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दिवास्वप्न बुरा या अच्छा … मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी

एक दिवास्वपन आया मुझे

एक दिन..

श्री भगवान ने आशीर्वाद दिया,

सारे अच्छे लोग देवता रूपी

और

उनके पास हथियार भी वही,

सारे बुरे लोग राक्षस रूपी

और

उनके पास हथियार भी वही

समस्या यह हो गई

कि

देवता लोग कम

और

राक्षस ज्यादा हो गये

तब

श्री भगवान वापिस आये

और

देवता की परिभाषा ठीक की

फ़िर

देवता ज्यादा हो गये

और

राक्षस कम हो गये,

देवताओं ने राक्षसों पर कहर ढ़ाया

और

देवताओं का वास हो गया

फ़िर

कुछ देवता परेशान हो गये

क्योंकि

राक्षस गायब हो गये

तो

कुछ फ़िर से राक्षस बन गये।

असली ताकत तो हमारे पास ही है !

अन्ना का अनशन चल रहा है, सरकार, राजनैतिक पार्टियाँ और मीडिया अन्ना को मिल रहे समर्थन को कम कर आंक रहे हैं। और देश की जनता को चिल्ला चिल्ला कर बता रहे हैं, देखा अन्ना के आंदोलन में कोई दम नहीं है, अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रहे हैं, “देख लो, सारे ईमानदारों, तुम सबकी हम भ्रष्टाचारियों के सामने कोई औकात नहीं है”।

मीडिया भी निष्पक्षता से खबरें नहीं बता रहा है, सब के सब मिल चुके हैं, केवल अन्ना एक तरफ़ है और दूसरी तरफ़ ये सारे बाजीगर। इन बाजीगरों को लग रहा है कि इन लोगों ने जैसे अन्ना और जनता को हरा दिया है। पर क्या इन बाजीगरों को पता नहीं है कि जनता से वे हैं, जनता उनसे नहीं।

जनता सब देख रही है, समझ रही है, वैसे समझदार लोगों के लिये अभी कुछ महीनों में जो चुनाव हुए हैं, वो ही जनता की सोच और ताकत समझने के लिये काफ़ी हैं।

देखते हैं कि ये सारे कब तक अपना पलड़ा भारी समझते हैं, क्योंकि असली ताकत तो हमारे पास ही है, ठीक है कुछ लोगों की ताकत बिकाऊ है परंतु सरकार बनाने जितनी ताकत खरीदना असंभव है।

देखो कि अगली सरकार जनता की ताकत से बनती है या सरकार की खरीदी हुई ताकत से।

वैसे सरकार यह ना समझे कि अन्ना वहाँ जंतर मंतर पर अकेले हैं, अन्ना के समर्थन में घर पर भी बहुत सारे लोग हैं जो अन्ना के साथ हैं बस जंतर मंतर पर नहीं हैं।

परिवार में क्या अब तो फ़िल्मों में भी कोई सीख नहीं मिलती ।

    कल सोने ही जा रहे थे तभी ना जाने क्या सूझी और बुद्धुबक्सा चालू कर लिया और जीअफ़लाम पर फ़िल्म आ रही थी, बलराज साहनी और निरूपमा राय इसके मुख्य कलाकार थे और उनके तीन बच्चे बड़ा बेटा रवि, मंझली बेटी और छोटा बेटा राजा के इर्दगिर्द घूमती कहानी ने पूरी फ़िल्म देखने पर मजबूर कर दिया।

    बाद में अंतराल में फ़िल्म का नाम पता चला, फ़िल्म का नाम “घर घर की कहानी” था।

    फ़िल्म की कहानी माता पिता और बच्चों के ऊपर बेहद कसी हुई थी, जिसमें बताया गया था कि बच्चों को शिक्षा घर से ही मिलती है कहीं बाहर से नहीं मिलती, मूल रूप से ईमानदार पिता जो कि एक अच्छे पद पर कार्यरत है, और चाहे तो विटामिन आर बकौल बलराज साहनी के कार्यालय में कार्य करने वाले एक क्लर्क याने कि रिश्वत से अपनी सारी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, परंतु वे बेईमानी न करते हैं और ना करने देते हैं, और परिवार के लिये भी एक मिसाल बनते हैं।

    बलराज साहनी को एक बेहद ईमानदार, संजीदा, जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति के रूप में पेश किया गया है, पिता के रूप में उनमें गुस्सा नहीं बल्कि प्यार है और हरेक बिगड़ी हुई स्थिती को गुस्से से नहीं, समझदारी और जिम्मेदारी से सुधारते हैं।

    बड़ा बेटा रवि जो कि हाईस्कूल में पढ़ता है वह अपने पिता से ५० रूपयों की मांग करता है जिससे वह बच्चों के साथ अजंता एलोरा घूमने जा सके तो पिता मना कर देते हैं और कहते हैं कि “बेटा जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिये, चादर से बाहर पैर पसारने से घर की सुख शांति भंग हो जाती है।”

    पर बेटा रवि नहीं मानता और अपने पिता से कहता है कि मैं हड़ताल करूँगा और खाना नहीं खाऊँगा जब तक कि मुझे ५० रूपये नहीं मिल जाते, इधर साथ ही मंझली बेटी भी टेरलीन की फ़्रॉक लेने और छोटा बेटा राजा साईकिल की जिद लेकर हड़ताल करने लगते हैं, और तीनों माता पिता से कहते हैं कि जब तक हमारी माँगें पूरी नहीं होतीं, तब तक हम खाना नहीं खायेंगे।

    माँ निरूपा राय पिता से कहती है कि बच्चों की जिद पूरी कर दो, तो वे कहते हैं कि ये बच्चे ही कल के शहरी हैं और इन्हें पता होना चाहिये कि पैसा का मोल क्या है, पैसा कमाना कठिन है और पैसा खर्च करना बहुत आसान, अगर आज मैं इनकी माँगें पूरी कर दूँगा तो ये कल फ़िर कोई नई माँगे खड़ी कर देंगे और बात बनने की जगह बिगड़ने लगेगी। पिता कहते हैं कोई नहीं चलो खाना खाते हैं, जब सुबह तक भूखे रहेंगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी और चुपचाप हड़ताल ओर सत्याग्रह हवा हो जायेगी। पिता खाने पर बैठते हैं कि पहला निवाला लेते ही बच्चों की याद आ जाती है और चुपचाप निवाला वापिस थाली में रखकर वहीं गिलास में हाथ धोकर उठ खड़े होते हैं।

    उसके बाद माँ अपने तीनों बच्चों के पास खाने की सजी थाली लेकर उनसे शांतिपूर्वक कहती है कि खाना खा लो तुम लोग तो हर बात मानते हो, तो तीनों बच्चे कहते हैं कि हम तो आज भी हर बात मानने को तैयार हैं केवल खाना खाने की बात छोड़कर। जब माँ अपने कमरे में वापिस पहुँचती है तो पिता पूछते हैं कि तुम्हारी शांति यात्रा भी लगता है नाकामयाब हो गई है, तो माँ फ़फ़क फ़फ़क कर रो पड़ती है तो पिता कहते हैं कि जब बेटा बड़ा हो जाये तो उसे सारी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिये और यह भी समझना चाहिये कि परिवार के लिये पैसे का क्या मोल है।

    सुबह माँ बढ़िया गरम गरम आलू के परांठे नाश्ते में सेंकती हैं और राजा के मुँह में पानी आ रहा होता है परंतु फ़िर भी वह काबू करता है और माँ कहती है कि चलो नाश्ता कर लो, पर बच्चे मना कर देते हैं, तभी पिता आते हैं और कहते हैं कि रवि तुमको लगता है कि घर चलाना बहुत आसान है।

    रवि कहता है कि मेरा दोस्त है उसके पिता जी को तो आपसे भी कम तन्ख्वाह मिलती है और उसकी सारी जिद उनके पिता जी पूरी कर देते हैं, पिता जी कहते हैं बेटा मुझे प्राविडेंट फ़ंड और आयकर कटने के बाद ६०० रूपये के आसपास मिलते हैं, तो रवि कहता है कि इसमें से तो बहुत कुछ खरीदा जा सकता है तो पिता कहते हैं कि बेटा घर का सारा खर्च करने के बाद महीने के आखिरी में कुछ भी नहीं बचता है।

    तो पिता कहते हैं कि अच्छा बेटा एक काम करते हैं कि कल से घर अगले छ: महीने के लिये तुम चलाओगे और अगर पैसे बचा सके तो अपनी सारी माँगें पूरी कर लेना। रवि तैयार हो जाता है, माँ कहती भी है कि बेटा रहने दो नहीं तो आटॆ दाल का भाव पता चल जायेगा।

    रवि घर चलाने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले लेता है, पिता के एक साले हैं जो कि इनके समझदारी पर नाज करते हैं और अपनी बहन याने कि निरूपा राय को हद से ज्यादा प्यार करते हैं, फ़िल्म ऐसे ही बड़ती रहती है रवि घर का खर्च चलाने लगता है तो पहले महीने के बाद वह कहता है कि ४० रूपये की बचत है, तो पिता सारे खर्च याद दिलाते हैं तो पता चलता है कि कुछ बिल तो उसने भरे ही नहीं हैं और इस तरह से कुछ भी नहीं बचता अगले महीने दीवाली आ जाती है और बच्चे नये कपड़े लेने से मना कर देते हैं और साथ ही घर में मेहमान आ जाते हैं, एक बच्चा पटाखों से जल जाता है उसके अस्पताल का खर्चा। फ़िर तीसरे महीने में माँ बीमार हो जाती है तो सब दिन रात सेवा करते हैं और माँ ठीक हो जाती है।

    क्लर्क को पुलिस रिश्वत के जुर्म में पकड़ लेती है और उनकी बेटी का रिश्ता टूट जाता है यहाँ पिता बलराज साहनी लड़के वालों को समझाने जाते हैं कि पिता का किया बच्चों सजा क्यों भुगते और आखिरकार लड़केवाले मान जाते हैं।

    इसी बीच बच्चे पैसे बचाने के लिये घर से नौकरानी को हटा देते हैं, स्कूल बस की बजाय पैदल जाने लगते हैं और घर के सारे काम खुद ही करने लगते हैं। पूरे घर की जिम्मेदारी बच्चे बखूबी निभाते हैं। उधर पिता के साले का बेटा जो है वह जुएँ में मस्त है और घर की चीजें बेचकर जुएँ मॆं लगाता रहता है और उसकी माँ उस पर पैसे लुटाती रहती है। रवि चौथे महीने के हिसाब की शुरूआत ही कर रहा होता है और साथ ही उसके पास स्कूल में किये गये ड्रामा “श्रवण कुमार” से २०० रूपयों का ईनाम भी रहता है। उसी समय साले के बच्चा इनके घर पर आता है और रवि को रूपये रखते हुए देख लेता है तो वह इनके घर से ८०० रूपये चुरा लेता है, अब सब बहुत परेशान होते हैं और पिता कहते हैं मुझे अपनी तन्ख्वाह से ज्यादा रवि के ईनाम में मिले रूपयों की फ़िक्र है। खैर चोर पकड़े जाते हैं। और बच्चों को भी समझ आ जाता है कि जब माता पिता घर चला रहे थे तब ज्यादा सही था, सब चीजें भी घर में आती थीं और मजे रहते थे।

फ़िल्म में बहुत सारी सीखें मिलीं –

१. जितनी चादर हो उतने ही पैर फ़ैलाने चाहिये।

२. रिश्वत नहीं लेनी चाहिये।

३. सिगरेट अगर छोड़ दी जाये तो अच्छी खासी रकम महीने की बच जाती है। और सेहत भी ठीक रहती है।

४. जुआँ खेलना और बुरी संगत ठीक नहीं है।

५. बच्चों को बचपन से ही संस्कार घर में ही देने होते हैं।

    बहुत सारी चीजें अच्छी लगीं जैसे कि सुबह उठते ही माँ निरूपा राय पिता के पैर छूकर दिन की शुरूआत करती है, बच्चे माता पिता को भगवान का रूप मानते हैं, पूरा घर मिलजुल कर रहता है।

आजकल की फ़िल्मों में यह सब कहाँ मिलता है।

हमारे शौक ही हमारी सोच को बदल देते हैं

समाज को बहुत तेजी से बदलते हुए हमने देखा है, समाज की सोच को बदलते हुए देखा है, इंसान की सोच को बदलते हुए देखा है, दरअसल हमारे शौक ही हमारी सोच को बदल देते हैं। हम समय कैसे बिताते हैं यह भी हमारे शौक पर निर्भर करता है।
मुझे बचपन की याद है, जब पापाजी शासकीय वाचनालय से २-३ हिन्दी की साहित्यिक किताबें लाते थे और सप्ताह भर में पढ़ भी लिया करते थे और लगभग हर रविवार मैं उनके साथ वाचनालय किताबें बदलने जाया करता था, मेरा लालच यह होता था कि वहाँ बहुत सारे अखबार होते थे और बच्चों की किताबें भी पढ़ने को मिल जाया करती थीं, पापाजी को हमारा इंतजार करना पड़ता था।
उस समय हमें साहित्य की तो इतनी समझ नहीं थी तो हम किताबें तो नहीं पढ़ते थे परंतु हाँ घर में पढ़ने का महत्व समझ आ गया और यह समझ बचपन से आ गई कि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं और हमेशा इन किताबों से कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता रहता है।
उस समय टीवी की इतनी ज्यादा धूम नहीं थी, और फ़ेसबुक, ट्विटर, लिंकडिन के पते भी नहीं थे क्योंकि इंटरनेट नहीं था, और फ़ोन होना उस समय विलासिता माना जाता था।
पापाजी जब शाम को कार्यस्थल से घर आते तो यदाकदा कहते आज फ़लाने अंकल के यहाँ खाने पर चलना है या फ़िर आज वो अंकल अपने परिवार के साथ मिलने आ रहे हैं या खाने पर आ रहे हैं, और इस मिलने का अंतराल आज की तुलना में बहुत ज्यादा होता था। उस समय फ़ोन न होने के कारण सारी बातें पहले से ही तय कर ली जाती थीं और सारे कार्य आसानी से हो जाते थे।
आज हम इंटरनेट, टीवी के सीरियलों में ही इतने व्यस्त हैं कि हमें बाहर की बात तो छोड़िये अपने परिवार के लिये भी समय नहीं है। परिवारों में आजकल कई बार तो कुछ दिन ऐसे निकल जाते हैं कि किसी सदस्य से बात ही नहीं होती, तो बाहर के अंकल से मिलने की बातें तो छोड़ ही दो।
समाज की सोच और धारणा तेजी से बदल रही है, आगे पता नहीं क्या होगा, परंतु जितना समय हमने देखा उतने में ही इतना सब कुछ  बदल गया, पता नहीं आगे क्या होगा ।

मैं उन सभी शरीफ़ लोगों को सैल्यूट करता हूँ ।

जब मैं पहली बार घर से बाहर याने कि किसी दूसरे शहर वो भी इतनी दूर कि जाने में ही कम से कम १८ घंटे लगते थे, जिसमें बीच में अलीगढ़ से बस बदलनी पड़ती थी, चूँकि हमारे अभिभावक उधर की ही तरफ़ के हैं, तो उन्होंने बहुत सारी हिदायतों से हमारा थैला भर दिया । जैसे कि –

– किसी दूसरे पर ऐसे ही विश्वास मत कर लेना ।

– अपना और अपने समान का ध्यान रखना ।

– किसी भी अनजान से खाने को मत लेना ।

– बस स्टैंड पर भी अपने सूटकेस का ध्यान रखना, कहीं ऐसा ना हो कि सूटकेस का हैंडल तुम्हारे हाथ में हो और सूटकेस गायब हो जाये ।

– चलते रिक्शे से लोग गायब कर दिये जाते हैं।

– यहाँ तक कि चलते रिक्शे गायब हो जाते हैं और जो गायब होते हैं उनका कभी पता भी नहीं चलता ।

और भी ऐसी बहुत सारी बातें हमें बतलाई गईं, हमने भी पूर्ण सतर्कता से अपनी यात्रा शुरू की और अलीगढ़ पहुँचे और ये सारी बातें हमें याद आने लगीं, और पूरे साहस के साथ बस स्टैंड पर बस के इंतजार में ऐसे खड़े थे जैसे लुटेरों की बस्ती में एक शरीफ़ आदमी बेबस खड़ा है अगर लुटेरे आ भी गये तो ये शरीफ़ आदमी इस सतर्कता का क्या अचार डालेगा ।

खैर लगभग इस डर और सतर्कता के वातावरण में वो सुबह का एक घंटा अलीगढ़ के बस स्टैंड पर बस का इंतजार करते हुए निकला और फ़िर बस समय से आ गई तब जाकर जान में जान आई। और ये जानकर तसल्ली हुई कि न अपन ने किसी पर विश्वास किया, अपने समान का ध्यान रखा, न ही किसी अनजान से खाने को लिया और समान का ध्यान रखा और सबसे बड़ी बात ना ही चलते रिक्शे से अपन गायब हुए।

खैर आज भी ऐसे कई इलाके हैं जहाँ ये बातें सच हैं, और ऐसी खौफ़नाक जगहों पर लोग रहते ही हैं, और ऐसे लुटेरों में हिम्मत इसलिये है क्योंकि वहाँ ज्यादा ही शरीफ़ लोग रहते हैं, मैं उन सभी शरीफ़ लोगों को सैल्यूट करता हूँ ।

प्रतिबंधों के बाद आजाद जिंदगी का मजा

    बीते महीने से बहुत कुछ लिखने की सोच रहा था, परंतु लिखना नहीं हो पा रहा था, राईटर्स ब्लॉक नहीं था, ऐसा लगता है कोई मेंटल ब्लॉक था, इतने सारे प्रतिबंधों में लगता था कि दिमाग पर भी पहरा लग गया है। कोई भी विचार आता था तो पहले प्रतिबंध हावी होता था, कहीं इस देश में यह प्रतिबंधित तो नहीं है।

    प्रतिबंध दिमाग को एक संकुचित दायरे में रखता है और उसे बड़ा आकार लेने से रोकता है। यह जब अपने ऊपर गुजरी तब जाना, जिन लोगों ने वहाँ जन्म लिया और वहीं मरते दम तक रहना है, सोचकर ही शरीर में फ़ुरफ़ुरी दौड़ने लगती है।

    फ़िर एक बात और दिमाग में आती है जैसे हमें इस आजादी की आदत पड़ चुकी है वैसे ही उन्हें इस प्रतिबंध की आदत पड़ चुकी होगी, जैसे यहाँ कुछ लोगों को आजादी अच्छी नहीं लगती वैसे ही वहाँ कुछ लोगों को प्रतिबंध अच्छा नहीं लगता होगा । अपवाद तो हर जगह होते हैं ।

    और वाकई यह भी अपवाद है कि जेद्दाह में कोई सिनेमा घर नहीं है, कोई सार्वजनिक पर्यटन स्थल नहीं है और अगर कहीं किसी जगह पर चार से अधिक व्यक्ति कुछ ज्यादा देर खड़े रहते हैं तो एकदम पुलिस की जीप आ जाती है। सार्वजनिक जगहों की फ़ोटो नहीं खींच सकते, अगर फ़ोटो खींच भी लिया तो कहीं से एक सुरक्षाकर्मी आ टपकेगा और वह फ़ोटो डिलिट कर देगा, ज्यादा आनाकानी करी तो वहीं पर उस डिवाइस को तोड़ डाला जायेगा या जब्त करके ले जाया जायेगा।

प्रतिबंध के बाद मजा २ प्रतिबंध के बाद मजा १

   जो लोग प्रतिबंध के बावजूद जिंदगी के मजे करना चाहते हैं, वे दुबई जाकर हसीं जिंदगी जी  लेते है, हवा से जाने में ढ़ाई घंटा लगता है और सड़क से लगभग ११०० किमी होने के बावजूद ८-९ घंटे लगते हैं और सप्ताहांत पर अच्छी खासी भीड़ होती है।

    ऐसे ही एक बंदे से बात हो रही थी तो उसने बताया कि  हमने कई लोगों को देखा जो कि अपने परिवार के साथ हर सप्ताह हवाई अड्डे पर मौजूद होते हैं, दुबई जाने के लिये, जिंदगी की मौज उड़ाने के लिये।

    वाकई प्रतिबंधों में रहने के बाद कहीं बिना प्रतिबंध के जीने को मिले तो जिंदगी का मजा ही कुछ और होता है और वह मजा केवल तब ही जाना जा सकता है जब प्रतिबंध में रहना पड़े।

जेद्दाह में सप्ताहांत, टैक्सीवाले की बातें, निराला में भोजन, मुशर्रफ़ और एमग्रांड कार (Weekend in Jeddah, Taxiwala, Lunch In Nirala, Musharraf and Emgrand Car)

    जेद्दाह में अभी लगभग ५० डिग्री तापमान चल रहा है कहने के लिये केवल ५० डिग्री है परंतु रेगिस्तान होने के कारण ये बहुत ही भयंकर वाली गर्मी पैदा होती है, ऊपर से हरियाली नहीं है। कहीं भी जाना हो टैक्सी में ही जाना पड़ता है, आज फ़िर टैक्सी करके निराला रेस्टोरेंट जाना तय किया।
    होटल से निकल लिये और टैक्सी रोकी, निराला रेस्टोरेंट का बताया और चल दिये मात्र १० रियाल, निराला रेस्टोरेंट यहाँ जेद्दाह में बहुत प्रसिद्ध है और अपने बेहतरीन स्वाद के लिये जाना जाता है। जैसे ही टैक्सी में बैठे आगे पेट्रोल पंप पर उसने अपनी टैक्सी रोकी और कहा पेट्रोल लेना है, पेट्रोल ना होने की लाल बत्ती बार बार दिख रही थी, १८ रियाल दिये पेट्रोल पंप कर्मचारी को और ४० लीटर पेट्रोल डाल दिया गया, टैक्सीवाले का नाम सैफ़ुल्ला था और बंदा पाकिस्तान से था, कहने लगा कि यहाँ देखिये ४१ हलाला का एक लीटर पेट्रोल मिलता है और १८ रियाल में टैंक फ़ुल हो गया। साथ में १.५ लीटर पानी की बोतल और पसीना पोंछने के लिये टिश्यु पेपर का १ बॉक्स फ़्री। इतने में ही उसके पास फ़ोन आ गया (जी हाँ यहाँ पेट्रोल पंपों पर मोबाईल फ़ोन पर बात करने की पाबंदी नहीं है, पता नहीं भारत में किसने लगाई), पंजाबी भाषा में बात करने लगा, इतना समझ में आया कि किसी ने मुर्गी पकाई है और वह पंद्रह बीस मिनिट में खाने पहुँच जायेगा।
    टैक्सीवाले ने बताना शुरु किया कि पाकिस्तान में १०३ रुपया पेट्रोल था अभी सरकार ने १० रुपये कम किये हैं, हमारे मित्र ने कहा जरदारी को हटा दिया, तो उनका कहना था कि सारे हुक्मरान ऐसे ही हैं, बस पैसा खा जाते हैं, भ्रष्टाचार करते हैं और अवाम को मरने के लिये छोड़ देते हैं, सारा पैसा अपनी जेब में रख लेते हैं जैसे अल्लाह के पास सारा पैसा लेकर जायेंगे।
    जब मुशर्र्फ़ का शासन था तब बहुत अच्छा था, यह चुनाव जो हैं पाकिस्तान के लिये नहीं बने हैं, पाकिस्तान तो सैनिक शासन में ही खुश रहता है, आज पाकिस्तान के अधिकतर जगहों पर २२ घंटे बिजली नहीं आती, जब मुशर्रफ़ थे तब एक मिनिट के लिये भी बिजली नहीं जाती थी। वाप्टा (बिजली विभाग का दफ़्तर) में यह हालात थे मुशर्रफ़ के आने के पहले कि केवल २५% कर्मचारी चढ्ढी बनियान में बैठे रहते थे और बाकी के बचे हुए घर पर ही रहते थे और मुफ़्त की तन्ख्वाह खाते थे। जैसे ही मुशर्रफ़ का शासन आया, उन्होंने सेना की टुकड़ियाँ सारे सरकारी महकमे में भेजी और कहा देखो क्या काम चल रहा है और अगर काम नहीं हो रहा है तो काम करवाओ।
    जब सेना वाप्टा पहुँची तो देखा कि सारे कर्मचारी हाजिर ही नहीं हैं, तो सेना के अफ़सरान ने कहा, कल सारे कर्मचारी यहाँ यूनिफ़ार्म में उपस्थित होने चाहिये नहीं तो बस छुट्टी समझो। इस तरह से सारे सरकारी महकमों को ठीक किया गया। अब लोकतंत्र की बहाली के बाद वापिस से वही पुराना हाल हो गया है।
    हम लोग पाकिस्तान से यहाँ आकर मजदूरी करके, टैक्सी चलाकर पेट पाल रहे हैं और हुक्मरान हमारे हिस्से का पैसा अपनी जेब में भरे जा रहे हैं। जब सारे देशों से मदद आयी तो उस मदद को भी हुक्मरानों ने अपने घर में भर लिया और पाकिस्तान की जनता उससे महरूम रह गई। जब सऊदी सरकार ने भी मदद की पेशकश की तो हुक्मरान ने कहा आप मदद भेज दीजिये हम गरीबों में मदद भिजवा देंगे, तो यहाँ की सरकार ने कहा कि मदद हम सीधे गरीबों को देना चाहते हैं, और यहाँ से सेना मदद लेकर गई और सीधे पाकिस्तान की गरीब जनता को मदद दी गई, सही मायने में केवल यही मदद जनता के पास पहुँची, बाकी तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, यहाँ रेल्वे की हालत यह है कि चंद ट्रेनें ही चलती हैं, बस बंद होने की कगार पर है।
    आगे टैक्सी ड्राईवर का कहना था,  साहब आपका भारत तो बहुत अच्छा है, कम से कम सरकार मीडिया और कोर्ट के पास अधिकार तो हैं, उनके पास पॉवर तो है।
    हमारा रेस्टोरेंट आ गया था सप्ताहांत का माहौल था, यहाँ वेज और नॉनवेज दोनों मिलता है, हम तो वेज ही खाते हैं और यहाँ की दाल, आलू मैथी और रोटियाँ बहुत पसंद आईं, और कुल्फ़ी के तो क्या कहने, एकदम बेहतरीन।
    आते समय वहीं रेस्टोरेंट के पास कालीन की दुकान थी, जिसमें हमें तुर्की का कालीन बहुत अच्छा लगा, बहुत ही अच्छी कारीगरी वाला नीले रंग में, परंतु वह हमारे मित्र को पसंद आ गया, तो हमने कहा आप ले लीजिये और दुकानवाले को कहा कि हमारे लिये एक ऐसा ही मंगवा दीजिये अगले १-२ दिन में आकर ले जायेंगे।
    आते समय टैक्सी वाला बता रहा था कि सऊदी में अभी एम्ग्रांड चाईना की नई कार आई है, ३९,००० रियाल में सबसे अच्छा मॉडल है और कैमरी की सेल्स को इस गाड़ी ने पीटकर रख दिया है, आगे एक लेपटॉप भी दिया है, गाड़ी इतनी बड़ी है कि मर्सीडिज भी कहीं नहीं लगती, बहुत शान-शौकत वाली गाड़ी है।
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    हमारा होटल आ चुका था हमने १० रियाल चुकाये और फ़तूरा (बिल) लेकर उतर गये। सोचने लगे कि अगर यही गाड़ी भारत में आ गई तो लगभग ३-४ लाख की होगी, अभी तो ट्राफ़िक की यह हालत है बाद में क्या होगी।

दोस्तों के जाने का गम..

    दोस्तों के जाने का गम हमेशा तकलीफ़देह होता है, जाना मतलब हमेशा के लिये हमें छोड़कर जाना। अपने पीछे इतने सारे रिश्ते जो कि कितने जतन से बनाये गये थे, और बस एक पल में बिछड़ जाना।
 
    मेरे साथ काम करने वाले दो मित्र अचानक ही अलविदा कहकर चल दिये, उनके जाने की उम्र भी नहीं थी, और सुनकर विश्वास करना भी नामुमकिन।
 
    एक मित्र थे जो कि २ – ३ महीने पहले ही अलविदा कह चुके थे, परंतु हमें पता नहीं चला, फ़ेसबुक पर उनके जन्मदिन पर हमने बधाई का सन्देश दे दिया, तो एक मित्र से पता चला कि अब वह मित्र इस दुनिया में ही नहीं है, जबकि उसकी शादी हुए शायद पूरा वर्ष भी नहीं हुआ था, यह मेरे लिये दिल दहला देने वाली खबर थी।
शोकसंदेश
 
    उस मित्र का जीटॉक स्टेटस होता था “भगवान सबका भला करे बस शुरूआत मुझसे करे”, पता नहीं भगवान ने ये कैसा भला किया मेरे मित्र के साथ। न रहने की खबर मिलते ही जो स्थिती मेरी थी वही स्थिती मेरे कई दोस्तों की थी। जिस चीज पर हमारा जोर नहीं हम इसके लिये कुछ नहीं कर सकते।
 
    कल फ़िर शाम के समय एक फ़ोन आया कि एक हमारे साथ काम करने वाले जो कि आजकल भारत के बाहर थे और घूमने के लिये भारत आये हुए थे और कल वो भी नहीं रहे। जल्दी जल्दी दो बुरी खबरें सुनने से दिल आहत हो गया है।
 
    बहुत पहले ऐसे ही एक मित्र के जाने पर अंतिम विदाई के समय हमारी मित्र मंडली में यही चर्चा थी, सारी दुनियादारी करते हैं, सारे जतन करते हैं, परंतु आखिरकार इस देह को पंचतत्व में ही विलीन होना है, तो लोग याद करें हमारे जाने के बाद इसके लिये अच्छे काम करें, ना कि बुरे जिससे लोग आहत हों और हमारे जाने के गम की जगह खुशियाँ मनायें।
 
    इतनी बड़ी देह आखिरकर राख हो जाती है और किसी भी “अहं” और “मैं” का नामोनिशां नहीं होता । तुम्हारे साथ की गई चैटिंग अभी तक मेरे मेल बॉक्स में है, तुम अभी भी मेरे मैसेन्जर में हो और तुम्हें हटाते हुए हाथ काँपता है और आज तक हटा नहीं पाया हूँ और ना ही फ़ेसबुक से तुम्हें अनफ़्रेंड कर पाया हूँ ।

छुट्टियों के बाद का अकेलापन (Feeling alone after vacations..)

छुट्टियाँ खत्म हो गईं, घर से आ गये, वहाँ ज्यादातर वक्त परिवार के साथ बीता कुछ ही दोस्तों से मिल पाये, कुछ दोस्तों की बड़ी बड़ी शिकायतें भी मिलीं, परंतु प्राथमिकता तो हमें खुद ही निश्चित करनी होती है, और परिवार ही प्राथमिक होता है।
घर पर माता पिता के साथ रहना अपने आप में उम्र के इस ढ़लान पर एक अलग ही तरह का अनुभव है, अब परिवार का महत्व इतनी दूर रहने के कारण   और उम्र बड़ने के कारण पता लगने लगा है।
जब घर पर थे तो बस परिवार के बीच रहकर परिवार में ही बातचीत, हँसी ठिठोली हुआ करती थी, कैसे इतना सारा समय निकल गया पता ही नहीं चला। मैं लगभग ३-४ किताबें ले गया था पढ़ने के लिये परंतु वे सारी किताबें बिना खुले ही वापिस आ गईं।
अकेलापन
परिवार में रहने से जख्मों पर घाव भर जाते हैं और एक असीम सुख प्राप्ति का अनुभव होता है। परिवार में सदस्य भले ही बुजुर्ग हो या नवागत सबसे अच्छे तरह से मिले और उनके साथ बैठकर बातचीत हुई।
हमें नौकरी के चक्कर में घर से दूर रहना पड़ता है, इससे उपजा मानसिक एकाकीपन परिवार में ही भरा जा सकता है। परिवार मतलब पूर्ण परिवार, केवल एकल परिवार नहीं।
अब घर परिवार से वापिस आ गये हैं, छुट्टियाँ खत्म हो चुकी हैं, वापिस अपने रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी हो चुकी है, यहाँ आकर अब अजीब तरह का अकेलापन लगने लगा है। ऐसा लगता है कि हर चीज खाने दौड़ रही है, किसी से ज्यादा बात करने की इच्छा नहीं होती, खैर यह तो मानवीय प्रवृत्ति है। पर इस बार वाकई ये अकेलापन दुश्कर है।
मन अभी भी सुप्तावस्था में है अब चेतनता को जगाया जा रहा है ।

महाकालेश्वर का बदलता स्वरूप

इस बार महाकालेश्वर महाराज के दर्शन करने गये तो पता नहीं क्यूँ हृदय तीव्र क्रंदन करने लगा और महाकालेश्वर के पुराने स्वरूप याद आ गये। आज जो भी स्वरूप महाकाल का है वह इस प्रकार का है, जिससे लगता है कि यहाँ भक्त नहीं, अपराधी आते हों, जहाँ कैदियों को रखने वाली बड़ी बड़ी सलाखें और बेरीकेड्स लगाये गये हैं।

महाकालपहले महाकाल के आँगन में ही फ़ूल वाले अपनी दुकानें लगाते थे, जहाँ अब चारों और गलियारे बना दिये गये हैं और उन्हें सलाखों से पाट दिया गया है, कुछ गलियारे भक्तों के लिये काम आते थे तो कुछ पुजारियों और प्रशासन के, परंतु जबसे महाकालेश्वर मंदिर में मुख्य द्वार से प्रवेश बंद कर दिया गया है, तब से ये गलियारे भुतहे हो गये हैं, अकेले चलने पर इन गलियारों में डर लगने लगता है।

पिछले सिंहस्थ में महाकालेश्वर के दर्शन के लिये आये भक्तों के लिये प्रशासन ने एक बड़ा हॉल रूपी पिंजड़ा बनवाया और कम से कम ५०० मीटर चलने के लिये मजबूर कर दिया, अब टनल बना रहे हैं, फ़िर ये सब भी बेमानी हो जायेगा । महाकालेश्वर मंदिर पूर्ण तरह से व्यावसायिक स्थल बन चुका है, जहाँ महाकालेश्वर की भक्ति बिकती है, यह लिखते हुए हृदय में गहन वेदना हो रही है, परंतु सच्चाई कड़वी ही होती है और कभी ना कभी किसी ना किसी को लिखनी ही पड़ती है और सोचना पड़ती है।

महाकाल के सारे पंडे (जितने हमने देखे) धनलौलुप और ब्रोकर बन चुके हैं, महाकाल में प्रवेश द्वार से दर्शन तक ये ब्रोकर जगह जगह तरह तरह की बातें करते हैं, आईये पूजा करवा देते हैं, ऐसे लाईन में लगा रहने पड़ेगा, हमारे साथ आ जाईये १५ मिनिट में ही दर्शन हो जायेंगे और पूजन भी हो जायेगा। पंडे पूजा कराते कराते एक हाथ से मोबाईल पर ही दूसरे भक्तों से पूजा की बुकिंग भी कर रहे हैं।

आकाश तारके लिंगम

पुलिस व्यवस्था में लगे कर्मियों में महाकाल का रौद्र रूप ही देखने को मिलता है, पता नहीं बाबा महाकाल अपना भोलेपन स्वरूप को कब इन्हें देंगे जिससे ये कर्मी दर्शनार्थियों से भोलेपन और सौम्य रूप से बात करेंगे।

विशेष दर्शन के लिये १५१ रूपये का प्रवेश शुल्क है, वहीं पर ये ब्रोकर मिल जाते हैं कि हम आपको सीधे गर्भगृह तक ले चलेंगे और पूजा और अभिषेक करवा देंगे, आप अपने १५१ रूपये इस ब्राह्मण को दान कर दीजियेगा। यह है महाकालेश्वर में भ्रष्टाचार, और यह सब वहाँ ड्य़ूटी कर रहे पुलिसकर्मी देखते रहते हैं।

बाहर इतने बेरीकेड्स लगा दिये गये हैं कि भक्त शिखर दर्शन से महरूम ही रह जाते हैं,  महाकाल के दर्शन के बाद शिखर दर्शन करना चाहिये ऐसा कहा जाता है  महाकाल बाबा के दर्शन से जितना पुण्य मिलता है, शिखर दर्शन से उसका आधा पुण्य मिलता है।

उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन…

वैसे इतने सारे धार्मिक स्थलों पर जाने के बाद यह तो समझ में आ गया कि भगवान सबसे बड़े भ्रष्टाचारियों और पापियों को अपने पास ही रखते हैं और ये पाखंडी अपने आप को भगवान के करीब पाकर धन्य होते हैं।

अकाल मृत्यु वो मरे

भक्त और दर्शनार्थी इन सबको नजरअंदाज करते हुए निकल जाते हैं जैसे भारत की जनता, सरकार को नजरअंदाज करते हुए निकल जाती है।

प्रशासन पता नहीं कब जागेगा और महाकालेश्वर के भक्त धन्य होंगे और मन में जिस श्रद्धा को लेकर आते हैं, उतनी ही श्रद्धा वापिस लेकर जायें, मन में असंतोष लेकर ना जायें।