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सोमनाथ का एक वृत्तांत आज के परिप्रेक्ष्य में.. यदि कोई आततायी देव की अवज्ञा करेगा तो भारत उसे कभी सहन न करेगा

गंग सर्वज्ञ ने हँस कर कहा, “कुमार, यदि गजनी का सुलतान सोमपट्टन पर अभियान करे तो गुजरात का गौरव भंग होगा, यह तुम प्रथम ही से कैसे कहने लगे?  यदि वह अभियान करे तो गुजरात का गौरव बढ़े क्यों नहीं?”

भीमदेव लज्जित हुए। उन्होंने कहा, “गुरूदेव, सोलह बार इस दैत्य ने तीस बरस से भारत को अपने घोड़ों की टापों से रौंदा है। हर बार इसने भारत को तलवार और आग की भेंट किया है”।”

“तो इसमें क्या इसी अमीर का दोष है कुमार, तुम्हारा, देशवासियों का कुछ भी दोष नहीं है? कैसे एक आततायी इतनी दूर से दुर्गम राह पार करके, धन-जन से परिपूर्ण, शूरवीर राजाओं और क्षत्रियों से सम्पन्न भारत को सफ़लतापूर्वक आक्रान्त करता है, धर्मस्थलों को लूट ले जाता है, देश के लाखों मनुष्यों को गुलाम बनाकर बेचता है, परन्तु देश के लाखों-करोड़ों मनुष्य कुछ भी प्रतीकार नहीं कर पाते। तुम कहते हो, तीस बरस से यह सफ़ल आक्रमण कर रहा है। उसके सोलह आक्रमण सफ़ल हुए हैं। फ़िर सत्रहवाँ भी क्यों न सफ़ल होगा, यही तो तुम्हारा कहना है? तुम्हें भय है कि इस बार वह सोमपट्टन को आक्रान्त करेगा। फ़िर भी भय है कि यदि वह ऐसा करेगा तो गुजरात का गौरव भ्ग होगा। तुम्हारे इस भय का कारण क्या है? क्या अमीर का शौर्य? नहीं, तुम्हारे भय का कारण तुम्हारे ही मन का चोर है। तुम्हें अपने शौर्य और साहस पर विश्वास नहीं। कहो तो, इसका गजनी यहां से कितनी दूर है?  राह में कितने नद, वन, पर्वत और दुर्गम स्थल हैं? सूखे मरूस्थल हैं, जहाँ प्राणी एक-एक बूँद जल के बिना प्राण त्यागता है। ऐसे विकट वन भी हैं, जहाँ मनुष्य को राह नहीं मिलती। फ़िर उस देश से यहाँ तक कितने राज्य हैं? मुलतान है, मरूस्थल के राजा हैं। सपादलक्ष के, नान्दोल के चौहान, झालौर के परमार, अवन्ती के भोज, अर्बुद के ढुण्ढिराज हैं। फ़िर पट्ट्न के सोलंकी हैं। इनके साथ लक्ष-लक्ष, कोटि-कोटि प्रजा है, जन-बल है, अथाह सम्पदा है, इनका अपना घर है, अपना देश है। फ़िर भी यह आततायी विदेशी, इन सबके सिरों पर लात मार कर, सबको आक्रान्त करके, देश के दुर्गम स्थानों को चीरता हुआ, राज्यों के विध्वंस करता हुआ, इस अति सुरक्षित समुद्र-तट पर सोम-तीर्थ को आक्रान्त करने में सफ़ल हो-तो कुमार, यह उसका दोष नहीं, उसका विक्रम है-उसका शौर्य है। दोष यदि कहीं है तो तुममें है।”

देव तो भावना के देव हैं। साधारण पत्थर में जब कोटि-कोटि जन श्रद्धा, भक्ति और चैतन्य सत्ता आवेशित करते हैं तो वह जाग्रत देव बनता है। वह एक कोटि-कोटि जनों की जीवनी-सत्ता का केन्द्र है। कोटि-कोटि जनों की शक्ति का पुंज है। कोटि-कोटि जनों की समष्टि है। इसी से, कोटि-कोटिजन उससे रक्षित हैं। परन्तु कुमार, देव को समर्थ करने के लिए उसमॆं प्राण-प्रतिष्ठा करनी पड़ती है। वह कोरे मन्त्रों द्वारा नहीं, यथार्थ में । यदि देव के प्रति सब जन, अपनी सत्ता, सामर्थ्य और शक्ति समर्पित करें, तो सत्ता, शक्ति और सामर्थ्य का वह संगठित रूप देव में विराट पुरूष के रूप का उदय करता है। फ़िर ऐसे-ऐसे एक नहीं, सौ गजनी के सुलतान आवें तो क्या? जैसे पर्वत की सुदृढ़ चट्टानों से टकरा कर समुद्र की लहरें लौट जाती हैं, उसी प्रकार उस शक्ति-पुंज से टकराकर, खण्डित शक्तियाँ चूर-चूर हो जाती हैं…

“थानेश्वर, मथुरा और नगरकोट का पतन कैसे हुआ, इस पर तो विचार करो। महमूद तुम पर आक्रमण नहीं करता, राज्यों का उसे लोभ नहीं है। वह तो देव-भंजन करता है। कोटि-कोटि जनों के उसे अविश्वास और पाखण्ड को खण्डित करता है, जिसे वे श्रद्धा और भक्ति कहकर प्रदर्शित करते हैं। वह भारत की दुर्बलता को समझ गया है। यहाँ धर्म मनुष्य-जीवन में ओत-प्रोत नहीं है। वह तो उसके कायर, पतित और स्वार्थमय जीवन में ऊपर का मुलम्मा है। नहीं तो देखो, कैसे वह एक कुरान के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों योद्धाओं को बराबर जुटा लेता है। कुरान के प्रति उनकी श्रद्धा, उसमें और उसके प्रत्येक साधारण सिपाही में मुलम्मे की श्रद्धा नहीं है, निष्ठा की श्रद्धा है..

“इसी से कुमार, मेरी दृष्टि में वह उस आशीर्वाद ही का पात्र है, जो मैंने उसे दिया.. और प्राणि-मात्र को अभयदान तो भगवान सोमनाथ के इस आवास का आचार है, मैं उस आचार का अधिष्ठाता हूँ, यह भी तो देखो!”

“परन्तु गुरूदेव, शत्रु-दलन की शक्ति क्या देवता में नहीं है?”

“कुमार! यदि राजा के मन्त्री, सेना तथा प्रजा अनुशासित न हों, सहयोग न दें, तो राजा की शक्ति कहाँ रही? राजा की शक्ति उसके शरीर में नहीं है। शरीर से तो वह एक साधारण मनुष्य-मात्र है। उस राजा के शरीर को नहीं, उसके र्र्जत्व की भावना को अंगीकार करके जब सेना और मन्त्री दोनों का बल उससे संयुक्त होता है, तब वह महत्कृत्य करता है। इसी भाँति पुत्र, देवता अपने-आप में तो एक पत्थर का टुकड़ा ही है, उसकी सारी सामर्थ्य तो उसके पूजकों में है। वे यदि वास्तव में अपनी सामर्थ्य समष्टिरूप में देवार्पण करते हैं, तो वे देवत्व का उत्कर्ष होता है। वास्तव में भक्त की सामर्थ्य का समष्टि-रूप ही देव का सामर्थ्य है।”

बहुत देर तक कुमार भीमदेव गंग सर्वज्ञ की इस ज्ञान गरिमा को समझते रहे। फ़िर बोले, “तो देव, गजनी का सुलतान यदि सोमपट्टन को आक्रान्त करे तो हमारा क्या कर्तव्य है?”

“जिस अमोघ सामर्थ्य की भावना से तुम देवता से अपनी रक्षा चाहते हो, उसी अमोघ सामर्थ्य से देव-रक्षण करना”।

“परन्तु वह अमोघ सामर्थ्य क्या मनुष्य में है?”

“और नहीं तो कहाँ है? बेटे! मनुष्य का जो व्यक्तित्व है वह तो बिखरा हुआ है, उसमें सामर्थ्य का एक क्षण है। अब, जब मनुष्य का समाज एकीभूत होकर अपनी सामर्थ्य को संगठित कर लेता है, और वह उसका उपयोग स्वार्थ में नहीं, प्रत्युत कर्तव्य-पालन में लगाता है, तो यह सामर्थ्य-समष्टि मनुष्य की सामर्थ्य होने पर भी देवता की सामर्थ्य हो जाती है। इसी से देव-रक्षण होगा।”

“परन्तु यदि लोग उपेक्षा करें, अपने-अपने स्वार्थ में रत रहें”?”

“तो देवता की सामर्थ्य भंग होती, तब प्रथम देवता अन्तर्धान होगा, फ़िर देव-अरक्षित कोटि-कोटि जन दु:ख-ताप से पीड़ित हो दु:ख भोगेंगे। जनपद-ध्वंस होगा।”

“तब प्रभु, मुझ अज्ञानी को आप यह आदेश दीजिए कि मैं क्या करूं। आज मैं आपके चरणों में प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि यह दुर्दान्त भारत-विजेता भगवान सोमनाथ को आक्रान्त करेगा तो मैं इसी तलवार से उसके दो टुकड़े कर दूँगा।”

“पुत्र! इस ‘मैं’ शब्द को निकाल दो। इससे ही ‘अहं-तत्व’ उत्पन्न होता है। कल्पना करो, कि तुम्हारी भाँति ही दूसरे भी इस “मैं” का प्रयोग करेंगे, तो प्रतिस्पर्धा और भिन्नता का बीज उदय होगा। सामर्थ्य का समष्टि-रूप नहीं बनेगा।”

“तो भगवन! हम कैसे कहें—?”

“ऐसे कहो पुत्र, कि यदि कोई आततायी देव की अवज्ञा करेगा तो भारत उसे कभी सहन न करेगा।”

जो स्कूल जाते हैं वे नौकरी करते हैं और जो कतराते हैं वे उन्हें नौकरी पर रखते हैं.. बेटेलाल से कुछ बातें..

    अभी बस बेटे को बस पर स्कूल के लिए छोड़ कर आ रहा हूँ, लगभग १० मिनिट बस स्टॉप पर खड़ा था, तो बेटेलाल से बात हो रही थीं।
    कहने लगा कि मम्मी बोल रही थी कि कॉलेज में यूनिफ़ॉर्म नहीं होती, वहाँ तो कैसे भी रंग बिरंगे कपड़े पहन कर जा सकते हैं, मैंने कहा हाँ पर आजकल बहुत सारे कॉलेजों में भी यूनिफ़ॉर्म पहन कर जाना पड़ता है तो मैं तो ऐसे ही कॉलेज में एडमिशन लूँगा जिसमें अपने मनमर्जी के कपड़े पहन कर जा सकते हों।
    फ़िर कॉलेज के बाद की बात हुई कि आईबीएम में भी तो आप अपने मनमर्जी के कपड़े पहन कर जा सकते हो, मैंने कहा हाँ पर केवल फ़ोर्मल्स और शुक्रवार को जीन्स और टीशर्ट पहन सकते हैं, टीशर्ट कैसी पहन सकते हैं, कॉलर वाली या गोल गले वाली, मैंने कहा “कॉलर वाली, गोल गले वाली अलाऊ नहीं है”, ऊँह्ह फ़िर मैं आईबीएम में नहीं जाऊँगा, मुझे तो ऐसी जगह जाना है जहाँ गोल गले वाली टीशर्ट में जा सकते हों, फ़िर मैं माईसिस में जाऊँगा तो मैंने कहा कि हाँ वहाँ पर तो पूरे वीक कुछ भी पहन कर जा सकते हो, बस तुम स्मार्ट लगने चाहिये।
    तो ठीक है मैं आईबीएम को मोबाईल बनाऊँगा और यहीं पर एक इतनी ऊँची बिल्डिंग बनाऊँगा जो कि चाँद को छुएगी जिससे यहाँ पास में रहने वाले लोगों को ऑफ़िस आने में आसानी होगी, और मोबाईल ऑफ़िस को उनके घर के पास खड़ा कर दूँगा, तो प्राब्लम सॉल्व हो जायेगी।
    मैंने कहा कि तुम नौकरी क्यों करोगे, तुम खुद एक कंपनी बनाओ, तो जबाब मिला कि मेरे पास इतने पैसे थोड़े ही हैं जो इतनी बड़ी कंपनी खोल लूँगा, हमने कहा कि हरेक कंपनी की शुरूआत छोटे से ही होती है बाद में बाजार में जाने के बाद अच्छा कार्य करने पर बड़ी हो जाती है। तो नौकरी का मत सोचो और कंपनी खोलने का सोचो, उसके लिये पैसे की नहीं अक्ल की जरूरत होती है, उसके लिये स्कूल भी जाने की जरूरत नहीं होती, जो स्कूल जाते हैं वे नौकरी करते हैं और जो स्कूल जाने से कतराते हैं दिमाग कहीं और लगाते हैं वे स्कूल जाने वालों को नौकरी पर रखते हैं।
    तो बेटेलाल बोलते हैं फ़िर मैं पार्टनर बन जाऊँगा और आगे चलाऊँगा, इतने में बस आ चुकी थी, हम सोच रहे थे कि काश कुछ सालों पहले इतनी समझ हम में होती तो ऐसा ही कुछ कर रहे होते।
    जिन्होंने भी अभी तक अच्छे कॉलेज से शिक्षा ली है, साधारणतया वे अभी तक बड़ी कंपनी नहीं बना पाये हैं, परंतु औसत शिक्षा वाले लोगों ने असाधारण प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए बड़ी बड़ी कंपनियाँ बनाई हैं।

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क्या उज्जैन की जनता को कुछ समझ में नहीं आता या समझना नहीं चाहती, कि ये बिल्कुल शुद्ध पूँजी स्कीम है, लूट स्कीम, हो सकता है कि यह स्कीमें और भी शहरों में चल रही हों, परंतु यह तो तय है कि इससे कमाई तो नहीं होगी, आम जनता की जेब ही कटेगी।

अभी भी पता नहीं ऐसी कितनी ही स्कीमें उज्जैन में चल रही हैं, और जनता केवल इसी में लगी हुई है, कुछ स्कीमें तो पिछले ५-६ वर्षों से चल रही हैं।

क्या इस तरह के लुभावने और लालच वाले विज्ञापन हमारी आज की पीढ़ी को गुमराह नहीं कर रहे हैं।

पहले की चेताई गई दो पोस्टें जो सही साबित हुईं ।
 

 

खोह, वीराने और सन्नाटे

    जिंदगी की खोह में चलते हुए वर्षों बीत चुके हैं, कभी इस नीरव से वातावरण में उत्सव आते हैं तो कभी दुख आते हैं और कभी नीरवता होती है जो कहीं खत्म होती नजर नहीं आती। कहीं दूर से थोड़ी सी रोशनी दिखते ही लपककर उसे रोशनी की और बढ़ता हूँ, परंतु वह रोशनी पता नहीं अपने तीव्र वेग से फ़िर पीछे कहीं चली जाती है।

खोह १

    इस खोह में साथ देने के लिये न उल्लू हैं, न चमगादड़ हैं, बस सब जगह भयानक भूत जो दीवालों से चिपके हुए कहीं उल्टॆ टंगे हुए हैं, और मैं अब इन सबका आदी हो चुका हूँ, कभी डर लगता है तो भाग लेता हूँ पर आखिरकार थककर वहीं उन्हीं भूतों के बीच सोना पड़ता है।

लटकते भूत

    शायद मैं भी इन भूतों के लिये अन्जान हूँ, और ये भूत मेरे लिये अन्जान हों, इस अंधेरी खोह में चलना मजबूरी सी जान पड़ती है, कहीं सन्नाटे में, वीराने में कोई हिटलर हुकुम बजा रहा होता है, कहीं कोई सद्दाम अपनी भरपूर ताकत का इस्तेमाल करने के बजाय किसी ऐसी ही खोह में छुप रहा होता है।

अँधेरा १

    इन वीरानों में उत्सवों की आवाजें बहुत ही भयानक लगती हैं, शरीर तो कहीं अच्छी ऊँचाईयों पर है, परंतु जो सबके मन हैं वे ही तो भूत बनकर इन खोह में लटकते रहते हैं, सबके अपने अपने जंगल हैं और अपनी अपनी खोह, वीराने और सन्नाटे सबके अपने जैसे हैं, किसी के लिये इनका भय ज्यादा होता है और किसी के लिये इनका भय कुछ कम होता है।

वीरान जंगल

    बाहर निकलने का रास्ता बहुत ही आसान है, परंतु बाहर निकलते ही कमजोर लोगों को तो दुनिया के भेड़िये और चील कव्वे नोच नोच कर खा जाते हैं, उनके मांस के लोथड़ों को देखकर ही तो और लोग बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करते।

खोह की दीवालें

    कुछ बहादुर भी होते हैं जो इस आसान रास्ते को आसानी से पार कर लेते हैं और जिंदगी के सारे सुख पाते हैं, जब मन में करूणा और आत्म की पुकार होगी, तभी यह भयमुक्त वातावरण और जीवन उनके लिये नये रास्ते बनाता है।

गंभीर चिंतन और मंथन देश को क्या नई दिशा देता है ? यह देखना है ।

कल ऑफ़िस से आने के बाद ऑनलाईन खबरें सुन रहे थे जो कि देश के औद्योगिक घरानों को लेकर था, कि भारत सरकार चला रही है या देश के औद्योगिक घराने चला रहे हैं। हमारे औद्योगिक घराने सरकार की मदद से आम आदमी को लूटने में लगा हुआ है। जिन लोगों ने इस चीज को सार्वजनिक मंच से उठाया, पहले उनकी मंशा पर शक होता था, पर कल जो भी हुआ उससे अब उनकी मंशा साफ़ होती जा रही है।

पहले ऐसा लगता था कि ये सब राजनैतिक लालच में किया जा रहा है और “मैं आम आदमी हूँ” की टोपी पहनने वाले लोग भारत की जनता को गुमराह कर रहे हैं, मासूमों को बरगला रहे हैं। पर कल यह बात साफ़ हो गई कि इस देश में ना पक्ष है मतलब कि सरकार और ना ही विपक्ष, सब मिले हुए हैं, इस बात को और बल मिला कि देश को औद्योगिक घराने ही चला रहे हैं।

कल बहस में एक बात सुनने को मिली जो कि सरकारी पक्ष वाली पार्टी और विपक्ष वाली पार्टी दोनों ही एक सुर में कह रही थीं, ये हर सप्ताह नये खुलासे करने वाली पार्टी केवल खुलासे करती है और अंजाम तक नहीं पहुँचाती है, ये केवल चिंगारी दिखाकर भाग जाते हैं। सही बात तो यह है कि नये खुलासे करने वाली पार्टी के पास भी समय बहुत कम है, २०१४ के चुनाव सर पर खड़े हैं, और उनका मकसद किसी भी चीज को अंजाम तक पहुँचाना हो भी नहीं सकता क्योंकि आजादी के बाद से सभी राजनौतिक घरानों की और से इतने घोटाले हुए, उनका बयां करना ज्यादा जरूरी है।

जनता नासमझ तो है नहीं, सारी बातें पहले ही सार्वजनिक हैं परंतु हमें तो यह बात समझ में नहीं आती कि अगर ये लोग इतने ही सही हैं और कोई घोटाले नहीं किये तो इतने तिलमिलाये हुए क्यों हैं। इन्हें जो करना है करने दो, आपको अपना वोटबैंक पता है फ़िर आपकी समस्या क्या है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन लोगों को वाकई में डर लगने लगा है कि अब आम आदमी तक ये आदमी चिल्ला चिल्लाकर हमारी सारी गलत बातें पहुँचा रहा है और इससे हमें नुक्सान हो सकता है।

खैर यह तो क्रांति की शुरूआत भर है, जब तक राजनैतिक ताकतों को जनता की असली ताकत का अहसास होगा तब तक इन लोगों के लिये बहुत देर हो चुकी होगी, और इनका अस्तित्व मिट चुका होगा। खुशी इस बात की है कि जनता में गंभीर चिंतन पहुँच रहा है और जनता के बीच गंभीर मंथन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और राजनैतिक दलों के नेताओं के पास कुछ बोलने के लिये ज्यादा बचा नहीं है, सब नंगे हो चुके हैं। अब यह गंभीर चिंतन और मंथन देश को क्या नई दिशा देता है, और इतिहास में क्या लिखा जायेगा, भविष्य के गर्भ में क्या है यह तो जनता को तय करना है।

दूसरे देस में आने के बाद विचारों का परिवर्तन

    दूसरे देस जाने की इच्छा किसकी नहीं होती, हर कोई दूसरे देस का अनुभव लेना चाहता है, हम भी जून २०१२ से दूसरे देस को लगातार देख रहे हैं, और अपनी जिंदगी एक अनुभव को समृद्ध कर रहे हैं। कई नये प्रकार के लोगों से परिचय हुआ, कई नई संस्कृतियों को करीब से देख रहे हैं। जो चीज हमारी संस्कृति में है यहाँ इनकी संस्कृतियों से भिन्न है। परंतु फ़िर भी उनको करीब से देखना जानना एक अच्छा अनुभव है।

    दूसरे देस में कई लोग आसपास और दूरदराज के मुल्कों के भी मिले उनकी बातचीत करने की तहजीब बहुत करीब से जान रहे हैं, पड़ोसी मुल्कों के बारे में भी जान रहे हैं, उनकी समस्याएँ भी हमसे जुदा नहीं हैं, पर ऐसा लगता है कि उनकी समस्याएँ हमसे कहीं ज्यादा हैं। कम से कम हम लोग अपनी समस्याओं के केन्द्रीकरण के लिये जूझ रहे हैं पर उनकी समस्याएँ तो अभी भी विकेंद्रित हैं, कुछ मुल्कों के जन सैलाब ने अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिये हाल ही में बड़ी बड़ी क्रांतियाँ की हैं, जिसमें अच्छे नेतृत्व के अभाव के चलते वे अब भी अपनी मूल समस्याओं से जूझ रहे हैं।

    ये नई समस्याएँ हैं, जो पुरानी परेशानियों के सबब थे उन्हें तो उस जनसैलाब ने जड़ से उखाड़ फ़ेंका है और नई राह की तलाश में घूम रहे हैं, मंथन चल रहा है। क्रांति कुछ लोग विचारों से शुरू करते हैं और वो चिंगारी आग में बदलते देर नहीं लगती। ये हमारे यहाँ के मूल समस्याओं को पैदा करने वालों को सोच लेना चाहिये। शासन व्यवस्था के लिये होता है, अगर कुव्यवस्था और अराजकता उसकी जगह ले लेती है तो ऐसे शासन को जन सैलाब का सामना करने का सामर्थ्य भी होना चाहिये, इतिहास गवाह है कि ऐसे शासन और शासक हमेशा के लिये मिट गये हैं।

    कुछ जगह समस्याओं के केन्द्रीकरण के लिये छोटे बच्चे भी आवाजें उठा रहे हैं तो कुछ जगह पूरी की पूरी शिक्षा पद्धति बदली जा रही है और शिक्षा लेने वाले छात्रों ने इतिहास में क्रांति से अपना नाम अमर कर दिया है। यह तय है कि समस्याओं को सुलझाने के लिये पहले हमें समस्याओं को पैदा करने वालों को जड़ से उखाड़ना होगा और उसके लिये केवल विशाल जन सैलाब से कुछ नहीं होगा, उस जन सैलाब के विचारों को आंदोलित करना होगा।

    शिक्षा पद्धति में सिरे से सुधार करने होंगे, हमें देश में उद्यमी चाहिये। अभी हमारी शिक्षा पद्धति से केवल और केवल विकासशील देशों को चलाने वाले बाबू ही मिल रहे हैं, वाकई अगर हम उद्यमशील हो जायें तो सोने की चिड़िया बनने से हमें कोई रोक नहीं सकता, हमारी जनता को जागना होगा और उनके विचारों को आंदोलित होना होगा। आखिर हरेक विकास वैचारिक आंदोलन है और इस वैचारिक आंदोलन को प्रखर और अक्षुण्ण बनाने के लिये अपने को होम करना ही होगा।

    दूसरे देस में आने के बाद विचारों का परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है, यहाँ पर कई लोगों से बात करने के बाद मेरे यह विचार ठोस होते जा रहे हैं।

मैं तुम और जीवन (मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी)

मैं तुम्हारी आत्मीयता से गदगद हूँ
मैं तुम्हारे प्रेम से ओतप्रोत हूँ
इस प्यार के अंकुर को और पनपने दो
तुममें विलीन होने को मैं तत्पर हूँ।तुम्हारे प्रेम से मुझे जो शक्ति मिली है
तुम्हें पाने से मुझे जो भक्ति मिली है
इस संसार को मैं कैसे बताऊँ
तुम्हें पाने के लिये मैंने कितनी मन्नतें की हैं।

जीवन के पलों को तुमने बाँध रखा है
जीवन की हर घड़ी को तुमने थाम रखा है
तुम्हें अपने में कैसे दिखलाऊँ
कि ये सारी पंक्तियाँ केवल तुम्हारे लिये लिखी हैं।

कभी कभी चैट से भी खुशियाँ दिल को बाग बाग कर देती हैं ।

    जिंदगी मुश्किल का दूसरा नाम है और जो मुश्किलों का सामना डटकर करते हैं, वे अपने आप में हरफ़नमौला होते हैं। सहनशीलता जिनमें होती है वे एक ना एक दिन अपने लक्ष्य पर जरूर पहुँचते हैं, सफ़लता उनके कदम चूमती है। मुश्किलों से घबराकर जो जीवन के सामने अपने हथियार डाल दे वे बुजदिल होते हैं। अगर मुश्किलें जीवन में नहीं होंगी तो जीवन बोझिल हो जायेगा और जीवन जीने का आनन्द नहीं आयेगा।

    हमारे एक बेहद करीबी मित्र पिछले कुछ वर्षों से इसी तरह की परिस्थितियों से गुजर रहे थे, दो दिन पहले फ़ेसबुक पर रात्रि को उनका मैसेज आया – “भाई परेशान करना है, कर लूँ क्या ?”, वैसे दोस्त जो कि कार्पोरेट दुनिया में होते हैं, यही उनकी एक खासियत होती है बोलकर परेशान करते हैं, और अगर अभी समय नहीं है तो समय बता दो तब परेशान करता हूँ। हमने झट से चैट पर कहा “अरे साब आपके लिये तो हम हमेशा फ़्री हैं”। जबाब मिला “एक गुड न्यूज दे रहे हैं आपको !!” आज हमने अपनी तत्काल कंपनी में पेपर डाल दिया है, पेपर को त्यागपत्र हिन्दी में कहा जाता है। हमने झट से कहा “वाह !! बधाई, तो आपको आखिरकार नई राह मिल ही गई”।

    हमारे मित्र का जबाब था “कोशिश की है”, हमने कहा “भगवान सबकी सुनता है बस आपको इंतजार करवाया “, उन्होंने कहा “घर की राह मिल गई है, अब बस बहुत हुआ अब वापिस जायेंगे”। जो अपने परिवार से नौकरी के लिये दूर रह रहे होते हैं, वे इस बात को शायद अच्छी तरह से समझ पायेंगे। हमने कहा “हृदय से हमारी बधाई स्वीकारें”। हमारे मित्र ने बताया कि हमें शाम से यह बात बताने की बहुत इच्छा थी, हमें बहुत अच्छा लगा। और हमने कहा “भाई वैसे भी कमीने बोलने वाले दोस्त बहुत कम हैं”।

    हमने पूछा कि फ़िर तो आपको कल जब नई राह मिली तो नींद सुकून से आई होगी, उन्होंने चैट पर जबाब दिया नहीं सब कुछ आज हुआ है तो पता नहीं आज की रात कैसे कटेगी, नींद आयेगी या नहीं। दिल खुशियों से लबालब हुआ जा रहा था, हमने चैट पर लिखा “आपकी जिंदगी में हर रोज ऐसे ही खुशियों की बौछार हो”, हमारे मित्र कहते हैं “सरकार इतनी खुशियों को बटोरने की आदत नहीं है, सँभाल नहीं पाते हैं, थोड़ी सी खुशी में ही खुश हैं”।  हमने कहा ऐसे भी खुशियाँ कभी कभी आती हैं इसलिये जब भी खुशी मिले बौरा लेना चाहिये”।

    ऐसे ही अपने करीबी को जब खुशी मिलती है तो हम भी उसकी खुशी में झूम उठते हैं और उसको भी बौरा लेने की सलाह देते हैं।

वीडियो चैटिंग ब्लैकबैरी प्लेबुक से (Video Chat for Blackberry Playbook via AIM & AOL)

कल से वीडियो चैटिंग के लिये लगे हुए थे, कैसे कम्प्य़ूटर और ब्लैकबैरी प्लेबुक के मध्य वीडियो चैटिंग हो, इसके लिये ऐसे सॉफ़्टवेयर उत्पाद की जरूरत महसूस हो रही थी जिसमें किसी भी डिवाइस पर सॉफ़्टवेयर संस्थापित न करना पड़े। इसमें आज हमें सफ़लता भी मिली ।
www.aim.com

aim

इसमें बिना संस्थापन के भी सीधे वेबसाईट से वीडियो चैटिंग की जा सकती है, हालांकि हमें जो महसूस हुआ वह यह है कि इसमें थोड़ा आडियो का लफ़ड़ा है, पर वीडियो बिल्कुल साफ़ है। पर इसमें पंजीकरण जरूरी है, या तो आप AIM में पंजीकरण करें या फ़िर Facebook से भी लॉगिन कर सकते हैं।

इसके पहले हमने AOL की ही एक और सेवा है जिसमें वेबपेज से सीधे वीडियो कान्फ़्रेंसिंग की जा सकती है, उसका भी उपयोग किया था, पर हमें अब लगा कि AOL की ही सेवा है और उसमें भी हमने यही ऑडियो की समस्या का सामना किया था, पर उसमें भी वीडियो बढ़िया था।

www.aol.com/av की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसमें आपको वेबसाईट पर पंजीकरण करवाना जरूरी नहीं है, केवल एक बक्से पर टिक मारना है कि आप १३ वर्ष के ऊपर हैं और फ़िर अपने कैमरा और माईक की सैटिंग चुन लीजिये। सीधे वीडियो चैट शुरू हो जायेगा।

aolav

इस वीडियो चैट में AOL आपको एक जादुई लिंक देगा जिसे आपको उन लोगों को देनी होगी जिनसे आप वीडियो चैटिंग करनी होगी, यह पूर्णतया सुरक्षित है, और इसमें अधिकतम ३ लोग वीडियो चैट कर सकते हैं। आप यहाँ AIM और Facebook वालों को भी बुला सकते हैं।

वीडियो क्वालिटी जबरदस्त है, ऑडियो क्वालिटी हमें ठीक नहीं लगी।

अब चूँकि ब्लैकबैरी प्लैबुक में एक वीडियो चैट का सॉफ़्टवेयर उत्पाद जरूर दे रखा है, परंतु यह सॉफ़्टवेयर केवल ब्लैकबैरी से ब्लैकबैरी के मध्य ही वीडियो चैटिंग कर सकता है। हमने Skype भी ढूँढ़ा परंतु Skype कंपनी ने ब्लैकबैरी के लिये उत्पाद बनाना बंद कर दिया है और जो उपलब्ध था वह भी अपनी साईट से हटा दिया है, जबसे Skype ने Facebook के साथ वीडियो चैटिंग शुरू की है।

अभी वीडियो चैटिंग के लिये खोज जारी है, जब तक कि ब्लैकबैरी प्लेबुक के लिये कोई अच्छा सा वीडियो चैट नहीं मिल जाता है। नहीं तो आखिर में खुद ही बैठकर कोड लिखना पड़ेगा और वीडियो चैट बनाना पड़ेगा Sad smile

कम उम्र में मानसिक तनाव के कारण बड़ रहीं शारीरिक समस्याएँ

इस भागती दौड़ती दुनिया में तनाव बड़ता ही जा रहा है, कुछ शारीरिक समस्याएँ वर्षों पहले कुछ उम्र के बाद होती थीं याने कि लगभग ५० वर्ष के बाद होती थीं । अब वे शारीरिक समस्याएँ तेजी से कम उम्र की अवस्था में होने लगी हैं।

सब कहते हैं कि स्वस्थ्य जीवन जीना चाहिये, सबकी इच्छा स्वस्थ्य जीवन जीने की होती है, परंतु या तो समय पास ना होने की लाचारी होती है या फ़िर आराम तलबी के कारण पसीना नहीं बहाने देने की लाचारी होती है।

HeartAttackमानसिक तनाव

ये शारीरिक समस्याएँ मानसिक तनाव की वजह से घर कर रही हैं, आजकल नौकरी में इतना तनाव होता है कि व्यक्ति पल पल केवल अपनी व्यवसायिक समस्याओं को निपटाने में ही दिमाग में उलझा होता है, और इसी उलझन में उधेड़बुन में कब  यह तनाव उसके शरीर को लक्ष्य करने लगता है, उसे पता ही नहीं चलता है।

दो तीन दिन पहले ही पता चला कि लगभग ४० वर्षीय एक सहकर्मी को पहले दिल में ब्लॉकेज की समस्या हुई और फ़िर वे कोमा में चले गये और अगले ही दिन वे नहीं बचे। इस व्यवसायिक तनाव के कारण सीधे दिल पर भार पड़ रहा है। सहकर्मी की मौत से हृदय विचलित हो गया है।

हृदयघातमानसिक तनाव १

ऐसे ही कुछ महीनों पूर्व एक आई.टी. कंपनी के २९ वर्षीय कर्मचारी भी तनाव का शिकार हो चुके हैं। भारत की नंबर १ सॉफ़्टवेयर उत्पाद कंपनी में कार्य करने वाले इस २९ वर्षीय युवा को तो दिल का दौरा मोटर साईकिल से अपने ऑफ़िस जाते वक्त ही पड़ गया। और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

हमें तो तनाव के कारण गई जिंदगियों में कुछ की ही जानकारी है, कुछ जिंदगियाँ जो कि मौत से गले मिल लेती हैं और उनके बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं चलता है। शायद कंपनियों में तनाव कम करना होगा या फ़िर तनाव को कैसे व्यवस्थित किया जाये और कैसे खत्म किया जाये, इसके बारे में जागरूकता फ़ैलानी होगी।

हमारे विद्यालयों और महाविदयालयों में बच्चों को केवल शिक्षा दी जाती है, पर शायद यही वे जगहें हैं जहाँ बच्चों को मानसिक स्तर पर मजबूत किया जा सकता है और जो लोग अब कार्य कर रहे हैं, उन्हें नियमित वर्कशाप लगाकर मानसिक स्तर पर मजबूत किया जाना चाहिये। जिससे कंपनियों को अच्छे मानसिक मजबूती वाले लोग तो मिलेंगे ही, साथ ही कंपनी की श्रम उत्पादकता भी बढ़ेगी।

नोट : – चित्र गूगल से साभार।