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केरल के दो ड्राइवरों ने एम्बुलेंस से 3500 किमी की यात्रा, बेडरिडन नेपाली मरीज को पहुंचाया घर!

केरल के कोट्टायम के दो एम्बुलेंस ड्राइवरों ने 45 साल के नेपाली मरीज गणेश बहादुर और उनके बेटे को उनके गाँव तक पहुंचाने के लिए 3500 किलोमीटर की यात्रा सिर्फ तीन दिन में पूरी की।

गणेश बहादुर, जो कंजीरापल्ली में एक रबर फैक्ट्री में काम करते थे, 24 मई को दिल का दौरा पड़ने के बाद अचानक गिर पड़े। एक निजी अस्पताल में उनकी सर्जरी हुई, लेकिन हालत ऐसी थी कि वे बेडरिडन हो गए। उनकी हालत को देखते हुए, उन्हें उनके नेपाली गाँव वापस ले जाना जरूरी था। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। 3500 किलोमीटर की दूरी, अनजान रास्ते, जंगली रास्तों की चुनौतियाँ, पुलिस की परेशानियाँ।

लेकिन इन दो ड्राइवरों ने हिम्मत नहीं हारी। अभय इमरजेंसी सर्विस के तहत, उन्होंने गणेश और उनके बेटे को सुरक्षित उनके घर पहुंचाने का बीड़ा उठाया।

उन्होंने बताया कि वे रास्ते में केवल ईंधन भरवाने, खाने और मरीज को फीड करने के लिये ही रुके, एक ड्राइवर एम्बुलेंस चलाता तो दूसरा आरमा करता।

उन्होंने अपने कटु अनुभव भी बताए कि जब उत्तरप्रदेश में एंट्री करी तो एम्बुलेंस की इमरजेंसी लाईट चालू होने के बावजूद पुलिस ने रोका और उनके नाम पता, पिता का नाम इत्यादि पूछने लगे, तब इन्हें समझ आया कि ये धर्म जानने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्होंने ₹500 की रिश्वत देकर आगे बढ़ने में भलाई समझी, क्योंकि उनके पास समय नहीं था।

ऐसा ही एक और अनुभव उत्तरप्रदेश का ही बताया कि किसी गाड़ी पर उनकी एम्बुलेंस से स्क्रैच आ गया, 5ओ इन्होंने एम्बुलेंस रोककर उसकी गाड़ी के स्क्रैच साफ करके बताया कि कुछ ज्यादा नहीं हैं, पर थोड़ी आगे जाने पर वो अपने कई साथियों के साथ आकर एम्बुलेंस को घेर कर पैसा माँगने लगे, तो इन्होंने एम्बुलेंस की इमरजेंसी लाईट जलाई, जिससे लोकल लोगों को पता चला कि इसमें तो मरीज भी है, तो वे सब वहाँ से भाग गये।

उत्तरप्रदेश ने गजब नाम कमाया है। खैर जब मरीज को घर पहुँचा दिया तो दोनों ड्राइवरों ने बस तैयार होने और खाने का समय लियाँ और वापिस 20 जून को केरल पहुँच गये। इसमें लगभग 2 लाख का खर्चा आया जो कि फेक्ट्री ने वहन किया।

जर्मनी ने माइक्रोसॉफ्ट टीम को किया अनइंस्टॉल

जर्मनी का श्लेसविग-होल्सटीन राज्य ने माइक्रोसॉफ्ट टीम (Microsoft Teams) को अनइंस्टॉल करने का फैसला लिया है! 😮 जी हाँ, ये कोई छोटी बात नहीं है। ये निर्णय डेटा गोपनीयता और साइबर सुरक्षा को लेकर लिया गया है।

जर्मन सरकार का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट का डेटा प्रबंधन यूरोपीय संघ के सख्त गोपनीयता नियमों (GDPR) के अनुरूप नहीं है। 🛡️इस कदम के पीछे वजह है डेटा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएँ।

माइक्रोसॉफ्ट टीमें पर निर्भरता के बावजूद, श्लेसविग-होल्सटीन अब ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर की ओर बढ़ रहा है, ताकि स्थानीय नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। 📊 ये कदम न केवल तकनीकी बदलाव है, बल्कि ये दिखाता है कि डेटा गोपनीयता अब कितनी बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है।

लेकिन सवाल ये है – क्या ये फैसला अन्य देशों और कंपनियों को भी प्रेरित करेगा? 🤔 भारत में भी हम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इतना निर्भर हैं, लेकिन क्या हम अपने डेटा की सुरक्षा को लेकर उतने सजग हैं? माइक्रोसॉफ्ट टीम जैसे टूल्स हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं, पर क्या हमें भी ओपन-सोर्स विकल्पों की ओर देखना चाहिए?

क्या हम भारत के लोग डाटा सिक्योरिटी को लेकर सीरियस भी हैं?

2030 की तूफानी रैली के लिये तैयार हैं आप?

अगर अभी तक आपने अपने निवेश को शेयर बाजार या म्युचुअल फंड्स से दूर रखा है, तो आप आने वाली तूफानी रैली को मिस करने जा रहे हैं, मेरे विश्लेषण के मुताबिक बहुत सी कंपनियों की असली वैल्यू अनलॉक ही नहीं हुई है।

या यूँ कहें कि बैलेंस शीट में बहुत सी चीजें जुड़ने वाली हैं, जो कंपनियों के शेयर में तूफानी रैली लाने वाले हैं। मैं किसी सेक्टर पर बात नहीं कर रहा, यह एक ओवरऑल बड़ा रैला आने वाला है।

तो अभी भी सही समय है, आपको निवेश करने के लिये, जो मैं देख पा रहा हूँ, उसके मुताबिक रियल एस्टेट का बाजार बहुत ज्यादा बूम कर चुका है, अब यहाँ से 20-30% भाव अगले 4-5 साल में अलग अलग कारणों से गिरेंगे।

2030 में nifty50 बहुत ही कंजरवेटिव एप्रोच के साथ मैं 35000 के आसपास देखता हूँ, और खुले दिल से लगभग 48 से 50 हजार के आसपास। अगर जो आज इस गाड़ी में बैठ गया, यकीन मानिये कि पछतायेंगे नहीं।

शेयर कौन से लेना है पूछने की जरूरत नहीं nifty 100 के सारे शेयर निवेश के लायक हैं, शेयर समझ नहीं आता तो top 100 nifty या index फंड्स में निवेश कर सकते हैं। मैं हमेशा small व midcap पर बुलिश रहता हूँ, क्योंकि जो कंपनियां 200 करोड़ की हैं, वे 5 साल में 2000 करोड़ की हो सकती हैं। ऐसे कई उदाहरण पिछले 5 साल के हैं, पकी पकाई मैं नहीं देने वाला, बस बाजार में बिलबोर्ड देखिये, आंखें कान खुले रखिये, सब सामने दिखता है। छुपा हुआ कुछ नहीं।

#sharemarket

Dell की मजेदार कहानी: एक गैरेज से ग्लोबल टेक दिग्गज तक

क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटा सा कमरा, कुछ पुराने कंप्यूटर पार्ट्स, और एक 19 साल के लड़के का जुनून दुनिया को बदल सकता है?

शुरुआत: गैरेज का जादूगर

1984 की बात है, टेक्सास के ऑस्टिन में एक कॉलेज स्टूडेंट माइकल डेल अपने हॉस्टल के कमरे में बैठा सोच रहा था, “यार, ये कंप्यूटर कंपनियां इतने महंगे पीसी क्यों बेचती हैं? मैं तो इससे बेहतर और सस्ता बना सकता हूँ!” माइकल कोई सुपर जीनियस नहीं था, बस एक ऐसा लड़का था जो कंप्यूटर के पुर्जों को देखकर वैसा ही उत्साहित हो जाता था, जैसे हम लोग नई नेटफ्लिक्स सीरीज देखकर! उसने अपने हॉस्टल के कमरे में पुराने कंप्यूटर पार्ट्स जोड़कर कस्टम पीसी बनाना शुरू किया। उसका मंत्र था: “सीधे ग्राहक को बेचो, बीच में कोई दुकानदार नहीं!”

माइकल ने अपनी कंपनी शुरू की, नाम रखा PC’s Limited। लेकिन भाईसाहब, शुरू में तो हालत ऐसी थी कि वो अपने दोस्तों को फोन करके कहता, “ब्रो, मेरे पास एक कूल पीसी है, खरीद ले!” और इस तरह गैरेज से शुरू हुआ ये कारोबार धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

नाम बदला, गेम बदला

1988 में माइकल ने सोचा, “PC’s Limited तो बड़ा बोरिंग नाम है, कुछ स्टाइलिश चाहिए!” और बस, कंपनी का नाम बदलकर हो गया Dell Computer Corporation। अब माइकल का आइडिया था कि कंप्यूटर को ऑर्डर पर बनाओ, ग्राहक जैसा चाहे वैसा बनाकर सीधे उनके घर भेजो। ये उस समय की बात है जब लोग दुकानों में जाकर तैयार कंप्यूटर खरीदते थे, और कस्टमाइजेशन का मतलब सिर्फ़ वॉलपेपर बदलना था!

Dell ने इस डायरेक्ट-टू-कस्टमर मॉडल से तहलका मचा दिया। लोग फोन पर ऑर्डर देते, और माइकल की टीम उनके लिए वैसा ही पीसी बनाती जैसा वो चाहते थे। ये थोड़ा ऐसा था जैसे आप पिज्जा ऑर्डर करें और कहें, “भाई, एक्स्ट्रा चीज़ डाल दे, मशरूम हटा दे!” बस, Dell ने टेक्नोलॉजी का पिज्जा बनाना शुरू कर दिया।

वो लम्हा जब Dell ने उड़ान भरी

1990 के दशक में Dell ने इंटरनेट का फायदा उठाया। जब बाकी कंपनियां अभी भी दुकानों में अपने कंप्यूटर बेच रही थीं, Dell ने अपनी वेबसाइट लॉन्च कर दी। अब लोग ऑनलाइन जाकर अपने पीसी को कस्टमाइज कर सकते थे। स्क्रीन साइज़, प्रोसेसर, रैम—सब कुछ अपनी मर्जी से! ये उस समय का ई-कॉमर्स क्रांति थी, जब अमेज़न अभी डायपर में था!

1996 में Dell की वेबसाइट रोज़ाना 1 मिलियन डॉलर की सेल करने लगी। सोचिए, उस समय लोग ऑनलाइन शॉपिंग से डरते थे, लेकिन Dell ने ग्राहकों का भरोसा जीत लिया। माइकल डेल अब टेक्नोलॉजी का रॉकस्टार बन चुका था।

उतार-चढ़ाव: हर कहानी में ट्विस्ट होता है

लेकिन हर कहानी में थोड़ा ड्रामा तो बनता है, है ना? 2000 के दशक में Dell को कड़ी टक्कर मिली। HP, Lenovo, और Apple जैसी कंपनियां मार्केट में छा रही थीं। Dell के लैपटॉप और डेस्कटॉप अब भी अच्छे थे, लेकिन लोग अब डिज़ाइन और ब्रांडिंग के पीछे भाग रहे थे। माइकल ने सोचा, “चलो, कुछ नया करते हैं!”

2013 में माइकल ने एक बड़ा दांव खेला—उन्होंने Dell को प्राइवेट कंपनी बना लिया। मतलब, अब वो शेयर मार्केट के चक्कर में नहीं फंसेंगे। इस कदम से Dell ने फिर से इनोवेशन पर फोकस किया। नए लैपटॉप, टैबलेट, और सर्वर लॉन्च किए। XPS सीरीज ने तो मार्केट में आग लगा दी—लोग कहने लगे, “ये तो Apple का जवाब है!”

आज का Dell: टेक्नोलॉजी का बादशाह

आज Dell Technologies एक ग्लोबल टेक दिग्गज है, जो न सिर्फ़ लैपटॉप और डेस्कटॉप बनाता है, बल्कि क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज, और AI सॉल्यूशंस में भी छाया हुआ है। माइकल डेल, जो कभी हॉस्टल के कमरे में पुर्जे जोड़ता था, आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी खासियत? वो आज भी टेक्नोलॉजी को लेकर उतना ही उत्साहित है, जितना 1984 में था!

सिंगापुर: एक छोटे से द्वीप की बड़ी सफलता की कहानी!

🌍 सिंगापुर: एक छोटे से द्वीप की बड़ी सफलता की कहानी! 🌟

1965 में जब मलेशिया ने सिंगापुर को अलग कर दिया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटा सा देश एक दिन विश्व का आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। लेकिन आज सिंगापुर की अर्थव्यवस्था 548 अरब डॉलर की है, और यहाँ प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा millionaire लंदन और न्यूयॉर्क से भी ज्यादा हैं! 😍

9 अगस्त 1965 को सिंगापुर को मलेशिया से अलग कर दिया गया। उस समय सिंगापुर के पास ना तो प्राकृतिक संसाधन थे, ना ही अपनी सेना, और ना ही पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ। एक तिहाई आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती थी। मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री तंकु अब्दुल रहमान को लगा था कि सिंगापुर असफल हो जाएगा। लेकिन सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री हैरी ली कुआन येव ने हार नहीं मानी। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उनके इरादे मजबूत थे। उन्होंने कहा, “यह मेरे लिए दुख का क्षण है, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे।” 💪

सिंगापुर की सबसे बड़ी ताकत थी इसकी भौगोलिक स्थिति। यह मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित है, जहाँ से विश्व का 30% व्यापार होता है। हैरी ली कुआन येव ने इस अवसर को पहचाना और सिंगापुर को एक वैश्विक व्यापार केंद्र बनाने की ठानी। उन्होंने कारोबार के लिए सबसे अनुकूल माहौल बनाया – कम कर, न्यूनतम नियम, भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता, और अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बनाया। इसके साथ ही कानून का सख्त शासन लागू किया। नतीजा? विदेशी निवेश की बाढ़ आ गई! 🌟

सिंगापुर ने खुद को “विश्व का गैस स्टेशन” बनाया। बिना प्राकृतिक तेल संसाधनों के, यह आज 14 लाख बैरल तेल प्रतिदिन शुद्ध करता है और विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा पेट्रोलियम निर्यातक है। इसके बंदरगाह विश्व के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक हैं, जहाँ से हर साल 20% वैश्विक शिपिंग कंटेनर गुजरते हैं। सिंगापुर ने अपनी आय का उपयोग सही दिशा में किया और आज इसके सॉवरेन वेल्थ फंड्स 1.8 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति नियंत्रित करते हैं, जो इसके वार्षिक जीडीपी का 3 गुना है! 🚢💰

सिंगापुर ने ना सिर्फ अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, बल्कि अपने नागरिकों के लिए बेहतर जीवन भी सुनिश्चित किया। यहाँ 90% जमीन सरकार ने अधिग्रहित की और सार्वजनिक आवास बनाए। आज 88% लोग अपने घर के मालिक हैं, जो विश्व में सबसे ज्यादा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, और सैन्य शक्ति में भी सिंगापुर ने कमाल कर दिखाया। 🌇

यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। सिंगापुर ने दिखा दिया कि मेहनत, अनुशासन, और सही नेतृत्व के साथ कुछ भी हासिल किया जा सकता है।

सिंगापुर #प्रेरणा #सफलता #विकास #इतिहास

एलन मस्क और ओपनएआई

क्या आपने सुना कि एलन मस्क ने ओपनएआई को 97 बिलियन डॉलर में खरीदने की कोशिश की? लेकिन ये सिर्फ एक ऑफर नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी, जिसके पीछे का मकसद ओपनएआई और इसके सीईओ सैम ऑल्टमैन को नीचे लाना था। इस दिलचस्प कहानी को थोड़ा और करीब से बताता हूँ।

एलन मस्क, जिन्हें हम टेस्ला और स्पेसएक्स के लिए जानते हैं, ने 2015 में ओपनएआई की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय उनका मिशन था कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) को पूरी इंसानियत के फायदे के लिए बनाया जाए, ना कि कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए। लेकिन 9 साल बाद, 2024 में चीजें बदल गईं। ओपनएआई ने अपनी नॉन-प्रॉफिट स्ट्रक्चर को छोड़कर एक “कैप्ड-प्रॉफिट” मॉडल अपनाया, जिससे निवेशकों को 100 गुना रिटर्न मिल सकता था। लेकिन मस्क को ये बिल्कुल पसंद नहीं आया।

मस्क का मानना है कि ओपनएआई ने अपना वादा तोड़ा। लेकिन असली वजह कुछ और गहरी है। मस्क जानते हैं कि जो भी AGI को सबसे पहले बनाएगा, वही भविष्य पर राज करेगा। और ये रेस सिर्फ सबसे स्मार्ट AI बनाने की नहीं है, बल्कि सबसे ज्यादा कंप्यूटिंग पावर जुटाने की है। पिछले 5 सालों में AI की लागत 25 गुना बढ़ गई है। माइक्रोसॉफ्ट ने ओपनएआई में 13 बिलियन डॉलर डाले हैं, और अब ओपनएआई 40 बिलियन डॉलर और जुटाने की कोशिश में है। ये रेस अब सिर्फ उन कंपनियों के लिए है जो ट्रिलियन डॉलर की लीग में हैं।

तो मस्क ने क्या किया? उन्होंने ओपनएआई के खिलाफ एक चाल चली। 97.4 बिलियन डॉलर का एक फर्जी ऑफर दिया, जिसका मकसद था ओपनएआई की फंडिंग को रोकना और उसे वापस नॉन-प्रॉफिट बनने पर मजबूर करना। ओपनएआई ने इसे सीधे तौर पर “हैरासमेंट” करार दिया। लेकिन मस्क का असली प्लान क्या है? दरअसल, ओपनएआई को दिसंबर 2025 तक एक पब्लिक बेनिफिट कॉर्पोरेशन बनना है, वरना उनकी फंडिंग रुक जाएगी। और मस्क का मुकदमा इस डेडलाइन को खतरे में डाल रहा है। अगर ओपनएआई हार गई, तो उनकी फंडिंग खत्म हो जाएगी, और बिना फंडिंग के वो इस रेस में पीछे रह जाएगी।

लेकिन मस्क का असली मकसद अपनी AI कंपनी xAI को आगे लाना है। वो जानते हैं कि AI की रेस में जीत दिमाग से नहीं, बल्कि पैसे से मिलेगी। और इस रेस में सबसे ज्यादा फायदा उन कंपनियों को होगा जो “पिक्स एंड शोवेल्स” बेच रही हैं—यानी क्लाउड कंपनियां, चिपमेकर्स और डेटा सेंटर ऑपरेटर्स।

टेक्नोलॉजी की दुनिया में असली जीत हाइप से नहीं, बल्कि सही रणनीति से मिलती है।

बैंकिंग में एक नया फ्रॉड

एक बंदे के पास बैंक की तरफ से फोन आया कि आपके रिवॉर्ड पॉइंट के बदले में आपके मोबाइल दिया जा रहा है, क्योंकि आपकी बहुत सारे रिवार्ड पॉइंट्स इकट्ठे हो गए हैं, तो आप अपना एड्रेस बता दीजिए आपके मोबाइल डिलीवर कर दिया जाएगा।

उसे बंदे के पास अगले दिन फोन डिलीवर हो गया। फिर उसके बाद बैंक से फोन आया कि अब आपको अपने सारे बैंकिंग ट्रांजैक्शन इसी फोन से करने हैं। यह बैंक की शर्त है, क्योंकि आपको यह फोन रिवॉर्ड पॉइंट के बदले में दिया गया है।

तो उसे बंदे ने उसे फोन पर बैंक के एप में लॉगिन किया और उपयोग करने लगा। लगभग 10 दिन के बाद जब वह अपने बैंक का स्टेटमेंट देख रहा था, तो उसे पता चला कि उसकी 2.80 करोड़ की एचडी प्रीमेच्योर हो गई है और कहीं और उसका पैसा ट्रांसफर हो चुका है।

अब बताइए – अगर आपके पास भी ऐसा फोन आएगा, तो आप क्या करेंगे? आप अपना कॉमनसेंस का उपयोग करेंगे या फिर नए फोन में बैंक की एप में लॉगिन करेंगे।

क्या ट्रम्प 1829 वाला दौर दुबारा ला रहे हैं?

अमेरिकी राजनीति में यह दौर असाधारण लग सकता है। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के आलोचक उन्हें अभूतपूर्व रूप से चित्रित कर रहे हैं। नवंबर का चुनाव युगों के बाद वापसी का था- एक ऐसे व्यक्ति की सत्ता में वापसी होती है, जो यह मानता है कि उसके प्रतिद्वंद्वी ने चार साल पहले उससे राष्ट्रपति पद छीन लिया था। उद्घाटन के लिए उमड़ी भीड़ से वाशिंगटन की सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था स्तब्ध थी।

ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति पद के अधिकार का प्रयोग करने में बिल्कुल समय बर्बाद नहीं किया। उन्होंने राजनीति, मीडिया, व्यवसाय और संस्कृति में देश के अभिजात वर्ग पर तुरंत हमला किया। सत्ता-विरोधी लोगों को जो कि संघीय सेवा में कर्मचारी थे, उनको धड़ाधड़ निकालना शुरू कर दिया। ट्रम्प ने कामचोरी, धोखाधड़ी, दुरुपयोग और अक्षमता के आरोपों को उचित ठहराया।

राष्ट्रपति के इन कार्यों ने आलोचक मीडिया और राजनीतिक विरोधियों ने उन्हें एक राजा के रूप में चित्रित करने की कोशिश करी। उन्होंने डेनमार्क से शुरू करके विदेशी देशों के बहुत से नेताओं को नाराज़ किया – जहाँ उन्हें लगा कि कोई और देश अमेरिका में मिला लेना चाहिए। उन्होंने यह कहकर वैश्विक राय को और भड़का दिया कि पड़ोसी देश को राज्य बना दिया जाना चाहिए।

आर्थिक मोर्चे पर, उन्होंने उच्च टैरिफ का बचाव किया और ब्याज दरों को लेकर सेंट्रल बैंक को विरोध किया। लेकिन सच्चाई तो यह है कि जो कुछ भी ट्रम्प ने किया है, कुछ भी नया नहीं है। लगभग 200 साल पहले, एंड्रयू जैक्सन के रूप में अमेरिका ने यह सब पहले भी देखा है। 1828 में जैक्सन का चुनाव भी ऐसे ही हुआ था, जिन्होंने दावा किया था कि पिछले चुनाव में उन्हें “भ्रष्टाचार और सौदेबाज” के ग़लत संदेश हराया था।

1824 में, जैक्सन ने चार उम्मीदवारों की दौड़ में 40.5% जीत दर्ज करी, 24 राज्यों में से 11 पर कब्जा किया। लेकिन वे बहुमत से 32 इलेक्टर दूर थे। 47वें राष्ट्रपति कई मायनों में सातवें राष्ट्रपति की तरह हैं।

जब फरवरी 1825 में सदन में मत हुआ तो चार राज्य पलट गए जिन्होंने जैक्सन के विरोध में मतदान किया था। नवंबर में दूसरे स्थान पर रहे जॉन क्विंसी एडम्स ने 24 में से 13 राज्यों और व्हाइट हाउस पर कब्ज़ा कर लिया। जैक्सन ने कथित तौर पर कहा, “लोगों को” “धोखा दिया गया है”। “भ्रष्टाचार और षड्यंत्रों ने लोगों की इच्छा को हरा दिया।” उन्होंने चार साल बाद दक्षिण कैरोलिना के उप राष्ट्रपति जॉन कैलहॉन के साथ जीत दर्ज की।

जैक्सन के जीतने के समारोह के दौरान, जश्न मनाने वाले समर्थकों ने सड़कों को जाम कर दिया, कैपिटल को उनसे हाथ मिलाने के लिए भर दिया, फिर व्हाइट हाउस को घेर लिया। जैक्सन ने, श्री ट्रम्प की तरह, अपने समय की सरकार की निंदा की, 1824 में अपनी पत्नी से कहा कि वह “देश को लोकतंत्रवादियों के शासन से बचाएंगे।”

सत्ता संभालने के बाद, उन्होंने बहुत से सरकारी कर्मचारियों को तुरंत ही पद से हटा दिया, जैक्सन राष्ट्रपति पद की शक्ति बढ़ाना चाहते थे। उनके अत्याचारी कार्यों और कांग्रेस को नज़रअंदाज़ करने के कारण विरोधियों ने 1832 में उन्हें “राजा एंड्रयू प्रथम” कहकर प्रसिद्ध करने लगे, जो मुकुट और वस्त्र पहने हुए थे और राजदंड लिए हुए थे।

नेपोलोनिक युद्धों के दौरान जब्त किए गए अमेरिकी जहाजों के लिए लूट के दावों को लेकर उनका डेनमार्क और अन्य यूरोपीय शक्तियों के साथ विवाद हो गया। जैक्सन चाहते थे कि टेक्सास-जो 1836 में स्वतंत्रता की घोषणा करने से पहले मेक्सिको का हिस्सा था-एक राज्य बन जाए। उन्होंने “टैरिफ ऑफ़ एबोमिनेशन” की अध्यक्षता की, जो इतने अधिक थे कि 1832 में दक्षिण कैरोलिना ने उनसे अलग होने की धमकी दी। उन्होंने बैंक ऑफ़ अमेरिका की उच्च ब्याज दरों का कड़ा विरोध किया।

दोनों राष्ट्रपति आत्म-मुग्ध व्यक्तित्व वाले, कट्टर पक्षपाती और प्रतिशोध लेने वाले थे। लेकिन दोनों में उल्लेखनीय अंतर हैं। जैक्सन युद्ध नायक थे; ट्रम्प नहीं हैं। जैक्सन गरीबी में पैदा हुए थे, ट्रम्प अमीरी में। जैक्सन भ्रष्टाचार को रोकना चाहते थे; ट्रम्प को राष्ट्रपति-चुनाव के दौरान अपना स्वयं का क्रिप्टो जारी करने में कोई हिचक नहीं थी। जैक्सन ने राष्ट्रीय ऋणों का भुगतान किया; ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में इसमें भारी वृद्धि की।

जैक्सन ने लोकतंत्र का समर्थन किया और अधिक आर्थिक समानता के लिए काम किया। क्या ट्रम्प ऐसा करेंगे? समय बहुत अलग है और आज दांव पर भी बहुत कुछ लगा हुआ है। दुनिया आर्थिक रूप से बहुत अधिक परस्पर निर्भर और खतरनाक तरीके से चल रही है।

19वीं शताब्दी के मध्य में यूरोपीय शक्तियों के बीच युद्ध ने अमेरिका के लिए उतना खतरा पैदा नहीं किया था, जितना आज है। विशाल महासागर अब हमारी शांति और समृद्धि की गारंटी नहीं हैं। इन अतिरिक्त चुनौतियों के साथ, क्या राष्ट्रपति ट्रम्प अपने जैक्सनियन वादों को पूरा करेंगे? क्या सीमा की सुरक्षा पर उनकी प्रगति मुद्रास्फीति के अंत और सभी अमेरिकियों के लिए बढ़ती समृद्धि को आगे बढ़ा पायेंगे? क्या अमेरिका फिर से एक मजबूत, सम्मानित शक्ति के रूप में खड़ा होगा या कमजोर दिखाई देगा और अपना विश्वास बचा पायेगा? क्या संवैधानिक सुरक्षा व्यवस्था कायम रहेगी?

त्रिफला जबरदस्त औषधि

त्रिफला जबरदस्त औषधि है, आयुर्वेद में लिखा है जो 10 साल तक त्रिफला लगातार ले लेता है। उसका कायाकल्प हो जाता है। हाँ इसके सेवन करने के तरीके मौसम के अनुसार बदल जाते हैं।

1 भाग हरड, 2 भाग बहेड़ा, 3 भाग आंवला 1:2:3 मात्रा वाला त्रिफला ही लेना चाहिये, हम अमेजन से मंगवाते हैं, लोकल में इधर अत्तार नहीं हैं। हमने थोड़े दिन पहले शुरू किया जबरदस्त फायदा है।

फायदे जो गिनाये जाते हैं वे इस प्रकार हैं –

एक वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर चुस्त होता है।

दो वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर निरोगी हो जाता हैं।

तीन वर्ष तक नियमित सेवन करने से नेत्र-ज्योति बढ जाती है।

चार वर्ष तक नियमित सेवन करने से त्वचा कोमल व सुंदर हो जाती है।

पांच वर्ष तक नियमित सेवन करने से बुद्धि का विकास होकर कुशाग्र हो जाती है।

छः वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है।

सात वर्ष तक नियमित सेवन करने से बाल फिर से सफ़ेद से काले हो जाते हैं।

आठ वर्ष तक नियमित सेवन करने से वृद्धाव्स्था से पुन: योवन लोट आता है।

नौ वर्ष तक नियमित सेवन करने से नेत्र-ज्योति कुशाग्र हो जाती है और सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु भी आसानी से दिखाई देने लगती हैं।

दस वर्ष तक नियमित सेवन करने से वाणी मधुर हो जाती है यानी गले में सरस्वती का वास हो जाता है

ग्यारहवें और बारहवे वर्ष से आपको वाक-सिद्धी प्राप्त होगी।

₹80 में नार्थ कर्नाटका थाली, जिसे जोलड़ा रोटी उटा भी कहते हैं।

लोग कहते हैं कि इधर सबसे सस्ती थाली मिलती है या उधर, पर मैंने बैंगलोर से सस्ती थाली कहीं नहीं खाई, मात्र ₹80 में नार्थ कर्नाटका थाली मिलती है, जिसे जोलड़ा रोटी उटा (oota) मील कहते हैं। oota का मतलब कन्नड़ में भोजन होता है।

इसमें पतली पतली ज्वार की 2 रोटी, 1 सब्जी, 1 दाल, चटपटी चटनी, स्प्रोउट सलाद, दही, चावल और सांभर मिलता है, साथ ही प्याज व तली हुई हरी मिर्च। सब्जी, दाल, चटनी व सांभर अनलिमिटेड होता है।

रोटी व चावल की मात्रा इतनी होती है कि आराम से एक व्यक्ति का पेट भर जाता है, क्योंकि चावल की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, हम 2 लोग जाते हैं तो एक थाली का चावल लौटा ही देते हैं।

साथ ही अगर ज्वार रोटी और चाहिये तो भी ₹20 की और मिल जाती है। इन रेस्टोरेंट्स के नाम बसवेश्वरा काना वाली के नाम से होते हैं, कुछ ब्राह्मिन के नाम से भी होते हैं। पर जो स्वाद बसवेश्वरा रेस्टोरेंट्स में मिलता है, वह ब्राह्मिन में नहीं मिलता। हमारे घर के पास कम से कम 5-6 रेस्टोरेंट हैं। पर अधिकतर लोग इनको एक्सप्लोर ही नहीं कर पाते, क्योंकि उनको पता ही नहीं होता।

क्या आपके शहर में ₹80 में या इससे कम में थाली मिलती है?

#bengaluru