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जेद्दाह में सप्ताहांत, टैक्सीवाले की बातें, निराला में भोजन, मुशर्रफ़ और एमग्रांड कार (Weekend in Jeddah, Taxiwala, Lunch In Nirala, Musharraf and Emgrand Car)

    जेद्दाह में अभी लगभग ५० डिग्री तापमान चल रहा है कहने के लिये केवल ५० डिग्री है परंतु रेगिस्तान होने के कारण ये बहुत ही भयंकर वाली गर्मी पैदा होती है, ऊपर से हरियाली नहीं है। कहीं भी जाना हो टैक्सी में ही जाना पड़ता है, आज फ़िर टैक्सी करके निराला रेस्टोरेंट जाना तय किया।
    होटल से निकल लिये और टैक्सी रोकी, निराला रेस्टोरेंट का बताया और चल दिये मात्र १० रियाल, निराला रेस्टोरेंट यहाँ जेद्दाह में बहुत प्रसिद्ध है और अपने बेहतरीन स्वाद के लिये जाना जाता है। जैसे ही टैक्सी में बैठे आगे पेट्रोल पंप पर उसने अपनी टैक्सी रोकी और कहा पेट्रोल लेना है, पेट्रोल ना होने की लाल बत्ती बार बार दिख रही थी, १८ रियाल दिये पेट्रोल पंप कर्मचारी को और ४० लीटर पेट्रोल डाल दिया गया, टैक्सीवाले का नाम सैफ़ुल्ला था और बंदा पाकिस्तान से था, कहने लगा कि यहाँ देखिये ४१ हलाला का एक लीटर पेट्रोल मिलता है और १८ रियाल में टैंक फ़ुल हो गया। साथ में १.५ लीटर पानी की बोतल और पसीना पोंछने के लिये टिश्यु पेपर का १ बॉक्स फ़्री। इतने में ही उसके पास फ़ोन आ गया (जी हाँ यहाँ पेट्रोल पंपों पर मोबाईल फ़ोन पर बात करने की पाबंदी नहीं है, पता नहीं भारत में किसने लगाई), पंजाबी भाषा में बात करने लगा, इतना समझ में आया कि किसी ने मुर्गी पकाई है और वह पंद्रह बीस मिनिट में खाने पहुँच जायेगा।
    टैक्सीवाले ने बताना शुरु किया कि पाकिस्तान में १०३ रुपया पेट्रोल था अभी सरकार ने १० रुपये कम किये हैं, हमारे मित्र ने कहा जरदारी को हटा दिया, तो उनका कहना था कि सारे हुक्मरान ऐसे ही हैं, बस पैसा खा जाते हैं, भ्रष्टाचार करते हैं और अवाम को मरने के लिये छोड़ देते हैं, सारा पैसा अपनी जेब में रख लेते हैं जैसे अल्लाह के पास सारा पैसा लेकर जायेंगे।
    जब मुशर्र्फ़ का शासन था तब बहुत अच्छा था, यह चुनाव जो हैं पाकिस्तान के लिये नहीं बने हैं, पाकिस्तान तो सैनिक शासन में ही खुश रहता है, आज पाकिस्तान के अधिकतर जगहों पर २२ घंटे बिजली नहीं आती, जब मुशर्रफ़ थे तब एक मिनिट के लिये भी बिजली नहीं जाती थी। वाप्टा (बिजली विभाग का दफ़्तर) में यह हालात थे मुशर्रफ़ के आने के पहले कि केवल २५% कर्मचारी चढ्ढी बनियान में बैठे रहते थे और बाकी के बचे हुए घर पर ही रहते थे और मुफ़्त की तन्ख्वाह खाते थे। जैसे ही मुशर्रफ़ का शासन आया, उन्होंने सेना की टुकड़ियाँ सारे सरकारी महकमे में भेजी और कहा देखो क्या काम चल रहा है और अगर काम नहीं हो रहा है तो काम करवाओ।
    जब सेना वाप्टा पहुँची तो देखा कि सारे कर्मचारी हाजिर ही नहीं हैं, तो सेना के अफ़सरान ने कहा, कल सारे कर्मचारी यहाँ यूनिफ़ार्म में उपस्थित होने चाहिये नहीं तो बस छुट्टी समझो। इस तरह से सारे सरकारी महकमों को ठीक किया गया। अब लोकतंत्र की बहाली के बाद वापिस से वही पुराना हाल हो गया है।
    हम लोग पाकिस्तान से यहाँ आकर मजदूरी करके, टैक्सी चलाकर पेट पाल रहे हैं और हुक्मरान हमारे हिस्से का पैसा अपनी जेब में भरे जा रहे हैं। जब सारे देशों से मदद आयी तो उस मदद को भी हुक्मरानों ने अपने घर में भर लिया और पाकिस्तान की जनता उससे महरूम रह गई। जब सऊदी सरकार ने भी मदद की पेशकश की तो हुक्मरान ने कहा आप मदद भेज दीजिये हम गरीबों में मदद भिजवा देंगे, तो यहाँ की सरकार ने कहा कि मदद हम सीधे गरीबों को देना चाहते हैं, और यहाँ से सेना मदद लेकर गई और सीधे पाकिस्तान की गरीब जनता को मदद दी गई, सही मायने में केवल यही मदद जनता के पास पहुँची, बाकी तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, यहाँ रेल्वे की हालत यह है कि चंद ट्रेनें ही चलती हैं, बस बंद होने की कगार पर है।
    आगे टैक्सी ड्राईवर का कहना था,  साहब आपका भारत तो बहुत अच्छा है, कम से कम सरकार मीडिया और कोर्ट के पास अधिकार तो हैं, उनके पास पॉवर तो है।
    हमारा रेस्टोरेंट आ गया था सप्ताहांत का माहौल था, यहाँ वेज और नॉनवेज दोनों मिलता है, हम तो वेज ही खाते हैं और यहाँ की दाल, आलू मैथी और रोटियाँ बहुत पसंद आईं, और कुल्फ़ी के तो क्या कहने, एकदम बेहतरीन।
    आते समय वहीं रेस्टोरेंट के पास कालीन की दुकान थी, जिसमें हमें तुर्की का कालीन बहुत अच्छा लगा, बहुत ही अच्छी कारीगरी वाला नीले रंग में, परंतु वह हमारे मित्र को पसंद आ गया, तो हमने कहा आप ले लीजिये और दुकानवाले को कहा कि हमारे लिये एक ऐसा ही मंगवा दीजिये अगले १-२ दिन में आकर ले जायेंगे।
    आते समय टैक्सी वाला बता रहा था कि सऊदी में अभी एम्ग्रांड चाईना की नई कार आई है, ३९,००० रियाल में सबसे अच्छा मॉडल है और कैमरी की सेल्स को इस गाड़ी ने पीटकर रख दिया है, आगे एक लेपटॉप भी दिया है, गाड़ी इतनी बड़ी है कि मर्सीडिज भी कहीं नहीं लगती, बहुत शान-शौकत वाली गाड़ी है।
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    हमारा होटल आ चुका था हमने १० रियाल चुकाये और फ़तूरा (बिल) लेकर उतर गये। सोचने लगे कि अगर यही गाड़ी भारत में आ गई तो लगभग ३-४ लाख की होगी, अभी तो ट्राफ़िक की यह हालत है बाद में क्या होगी।

दोस्तों के जाने का गम..

    दोस्तों के जाने का गम हमेशा तकलीफ़देह होता है, जाना मतलब हमेशा के लिये हमें छोड़कर जाना। अपने पीछे इतने सारे रिश्ते जो कि कितने जतन से बनाये गये थे, और बस एक पल में बिछड़ जाना।
 
    मेरे साथ काम करने वाले दो मित्र अचानक ही अलविदा कहकर चल दिये, उनके जाने की उम्र भी नहीं थी, और सुनकर विश्वास करना भी नामुमकिन।
 
    एक मित्र थे जो कि २ – ३ महीने पहले ही अलविदा कह चुके थे, परंतु हमें पता नहीं चला, फ़ेसबुक पर उनके जन्मदिन पर हमने बधाई का सन्देश दे दिया, तो एक मित्र से पता चला कि अब वह मित्र इस दुनिया में ही नहीं है, जबकि उसकी शादी हुए शायद पूरा वर्ष भी नहीं हुआ था, यह मेरे लिये दिल दहला देने वाली खबर थी।
शोकसंदेश
 
    उस मित्र का जीटॉक स्टेटस होता था “भगवान सबका भला करे बस शुरूआत मुझसे करे”, पता नहीं भगवान ने ये कैसा भला किया मेरे मित्र के साथ। न रहने की खबर मिलते ही जो स्थिती मेरी थी वही स्थिती मेरे कई दोस्तों की थी। जिस चीज पर हमारा जोर नहीं हम इसके लिये कुछ नहीं कर सकते।
 
    कल फ़िर शाम के समय एक फ़ोन आया कि एक हमारे साथ काम करने वाले जो कि आजकल भारत के बाहर थे और घूमने के लिये भारत आये हुए थे और कल वो भी नहीं रहे। जल्दी जल्दी दो बुरी खबरें सुनने से दिल आहत हो गया है।
 
    बहुत पहले ऐसे ही एक मित्र के जाने पर अंतिम विदाई के समय हमारी मित्र मंडली में यही चर्चा थी, सारी दुनियादारी करते हैं, सारे जतन करते हैं, परंतु आखिरकार इस देह को पंचतत्व में ही विलीन होना है, तो लोग याद करें हमारे जाने के बाद इसके लिये अच्छे काम करें, ना कि बुरे जिससे लोग आहत हों और हमारे जाने के गम की जगह खुशियाँ मनायें।
 
    इतनी बड़ी देह आखिरकर राख हो जाती है और किसी भी “अहं” और “मैं” का नामोनिशां नहीं होता । तुम्हारे साथ की गई चैटिंग अभी तक मेरे मेल बॉक्स में है, तुम अभी भी मेरे मैसेन्जर में हो और तुम्हें हटाते हुए हाथ काँपता है और आज तक हटा नहीं पाया हूँ और ना ही फ़ेसबुक से तुम्हें अनफ़्रेंड कर पाया हूँ ।

छुट्टियों के बाद का अकेलापन (Feeling alone after vacations..)

छुट्टियाँ खत्म हो गईं, घर से आ गये, वहाँ ज्यादातर वक्त परिवार के साथ बीता कुछ ही दोस्तों से मिल पाये, कुछ दोस्तों की बड़ी बड़ी शिकायतें भी मिलीं, परंतु प्राथमिकता तो हमें खुद ही निश्चित करनी होती है, और परिवार ही प्राथमिक होता है।
घर पर माता पिता के साथ रहना अपने आप में उम्र के इस ढ़लान पर एक अलग ही तरह का अनुभव है, अब परिवार का महत्व इतनी दूर रहने के कारण   और उम्र बड़ने के कारण पता लगने लगा है।
जब घर पर थे तो बस परिवार के बीच रहकर परिवार में ही बातचीत, हँसी ठिठोली हुआ करती थी, कैसे इतना सारा समय निकल गया पता ही नहीं चला। मैं लगभग ३-४ किताबें ले गया था पढ़ने के लिये परंतु वे सारी किताबें बिना खुले ही वापिस आ गईं।
अकेलापन
परिवार में रहने से जख्मों पर घाव भर जाते हैं और एक असीम सुख प्राप्ति का अनुभव होता है। परिवार में सदस्य भले ही बुजुर्ग हो या नवागत सबसे अच्छे तरह से मिले और उनके साथ बैठकर बातचीत हुई।
हमें नौकरी के चक्कर में घर से दूर रहना पड़ता है, इससे उपजा मानसिक एकाकीपन परिवार में ही भरा जा सकता है। परिवार मतलब पूर्ण परिवार, केवल एकल परिवार नहीं।
अब घर परिवार से वापिस आ गये हैं, छुट्टियाँ खत्म हो चुकी हैं, वापिस अपने रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी हो चुकी है, यहाँ आकर अब अजीब तरह का अकेलापन लगने लगा है। ऐसा लगता है कि हर चीज खाने दौड़ रही है, किसी से ज्यादा बात करने की इच्छा नहीं होती, खैर यह तो मानवीय प्रवृत्ति है। पर इस बार वाकई ये अकेलापन दुश्कर है।
मन अभी भी सुप्तावस्था में है अब चेतनता को जगाया जा रहा है ।

महाकालेश्वर का बदलता स्वरूप

इस बार महाकालेश्वर महाराज के दर्शन करने गये तो पता नहीं क्यूँ हृदय तीव्र क्रंदन करने लगा और महाकालेश्वर के पुराने स्वरूप याद आ गये। आज जो भी स्वरूप महाकाल का है वह इस प्रकार का है, जिससे लगता है कि यहाँ भक्त नहीं, अपराधी आते हों, जहाँ कैदियों को रखने वाली बड़ी बड़ी सलाखें और बेरीकेड्स लगाये गये हैं।

महाकालपहले महाकाल के आँगन में ही फ़ूल वाले अपनी दुकानें लगाते थे, जहाँ अब चारों और गलियारे बना दिये गये हैं और उन्हें सलाखों से पाट दिया गया है, कुछ गलियारे भक्तों के लिये काम आते थे तो कुछ पुजारियों और प्रशासन के, परंतु जबसे महाकालेश्वर मंदिर में मुख्य द्वार से प्रवेश बंद कर दिया गया है, तब से ये गलियारे भुतहे हो गये हैं, अकेले चलने पर इन गलियारों में डर लगने लगता है।

पिछले सिंहस्थ में महाकालेश्वर के दर्शन के लिये आये भक्तों के लिये प्रशासन ने एक बड़ा हॉल रूपी पिंजड़ा बनवाया और कम से कम ५०० मीटर चलने के लिये मजबूर कर दिया, अब टनल बना रहे हैं, फ़िर ये सब भी बेमानी हो जायेगा । महाकालेश्वर मंदिर पूर्ण तरह से व्यावसायिक स्थल बन चुका है, जहाँ महाकालेश्वर की भक्ति बिकती है, यह लिखते हुए हृदय में गहन वेदना हो रही है, परंतु सच्चाई कड़वी ही होती है और कभी ना कभी किसी ना किसी को लिखनी ही पड़ती है और सोचना पड़ती है।

महाकाल के सारे पंडे (जितने हमने देखे) धनलौलुप और ब्रोकर बन चुके हैं, महाकाल में प्रवेश द्वार से दर्शन तक ये ब्रोकर जगह जगह तरह तरह की बातें करते हैं, आईये पूजा करवा देते हैं, ऐसे लाईन में लगा रहने पड़ेगा, हमारे साथ आ जाईये १५ मिनिट में ही दर्शन हो जायेंगे और पूजन भी हो जायेगा। पंडे पूजा कराते कराते एक हाथ से मोबाईल पर ही दूसरे भक्तों से पूजा की बुकिंग भी कर रहे हैं।

आकाश तारके लिंगम

पुलिस व्यवस्था में लगे कर्मियों में महाकाल का रौद्र रूप ही देखने को मिलता है, पता नहीं बाबा महाकाल अपना भोलेपन स्वरूप को कब इन्हें देंगे जिससे ये कर्मी दर्शनार्थियों से भोलेपन और सौम्य रूप से बात करेंगे।

विशेष दर्शन के लिये १५१ रूपये का प्रवेश शुल्क है, वहीं पर ये ब्रोकर मिल जाते हैं कि हम आपको सीधे गर्भगृह तक ले चलेंगे और पूजा और अभिषेक करवा देंगे, आप अपने १५१ रूपये इस ब्राह्मण को दान कर दीजियेगा। यह है महाकालेश्वर में भ्रष्टाचार, और यह सब वहाँ ड्य़ूटी कर रहे पुलिसकर्मी देखते रहते हैं।

बाहर इतने बेरीकेड्स लगा दिये गये हैं कि भक्त शिखर दर्शन से महरूम ही रह जाते हैं,  महाकाल के दर्शन के बाद शिखर दर्शन करना चाहिये ऐसा कहा जाता है  महाकाल बाबा के दर्शन से जितना पुण्य मिलता है, शिखर दर्शन से उसका आधा पुण्य मिलता है।

उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन…

वैसे इतने सारे धार्मिक स्थलों पर जाने के बाद यह तो समझ में आ गया कि भगवान सबसे बड़े भ्रष्टाचारियों और पापियों को अपने पास ही रखते हैं और ये पाखंडी अपने आप को भगवान के करीब पाकर धन्य होते हैं।

अकाल मृत्यु वो मरे

भक्त और दर्शनार्थी इन सबको नजरअंदाज करते हुए निकल जाते हैं जैसे भारत की जनता, सरकार को नजरअंदाज करते हुए निकल जाती है।

प्रशासन पता नहीं कब जागेगा और महाकालेश्वर के भक्त धन्य होंगे और मन में जिस श्रद्धा को लेकर आते हैं, उतनी ही श्रद्धा वापिस लेकर जायें, मन में असंतोष लेकर ना जायें।

कैरम से मिलती जीवन की सीख

अभी पिछले कुछ दिनों से अवकाश पर हूँ और पूर्णतया: अपने परिवार के साथ समय बिता रहा हूँ। आते समय कुछ किताबें भी लाया था, परंतु लगता है कि किताबें बिना पढ़े ही चली जायेंगी और हमारा पढ़ने का यह टार्गेट अधूरा ही रह जायेगा।

इसी बीच बेटे को कैरम खेलना बहुत पसंद आने लगा है, और हमने भी बचपन के बाद अब कैरम को हाथ लगाया है। थोड़े से ही दिनों में हमरे बेटेलाल तो कैरम में अपने से आगे निकल गये और अपन अभी भी हाथ जमाने में लगे हैं।

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कैरम के खेल को खेलते खेलते हमने पाया कि असल जिंदगी भी कैरम के खेल जैसी है, कुछ बातें इस बात पर निर्भर करती है कि आपका साथी कौन है, आपका प्रतिद्वंदी कौन है और आप किस मामले में उससे बेहतर हैं।

कैरम जुनून और प्रतिस्पर्धा का खेल है, जिसमें राजनीति और उससी उपजी लौलुपता भी खड़ी दिखती है। कैरम एकाग्रचित्त होकर खेलना पड़ता है, इससे जीवन की सीख मिलती है कि कोई भी कार्य एकाग्रचित्त होकर करना चाहिये, तभी सफ़लता मिलेगी।

रानी कब लेनी है, यह भी राजनीति का एक पाठ है और इस पाठ को अच्छे से सीखने के लिये कैरम में अच्छॆ अनुभव की जरूरत होती है, जैसे जिंदगी में बड़े निर्णय लेने के लिये सही समय का इंतजार करना चाहिये और जैसे ही समय आये वैसे ही सही निर्णय ले लेना चाहिये।

हमेशा अपने सारे मोहरों पर नजर रखो और नेटवर्किंग मजबूत रखो, अगर अपने सारी गोटियों को एकसाथ ले जाना है तो हरेक गोटी पर नजर रखो और मौका लगते ही पूरा बोर्ड एक साथ साफ़ कर दो।

ऐसी ही सतर्कता जिंदगी में भी रखना जरूरी है, इतनी ही राजनीति आपको आनी चाहिये और मोहरों पर एक साथ नजर रखना जरूरी है। हरेक जरूरी काम और जिंदगी के सारे काम बहुत ही एकाग्रचित्त तरीके से पूर्ण करना चाहिये।

बैंक ने क्रेडिट रेटिंग के कारण गृहऋण देने से मना किया (Bank rejected Home loan due to Credit rating..)

कुछ दिनों पहले अपने एक सहकर्मी से बात हो रही थी, वे अपने लिये एक फ़्लैट ढूँढ़ रहे थे, अब वे किसी क्रेडिट कार्ड कंपनी और बैंक से बात कर रहे थे। उनसे पूछा कि क्या बात है – तो पता चला कि क्रेडिट रेटिंग के कारण गृह ऋण में बहुत परेशानी आ रही है।
हमारे सहकर्मी की तन्ख्वाह भी अच्छी खासी है, जिसे देखकर शायद ही कोई बैंक उन्हें ऋण देने से मना करे। परंतु उनकी क्रेडिट रेटिंग याने कि क्रेडिट स्कोर काफ़ी कम था, क्रेडिट रेटिंग सिबिल (CIBIL) द्वारा प्रदत्त की जाती है। सिबिल आपके सभी तरह के वित्तीय लेनदेन पर नजर रखता है, और लेनदेन के स्वभाव पर भी नजर रखता है और क्रेडिट रेटिंग के लिये उनका खुद का फ़ोर्मुला है, जिससे किसी भी व्यक्ति विशेश का क्रेडिट रेटिंग पता चल जाता है। आजकल किसी भी बैंक या वित्तीय संस्थान में ऋण लेने जायें तो सबसे पहले वह क्रेडिट रेटिंग देखते हैं।
हमारे सहकर्मी को बैंक ने बताया कि आपकी क्रेडिट रेटिंग बहुत कम है और बावजूद आपकी अच्छी तन्ख्वाह होने के, आपको ऋण देना बहुत मुश्किल है, आप क्रेडिट कार्ड कंपनी से बात करें और देखें तो शायद आपकी क्रेडिट रेटिंग थोड़ी अच्छी हो जाये और हमें ऋण देने में आसानी हो।
उन्होंने पहले ५-६ क्रेडिट कार्ड ले रखे थे, परंतु कभी बकाया नहीं रखते थे, और केवल शौक के लिये ५-६ क्रेडिट कार्ड ले रखे थे, क्योंकि इन कार्डों की कोई सालाना फ़ीस नहीं थी। फ़िर बाद में उन कार्डों की बराबर से मैनेज नहीं कर पाते थे, तो उन्होंने एक क्रेडिट कार्ड छोड़कर बाकी सभी क्रेडिट कार्ड सरेंडर कर दिये। इसी में से एक सिटीबैंक का एक क्रेडिट कार्ड भी था, और उन्होंने उसका भी पूरा बकाया भर दिया था परंतु फ़िर भी उनकी क्रेडिट रेटिंग रिपोर्ट में सैटलमेंट लिखा हुआ था, उस समय हमारे सहकर्मी ने पूछताछ नहीं की थी, कि सैटलमेंट क्यों लिखा है, और न ही उन्हें इसका मतलब पता था।
अब जब बैंक वालों ने ऋण देने में नाटक किये तो इन्हें पता चला कि सैटलमेंट मतलब कि जब आप आखिरी भुगतान कर रहे हैं, तो आपने क्रेडिट कार्ड कंपनी या ऋण प्रदाता के साथ आखिरी भुगतान में कुछ मोलभाव किया तो उसे सैटलमेंट कहा जाता है। और इस सैटलमेंट शब्द के कारण क्रेडिट रेटिंग पर बुरा असर पड़ता है।
जब आप अपना खाता बंद करवा रहे होते हैं तो कई बार कई क्रेडिट कार्ड कंपनियाँ और ऋण प्रदाता कंपनी बदमाशी करती हैं, और साधारण भुगतान को सैटलमेंट कहकर दर्शाती हैं, ध्यान रखें साधारण भुगतान सैटलमेंट नहीं कहलाता है, इसके लिये जरूरी हो तो कानून का भी सहारा लिया जा सकता है।
आज हमारे सहकर्मी को इतनी परेशानी आ रही है, केवल एक छोटे से क्रेडिट कार्ड के सैटलमेंट शब्द से, ध्यान रखें सावधानी रखें जब भी क्रेडिट कार्ड या ऋण खाता बंद करें।
अगर ध्यान नहीं दिया तो आपके क्रेडिट रेटिंग की हालत खराब होगी और बैंक गृह ऋण क्या कोई भी ऋण देने से मना कर सकती है।

लड़कियों वाली कटिंग की दुकान

आज बहुत दिनों बाद हैयर सैलून याने की नाई की दुकान में गये। बाल बहुत बढ़ गये थे, तो सोचा कि चलो आज कैंची चलवा ली जाये।

बचपन से ही नाई की दुकान पर जाते थे, उस समय जो स्टाईल हमारे पिताजी कह देते थे बन जाती थी। फ़िर बाद में जब थोड़ी समझ आ गई तो अपने हिसाब से कटिंग करवाते थे। फ़िर एनसीसी में रहे तो बस सैनिक कटिंग इतनी अच्छी लगी कि उसके बाद तो वहीं स्टाईल रखने लगे।

अब यहाँ दक्षिण में आये तो यहाँ के नाईयों की कटिंग ही समझ नहीं आई, धीरे धीरे उन्हें समझाना पड़ा कि कैसी कटिंग चाहिये, अब भी उन्हें समझाना पड़ता है। हमारे बेटेलाल हमें बोले कि हमें तो नुन्गे स्टाईल करवानी है। हम बोले कि ऐसी कोई स्टाईल नहीं है तो जवाब मिला अरे आप चलो तो सही नुन्गे स्टाईल करवायेंगे। जब नाई की दुकान पर पहुँचे तो उसने झट से नुन्गे कट बना दी, जो कि सैनिक कटिंग की मिलती जुलती स्टाईल थी। यहाँ कन्नड़ में छोटे बालों को नुन्गे कहा जाता है।

बाल कटवाने की समस्या मुंबई में ज्यादा नहीं झेलना पड़ी थी, क्योंकि वहाँ अधिकतर उत्तर भारतीयों की ही नाई की दुकानें हैं, जो अपनी भाषा समझते हैं और एक से एक बाल काटने के कारीगर हैं।

बीच में जब हम गंजे रहने लगे थे, तो हर पंद्रह दिन में सिरे का शेव करवाने जाना पड़ता था, नाई पहले सिर पर शेविंग स्प्रे करता फ़िर हाथ से पूरे सिर पर फ़ैलाता और फ़िर उस्तरे से गंजी कर देता, गंजी करने का काम भी बहुत सावधानी का होता है। पर हाँ बाल कटावाने से कम समय लगता था।

पहले उस्तरे धार करने वाले होते थे, हर शेविंग के बाद धार लगाते थे। परंतु उस्तरे के अपराध जगत में बढ़ते उपयोग के मद्देनजर कानून ने उस पर लगाम कस दी और ब्लेड वाले उस्तरे चलन में आ गये।

बाल काटने के भी विशेषज्ञ कारीगर होते हैं, जब उज्जैन में थे तो एक नाई था जो कि बारीक बाल काटने में माहिर था और उसके हाथ में बहुत सफ़ाई थी, उसके हाथ से बाल कटवाने के लिये उस समय उस दुकान पर लाईन लगा करती थी।

हमारे एक मित्र हैं जो घर पर ही बाल काट लेते हैं, हमने भी कोशिश करने की सोची परंतु हिम्मत ही नहीं पड़ी और आज भी दुकान पर नाई की सेवाएँ लेते हैं।

खैर अब तो बाल काटने का धंधा भी चोखा है, इसमें भी काफ़ी नामी गिरामी ब्रांड आ गये हैं, पहले तो सड़क पर ही नाई दुकान लगाते थे फ़िर धीरे धीरे दुकानें आ गईं और अब वातानुकुलित दुकानें हैं, जहाँ लड़कियाँ नाईयों की दुकान चला रही हैं, और ये लड़कियों वाली कटिंग की दुकान कहलाती है।

प्यार का अहसास और उसकी बातें

    प्यार का अहसास एक ऐसे अहसास है जो जिंदगी में नये नये रंग भर देता है, प्यार जीवन में सच्चाई लाता है। जब प्यार जीवन में आता है तो जीवन में आईने का मतलब बदल जाता है, बार बार आईना देख कर मंद मंद मुस्कराना प्यार को जीना सिखाता है।
    प्यार में लोग पगला जाते हैं और हमारे यहाँ मालवा में कहते हैं कि बहरा जाते हैं, बहराना याने कि पगलाना। प्यार अंधा होता है और प्यार सच्चा होता है। प्यार का अहसास बहुत मीठा, तीखा और भोलापन लिये होता है। जब प्यार होता है तब कोई भी उसे समझ नहीं पाता है। बस दिल को तो यही सुनने की आस लगी रहती है कि वह भी हमें कह दे कि हाँ हम तुमसे प्यार करते हैं। नहीं तो प्यार एक तरफ़ा ही होता है।
    जीवन में प्यार बहुत जरूरी होता है, उसी के बल पर सब अपना जीवन बिताते हैं, भारत में कुछ लोग पहले प्यार करते हैं और फ़िर जीवन साथी बनाते हैं और बहुत सारे लोग पहले जीवन साथी बनाते हैं और फ़िर प्यार करते हैं। दोनों ही रूप में मायने प्यार के कभी बदलते नहीं हैं। जो प्यार दिल के उमंग को जगा दे, तरन्नुम के तार छेड़ दे, शाम का मौसम अचानक सुहाना कर दे और जीवन के प्रति राग उत्पन्न कर दे, वही सच्चा प्यार होता है। और अगर वाकई ये सब लक्षण आने लगें तो समझ लीजिये कि प्यार हो गया। वैसे प्यार का अहसास इतना गजब होता है कि प्यार क्या होता है पता ही नहीं चलता।
    प्यार का अहसास शब्दों में ढ़ालना बहुत ही मुश्किल होता है और प्यार को जो शब्दों में बयां कर दे वो अद्भुत शब्दों का कारीगर होता है। प्यार के इस अद्भुत अहसास ने हमें भी जकड़ रखा है, एक ऐसा पाश है जो कि हमें रोज धरती से बादलों तक ले जाता है और उन मेघों की एक एक फ़ुहार प्यार का अहसास करवाती है। प्यार शरारतें करवाता है और शरारत करने के बाद ऐसा लगता है “ओह! ऐसी शरारत हम भी कर सकते हैं”।
    ऐसे ही जब किसी प्यार को मिलने की इच्छा होती है तो तड़प दिल को बहुत परेशान करती है, वैसे तो दिल जीने के काम आता है परंतु प्यार के अहसास में दिल शब्द और दिल का बहुत महत्व है। प्यार के अहसास के बाद अक्सर सुनने को मिलता है “तुमने मेरा दिल ले लिया”। अब इससे जबरदस्त प्यार का इजहार करने का तरीका और क्या होगा।
प्यार के कुछ गाने जो मुझे बेहद पसंद हैं –
फ़िल्म सत्ते पर सत्ता –
संदेशा पहुँचाने के लिये –

 

इंतजार करते हुए –
अपने रंग मे ंरंगते हुए –

मेरी बाईकें फ़टफ़टी और मेरा बाईक शौक (My Bike passion..)

    बाईक मेरा बहुत बड़ा शौक रहा है, पहले इसे फ़टफ़टी कहते थे क्योंकि इसमें से फ़ट फ़ट की आवाज आती थी, पर अब बाईक कहते हैं और इसमें से फ़ट फ़ट की आवाज भी नहीं आती अब तो झूम्म्म की आवाज आती है।
crusedar bike    मुझे बचपन की याद है पापाजी के पास सबसे पहली फ़टफ़टी थी क्रूसेडर, जिसमें से बहुत आवाज आती थी और उस आवाज को सुनकर ऐसा लगता था कि बस अब बहरे हो जायेंगे। फ़िर क्रूसेडर के बाद पापाजी ने यजदि बाईक ली। जो मुझे बेहद ही पसंद थी। ऊँचाई इतनी कि मैं बैठ ही नहीं पाता था, मैंने उसका नाम ऊँट रखा था। उसमें किक और गियर एक ही था, पहले गियर वाले डंडे से किक मारके यजदि चालू करो और फ़िर उसी डंडे को नीचे गिराकर उसका गियर बना लो। ये सब तो मुझे जादू जैसा लगता था।
यजदि की एक खासियत यह अच्छी लगती थी कि उसमें पेट्रोल और ओईल एक अनुपात में मिलाना पड़ता था पर अगर आपको कहीं जल्दी जाना है तो ओईल थोड़ा ज्यादा कर लो, फ़िर तो यजदि रॉकेट बन जाती थी, उसका पिकअप जबरदस्त हो जाता था।
जब बड़े हुए तब तक बाजार में स्कूटर ने अपनी पैठ बना ली थी, औरbajaj super हमारे घर भी आया “हमारा बजाज” याने कि बजाज सुपर स्कूटर। मुझे वह स्कूटर बहुत ही पसंद था और उसी स्कूटर से मैंने दोपहिया वाहन चलाना सीखा था। कॉलेज के कुछ दिन भी उसी स्कूटर से निकले।
फ़िर बाद में मैं उज्जैन आ गया तो पहले मेरे पास एक २८ इंच की luna superएटलस साईकिल थी, डबल डंडे वाली, वह तो मेरे ऊँट से भी ऊँची थी, उस पर बैठने के लिये मुझे एक बड़े पत्थर का सहारा लेना पड़ता था या फ़िर पैर आगे से उचकाकर सीट पर बैठना पड़ता था। साथ ही मुझे मिली काईनेटिक की लूना, जो कि उस समय लगभग ६० किमी माईलेज देती थी। बजाज सुपर पुराना पड़ने लगा था और उसका इंजिन दम तोड़ने लगा था, बजाज सुपर हमारे घर में लगभग १४ वर्ष रहा।
सुपर के बाद हमारे घर में आया फ़िर “हमारा बजाज” का ही बजाज ब्रेवो, जो कि फ़ेल स्कूटर रहा परंतु मुझे ब्रेवो स्कूटर की जो बातें पसंद थीं वे थी उसकी अच्छी ऊँचाई, क्योंकि लगभग सभी स्कूटरों की ऊँचाई थोड़ी कम ही होती थी, और ब्रेवो का पिकअप, गजब का पिकअप था।
इसी बीच दोस्तों की बाईक राजदूत, यमाहा RX100 और कावासाकी बजाज मेरे मनपसंदीदा बाईक रहीं।
राजदूत थोड़ी भारी मोटरसाईकिल थी और उसमें किक पलट कर मारती थी, जिससे कई बार पैर में भी चोट खाई है, उस समय राजदूत का माईलेज लगभग ४० किमी मिलता था, और लगभग हर दूधवाले और पुलिसवाले के पास राजदूत ही होती थी। सबसी अच्छी मुझे राजदूत की चाबी लगती थी, बिल्कुल अलग तरह की, शायद आज तक किसी और बाईक की चाबी वैसी बनी ही नहीं है।
यमाहा RX100 मेरी सबसे करीब रही, इसमें सबसे अच्छी चीज जो मुझे भाती थी वह था इसका पिकअप और आवाज। हमने कई बार साईलेंसर की आधी गुल्ली काटकर लगाते थे, तभी ओरिजनल आवाज आती थी। आज  भी अगर यह बाईक मेरे पास से निकल जाती है तो बिना देखे पता चल जाता है कि RX100 आ रही है।
कावासाकी बजाज ने जब पहली बार बाईक भारत में लाई तो मेरे दोस्त के पास जापान वाला ओरिजनल मॉडल था, और झाबुआ के माछलिया घाट जो कि लगभग १० किमी का बड़ा घाट है, उतार पर हाथ छोड़कर वह घाट पार करने जाते थे। एक बार उसी बाईक से एक दुर्घटना भी हुई, हम घूमने गये थे और बाईक लगभग ८० की रफ़्तार पर चल रही थी और उसमें आईल खत्म हो गया था, जिसका हमें पता ही नहीं था, उसके पिस्टन चिपक गये और हम बहुत दूर तक घिसटते हुए गये, फ़िर एक वाहन में रखकर बाईक वापस लाये थे। खैर बाद में वह ओरिजिनल पिस्टन नहीं मिला। उस समय ओईल हम केस्ट्रोल का उपयोग में लाते थे। www.facebook.com/CastrolBiking
इसी बीच मेरे पास एक बाईक आयी टीवीएस की मैक्स 100 जो कि मेरी सबसे पसंदीदा बाईक रही, उसका पिकअप और उसकी आवाज का तो मैं दीवाना था और यह बाईक भी दूधवालों के पास बहुत प्रसिद्ध रही। यह बाईक मेरे पास लगभग २ वर्ष रही और इस बाईक से मैंने उज्जैन के आसपास के लगभग सारी जगहें घूम डाली थीं, लगभग हर गाँव भी। इस बाईक से मुझे लांग ड्राईव पर जाना बहुत अच्छा लगता था, और खासकर सुबह जब सूरज आसमान पर चढ़ रहा होता था, और मैं खेतों के बीच यह बाईक लेकर घूमा करता था।
फ़िर मेरे पास आई बजाज की सीडी १००, माईलेज और मैंन्टेनेन्स के लिहाज से बहुत अच्छी बाईक है, और इससे मैंने इंदौर बहुत आना जाना किया एक एक दिन में मैं इससे लगभग १५० किमी तक की सवारी कर लिया करता था। इसका पिकअप थोड़ा कमजोर था, परंतु बाकी मामलों में ठीक थी।
इसके बाद थोड़े दिन हमने हीरो हांडा और पल्सर के भी मजे लिये, अब बैंगलोर में आकर फ़िर बाईक की जरूरत पड़ी तो हमने फ़िर सुजुकी मैक्स 100 का पता किया तो पता चला कि वो तो कब की कंपनी ने बंद कर दी है। हमें सुजुकी का इंजिन बेहद पसंद है और इसकी मशीन के आगे हमें और किसी कंपनी की बाईक की मशीन पसंद ही नहीं है, फ़िरThunderbird सोचा कि रॉयल एनीफ़ील्ड की थंडरवर्ल्ड बुलेट ली जाये जो कि 350 सीसी की है परंतु बैंगलोर में इसका वैटिंग पीरियड लगभग १० महीने का था और हमें बाईक एकदम चाहिये थी, अब चूँकि वजन बड़ चुका है इसलिये 100 सीसी की बाईक से काम नहीं होने वाला था, इसलिये हमने 125 सीसी की बाईक लेने की सोची, जिससे पिकअप और माईलेज अच्छा मिले।
suzuki sling shot plus
हमने ली सुजुकी स्लिंगशॉट प्लस हाईएन्ड मॉडल जिसमें ऑटो स्टार्ट और एलॉय व्हील हैं। और इसकी बैठने के लिये सीट बहुत ही आरामदायक है, बाईक को इस तरह से डिजाईन किया गया है कि अगर दो लोग भी बैठे हैं और बाईक रफ़्तार में है तो इसका बैलेन्स नहीं बिगड़ेगा, इसकी पीछे वाली सीट ऊँची दी गई है।
ऐसी बहुत सारी बाईकें जो मैंने चलाई हैं उन सभी को मैं यहाँ शामिल नहीं कर पाया परंतु बाईक की दीवानगी आज भी सिर चढ़कर बोलती है।  आज भी बाईक को चलाते समय ऐसा लगता है कि मैं बहुत ऊर्जावान घोड़े पर बैठ सवारी कर रहा हूँ। आज भी मेरा सपना है कि मैं पूरा राजस्थान बाईक से घूम कर आऊँ। देखते हैं कि यह सपना कब पूरा हो पाता है।
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बैंगलोर में प्रोजेक्ट, पिता परिवार से दूर और छोटे बच्चे पर उसका प्रभाव

हमारे एक मित्र हैं जो कि पिछले ६ महीने से बैंगलोर में प्रोजेक्ट के कारण अपने परिवार से दूर हैं। हालांकि माह में एक बार वे अपने परिवार से मिलने जाते हैं, उनका एक छोटा बच्चा भी है जो कि ४ वर्ष का है। कल उनसे ऐसे ही बातें हो रही थीं, तो बहुत सारी बातें अपनी सी लगीं, क्योंकि यही सब मेरे साथ मेरे अतीत में गुजर चुका था। ऐसा लगा कि वे अपनी नहीं मेरी बातें कह रहे हैं, फ़िर मैंने कुछ बातें बोलीं तो उनसे वे भी सहमत थे।
मैं अपने परिवार के साथ अब लगभग पिछले तीन-चार वर्षों से रह रहा हूँ उसके पहले दो वर्ष लगभग ऐसे बीते कि मैं हमेशा क्लाईंट लोकेशन पर ही रहता था और वहाँ परिवार को ले भी नहीं जाया सकता था, क्योंकि सब प्रोजेक्ट पर निर्भर था, और प्रोजेक्ट अस्थायी होते हैं। जैसे ही प्रोजेक्ट खत्म हुआ अपनी बेस लोकेशन पर वापसी हो जाती है।
पिछले तीन-चार वर्षों में भी क्लाईंट के पास जाना हुआ परंतु वहाँ रहना लंबा नहीं होता था, अब हमारी टीम वहाँ रहती थी और हम किसी जरूरी काम से ही जाते थे।
मित्र से बात हो रही थी, कह रहे थे कि अब बेटा फ़ोन पर कहता है कि आपसे बात नहीं करनी है। बीबी भी कभी कभी नाराज हो जाती है, अब ये सब तो ऐसी परिस्थितियों में चलता ही रहता है, क्योंकि जब पति और पिता बाहर हों और सांसारिक परिस्थितियों का अकेले मुकाबला करना हो तो इस तरह की बाधाएँ आती ही हैं।
बेटे को मनोचिकित्सक के पास दिखाया तो मनोचिकित्सक ने हमारे मित्र को राय दी कि आप कैसे भी करके जल्दी से अपने परिवार के साथ रहें तो सब के लिये यह अच्छा होगा। उनका बेटा  बहुत जिद्द करने लगा है, मम्मी की सुनता नहीं है, खाना नहीं खाता है। मित्र ने बताया कि पहले बेटा मुझसे बहुत खेलता था परंतु आजकल वैसा नहीं है, हमने कहा कि अब बेटॆ को लगता है कि शायद उससे भी कोई जरूरी चीज है जो कि पापा को मुझसे दूर ले गई है, अब इस उम्र में बच्चे को समझाना नामुमकिन है। उसके कोमल मन में तो है कि पापा मम्मी हमेशा मेरे साथ रहें। जब वे पिछली बार बैंगलोर आ रहे थे तो अपने बेटॆ को बोले कि मैं बैंगलोर जा रहा हूँ, तो बेटा साधारण तौर पर बोला कि ठीक है जाओ। इतनी साधारण तरीके से बोलना देखकर हमारे मित्र को  भी बहुत बुरा लगा और दूर रहने का प्रभाव दिखने लगा।
हमारे मित्र की बातें सुनकर हमें भी अपने पुराने दिन याद आ गये। जब हम भी ऐसे ही घर जा पाते थे, जैसे ही हम अपना बैग पैक करते थे तो पहले तो हमारा बेटा बैग के पास ही रहता था कि पता नहीं डैडी कब चले जायें, और जाने के समय बहुत रोता था, बहुत प्यार करके मैं उसको चुप करवाकर जाता था। बहुत दिनों तक ऐसा चला फ़िर धीरे धीरे मेरे बेटे को इस सब की आदत पड़ गई, और वह मेरे जाने के प्रति लापरवाह हो गया। कुछ दिनों बाद पता नहीं क्या हुआ वह हमारा आने का बेसब्री से इंतजार करता और बहुत प्यार करता। उस समय मैं मुंबई में था और वह हमसे कहता कि हमें भी मुंबई देखना है, हमें मुंबई ले चलो, बस उसके कहने भर की देर थी और लगभग उसी समय हमारा प्रोजेक्ट खत्म हो गया, तो एकदम हमने परिवार को मुंबई ले गये।
जीवन का वह दौर आज भी याद है, इतनी मुश्किल इतनी कठिनाईयाँ जो कि छोटी छोटी होती हैं, परंतु अपने आप में उनका सामना करना बहुत ही कठिन होता है, और ये ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता है। ऐसा दौर हमने भी देखा है परंतु उस समय तक हम समझदार हो चुके थे, इसलिये हमें बातें समझ में आती थीं, परंतु छोटे बच्चों से उनका बचपन में अगर यह कहा जाये तो शायद बहुत ही जल्दी होगी।
हमने भी मित्र को सलाह तो दी है अच्छा है कि जल्दी अपने परिवार के पास जाओ या अपने परिवार को यहाँ ले आओ, पर आई.टी. में प्रोजेक्ट जो ना करवाये वह कम है।