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काली चमड़ी के कारण आँखों और गर्दनों पर असर और वजन बढ़ना

जून महीने में जब पहली बार सऊदी आये थे तो अप्रत्याशित तरीके से २ किलो बजन बढ़ गया था, इस बार अभी तक २०० ग्राम तो बड़ ही चुका है, जबकि यहाँ आने के बाद व्यायाम ज्यादा कर रहे हैं।

यहाँ के खाने में हो सकता है कि कैलोरी कुछ ज्यादा हों और उसके लिये हमारा शरीर अभ्यस्त नहीं हो, अब इस बार दोगुना ज्यादा कैलोरी जलाना शुरू कर दिया परंतु फ़िर भी वजन थोड़ा बहुत बड़ा है। जबकि यह महीना रमजान का महीना है और खुले आम खाना पीना यहाँ अपराधिक श्रेणी में रखा जाता है। खुले आम खाना पीना और धूम्रपान वर्जित है।

ऐसा लगता है कि यहाँ की हवाएँ स्वास्थय के लिये अच्छी हैं और उससे स्वास्थ्य वर्धन हो रहा है, यहाँ पर अभी तापमान लगभग ३८ डिग्री होगा, परंतु गर्मी और धूप ३८ डिग्री वाली नहीं है, ऐसा लगता है कि अगर इस धूप में अगर थोड़ी देर खड़े हो गये तो जल भुन कर खाक हो जायेंगे। शाम को भी लू के थपेड़े जिस्म को लहुलुहान करते रहते हैं।

एक और खासबात कि यहाँ पर मर्द सफ़ेद लिबास में और औरत काले लिबास में पायी जाती है, हम कहते हैं कि यहाँ आकर मर्द की चमड़ी सफ़ेद और औरत की चमड़ी काली हो जाती है। हर औरत एक जैसी दिखती है क्योंकि काली चमड़ी ऊपर से नीचे तक एक जैसी होती है, जहाँ काली चमड़ी के बीच चमकने का कोई रोलपार्ट ही नहीं है।

काली चमड़ी होने के कारण न आँखों को इधर उधर जोर देना होता है और ना हई अस्वाभाविक या स्वाभाविक रूप से आँखों और गर्दनों को घुमाना पड़ता है, जब अलग अलग प्रकार की चमड़ी प्रदर्शित होगी केवल तभी आँखों और गर्दन को कष्ट होगा, अब आँखों और गर्दन का काम भी कम हो गया है तो इसके कारण भी कम कैलोरी जल रही हैं।

अभी कारण और भी होंगे जिस पर विश्लेषण जारी है।

चिकन समोसा मटन समोसा और आलू समोसा

अभी दो तीन पहले ही अपनी वेज थाली पार्सल करवाकर चैन्नई दरबार अल शर्फ़िया से टैक्सी पकड़ने के लिये अल शर्फ़िया की मुख्य सड़क तक आये थे कि वहाँ देखा समोसे, पकोड़े, चाट और फ़्रूटचाट वाली दुकान भी है। बस फ़िर क्या था, झट से दुकान में घुस गये देखा कि मिठाईयाँ, नमकीन, टोस्ट भी दुकान में उपलब्ध थे।
पर सबसे ज्यादा इस दुकान में बिक्री पकोड़े, समोसे, कचोरी और दहीबड़े की ही थी। हमने दुकानदार से पूछा कि हाँ भई क्या क्या है, तो जनाब आवाज आई “चिकन समोसे, मटन समोसे, आलू समोसे, कचोरी, बीफ़ समोसे, दही वड़ा और फ़्रूटचाट”, हम तो समोसे के इस नॉनवेज प्रकार पर दंग थे।
हमने कहा क्या बात है, इतने सारे प्रकार के समोसे, हमने पहली बार नॉनवेज समोसे अपनी जिंदगी में सुने हैं, हमारे मित्र ने चिकन समोसा पार्सल करवाया, हमने आलू समोसा पार्सल करवाया। जब होटल पहुँचकर खाया तो स्वाद ठीक ठाक था, खाया जा सकता था।
अब दही वड़े हमारे दिमाग में हलचल मचा रहे थे, अगले दिन दही वड़े लिये जिसमें उसने आलू चाट, काबुली चने की चाट और जबरदस्त मसाला मिलाया और दही भी जबरदस्त था। साथ में बड़ी पपड़ी या यूँ कह लें कि बड़ी मठरी थी और कुछ रंग बिरंगी सेंव नमकीन।
होटल पहुँचकर खाया तो अहा ! मजा आ गया, क्या स्वाद था, अब हमारे दिमाग में पकौड़े घूम रहे थे, अगले दिन दही वड़े के साथ ही पकौड़े भी लिये गये और चटकारे मारकर खाया गया।
हमारे एक मित्र ने कल आधा किलो रसगुल्ले लिये थे और अकेले निपटा दिये, खैर हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, परंतु हमारे आश्चर्य न करने से उसको जरूर आश्चर्य हुआ, हमें आश्चर्य इसलिये नहीं हुआ क्योंकि हम भी पहले १ – २ किलो रसगुल्ले एक बार की बैठक में ही निपटा दिया करते थे।
वैसे कल वहाँ जलेबी और इमरती भी देखी है, सोच रहे हैं कि आज इनका भी स्वाद ले लिया जाये।

जेद्दाह में रेस्त्रां खाना और स्वाद (South Indian, Malyalai and North Indian food in Restaurant’s @ Jeddah Saudi Arabia)

जब से सऊदी आये हैं तब से भारतीय स्वाद बहुत याद करते हैं, भारतीय खाना तो जरूर मिल जाता है फ़िर भी बिल्कुल वह स्वाद मिलना बहुत मुश्किल है। यहाँ पर दक्षिण भारतीय स्वाद तो मिल जाता है, परंतु उत्तर भारतीय स्वाद मिलना मुश्किल होता है।

यहाँ पर जो थालियाँ भी उपलब्ध होती हैं, उसे दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय व्यंजनों को मिलकर बनी होती हैं। परंतु फ़िर भी दक्षिण भारतीय व्यंजन ज्यादा होते हैं। उत्तर भारतीय में केवल दाल होती है या यह भी कह सकते हैं कि दाल उत्तर भारतीय तरीके से बनी होती है। मसाला ठीक ठाक होता है।

रोटी जो है वह बिल्कुल मैदे की होती है और गेहूँ की रोटी ढूँढ़ना बहुत ही मुश्किल काम है। चावल बासमती या फ़िर दक्षिण में खाया जाने वाला मोटा केरल का चावल होता है।

यह तो दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट की बातें हैं, यहाँ पर लगभग आसपास के देशों के रेस्ट्रोरेंट भी उपलब्ध हैं, जैसे पाकिस्तानी, अफ़गानी, फ़िलिपीन्स, बांगलादेशी, इजिप्ट इत्यादि..। खाने में पाकिस्तानी स्वाद कुछ भारतीय स्वाद के करीब है, यहाँ मसाला अच्छा मिलता है, बस तेल या घी ज्यादा होता है।

यहाँ मिनी भारत अल-शर्फ़िया के इलाके में पाया जाता है, जहाँ भारत ही नहीं सभी आसपास के देशों की दुकानें हैं और ऐसे ही रेस्टोरेंट भी बहुत सारे हैं, हर ८ – १० दुकान के बाद एक रेस्टोरेंट मिल ही जाता है, कुछ रेस्टोरेंट जिसमें हम जाते हैं जो कि दक्षिण भारतीय हैं, चैन्नई दरबार, इंडिया गेट, मेट्रो, विलेज (मलयाली) कुछ पाकिस्तानी रेस्तरां हैं जैसे कि निराला, मक्काह इत्यादि.. निराला की सबसे अच्छी चीज लगी हमें रोटी, तंदूरी रोटी कम से कम १२ या १५  इंच के व्यास की रोटी होगी और बिल्कुल नरम, कम से कम दो रोटी तो खा ही जाये। यहाँ की कुल्फ़ी भी बहुत अच्छी है । बस यहाँ सब्जियों और दाल में तेल बहुत मिलता है तो पहले हम तेल निकाल देते हैं फ़िर ही खाना शुरू करते हैं, जो कुछ लोग कैलोरी कान्शियस होते हैं, वे लोग तो पहली बार को ही आखिरी बताकर निकल लेते हैं। पर यहाँ का स्वाद वाकई गजब है। साथ ही पाकिस्तानी वेटरों की मेहमनानवाजी देखते ही बनती है।

ऐसे ही शाम को फ़िलिस्तीन स्ट्रीट जहाँ कि हम मैरियट होटल में रहते हैं, वहाँ तो खाना खाते नहीं हैं कारण है कि इतना महँगा खाना जो हम अफ़ोर्ड नहीं कर सकते, तो पास ही होटल बहुत सारे हैं, पर कुछ ही होटलों पर शाकाहारी खाना भी उपलब्ध होता है। पास ही एक अफ़गानी होटल है जिससे दक्षिण भारतीय सहकर्मी चावल लेकर खाते हैं। पास ही एक इजिप्शियन रेस्तरां भी है जहाँ अलग तरह की करियों के साथ चावल मिलते हैं, हमने भी एक बार खाकर देखा था, कभी कभार खा सकते हैं, एक मलयाली रेस्त्रां है रेजेन्सी, जहाँ डोसा वगैरह के साथ आलू गोभी और मिक्स वेज सब्जी मिल जाती है साथ में रोटी या केरल परांठा खा सकते हैं। अभी एक और नया रेस्त्रां ढूँढ़ा है लाहौर गार्डन जैसा कि नाम से ही पता चलता है यह एक पाकिस्तानी रेस्त्रां है परंतु खाना अच्छा है। कलकत्ता रोल्स पर भी शाकाहारी रोल मिल जाता है साथ में ज्यूस ले सकते हैं। नाम से कलकत्ता है परंतु है बांग्लादेश का।

यहाँ अधिकतर रोटियाँ करी के साथ फ़्री होती हैं, केवल करी का बिल ही लिया जाता है, वैसे ही यहाँ सऊदी के खुबुस बहुत प्रसिद्ध हैं, तंदूर में बनाये जाते हैं। हमने भी खाकर देखा मैदे के होते हैं, रोज नहीं खा सकते।

मांसाहारी लोग ध्यान रखें पहले ही पूछ लें कि क्या आर्डर कर रहे हैं, क्योंकि यहाँ बीफ़, लेम्ब और मीट बहुतायत में खाया जाता है।

बहुत खाने की बातें हो गईं, और शायद इससे किसी को तो मदद मिल ही जायेगी, खाने के लिये सऊदी बहुत अच्छी जगह है और विशेषत: उनके लिये जो कि मांसाहारी हैं, उनके लिये कई प्रकार के व्यंजन मिल जायेंगे।

हम ठहरे शाकाहारी तो हमारे लिये सीमित संसाधन मौजूद हैं।

जिस्म २ देह का प्रेम प्रदर्शन… (Jism 2..)

फ़िल्म जिस्म २ देखी, यह फ़िल्म देहप्रदर्शन के साथ ही संपूर्ण देह के प्रेम प्रदर्शन का अच्छा अक्स दिखाती है। जिसमें बताया गया है कि मन तो नफ़रत कर सकता है, परंतु जिस्म का क्या करें उसकी जरूरतें अपनी हैं और उस जिस्म की जरूरतें वहीं पूरी कर सकता है जो उस जिस्म को समझ सकता है।
जिस्म २ में सनी लियोन को लिया गया, ज्ञात रहे कि सनी लियोन कनाडा की पोर्न स्टार हैं और भारतीय हैं, सनी लियोन को भारत में पहली बार बिग बोस में दिखाया गया था।
अदाकारी सनी में बिल्कुल नहीं है, चेहरे पर भाव नहीं है, फ़िल्म केवल देहयष्टि के भाव देखने के हिसाब से उचित है वरना कहानी कसी हुई नहीं है और जिस्म के संवाद अच्छॆ बन पड़े हैं, संवाद बहुत कुछ अच्छे लगे, कुछ गाने भी अच्छॆ हैं।
यह फ़िल्म केवल सनी लियोन के देह प्रदर्शन के बलबूते ही बॉक्स ऑफ़िस पर चलेगी, क्योंकि इस फ़िल्म में बस सनी लियोन का जिस्म ही दिखाया गया है और वह भारतीय सिनेमा में पसंद किया जायेगा या नहीं, यह पता नहीं, क्योंकि कलाकार जो कामुकता दर्शाते हैं वह सच के करीब होती है और यह कामुकता बिल्कुल पोर्न फ़िल्म के समकक्ष वाली है।
गाँवों में शायद यह फ़िल्म लोगों द्वारा पसंद की जायेगी, शहरों में नहीं, पूजा भट्ट से एक अच्छी फ़िल्म की अपेक्षा थी और आशा के विपरीत इसमें इमरान हाशमी नहीं थे, जो कि इस तरह की फ़िल्मों के लिये भट्ट कैंप से सबसे उपयुक्त हीरो इमरान हैं और उनका अभिनय फ़िल्म में जान डाल देता है।
वैसे शिवा फ़ेम ……. ने इस फ़िल्म में जान डालने की पूरी कोशिश की है, परंतु किरदार का इतना महत्वपूर्ण रोल ना होने से उन्हें अपनी अदाकारी दिखाने का पूरा मौका नहीं मिला।
कुल मिलाकर हमारी तरफ़ से तो यह फ़िल्म को हम केवल १ स्टार देते हैं, परंतु सबकी अपनी अपनी जरूरतें होती हैं, जिंदगी की भी और देखने की भी, तो हो सकता है कि जो जिस्म देखने जायेंगे उन्हें बहुत अच्छी लगे और वे उसे ४ स्टार भी दे सकते हैं।
कुछ संवाद जिस्म २ से जो कि मैंने ट्विट किये थे –
झूठ में मान नहीं सकता और सच किसी को सुनना नहीं ।
ये दुनिया सिर्फ़ प्यार की बातें करती है, चलती जुर्म पर है ।
जिंदगी में इंसान के पास सिर्फ़ दो ही रास्ते होते हैं, या तो वो झूठ को मानकर होश में रहे या सच सुनकर दीवाना हो जाये ।
तुम झूठ नहीं हो, क्योंकि तुम भी इसी जिंदगी के सर्कस का एक हिस्सा हो ।
ऐ जिंदगी तुझे तो सिर्फ़ ख्वाब में देखा हमने ।
तन्हा आदमी अक्सर अपने आप से ही बातें किया करते हैं ।
जब जान पर आती है तो उस जान को बचाने के लिये सब कुछ सीख जाते हैं।
जब कोई खुद को ही खत्म करने पर आ जाये, तो उसे कोई नहीं बचा सकता ।
अगर दुनिया में खूबसूरती है तो बदसूरती भी है । अँधेरा है तो रोशनी भी है ।
अगर किसी से प्यार करते हो तो उसे भूल जाने का जिगर भी रखो ।

 

कठिनाईयों भरे ये दिन

जीवन में सभी प्रकार की कठिनाईयाँ आती रहती हैं, और हमें अपने जीवन में सारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। सारी मजबूरियों के मारे होते हैं और सारे हालात से समझौता करना पड़ता है।

अभी यह मेरा जेद्दाह में दूसरा  ट्रिप है, पहला ट्रिप ठीक ठाक निकल गया था, परंतु दूसरे ट्रिप में बहुत सारी कठिनाईयाँ हैं, तो यह भी समझ लें कि जीवन में यह भी एक सीख ही है।

रमजान का महीना चल रहा है और यहाँ गैरमुस्लिमों के लिये जीना बहुत मुश्किल हो जाता है, यहाँ पर सभी रोजा रखते हैं, और सारा बाजार सुबह के ४ बजे से रात ९ बजे तक बंद रहता है, खाने के लिये रेस्त्रां भी शाम ५ बजे खुलते हैं, पर रेस्त्रां में जाकर खा नहीं सकते, ५ से ७ के बीच आप केवल पार्सल करवा सकते हैं, फ़िर शाम ७ बजे के बाद रेस्त्रां में खा सकते हैं।

और ७ बजे के बाद रेस्त्रां जाने के लिये टैक्सी मिलना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि लगभग सभी लोग इफ़्तार पर गये होते हैं। यहाँ पर असली समां तो शाम ७ बजे बाद ही शुरू होता है, जीवन में गति भी शाम ७ बजे बाद आती है। ७ बजे से ट्राफ़िक बड़ना शुरु होता है और रात ९ बजे के बाद तो ट्राफ़िक अपने चरम पर होता है।

यहाँ पर सभी लोग ७ बजे के बाद इफ़्तार करते हैं और सुबह ३.३० पर सहर करते हैं, समय थोड़ा आगे पीछे होता है । ऐसे ही बाजार भी रात्रि ९ बजे से सुबह ४ बजे तक खुले रहते हैं, बाजार मतलब कि सारे प्रकार के बाजार मॉल, दुकानें और पटरी बाजार भी।

खुलेआम खाना पीना और धूम्रपान मना होता है। अगर किसी गैरमुस्लिम को यह सब करना भी है तो उसे सार्वजनिक जगहों पर नहीं करना चाहिये। यहाँ कार्यालयों का समय १० से ४ हो जाता है पर केवल उनके लिये जो रोजे रखते हैं और बाकियों के लिये ८ से ५ ही होता है।

शाम को जगह जगह इफ़्तार पार्टिंयों का आयोजन होता है, बस शाम को जल्दी मतलब कि ५ बजे के बाद शाकाहारी भोजन कुछ चुनिंदा रेस्त्रां में ही उपलब्ध होता है, अधिकतर रेस्त्रां में शाकाहारी भोजन रात्रि ९ बजे बाद उपलब्ध होता है।

थोड़े दिनों की कठिनाईयाँ और हैं, फ़िर जीवन वापिस से पटरी पर आ जायेगा, एक बात और है कि यहाँ घूमने के लिये ऐसा कोई पर्यटक स्थल नहीं है, अगर कुछ है भी तो इतनी बंदिशें हैं कि जाने से पहले इच्छा ही खत्म हो जाये और मौसम इस बात की इजाजत भी नहीं देता, क्योंकि मौसम अभी बहुत गर्म है रात में भी लू के थपेड़े लगते हैं।

सकारात्मक और नकारात्मक संकेत जीवन में ..

कभी कभी जो सोचो वह हो नहीं पाता और जो नहीं सोचो वह हो जाता है, पर अधिकतर छ्ठी इंद्रिय से जो संकेत मिलते हैं वे हमेशा हमेशा बहुत ज्यादा करीब होते हैं। जीवन में ऐसे बहुत सारे वाकये हो रहते हैं जब हमें लगता है कि यह हमारा फ़ैसला नहीं, यह तो तकदीर का फ़ैसला है।

हम कितना भी किसी भी काम के बारे में सोच लें हमेशा उसके बारे में मन में विचारों में दो प्रकार की लहरें दौड़ती रहती हैं, एक नकारात्मक और एक सकारात्मक, जिसमें कई बार हम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों लहरों के लिये कई पैमाने निर्धारित कर देते हैं। जैसे अगर आज यह कार्य हो गया तो मेरे काम में सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं, परंतु अगर नहीं हुआ तो नकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं।

यह प्रक्रिया लगभग सबके साथ होती है जो कि निश्चलता से अपने कर्मों को निभाते हैं, जिनके मन की ऊर्जा का स्रोत हमेशा पवित्रता होती है। अपने निश्छल कर्मों से ऐसे लोग प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का भरपूर प्रयोग कर पाते हैं और वही प्रकृति प्रदत्त संसाधन उनके लिये छठी इंद्रिय का कार्य करती है।

ऐसे ही नकारात्मक संकेत भी प्रकृति प्रदत्त होते हैं, जो कि हमेशा समय समय पर इंसान को चेताते रहते हैं और इंसान को जीवन के अँधेरे में जाने से बचाता है, वहीं सकारात्मक संकेत जीवन के लक्ष्यों को अपने पूर्ण रूप में प्राप्त करने में मदद करते हैं।

जरूरत है हमें अपने जीवन में सारे कार्यों को निश्छल भाव से पूर्ण करने की, सारे कार्यों को पूर्ण करने के संकेत हमें प्रकृति हमेशा सकारात्मक और नकारात्मक रूप में हमेशा देती है। अत: कोई भी कार्य करें पूर्ण लगन और ईमानदारी से करें, प्रकृति प्रदत्त ऊर्जा का स्रोत बना रहता है।

दिवास्वप्न बुरा या अच्छा … मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी

एक दिवास्वपन आया मुझे

एक दिन..

श्री भगवान ने आशीर्वाद दिया,

सारे अच्छे लोग देवता रूपी

और

उनके पास हथियार भी वही,

सारे बुरे लोग राक्षस रूपी

और

उनके पास हथियार भी वही

समस्या यह हो गई

कि

देवता लोग कम

और

राक्षस ज्यादा हो गये

तब

श्री भगवान वापिस आये

और

देवता की परिभाषा ठीक की

फ़िर

देवता ज्यादा हो गये

और

राक्षस कम हो गये,

देवताओं ने राक्षसों पर कहर ढ़ाया

और

देवताओं का वास हो गया

फ़िर

कुछ देवता परेशान हो गये

क्योंकि

राक्षस गायब हो गये

तो

कुछ फ़िर से राक्षस बन गये।

असली ताकत तो हमारे पास ही है !

अन्ना का अनशन चल रहा है, सरकार, राजनैतिक पार्टियाँ और मीडिया अन्ना को मिल रहे समर्थन को कम कर आंक रहे हैं। और देश की जनता को चिल्ला चिल्ला कर बता रहे हैं, देखा अन्ना के आंदोलन में कोई दम नहीं है, अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रहे हैं, “देख लो, सारे ईमानदारों, तुम सबकी हम भ्रष्टाचारियों के सामने कोई औकात नहीं है”।

मीडिया भी निष्पक्षता से खबरें नहीं बता रहा है, सब के सब मिल चुके हैं, केवल अन्ना एक तरफ़ है और दूसरी तरफ़ ये सारे बाजीगर। इन बाजीगरों को लग रहा है कि इन लोगों ने जैसे अन्ना और जनता को हरा दिया है। पर क्या इन बाजीगरों को पता नहीं है कि जनता से वे हैं, जनता उनसे नहीं।

जनता सब देख रही है, समझ रही है, वैसे समझदार लोगों के लिये अभी कुछ महीनों में जो चुनाव हुए हैं, वो ही जनता की सोच और ताकत समझने के लिये काफ़ी हैं।

देखते हैं कि ये सारे कब तक अपना पलड़ा भारी समझते हैं, क्योंकि असली ताकत तो हमारे पास ही है, ठीक है कुछ लोगों की ताकत बिकाऊ है परंतु सरकार बनाने जितनी ताकत खरीदना असंभव है।

देखो कि अगली सरकार जनता की ताकत से बनती है या सरकार की खरीदी हुई ताकत से।

वैसे सरकार यह ना समझे कि अन्ना वहाँ जंतर मंतर पर अकेले हैं, अन्ना के समर्थन में घर पर भी बहुत सारे लोग हैं जो अन्ना के साथ हैं बस जंतर मंतर पर नहीं हैं।

परिवार में क्या अब तो फ़िल्मों में भी कोई सीख नहीं मिलती ।

    कल सोने ही जा रहे थे तभी ना जाने क्या सूझी और बुद्धुबक्सा चालू कर लिया और जीअफ़लाम पर फ़िल्म आ रही थी, बलराज साहनी और निरूपमा राय इसके मुख्य कलाकार थे और उनके तीन बच्चे बड़ा बेटा रवि, मंझली बेटी और छोटा बेटा राजा के इर्दगिर्द घूमती कहानी ने पूरी फ़िल्म देखने पर मजबूर कर दिया।

    बाद में अंतराल में फ़िल्म का नाम पता चला, फ़िल्म का नाम “घर घर की कहानी” था।

    फ़िल्म की कहानी माता पिता और बच्चों के ऊपर बेहद कसी हुई थी, जिसमें बताया गया था कि बच्चों को शिक्षा घर से ही मिलती है कहीं बाहर से नहीं मिलती, मूल रूप से ईमानदार पिता जो कि एक अच्छे पद पर कार्यरत है, और चाहे तो विटामिन आर बकौल बलराज साहनी के कार्यालय में कार्य करने वाले एक क्लर्क याने कि रिश्वत से अपनी सारी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, परंतु वे बेईमानी न करते हैं और ना करने देते हैं, और परिवार के लिये भी एक मिसाल बनते हैं।

    बलराज साहनी को एक बेहद ईमानदार, संजीदा, जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति के रूप में पेश किया गया है, पिता के रूप में उनमें गुस्सा नहीं बल्कि प्यार है और हरेक बिगड़ी हुई स्थिती को गुस्से से नहीं, समझदारी और जिम्मेदारी से सुधारते हैं।

    बड़ा बेटा रवि जो कि हाईस्कूल में पढ़ता है वह अपने पिता से ५० रूपयों की मांग करता है जिससे वह बच्चों के साथ अजंता एलोरा घूमने जा सके तो पिता मना कर देते हैं और कहते हैं कि “बेटा जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिये, चादर से बाहर पैर पसारने से घर की सुख शांति भंग हो जाती है।”

    पर बेटा रवि नहीं मानता और अपने पिता से कहता है कि मैं हड़ताल करूँगा और खाना नहीं खाऊँगा जब तक कि मुझे ५० रूपये नहीं मिल जाते, इधर साथ ही मंझली बेटी भी टेरलीन की फ़्रॉक लेने और छोटा बेटा राजा साईकिल की जिद लेकर हड़ताल करने लगते हैं, और तीनों माता पिता से कहते हैं कि जब तक हमारी माँगें पूरी नहीं होतीं, तब तक हम खाना नहीं खायेंगे।

    माँ निरूपा राय पिता से कहती है कि बच्चों की जिद पूरी कर दो, तो वे कहते हैं कि ये बच्चे ही कल के शहरी हैं और इन्हें पता होना चाहिये कि पैसा का मोल क्या है, पैसा कमाना कठिन है और पैसा खर्च करना बहुत आसान, अगर आज मैं इनकी माँगें पूरी कर दूँगा तो ये कल फ़िर कोई नई माँगे खड़ी कर देंगे और बात बनने की जगह बिगड़ने लगेगी। पिता कहते हैं कोई नहीं चलो खाना खाते हैं, जब सुबह तक भूखे रहेंगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी और चुपचाप हड़ताल ओर सत्याग्रह हवा हो जायेगी। पिता खाने पर बैठते हैं कि पहला निवाला लेते ही बच्चों की याद आ जाती है और चुपचाप निवाला वापिस थाली में रखकर वहीं गिलास में हाथ धोकर उठ खड़े होते हैं।

    उसके बाद माँ अपने तीनों बच्चों के पास खाने की सजी थाली लेकर उनसे शांतिपूर्वक कहती है कि खाना खा लो तुम लोग तो हर बात मानते हो, तो तीनों बच्चे कहते हैं कि हम तो आज भी हर बात मानने को तैयार हैं केवल खाना खाने की बात छोड़कर। जब माँ अपने कमरे में वापिस पहुँचती है तो पिता पूछते हैं कि तुम्हारी शांति यात्रा भी लगता है नाकामयाब हो गई है, तो माँ फ़फ़क फ़फ़क कर रो पड़ती है तो पिता कहते हैं कि जब बेटा बड़ा हो जाये तो उसे सारी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिये और यह भी समझना चाहिये कि परिवार के लिये पैसे का क्या मोल है।

    सुबह माँ बढ़िया गरम गरम आलू के परांठे नाश्ते में सेंकती हैं और राजा के मुँह में पानी आ रहा होता है परंतु फ़िर भी वह काबू करता है और माँ कहती है कि चलो नाश्ता कर लो, पर बच्चे मना कर देते हैं, तभी पिता आते हैं और कहते हैं कि रवि तुमको लगता है कि घर चलाना बहुत आसान है।

    रवि कहता है कि मेरा दोस्त है उसके पिता जी को तो आपसे भी कम तन्ख्वाह मिलती है और उसकी सारी जिद उनके पिता जी पूरी कर देते हैं, पिता जी कहते हैं बेटा मुझे प्राविडेंट फ़ंड और आयकर कटने के बाद ६०० रूपये के आसपास मिलते हैं, तो रवि कहता है कि इसमें से तो बहुत कुछ खरीदा जा सकता है तो पिता कहते हैं कि बेटा घर का सारा खर्च करने के बाद महीने के आखिरी में कुछ भी नहीं बचता है।

    तो पिता कहते हैं कि अच्छा बेटा एक काम करते हैं कि कल से घर अगले छ: महीने के लिये तुम चलाओगे और अगर पैसे बचा सके तो अपनी सारी माँगें पूरी कर लेना। रवि तैयार हो जाता है, माँ कहती भी है कि बेटा रहने दो नहीं तो आटॆ दाल का भाव पता चल जायेगा।

    रवि घर चलाने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले लेता है, पिता के एक साले हैं जो कि इनके समझदारी पर नाज करते हैं और अपनी बहन याने कि निरूपा राय को हद से ज्यादा प्यार करते हैं, फ़िल्म ऐसे ही बड़ती रहती है रवि घर का खर्च चलाने लगता है तो पहले महीने के बाद वह कहता है कि ४० रूपये की बचत है, तो पिता सारे खर्च याद दिलाते हैं तो पता चलता है कि कुछ बिल तो उसने भरे ही नहीं हैं और इस तरह से कुछ भी नहीं बचता अगले महीने दीवाली आ जाती है और बच्चे नये कपड़े लेने से मना कर देते हैं और साथ ही घर में मेहमान आ जाते हैं, एक बच्चा पटाखों से जल जाता है उसके अस्पताल का खर्चा। फ़िर तीसरे महीने में माँ बीमार हो जाती है तो सब दिन रात सेवा करते हैं और माँ ठीक हो जाती है।

    क्लर्क को पुलिस रिश्वत के जुर्म में पकड़ लेती है और उनकी बेटी का रिश्ता टूट जाता है यहाँ पिता बलराज साहनी लड़के वालों को समझाने जाते हैं कि पिता का किया बच्चों सजा क्यों भुगते और आखिरकार लड़केवाले मान जाते हैं।

    इसी बीच बच्चे पैसे बचाने के लिये घर से नौकरानी को हटा देते हैं, स्कूल बस की बजाय पैदल जाने लगते हैं और घर के सारे काम खुद ही करने लगते हैं। पूरे घर की जिम्मेदारी बच्चे बखूबी निभाते हैं। उधर पिता के साले का बेटा जो है वह जुएँ में मस्त है और घर की चीजें बेचकर जुएँ मॆं लगाता रहता है और उसकी माँ उस पर पैसे लुटाती रहती है। रवि चौथे महीने के हिसाब की शुरूआत ही कर रहा होता है और साथ ही उसके पास स्कूल में किये गये ड्रामा “श्रवण कुमार” से २०० रूपयों का ईनाम भी रहता है। उसी समय साले के बच्चा इनके घर पर आता है और रवि को रूपये रखते हुए देख लेता है तो वह इनके घर से ८०० रूपये चुरा लेता है, अब सब बहुत परेशान होते हैं और पिता कहते हैं मुझे अपनी तन्ख्वाह से ज्यादा रवि के ईनाम में मिले रूपयों की फ़िक्र है। खैर चोर पकड़े जाते हैं। और बच्चों को भी समझ आ जाता है कि जब माता पिता घर चला रहे थे तब ज्यादा सही था, सब चीजें भी घर में आती थीं और मजे रहते थे।

फ़िल्म में बहुत सारी सीखें मिलीं –

१. जितनी चादर हो उतने ही पैर फ़ैलाने चाहिये।

२. रिश्वत नहीं लेनी चाहिये।

३. सिगरेट अगर छोड़ दी जाये तो अच्छी खासी रकम महीने की बच जाती है। और सेहत भी ठीक रहती है।

४. जुआँ खेलना और बुरी संगत ठीक नहीं है।

५. बच्चों को बचपन से ही संस्कार घर में ही देने होते हैं।

    बहुत सारी चीजें अच्छी लगीं जैसे कि सुबह उठते ही माँ निरूपा राय पिता के पैर छूकर दिन की शुरूआत करती है, बच्चे माता पिता को भगवान का रूप मानते हैं, पूरा घर मिलजुल कर रहता है।

आजकल की फ़िल्मों में यह सब कहाँ मिलता है।

हमारे शौक ही हमारी सोच को बदल देते हैं

समाज को बहुत तेजी से बदलते हुए हमने देखा है, समाज की सोच को बदलते हुए देखा है, इंसान की सोच को बदलते हुए देखा है, दरअसल हमारे शौक ही हमारी सोच को बदल देते हैं। हम समय कैसे बिताते हैं यह भी हमारे शौक पर निर्भर करता है।
मुझे बचपन की याद है, जब पापाजी शासकीय वाचनालय से २-३ हिन्दी की साहित्यिक किताबें लाते थे और सप्ताह भर में पढ़ भी लिया करते थे और लगभग हर रविवार मैं उनके साथ वाचनालय किताबें बदलने जाया करता था, मेरा लालच यह होता था कि वहाँ बहुत सारे अखबार होते थे और बच्चों की किताबें भी पढ़ने को मिल जाया करती थीं, पापाजी को हमारा इंतजार करना पड़ता था।
उस समय हमें साहित्य की तो इतनी समझ नहीं थी तो हम किताबें तो नहीं पढ़ते थे परंतु हाँ घर में पढ़ने का महत्व समझ आ गया और यह समझ बचपन से आ गई कि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं और हमेशा इन किताबों से कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता रहता है।
उस समय टीवी की इतनी ज्यादा धूम नहीं थी, और फ़ेसबुक, ट्विटर, लिंकडिन के पते भी नहीं थे क्योंकि इंटरनेट नहीं था, और फ़ोन होना उस समय विलासिता माना जाता था।
पापाजी जब शाम को कार्यस्थल से घर आते तो यदाकदा कहते आज फ़लाने अंकल के यहाँ खाने पर चलना है या फ़िर आज वो अंकल अपने परिवार के साथ मिलने आ रहे हैं या खाने पर आ रहे हैं, और इस मिलने का अंतराल आज की तुलना में बहुत ज्यादा होता था। उस समय फ़ोन न होने के कारण सारी बातें पहले से ही तय कर ली जाती थीं और सारे कार्य आसानी से हो जाते थे।
आज हम इंटरनेट, टीवी के सीरियलों में ही इतने व्यस्त हैं कि हमें बाहर की बात तो छोड़िये अपने परिवार के लिये भी समय नहीं है। परिवारों में आजकल कई बार तो कुछ दिन ऐसे निकल जाते हैं कि किसी सदस्य से बात ही नहीं होती, तो बाहर के अंकल से मिलने की बातें तो छोड़ ही दो।
समाज की सोच और धारणा तेजी से बदल रही है, आगे पता नहीं क्या होगा, परंतु जितना समय हमने देखा उतने में ही इतना सब कुछ  बदल गया, पता नहीं आगे क्या होगा ।