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बेटी तू कितना भी विलाप कर ले, तुझे मरना ही होगा (नाटक)

माँ और उसकी कोख में पल रही बेटी के मध्य संवाद

 पार्श्व में स्वरघोष के साथ ही बताया जाता है –
( जैसे ही बहु के माँ बनने की सूचना मिली परिवार खुशियों से सारोबार था, परिवार में उत्सव का माहौल था। उनके घर में वर्षों बाद नये सदस्य के परिवार में जुड़ने की सूचना जो मिली थी, परिवार रहता तो आधुनिक माहौल में है, पर उनके विचार रूढ़िवादी हैं, बहु को बहु जैसा ही समझते हैं, जब से बहु घर में आई है तो घर में उनके पति की मम्मी को बहुत ही आराम है, पहले दिन रात घर के काम में खुद तो खटना ही पड़ता था और साथ ही बर्तन साफ करने वाली, पोंछे वाली और कपड़े धोने वाली धोबन सबका ध्यान रखना पड़ता था, अब जब से बेटे की शादी की है, तब से ना खुद काम करने पड़ता है और बर्तन साफ करने वाली, पोंछे वाली और कपड़े धोने वाली धोबन का भी ध्यान नहीं रखना पड़ता है, क्यूंकि बहु तो होती ही घर के काम करने के लिये है, तो अब घर का सारा काम बहु करती है। जैसे सदियों से धरती और सूर्य अपनी धुरी पर घूम रहे हैं वैसे ही औरत घर की धुरी पर घूम रही है, क्या कभी उसके अंतर्मन को किसी ने पढ़ने की कोशिश की, नहीं कम से कम अब तक तो नहीं ।
जब से बेटी के घर में आने की खबर घर वालों को एक अवैधानिक अल्ट्रासाऊंड से मिली है, माँ को कान में केवल एक ही बात सुनाई देती है,  (गूँजती हुई कोरस में आवाज) मार दो, मार दो, मार दो !!! )
मंच के बीचों बीच माँ बैठी है, फोकस लाईट माँ पर आती है..
माँ अपने पेट पर हाथ रखकर अपनी बेटी से संवाद कर रही है..
माँ – बेटी मैं तो तुझे बचाने की पूरी कोशिश कर रही हूँ, परंतु आखिर मैं हूँ तो नारी ही
बेटी – माँ मुझ बचा लो माँ, क्या माँ आप इस धरती की मानस संतानों को समझा नहीं सकतीं कि अगर बेटी ना होगी तो बहु कैसे आयेगी, वंश आगे कैसे बढ़ेगा, ये तो प्रकृति का नियम है, लिंग कोई भी हो पर प्रकृति के प्रति जबाबदेही तो बराबर ही होती है ।
माँ – बेटी मैं तो दुनिया के हर वहशी दरिंदे हत्यारों से तुझको बचाना चाहती हूँ, पर मैं क्या करूँ, आखिर हूँ तो नारी ही, बेबस हूँ, लाचार हूँ, मैंने इस धरती पर अनचाहे ही कितने ही हत्यारों को देखा है, अनमने ढ़ंग से हत्यारे परिवारों के मध्य रही हूँ, इन खौफनाक आँखों को पढ़ते हुए जाने कितने दिन और रातें सहमी सी बिताई हैं, और सबसे काला पक्ष इसका यह है कि इन वीभत्स हत्याओं के पीछे हमेशा ही कोई नारी सर्वोच्च भूमिका निबाह रही होती है। वह एक बार भी अपने खुद को मारने के अहसास को समझ नहीं पाती है।
बेटी – माँ हमने ही तो किसी न किसी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू के जन्म दिया था, अगर बेटी को ऐसे ही मारा जाता रहा तो इस दुनिया को बता दो कि इनकी किस्मत बदलने वाले की माँ का कत्ल कोख में ही हो गया, हो सकता है कि तुम्हारी कोख से नहीं पर मेरी कोख से भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू जन्म ले लें पर अब वे किसी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू के आने की प्रतीक्षा न करें, बस वे बेटी को कोख में ही कत्ल करें !!
माँ – बेटी तू लड़की है, अल्ट्रासाऊँड में आ गया है, और तत्क्षण ही मैंने इस परिवार की आँखों में तैरती हुई वह नंगी वहशियानी खून में लिपटी हुई तलवारें देखी थीं, ऐसा लगने लगा है कि मैं अब किसी भी पल माँस के लोथड़ों के मध्य जा सकती हूँ, मैं पल पल केवल यही अहसास कर रही हूँ कि कब साँसें रूकेंगी, कब धड़कन रूकेगी और कब मैं उन नरभक्षियों को शिकार बनूँगी, मैँने पता नहीं कितनी बेटियों को कोख में ही मरते देखा है, ना
आजतक बोल पाई और ना ही अब बोल पाऊँगी।
बेटी – माँ आखिर हूँ तो मैं भी एक संतान ही ना, क्या मुझे वाकई इस रंगीन दुनिया को देखने का, अहसास करने का एक मौका नहीं मिलेगा, क्या आने वाले समय में रक्षाबंधन, भाईदूज जैसे त्यौहार दुनिया के लिये गौण हो जायेंगे । जब लड़की न होगी तो, क्या आने वाले समय में विवाह बंधन होंगे !!
माँ – बेटी तू कितना भी विलाप कर ले, पर यह तो तेरी नियती है, तुझे मरना ही होगा, तुझे मरना ही होगा
कोरस में पार्श्व में आवाज (तुझे मरना ही होगा, तुझे मरना ही होगा)

स्पर्श की संवेदनशीलता (BringBackTheTouch)

    पहले हम लोग एक साथ बड़ा परिवार होता था, पर अब आजकल किसी न किसी कारण से परिवार छोटे होने शुरू हो गये हैं, पहले परिवार में माता पिता का भी एक अहम रोल होता था, परंतु आजकल हम लोग अलग छोटे परिवार होते हैं, और अपनी छोटी छोटी बातों पर ही झगड़ पड़ते हैं, पर पहले परिवार एक साथ रहने पर समझदारी से सारी बातों का निराकरण हो जाता था, छोटे झगड़े बड़ा रूप नहीं लेते थे।
    केशव और कला एक ऐसे ही जोड़े की कहानी है, जब तक वे संयुक्त परिवार के साथ रहे, तब तक जादुई तरीके से उनका जीवन सुखमय था, वे आपस में अंतर्मन तक जुड़े हुए थे। परंतु केशव को अच्छे कैरियर के लिये भारत से दूर विदेशी धरती पर जाना पड़ा, केशव और कला दोनों ही बहुत खुश थे, आखिरकार भारत से बाहर जाने का हर भारतीय दंपत्ति का सपना होता है, जो उनके लिये साकार हो गया था।
    यह पहली बार था जब वे संयुक्त परिवार से एकल परिवार में होकर रहने का अनुभव करने जा रहे थे, पहले पहल दोनों को बहुत मजा आया, परंतु जैसे जैसे दिन निकलते गये, केशव की व्यस्तता बड़ती गई, और कला घर में अकेले गुमसुम सी रहने लगी, केशव भले ही शाम को घर पर होता था, पर हमेशा ही काम में व्यस्त और यही आलम सुबह का भी था। ना ढंग से नाश्ता करना और ना ही भोजन, कला भी क्या बोलती, कई बार बोलने की कोशिश की परंतु, कुछ न कुछ कला को हमेशा बोलने से रोक लेता और कला रोज की भांति अपने में सिमटना शुरू हो जाती।
    हर चीज को किसी एक बिंदु तक ही सहन किया जा सकता है, वैसे ही कला का एकांत था, वह दिन कला और केशव के लिये मानो परीक्षा की घड़ी बनकर आया था, कला केशव के ऑफिस से आते ही उस पर टूट पड़ी, बिफर पड़ी, आखिर मेरे लिये समय कब है, क्या मैं यहाँ केवल और केवल कठपुतली बनकर रहने आई हूँ, मैं भी इंसान हूँ मुझे भी तवज्जो चाहिये, मुझे भी तुमसे बात करने के लिये तुम चाहिये, इस खुली हुई दुनिया में मैं अपने आप को कैद पाती हूँ और घुटन महसूस करती हूँ। केशव कला की बातों को बुत के माफिक खड़ा सुनता रहा, और उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, आखिरकार कला का एक एक शब्द सच था, ना उसके पास बात करने का समय था और ना ही कला को कला की बातें महसूस करने के लिये वक्त था।


    कला केशव के सामने फफक फफक कर रो रही थी, केशव धीमे धीमे कला के नजदीक गया और कला को अपनी बाँहों में भरकर गालों से गालों को सटाकर कह रहा था, बस कला मुझे समझ आ गया है कि मैं कहाँ गलत हूँ । अब आज से मेरा समय तुम्हारा हुआ, केशव के स्पर्श से कला का गुस्सा और अकेलापन क्षण भर में काफूर हो गया, स्पर्श के स्पंदन को कला और केशव दोनों ही महसूस कर रहे थे, कला और केशव दोनों ने आगे से अपना समय आपस में बिताने का निश्चय किया।

    ठंड में स्पर्श को बेहतरीन बनाने के लिये पैराशूट का एडवांस बॉडी लोशन बटर स्मूथ वाला उपयोग कीजिये, अमेजन पर यह ऑनलाईन उपलब्ध है ।
    यह कहानी #BringBackTheTouch http://www.pblskin.com/ के लिये हमने लिखी है । स्पर्श को आपस में महसूस करिये, जीवन में नई ऊर्जा मिलेगी।
इस वीडियो में निम्रत और पराम्ब्रता को स्पर्श की संवेदनशीलता को दर्शाते हुए देखिये, आपको स्पर्श के महत्वत्ता पता चलेगी – Watch the video to witness Nimrat and Parambrata #BringBackTheTouch.

व्याकुलता – चिंतन

    व्याकुलता इंसान को जितनी जल्दी कमजोर बनाती है, उतनी ही जल्दी व्याकुलता से मन को ताकत मिल जाती है। जब भी कोई दिल दहलाने वाली खबर हमें लगती है, हम व्याकुल हो उठते हैं, मन कराहने लगता है, दिमाग काम करना बंद कर देता है और तत्क्षण हम निर्णय लेने की स्थिती में नहीं होते, मन की स्थिती डांवाडोल हो चुकी होती है, आँखों को वस्तुएँ एक से ज्यादा लगने लगती हैं, क्योंकि उस समय हमने कुछ ऐसे सुन लिया होता है जो कि हम सुनना नहीं चाहते, और हम कुछ बुरा सपने में भी नहीं सोच सकते।
    यह सत्य है कि हमारे मन में कई बार अपनों के ही लिये कुछ बुरे ख्याल मन में आते रहते हैं, और कोई भी इस क़टु सत्य को नकार नहीं सकता है, उस समय हमारा मन सोचता है कि कैसे उस समय उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निपटा
जायेगा। इन सारी चीजों को सोचते समय हम विचलित नहीं होते, वरन् हम अपने आप को दृढ कर रहे होते हैं।
    जीवन में इस तरह के क्षण हरेक की जिंदगी में आते हैं, जिसे हर व्यक्ति अपने अपने तरीके से अपनी क्षमता के अनुसार संचालित करता है, हमारा दिमाग दो भागों में बँटा होता है, जिसमें बायें तरफ का दिमाग बहुत ही ज्यादा सक्रिय रहता है, जिसमें हम तरह तरह की बातें सोचते रहते हैं, विचारों को बुनते गुनते रहते हैं। वहीं दायीं तरफ का दिमाग हमारे शारीरिक प्रबंधन का कार्य करता है। सोते समय हमारा बायीं तरफ का दिमाग आराम करता है और दायीं तरफ का दिमाग सोते समय बायीं तरफ केदिमाग का कार्य करता है, अधिकतर बीमारियों के उत्पन्न होने की वजह भी बायीं तरफ का दिमाग होता है। व्याकुलता बायें हिस्से से ही नियंत्रित होती लगती है।
    व्याकुलता याने कि वह स्थिती जिसमें कि हमारा काबू हमारे ऊपर नहीं होता है, हम अपना नियंत्रण खो देते हैं, हम ऐसी कोई खबर सुनने के बाद अपने ऊपर किसी को भी हावी हो जाने देते हैं, हमें अगर कोई भी इस समय सहारा देता है खासकर वह जो कि हमारे बहुत नजदीकी हो, जिसका हमारी जिंदगी में बहुत महत्व हो, तो हमारी व्याकुलता कुछ हद तक कम हो जाती है।
ये विचार मैंने अपने अनुभव के आधार पर लिखे हैं ।

आटा, सब्जी, प्रेमकपल और पुलिसचौकी

कल शाम की बात है, बेटेलाल स्कूल से आ चुके थे तो अचानक गुस्से से आवाज आई “आटा आज भी आ गया ?” “सब्जी आ गई”, हम सन्न !! बेचारे क्या करते, अपने काम में मगन आटे का ध्यान एक सप्ताह से ना था, इधर पास के पंसेरी से १ किलो आटे का पैकेट लाकर थमा देते थे। हम चुपचाप घर से निकले, लिफ़्ट से उतरे, तो घर के सामने का मौसम अचानक से हसीन हो चला था।
सामने ही करीबन ५ लड़के और १ लड़की स्कूल ड्रेस में थे, जिनमें से एक लड़का और एक लड़की साथ साथ थे और लड़की के हाथ में गिफ़्ट भी था, बाकी लड़के उस लड़के से मस्ती कर रहे थे, शायद उसने आज ही प्रपोज किया हो और स्वीकार हो गया हो, फ़िर उन सब लड़कों ने प्रेमकपल वाले लड़के से कुछ पैसे लिये और घर के सामने वाली चाट की दुकान पर पानी बताशे खाने लगे, प्रेमकपल के चेहरे पर अजीब सी खुशी थी, जैसे उनके जन्म जन्म का साथी मिल गया हो, लड़के के बाल कुछ अजीब से आगे से ऊपर की तरफ़ थे, वो भी कोई स्टाईल ही रही होगी, हाँ हमारे बेटेलाल जरूर उस बालों की स्टाईल का नाम बता देते।
हम अपनी बिल्डिंग की पार्किंग में खड़े होकर सभ्यता से यह सब देख रहे थे, पर उन लड़कों को यह अच्छा नहीं लग रहा था, खैर जब हम गाड़ी से चाट वाले के सामने से निकले तो भी वे सब हमें घूर ही रहे थे, यह सब वैसे हमें पहले से ही पसंद नहीं है, जब हम  उज्जैन में थे तब हमारी कालोनी में भी यही राग रट्टा चलता था, फ़िर हमने अपना प्रशासन का डंडा दिखाया तो बस इन लोगों के लिये कर्फ़्यू ही लग गया था।
आटा लेने गये, तो पता चला कि उस पूरी कॉलोनी की बिजली ही सुबह से गायब है, हम पूछे “भैया बिजली आज ही गई है ना ?, कल तो आयेगी”, वो क्या और जो दुकान के अंदर थे वे भी निकलकर हमें देखने लगे, ये कौन एलियन आया है जो अजीब और अहमक सा सवाल पूछ रहा है। खैर वापसी पर याद आया कि सब्जी लेनी है, अब हम सोचे बेहतर है कि घर पर फ़ोन करके पूछ लें “कौन सी सब्जी लायें”, जबाब मिला “कौन कौन सी सब्जी है?”, हम कहे “करेला, शिमला मिर्च, बीन्स, भिंडी, फ़ूलगोभी, पत्तागोभी,बैंगन” हमें कहा गया केवल देल्ही गाजर और टमाटर लाने के लिये, टमाटर का भाव हम बहुत दिनों बाद सुने थे, मतलब कि बहुत दिनों बाद सब्जी लेने गये थे, केवल दस रूपया किलो, हमने सोचा बताओ टमाटर के दाम पर कितनी सियासत हुई, टमाटर महँगी सब्जियों का राजा बन गया था और आज देखो इसकी दशा कोई पूछने वाला नहीं, हेत्तेरेकी केवल दस रूपया !
शाम को घूमने निकले, चार लड़के दो लड़कियाँ एक ही समूह में घूम रहे थे, जिनमें से साफ़ दिख रहा था कि दो प्रेमकपल हैं और बाकी के दो इस समूह के अस्थायी सदस्य हैं, वे दोनों प्रेमकपल सड़क पर ही बाँहों में आपस में ऐसे गुँथे हुए थे, कि अच्छे से अच्छे को शर्म आ जाये, परंतु वो तो अपने घरों से दूर यही कहीं पीजी में रहते हैं, तो उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है, फ़िर अगली गली के नुक्कड़ पर ही वे दोनों प्रेमकपल आपस में एक दूसरे की आँखों में झांकते हुए नजर आये, और हँसी ठिठोली कर रहे थे, पर अचानक हमें देखते ही वे सब बोले कि चलो गली के थोड़ा अंदर चलो। हमने सोचा कि आज यही सब इनको अच्छा लग रहा है, कल जब ये जिम्मेदारी लेंगे परिवार की बच्चों की, तब शायद यही सब इनको बुरा लगेगा।

एक अच्छी बात यह हुई है कि पास ही पुलिसचौकी खुल गई है, तो इस तरह की हरकतें पहले बगीचे में होती थीं वे अब चौकी के पीछे की गलियों में होने लगी हैं।

 वैसे ही जब घूमते हुए वापिस घर की और आ रहे थे तब एक दिखने से ही साम्भ्रान्त प्रेमकपल खड़ा था, लड़के की पीठ पर लेपटॉप बैग था और लड़की भी ऑफ़िस वाली ड्रेस में ही थी, शायद लड़की कहीं पास रहती हो और कुछ जरूरी बात करनी हो, बहुत धीमे धीमे से बात कर रहे थे, कितना भी कान लगा लो बातें सुनाई दे ही नहीं सकती थी, पर उनका बात करने का तरीका और कॉलोनी में जिस तरह से वे खड़े थे और बातें कर रहे थे वह शालीन था ।

शादी के १२ वर्ष और जीवन के अनुभव

आज शादी को १२ वर्ष बीत गये, कैसे ये १२ वर्ष पल में निकल गये पता ही नहीं चला, आज से हम फ़िर एक नई यात्रा की और अग्रसर हैं, जैसे हमने १२ वर्ष पूर्व एक नई यात्रा शुरू की थी, जब पहली यात्रा शुरू की थी तब पास कुछ नहीं था, बस कुछ ख्वाब थे और काम करने का हौंसला और अगर बैटर हॉफ़ याने कि जीवन संगिनी आपको समझने वाली मिल जाये, हर चीज में आपका साथ दे तो मंजिलें बहुत मुश्किल नहीं होती हैं।
शादी की १२ सालगिरह में से मुश्किल से आधी हमने साथ बिताई होंगी, हमेशा काम में व्यस्त होने के कारण बहुत कुछ जीवन में छूट सा गया, परंतु हमारी जीवन संगिनी ने कभी इसकी शिकायत नहीं की, हमने जब खुशियों का कारवाँ शुरू किया था, तब हम ये समझ लीजिये खाली हाथ थे और फ़िर जब हमारे आँगन में प्यारी सी किलकारी गूँजी, जिससे जीवन के यथार्थ का रूप समझ में आया।
जीवन यथार्थ रूप में बहुत ही कड़ुवा होता है और मेरे अनुभव से मैंने तो यही पाया है कि यह कड़ुवा दौर सभी की जिंदगी में आता है, बस इस दौर में हम कितनी शिद्दत से इससे लड़ाई करते हैं, यह हमारी सोच, संस्कार और जिद्द पर निर्भर करता है। जीवन के इस रास्ते पर चलते चलते हमने इतने थपेड़े खाये कि अब थपेड़े  अजीब नहीं लगते, यात्रा जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है।
बस जीवन से यही सीखा है कि कितनी भी मुश्किल हो अपने लक्ष्य पर अड़िग रहो, सीधे चलते रहो, मन में प्रसन्नता रखो, धीरज रखो । जीवन इतना भी कठिन नहीं है कि इससे पार ना पा सकें, और खासकर तब और आसान होता है जब हमारी अर्धांगनी उसमें पूर्ण सहयोग करे। जीवन के चार दिन में अगर साथी का सही सहयोग मिलता रहे तो और क्या चाहिये।

आखिरी बात हमेशा अपने वित्तीय निर्णय लेने के पहले अपने जीवनसाथी को अपने निर्णय के बारे में जरूर बतायें, कम से कम इस बहाने घरवाली को हमारे वित्तीय निर्णयों का आधारभूत कारण पता रहता है और उनके संज्ञान में भी रहता है, इससे शायद उनको भी अपने मित्रमंडली में मदद देने में आसानी हो। जीवन और निवेश सरल बनायें, दोनों सुखमय होंगे।

वो काँच का दरवाजा

    दोपहर का समय था, घर से ५०% डिस्काऊँट और एक खरीदो एक मुफ़्त  का लाभ लेने के लिये निकले, बैंगलोर सेंट्रल मॉल में ३ घंटे में एथिनिक और वेस्टर्न की बहुत सी खरीदारी कर घर की और लौट रहे थे, कि बीच में ही एक दुकान पड़ी जहाँ पर ना चाहते हुए भी गाड़ी रोकना पड़ी, वो दुकान थी लगेज कंपनी का शोरूम, क्योंकि मुझे दो लगेज और लेना थे, तो सोचा कि अभी मॉडल देख लें और कुछ उपहार के वाऊचर भी रखे हैं, उसके लिये भी पूछ लेंगे कि अगर वे इस शोरूम पर ले लेंगे।
    बात की गई, लगेज फ़ाईनल किये गये, उपहार वाऊचर भी चलने के लिये हाँ हो गई, परंतु खरीदारी में और समय लगता, और ठीक ५ मिनिट घर पहुँचने में लगते और १० मिनिट बाद बेटेलाल की स्कूल बस आने को थी, अगर बीच में यातायात मिला तो ५ मिनिट की जगह १० मिनिट भी लग सकते हैं।
    शोरूम से निकलते हुए जल्दी में काँच के दरवाजे का अहसास ही नहीं हुआ, और तेजी से निकलते हुए गये थे, रफ़्तार तीव्र थी, वो काँच का दरवाजा खुलता भी केवल अंदर की तरफ़ था और बाहर काँच के दरवाजे के ऊपर एक छोटा सा स्टॉपर लगा हुआ था कि बाहर ना खुले, हम उससे धम्म से भिड़ गये, दिन में तारे नजर आने लगे, ऐसा लगा मानो माथे पर किसी ने बहुत जोर से हथौड़ा मार दिया हो, परंतु कुछ कर नहीं सकते थे, आँख के ऊपर बहुत जोर की लगी थी, केवल अच्छा यह रहा कि खून नहीं निकला या चमड़ी नहीं हटी और ना ही कटी।
    वो काँच का दरवाजा बहुत मोटा था, इसलिये काँच के दरवाजे को तो कुछ नहीं हुआ, फ़िर हमने गाड़ी के मिरर में जाकर अपने माथे का जायजा लिया और हाथ से दबाकर बैठ गये, करीब २ मिनिट दबाने के बाद लगा कि यह दर्द ऐसे नहीं जाने वाला क्योंकि सीधे हड्डी में लगा है तो बेहतर है कि घर पहुँचा जाये और आयोडेक्स लगा लिया जाये। घर पहुँचे आयोडेक्स लगा लिया, परंतु दर्द कम होने का नामोनिशान नहीं था, खैर यह भी एक अच्छा अनुभव रहा।

अब हालत यह है कि उसके बाद से किसी भी दरवाजे से निकलना होता है तो पहले अच्छे से पड़ताल कर लेते हैं, संतुष्ट हो लेते हैं फ़िर ही निकलते हैं, दर्द तो अब भी बहुत है, सूजन कम है। समय के साथ साथ सब ठीक हो जाता है, गहरे जख्म भी भर जाते हैं।

विचारों पर विचार

    सुबह उठते समय बहुत सारे विचार अपनी पूर्ण ऊर्जा में रहते हैं, और शनै: शनै: उन विचारों के अपने प्रारूप बनने लगते हैं, उन विचारों में कई प्रकट हो जाते हैं, मतलब कि किसी ना किसी से वे विचार वाद-विवाद या किसी अन्य रूप में कह दिये जाते हैं। कुछ विचार जो प्रवाहमान रहते हैं, वे अपने संपूर्ण वेग से हर समय अपनी पूर्ण ऊर्जा से रक्त वाहिनियों में रक्त के कणों में बहते रहते हैं, उनकी रफ़्तार इतनी तेज होती है जो शायद ही नापी जा सकती होगी।
    विचारों की गति के समान शायद ही कोई गति वाला यंत्र विज्ञान बना पाया होगा, जो एक ही पल में कई वर्ष पहले और दूसरे ही पल में कहीं और किसी ओर समयकाल में ले जाता है। विचारों की इस तीव्र गति के कारण ही हम हमेशा विचलित रहते हैं, कुछ विचारों को हम व्यवहारिकता के धरातल पर ले आते हैं, और कुछ विचार शायद ही कभी दुनिया में प्रकट होते हैं, यह शायद हरेक व्यक्ति का अपना एक बहुत ही निजी घेरा होता है, जिसको वह किसी भी अपने, बेहद अपने से भी प्रकट  नहीं करता।
    विचारों की ऊर्जा से मन प्रसन्न भी हो जाता है और इस कारण से जो ऊर्जा शरीर को मिलती है, उसे कई बार अनुभव भी किया जा सकता है, कई बार ऐसे ही बैठे ठाले ही कोई विचार अचानक ही मन में आता है और अचानक ही रक्त संचार धमनियों मॆं रफ़्तार से होने लगता है, जिससे लगता है कि अचानक ही कोई नई ताकत हमारे अंदर आ गई है, शायद इस प्रक्रिया से कुछ हार्मोन्स का अवतरण होता होगा, जिससे मन का अवसाद, मन का फ़ीकापन दूर हो जाता है।
    नकारात्मक ऊर्जा वाले विचार शरीर के अंदर अत्यंत शिथिलता भर देते हैं, जो  भीरूपन जैसा होता है, जिससे हमें छोटी से छोटी बातों से डर लगने लगता है और हरेक घटना के पीछे वही ऊर्जा कार्य करती दिखती है, सही कार्य  भी करने वाले होंगे तो भी उस नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से हमारा मानस कहीं ना कहीं बिगड़ने लगता है और गलतियाँ करने लगते हैं।
    वहीं सकारात्मक ऊर्जा वाले विचार शरीर के अंदर बेहद उत्साह का संचार करते हैं, अत्यंत शक्तिशाली महसूस करने लगते हैं, कोई बड़ा कार्य भी बौना लगने लगता है। असहजता का अवसान हो जाता है, अगर तबियत खराब होती है तब भी उसका अनुमान नहीं हो पाता है, सकारात्मक ऊर्जा के दौरान अधिकतर हम दुश्कर कार्य अच्छे से कर पाते हैं।
    ऊर्जा कैसी भी हो, अपना मानस पटल हमें बहुत ही पारदर्शी रखना होगा, ध्यान रखना होगा कि नकारात्मक ऊर्जा का जब भी दौर हो, उस समय कैसे सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकते हैं, सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिये जो अच्छा लगता हो, वह करें, मुझे लगता है सफ़लता जरूर मिलेगी।
    ऐसे ही कुछ विचार प्रस्फ़ुटित होने के लिये इंतजार करते रहते हैं जिन्हें हम मन ही मन परिपक्व बनाते हैं, जिससे जब भी वह विचार हमारे मन की परिधि से निकल कर बाहर आये तो उस विचार से मान सम्मान और ऐश्वर्य की प्राप्ति हो।

अभी तक विचारों को सुबह लिखने की आदत नहीं पड़ी है, क्योंकि अगर सुबह ही विचार लिखने बैठ गये तो फ़िर प्रात: भ्रमण मुश्किल हो जाता है पर सुबह के विचारों को कहीं ना कहीं इतिहास बना लेना चाहिये, मानव मन है जो विचारों को जितना लंबा याद रख सकता है और उतनी ही जल्दी याने कि अगले ही क्षण भूल भी सकता है। ऐसे पता नहीं कितने विचारों की हानि हो चुकी है। जो शायद कहीं ना कहीं जीवन का मार्ग और दशा बदलने का कार्य करते हैं।

“शाहिद” शहादत और सुसाईड (“Shahid” Martyrdom or Suicide)

    आज फ़िल्म “शाहिद” देख रहा था, फ़िल्म बहुत ही अलग विषय पर बनी है, जिसे हम अनछुआ पहलू कह सकते हैं, इन अनछुए पहलुओं में केवल आतंकवाद से ग्रस्त लोग ही नहीं है, और भी बहुत सारे सामाजिक पहलू हैं जो अनछुए हैं, जिनके बारे में हमें आपको और बाहरी विश्व को कुछ पता नहीं है। क्योंकि इन पहलुओं को इतना लुका छिपाकर रखा जाता है कि हम तक कभी कोई खबर इस बारे में पहुँच ही नहीं पाती है।
    “शाहिद” में साफ़ साफ़ बताया गया है जो लोग आपका उपयोग करना चाहते हैं, उनसे दूर रहें, वे लोग केवल और केवल अपने स्वार्थ के लिये आपकी जिंदगी में आते हैं, बेहतर है कि उनसे बहुत दूरी बना ली जाये और मजबूरी हो तो कभी कभार मिलना जुलना रखना चाहिये। जो इंसान दुसरे के अनुभव से सीख लेता है वह शायद बहुत कुछ खोने से बच जाता है।
    फ़िल्म की कहानी बहुत ही सीधी सादी है, जिसमें केवल एक व्यक्ति के इर्दगिर्द यह फ़िल्म घूमती है और उसके परिवार को भी बताया गया है, फ़िल्म की कहानी में किसी भी तरह का कोई ड्रामा नहीं रखा गया है जो कि इसका बहुत ही अच्छा पक्ष है, जैसे कि अपने क्लाईंट से ही प्यार होने पर सीधे उसे शादी के लिये बात कह देना, अपने घर पर कुछ भी ना बताना और जब पता भी चले तो साफ़ साफ़ कह देना, यह साफ़गोई बहुत ही पसंद आई। जिसमें हीरोईन याने कि शाहिद की बीबी का यह संवाद कि “मुझे मेरी लाईफ़ कॉम्लीकेटेड नहीं चाहिये, कोई हर्डल कोई घुमाव फ़िराव नहीं चाहिये, बस स्टेट फ़ार्वर्ड लाईफ़ चलनी चाहिये” जमा।
    बहुत सारे संवाद दिल को छूने वाले हैं और प्रेरक हैं, जैसे शाहिद को उसकी बीबी ने कहा “लोग तो तुमको अतीत में धकेलकर तुम्हें अपने रास्ते से हटाने की कोशिश करेंगे, तुम केवल आगे की और देखो, नई किरण, नई रोशनी तुम्हारा इंतजार कर रही है”।
    जब शाहिद जेल में था तो उनका एक कैदी मित्र उनको पढ़ने में सहायता करता है और कहता है “लहरों के विरूद्ध चलना बहुत आसान नहीं होता परंतु अगर जो लहरों के विरूद्ध चलकर आगे बड़ता है, वह अपनी बुलंदियों को छूता है”, और उसने कहा कि जितना चाहो उतना पढ़ो तुम्हें अपनी मंजिल जरूर मिलेगी।
    किस प्रकार से झूठे केसों में लोगों को फ़ँसाया जाता है, और इतने कमजोर सबूत होने पर भी न्यायपालिका मूक दर्शक बनी देखती रहती है, हमारी न्यायपालिका पर भी बहुत बड़ा प्रहार है। किस प्रकार से धर्म के नाम पर नौजवानों को बरगलाया जाता है उसके लिये फ़िल्म खत्म होने के बाद फ़िल्म को एक्स्टेंडेड पार्ट में दिखाया गया है, वहाँ हमें शहादत और सुसाईड का अंतर पता चलता है।
    फ़िल्म बहुत ही शानदार है, अभिनय दिल छूने वाला है, शायद बहुत दिनों बाद ऐसी कोई फ़िल्म देखी कि लगा इसके लिये वाकई कुछ लिखना चाहिये। फ़िल्म की पूरी टीम को बधाई।

जंग .. मेरी कविता.. (विवेक रस्तोगी)

कठिनाईयाँ तो राह में बहुत हैं,
बस चलता चल,
राह के काँटों को देखकर हिम्मत हार दी,
तो आने वाली कौम से कोई तो
उस राह की कठिनाईयों पर चलेगा,
तो पहले हम ही क्यों नहीं,

आने वाली कौम के लिये
और बड़ी
उसी राह की
आगे वाली कठिनाईयाँ छोड़ें,
नहीं तो
वे इन कठिनाईयों को पार करते समय
सोचेंगे, कितने नकारा लोग थे
जो इन साधारण सी बाधाओं को पार
नहीं कर पाये

जो बाधाएँ आज कठिन लगती हैं
वे आने वाले समय में बहुत सरल हो जाती हैं
बेहतर है कि उनके सरल होने के पहले
उन कठिनाईयों से निपट लिया जाये

दिमाग और हौसलों में जंग न लगने देने का
इससे साधारण और कोई उपाय नहीं।

भाग–९ अपनी पहचान के लिये वेदाध्ययन (Study Veda for your own identity)

    भारतीय परम्परा में ज्ञान का मुख्यत: अभिप्राय है स्वयं को ही जानना-पहचानना और आत्मज्ञान ही है सर्वोच्च ज्ञान। ऋषि याज्ञवल्क्य अपने उपदेश पर आत्मज्ञान पर बल देते हैं।
आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:
    अपनी आत्मा ही देखने योग्य है जो परमात्मा से भिन्न नहीं है और इस एक तत्व को जान लेने से सब कुछ स्वत: जाना गया हो जाता है।
तस्मिन विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति
    (तस्मिन) उस एक परमतत्व के (विज्ञाते) जान लेने पर (सर्वं) सब कुछ (विज्ञातं) जाना गया (भवति) हो जाता है। कुछ भी जानने के लिये शेष नहीं रह जाता । इस तरह वेद अमरत्व का बोध कराते हैं। यही एकत्व का ज्ञान सभी को विद्वेषभावरहित बना कर स्नेहसूत्र में जोड़ने वाला है। सभी में सम्प्रीति सहयोग का भाव होगा और अपने-अपने कार्यों को करते हुए सभी सुखी रहेंगे।
    वैदिक ऋषियों का यह अध्यात्म-ज्ञान विश्व मानवता के कल्याण हेतु अनुपम महनीय योगदान है। इसीलिए समष्टिगत कल्याण हेतु सम्पूर्ण मानव समाज की रक्षा हेतु सभी के लिए वेदों का अध्ययन परमावश्यक है। इस दृष्टि से वेद आज और भी अधिक उपयोगी एवं प्रासंगिक हैं।