशन पर फोकस किया। नए लैपटॉप, टैबलेट, और सर्वर लॉन्च किए। XPS सीरीज ने तो मार्केट में आग लगा दी—लोग कहने लगे, “ये तो Apple का जवाब है!”

आज का Dell: टेक्नोलॉजी का बादशाह

आज Dell Technologies एक ग्लोबल टेक दिग्गज है, जो न सिर्फ़ लैपटॉप और डेस्कटॉप बनाता है, बल्कि क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज, और AI सॉल्यूशंस में भी छाया हुआ है। माइकल डेल, जो कभी हॉस्टल के कमरे में पुर्जे जोड़ता था, आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी खासियत? वो आज भी टेक्नोलॉजी को लेकर उतना ही उत्साहित है, जितना 1984 में था!