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शेयर बाज़ार में रोज़ नई चीजें कैसे सीखें

शेयर बाज़ार में लोगों का interest जब से lockdown लगा है, तब से कुछ ज्यादा ही हुआ है। इसी कारण से कोई भी ब्रोकर हो उनके यहाँ रिकार्डतोड़ DMAT account खुल रहे हैं। पर समस्या यह है कि लोगों को पैसा बनाने के लिये टिप चाहिये होती है, सीखने वाले न के बराबर हैं। टिप बहुत बुरी बीमारी है, टिप से व्यक्ति को अपनी risk ही पता नहीं रहती। किसी और के कहने पर अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा अंधी दौड़ के लिये लगाता जाता है।

खैर ज़्यादा भाषण नहीं, तो मुख्य बात यह है कि शेयर बाज़ार में रोज़ नई चीजें कैसे सीखें, यहाँ तक कि बुनियादी बातें, Share market terms कैसे जानें। उसके लिये बहुत ही बढ़िया तरीका है कि आप यूट्यूब पर जाकर आपको जो सीखना है वह सीखना शुरू करें, फिर जो terms आपको समझ न आती हों तो उन terms को लिखकर सर्च करें, इस प्रकार कड़ी से कड़ी जोड़कर आप बहुत सी चीजों को सीख सकते हैं।

मुझे शेयर बाज़ार में काम करते हुए 20 वर्ष से ज़्यादा हो गये, पर अब भी बहुत सी नई चीजें उनके बीच के co-relation पता चलते हैं, तो बच्चे जैसा सीखने के लिये मचल जाता हूँ, और फिर पागलों की तरह की वीडियो देखता रहता हूँ, ब्लॉग पढ़ता हूँ, ट्विटर पर ढूँढता हूँ, साथ ही अपनी कॉपी रखता हूँ, और जो भी महत्वपूर्ण बिंदु होते हैं, उन्हें लिखता जाता हूँ, अगर data उपलब्ध होता है तो हाथों हाथ उन सबकी back testing भी कर लेता हूँ, तथा अगले दिन से paper trade में शामिल कर लेता हूँ।

केवल इसी हैबिट के कारण मुझे पिछले एक महीने से इतना फ़ायदा हुआ कि अब एक डील में weekly expiry के दिन लेता हूँ और Friday बाजार बंद होने के पहले या Monday morning में ही मुझे मेरी लगायी मार्जिन रकम का 1.5 – 2% का रिटर्न मिल जाता है, जिसके लिये मुझे बारबार बाजार भी नहीं देखना होता है। मैं अपना ऑफिस के काम में व्यस्त रहता हूँ, बस किसी एक ब्रेक में डील देख लेता हूँ, जब भी मुझे 1.5-2% के आसपास का फायदा होता है, मैं निकल लेता हूँ। महीने का 8% जो कि साल का 96% याने कि लगभग पैसा दोगुना एक साल में हो जायेगा। अभी तक मेरा profit 2% हर सप्ताह के हिसाब से पिछले 3 सप्ताह से हो रहा है, जिसकी पेपर ट्रेडिंग मैंने लगभग 1 महीना की, फिर मुझे confidence आ गया, क्योंकि मैं बहुत सारे ifs and buts जानता था, अगर trade गलत हो गई तो उसके adjustments भी करना जानता हूँ।

आज कुछ नई बातें MACD, Elliot Waves पर सीखीं, back testing भी करी, अब कल से paper trade करेंगे, अगर यह समझ आ गया तो बस मजा ही आ जायेगा।

शेयर बाज़ार जुआँ सट्टा नहीं है, बहुत सी चीजें technicals पर चलती हैं, बहुत सी नहीं, इसलिये सीखना बहुत है, मेरा तो यही मानना है कि शेयर बाज़ार में आकर मुनाफ़ा कमाना दूर की बात है, पहले आप जो पैसा बाज़ार में लगाने के लिये लाये हैं, पहले उसे बचाना सीख लें, अगर वह सीख लिया तो profit तो झक मारकर आयेगा।

पुनीत राजकुमार की असामयिक मृत्यु

कल कन्नड़ अभिनेता पुनीत राजकुमार की ह्रदयाघात से मृत्यु हो गई, उनकी उम्र केवल 46 वर्ष थी, मतलब कि बिल्कुल मेरी उम्र के थे। हालाँकि मैंने शायद उनकी एक ही फ़िल्म देखी थी, उनके भाई शिवा राजकुमार के साथ हमने बेटेलाल की एक फ़ोटो बैंगलोर एयरपोर्ट पर ली थी। कन्नड़ फ़िल्में न देखने के कारण हमें बहुत ज़्यादा कुछ पता नहीं हैं, परंतु एक बात देखी है कि दक्षिण भारत में अपने नेताओं के लिये ज़बरदस्त प्यार देखने को मिलता है, जिसकी मिसाल इसी बात से है कि कई अभिनेताओं व अभिनेत्रियों को राजगद्दी पर वर्षों तक बैठाये रखा।

कल जब बैंगलोर के फेसुबक पेज पर जहाँ कि पुनीत राजकुमार के बारे में जानकारी दी जा रही थी वहीँ कमेंट पढ़ रहा था, कई लोगों ने कमेंट में लिखा था कि वैक्सीन के बाद के साइड इफ़ेक्ट हैं, और वैक्सीन के बाद बहुत सी गंभीर बीमारियों का लोगों को सामना करना पड़ रहा है।वहीं मेरा मत भी यही है कि वैक्सीन लगने के बाद मेरे अपने ही कई परिचितों को मैंने खोया, इससे मैं कई दिनों तक टूटा रहा। वैक्सीन के इन साइड इफेक्टों की सरकार को या किसी स्वतंत्र एजेंसी को जाँच करनी चाहिये।

कल शाम को बाज़ार गये थे, तो वहाँ चौक पर पुनीत राजकुमार की फ़ोटो और कर्नाटक का झंडा शोक स्वरूप झुका रखा था। बैंगलोर में लगभग हर क्षैत्र में किसी एक चौक पर इवेंट के लिये जगह है, जहाँ लोकल लोग इकठ्ठे होकर कन्नड़ त्योहार मनाते हैं। वहीं आसपास अच्छे से सजाया भी जाता है। अब दो दिन बाद १ नवंबर को कर्नाटक राज्योत्सव है, जिसकी लगभग हर कंपनी में छुट्टी होती है उस दिन हर चौक पर सजाया जाता है, ऑटो टैक्सी पर फूलों की मालायें व उन पर कर्नाटक राज्य का झंडा लगाकर रैली भी निकालते हैं, साथ ही दिनभर ऐसे ही घूमते हैं। हमें भी अच्छा लगता है, क्योंकि इस तरह से त्योहारों को जब आनंददायक बनाया जायेगा, तब ही लोग इस तरह के इवेंट से जुड़ेंगे।

पुनीत राजकुमार की इस असामयिक मृत्यु पर हमें भी बहुत दुख हुआ, वे बहुत से ऐसे सामाजिक कार्यों में मदद करते थे, कई जगह चंदा देते थे, उनकी मदद से कई लोगों के जीवन चल रहे थे, वे अब अपने आपको अनाथ मान रहे हैं।

ज़िंदगी कितनी भी हो, छोटी या बड़ी बस उसका इंपेक्ट लोगों पर लंबे समय तक रहना चाहिये, वह भी अच्छे स्वरूप में, ऐसी कोशिश हर किसी को करनी चाहिये।

मानोगे तो परेशानी है, नहीं तो सब सामान्य है

परेशानी ऐसी चीज है, अगर किसी समस्या को बड़ी मानोगे तो बड़ी होगी, छोटी मानोगे तो छोटी, और न मानोगे तो न होगी। बस यह हमारा दिमाग़ है जो किसी भी कठिनाई को समस्या मान लेता है और फिर उस समस्या का समाधान न मिलने पर उसे परेशानी का नाम देकर अपने दिमाग़ में चिंता रूपी कीड़ा पाल लेता है। फिर वह कीड़ा दिन रात दिमाग़ में घूमता रहता है और बिना किसी बात के वह छोटी सी कठिनाई जो लगती है, पर दरअसल कई बार होती भी नहीं है, कीड़ा दिमाग़ में अपना भौकाल बनाये रखता है।

हमें वह कीड़ा उस कठिनाई से निपटने के लिये कोई समाधान न सुझाता है, परंतु उसकी जगह हमें वह कीड़ा नकारात्मक विचार हमारे ज़हन में भर देता है, कि अगर ऐसा हो गया तो, वैसा हो जायेगा, फिर वैसा और फ़लां को पता चल गया तो बस हो गया काम। इस तरह से हम अपनी कोई छोटी सी कठिनाई को पहले समस्या फिर परेशानी बना लेते हैं। कई बार हम अगर किसी बात को इग्नोर कर दें तो बहुत सी बातें कठिनाई नहीं बनतीं, जब कठिनाई नहीं होगी तो न समस्या होगी न परेशानी होगी।

कई कठिनाइयाँ समय के साथ अपने आप ही लुप्त हो जाती हैं और कई समय के साथ बढ़ती हैं, तो हमें पहले कठिनाई का प्रकार समझकर विश्लेषण कर लेना चाहिये, वह भी साफ़ मन व दिमाग़ से, पहली बात तो यह कि कठिनाई को कठिनाई न मानें, जीवन है तो कठिन तो होगा ही, कठिन होगा तो समस्या व परेशानी भी आनी ही हैं। इसलिये बेहतर है कि अपने दिमाग़ व मन को साफ़ रखें तथा जीवन की सोच को साधारण रखें।

दरअसल 99% समय होता यह है कि हम फ़ालतू की कोई बात दिल या दिमाग़ में धर लेते हैं और ख़ुद ही परेशानी बना लेते हैं। क्यों? क्योंकि हमारा दिमाग़ वाक़ई बहुत फ़ालतू होता है, एक साथ हज़ारों चीजें सोच सकता है और जिस चीज में उसे मज़ा आता है, वही बातें दिमाग़ के कोनों से टकराकर लौटकर वापिस आती है, तो इस फ़ालतू दिमाग़ को सबसे पहले आराम दें, अपने मन को तटस्थ रखें, इसके लिये थोड़ा सा ध्यान लगाकर बहुत जल्दी सफलता पाई जा सकती है। फ़ालतू की चीजों में अपना समय न गँवायें, कुछ अच्छा देखें, कुछ अच्छा पढ़ें, नई चीजें सीखें, देखें, भले न समझ आयें परंतु जब एक बार कुछ करने की इच्छा पर आपने विजय पा लिया तो, आप अपने एक नये रूप को जल्दी ही धरातल पर देखेंगे।

कठिन कार्यों को सीखने की कला

बहुत से काम कठिन होते हैं, परंतु सीखने और फिर रोज उसे अभ्यास करने से वे काम कब कठिन से बेहद सरल हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। बस हमारे अंदर सीखने की आकांक्षा और रोज अभ्यास करने का बल होना चाहिये। यही कठिन कार्यों को सीखने की कला है।

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सबसे पहला उदाहरण साईकिल है, साईकिल 2 चक्कों पर चलने वाला वाहन है और जिसने कभी चलाया नहीं, वह व्यक्ति साईकिल चला रहे लोगों को अजूबों की तरह देखता है, क्योंकि उसे बैलेन्स बनाना नहीं आता, परंतु जो साईकिल चला रहे होते हैं, अब उनके लिये यह रोजमर्रा का काम हो गया होता है। जब साईकिल सीखते हैं, तो लगता है कि कितने सारे काम एक साथ करना होते हैं, बैलेन्स बनाना होता है, साईकिल का हैंडल सही तरीके से पकड़ना होगा और कंट्रोल नहीं छोड़ना होगा, पैडल भी मारने होंगे, ब्रेक भी लगाना होगा, तो इन सबका सामंजस्य बैठाने में शुरू में बहुत समस्या होती है।
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ऐसे ही जब मैंने कार सीखना शुरू की थी, तो लगा था कि सबसे पहले तो कार को सही तरीके से चलाने का जजमेंट आना चाहिये, क्योंकि कार इतनी बड़ी है और आप एक तरफ कोने वाली सीट पर बैठकर चला रहे होते हैं, किसी कार में बोनट दिखता है, किसी में नहीं, इसलिये कई कारों में आपने देखा होगा कि बोनट के आगे एक डंडा लोहे का लोग लगा लेते हैं, वैसे ही पीछे की और भी लगा लेते हैं, यह कोई शौक नहीं होता, बल्कि सही जजमेंट के लिये लगा लिया जाता है।
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जब पहले दिन कार चलाना सीखना शुरू किया तो ड्राईविंग स्कूल का ड्राईवर जो सिखाता था, बहुत ही गंदी तरीके से बात करता था, और कहता भी था, कि आप बुरा मत मानना, परंतु अगर जब तक मैं इस तरह से बोलूँगा नहीं आपको याद ही नहीं रहेगी और अगली बार फिर से वही गलती करने से आप खुद ही बचोगे, आज भी जब मैं कोई गलती कर लेता हूँ, तो जहन में उसी की आवाज गूँज जाती है।
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पहले दिन केवल स्टेयरिंग हाथ में पकड़ाया और कहा कि केवल स्टेयरिंग पर ध्यान दो, गढ्ढे में गाड़ी को मत जाने दो, फिर धीरे धीरे कुछ दिनों में क्लच, एक्सीलरेटर और गियर के साथ सब कुछ सिखा दिया, पहले 15 दिन तो मेरी जान ही निकली रहती थी कि इतनी सारी चीजों के सामंजस्य के साथ कैसे लोग कार चला लेते हैं। परंतु अब इतने वर्ष हो गये चलाते चलाते तो ये सब बहुत आसान हो गया, अब तो कार चलाते चलाते बहुत से काम भी कर लिये जाते हैं।
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दोहा याद आ जाता है –
करत करत अभ्यास के जड़मत होत सुजान
रसरी आवत जात ते  सिल पर पड़त निसान
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यह सामंजस्य बैठाने का खेल सबके साथ होता है, आप बताईये कि आपको क्या सीखने में सबसे ज्याादा कठिनाई महसूस हुई और फिर वही काम बहुत आसान हो गया।
लखनवी समोसे

लखनवी समोसे

लखनवी समोसे
लखनवी समोसे

जब से लॉकडाऊन लगा है, तब से हम यूट्यूब पर ज्यादातर वीडियो खाने पीने व ट्रेवलिंग के वीडियो बहुत देखने लगे हैं। खाने पीने के वीडियो ज्यादा देखने का एक मूल कारण यह भी है कि लॉकडाऊन के चलते बाहर का खाना लगभग बिल्कुल ही बंद है। बेटेलाल अपनी परीक्षा के बाद बोर होने लगे थे, तो खाना बनाने में रूचि जागृत हुई, हम उन्हें रसोई में जाने की इजाजत नहीं देते थे, परंतु सोचा कि चलो अब लॉकडाऊन के चलते अपनी देखरेख में रसोई में काम करने की इजाजत दे देते हैं।

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हम तो वैसे कई प्रकार के वीडियो देखते हैं जैसे कि एक्सेल के फंक्शन को उपयोग करने के तरीके, पॉवरपॉईंट प्रेजेन्टेशन को किन तरीकों से ओर बेहतर बनाया जा सकता है, नई चीजों को सीखना, जैसे कि टैब्ल्यू, पॉवर बीआई इत्यादि।
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खैर हम आते हैं अपने लखनवी समोसे पर, फोटो नहीं खींच पाये, कल रात को ही यूट्यूब पर रनवीर बरार शेफ के चैनल से सीखा था, रनवीर लगता है कि हमउम्र ही होंगे, पर उनका बोलने का तरीका, खाना बनाने का सिखाने का तरीका, बिल्कुल ही अलग अंदाज है। हमें बहुत अच्छा लगता है उनका देसी तरीका जब वे खाने के मसालों के बारे में बताते हैं या फिर उस डिश से जुड़ी कोई कहानी, या उसकी दास्तान सुनाते हैं। देखिये खाने में कोई धर्म नहीं होता है, इसलिये खाने को खाने की दृष्टि से ही सोचना व देखना चाहिये, यह रनवीर का कहना है। एक बात ओर हर वीडियो में वे कहते हैं, ध्यान से देख लीजिये, या समझ लीजिये यह गड़बड़ी हो जायेगी ओर फिर आप कहेंगे कि रनवीर ने यह तो बताया ही नहीं, तो रनवीर ने आपको यह बता दिया है। तो सबकी अपनी अपनी सिग्नेचर टोन या वाक्य होते हैं, यह रनवीर का सिग्नेचर वाक्य है।
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लखनवी समोसे में नजाकत होती है, मिर्च नहीं होती है, उबले हुए आलू लेने हैं, हाथ में ही चाकू से छोटो छोटे टुकड़ों में काट लेना है, क्योंकि लखनवी समोसे हैं, नजाकत का हर समय ध्यान रखना है। फिर एक पैन में एक चम्मच घी, जीरा, सौंफ, बारीक कटी हुई अदरक, कूटा हुआ सूखा हरा धनिया डाल लें और फिर इसमें कटे हुए आलू मिला लें, अच्छे से आलुओं को चला लें, ऊपर से थोड़ा सा अजवाईन, स्वादानुसार नमक मिला लें। तो यह तो तैयार हो गया लखनवी समोसे का  मसाला।
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अब बारी आती है समोसे की परत बनाने की, तो उसके लिये मैदा, थोड़ा अजवाईन व मौन के लिये घी, थोड़ा नमक और इसे मलना है बर्फ के ठंडे पानी से। समोसे का आटा थोड़ा सख्त रखें, आटा होने के बाद थोड़ी देर कपड़े से ढ़ँककर छोड़ दें।
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बस अब आटे से चकले पर रोटियों जैसे बेल लें और उसे बीच से काटकर किनारों पर थोड़ा पानी लगाकर समोसे के आकार में ढ़ालकर थोड़ा थोड़ा आलू का मसाला भरते जायें, ध्यान रखें समोसे छोटे बनायें। जब सारे समोसे भर जायें तब मीडियम तेज आँच पर समोसों को तल लें, ध्यान रखें कि अगर ज्यादा तेज गर्म तेल होगा तो समोसे पर फफोले पड़ जायेंगे। समोसे पर फफोले न पड़ें इसके लिये तेल बहुत ज्यादा तेज गर्म न हो, समोसे तलने में समय ज्यादा लगेगा।
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समोसे तैयार हो जायें तो इन लखनवी समोसे को आप हरी व लाल मीठी चटनी के साथ परोसें।
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हम अपनी जबान पर कंट्रोल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, परंतु घर के घर में अब 10 महीने हो गये हैं, कुछ तो एक्साईटेड होना चाहिये, तो खाने पीने में ही सही।
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बताईये आप घर में बंद होकर बोर तो हो ही रहे होंगे, आप कैसे इस समय का सदुपयोग कर रहे हैं, व नया क्या सीख रहे हैं।

दिल का दौरा

सौरव गाँगुली को दिल का दौरा 2 जनवरी 2021 को पड़ा, और उन्हें तत्काल ही अस्पताल में ले जाया गया, तथा अब एन्जियोप्लास्टी भी की गई है, हमने यह अखबारों में व सोशल मीडिया में पढ़ा। दादा जल्दी स्वस्थ हों, हमारी शुभकामनायें उनके साथ हैं।

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सब जगह यही बात चल रही थी कि खिलाड़ी को कैसे दिल का दौरा पड़ सकता है, खिलाड़ी तो इतना दौड़ते भागते हैं, फिर भी उन्हें दिल का दौरा कैसे पड़ सकता है। दरअसल खिलाड़ी होने से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दिल का दौरा मतलब कि हमारे ह्रदय में ब्लॉकेज हो जाना, वो कोलोस्ट्रोल व ट्राईग्लिसराईड से होता है।
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कोलोस्ट्रोल याने कि कोई भी डेयरी उत्पाद जैसे कि दूध, घी, अंडा, पनीर, मांसाहार कुछ भी, वहीं दूसरी चीज है ट्राईग्लिसराईड तो यह मिलता है तेल में, भले कोई तेल हो, बादाम में सबसे ज्यादा होता है, नारियल में भी। तेल कोई हो वह आपको ट्राईग्लिसराईड देगा ही। एक बात और बता दें यहाँ कि तेल को अगर ज्यादा बार उपयोग किया जाता है तो उसमें ट्रांसफैट भी होता है, जो कि बहुत ही ज्यादा हानिकारक है, तेल को मात्र एक बार ही उपयोग करना चाहिये, उसके बाद उसमें ट्रांसफैट बनने लगता है, पर हम भारतीय लोग तेल को जाने कितनी बार उपयोग कर लेते हैं।
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तो होता यह है कि 18 वर्ष की उम्र तक शरीर की ग्रोथ होती रहती है और उसके बाद लंबाई बढ़ना बंद हो जाती है, पर खानपान में कोई सुधार नहीं होता, तो लंबाई की जगह मोटाई बढ़ने लगती है। जितना ज्यादा आप कोलोस्ट्रोल वाली चीजों का उपयोग करेंगे, उतनी ही जल्दी ह्रदयाघात की समस्या होगी। विस्तार से इस पर एक ओर पोस्ट लिख दी जायेगी।
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तो  कोलोस्ट्रोल व ट्राईग्लिसराईड डैडली कॉम्बो हैं, और उच्च रक्ताचाप तो सोने पर सुहागा है। हम यही कहेंगे कि डेयरी उत्पादों, मांसाहार, धूम्रपान, मद्यपान व तेल सबसे ज्यादा हानिकारक है। न उपयोग करें, उतना अच्छा। दादा तो बड़ी हस्ती हैं, प्रधानमंत्री जी फोन करके उनसे हालचाल पूछते हैं, व उनके लिये भारत के बेस्ट ह्रदय रोग विशेषज्ञों की तत्काल ही समिति बना दी गई, पर हम साधारण लोग हैं, हमारे लिये तो सामान्य सा डॉक्टर भी हमें लाईन में बिठायेगा। अपना व परिवार की सेहत का ध्यान हमें ही रखना है।

मानसिक परेशानी

कुछ बातें जो हमें परेशान करती हैं, हमेशा ही दिमाग में घूमती ही रहती हैं। और हम उनके अपने दिमाग में घूमते रहने से ओर ज्यादा परेशान हो जाते हैं। दिन हो या रात हो, जाग रहे हों या सो रहे हों, बस वही बातें दिमाग में कहीं न कहीं घूमती रहती हैं। कई बार यह बड़ी मानसिक परेशानी की वजह हो जाती है। हम चाहे कुछ भी कर रहे हों, पर हमेशा ही वह परेशानी हमारे दिमाग में घूमती ही रहती है। दिमाग शांत नहीं रहता, हमेशा ही अशांत रहता है। दिमाग में जैसे कोई फितूर घुस गया हो।

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कई बार तो लगता है कि व्यक्ति साईको हो जाता है, हम कहीं भी कितना भी भाग लें, पर उन डर के विचारों से पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं, और जब तक कि वह परेशानी सुलझ नहीं जाती, तब तक हम किसी भी बात को सही तरीके से कर ही नहीं पाते, अपना कोई भी मनपसंदीदा काम हो, कोई फिल्म ही क्यों न हो, या फिर आपका कोई प्रिय लेखक ही क्यों न हो। भले घर में मनसपंदीदा व्यंजन बना हो, पर जब इस प्रकार की परेशानी से जूझ रहे होते हैं तो वह भी अच्छा नहीं लगता।
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कहना आसान  है कि अपना ध्यान भटकाओ, उसके बारे में मत सोचो, कुछ ओर कर लो, कहीं घूम आओ, पर दरअसल परेशानी हमें छोड़ती ही नहीं, इसका एक कारण मुझे समझ आता है कि हम अपना आत्मविश्वास कमजोर कर चुके होते हैं और उसे हम अपने दैनिक जीवन की बहुत सी आदतों में प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं, कई बार अकेले में बैठकर रोने का मन करता है, कई बार कोने में घुटनों में छुपकर रहना चाहते हैं, तो कई बार हाथ पैर काँपने लगते हैं। यह सब बहुत ज्यादा नेगेटिव वातावरण ओर ज्यादा तकलीफदेह होता है।
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समस्या का समाधान बहुत सीधा नहीं है, क्योंकि किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता है, और न ही किसी को मन की पीड़ा बताई जा सकती है। कई बार छोटी परेशानी भी हम बड़ी समझ लेते हैं ओर परेशान होते रहते हैं। ऐसे समय जितना हो सके अपने आपको अच्छे लोगों के सान्निध्य में रखने की कोशिश करें, नेगेटिविटी कम करें। ध्यान करें, सुबह शाम टहलने जायें, प्रकृति के बीच रहें। छोटी छोटी चीजों में अपनी खुशियाँ ढूँढ़ें। आपने जो उपलब्धियाँ अभी तक पाई हैं, उन्हें याद करें और उनसे पॉजीटिव ऊर्जा लें।
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क्या और भी कोई तरीका है, इन परेशानियों से छुटकारा पाने का, तो बताईये?

लॉकडाउन में बेटेलाल

लॉकडाउन में बेटेलाल ने जमकर खाना बनाने का लुत्फ उठाया है, केवल वीडियो देखकर, थोड़ी अपनी अक्ल लगाकर जो पारंगत हुए हैं, काबिले तारीफ है।

खाना बनाना बहुत आसान नहीं है, इसमें सबसे मुश्किल है खाना बनाने के लिये अपने आप को तैयार करना। खाना बनाना दरअसल केवल महिलाओं का ही काम समझा जाता है, पर बेटेलाल कहते हैं कि जो स्वाद मेरे हाथ का होगा, वह किसी और के हाथ में नहीं, ध्यान रखना। वाकई स्वाद तो है।

आटा गूँथना भी रख स्किल है, रोटी, पराँठे, पूरी, बाटी, बाफले, मैदा सबको अलग अलग तरह से गूँथा जाता है। पर बेटेलाल अब इन सबमें परफेक्ट हो चुके हैं। उन्हें नान बहुत पसंद है, जिस दिन खाने की इच्छा होती है सबसे पूछ लेते हैं, फिर नान और पनीर की सब्जी बनाते हैं।

यही हाल इनका गेमिंग में है, पब्जी में पता नहीं कौन सी रैंकिंग हो गई है,चेस खेलने का शौक है तो पता नहीं कहाँ कहाँ के चेस के मैच देखते रहते हैं, फिर यूट्यूब के वीडियो, मूवीज और वेबसिरिज में लगे रहते हैं। पढाई जिस दिन मूड होता है किसी एक विषय का पूरा चेप्टर निपटा देते हैं। वीडियो में भी कुछ अलग ही देखते हैं, जैसे शार्क टैंक और भी कई एंटरप्रेन्योरशिप के कुछ अलग अलग।

रोको टोको मत बस, जो करना चाहते हैं करने दो, हम कहे, करो भई करो, इन सबका भी कुछ विधान ही होगा।

लॉकडाऊन में बैंगलोर से कोझिकोड 400 किमी मित्र की यात्रा बाईक से

लॉकडाऊन में बैंगलोर से कोझिकोड 400 किमी मित्र की यात्रा बाईक से परिवार के पास पहुँचने के लिये –
 
आज सुबह मित्र से बात हो रही थी, वे कालिकट केरल के रहने वाले हैं, कालिकट को कोझिकोड़ भी कहा जाता है। उनका परिवार लॉकडाऊन के पहले ही घर चला गया था, और इसी बीच अचानक ही लॉकडाऊन लग गया, और मित्र यहीं रह गये।
 
घर से काम चालू हो गया, वैसे तो उन्हें खाना बनाना आता था, परंतु जब रोज़ सुबह शाम खाना ऑफिस के काम के साथ बनाना पड़े तो बहुत मुश्किल होती है।फिर एक दिन ऐसा भी आया कि आलस के कारण और काम ज़्यादा होने के कारण कुछ बना नहीं पाये, तब जाकर उन्होंने सोचा कि जब भी फ़ुरसत हो और खाना बनाने का मूड हो, कुछ न कुछ बनाकर रख लो, जिससे घर में खाने के लिये कुछ न कुछ हमेशा रहे। साथ ही वे कुछ इंस्टैंट फ़ूड भी ले आये, मैगी वग़ैरह।
 
तो एक और मित्र केरल के पालक्कड़ से हैं, उनके साथ भी यही समस्या थी, पर लॉकडाउन के चलते परिवार के पास घर नहीं जा पा रहे थे। दोनों के साथ एक ही समस्या थी कि दोनों की कारें इनके गृहनगर में ही खड़ी थीं, लॉकडाऊन के पहले परिवार को छोड़ने गये थे तो वहीं कार छोड़ आये थे। इन दोनों ने आपस में बात की और कहा कि बाईक से ही चलते हैं, दोनों ने ई-पास के लिये आवेदन दिया था और पिछले बुधवार को गुरूवार को यात्रा करने के लिये उन्हें ई-पास मिल गया, पालक्कड़ वाले मित्र गुरूवार सुबह निकल गये अपनी बाईक से और अच्छे से घर पहुँच भी गये (हालाँकि मेरी बात इनसे नहीं हो पायी, जैसे कालिकट वाले मित्र ने बताया)
 
कालिकट वाले मित्र ने बताया कि बुधवार को काम ज़्यादा था और उस वजह से नींद पूरी नहीं हो पायी, इसलिये गुरूवार को नहीं निकले, गुरूवार को दोपहर से ही सो गये, जिससे नींद पूरी हो जाये और शुक्रवार को सुबह 5 बजे निकलने का प्लॉट किया, इसके पहले अपनी 15 वर्ष पुरानी बजाज पल्सर बाईक को सर्विस सेंटर लेकर पहुँचे और ज़रूरी मरम्मत करवाई।
 
साथ में लेपटॉप बैग, पानी व खाने का समान, क्योंकि रास्ते में किसी भी रेस्टोरेंट में नहीं रूकना था। सारा सामान बाईक की पीछे वाली सीट पर बाँधकर चल दिये। केरल जाने के बैंगलोर से दो रास्ते हैं एक जो कि मधुमलई जंगल क्षेत्र से होकर जाता है, अभी लॉकडाऊन में बंद कर दिया है, दूसरा रास्ता लगभग 50 किमी लंबा है।बैंगलोर से कोझिकोड़ की दूरी अब उनके लिये 400 किमी की थी।
 
सुबह यात्रा शुरू करने के बाद 50 किमी के बाद ही उनकी कमर में दर्द शुरू हो गया, तब उन्हें हमारी बहुत याद आई मेरे पास बाईक के लिये एयर फ्लोटर सीट है जिससे पीठ में दर्द नहीं होता, हमने उनसे कहा भी कि अगर जाना था, तो मेरी सीट ले जानी थी, वे बोले यह तो तब याद आया जब कमर में दर्द हुआ, फिर उन्होंने निर्णय लिया कि हर 50 किमी के बाद 10 मिनिट का आराम करेंगे और फिर से बाईक चलायेंगे। इस प्रकार वे लगभग 12 बजे कर्नाटक केरल बॉर्डर पर पहुँच गये, कर्नाटक बॉर्डर पर उन्होंने अपना ई-पास दिखाया और उन्हें केरल में जाने दिया।
 
केरल की बॉर्डर शुरू होते ही पहला चेकपोस्ट पड़ा, जहाँ पर उनसे पूछताछ हुई और ई-पास देखा गया, फिर कहा कि बाईक साइड में लगाओ, स्वास्थ्य की जाँच हुई और सेनेटाईजेशन स्टेशन में उनकी बाईक लगवाई गयी, और बाईक को अच्छे से सेनेटाईज किया गया, और कहा कि अब दो मिनिट के बाद बाईक को आप शुरू कर सकते हैं। बहुत सारे दिशा निर्देश दिये गये।
 
वहाँ से लगभग 15-20 मिनिट बाद निकले तो फिर से 100 मीटर के बाद एक और चेकपोस्ट आ गई, वहाँ फिर से उनके स्वास्थ्य की जाँच हुई, और पूछताछ हुई, कि क्यों जा रहे हो वग़ैरह वग़ैरह, फिर वहाँ से उनको स्वास्थ्य अधिकारी, डॉक्टर, अस्पताल, खाद्य विभाग इत्यादि कई लोगों के नंबर दिये गये, कि उनसे संपर्क करके मदद ली जा सके, और उन्हें कहा गया कि आपको 7 दिन के क्वारेंटाईन में रहना है। और उसके बाद उन्हें एक Red Card दिया गया कि आपको अब हर चेकपोस्ट पर यह दिखाना है, खाना आपको रोज़ घर पर पहुँचाया जायेगा, रोज़ आपके पास फ़ोन करके आपसे आपके स्वास्थ्य की जानकारी ली जायेगी। यह चेकपोस्ट थी वायनाड की, और वायनाड में प्रशासन ने ध्यान रखा कि कोई भी वायनाड की सीमा में न रूके, लगातार प्रशासन ने इस बात का ध्यान रखा।
 
मित्र शाम लगभग 5 बजे कोझिकोड़ पहुँच गये, हमने उनसे पूछा कि रास्तेभर बारिश नहीं मिली तो उन्होंने बताया कि कोझिकोड़ में प्रवेश के पहले ही देखा कि ज़बरदस्त बारिश होकर चुकी थी, पेड़ गिरे हुए हैं और सड़क पर भी थोड़ा पानी था।
 
हमने पूछा कि कितने लोग बैंगलोर से जा रहे थे और आ रहे थे, तो वे बोले कि कहीं रूकने की जगह तो नहीं थी, और किसी से बात भी नहीं करनी थी, तो साफ़ साफ़ पता नहीं, परंतु चेकपोस्ट पर देखकर लग रहा था कि केवल वे अकेले ही यह रोमांचक यात्रा करने वाले नहीं हैं, बल्कि कई हैं, क्योंकि उनको सभी गाड़ियों के नंबर बैंगलोर के ही दिख रहे थे। वे बता रहे थे कि एक बंदे ने एक्टिवा पर ही 2-3 सूटकेस टेप से अच्छे से बाँध रखे थे, इतनी टेप लगा रखी थी कि सूटकेस हिल भी नहीं सकते थे, बस चलाने वाला आराम से बैठा था। मौसम भी अच्छा था, बहुत ज़्यादा धूप भी नहीं थी, इसलिये ज्यााद दिक़्क़त नहीं हुई।
 
उन्होंने खाने के पैकेट के लिये सरकारी अमले को मना कर दिया था, बावजूद इसके उन्हें लगातार खाना घर पहुँचाया जा रहा है, रोज़ फ़ोन करके तीन अलग अलग सरकारी अमले के लोग उनका हाल-चाल पूछते हैं। इतना सुनने के बाद लगा कि वाक़ई अगर सरकार कुछ करना चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है। हमने अपने मित्र को सुरक्षित पहुँचने की शुभकामनायें दीं।

दिल्ली पुलिस के पास दंगों से निपटने के लिये क्या बढ़िया रणनीति नहीं थी?

मुझे तो लगता था कि पुलिस कर पास दंगों से निपटने की बढ़िया रणनीति होती है, और समय समय और उन रणनीतियों का रिव्यू भी होता है, तो पुलिस को इस स्थिति को बहुत अच्छे से निपट लेना चाहिये था। वैश्विक पटल पर दिल्ली पुलिस भी अपने आपमें एक ब्रांड है।

मैं जब दिल्ली में था तब fm पर कई बार लय में सुना था, दिल्ली पुलिस दिल्ली पुलिस आपकी सुरक्षा में।

समझ ही नहीं आया, भरोसा भी न हुआ कि जिस दिल्ली पुलिस के पास राजधानी की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वे अपनी रणनीति में फेल हो गयी? सही बताऊँ तो मानने को दिल ही नहीं करता।

पुलिस के वे सारे वीडियो जो दिख रहे हैं, जिनमें वे दंगाईयो का साथ दे रहे हैं, दिल मानता ही नहीं कि वे पुलिस के लोग हैं। आख़िर पुलिस दंगाईयों का साथ कैसे दे सकती है? हो ही नहीं सकता, खैर यह भी जाँच का विषय है।

अब अगर कोर्ट को आकर दिल्ली पुलिस को कार्यवाही करने को कहा जा रहा है, तो भई सही बात तो यही अब लगती है कि दिल्ली पुलिस से बदला लेना है तो दिल्ली सरकार के अधीन कर दो, सारी दिल्ली पुलिस सुधर जायेगी। क्यों लोग दिल्ली सरकार को कोस रहे थे, जबकि सबको पता है दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन है, और अंतत: गृह मंत्री को ही मामला अपने हाथ में लेना पड़ा, वह भी यह कहकर कि दिल्ली पुलिस व्यवस्था को ढंग से सँभाल नहीं पाई, यह ख़ुद दिल्ली पुलिस पर एक दाग़ है।

अगर ऐसी पुलिस के हाथों दिल्ली याने देश की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था है तो खुद ही समझ जायें कि भारत सुरक्षित नहीं है, क्योंकि राजनैतिक सत्ता दिल्ली से ही चलती है, और लंबे दौर इस तरह के चलते रहे तो यही सब नासूर बनकर अर्थव्यवस्था पर गम्भीर संकट बनकर आयेंगे।

किसी को तो ठीक होना जरूरी है, कौन ठीक होगा यह तो भविष्य ही बतायेगा।