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भारतीय मानसिकता घाटे में बाहर निकलने की नहीं है

हाल ही में ऐसे बहुत सारे लोगों से मिलना हुआ जो कि शेयर बाजार की समझ नहीं रखते परंतु फ़िर भी शेयर बाजार में अपना निवेश कर बैठे थे, वह भी तब मतलब कि २००८ – २००९ जब बाजार अपनी उच्च अवस्था पर था। उस समय हालात यह थे कि जिसको कुछ पता नहीं था वह भी शेयर बाजार में रूचि लेने लगा था और अपना निवेश बाजार में करके उस रैली का फ़ायदा उठाना चाहता था, परंतु उसे शेयर बाजार के मुगलों की जानकारी नहीं थी, जैसे ही आम आदमी का पैसा शेयर बाजार में आया, मुगलों ने अपनी कारीगरी दिखाई और बाजार को आसमान से उठाकर जमीन पर पटक दिया।

और ये नये निवेशक केवल बाजार को औंधे मुँह गिरते देखते रहे, चूँकि इन्होंने अपने गाढ़ी कमाई का पैसा लगाया था तो सोचा कि घाटा लेने से अच्छा है कि थोड़ा इंतजार कर लिया जाये और जब अपने भाव मिल जायेंगे तब बाजार से बाहर हो जायेंगे, परंतु उनका दुर्भाग्य कि वह दिन कभी नहीं आया। क्योंकि उन दिनों अच्छी कंपनियों के साथ साथ बेकार कंपनियों के भाव भी आसमान छू रहे थे, ये नवागत निवेशक अपने आप को उस बाजार में शामिल कर अपने आप को फ़न्ने खाँ समझ रहे थे। आज की हालात में भी उनके पोर्टफ़ोलियो ७०% घाटा दर्शा रहे हैं, हम तो उन्हें अब भी यही सलाह दे रहे हैं कि ३०% जो मिल रहा है उसे निकालकर किसी अच्छी म्यूचयल फ़ंड में डाल दो, तो अगले कुछ अरसे में कम से कम आपने जितना पैसा लगाया था उतना तो हो ही जायेगा।

किंतु भारतीय मानसिकता घाटे में बाहर निकलने की नहीं है, हमें तो बस सुनहरे स्वप्न देखने को चाहिये, जब घाटा होता है तो कहते हैं कि अपनी तो किस्मत ही खराब थी, और जब मुनाफ़ा होता है तो कहते हैं देखा अपनी अक्ल का कमाल, हारना किसी को अच्छा नहीं लगता । परंतु निवेश जो कि आम इंसान अपनी गाढ़ी कमाई से करता है उसे अपने निवेश को हमेशा व्यावसायिक नजरिये से देखना चाहिये।

हमेशा निवेश करते समय अपना घाटा सहने की शक्ति का आकलन कर लें, हमेशा स्टॉप लॉस लगाकर बाजार में निवेश करें, अगर अच्छी कंपनी में निवेश कर रहे हैं तो उसके अच्छे परिणामों का इंतजार भी करें। परंतु हमारे भारतीय निवेशक करते हमेशा उल्टा हैं। बाजार में निवेश का कोई समय बुरा नहीं होता, फ़िर भले ही इन्डेक्स कम हो या ज्यादा । केवल निवेशक को अपनी रकम ऐसी कंपनी में निवेश करनी चाहिये जो उस समय कम भाव पर हो, और इसके लिये तगड़े विश्लेषण और अपने कुछ अच्छे जानकारों की सलाह लेनी चाहिये।

जैसे कि घाटे के लिये आकलन करना चाहिये बिल्कुल वैसे ही मुनाफ़े का भी पहले से आकलन करना चाहिये, अगर १०% के मुनाफ़े की उम्मीद कर रहे हैं तो बेहतर है कि उतने पर ही मुनाफ़ा लेकर बाहर हो जायें, परंतु हमारे यहाँ के निवेशक इस पर भी ध्यान नहीं देते, हमारे यहाँ के निवेशक को जरूरत है बेहतर विश्लेषण की जो कि उसे खुद करना चाहिये, हमेशा ध्यान रखें अगर कोई निवेशक को टिप दे रहा है कि फ़लाना शेयर खरीद लें या बेच दें तो उसमें कहीं ना कहीं उसका निजी स्वार्थ है। कार्य हमेशा वही करना चाहिये जिसमें आपको खुद ज्ञान हो, दूसरों के भरोसे दुनिया में कभी नहीं चला जाता, दूसरों के भरोसे चलने वाले हमेशा धोखा ही खाते हैं। बेहतर है कि पहले सीखें और फ़िर कुछ करें ।

रात्रि का सफ़र और दिन भर नींद

    इस बार सफ़र कुछ जल्दी ही हो गया, केवल तीन दिन ही भारत में परिवार के साथ व्यतीत कर पाये थे कि तीसरे दिन की रात्रि को ही घर से निकलना था, क्योंकि सुबह ४.३० बजे की फ़्लाईट थी और अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिये ३ घंटे पहले पहुँचना होता है, वैसे तो वेब चेक इन कर लिया था, तो १.५ घंटे पहले भी पहुँचते तो काम चल जाता । परंतु हमने सोचा कि दो बजे तो निकलना ही है उसकी जगह १२ बजे ही निकल लेते हैं, अगर नींद नहीं खुली तो खामखाँ में घर पर ही सोते रह जायेंगे, और फ़िर २ बजे जरा नींद ज्यादा ही आती है, तो टैक्सी ड्राइवर साब भी झपकी मार लिये गाड़ी चलाते हुए तो बस कल्याण ही हो जायेगा।

समय से मतलब कि १ बजे रात्रि को हवाई अड्डे पहुँच गये, सोचा इतनी जल्दी भी क्या करेंगे, उधर जाकर । पहले कैफ़ोचीनो पीते हैं आराम से और फ़िर थोड़ी देर बैंगलोर की रात की ठंडक के मजे लेते हैं। जींस के जैकेट में भी ठंडक कुछ ज्यादा ही लग रही थी, सो ज्यादा देर बैठने का आनंद भी नहीं लूट पाये। चाँद की हसीन रोशनी में कोहरा देखना कभी कभी ही नसीब होता है। हवा में भरपूर नमी थी, और जितने भी लोग घूम रहे थे या बैठे थे, वे अपने भरपूर गरम कपड़े होने के बावजूद ठिठुर रहे थे। वैसे भी बैंगलोर में इस तरह से रात बिताने का संयोग से बनता है।

खैर जल्दी ही चाँद के आँचल से निकल कर हवाईअड्डे की पक्की इमारत के आगोश में आ गये। पता चला कि फ़्लाईट एक घंटा देरी से है, सोचा कि पहले लगता था कि केवल ट्रेन और बस ही देरी से चलते हैं और तो और ये हवाई कंपनी वाले एस.एम.एस. भी नहीं करते हैं । जब चेक इन के काऊँटर पर देखने पहुँचे तो लंबी लाईन लगी थी, और वेब चेकइन की लाईन खाली थी, हमारे एक और मित्र भी मिल गये थे लाईन में लगने के पहले, तो दोनों साथ ही चेक इन की लाईन में लग लिये और कब एक घंटा बातों में व्यतीत हो गया, पता ही नहीं चला, जब काऊँटर पर पहुँचे तो अधिकारी महोदय मुस्कराकर बोले कि आपने तो वेबचेक इन कर लिया था फ़िर इधर, हम कहे नींद नहीं आ रही थी, तो सोचा कैसे टाईम पास किया जाये सो लाईन में लग लिये, वे भी हँस पड़े। इमिग्रेशन फ़ॉर्म भरने के बाद इमिग्रेशन और सुरक्षा की बाधाएँ पार कीं, तो पाया सब हिन्दी बोलने वाले थे, और सुरक्षा में जो अधिकारी मौजूद थे वे तो ठॆठ हिन्दी बोल रहे थे, जैसे कि अधिकतर उत्तर भारत के राज्यों में बोली जाती है।

फ़िर लंबी कुर्सी पर लेट लिये पर नींद को हम आने नहीं दे रहे थे क्योंकि ३ घंटे बचे थे और एक बार हम सो जायें तो उठने की गारंटी तो अपनी है नहीं, तो बेहतर था कि जागकर नींद को न आने दिया जाये। जब फ़्लाईट में घुस गये तो सुबह के पाँच बज चुके थे और साढ़े पाँच को उड़नी थी, अपन तो कंबल ओढ़कर सो लिये।

लगभग चार घंटे की फ़्लाईट में पूरा समय सोकर निकाला, जब सुबह अबूधाबी पहुँचे तो केवल आठ ही बज रहे थे, याने की भारत में दस, हम समय से दो घंटे तेजी से भाग लिये थे, और अब हमें फ़िर ७ घंटे का इंतजार करना था, सो फ़िर लंबी आराम कुर्सी पकड़ी और सो लिये । घर से परांठे बनवाकर लाये थे, जब भूख लगी खाकर फ़िर सुस्ता लिये।

आखिरकार आठ घंटे इंतजार करने के बाद अपनी अगली फ़्लाईट का वक्त हो गया और सऊदी पहुँच गये, इधर भी पूरी फ़्लाईट में सोते सोते गये। इमिग्रेशन में १ घंटा लग गया फ़िर आधे घंटे में होटल पहुँच गये और फ़िर जल्दी ही शुभरात्रि कर बिस्तर में घुस गये।

कुछ फ़ोटो खींचे थे, अबूधाबी के ऊपर से वो हमारे टेबलेट में पड़े हैं, अभी लोड करने में आलस आ रहा है, तो फ़ोटो अगली पोस्ट में लगा देंगे।

स्नूज कार्यक्रम और सुबह का आलस

अगर ऑफ़िस जाने का समय जल्दी का हो तो सुबह उठने में कभी कभी आलस्य आने लगता है, रोज उसी समय उठो, रात को रोज अलार्म चेक करो कि हाँ भई अलार्म चल भी रहा है, जब से मोबाईल में अलार्म लगाने लगे हैं, तो मोबाईल झट से गणना करके बता भी देता है कि कितने घंटे और कितने मिनिट अलार्म बजने में लगे हैं, और लगता है कि अरे केवल इतनी ही देर सोने को मिलेगा।

सुबह उठना बचपन से अच्छा लगता है, ऐसा नहीं है कि अब नहीं लगता परंतु कभी कभी देर तक सोने की इच्छा हो जाती है और ये अलार्म इतनी जल्दी बज जाता है कि बस, ऐसा लगता है कि अभी अभी सोये थे और इतनी जल्दी सुबह हो गई, अभी नई अलार्म लगाया है जिसमें पक्षिओं के कोलाहल के बीच मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है, इस अलार्म को सुनकर तो नींद और लेने का मन करता है, ऐसा लगने लगता है कि कहीं बागीचे में ठंडी बयार में घास पर लेटे हुए इन आवाजों को सुन रहे हैं।

अभी कम से कम रोज ४-५ बार तो स्नूज करना पड़ता है ५ मिनिट के स्नूज में फ़िर भी २०-२५ मिनिट सो जाते हैं, इसे कहते हैं अर्धचेतन अवस्था, और जो सपना पूरा नहीं हो पाता है, उसे फ़ास्ट फ़ार्वर्ड करके पूरा कर लेते हैं।

स्नूज का कार्यक्रम अच्छा लगा मोबाईल में, नहीं तो पहले जब घरवाले उठाते थे तो कभी कभी प्रवचन से दिन की शुरूआत होती थी, पर अब अलार्म ने आसान कर दिया है, पहले वाली घड़ी में स्नूज वाला कार्यक्रम नहीं था।

दिन भर एक्सेल, वर्ड, पीडीएफ़ और ईमेल में गुजरता है, लंबे लंबे फ़ोन कॉल होते हैं, कभी पढ़ते हुए कभी सुनते हुए और कभी बोलते हुए उन तन्हाईयों में भी कोई विचार आ जाता है। पता नहीं ये विचार कहाँ कितनी जगह लेते हैं, जरा सी स्पेस मिली नहीं और विचार घुस जाता है। जो दिन भर करते हैं वही सपने रात में आते हैं, कभी किसी एक्सेल शीट में काम कर रहे होते हैं और काम चल रहा होता है, गणनाएँ कठिन होती हैं तो रात को सपने में भी वहीं एक्सेल शीट घूम रही होती है, और सपने में भी उसके सॉल्यूशन पर काम चलता रहता है।

कई बार ऐसा लगता है कि लंच के बाद ऑफ़िस खत्म हो जाना चाहिये, लंच के बाद घनघोर आलस आता है, मुँह में उबासी और आँखों में नींद होती है। पर जब कार्य होता है तो कार्य तो करना ही पड़ता है।

हम स्नूज कार्यक्रम का अच्छा उपयोग कर रहे हैं, अब सोचते हैं कि कोई मोबाईल ऐसा नहीं आये जिसमें नहीं उठने पर वो करंट मार दे या पानी की बाल्टी डाल दे ।

स्वप्न की पटकथा के लेखक और अभिनयकर्ता

स्वप्न हमारी मूर्क्षित जिंदगी के वे पल होते हैं जहाँ हम हमारे आसपास की घटनाओं और आसपास रहने वाले व्यक्तियों को देखते हैं। दिनभर में जो भी घटना हम पर प्रभाव डालती है उससे जुड़ी वे बातें जो हम देखना चाहते हैं और वास्तव में देखी नहीं हैं, वास्तव में स्वप्न में अपने आप वह कहानी बुन जाती है और हम उसे फ़िल्म जैसा देखते हैं।

कई बार हम अपने स्वप्न की कहानी खुद चला रहे होते हैं और यहाँ तक कि जो कार्यकलाप हम स्वप्न में देख रहे होते हैं, उन कार्यकलापों में हम उन वास्तविक व्यक्तियों की प्रतिमूर्ति अभिनय के रूप में देख रहे होते हैं, जिन्हें हम जानते हैं कि यह व्यक्ति इन कार्यकलापों में संलग्न है या अच्छा करता है।

स्वप्न अकारण भी नहीं होते हैं शायद प्रकृति की देन है कि हम स्वप्न में भी मनोरंजन चाहते हैं, और उस आनंद की अनुभूति करना चाहते हैं, जो वास्तव में कहीं पर भी नहीं है, देशकाल वातावरण कहीं का भी हो सकता है, जहाँ वास्तव में स्वप्नदर्शी गया ही नहीं हो, परंतु इस का एक बिंदु यह भी है कि व्यक्ति स्वप्न में अपनी सारी क्षमताओं का प्रदर्शन करता है, जो कि वास्तव में उसके पास होती ही नहीं हैं, यह भी कह सकते हैं कि उन क्षमताओं को व्यक्ति पाना चाहता है परंतु वास्तविक जिंदगी में वह पा नहीं सकता या उतना दृढ़ नहीं बन पाता कि वह उन क्षमताओं का अधिकारी पात्र हो।

स्वप्न अर्धचेतन अवस्था में भी होते हैं, जिसमें हम आधे जड़ और आधे चेतन होते हैं, जिसमें स्वप्न की कहानी की डोर स्वयं स्वप्नदर्शा के पास होती है, परंतु अर्धचेतन होने पर भी वह अपना स्वप्न पूर्ण कर पाता है, अधिकतर ऐसे स्वप्न प्रात:काल उठने के पहले होते हैं, यह वह समय होता है जब व्यक्ति अर्धचेतन अवस्था में अपने स्वप्न को किसी फ़िल्म की तरह अपने रंगमंच पर अपने कलाकारों के साथ बुन रहा होता है।

स्वप्न हमेशा वैयक्तिक चिंतन से संबंधित होते हैं, जैसा चिंतन पार्श्व मष्तिष्क में चल रहा होता है, वही स्वप्न की पटकथा निर्धारित करता है, बेहतर है कि हम अच्छे वातावरण में अच्छे विचारों के साथ रहें और अच्छे स्वप्न देखें।

हम लोकतंत्र के ऊपर गर्व कब कर पायेंगे।

    जनता का गुस्सा उबल रहा है, जनता क्रोध में उफ़न रही है, पर हमारी सरकार है कि सो रही है । सरकार को जनता को गंभीरता से लेना कभी आया ही नहीं है, यह गुण इन्हें अंग्रेजों से विरासत में मिला है। शनिवार को जो भी कुछ विजय चौक और इंडिया गेट पर हुआ है उससे तो यही साबित होता है कि हम लोकतंत्र में नहीं रहते हैं, हम अब भी अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम हैं।

    नहीं चाहिये हमें ऐसी सरकार जो हमारे लोकतंत्र के हक को हमसे छीने, जिन लोगों को अपनी भाषा की मर्यादा और अपने ऊपर ही संयम नहीं हैं वो क्या जनता को इसकी सीख दे रहे हैं। जब जनता सड़क पर आती है तो क्रांतियाँ होती हैं। जनता सड़क पर अपना मौलिक अधिकार के लिये है, ना कि सरकार का विरोध करने के लिये सड़क पर उतरी है।

    फ़िर भी सरकार अपनी पूरी ताकत इस जनता के ऊपर लठ भांजने में और आंसू गैस के गोले छोड़ने में लगा रही है। क्या बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के खिलाफ़ अपनी आवाज उठाना अपराध है ? क्या ये लोग वाकई कानून तोड़ रहे हैं ? क्या ये हिंसक तरीके से प्रतिरोध कर रहे हैं ?

    शरम आती है मुझे कि मैं ऐसे लोकतंत्र का नागरिक हूँ और ऐसी सरकार इस लोकतंत्र को चला रही है। केवल कहने के लिये लोकतंत्र है, बाकी सब अंग्रेज तंत्र है, अंग्रेजों की बर्बरता के सारे गुण लोकतंत्र को चलाने वालों के जीन में रचे बसे हुए हैं, जनता के बीच जाकर उनकी बात सुनकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले कहते हैं कि हमारी भी लड़कियाँ हैं, हमें भी भय है, कितनी हास्यास्पद बात है। सारी पुलिस तो लोकतंत्र के इन कथित चालकों और परिवारों की सुरक्षा में लगी है।

    लोकतंत्र में वोट देने का अधिकार होता है जिससे आप अपने नेता का चुनाव कर सकते हैं और सरकार बना सकते हैं, परंतु ऐसे लोकतंत्र का को कोई मतलब नहीं है जहाँ जनता की आवाज को दबाया जाये और कुचला जाये।

    आज मन बहुत दुखी है, सुबह पुलिस  विजय पथ और इंडिया गेट से प्रदर्शनकारियों को अपनी तथाकथित ताकत दिखाकर कहीं अज्ञात स्थान पर ले गई है, सरकार और पुलिस इतने डरे हुए क्यों हैं, उनकी तो केवल कानून में बदलाव की माँग है, वो पुलिस या सरकार को भारत छोड़कर जाने को तो नहीं कह रहे हैं।

    पता नहीं कि हम लोकतंत्र के ऊपर गर्व कब कर पायेंगे।

बैंगलोर पासपोर्ट की ऑनलाइन सेवा याने कि भ्रष्टाचार (Bangalore Passport online seva means Corruption)

    सरकार ने लगभग २ वर्ष पहले पासपोर्ट कार्यालय और पुलिस के भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवाते हुए, पासपोर्ट की प्रक्रिया ऑनलाइन की थी। मैंने खुद लगभग १.८ वर्ष पहले पासपोर्ट बनवाया था और इस प्रक्रिया का साक्षात अनुभव किया था। पासपोर्ट कार्यालय में केवल २ घंटे की अवधि में मेरा पूरा कार्य हो गया था, सरकार ने ऑनलाईन प्रक्रिया करते हुए प्रोसेसिंग का कार्य टीसीएस को ऑउटसोर्स कर दिया था।
    अभी मेरे ऑफ़िस के कुछ मित्रों को पासपोर्ट बनवाना था तब यह भ्रष्टाचार हमारे सामने आया । जनता समझती है कि अगर सरकार सुविधाएँ ऑनलाइन कर दे उसको सुविधाएँ मिलने लगेंगी। पहली बार जब IRCTC के द्वारा रेल्वे ने ऑनलाइन टिकट की सुविधा दी थी, तब भी हमने सोचा था कि अब टिकट आराम से मिल जाया करेगा । IRCTC की ऑनलाइन सुविधा का दुरूपयोग जिस तरह से एजेन्टों की मदद से किया गया वह तो सर्वविदित है, अब IRCTC की सुविधा फ़िर भी बहुत कुछ ठीक है।
    पासपोर्ट के आवेदन के लिये पासपोर्ट केन्द्र की वेबसाईट पर जाना होता है और आवेदक को अपना user id  बनाना होता है। फ़िर आवेदक को आवेदन भरकर ऑनलाइन ही eForm जमा करना होता है, जिससे पासपोर्ट वेबसाइट एक यूनिक आवेदन नंबर देती है। उस eForm की प्रक्रिया होने के बाद आवेदक को पासपोर्ट सेवा केन्द्र की वेबसाइट से अपांइटमेंट लेना होता है जो कि आजकल दो दिन पहले खोलते हैं और उसमें PSK kendra चुनना होता है फ़िर एक captcha भरना होता है, उसके बाद समय को चुनना होता है, यह पन्ना कभी खुलता ही नहीं है।
    यह अपांइटमेंट की प्रक्रिया शाम ६ बजे शुरू होती है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बैंगलोर में ४ PSK kendra हैं और हर PSK kendra पर लगभग ६०० अपांइटमेंट होते हैं और लगभग शाम ६ बज कर १ मिनिट पर सारे अपांटमेंट खत्म हो चुके होते हैं। हमारे मित्र लगभग १० दिन तक यही प्रक्रिया करते रहे परंतु हरेक बार नाकाम रहे, फ़िर उन्होंने कुछ फ़ोरमों में जाकर देखा, तो पता चला कि ये काम भी आजकल एजेन्ट कर रहे हैं। उन्होंने justdial.com पर जाकर passport agent in bangalore के लिये बोला और झट से उन्हें १० से ज्यादा फ़ोन नंबर मुहैया करवा दिये गये, उन्होंने लगभग सभी को फ़ोन लगाया और सभी से एक समान जबाब मिला कि आपको ग्यारन्टीड अपांइटमेंट मिल जायेगा, आप चिंता न करें हमारी फ़ीस ८०० रूपये है।
    आऊटर रिंगरोड स्थित साँई आर्केड वाले PSK Kendra के लिये उन्हें अपांइटमेंट मिला और उन्होंने बताया कि इसी PSK Kendra के सामने (Diagonal Opposite) एक गैस सिलेंडर रखे हुए दुकान जो कि कच्ची सी है टीन की है वह नजर आयेगी, वहाँ गैस का कोई कार्य नहीं होता है, पर वहाँ ३ एजेन्ट बैठे रहते हैं और यही सब करते हैं।
    क्यों इस भ्रष्टाचार पर मीडिया भी चुप है समझ नहीं आता ? और ऊपर से यह लाईन हमें मुँह चिढ़ाती है –
Passport Seva Project Wins CSI-Nihilent e-Governance Award for Excellence

मैले मन, बेशर्मी की चादर, उच्चशिक्षितों से तो अनपढ़ अच्छॆ ?

    रोज सुबह अपने ऑफ़िस जाते समय एक जगह ट्रॉफ़िक ऐसा होता है, जहाँ कोई सिग्नल नहीं है, और मुख्य सड़क है । यह ट्रॉफ़िक जाम एक मुख्य सिग्नल से मात्र ५०-१०० मीटर दूर ही है, परंतु पुलिस के भी मात्र एक या दो जवान ही होते हैं जो शायद वह नियंत्रित नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें वह मुख्य सिग्नल संभालना भारी पड़ता है, वे भी बेचारगी की अवस्था में देखते रहते हैं।

    सब जल्दी जाने के चक्कर में ट्रॉफ़िक के सारे नियम कायदे कानून ताक पर रखकर बीच सड़क पर लोगों का रास्ता रोककर खड़े होते हैं। जितने भी लोग अपने दोपहिया और चारपहिया वाहन लेकर खड़े होते हैं वे सब तथाकथित आईटी की बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करने वाले, पढ़े लिखे और उच्चशिक्षित लोग होते हैं। इन उच्चशिक्षित लोगों को नियम की अवहेलना करना और दुखी कर जाता है।

 11122012(001)11122012

ये दो फ़ोटो मैंने अपने मोबाईल से लिये हैं..

   कई बार सोचता हूँ कि इनसे पूछा जाये कि क्या आप पढ़े लिखे हैं ? क्या आपको परिवार ने संस्कार दिये हैं, अगर नियम पालन करवाने वाले बेबस हैं तो क्या आप भी संसद में बैठे नेताओं जैसी असंसदीय कार्यों में लिप्त होना चाहेंगे ? क्या आप वाकई में शिक्षित हैं ? क्या आपके विद्यालय / महाविद्यालय में यही सिखाया जाता है ? क्या आप अपने बच्चे को भी यही सब सिखाना चाहेंगे ?

    पर मन की कोफ़्त मन में ही दबी रह जाती है, आज की भागती दौड़ती जिंदगी में सबके मन मैले हो चुके हैं, और बेशर्मी की चादर ओढ़ रखी है। चेहरे पर गलत करने की कोई शर्म नजर नहीं आती । बेशर्मी से बीच सड़क पर खड़े होकर दूसरी ओर के वाहनों को नहीं निकलने देते हैं और खुद न आगे जा सकते हैं और ना पीछे जा सकते हैं।

    इन पढ़े लिखे नौजवन और नवयुवतियों को देखकर ऐसा लगता है कि अच्छा है कि लोग अनपढ़ ही रहें, पढ़ने लिखने के  बाद भी अगर नियम पालना नहीं आयें तो ऐसी पढ़ाई लिखाई किस काम की ?

    यही लोग जब दूसरे देशों में जाते हैं तो भीगी बिल्ली बन जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यहाँ अगर नियम तोड़ा तो कोई बचाने वाला नहीं है और भारत में नियम हैं जरूर मगर तोड़ने के लिये । अगर हम जिस तरह से प्रगति कर रहे हैं उसी तरह से अपने दिमाग और दिल को भी उन्नति की राह पर ले चलें तो कमाल हो जाये। भारत में लोग किसी भी नियम की परवाह नहीं करते।

जगह – ब्रुकफ़ील्डस से महादेवपुरा जाते हुए आईटीपीएल सिग्नल के बाद ५०-१०० मीटर के बीच, बैंगलोर

आचार्य चतुरसेन कृत “सोमनाथ” और मेरा दृष्टिकोण..

    आज आचार्य चतुरसेन कृत “सोमनाथ” उपन्यास खत्म हुआ, इस उपन्यास को पढ़ने के बाद कहीं ना कहीं मन और दिल आहत है, बैचेन है.. कैसे हमारे ही लोग जो कि केवल अपने कुछ स्वार्थों के लिये गद्दारी कर बैठे.. और आखिरकार जिन लोगों के लिये गद्दारी की गई, जिस वस्तु के लिये गद्दारी की गई.. वह भी उनसे दगा कर बैठी.. और जिन लोगों से गद्दारी की गई.. उन लोगों ने उन्हें छोड़ा भी नहीं..

    किसी ने जाति के नाम पर .. किसी ने स्त्री के प्रेम में .. किसी ने गद्दी के लिये .. किसी ने अपने स्वार्थ के लिये .. किसी ने अपने अपमान के बदले के लिये .. अपने ही देव अपने ही धर्म को कलुषित किया .. और दूसरे धर्म ने कुफ़्र और काफ़िर कहकर .. अनुचित ही धर्मों को और उसकी संस्कृतियों को तबाह किया..

    छोटी छोटी रियासतों में आपस की दुश्मनी ने गजनी के महमूद को सोमनाथ पर चढ़ाई के दौरान बहुत मदद की.. छोटे और बड़े साम्राज्यों ने अपनी आन बान और शान बचाने के लिये जिस तरह से गजनी के महमूद के आगे समर्पण कर दिया.. वह भारत के लिये इतिहास का काला पन्ना है.. और जिन्होंने अपने प्राण न्यौछावार कर .. मरते दम तक अपनी मातृभूमि की रक्षा की.. उन्होंने अपना नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अमिट स्यासी से लिखवा लिया है..

    पुरातनकाल में जब राजाओं का शासन होता था.. तब की कूटनीति और राजनीतिक चालों में बहुत ही दम होता था.. जितने भी कूटनीतिज्ञ और राजनीतिक अभी तक मैंने इतिहास की किताबों में पढ़े हैं.. वे आज की दुनिया में देखने को नहीं मिलते हैं.. इसका मुख्य कारण जो इतिहास से समझ में आता है वह है ब्राह्मणों का उचित सम्मान और वैदिक अध्ययन को समुचित सहयोग ।

    सोमनाथ में चौहान, परमार, सोलंकी, गुर्जर आदि राजाओं का वर्णन जिस शूरवीरता से किया गया है, उससे क्षत्रियों के लिये हम नतमस्तक हैं.. परंतु वहीं जहाँ इन राजाओं के शौर्य और पराक्रम को देखने को मिलता है .. वहीं इनमें से ही कुछ लोगों द्वारा पीठ में छुरा घोंपने का भी काम किया..

    सोमनाथ पर आक्रमण और सोमनाथ को ध्वस्त करने के बाद जिस तरह से प्रजा को गुलाम बनाकर उनपर अत्याचार किये गये.. और शब्दचित्र रचा गया है.. बहुत ही मार्मिक है.. हरेक बात पर महमूद को कर चाहिये होता था.. क्योंकि वह भारत में शासन करने के उद्देश्य से नहीं आया था .. वह आया था केवल भारत को लूटने के लिये.. धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने के लिये और इस्लामिक साम्राज्य को स्थापित करने के लिये..

    गजनी का महमूद भले ही कितना भी शौर्यवान और पराक्रमी रहा हो.. परंतु यहाँ पर आचार्य चतुरसेन ने महमूद की कहानी को जो अंत किया है वह थोड़ा बैचेन कर देता है.. परंतु यह भी पता नहीं कि वाकई इस गजनी के महमूद का सत्य कभी सामने आ पायेगा ।

आत्मसंकल्प या बलपूर्वक

किसी भी कार्य को करने के लिये संकल्प चाहिये होता है, अगर संकल्प नहीं होगा तो कार्य का पूर्ण होना तय नहीं माना जा सकता है। जब भी किसी कार्य की शुरूआत करनी होती है तो सभी लोग आत्मसंकल्पित होते हैं, कि कार्य को पूर्ण करने तक हम इसी उत्साह के साथ जुटे रहेंगे।

परंतु असल में यह बहुत ही कम हो पाता है, आत्मसंकल्प की कमी के कारण ही दुनिया के ५०% से ज्यादा काम नहीं हो पाते, फ़िर भले ही वह निजी कार्य हो या फ़िर व्यापारिक कार्य । कार्य की प्रकृति कैसी भी हो, परंतु कार्य के परिणाम पर संकल्प का बहुत बड़ प्रभाव होता है।

कुछ कार्य संकल्प लेने के बावजूद पूरे नहीं कर पाने में असमर्थ होते हैं, तब उन्हें या तो मन द्वारा हृदय पर बलपूर्वक या हृदय द्वारा मन पर बलपूर्वक रोपित किया जाता है। बलपूर्वक कोई भी कार्य करने से कार्य जरूर पूर्ण होने की दिशा में बढ़ता है, परंतु कार्य की जो मूल आत्मा होती है, वह क्षीण हो जाती है।

उदाहरण के तौर पर देखा जाये कि अगर किसी को सुबह घूमना जरूरी है तो उसके लिये आत्मसंकल्प बहुत जरूरी है और व्यक्ति को अपने आप ही सुबह उठकर बाग-बगीचे में जाना होगा और संकल्पपूर्वक अपने इस निजी कार्य को पूर्ण करना होगा। परंतु बलपूर्वक भी इसी कार्य को किया जा सकता है, जिम जाकर, जहाँ ट्रेडमिल पर वह चढ़ जाये और केवल पैर चलाता जाये तो उसका घूमना जरूर हो जायेगा, परंतु मन द्वारा दिल पर बलपूर्वक करवाया गया कार्य है। किंतु वहीं बाग-बगीचे में घूमने के लिये आत्मसंकल्प के बिना घूमना असंभव है, क्योंकि तभी व्यक्ति के हाथ पैर चलेंगे। जब हाथ पैर चलेंगे, उत्साह और उमंग होगी तभी कार्य पूर्ण हो पायेगा।

कार्य पूर्ण होना जरूरी है, फ़िर वह संकल्प से हो या बलपूर्वक क्या फ़र्क पढ़ता है, संकल्प से कार्य करने पर आत्मा प्रसन्न रहती है, परंतु बलपूर्वक कार्य करने से आत्मा हमेशा आत्म से बाहर निकलने की कोशिश करती है।