Tag Archives: मेरी जिंदगी

अब क्या चाहते हो तुम … मेरी कविता… विवेक रस्तोगी

अब

क्या चाहते हो तुम,

तुम्हारे लिये और क्या कर गुजरें

देखो तो सही

समझो तो सही,

क्या इतना कुछ काफ़ी नहीं है

अब बोलो भी,

आखिर क्या चाहते है तुम !!

मौन….?

(किसे कहना चाह रहे हैं, क्यों कहना चाह रहे हैं, उसकी ढूँढ़ जारी है, बाकी तो सबका अपना नजरिया है।)

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण..आगे..३ (श्रंखला पद्धति से टिकट मंगवाया गया) (Mumbai experience of Best Bus)

    आज घर से निकलने में तनिक १-२ मिनिट की देर हो गई, तो ऐसा लगा कि कहीं बस न छूट जाये, चूँकि  मुंबई की बस पीछे डिपो से बनकर चलती है, इसलिये हमेशा समय पर आती है। तो हम बिल्कुल मुंबईया तेज चाल से चलने लगे, जिससे बस मिल जाये और वाकई रोज जो दूरी हम ४ मिनिट में पूरी करते थे वह हमने लगभग ३ मिनिट में पूरी कर ली।

    बस स्टॉप से निकल चुकी थी, जैसा कि हमको अंदेशा था, परंतु हमको आता देख ड्राईवर ने आँखों से ही इशारा किया कि आगे के दरवाजे से ही चढ़ जाओ, पर हमें संकोच हुआ और हम पीछे के दरवाजे की ओर देखने लगे, तो ड्राईवर को लगा कि संकोच कर रहे हैं तो हाथों से इशारा कर बोला कि इधर से ही चढ़ जाईये।

    इतनी देर में हमें आगे से किनको चढ़ना चाहिये उसकी सूचना जो कि बस में लगी रहती है, आँखों के सामने घूम रही थी, पर फ़िर भी ड्राईवर जो कि अब हमें पहचानने लगा था क्योंकि रोज ही हम उनको नमस्ते करते थे, तो उन्होंने अपनी दोस्ती आज निभाई थी।

    फ़िर ध्यान आया कि मास्टर तो पीछे है, हमने जेब से पैसे निकाले और श्रंखला पद्धति से टिकट मंगवाया गया, तो हमें याद आया कि दिल्ली में भी डीटीसी की बस में ऐसे ही टिकट मंगवाते थे। आज हम जिस सीट के आगे खड़े थे वह थी अपंगों वाली सीट, थोड़ी देर में ही वह खाली हो गई, तो हम बैठ लिये कि अगर कोई सही उत्तराधिकारी आयेगा तो खुद ही उठ जायेंगे, आगे स्टॉप पर ही एक ज्येष्ठ सज्जन आये तो हम उठने लगे तो बोले नहीं बैठिये, हम बोले नहीं आप बैठिये, हालांकि ज्येष्ठ की परिभाषा बस में ६० वर्ष से अधिक उम्र की होती है, परंतु सफ़ेद बाल को देखकर हम उठ ही गये, हालांकि थोड़े थोड़े हमारे भी बाल सफ़ेद हैं, परंतु फ़िर भी उठ ही गये।

    उन सज्जन ने बैठते ही, अपनी पाकिट में से तीन गुटके निकाले पहले पढ़ा हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा फ़िर गौरी चालीसा (नाम ठीक से याद नहीं), हमारा भी साथ में हनुमान चालीसा हो गया, हालांकि उनका गुटका गुजराती में था, पर हमें याद था इसलिये कोई परेशानी नहीं हुई।

    ड्राईवर को फ़िर हँसते हुए नमस्ते करते हुए बस से उतर कर आज फ़िर बिल्कुल अपने समय से ऑफ़िस पहुँच गये। लालबागचा राजा के मन्नत के दर्शन करने के बाद हमारे क्यूबिकल के तीन लोग आये थे पूरे १७ घंटे लाईन में लगने के बाद उनको दर्शन हुए थे और वहाँ का प्रसाद भी हमें मिल गया।

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… आगे..२.. गरोदर स्त्रियाँ (Mumbai experience Best Bus)

    पिछली पोस्ट पर अरविन्द मिश्रा जी ने पूछा था कि गरोदर स्त्रियाँ कौन सी प्रजाति होती हैं, गर्भवती स्त्री को मराठी में गरोदर कहते हैं, सच कहूँ तो इसका मतलब तो मुझे भी नहीं पता था और न ही जानने की कोशिश की थी, परंतु अरविन्द जी ने पूछा तो ही पता किया।

    इसका मतलब जो स्त्रियाँ आगे के दरवाजे से बेस्ट की बसों में चढ़ती हैं, मतलब जवान स्त्रियाँ वे गरोदर होती हैं, बहुत कठिन है यह भी कहना, खैर सरकार ने जनता को सुविधा देने के लिये नियम बनाया है तो जो स्त्री गरोदर नहीं है वह भी आगे के दरवाजे से चढ़कर नियम तोड़ती हैं, बेचारा ड्राईवर भी क्या बोलेगा। नारी शक्ति से तो सभी का परिचय है। इसलिये पुरुष बेचारा अपनी शक्ति को छिपा लेता है।

    खैर छोड़िये नहीं तो अभी नारी शक्ति वाली आती होंगी काली पट्टी लिये और झाड़ू हाथ में लिये… हम क्या कहना चाह रहे हैं और वे क्या समझकर हमारी लू उतार दें।

    तो नियम केवल पुरुषों के लिये होते हैं, यह बात तो तय है, हमने बेस्ट की बस में चढ़कर जाना है। वैसे तो यह हम पहले से ही जानते हैं परंतु यह बात बेस्ट की बसों में चढ़कर कन्फ़र्म हो गई है।

    आज भी बस के लिये हम तो समय पर अपने स्टॉप पर पहुँच लिये परंतु बस थी कि आ ही नहीं रही थी, समय होता जा रहा था और बैचेनी बढ़ती जा रही थी, फ़िर १० मिनिट लेट बस आई, और हम चढ़ लिये, वैसे तो हमारे स्टॉप से चढ़ने वाले ३-४ लोग ही होते हैं, परंतु बस ठसाठस सी होती है, आखिरी में चढ़े यात्री को डंडा पकड़कर लटकना ही पड़ता है और १-२ मिनिट में ही बस के अंदर हो जाता है। आज आखिरी यात्री हम थे तो हमने जैसे ही डंडा पकड़ा देखा कि बेचारा डंडा भी जंग लगकर सड़ गया है तो उल्टे हाथ की तरफ़ वाला डंडा पकड़कर अंदर हो लिये।

    फ़िर वही राम कहानी सीट के पास खड़े होकर सफ़र करने की, मास्टर और ड्राईवर आज दोनों नये थे, ३-४ लड़के पास खड़े होकर बतिया रहे थे, और कहीं साक्षात्कार देने जा रहे थे। तो उनके डेबिट और क्रेडिट के सिद्धातों को सुन रहा था, बेचारे बोल रहे थे जो पढ़ा इतने साल सब पानी में, व्यवहारिक दुनिया में तो सब उल्टा होता है। अब बेचारा इंटर्व्यूअर भी क्या करे, जो उसे आता होगा वही तो पूछेगा ना, स्स्साले को क्या डेबिट और क्रेडिट भी नहीं पता होता है, और इतनी पढ़ाई करने के बाद हमें क्या समझा है कि हमें ये भी पता नहीं होगा। चल छोड़ न यार आज देखते हैं, कि आज के इंटर्व्यू में क्या होता है।

    तभी पीछे से एक लड़की धक्के मारते हुए आगे की ओर निकल गई और जबरदस्ती उल्टी हाथ की सीट की तरफ़ खड़ी हो गई, जबकि सीधे हाथ की ओर स्त्रियों की आरक्षित सीट होती है, और बड़ी आसानी से सीट मिल भी जाती है, कोई न कोई आरक्षित वर्ग उतरता रहता है और चढ़ता रहता है, और अगर नहीं होता है तो सीट बेचारी खाली ही जाती है, कोई नहीं बैठता, कब कौन कहाँ से आरक्षित वर्ग आ जाये कुछ बोल नहीं सकते।

    अब वह लड़की जहाँ खड़ी थी, थोड़े ही देर में वही सीट से बंदा उतर गया और आम आदमी की सीट आरक्षित वर्ग ने हथिया ली, और सीधे हाथ की एक सीट खाली पड़ी आरक्षित वर्ग के यात्री का इंतजार कर रही थी, हमें बहुत ही कोफ़्त हो रही थी, पर क्या करते चुपचाप शक्ति के आगे नतमस्तक थे, आखिर सरकार ने नियम बहुत सोच समझकर बनाया होगा।

    खैर जैसे तैसे करके अपना स्टॉप आया और बिल्कुल टाईम पर उतर गये, चले भले ही १० मिनिट लेट थे परंतु पहुँच समय पर ही गये, ड्राईवर ने क्या गाड़ी भगाई, बस मजा ही आ गया।

    ऑफ़िस पहुँचे तो सहकर्मियों से बात हुई, बताया गया कि वे लोग लालबागचा राजा के दर्शन करके आये हैं, शनिवार की रात को, और एक सहकर्मी से सिद्धिविनायक का प्रसाद भी खाने को मिला। दिन बढ़िया रहा।

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… आगे …१..सीट पर कब्जा कैसे करें (Mumbai Experience of Best Bus)

पिछली पोस्ट को ही आगे बढ़ाता हूँ, एक सवाल था “कंडक्टर को मुंबईया लोग क्या कहते हैं।” तो जबाब है – “मास्टर” ।

अगर कभी टिकट लेना हो तो कहिये “मास्टर फ़लाने जगह का टिकट दीजिये”, बदले में मास्टर अपनी टिकट की पेटी में से टिकट निकालेगा, पंच करेगा और बचे हुए पैसे वापिस देगा, फ़िर बोलेगा “पुढ़े चाल” मतलब आगे बढ़ते जाओ।

जैसे हमारे देश में आरक्षण है वैसे ही बेस्ट बस में आरक्षण को बहुत अच्छॆ से देखा जा सकता है, ४९ सीट बैठने की होती है, जिसमें उल्टे हाथ की पहली दो सीटें विकलांग और अपाहिज और फ़िर उसके बाद की दो सीट ज्येष्ठांचा लोगों के लिये आरक्षित होती हैं, सीधे हाथ की तरफ़ तो महिलाओं के लिये ७ सीटें आरक्षित होती हैं। याने कि लगभग ५०% आरक्षण बस में, जैसे हमारे देश में।

अनारक्षित सीटों पर महिलाओं और ज्येष्ठ लोगों को बैठने से मनाही नहीं है, अब बेचारा आम आदमी इस आरक्षण में पिस पिस कर सफ़र करता रहता है।

अभी कुछ दिनों पहले एक ए.सी. बस में चढ़े तो अनारक्षित सीटों पर महिलाएँ काबिज थीं और महिलाओं की आरक्षित सीटें खाली थीं, सब महिलाएँ भी पढ़ी लिखी सांभ्रांत परिवार की थी जिन्हें शायद महिलाओं के लिये चिन्हित सीटों की समझ तो होगी ही, परंतु फ़िर भी न जाने क्यों, आम आदमी की सीट पर कब्जाये बैठी थीं, हमारे जैसे ३-४ आमजन और खड़े थे, मास्टर को बोला कि इन आरक्षण वर्ग को इनकी सीटों पर शिफ़्ट कर दें तो हम भी बैठ जायेंगे, बेचारा मास्टर बोला कि इनको कुछ बोलने जाऊँगा तो ईंग्रेजी में गिटीर पिटिर करके अपने को चुप करवा देंगी, और ये तो रोज की ही बात है।

अब बताईये महिला शक्ति से कोई उलझता भी नहीं, वे सीटें खाली ही रहीं जहाँ तक कि हमें उतरना था, और उन सीटों पर बैठना हमें गँवारा न था, कि कब कौन सी महिला कौन से स्टॉप पर चढ़ जाये और अपनी आरक्षित सीट की मांग करने लगे, इससे बेहतर है कि खड़े खड़े ही सफ़र करना।

जब महिलाओं को समान अधिकार दिये जा रहे हैं, तो ये आरक्षण क्यों, फ़िर भले ही वह सत्ता में हो या फ़िर बस में या फ़िर ट्रेन में…। खैर हम तो ये मामला छोड़ ही देते हैं, भला नारी शक्ति से कौन परिचित नहीं है.. और फ़िर इस मामले में सरकार तक गिर/झुक जाती हैं… तो हम क्या चीज हैं।

बेस्ट की बस में निर्देशित होता है कि आगे वाले दरवाजे से केवल गरोदर स्त्रियाँ, ज्येष्ठ नागरिक और अपंग ही चढ़ सकते हैं। वैसे कोई कुछ भी कहे बेस्ट की बसें और उसकी सर्विस बेस्ट है।

यह वीडियो देखिये जिसमें प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि बेस्ट की बसों में कैसे सीट पर कब्जा किया जाये –

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण (Mumbai experience of BEST Bus)

    कुछ दिनों से बस से ऑफ़िस जा रहे हैं, पहले पता ही नहीं था कि बस हमारे घर की तरफ़ से ऑफ़िस जाती है। बस के सफ़र भी अपने मजे हैं पहला मजा तो यह कि पैसे कम खर्च होते हैं, और ऐसे ही सफ़र करते हुए कितने ही अनजान चेहरों से जान पहचान हो जाती है जिनके नाम पता नहीं होता है परंतु रोज उसी बस में निर्धारित स्टॉप से चढ़ते हैं।

    पहले ही दिन बस में बैठने की जगह मिली थी और फ़िर तो शायद बस एक बार और मिली होगी, हमेशा से ही खड़े खड़े जा रहे हैं, और यही सोचते हैं कि चलो सुबह व्यायाम नहीं हो पाता है तो यही सही, घर से बस स्टॉप तक पैदल और फ़िर बस में खड़े खड़े सफ़र, वाह क्या व्यायाम है।

    बस में हर तरह के लोग सफ़र करते हैं जो ऑफ़िस जा रहे होते हैं, स्कूल कॉलेज और अपनी मजदूरी पर जा रहे होते हैं, जो कि केवल उनको देखने से या उनकी बातों को सुनने के बाद ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

    कुछ लोग हमेशा बैठे हुए ही मिलते हैं, रोज हुबहु एक जैसी शक्लवाले, लगता है कि जैसे सीट केवल इन्हीं लोगों के लिये ही बनी हुई है, ये रोज डिपो में जाकर सीट पर कब्जा कर लेते होंगे।

    बेस्ट की बस में सफ़र करना अपने आप में रोमांच से कम भी नहीं है, कई फ़िल्मों में बेस्ट की बसें बचपन से देखीं और अब खुद ही उनमें घूम रहे हैं।

    बेस्ट की बसों में लिखा रहता है लाईसेंस बैठक क्षमता ४९ लोगों के लिये और २० स्टैंडिंग के लिये, परंतु स्टैंडिंग में तो हमेशा ऐसा लगता है कि अगर यह वाहन निजी होता तो शायद रोज ही हर बस का चालान बनता, कम से कम ७०-८० लोग तो खड़े होकर यात्रा करते हैं, सीट पर तो ज्यादा बैठ नहीं सकते परंतु सीट के बीच की जगह में खड़े लोगों की ३ लाईनें लगती हैं।

बातें बहुत सारी हैं बेस्ट बस की, जारी रहेंगी… इनकी वेबसाईट भी चकाचक है और कहीं जाना हो तो बस नंबर ढूँढ़ने में बहुत मदद भी करती है… बेस्ट की साईट पर जाने के लिये चटका लगाईये।

एक गाना याद आ गया जो कि अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माया गया था –

आप लोगों के लिये एक सवाल कंडक्टर को मुंबईया लोग क्या कहते हैं।

खोज रहा हूँ.. क्यों उदास है ये जिंदगी…..मेरी कविता….विवेक रस्तोगी

क्यों उदास है ये जिंदगी

पलकें भारी हैं

होश नहीं है,

जीवन जीवन नहीं है

पर फ़िर भी

इस उदासी भरी जिंदगी को,

जीते जा रहे हैं

अब शायद कुछ बचा न हो

पर फ़िर भी,

इंतजार कर रहे हैं

मन व्याकुल है

आत्मा कष्ट में है,

हर राह में कंटक बिछे हैं

अंतर बीमार है

मन अशांत है

जीवन में

ध्यान छिन्न भिन्न है

अत्र तत्र यत्र सर्वथा

अवांक्षित से विचार

न कोई ओर न कोई छोर

जीवन की डोर

फ़िसली जा रही है

राहें कठिन होती जा रही हैं

संबल अंतहीन के अंत तक

पहुँचा लगता है

हर चीज जो जीवंत है

मेरे लिये उसका अंत ही दिखता है,

अनमोल है सब पर,

मेरे जीवन का मोल और

हर वस्तु का मोल खत्म सा है,

गीता ज्ञान और मर्म

सब निरापद सा लगता है

चहुँ और अवसाद के

घिरे हुए से बादल हैं,

कहीं कोई रोशनी और

उम्मीद दूर दूर तक नहीं है

बस जीवन अवसादपूर्ण है

कैसे इसकी थाह लूँ

गंगा में या हिमालय में

खोज रहा हूँ।

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (एन.सी.सी. के बटालियन केम्प और तैयारियाँ)..My life my experience

एन.सी.सी. मे हर वर्ष बटालियन में केम्प लगता था, जिसमें सेना से संबंधित बहुत सारी जानकारियाँ दी जाती, युद्ध क्षैत्र में कैसे दैनिक व्यवहार किया जाता है, फ़ायरिंग करवाई जाती है।

जब कैम्प में जाने की सूचना मिलती तो बड़े जोर शोर से पूरी तैयारी शुरु हो जाती थी, लोहे की पेटी पर रंगरोगन फ़िर अपना नाम और नंबर लिखकर पेटी तैयार करना। बेल्ट, जूते पर पॉलिश करके चमकाना और पीतल के बेज को चमकाना। पूरी आस्तीन के शर्ट और पैंट, जिससे मलेरिया का खतरा न रहे।

ट्रेन से जाना तय होता था, झाबुआ से मेघनगर तक जाने के लिये बस से जाना होता था, उस समय बस का सामान्य किराया ४ रुपये था पर स्टूडेन्ट कन्सॆशन में हमें केवल १ रुपया ही लगता था, अपनी पेटियाँ और बेडिंग बस के ऊपर खुद ही चढ़वानी होती थीं। मेघनगर पहुँचकर वापिस से बस से अपनी पेटियाँ और बेडिंग लेकर फ़िर रेल्वे स्टेशन की ओर प्रस्थान करते थे। लोग हमें घूर घूर कर देखते थे, क्योंकि हम सभी एन.सी.सी. की वर्दी में होते थे, पर हाँ एन.सी.सी. की वर्दी पहनने के बाद खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे।

फ़िर इंतजार होता था, देहरादून ट्रेन का जो कि मेघनगर से १० बजे चलती थी और रतलाम लगभग १२ बजे पहुँचती थी, रेल्वे स्टेशन पर बटालियन के ट्रक हमारा इंतजार कर रहे होते थे, फ़िर ट्रक में लदफ़दकर शहर से ८-१० किमी दूर गंगासागर के पास केम्प लगता था।

और दस दिन का कैम्प खत्म करके वापिस घर की ओर लौट पड़ते थे। गोविन्दा की एक फ़िल्म आई थी “शोला और शबनम” जिसमॆं एन.सी.सी. का जीवन काफ़ी हद तक फ़िल्माया गया था, यह फ़िल्म मेरी मन पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है आज भी। फ़िल्म के कुछ दृश्य देखिये जिससे एन.सी.सी. के पुराने दिन आज भी याद हो आते हैं –

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (एन.सी.सी. की परेड और ड्रिल).. My life my experience

कॉलेज में दाखिला लिया था, और कुछ ही दिनों में पता चला कि एन.सी.सी या एन.एस.एस. में से कुछ एक लेना होता है, शुरु से ही हमें सेना अपनी ओर आकर्षित करती थी, बस तो यही आकर्षण हमें एन.सी.सी. की ओर खींचकर ले गया।

अपना नाम हमने एन.सी.सी (नेशनल कैडेट कोर) में लिखवाया और फ़िर हमारे एन.सी.सी. वाले सर ने एन.सी.सी. रुम में बुलाया कि अपनी एन.सी.सी. की ड्रेस ले जाओ, हम भी पहुँच गये एन.सी.सी. रुम में अपने नाप की ड्रेस लेने के लिये। वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि लड़कों की भीड़ टूटी पड़ी है। समझ ही नहीं आ रहा था कि इतनी भीड़ में कैसे अपने नाप के कपड़ों का चुनाव करें।

लोहे की अलमारियों में से नई पैंट और शर्ट रखी हुई थीं, जिन पर साईज भी केवल एस, एम और एल लिखा हुआ था, समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन से साईज का कपड़ा अपने को सही आयेगा। फ़िर थोड़ा सा बेशरम बनकर वहीं पर शर्ट और पैंट पहनकर देख ही लिये, फ़िर नई जुराबें और मिलिट्री वाले एंकल शूज, टोपी और कुछ एसेसरीज।

एंकल शूज के नीचे तले में घोड़े की नाल लगवानी थी, जिससे कदमताल अच्छा होता था और जूते घिस भी नहीं पाते थे। जब ये शूज पहनकर चलते थे तो खटखट की अलग ही आवाज होती थी।

कॉलेज के मैदान में सप्ताह में दो बार परेड होती थी, गुरुवार और शुक्रवार शाम ४ बजे से ६ बजे तक। चार बजे पहुँचने के बाद सबसे पहले हाजिरी होती थी, फ़िर एन.सी.सी. गीत (हम सब भारतीय हैं) और फ़िर मैदान के ५-६ चक्कर हवलदार दौड़वाते थे, कसम से ५-६ चक्कर में दम निकल जाता था और फ़िर उसके बाद  ड्रिल या कुछ और ट्रेनिंग।

इंतजार होता था शाम छ: बजे का, जब परेड का समापन होता था तब मिलता था नाश्ता दो समोसे या कचोरी और मिठाई के पीस। कभी वहीं खा लेते थे तो कभी अपने साथ रखकर घर पर लाकर आराम से खाते थे।

एन.सी.सी. की वर्दी पहनने से ऐसा लगता था कि मैं भारत माता का सिपाही हूँ और मेरा जन्म सार्थक हो गया और अपने आप पर गर्व महसूस होता।

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (राजदूत मोटर साईकिल, मेरी हीरो रेंजर और कालिया का वेस्पा स्कूटर..) My life my experience

कॉलेज के दिनों में कुछ ही दोस्तों के पास स्कूटर या मोटर साईकिल हुआ करती थी, जैसे कालिया के पास एल.एम.एल.वेस्पा और अनुराग के पास राजदूत मोटरसाईकिल, अब आजकल ये दोनों ही ब्रांड देखने को क्या सुनने को भी नहीं मिलते हैं।
RajdootLml_Scooter
ranger   हरी भरी वादियाँ
(चित्र गूगल से लिये गये हैं, आपत्ति हो तो दर्ज करवा दें, हटा लिये जायेंगे, हरी भरी वादियों का चित्र नीरज जाट जी के ब्लॉग से लिया गया है)
कालिया, केटी और मैं वेस्पा पर लदकर अपने शहर से दूर २५ किमी दूर गाँव में अपने दोस्त से मिलने जाते थे, और हरी भरी वादियों में हम दोस्त गाना गाते हुए, वेस्पा लहराते हुए चले जाते थे। कालिया वेस्पा वही ३-४ रुपये लीटर वाले पेट्रोल से फ़ुलटैंक करके आ जाता था और हम तीनों निकल पड़ते थे, सफ़र पर, कभी ऐसे ही लांग ड्राईव पर कभी किसी गांव में, कभी किसी तालाब या नदी के किनारे।
अनुराग की राजदूत बहुत काम की थी,  एक तो उस समय राजदूत शान मानी जाती थी, राजदूत की किक ऐसी कि ध्यान से नहीं मारी तो पलट के आती थी और टांग तोड़ देती थी। राजदूत काले और लाल रंग में बहुतायत में पाई जाती थी।
हम अपनी हीरो रेंजर साईकिल पर शान से घूमते थे, उससे पता नहीं कितने किलोमीटर घूम चुके थे, आगे डंडे पर और पीछे कैरियर पर अपने दोस्तों को बैठाकर घूमते थे। जब पापाजी ने बोला था कि देख लो कौन सी साईकिल लेनी है, तब बाजार में हीरो रेंजर बिल्कुल नई आयी थी, जब हमने बताया था तो पापाजी बोले कि एटलस, बीएसए एस.एल.आर या हीरो की साधारण डंडे वाली साईकिल ले लो। परंतु उस समय हीरो रेंजर बिल्कुल ही नया ब्रांड और नया फ़ैशन था तो भला साधारण साईकिल कैसे पसंद होती।
वो मेरे साईकिल वाले दिन और वेस्पा और राजदूत के सपने देखने वाले दिन, कैसे निकल गये, पता ही नहीं चला कि कब ये दिन निकल गये। जब तक मोटर साईकिल के दिन आये तब तक वापिस से साईकिल वाले दिनों के सपने आने लगे, ये सपने भी न बड़े अजीब होते हैं, पता ही नहीं होता है कि कब कौन से सपने देखने चाहिये और कब नहीं।

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (नदी किनारे पिकनिक और गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्य सृजन).. My life my experience

नदी किनारे पिकनिक मनाने का आनंद ही कुछ और होता है, नदी हमारे शहर से करीबन १० किमी. दूर थी, वहाँ पर शिवजी का प्राचीन मंदिर भी है और एक गोमुख है जिससे लगातार पानी निकलता रहता है, किवंदती है कि पाण्डवों के प्रवास के दौरान यह गौमुख अस्तित्व में आया था। कहते हैं कि गंगाजी का पानी है, और वह कुंड जिसमें पानी आता है हमेशा भरा रहता है। पानी नदी में प्रवाहित होता रहता है।

नदी के पाट पर बड़े छोटे पत्थर, कुछ रेत और उनके बीच में से निकलता नदी का उनमुक्त जल, जो पता नहीं कब कहाँ निकल आता और कैसा अहसास करा जाता। इसीलिये नदी किनारा हमेशा से मेरा पसंदीदा स्थान रहा है। जब हम मंगलनाथ पर नदी के किनारे बैठते थे तो गजानन माधव मुक्तिबोध की याद आ जाती थी, कहीं पढ़ा था कि मुक्तिबोध मंगलनाथ पर नदी के किनारे बैठकर ही साहित्य सृजन किया करते थे।

केवल इसी कारण से नदी हमारा पसंदीदा स्थान था, पिकनिक मनाने के लिये, सब सामान हम अपने साथ ले जाते थे, हम पाँच मित्र थे जो भी सामान पिकनिक में लगता सब अपने अपने घर से कच्चा ले जाते थे, जैसे कि आटा, दाल, मसाले, सब्जियाँ, पोहे.. इत्यादि। सब अपनी सुविधा के अनुसार घर से निकलते थे हालांकि समय निश्चित किया रहता था, पर उस समय मोबाईल तो क्या लैंड लाईन भी घर पर नहीं था।

हम दो दोस्त साईकल से नदी के लिये निकलते थे, हमारे दो दोस्त सारा समान लेकर स्कूटर से पहले ही पहुँच जाते थे। साईकल से १० किमी जाना और फ़िर शाम को आना पिकनिक के मजे को दोगुना कर देता था। इससे लगता था, अहसास होता था कि हम कितने ऊर्जावान हैं।

सुबह नदी पहुँचकर सबसे पहले शिवजी के दर्शन और अभिषेक करके पिकनिक का शुभारम्भ किया जाता। एक दोस्त रुककर लकड़ियाँ बीनकर इकट्ठी करता और उनका चूल्हा बनाने का बंदोबस्त करता और बाकी के चार हम लोग निकल पड़ते पास के खेतों में भुट्टा ढूँढने, जल्दी ही पर्याप्त भुट्टे लेकर वापिस आते और चूल्हे पर पकाकर रसभरे दानों का आस्वादन करते। भुट्टे का कार्यक्रम समाप्त होते होते फ़िर भूख तीव्र होने लगती तो पोहे बनाने की तैयारी शुरु होने लगती, किसी हलवाई को हम साथ लेकर नहीं जाते थे, सब खुद ही पकाते थे, नाश्ते में पोहे सेव और खाने में दाल बाफ़ले और सब्जी। बाफ़ले पकाने के लिये,  कंडे मंदिर से ही मिल जाते थे। खाना पकाने के बर्तन भी मंदिर से उपलब्ध हो जाते थे।

खुद ही पकाते थे और सब मिलकर खुद मजे में खाते थे। कभी अंताक्षरी खेलते कभी कविताएँ सुनाते कभी एकांकी अभिनय करते कभी अभिनय की पाठशाला चलाते, एक मित्र चित्रकार था तो वह सबका पोट्रेट बनाता। खूब मजे भी करते और अपने अंदर की प्रतिभाओं को भी निखारते, भविष्य में करने वाले नाटकों के मंचन की रुपरेखा बनाते।

क्या दिन थे, अब कभी लौटकर नहीं आयेंगे, बस वे दिन तो बीत ही गये, और उनकी यादें जेहन में आज भी ऐसी हैं जैसे कि ये पल अभी आँखों के सामने हो रहे हैं।