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पैसे पेड़ पर उगते हैं पता बता रहे हमारे बेटे लाल…

जब हम घर पर रहते हैं तो बेटेलाल को हम ही सुबह उठाते हैं, और कुछ संवाद भी हो जाते हैं, कुछ दिनों पहले महाराज अपनी एक किताब गुमा आये और अब बोल रहे हैं कि पैसे दे दीजिये हम नई किताब खरीद लायेंगे। अपनी आदत के अनुसार हमने कह दिया “पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं” और अब तो यह हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी पुष्ट कर दिया है।

हमने कहा बेटेलाल पहले जाकर अपनी किताब ढूँढ़ो जैसे डायरी गुमी थी और बाद में मिल गई वैसे ही वह भी मिल जायेगी, चिंता मत करो। पर ये महाराज आश्वस्त हैं नहीं मिलेगी। तभी हमने फ़िर से बोला बेटा पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, तो हम तो इसके लिये पैसे नहीं देने वाले हैं।

पैसे का पेड़

हमें तभी बेटेलाल का जबाब मिला “हमें कुछ नहीं पता, हमें तो किताब लेनी है, और पैसे चाहिये!!!”, हमने फ़िर से कहा बेटा पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, कहते हैं – “पैसे पेड़ पर उगते हैं”, हमने कहा फ़िर पता बताओ हम अभी वहीं से पैसे तोड़ लाते हैं और प्रधानमंत्री जी को भी बता देते हैं, बेटेलाल पूछते हैं कि ये प्रधानमंत्री जी कहाँ रहते हैं, हमने कहा दिल्ली में रहते हैं, बेटेलाल कहते हैं “उईई मैं तो इतनी दूर नहीं जा रहा उनको बताने कि पैसे का पेड़ कहाँ है”, हमने कहा अच्छा हमें तो बता दो।

बेटेलाल कहते हैं “वो पेड़ यहाँ बैंगलोर में थोड़े ही है, वह तो जयपुर में है, जयपुर में कांदिवली गाँव है, हमने कहा ओय्ये कांदिवली तो मुँबई में है, तो बेटेलाल कहते हैं अच्छा जयपुर की जगहों के नाम बताओ, हमने कहा हमें भी पता नहीं तो कहते हैं कि पुर्रपुर्रपुरम में है।

खैर यह संवाद तो इतना ही रहा, पर इतने संवाद में यह बात समझ में आ गई कि बेटेलाल को भी पता है कि पैसे का पेड़ नहीं है और कहीं उगते भी नहीं है, उनके लिये तो डैडी ही पैसे का पेड़ हैं, बस डैडी को हिलाओ और पैसे गिरने लगेंगे । मैं भी बेटे की मासूमियत भरी बातों को कहीं और से जोड़कर देखने लगा और अब सोच रहा हूँ कि काश मैं भी बच्चों जैसा पावन पवित्र मन वाला होता और इन बातों को यहीं खत्म कर कहीं किसी और काम में व्यस्त हो जाता ।

पापा प्लीज आज मत जाओ और आज यहीं रहो

    हमारे एक मित्र हैं जो कि आजकल नौकरी के कारण परिवार के साथ अलग रह रहे हैं। उनकी एक प्यारी सी बिटिया है जो कि लगभग ५ वर्ष की होगी। बिटिया अपने पापा को बहुत याद करती है। हमारे मित्र को अधिकतर व्यापारिक यात्राओं पर ही रहना होता है जिस कारण से परिवार को आजकल ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं। इसके पहले करीब तीन  वर्ष अपने परिवार के साथ ही भारत के बाहर रहे और वे तीन वर्ष बिटिया के जन्म के बाद के हैं, बिटिया का लगाव मम्मी से ज्यादा पापा के प्रति ज्यादा है।

    यह भी एक नैसर्गिक विषय है कि बिटिया पापा के करीब रहती है और बेटा मम्मी के करीब रहता है। इस विषय के बारे में शायद जितनी बात की जाये उतनी कम है, क्योंकि इसके प्रति सबके अपनी अपनी विचारधाराएँ हैं, जो कि इस विषय को प्रभावित करती हैं।

    तो हमारे मित्र अकेले भारत के बाहर जा रहे थे, मजबूरी यह थी कि परिवार को साथ लेकर नहीं जा पा रहे थे, क्योंकि व्यापारिक यात्राओं के साथ यही मजबूरी है जहाँ पर १ दिन से लेकर ३० दिन की यात्राएँ होती हैं और बहुत जल्दी जल्दी होती हैं। जिससे परिवार को साथ लेकर जाना लगभग असंभव हो जाता है। बाहर जाने के पहले परिवार से मिलने अपने गृहनगर गये तो बिटिया ने पापा को पकड़ लिया और कहा पापा आज आप मुझे अपने से चिपका कर सुलाना और छोड़कर मत जाना। पापा की मजबूरी यह थी कि पापा केवल ६-७ घंटे के लिये घर पर परिवार से मिलने जा पाये थे। पापा ने सबसे पहले घर पर जाकर बता दिया था कि मैं केवल ६-७ घंटे के लिये ही आ पा रहा हूँ।

    बिटिया पापा को एकटक देखे जा रही थी, फ़िर पापा के पास बड़े प्यार से आई और बोली पापा प्लीज आज मत जाओ और आज यहीं रहो, पर पापा ने अपनी मजबूरी बताई फ़िर भी बिटिया जिद पर अड़ी रही, पापा प्लीज आज रूक जाओ। फ़िर थोड़ी देर बाद पापा की गोदी में आकर बिटिया बैठ गई और पापा को प्यार करने लगी कभी गालों पर चूमती कभी हाथों को चूमती कभी माथे को चूमती। इस आस में बिटिया पापा को प्यार करती रही कि शायद पापा रुक जायें और उसकी आस पूरी हो जाये।

    पर पापा भी मजबूरी के हाथों अपने बिटिया का यह छोटा सा अरमान पूरा नहीं कर पा रहे थे, पापा का भी हृदय द्रवित हो रहा था, हृदय को कठोर कर पापा अपने गंतव्य के लिये निकल पड़े। सबकुछ अपने परिवार के लिये करना पड़ता है जिसके लिये इन छोटी छोटी बातों को पापा पूरी नहीं कर पाते हैं।

    यह केवल हमारे मित्र का ही हाल नहीं है, ऐसे बहुत सारे पापा, बेटे और बेटियाँ हैं जो कि इस जुदाई को महसूस कर रहे हैं, पापा अपने बच्चों का प्यार उनका बचपना खो रहे हैं और बच्चे बचपन में अपने पापा का प्यार नहीं पा रहे हैं। कहीं ना कहीं पापा और बच्चों में कहीं कुछ अधूरापन आ रहा है, वहीं रिश्ते में भी गरमाहट कम हो रही है, बच्चे तो छोटे हैं, वो तो कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं परंतु पापा मजबूरी में अपने बच्चों से दूर अपने काम में व्यस्त हैं। परिवार के साथ रहना और नौकरी करना दोनों ही जरूरी हैं, पर अगर इनमें से एक चीज को चुनना हो तो बहुत मुश्किल होता है ।

तश्तरी में खाना ना छोड़ क्या पेट पर अत्याचार कर लें ?

    आज सुबह नाश्ता करने गये थे तो ऐसे ही बात चल रही थी, एक मित्र ने कहा कि फ़लाना व्यक्ति नाश्ते में या खाने की तश्तरी में कुछ भी छोड़ना पसंद नहीं करते और यहाँ तक कि अपने टिफ़िन में भी कुछ छोड़ते नहीं हैं। वैसे हमने इस प्रकार के कई लोग देखे हैं जो इन साहब की तरह ही होते हैं जो कि अपने तश्तरी में कुछ छोड़ना पसंद नहीं करते। शायद कुछ लोग अपनी लुगाई के डर से नहीं छोड़ते, नहीं तो घर में महासंग्राम हो जायेगा, “अच्छा तो अब हमारे हाथ का खाना भी ठीक नहीं लगता जो तश्तरी में खाना छोड़ा जा रहा है।”

    हमारा मत थोड़ा अलग है, हम सोचते हैं कि तश्तरी में खाना छोड़ना, न छोड़ना अपने अपने व्यक्तिगत विचार हैं, जिस पर किसी और व्यक्ति का अपने विचार थोपना ठीक नहीं है। अब अगर कोई किसी होटल में खा रहा है और खाने का समान ज्यादा है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि खाते नहीं बने फ़िर भी बस भकोस लिया जाये । छोड़ने से होटल वाला किसी गरीब को भी नहीं देने वाला है, क्योंकि वह तो फ़ेंकेगा ही।

    जो लोग ऐसे उपदेश देते हैं, वे कहते हैं कि हम अन्न की कीमत जानते हैं, भई अन्न की कीमत तो हम भी जानते हैं, परंतु वे खुद ही सोचें क्या व्यवहारिकता में यह संभव है। हम तो सोचते हैं कि रोजमर्रा के व्यवहार में यह संभव नहीं है। आदमी कितना ही गरीब हो वह इज्जत की रोटी खाना चाहता है, जो आदमी ये खाना खाता भी होगा, क्या कभी उसके मन को पढ़ने की कोशिश की है, कि वो किस दर्द से गुजर रहा होगा। अगर पढ़ने की कोशिश की होती और आपका मन उसकी मदद करने को होगा तो आप कम से कम उसे खाना नहीं देंगे उसे किसी और तरह से मदद कर देंगे, जैसे कि कोई छोटा काम दे दें, मेहनत के पैसे कमाने से उसे भी खुशी होगी।

    हाँ कुछ ढीट होते हैं जो कि काम करना ही नहीं चाहते और मुफ़्त में ही माल खाना चाहते हैं, तो मैं कहता हूँ कि अगर हम ऐसे ही उन लोगों के लिये सोचते रहेंगे तो वो लोग भी कभी सुधरने वाले नहीं हैं। बल्कि हम उन लोगों को बढ़ावा ही दे रहे हैं।

    हाँ आप अगर बफ़ेट में खा रहे हैं तो आप खाना उतना ले सकते हैं जितना आप खा सकते हैं, परंतु अगर कहीं पूरी प्लेट ही आपको ऑर्डर करनी है तो यह संभव नहीं है कि आप पूरा खा लें और अपने पेट पर अत्याचार करें। मैं तो खाने की तश्तरी में छोड़ना या ना छोड़ने के बारे में ज्यादा सोचता नहीं, क्योंकि यह निजता है और हम अपनी निजता का उल्लंघन नहीं होने देना चाहते, सबके अपने व्यक्तिगत विचार होते हैं, उनका सम्मान करना चाहिये।

    पेट पर अत्याचार (हमारे मित्र विनित जी द्वारा बहुतायत में उपयोग किया जाने वाला वाक्य है ।)

विचारों के प्रस्फ़ुटन से एक नई सृष्टि का निर्माण होता है।

    कई बार सोचा इस क्षितिज से दूर कहीं चला जाऊँ और कुछ विशेष अपने लिये सबके लिये कुछ कर जाऊँ, परंतु ये जो दिमाग है ना मंदगति से चलता है, इसे पता ही नहीं है कि कब द्रुतगति से चलना है और कब मंदगति से चलना है। दिमाग के रफ़्तार की चाबी पता नहीं कहाँ है। और ये भी नहीं पता कि मंदगति से एकदम द्रुतगति पर कैसे ले जाया जाये।

    विचारसप्ताहांत में पाँचसितारा होटल में अकेला कमरे में दिनभर दिमाग दौड़ाने की कोशिश करता हूँ, परंतु दिमाग भी वातानुकुलन से प्रभावित हो चुका है और एक अजीब तरह का अहसास दिमाग में कुलबुलाने लगता है। शायद दिमाग इस होटल के कमरे की दीवारों की मजबूती देखना चाहता हो, हजारों विचार छिटक के इधर उधर निकल पड़ते हैं, दीवारों से टकराकर नष्ट होने की कोशिश करते हैं परंतु एक विचार के टूटने से चार नये खड़े हो जाते हैं। ज्यादा हो जाता है तो खिड़की के पास जाकर बाहर को देख लेता हूँ, सोचता हूँ कि शायद कुछ विचार इस खिड़की से बाहर गिर पड़ें और यह कमरा थोड़ा भारहीन हो जाये।

    खिड़की के पास जाकर शीतलता का अहसास कम हो जाता है और तपन लगने लगती है, जब शीतलता से तपन में जाते हैं तो तपन अच्छी लगती है और ऐसे ही जब तपन से शीतलता में आते हैं तो शीतलता अच्छी लगती है। मानव को कौन समझ पाया है, पता नहीं जब मानव फ़ैसला लेता है तो वह दिमाग से लेता है या दिल से लेता है।

    मानव को अपने आप को समझने की प्रवृत्ति ही मानव को अपने अंदर के प्रकाश की और धकेलती है, उसे समझने की कोशिश में ही मानव बाहरी ज्ञान को भूल अंतरतम में झांकने की कोशिश करता है, कभी यह कोशिश नाकाम होती है तो कभी यह कोशिश सफ़ल होती है।

    रफ़्तार की भी अपनी गति होती है और स्थिरता के स्थिर में भी एक गति होती है, शून्य में कुछ भी नहीं है, जब विचार अपने पूर्ण वेगों से प्रस्फ़ुटित होते हैं, पूर्ण आवेग में आते हैं तो विचार अंगारित हो जाते हैं और विचारों के प्रस्फ़ुटन से एक नई सृष्टि का निर्माण होता है। कई बार गति आवेग और वेग सब जाने पहचाने से लगते हैं, अपने से लगते हैं। किंतु यह भी सर्वथा सार्वभौमिक सत्य है ‘गति, आवेग और वेग’ कभी किसी की साँखल से नहीं बँधा है। सब पूर्व नियत है, सब पूर्व नियोजित है।

काली चमड़ी के कारण आँखों और गर्दनों पर असर और वजन बढ़ना

जून महीने में जब पहली बार सऊदी आये थे तो अप्रत्याशित तरीके से २ किलो बजन बढ़ गया था, इस बार अभी तक २०० ग्राम तो बड़ ही चुका है, जबकि यहाँ आने के बाद व्यायाम ज्यादा कर रहे हैं।

यहाँ के खाने में हो सकता है कि कैलोरी कुछ ज्यादा हों और उसके लिये हमारा शरीर अभ्यस्त नहीं हो, अब इस बार दोगुना ज्यादा कैलोरी जलाना शुरू कर दिया परंतु फ़िर भी वजन थोड़ा बहुत बड़ा है। जबकि यह महीना रमजान का महीना है और खुले आम खाना पीना यहाँ अपराधिक श्रेणी में रखा जाता है। खुले आम खाना पीना और धूम्रपान वर्जित है।

ऐसा लगता है कि यहाँ की हवाएँ स्वास्थय के लिये अच्छी हैं और उससे स्वास्थ्य वर्धन हो रहा है, यहाँ पर अभी तापमान लगभग ३८ डिग्री होगा, परंतु गर्मी और धूप ३८ डिग्री वाली नहीं है, ऐसा लगता है कि अगर इस धूप में अगर थोड़ी देर खड़े हो गये तो जल भुन कर खाक हो जायेंगे। शाम को भी लू के थपेड़े जिस्म को लहुलुहान करते रहते हैं।

एक और खासबात कि यहाँ पर मर्द सफ़ेद लिबास में और औरत काले लिबास में पायी जाती है, हम कहते हैं कि यहाँ आकर मर्द की चमड़ी सफ़ेद और औरत की चमड़ी काली हो जाती है। हर औरत एक जैसी दिखती है क्योंकि काली चमड़ी ऊपर से नीचे तक एक जैसी होती है, जहाँ काली चमड़ी के बीच चमकने का कोई रोलपार्ट ही नहीं है।

काली चमड़ी होने के कारण न आँखों को इधर उधर जोर देना होता है और ना हई अस्वाभाविक या स्वाभाविक रूप से आँखों और गर्दनों को घुमाना पड़ता है, जब अलग अलग प्रकार की चमड़ी प्रदर्शित होगी केवल तभी आँखों और गर्दन को कष्ट होगा, अब आँखों और गर्दन का काम भी कम हो गया है तो इसके कारण भी कम कैलोरी जल रही हैं।

अभी कारण और भी होंगे जिस पर विश्लेषण जारी है।

चिकन समोसा मटन समोसा और आलू समोसा

अभी दो तीन पहले ही अपनी वेज थाली पार्सल करवाकर चैन्नई दरबार अल शर्फ़िया से टैक्सी पकड़ने के लिये अल शर्फ़िया की मुख्य सड़क तक आये थे कि वहाँ देखा समोसे, पकोड़े, चाट और फ़्रूटचाट वाली दुकान भी है। बस फ़िर क्या था, झट से दुकान में घुस गये देखा कि मिठाईयाँ, नमकीन, टोस्ट भी दुकान में उपलब्ध थे।
पर सबसे ज्यादा इस दुकान में बिक्री पकोड़े, समोसे, कचोरी और दहीबड़े की ही थी। हमने दुकानदार से पूछा कि हाँ भई क्या क्या है, तो जनाब आवाज आई “चिकन समोसे, मटन समोसे, आलू समोसे, कचोरी, बीफ़ समोसे, दही वड़ा और फ़्रूटचाट”, हम तो समोसे के इस नॉनवेज प्रकार पर दंग थे।
हमने कहा क्या बात है, इतने सारे प्रकार के समोसे, हमने पहली बार नॉनवेज समोसे अपनी जिंदगी में सुने हैं, हमारे मित्र ने चिकन समोसा पार्सल करवाया, हमने आलू समोसा पार्सल करवाया। जब होटल पहुँचकर खाया तो स्वाद ठीक ठाक था, खाया जा सकता था।
अब दही वड़े हमारे दिमाग में हलचल मचा रहे थे, अगले दिन दही वड़े लिये जिसमें उसने आलू चाट, काबुली चने की चाट और जबरदस्त मसाला मिलाया और दही भी जबरदस्त था। साथ में बड़ी पपड़ी या यूँ कह लें कि बड़ी मठरी थी और कुछ रंग बिरंगी सेंव नमकीन।
होटल पहुँचकर खाया तो अहा ! मजा आ गया, क्या स्वाद था, अब हमारे दिमाग में पकौड़े घूम रहे थे, अगले दिन दही वड़े के साथ ही पकौड़े भी लिये गये और चटकारे मारकर खाया गया।
हमारे एक मित्र ने कल आधा किलो रसगुल्ले लिये थे और अकेले निपटा दिये, खैर हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, परंतु हमारे आश्चर्य न करने से उसको जरूर आश्चर्य हुआ, हमें आश्चर्य इसलिये नहीं हुआ क्योंकि हम भी पहले १ – २ किलो रसगुल्ले एक बार की बैठक में ही निपटा दिया करते थे।
वैसे कल वहाँ जलेबी और इमरती भी देखी है, सोच रहे हैं कि आज इनका भी स्वाद ले लिया जाये।

जेद्दाह में रेस्त्रां खाना और स्वाद (South Indian, Malyalai and North Indian food in Restaurant’s @ Jeddah Saudi Arabia)

जब से सऊदी आये हैं तब से भारतीय स्वाद बहुत याद करते हैं, भारतीय खाना तो जरूर मिल जाता है फ़िर भी बिल्कुल वह स्वाद मिलना बहुत मुश्किल है। यहाँ पर दक्षिण भारतीय स्वाद तो मिल जाता है, परंतु उत्तर भारतीय स्वाद मिलना मुश्किल होता है।

यहाँ पर जो थालियाँ भी उपलब्ध होती हैं, उसे दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय व्यंजनों को मिलकर बनी होती हैं। परंतु फ़िर भी दक्षिण भारतीय व्यंजन ज्यादा होते हैं। उत्तर भारतीय में केवल दाल होती है या यह भी कह सकते हैं कि दाल उत्तर भारतीय तरीके से बनी होती है। मसाला ठीक ठाक होता है।

रोटी जो है वह बिल्कुल मैदे की होती है और गेहूँ की रोटी ढूँढ़ना बहुत ही मुश्किल काम है। चावल बासमती या फ़िर दक्षिण में खाया जाने वाला मोटा केरल का चावल होता है।

यह तो दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट की बातें हैं, यहाँ पर लगभग आसपास के देशों के रेस्ट्रोरेंट भी उपलब्ध हैं, जैसे पाकिस्तानी, अफ़गानी, फ़िलिपीन्स, बांगलादेशी, इजिप्ट इत्यादि..। खाने में पाकिस्तानी स्वाद कुछ भारतीय स्वाद के करीब है, यहाँ मसाला अच्छा मिलता है, बस तेल या घी ज्यादा होता है।

यहाँ मिनी भारत अल-शर्फ़िया के इलाके में पाया जाता है, जहाँ भारत ही नहीं सभी आसपास के देशों की दुकानें हैं और ऐसे ही रेस्टोरेंट भी बहुत सारे हैं, हर ८ – १० दुकान के बाद एक रेस्टोरेंट मिल ही जाता है, कुछ रेस्टोरेंट जिसमें हम जाते हैं जो कि दक्षिण भारतीय हैं, चैन्नई दरबार, इंडिया गेट, मेट्रो, विलेज (मलयाली) कुछ पाकिस्तानी रेस्तरां हैं जैसे कि निराला, मक्काह इत्यादि.. निराला की सबसे अच्छी चीज लगी हमें रोटी, तंदूरी रोटी कम से कम १२ या १५  इंच के व्यास की रोटी होगी और बिल्कुल नरम, कम से कम दो रोटी तो खा ही जाये। यहाँ की कुल्फ़ी भी बहुत अच्छी है । बस यहाँ सब्जियों और दाल में तेल बहुत मिलता है तो पहले हम तेल निकाल देते हैं फ़िर ही खाना शुरू करते हैं, जो कुछ लोग कैलोरी कान्शियस होते हैं, वे लोग तो पहली बार को ही आखिरी बताकर निकल लेते हैं। पर यहाँ का स्वाद वाकई गजब है। साथ ही पाकिस्तानी वेटरों की मेहमनानवाजी देखते ही बनती है।

ऐसे ही शाम को फ़िलिस्तीन स्ट्रीट जहाँ कि हम मैरियट होटल में रहते हैं, वहाँ तो खाना खाते नहीं हैं कारण है कि इतना महँगा खाना जो हम अफ़ोर्ड नहीं कर सकते, तो पास ही होटल बहुत सारे हैं, पर कुछ ही होटलों पर शाकाहारी खाना भी उपलब्ध होता है। पास ही एक अफ़गानी होटल है जिससे दक्षिण भारतीय सहकर्मी चावल लेकर खाते हैं। पास ही एक इजिप्शियन रेस्तरां भी है जहाँ अलग तरह की करियों के साथ चावल मिलते हैं, हमने भी एक बार खाकर देखा था, कभी कभार खा सकते हैं, एक मलयाली रेस्त्रां है रेजेन्सी, जहाँ डोसा वगैरह के साथ आलू गोभी और मिक्स वेज सब्जी मिल जाती है साथ में रोटी या केरल परांठा खा सकते हैं। अभी एक और नया रेस्त्रां ढूँढ़ा है लाहौर गार्डन जैसा कि नाम से ही पता चलता है यह एक पाकिस्तानी रेस्त्रां है परंतु खाना अच्छा है। कलकत्ता रोल्स पर भी शाकाहारी रोल मिल जाता है साथ में ज्यूस ले सकते हैं। नाम से कलकत्ता है परंतु है बांग्लादेश का।

यहाँ अधिकतर रोटियाँ करी के साथ फ़्री होती हैं, केवल करी का बिल ही लिया जाता है, वैसे ही यहाँ सऊदी के खुबुस बहुत प्रसिद्ध हैं, तंदूर में बनाये जाते हैं। हमने भी खाकर देखा मैदे के होते हैं, रोज नहीं खा सकते।

मांसाहारी लोग ध्यान रखें पहले ही पूछ लें कि क्या आर्डर कर रहे हैं, क्योंकि यहाँ बीफ़, लेम्ब और मीट बहुतायत में खाया जाता है।

बहुत खाने की बातें हो गईं, और शायद इससे किसी को तो मदद मिल ही जायेगी, खाने के लिये सऊदी बहुत अच्छी जगह है और विशेषत: उनके लिये जो कि मांसाहारी हैं, उनके लिये कई प्रकार के व्यंजन मिल जायेंगे।

हम ठहरे शाकाहारी तो हमारे लिये सीमित संसाधन मौजूद हैं।

जिस्म २ देह का प्रेम प्रदर्शन… (Jism 2..)

फ़िल्म जिस्म २ देखी, यह फ़िल्म देहप्रदर्शन के साथ ही संपूर्ण देह के प्रेम प्रदर्शन का अच्छा अक्स दिखाती है। जिसमें बताया गया है कि मन तो नफ़रत कर सकता है, परंतु जिस्म का क्या करें उसकी जरूरतें अपनी हैं और उस जिस्म की जरूरतें वहीं पूरी कर सकता है जो उस जिस्म को समझ सकता है।
जिस्म २ में सनी लियोन को लिया गया, ज्ञात रहे कि सनी लियोन कनाडा की पोर्न स्टार हैं और भारतीय हैं, सनी लियोन को भारत में पहली बार बिग बोस में दिखाया गया था।
अदाकारी सनी में बिल्कुल नहीं है, चेहरे पर भाव नहीं है, फ़िल्म केवल देहयष्टि के भाव देखने के हिसाब से उचित है वरना कहानी कसी हुई नहीं है और जिस्म के संवाद अच्छॆ बन पड़े हैं, संवाद बहुत कुछ अच्छे लगे, कुछ गाने भी अच्छॆ हैं।
यह फ़िल्म केवल सनी लियोन के देह प्रदर्शन के बलबूते ही बॉक्स ऑफ़िस पर चलेगी, क्योंकि इस फ़िल्म में बस सनी लियोन का जिस्म ही दिखाया गया है और वह भारतीय सिनेमा में पसंद किया जायेगा या नहीं, यह पता नहीं, क्योंकि कलाकार जो कामुकता दर्शाते हैं वह सच के करीब होती है और यह कामुकता बिल्कुल पोर्न फ़िल्म के समकक्ष वाली है।
गाँवों में शायद यह फ़िल्म लोगों द्वारा पसंद की जायेगी, शहरों में नहीं, पूजा भट्ट से एक अच्छी फ़िल्म की अपेक्षा थी और आशा के विपरीत इसमें इमरान हाशमी नहीं थे, जो कि इस तरह की फ़िल्मों के लिये भट्ट कैंप से सबसे उपयुक्त हीरो इमरान हैं और उनका अभिनय फ़िल्म में जान डाल देता है।
वैसे शिवा फ़ेम ……. ने इस फ़िल्म में जान डालने की पूरी कोशिश की है, परंतु किरदार का इतना महत्वपूर्ण रोल ना होने से उन्हें अपनी अदाकारी दिखाने का पूरा मौका नहीं मिला।
कुल मिलाकर हमारी तरफ़ से तो यह फ़िल्म को हम केवल १ स्टार देते हैं, परंतु सबकी अपनी अपनी जरूरतें होती हैं, जिंदगी की भी और देखने की भी, तो हो सकता है कि जो जिस्म देखने जायेंगे उन्हें बहुत अच्छी लगे और वे उसे ४ स्टार भी दे सकते हैं।
कुछ संवाद जिस्म २ से जो कि मैंने ट्विट किये थे –
झूठ में मान नहीं सकता और सच किसी को सुनना नहीं ।
ये दुनिया सिर्फ़ प्यार की बातें करती है, चलती जुर्म पर है ।
जिंदगी में इंसान के पास सिर्फ़ दो ही रास्ते होते हैं, या तो वो झूठ को मानकर होश में रहे या सच सुनकर दीवाना हो जाये ।
तुम झूठ नहीं हो, क्योंकि तुम भी इसी जिंदगी के सर्कस का एक हिस्सा हो ।
ऐ जिंदगी तुझे तो सिर्फ़ ख्वाब में देखा हमने ।
तन्हा आदमी अक्सर अपने आप से ही बातें किया करते हैं ।
जब जान पर आती है तो उस जान को बचाने के लिये सब कुछ सीख जाते हैं।
जब कोई खुद को ही खत्म करने पर आ जाये, तो उसे कोई नहीं बचा सकता ।
अगर दुनिया में खूबसूरती है तो बदसूरती भी है । अँधेरा है तो रोशनी भी है ।
अगर किसी से प्यार करते हो तो उसे भूल जाने का जिगर भी रखो ।

 

कठिनाईयों भरे ये दिन

जीवन में सभी प्रकार की कठिनाईयाँ आती रहती हैं, और हमें अपने जीवन में सारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। सारी मजबूरियों के मारे होते हैं और सारे हालात से समझौता करना पड़ता है।

अभी यह मेरा जेद्दाह में दूसरा  ट्रिप है, पहला ट्रिप ठीक ठाक निकल गया था, परंतु दूसरे ट्रिप में बहुत सारी कठिनाईयाँ हैं, तो यह भी समझ लें कि जीवन में यह भी एक सीख ही है।

रमजान का महीना चल रहा है और यहाँ गैरमुस्लिमों के लिये जीना बहुत मुश्किल हो जाता है, यहाँ पर सभी रोजा रखते हैं, और सारा बाजार सुबह के ४ बजे से रात ९ बजे तक बंद रहता है, खाने के लिये रेस्त्रां भी शाम ५ बजे खुलते हैं, पर रेस्त्रां में जाकर खा नहीं सकते, ५ से ७ के बीच आप केवल पार्सल करवा सकते हैं, फ़िर शाम ७ बजे के बाद रेस्त्रां में खा सकते हैं।

और ७ बजे के बाद रेस्त्रां जाने के लिये टैक्सी मिलना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि लगभग सभी लोग इफ़्तार पर गये होते हैं। यहाँ पर असली समां तो शाम ७ बजे बाद ही शुरू होता है, जीवन में गति भी शाम ७ बजे बाद आती है। ७ बजे से ट्राफ़िक बड़ना शुरु होता है और रात ९ बजे के बाद तो ट्राफ़िक अपने चरम पर होता है।

यहाँ पर सभी लोग ७ बजे के बाद इफ़्तार करते हैं और सुबह ३.३० पर सहर करते हैं, समय थोड़ा आगे पीछे होता है । ऐसे ही बाजार भी रात्रि ९ बजे से सुबह ४ बजे तक खुले रहते हैं, बाजार मतलब कि सारे प्रकार के बाजार मॉल, दुकानें और पटरी बाजार भी।

खुलेआम खाना पीना और धूम्रपान मना होता है। अगर किसी गैरमुस्लिम को यह सब करना भी है तो उसे सार्वजनिक जगहों पर नहीं करना चाहिये। यहाँ कार्यालयों का समय १० से ४ हो जाता है पर केवल उनके लिये जो रोजे रखते हैं और बाकियों के लिये ८ से ५ ही होता है।

शाम को जगह जगह इफ़्तार पार्टिंयों का आयोजन होता है, बस शाम को जल्दी मतलब कि ५ बजे के बाद शाकाहारी भोजन कुछ चुनिंदा रेस्त्रां में ही उपलब्ध होता है, अधिकतर रेस्त्रां में शाकाहारी भोजन रात्रि ९ बजे बाद उपलब्ध होता है।

थोड़े दिनों की कठिनाईयाँ और हैं, फ़िर जीवन वापिस से पटरी पर आ जायेगा, एक बात और है कि यहाँ घूमने के लिये ऐसा कोई पर्यटक स्थल नहीं है, अगर कुछ है भी तो इतनी बंदिशें हैं कि जाने से पहले इच्छा ही खत्म हो जाये और मौसम इस बात की इजाजत भी नहीं देता, क्योंकि मौसम अभी बहुत गर्म है रात में भी लू के थपेड़े लगते हैं।

सकारात्मक और नकारात्मक संकेत जीवन में ..

कभी कभी जो सोचो वह हो नहीं पाता और जो नहीं सोचो वह हो जाता है, पर अधिकतर छ्ठी इंद्रिय से जो संकेत मिलते हैं वे हमेशा हमेशा बहुत ज्यादा करीब होते हैं। जीवन में ऐसे बहुत सारे वाकये हो रहते हैं जब हमें लगता है कि यह हमारा फ़ैसला नहीं, यह तो तकदीर का फ़ैसला है।

हम कितना भी किसी भी काम के बारे में सोच लें हमेशा उसके बारे में मन में विचारों में दो प्रकार की लहरें दौड़ती रहती हैं, एक नकारात्मक और एक सकारात्मक, जिसमें कई बार हम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों लहरों के लिये कई पैमाने निर्धारित कर देते हैं। जैसे अगर आज यह कार्य हो गया तो मेरे काम में सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं, परंतु अगर नहीं हुआ तो नकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं।

यह प्रक्रिया लगभग सबके साथ होती है जो कि निश्चलता से अपने कर्मों को निभाते हैं, जिनके मन की ऊर्जा का स्रोत हमेशा पवित्रता होती है। अपने निश्छल कर्मों से ऐसे लोग प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का भरपूर प्रयोग कर पाते हैं और वही प्रकृति प्रदत्त संसाधन उनके लिये छठी इंद्रिय का कार्य करती है।

ऐसे ही नकारात्मक संकेत भी प्रकृति प्रदत्त होते हैं, जो कि हमेशा समय समय पर इंसान को चेताते रहते हैं और इंसान को जीवन के अँधेरे में जाने से बचाता है, वहीं सकारात्मक संकेत जीवन के लक्ष्यों को अपने पूर्ण रूप में प्राप्त करने में मदद करते हैं।

जरूरत है हमें अपने जीवन में सारे कार्यों को निश्छल भाव से पूर्ण करने की, सारे कार्यों को पूर्ण करने के संकेत हमें प्रकृति हमेशा सकारात्मक और नकारात्मक रूप में हमेशा देती है। अत: कोई भी कार्य करें पूर्ण लगन और ईमानदारी से करें, प्रकृति प्रदत्त ऊर्जा का स्रोत बना रहता है।