बैंकें काटापिटी वाले चेक नहीं लेंगी

    यह समाचार शायद सब ने हाल ही में अखबारों में पढ़ा होगा कि बैंकें काटापिटी वाले चेक नहीं लेंगी, पर क्या आपको पता है यह केवल दिल्ली के लिये है, जहाँ कि क्लियरिंग के लिये चेक ट्रंकेशन सिस्टम (CTS) लागू किया गया है, और अभी यह केवल दिल्ली में ही लागू है अब आगामी दिनों में CTS चैन्नई में शुरु होने वाला है, फ़िर यह नियम चैन्नई के लिये भी लागू होगा।

    और किसी शहर में अगर आपको कोई परेशान करे फ़िर वह वित्तीय संस्थान ही क्यों न हो, आप बैंकिग ओम्बड्समैन से शिकायत कर सकते हैं, क्योंकि यह नियम अभी केवल और केवल दिल्ली के लिये है, और जल्दी ही केवल चैन्नई के लिये।

बैंकों के बारे में ज्यादा जानकारी के लिये मेरे ब्लॉग पर जाने के लिये यहाँ चटका लगाईये।

९वीं कक्षा में चुंबन, 7 वर्ष के भतीजे के दोस्त की गर्लफ़्रेंड [kiss in 9th Class, Grilfriend of 7 year old boy]

    आज सुबह दिन की शुरुआत कोई खास नहीं थी पर फ़िर भी कुछ लम्हें लिखना चाहूँगा, सुबह ऑफ़िस के लिये घर से निकले तो बहुत तेज बारिश शुरु हो गई, और हम ऑटो लेकर निकल पड़े ऑफ़िस की ओर। रास्ते में याद आ गई पुरानी कुछ बातें जो कि एक साथी के साथ हमने की थीं। समाज मॆं दो चीजों के बारे में खुलकर बात नहीं की जाती है, एक है पैसा और दूसरा है काम (Sex), हम थोड़ी बहुत कोशिश कर रहे हैं कि पैसे के बारे में खुलकर बातें हों जैसे कि और विषयों पर होती है, एक बार हमने अपने एक साथी के साथ “काम” के ऊपर भी खुलकर बात करने की कोशिश की।
हमने सीधे पूछा कि “तुम्हारी कोई गर्लफ़्रेंड है”,
मित्र बोला “नहीं आजकल तो कोई नहीं है, पर पहले ९ रह चुकी हैं।”
मैंने पूछा “तुमने पहली बार कितनी उम्र में लड़की का चुंबन लिया था”
तो वह शरमा गया और बोला “बोस कोई लफ़ड़ा है तुम मेरी पोलपट्टी लेकर मेरे से कोई काम करवाने वाले हो”
मैंने कहा “नहीं भई मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ।”
तो बोला “मैं जब ९ वीं क्लास में पढ़ता था तब पहली बार एक लड़की का चुँबन लिया था”
मैंने फ़िर से धैर्य के साथ पूछा “क्या साथ मॆं पढ़ती थी ?”
मित्र बोला “नहीं, दो साल छोटी थी, और घर पर आना जाना था, सामने की बिल्डिंग में रहती थी”
मैंने पूछा “चुंबन कहाँ लिया था, स्कूल में या घर में या कहीं और ?”
अब तो वो और सशंकित हो गया, फ़िर बोला “बोस जरुर कोई लफ़ड़ा है !!”
मैंने कहा “अरे मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ, कि मैं अपनी जिंदगी में कितना पीछे रहा हूँ और हमारी आज की पीढ़ी क्या कर रही है ?”
तब बोला “घर में चुंबन लिया था”
और फ़िर आज की युवा पीढ़ी के लिये बोलता है कि “अपने भतीजे के साथ बाजार गये थे, तो बाजार में भतीजे की सहपाठिन मिल गई, उसने हाय हैलो किया और मम्मी से बोला कि “मम्मी ये मेरे दोस्त की गर्लफ़्रेंड है”, और उनका भतीजा दूसरी कक्षा में पड़ता है।
फ़िर बोला “हमने तो ९ वीं में चुंबन लिया था, पार आज कल की पीढ़ी में यह ५-६ कक्षा में ही हो जाता है”
हमें आश्चर्य होने लगा कि हम शायद अब बहुत ही बूढ़े हो गये हैं, इसलिये हमने शादी के पहले चुंबन नहीं लिया यार फ़िर हम किसी और ही सभ्यता में रहते थे।
अब आप बताईये आपने पहली बार चुंबन कब लिया था 🙂

मेरे घर में चोरी और भारत के लोकतंत्र का मजाक नक्सलवादियों का भारत बंद आज

    आज सुबह सुबह घर (उज्जैन) से माताजी का फ़ोन आया कि बेटा आज एक दुर्घटना हो गई, तुम्हारा कमरे में पीछे से चोर घुस गये और लॉकर में से समान ले गये। अब हम सुबह सुबह नींद में कुछ समझ ही नहीं पाये ।

    फ़िर पूरा वाकया बयान किया कि सुबह पौने पाँच बजे पापाजी उठे तो हमारे कमरे में उन्हें खटपट की आवाज आई, चूँकि हम वहाँ रहते नहीं हैं तो हमारा कमरा बाहर से बंद ही रखा जाता है। तो पापाजी ने  आवाज लगाई कि अंदर कौन है, तो कुछ जबाब नहीं आया, और चोर/चोरों ने बाहर से तीनों दरवाजों की कुण्डी भी लगा दी थी, फ़िर पापाजी ने किरायेदार को मोबाईल करके बुलाया और बाहर से दरवाजे खोले गये। फ़िर पीछे जाकर देखा जहाँ हमारेक मरे की खिड़की थी और जहाँ से कमरे में चोर लोहे की मजबूत जाली को मोड़कर और खिड़की खोलकर घुसे थे, फ़िर कमरे का मुआयना किया तो लॉकर तोड़ा गया था जो कि लोहे की अलमारी में था। कागज सुरक्षित थे, बस जो पर्स था उसका सारा समान गायब था अब उसमें क्या था याद करने की कोशिश की तो थोड़ा बहुत समान याद आया, और हाँ नकद याद था तो सब मिलाकर याद बन पड़ा कि लगभग १५-२० हजार का समान होगा, चाँदी का समान था अब चाँदी का भाव भी तो आसमान छू रहा है।

    वैसे तो उज्जैन में घर असुरक्षित हो गये हैं, चोर पूरी तरह से सक्रिय हैं, पुलिस के पास बराबर हफ़्ता पहुँच जाता होगा ये हमें उम्मीद है। अब सोचा जा रहा है कि घर में सिक्योरिटी सिस्टम लगा दिया जाये।

    वैसे हमने घर पर कहा है कि पुलिस में चोरी की रिपोर्ट जरुर दर्ज करवायें।

    सुबह सुबह हमने टीवी न्यूज देखी कि बारिश के क्या हाल हैं क्योंकि रात भर मुंबई में भारी बरसात हुई है, परंतु टीवी तो अपने किस्मत के सितारे में ज्यादा व्यस्त थे, तभी नीचे बस दो ही ब्रेकिंग न्यूज थीं ।

१. पंजाब हरियाणा में बारिश का कहर

२. नक्सलियों ने आज भारत बंद की घोषणा की, गृह मंत्रालय ने अलर्ट जारी किया।

    तो उपरोक्त दोनों में हमारे भारत बंद वाले शूरवीर कहाँ हैं, बाहर सड़क पर निकलें और बाढ़ में फ़ँसे लोगों की मदद करें और नक्सलियों से सामना करें।

“सन्ध्या-सुन्दरी” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

दिवसावसान का था समय,

मेघमयआसमान से उतर रही है

वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी

धीरे धीरे धीरे।

तिमिराञ्चल में चञ्चलता का नहीं कहीं आभास,

मधुर मधुर है दोनों उसके अधर,

किन्तु जरा गम्भीर, – नहीं है उनमें हास-विलास,।

हँसता है तो केवल तारा एक

गूँथा हुआ उन घँघराले काले-काले बालों से,

हृदयराज्य की रानी का वह करता है अभीषेक।

अलसता की-सी लता

किन्तु कोमलता की वह कली

सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,

छाँह सी अम्बर पथ से चली।

नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,

नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,

नूपुरों में भी रुनझुन रुनझुन नहीं,

सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द सा “चुप, चुप, चुप”

                                              है गूँज रहा सब कहीं –

व्योम-मण्डल में – जगतीतल में –

सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल-में-

सौन्दर्य गर्विता सरिता के अति विस्तृत वक्ष:स्थल में-

धीर वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में –

उत्ताल-तरङ्गाघात प्रलय घन गर्जन-जलाधि प्रबल में-

क्षिति-में — जल में नभ में अनिल-अनल में,

सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप, चुप, चुप”

                                               है गूँज रहा सब कहीं, –

और क्या है ? कुछ नहीं।

मदिरा की वह नदी बहती आती,

थके हुए जीवों को वह सस्नेह

                                  प्याला एक पिलाती,

सुलाती उन्हें अङ्कों पर अपने,

दिखलाती फ़िर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने;

अर्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती जब लीन,

कवि का बढ़ जाता अनुराग,

विरहाकुल कमनीय कण्ठ से

आप निकल पड़ता तब एक विहाग।

“बादल राग” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

निर्दय विप्लव की प्लावित माया –

यह तेरी रण-तरी,

भरी आकांक्षाओं से,

घन भेरी-गर्जन से सजग, सुप्त अंकुर

उर् में पृथ्वी के, आशाओं से

नव जीवन की, ऊँचा कर सिर,

ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !

                                           फ़िर फ़िर

बार बार गर्जन,

वर्षण है मूषलधार,

हृदय थाम लेता संसार,

सुन-सुन घोर वज्र हुंकार।

अशनि-पात से शायित उन्नत शत शत वीर,

क्षत विक्षत-हत अचल शरीर,

         गगनस्पर्शी स्पर्धा-धीर।

हँसते हैं छोटे पौधे लघु-भार-

                   शस्य अपार,

हिल हिल,

खिल खिल,

हाथ हिलाते,

तुझे बुलाते,

विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।

अट्टालिका नहीं है रे

                         आतङ्क भवन,

सदा पङ्क ही पर होता जल विप्लव प्लावन

क्षूद्र प्रफ़ुल्ल जलज से सदा छलकता नीर,

रोग शोक में भी हँसता है शैशब का सुकुमार शरीर।

रुद्ध कोश, है क्षुब्ध तोष,

अंगना-अंग से लिपटे भी

आतंक-अङ्क पर काँप रहे हैं

धनी, वज्रगर्जन से, बादल,

त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे हैं।

जीर्ण-बाहु, शीर्ण शरीर,

तुझे बुलाता कृषक अधीर,

ऐ विप्लव के वीर!

चूस लिया है उसका सार,

हाड़मात्र ही हैं आधार,

ऐ जीवन के पारावार !

भारत बंद करने से क्या होगा ? जिम्मेदार लोगों को बंद करो ! मैं इसका विरोध करता हूँ !!

    भारत बंद को राजनैतिक दलों ने जनता को अपनी ताकत बताने का हथियार बना दिया है, और टी.वी. पर देखकर ही पता चल रहा था कि राजनीति में अब केवल और केवल गुंडों का ही अस्तित्व है, क्या आम आदमी ऐसा कर सकता है ??

पुतला बनाकर जलाना

टायर जलाना बीच सड़क पर

डंडा लेकर लहराना

इत्यादि

शायद आपका जबाब भी होगा “नहीं”, पर क्यों और ये लोग कौन हैं जो ये सब कर रहे हैं –

    आम आदमी तो बेचारा अपने घर में दुबका बैठा अपनी रोजी रोटी की चिंता कर रहा था और ये बदमाशी करने वाले लोग राजनैतिक दलों के आश्रय प्राप्त लोग हैं, जिन्हें अगर २-४ लठ्ठ पड़ भी गये तो उसकी भी सारी व्यवस्था इन दलों ने कर रखी है। टी.वी. पर फ़ुटेज दिखाये जा रहे थे लोग डंडे खा रहे थे पर बड़े नेता ४-५ पंक्ति पीछे मीडिया को चेहरा दिखा रहे हैं, फ़िर ब्रेकिंग न्यूज भी आ जाती है कि फ़लाने नेता प्रदर्शन करते गिरफ़्तार, सब अपने को बचा रहे हैं, बस भाड़े के आदमी पिट रहे हैं।

    जो राष्ट्र का एक दिन का नुकसान इन दंगाईयों ने किया, उसकी भरपाई कैसे होगी ? जो हम लोगों के कर से खरीदी गई या बनाई गई सार्वजनिक वस्तुओं की तोड़ फ़ोड़ की गई है, उसका हर्जाना क्या ये खुद भरने आयेंगे ? आम आदमी को सरेआम बेईज्जत करना, क्या ये राजनैतिक दलों को शोभा देता है, (जैसा कि टीवी फ़ुटेज में दिखाया गया, बोरिवली में लोकल से उतारकर लोगों को चांटे मारे गये)। तो इन राजनैतिक पार्टियों को बंद का साफ़ साफ़ मतलब समझा देना था। बंद महँगाई के खिलाफ़ नहीं था बंद था अमन के खिलाफ़, बंद था शांति के खिलाफ़, बंद था आम आदमी के खिलाफ़।

    अगर इन राजनैतिक दलों को वाकई काम करना है तो कुछ ऐसा करते जिससे एक दिन के लिये महँगाई कम हो। अपनी गाड़ियों से सब्जियाँ और दूध भिजवाते तो लागत कम होती और आम आदमी को एक दिन के लिये महँगाई से राहत मिलती। ऐसे बहुत से काम हैं जो किये जा सकते हैं, पर इन सबके लिये इनकी अकल नहीं चलती है।

शायद इस बंद का समर्थन हम भी करते अगर इसका कोई फ़ायदा होता, हमारे फ़ायदे –

सब्जी ५०-८० रुपये किलो है वो १०-२० रुपये किलो हो जायें।

दाल १००-१६० रुपये किलो हैं वो ४०-५० रुपये किलो हो जायें।

दूध ३० – ३९ रुपये लीटर है वो १५-२० रुपये लीटर हो जाये।

पानी बताशे १५ रुपये के ६ मिलते हैं, वो ५-६ रुपये के ६ हो जायें। 🙂

    भले ही पेट्रोल, डीजल और गैस के भाव बड़ें वो सहन कर लेंगे पर अगर आम जरुरत की चीजें ही इतनी महँगी होंगी तो जीना ही मुश्किल हो जायेगा, पेट्रोल डीजल नहीं होगा तो सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार हड़ताल करने वाले राजनैतिक दलों की भी थी और भविष्य में भी आयेगी परंतु क्या इन लोगों ने महँगाई कम करने के लिये कोई कदम उठाया ? नहीं क्यों इसका कारण इनको भारत बंद के पहले जनता को बताना चाहिये था, और ये भी बताना चाहिये था कि सरकार कैसे महँगाई कम कर सकती है ? आखिर ये भी तो सरकार चलाना जानते हैं। कैसे करों को कम किया जा सकता है, कैसे कमाई बढाई जा सकती है, फ़िर ये भारत बंद से क्या हासिल होगा ?   कुछ नहीं बस जनता को अपनी शक्ति प्रदर्शन दिखाने के ढ़ोंग के अलावा और कुछ नहीं है ये भारत बंद ।

“भारत बंद – मैं इसका विरोध करता हूँ”

“मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा ?

स्तब्ध दग्ध मेरे मरु का तरु

क्या करुणाकर, खिल न सकेगा ?

                 जग दूषित बीज नष्ट कर,

                 पुलक-स्पन्द भर खिला स्पष्टतर,

                 कृपा समीरण बहने पर क्या,

                 कठिन हृदय यह हिल न सकेगा ?

मेरे दुख का भार, झुक रहा,

इसलिए प्रति चरण रुक रहा,

स्पर्श तुम्हारा मिलने पर क्या,

महाभार यह झिल न सकेगा ?

“प्यार के अभाव में मेरी जिंदगी

एक वीराना बन कर रह गयी है

अगर तुम देख लो, यह सँवर जाये ।” अज्ञात

ज़ूही की कली कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहागभरी-
स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल-तनु तरुणी
जूही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल, पत्रांक में।
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर प्रिया-संग छोड़
किसी दूर-देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
फ़िर क्या ? पवन
उपवन-सरद-रितु गहन-गिरि-कानन
कुंज-लता-पुंजों को पार कर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
                                कली-खिली-साथ !
सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय आगमन वह ?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक क्षमा माँगी नहीं,
निंद्रालस वंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही –
किम्बा मतवाली थी यौवन की मदिरा पुए,
                                                     कौन कहे ?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की,
कि झोंकों की झाड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गाल;
चौक पड़ी युवती,
चकित चितवन निज चारों ओर फ़ेर,
हेर प्यारे को सेज पास
नम्रमुखी हँसी, खिली
खेल रंग प्यारे संग ।
इस कविता में छायावाद की romaniticism का प्रभाव है।
कुछ शब्दों के अर्थ –
विजन – एकान्त
वल्लरी – वेल
गात – प्रेम विभोर होकर कांपते हुए उसके सुन्दर
निद्रालस – निद्रा में अलसाये हुए कटाक्ष

भारती वन्दना कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

भारती जय, विजय करे 
कनक-शस्य-कमल धरे !
लंका पदतल-शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण-युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!
तरु-तृण-वन-लता-वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल-धार हार गले!
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओङ्कार,
ध्वनित दिशाएँ  उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे !

कुछ शब्दों के अर्थ –
कनक-शस्य-कमल धरे ! – प्राकृतिक वैभव से सुसज्जित है।
स्तव – प्रार्थना, गान
खचित – सजा हुआ है।
ज्योतिर्जल-कण – प्रकाशमान जल के कण
प्राण प्रणव – तेरी प्राण शक्ति ही औंकार शब्द है।

कवि परिचय –
जन्म – महिषादल मेदिनीपुर में माघ शुल्क ११ संवत १९५५ (सन १८९८) मृत्यु – १५ अक्टूबर १९६१। पिता – रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त करके दर्शन और बंगला साहित्य का विशेष अध्ययन किया ।
पहली काव्य रचना १७ वर्ष की आयु में की। “समन्वय” और “मतवाला” के सम्पादक रहे।
मुख्य रचनाएँ
अनामिका [१९२३] परिमल [ १९३०] अप्सरा (उपन्यास) [१९३१] अलका (उपन्यास) [१९३३] प्रबन्ध पद्य (निबन्ध) [१९३४] गीतिका [१९३६] तुलसीदास [१९३९] प्रबन्ध प्रतिमा (निबन्ध) [१९४०] बल्लेसुर बकरिहा (उपन्यास) [१९४१] कुकुरमुत्ता [१९४३] नये पत्ते [१९४६] बेला [१९४६] अपरा [१९४८] अर्चना [१९५४] आराधना [१९५५]

स्वास्थ्य के लिये शुल्क बिना सोचे समझे और वित्तीय प्रबंधन के लिये सोच समझकर ? [ Fees for Health and Wealth]

    आपमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि स्वास्थ्य के लिये शुल्क सोच समझकर देते हैं, अगर शुल्क ज्यादा होता है तो तकाजा करते हैं या डॉक्टर को बिना दिखाये वापिस आ जाते हैं, एक भी नहीं ? आश्चर्य हुआ !!! आखिर आप अपने स्वास्थ्य के लिये कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं, आप हमेशा अच्छे डॉक्टर को ही चुनेंगे, भले ही उनके यहाँ कितनी भी भीड हो, नहीं, पर क्यों ??

    जब स्वास्थ्य प्रबंधन के लिये आप इतना खर्च कर सकते हैं तो अपने वित्तीय प्रबंधन के लिये क्यों नहीं ?? ओह मुझे लगता है कि यहाँ आपको लगता है कि आप बहुत ही विद्वान हैं और अपने धन को बहुत अच्छे से प्रबंधन कर रहे हैं, आपसे अच्छा प्रबंधन कोई कर ही नहीं सकता है, ये वित्तीय प्रबंधन करने वाले लोग तो फ़ालतू का शुल्क ले लेते हैं, या फ़िर अगर कोई वित्तीय प्रबंधक ज्यादा शुल्क लेता है तो कम शुल्क वाले वित्तीय प्रबंधक को ढूँढ़ते हैं। नहीं ??

जैसे स्वास्थ्य के लिये कोई समझौता नहीं करते हैं फ़िर वित्तीय प्रबंधन के लिये कैसे करते हैं ?

जैसे स्वास्थ्य के लिये कोई तकनीकी ज्ञान आपके पास नहीं है, वैसे ही वित्तीय प्रबंधन के लिये है ?

जैसे स्वास्थ्य के लिये आप अपने चिकित्सक को सभी परेशानियाँ बता देते हैं, क्या वैसे ही वित्तीय प्रबंधक को अपनी सारी आय, खर्च, जमा और ऋण बताते हैं ?

क्या आपने कभी सोचा है कि कम शुल्क देकर आप अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं, जी हाँ, क्यों ?

अगर वित्तीय प्रबंधक ने गलत सलाह दे दी तो ? आपके वित्त की ऐसी तैसी हो जायेगी ।

    और अगर ज्यादा शुल्क वाला अच्छा वित्तीय प्रबंधन करता है तो शुल्क थोड़ा ज्यादा लेगा परंतु आपको वित्तीय रुप से सुरक्षित कर देगा, और यकीन मानिये कि आप सोच भी नहीं सकते आपके वित का इतनी अच्छी तरह से प्रबंधन कर देगा। क्योंकि आपको आज के बाजार के बहुत सारे उत्पाद पता ही नहीं होंगे और होंगे भी तो कैसे कार्य करते हैं, उसका पता नहीं होगा।

एक छोटी सी बात –

    अगर आपके शहर में ४ चिकित्सक हैं, और आपके घर में कोई बीमार पड़ गया, तो आप किस चिकित्सक को दिखायेंगे, आप शहर में नये हैं, तो दवाई की दुकान पर पूछेंगे या फ़िर अपने आस पड़ौस में पूछताछ करेंगे। आपको पता चलेगा कि ३ चिकित्सक तो ऐसे ही हैं पर जो चौथा चिकित्सक है, उसके हाथ में जादू है, उसकी फ़ीस भले ही ज्यादा है परंतु उसका ईलाज बहुत अच्छा है। तो आप उस ज्यादा फ़ीस वाले चिकित्सक के पास जाना पसंद करेंगे।

    परंतु वित्तीय प्रबंधक चुनते समय ऐसा बिल्कुल नहीं है, क्योंकि सब कहीं न कहीं पढ़ लिखकर अपने आप को ज्ञानी समझने लगते हैं, कि हमें वित्तीय प्रबंधक की कोई जरुरत ही नहीं है, और खुद ही प्रबंधन करके अपने वित्त को बढ़ने में बाधा बन जाते हैं। पहले पता कीजिये कि कौन अच्छा प्रबंधन करता है, शुल्क कितना है ये आप मत सोचिये क्योंकि अगर वित्तीय प्रबंधन अच्छे से हो गया तो शुल्क बहुत भारी नहीं होता है। 

    वित्तीय प्रबंधन के लिये सर्टिफ़ाईड फ़ाईनेंशियल प्लॉनर को बुलायें, जैसे हमारे देश में सी.ए., सी.एस. होते हैं वैसे ही सी.एफ़.पी. होते हैं, जो कि भारत सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मापद्ण्डों पर दिया जाने वाला सर्टिफ़िकेट है। ये लोग वित्तीय प्रबंधन में विशेषज्ञ होते हैं, और भारत में यह तीन वर्ष पहले ही शुरु हुआ है। इसमें भविष्य बहुत ही अच्छा है इसके बारे में तो बहुत से लोगों को पता ही नहीं है, और तीन वर्ष में केवल १००४ सी.एफ़.पी. (CFP) ही बाजार में आ पाये हैं।

सी.एफ़.पी. (CFP) के अंतर्जाल के लिये यहाँ चटका लगाईये।

    तो अब आपको फ़ैसला करना है कि आपको अपने वित्त का प्रबंधन वित्तीय चिकित्सक से करवाना है या फ़िर जैसा अभी तक चल रह है वैसे ही करना है। अपनी सोच बदलिये और जमाने के साथ नये उत्पादों में निवेश कर अपने वित्त को नई उँचाईयों पर पहुँचाइये।