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मुंबई गाथा लोकल के प्लेटफ़ॉर्म पर .. भाग ७ (On local platform .. Mumbai Part 7)

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    दादर में टिकिट लेने के बाद अब लोकल में बैठने का इंतजार था, और लोकल को टीवी में देखकर और अपने दोस्तों के मुख से बखाने गये शब्द याद आने लगे, भरी हुई लोकल और मुंबई की तेज रफ़्तार जिंदगी। इसीलिये ही हमारे प्रबंधन ने दोपहर के २ बजे ही हमें भेज दिया था कि जल्दी निकल जाओगे तो भीड़ नहीं मिलेगी। यह सब देखकर तो और भी रोमांचित हो उठे थे। कि जरुर लोकल कोई बहुत ही गजब चीज है तभी तो यह मुंबई की जीवन रेखा कहलाती है।

    फ़िर हमारे वरिष्ठ ने हमसे कहा कि फ़लाने प्लेटफ़ॉर्म पर चलते हैं, वहाँ फ़ास्ट लोकल आयेगी हमने उनसे पूछा कि ये फ़ास्ट क्या होता है तब वे बोले कि स्लो भी होती है, अब तो बस हमारे लिये अति ही हो गई थी, भई फ़ास्ट और स्लो होता क्या है, ये तो बताओ। तब वरिष्ठ बोले कि फ़ास्ट मतलब कि बड़े स्टेशन पर ही रुकती है जैसे कि वेस्टर्न लाईन पर बोरिवली, अंधेरी, बांद्रा, दादर, मुंबई सेंट्रल और चर्चगेट जबकि स्लो हरेक स्टेशन पर रुकती है। और हरेक प्लेटफ़ॉर्म पर अलग ही तरह की एक प्लेट लगी होती है जिसमें पहले गंतव्य लिखा होता है कि कहाँ जा रही है, जैसे BO मतलब बोरिवली फ़िर समय लिखा होता है फ़िर F या S लिखा होता है और फ़िर कितने मिनिट में ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आने वाली है, हम भी हैरान थे कि इतनी जानकारी कैसे लोगों को एक साथ हो जाती है

    जैसे ही लोकल के प्लेटफ़ॉर्म पर आये वहाँ इतनी भीड़ थी कि अपने पैसेन्जर के लिये भी इतनी भीड़ नहीं होती है, हमने कहा कि क्या बहुत देर से कोई ट्रेन नहीं आई है तो हमारे वरिष्ठ बोले, ट्रेन तो हर २-३ मिनिट में आती है परंतु जनता इतनी ज्यादा  है कि बस ! इसलिये ऐसा लगता है। वाकई हम दूसरे प्लेटफ़ॉर्म पर देख रहे थे एक ट्रेन आई और प्लेटफ़ॉर्म खाली पर फ़िर २ मिनिट में  वापिस उतना ही भरा हुआ नजर आता।

    अपने आप में बहुत ही रोमांचित क्षण थे वे मुंबई के प्लेटफ़ॉर्म पर, दोस्तों की बतायी हुई बातें बार बार याद आ रही थीं, और अब खुद को अच्छा लग रहा था कि देखो आ गये हम भी मायानगरी मुंबई, सपनों का शहर मुंबई, जहाँ का दिन ही रात से शुरु होता है, जहाँ २४ घंटे जीवन व्यस्त रहता है।

    वहीं खड़े खड़े हम आने जाने वालों को देख रहे थे, और मुंबई की लड़्कियों को देख रहे थे, सुना था कि मुंबई में दो चीज कब मेहरबान हो जाये कह नहीं सकते एक बारिश और दूसरी लड़की, एक और बात सुनी थी कि जिंदगी में कभी दो चीजों के पीछे नहीं भागना चाहिये पहली बस दूसरी लड़की एक जाती है तो दूसरी आती है। शायद यह भी मुंबई के लिये ही कहावत बनायी गई होगी। वहाँ की लड़्कियों के कपड़े जो पहने होतीं हम आँखें फ़ाड़फ़ाड़ कर देख रहे थे कि इनको बिल्कुल शर्म ही नहीं है, क्या कुछ भी पहनकर निकल लेती हैं। अब आखिर हम पहली बार बड़े शहर आये थे और वह भी मायानगरी मुंबई में तो अब यह सब हमको मुंबई के हिसाब से वाजिब भी लगने लगा।

जारी..

मुंबई गाथा दादर रेल्वे स्टेशन.. भाग ६ (Dadar Railway Station.. Mumbai Part 6)

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    हमें दिया गया था बोईसर, जो कि मुंबई से बाहर की ओर है, हमें थोड़ा मायूसी तो हुई कि काश मुंबई मिलता तो यहाँ घूमफ़िर लेते और मुंबई के आनंद ले लेते। पर काम तो काम है, और काम जब सीखना हो तो और भी बड़ा काम है।

    हम तीन लोग होटल की और जाने लगे उसमें वही वरिष्ठ जो हमें ट्रेन से लाये थे वही थे जो कि उस समय हमारे समूह का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, फ़िर पूछा कि टैक्सी से चलेंगे या पैदल, तो हमने कह दिया नहीं इस बात तो पैदल ही जायेंगे। मुश्किल से ७-८ मिनिट में हम होटल पहुँच लिये, और फ़िर उनसे बोला फ़ालतू में ही सुबह टैक्सी में गये और पैसे टैक्सी में डाले, इस पर वे बोले “अरे ठीक है, वह तो कंपनी दे देगी”, हम चुप रहे क्योंकि हमें अभी बहुत कुछ पता नहीं था, और जब पता न हो तो चुपचाप रहना ही बेहतर होता है। तो सामने वाला जो भी जानकारी देता है हम उसे ग्रहण कर लेते हैं, और जब हमें थोड़ा जानकारी हो जाती है तो फ़िर हम उसके साथ बहस करने की स्थिती में होते हैं, और यह समझने लगते हैं कि हम ज्यादा समझदार हैं और सामने वाला बेबकूफ़,  यह एक मानवीय प्रवृत्ति है।

    होटल से समान लेकर फ़िर टैक्सी में चल दिये दादर रेल्वे स्टेशन, जहाँ से हमें लोकल ट्रेन से हमें मुंबई सेंट्रल जाना था और फ़िर वहाँ से बोईसर के लिये कोई पैसेन्जर ट्रेन मिलने वाली थी। दादर लोकल रेल्वे स्टेशन पहुँचे और वहाँ इतनी भीड़ देखकर दिमाग चकराने लगा, और लोकल में यात्रा करने का रोमांच भी था। सड़क के दोनों तरफ़ पटरियाँ लगी थीं और लोग अपना समान बेच रहे थे, भाव ताव कर रहे थे, शायद यहाँ बहुत कम दाम पर अच्छी चीजें मिल रही थीं।

    दादर स्टेशन के ओवर ब्रिज पर चढ़े तो हमने पूछा कि टिकिट तो लिया ही नहीं, तो वरिष्ठ दादर रेल्वे स्टेशन बोले कि टिकिट काऊँटर ब्रिज पर ही है, हमें घोर आश्चर्य हुआ, कि बताओ टिकिट काऊँटर ऊपर ब्रिज पर बनाने की क्या जरुरत थी, मुंबई में बहुत सी चीजॆं ऐसी मिलती हैं जो कि आपको आश्चर्य देती हैं। खैर अपना समान लेकर ऊपर ब्रिज पर पहुँचे तो देखा कि लंबी लाईन लगी हुई है, लोकल ट्रेन के टिकिट के लिये, और कम से कम २५ लोग तो होंगे, हमने वरिष्ठ को बोला कि अब क्या करें वो बोले कि कुछ नहीं लग जाओ लाईन में और टिकिट ले लो ३ मुंबई सेंट्रल के, हमने अपना संशय उनसे कहा कि इस लाईन में तो बहुत समय लग जायेगा कम से कम १ घंटे की लाईन तो है, (अब अपने को तो अपने उज्जैन रेल्वे स्टॆशन की टिकिट की लाईन का ही अनुभव था ना !!) तो वो बोले कि अरे नहीं अभी दस मिनिट में नंबर आ जायेगा। हम भी चुपचाप लाईन में लगे और घड़ी से समय देखने लगे तो देखा कि द्स मिनिट भी नहीं लगे मात्र ८ मिनिट में ही हमारा नंबर आ गया।

     टिकिट काऊँटर वाले की तेजी देखकर मन आनंद से भर गया और सोचने लगे कि काश ऐसे ही कर्मचारी हमारे उज्जैन में होते तो लाईन में घंटों न खड़ा होना पड़ता।

जारी..

मुंबई गाथा स्ट्राँग रूम और १० करोड़ नगद.. भाग ५ (Strong Room and Cash 10 Caror.. Mumbai Part 5)

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   थोड़ी ही देर में क्लाईंट के ऑफ़िस के सामने थे, जिसके यहाँ हमारी कंपनी का सॉफ़्टवेयर चलता था और भारत के हरेक हिस्से में वे लोग अपनी संपूर्ण प्रक्रिया को कंप्यूटरीकृत कर रहे थे, जिसमें हमारा काम था, उनका डाटा ठीक करना, माइग्रेशन करना और फ़िर अगर बैलेंस नहीं मिल रहे हैं तो बैलेंस मिलाना और सॉफ़्टवेयर उपयोग करने वाले कर्मचारियों को सिखाना।

    जब वहाँ अपने एक कक्ष में पहुँचे तो देखा कि पहले से ही वहाँ हमारी कंपनी के बहुत सारे लोग मौजूद हैं, जिसमें से कुछेक को पहचानते थे और कुछ का नाम सुना था, पर बहुत सारे चेहरे अनजाने थे, सबसे हमारा परिचय करवाया गया, लगा कि अभी तो जिंदगी में ऐसे ही पता नहीं कितने नये चेहरों से मिलना होगा, और उन चेहरों के साथ काम भी करना होगा। जिनमें बहुत सारे चेहरे दोस्त बनेंगे और कुछ से अपने संबंध ठीक से रहेंगे और कुछ से नहीं भी बनेगी।

    मेरी जिंदगी में यह एक नया अध्याय शुरु हो चुका था, जिसका अहसास संपूर्ण रुप से मुझे हो रहा था, जिंदगी कितनी करवटें बदलती है यह मैंने देखा है, परंतु यह मेरी जिंदगी की पहली करवट है यह मुझे पता चल रहा था।

    हमारे वरिष्ठ ने फ़िर पूरे स्टॉफ़ से परिचय करवाया और पूरी इमारत घुमाने लगे, हम सोचने लगे कि बताओ हम कहाँ गाँव में रहते थे, इसे कहते हैं शहर। ऐसे ही घूमते घूमते हम पहुँचे स्ट्राँग रूम, हमसे पूछा गया कि स्ट्राँग रूम का मतलब समझते हो, और इसका क्या उपयोग होता है, हमने स्ट्राँग रूम शब्द ही पहली बार सुना था और उसके बारे में पता भी नहीं था कि ये क्या चीज होती है। तब हमारे वरिष्ठ ने हमें बताया कि स्ट्राँग रूम उसे कहते हैं जहाँ कोई भी वित्तीय संस्थान अपनी नकदी और लॉकर्स रखता है, और इस स्ट्राँग रूम में सुरक्षाओं के कई स्तर होते हैं, जिससे यह सब चीजें सुरक्षित रहें। स्ट्राँग रूम की दीवारें पूरी तरह से सीमेंट कांक्रीट से बनी होती हैं, जिस सामग्री से सामान्यत: बीम और पिलर बनते हैं, जिससे स्ट्राँग रूम इतना मजबूत हो जाता है, और उस पर भी सुरक्षा के विभिन्न स्तर रहते हैं।

    हम स्ट्राँग रूम पहुँचे तो वहाँ का स्ट्राँग रूम बहुत ही बड़ा था, और वहाँ ढेर सारे रुपये थे, हमने अपनी जिंदगी में पहली बार इतनी नकदी एक साथ देखी थी, हमारे वरिष्ठ ने पूछा कि बताओ कितने रुपये होंगे, हम बोले कि अंदाजा नहीं लग रहा है, वे बोले ये कम से कम दस करोड़ रुपये हैं और यहाँ रोज दस से बारह करोड़ रुपयों का नकद में व्यवहार होता है। हम सबके चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित चमक थी कि आज हमने इतने सारे रुपये एक साथ देखे और हमारी जिंदगी का एक यादगार लमहा भी था।

    थोड़ी ही देर में हमारी कंपनी के डायरेक्टर आये तो वे बोले कि आप सब को अलग अलग जगह जाना है और हमारा सहयोग करना है, सबको क्लाईंट की शाखाएँ दे दी गईं। पूरा बॉम्बे जैसे मेरी नजरों के सामने ही था, नाम पुकारे जा रहे थे और सभी लोग अपने नाम आने का इंतजार करने के बाद अपने समूह में चले जाते और कब निकलना है और कैसे काम करना है, उस पर चर्चा करने लगते, यह सब चीजें हमारे लिये बिल्कुल नई थीं, पर हम हरेक चीज का मजा ले रहे थे और समझने की कोशिश कर रहे थे। फ़िर एक एक समूह डायरेक्टर के पास जाता और उनसे मंत्रणा करने के बाद, सबको मिलकर निकल जाता।

    इतनी दूर परदेस से आये इतने सारे लोग अपनी जिंदगी की शुरुआत दूर देस बॉम्बे में कर रहे थे, हम भी उनमें से एक थे, ऐसे ही पता नहीं कितने लोग अपने रंगीन सपने लिये बॉम्बे आ चुके होंगे और आज भी आ रहे हैं, मुंबई नगरी में है ही इतना आकर्षण, कि सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेती है और अपनी संस्कृति में समाहित कर लेती है।

जारी…

मुंबई गाथा.. भाग ४ होटल में (In Hotel.. Mumbai Part 4)

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    शिवाजी पार्क दादर से गुजरते हुए बहुत ठंडी और ताजगी भरी हवा का अहसास हुआ, तो लगा कि पास ही कहीं समुंदर है, जो कि बहुत ही पास था दादर चौपाटी। शिवाजी पार्क से थोड़ा आगे जाते ही हमारा होटल था, जहाँ हमें ठहरना था। जब टैक्सी रुकी तो एकदम होटल से लड़के आये और हमारा समान हमारे कमरे में ले जाने लगे।

    उस होटल में कमरे बहुत ही कम खाली थे और पहले ही वहाँ बहुत सारे नये नियुक्ति वाले लोग आ चुके थे, तो हमारे वरिष्ठ ने कहा कि अभी और कोई कमरा खाली नहीं है, चलो मेरे कमरे में, पर हाल देखकर डरना मत, क्योंकि कम से कम १०-१२ लोग सो रहे होंगे और सुबह आठ बजते ही सब अपने अपने काम पर निकल लेंगे, उस समय प्रात: ६.३० बज रहे थे। हम कमरे में गये तो सुनकर पहले ही मन बना चुके थे पर देखकर कसमसाहट हो रही थी कि कहाँ फ़ँस गये, क्या और कोई होटल नहीं हो सकता था, और भी बहुत कुछ, तभी वरिष्ठ बोले कि अपना समान जहाँ जगह दिखती है वहाँ रखो और बिस्तर पर जगह बनाकर पसर लो, मैं तुम लोगों को लेने के लिये १० बजे आऊँगा तब तक तुम लोग नाश्ता करके तैयार रहना। और नाश्ता होटल की तरफ़ से है, तो अच्छे से दबाकर नाश्ता कर लेना।

    हमारा ध्यान सबसे पहले खिड़्की की ओर गया, खिड़की के बाहर दादर की मेन रोड थी और गाड़ीयाँ अपनी पूरी रफ़्तार से भागी जा रही थीं, सुबह का मौसम और समय बहुत सुकून देता है, शरीर में ताजगी और स्फ़ूर्ती भर देता है।

    हम लोगों ने भी बिस्तर पर थोड़ी थोड़ी जगह की और लेट गये क्योंकि फ़िर दिनभर आराम नहीं मिलने वाला था। पता नहीं कब झपकी लगी और जो साथी लोग सो रहे थे, तैयार होकर नाश्ता कर मुंबई की जिंदगी में विलीन होने लगे। थोड़े समय बाद हमें भी इस मुंबई में विलीन हो जाना था। थोड़ी ही देर में फ़िर हम केवल उतने दोस्त ही बचे जो उज्जैन से आये थे और हम लोग भी तैयार होने लगे, तैयार होकर फ़िर फ़ोन किया कि नाश्ता भेजिये। कॉन्टीनेन्टल नाश्ता था, अच्छे से दबाकर खाया। मुंबई का पहला दिन था और घर के बाहर भी, और नौकरी का भी पहला दिन था, मन में अजब सा उत्साह था, और गजब की स्फ़ूर्ती थी।

    हम लोग इसी उत्साह और स्फ़ूर्ती में जल्दी तैयार हो गये, और वरिष्ठ का इंतजार करने लगे, वे बिल्कुल १० बजे आये और हम लोगों को टैक्सी में साथ लेकर ऑफ़िस की ओर ले जाने लगे। वे बोले कि वैसे तो १० मिनिट चलकर भी जा सकते थे परंतु तुम सब लोग नये हो और मुंबई के अभ्यस्त नहीं हो इसलिये टैक्सी से ही चल रहे हैं।

जारी..

अस्थिरता से चंचलता की ओर .. खोज .. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

अशांत मन को शांत कैसे करुँ

क्या भावबोध दूँ मैं इस मन को

जिससे यह स्थिर हो जाये

अस्थिरता लिये हुए कब तक

ऐसे ही इन भावबोधों से

यह चित्रकारी करता रहूँगा

पुराने पड़ने लगे रंग भी कैनवास के

नये रंग चटकीले से भरने होंगे

कुछ उजास आये

कुछ समर्पण आये

प्रेम वात्सल्य करुणा रोद्र रस आयें

रसों के बिन कैसे जीवन तरे

सब अस्थिर है,

चंचलता को ताक रहा हूँ

मन के लिये…

घर का खाना [Home Food]

    घर के खाने का महत्व केवल वही जान सकता है जो घर के बाहर रहता हो, उसके लिये तो घर का खाना अमृत के समान है। और जो घर में रहता है उसके लिये तो घर का खाना “अपने घर की मुर्गी” जैसा होता है, और बाहर का खाना अमृत के समान होता है।

    हम ५-६ दोस्त गेस्ट हाऊस में रहते थे, जिसमें से २ पट्ना के, ३ कोलकाता के और एक हम थे उज्जैन से। पर सभी एक दूसरे को बहुत अच्छे से जानते थे।

    जो पटना वाले मित्र थे उनके लोकल मुंबई में अच्छी दोस्ती थी और कुछ शादीशुदा मित्र भी रहते थे, तो वे मित्र बहुत भाग्यवान थे, और घर के खाने का लुत्फ़ उठाते रहते थे। कभी कभी दूसरे मित्र को भी साथ ले जाते थे।

    एक दिन बड़ी जबरदस्त रोचक घटना हुई कि पहले मित्र बहुत देर से आये तो दूसरे ने पूछा कि आज किधर थे, तो पहले मित्र बोले कि फ़लाने मित्र के यहाँ थाना गया था और “भाईसाब्ब. .. भाभीजी ने क्या जबरदस्त आलू के पराठें बनाये थे, मैं ५-६ पराठें खा गया और साथ में घर का अचार.. अह्हा”, दूसरे का पारा सुनते सुनते ही सातवें आसमान पर पहुँच गया था, फ़िर वो शुरु हुआ, उसके हाथ में गिलास था पहले तो गुस्से में वह फ़ेंककर पहले को मारा और जोर से बोला “अबे, एक तो बिना बताये गये थे, दूसरा हियाँ जला रहे हो कि घर का खाना खाकर आ रहे हो, और वो भी आलू के पराठें, आज हम तुमका छोड़े नाहीं, ससुरा का समझत हो के घर का खाना केवल तुहार ही पसंद हो” और बहुत घमासान हुआ।

तो इस तरह की झड़पें अक्सर दोस्तों में देखने को मिलती रहती हैं।

[हमें पटना की भाषा नहीं आती है, पर कोशिश की है, अगर कोई सुधार हो तो बताईयेगा]

क्या फ़िर से इस भारत को आजाद करवाना होगा ? (Freedom of India… ?)

    वैसे मैं फ़िल्म वगैराह देखने में अपना समय नष्ट करना उचित नहीं समझता हूँ परंतु “खेलें हम जी जान से” की इतनी चर्चा सुनी थी, कि फ़टाफ़ट से टोरन्ट से डाऊनलोड किया और देखने लगे। ये फ़िल्म भी हम कल रात को ३ दिन में पूरी कर पाये हैं, एक साथ इतना समय निकालना और इतना ध्यान से देखना शायद अपने बस की बात नहीं है।

    फ़िल्म इतनी अच्छी लगी कि शायद ही इसके पहले स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि पर इस अंदाज में फ़िल्मांकन किया होगा। यह फ़िल्म बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है, हमें आजादी दिलाने वाले नौजवानों ने अपना खून बहाया है (पानी या पसीना नहीं)।

आजादी     हम इस आजादी का नाजायज लाभ उठा रहे हैं, क्या इसी आजादी के लिये क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत दी थी, अगर उन्हें पता होता कि आजादी के बाद ये सब होगा तो शायद ही उनके मन में भारत माता के आत्मसम्मान को जागृत करने की बात आती। शहीदों को नमन जिन्होंने हम भारतवासियों को इतनी गुंडागर्दी, भ्रष्टाचारी और भी न जाने क्या क्या वाली सरकार दी, दिल रो रहा है यह सब लिखते हुए, क्या फ़िर से इस भारत को आजाद करवाना होगा ?

    क्या भारत माता का आत्मसम्मान खो गया है, क्या हम क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत का बदला इतने बड़े बड़े कांड़ों को झेलकर और करके चुका रहे हैं।

    क्यों न वापिस से ऐसी ही एक क्रांति का जन्म हो जिसमें इन कांडों को करने वाले हरेक शख्स को खत्म कर दिया जाये और फ़िर से भारत माता के सम्मान को वापिस लाया जाये। अगर वाकई हमें अपना देश बचाना है तो ऐसी ही किसी क्रांति की जरुरत है, सजा तो इनको देनी ही होगी। क्योंकि अब ये लोग इतने बेशरम हो गये हैं कि ये न कलम की तलवार से डरते हैं और न ही भारत माता के सपूतों से ।

    बताईये क्या करना चाहिये ….. क्या क्रांति की बात गलत है… फ़िर से हमें भारतमाता के आत्मसम्मान को पाने के लिये क्रांति की अलख जगानी होगी।

वन्दे मातरम !! जय हिन्द !!

जिंदगी, चिंतन का चक्र, गहन चिंतन और मौलिक विचारधारा (Life.. some thoughts)

जिंदगी     बात तो बहुत पुरानी है परंतु चिंतन का चक्र चलता ही रहता है, अभी जुलाई में भविष्य की रुपरेखा के बारे में फ़िर से प्रस्तावना बनाया और गहन चिंतन किया तो लगा कि अभी तो अपने जिंदगी में बहुत कुछ पाना है मुकाम देखने हैं। जिंदगी आखिर मुकाम पाने का ही दूसरा नाम है, बस चलते ही जाओ, कमाते जाओ, काम करते जाओ, परिवार के साथ जब वक्त निकालने का समय आता है तो लेपटॉप खोल कर बैठ जाओ और जब काया साथ छोड़ दे तो उसी परिवार से उम्मीद करो कि वे अब आपका ख्याल करें, कितने स्वार्थी हैं ना !

    खैर ये सब बहुत माथापच्ची है जिंदगी की, अगर गहन चिंतन में उतर गये तो बस हो गया काम तमाम। जिंदगी का उद्देश्य क्या है उसमें हमें क्या पाना है, क्या खोना है, खैर खोना तो कोई  भी नहीं चाहता और सारे रिश्ते स्वार्थों के दम पर और दंभों की दुनिया में खड़े किये जाते हैं। कोई खून का रिश्ता मजबूरी में निभाना पड़ता है और कोई अनजाने रिश्ते या खून के रिश्ते खुशी खुशी निभाता है, यह भी बहुत गहन चिंतन है। समाज में कैसे जीवन जीना और हरेक समाज वर्ग की अपनी जीवन शैली होती है। जीवन शैली में बदलने का स्कोप बहुत होता है हम एक दूसरे को देखकर अपनी दिनचर्या, अपने जीवन जीने के तरीके में भी प्रभावित होते हैं। यहाँ तक कि बोलचाल और हावभाव में भी प्रभावित होते हैं। चाहे अनचाहे हम बहुत सारी चीजें दूसरों की ले लेते हैं, वह भी स्वार्थवश “ऐसा अच्छा लगता है”। पता नहीं समाज में कितने लोग अक्ल लगाते होंगे।

    सभी जीवन को अपने अपने नजरिये से देखते हैं, किसी के लिये यह बहता दरिया है तो किसी के लिये मौज का समुंदर तो किसी के लिये धार्मिक आस्था का केंद्रबिंदु, सबकी सोच जिंदगी के बारे में अलग अलग होती है। दिनचर्या बहुत ही निजी विषयवस्तु है परंतु अधिकतर देखने मॆं आता है कि उस पर किसी ओर (सोच या विचारधारा) का अतिक्रमण होता जा रहा है। हमारी अपनी मौलिक विचारधारा जिंदगी जीने की शायद खत्म ही हो गई है। हरेक चीज में बनावटपन है, क्या इससे जीवन जीने के लिये जरुरी चीजों को हम सम्मिलित कर पाते हैं।

बैकस्पेस     पता नहीं क्या हो रहा है जिंदगी लिखते हुए जिंदगए लिखने में आ रहा है, शायद कीबोर्ड पर भी हाथ बहकने लगे हैं। तो बारबार बैकस्पेस से जिंदगी को ठीक कर रहा हूँ काश कि ऐसा कोई बैकस्पेस जिंदगी में होता तो सारी चीजें ठीक हो गई होतीं।

१ रुपये की ओवर बिलिंग याने कि बेस्ट को कितना फ़ायदा ? (The profit of BEST by 1 Rupee over billing)

    आज किसी काम से बाहर गया था, तो बस नंबर २०४ से देना बैंक, कांदिवली से डीमार्ट कांदिवली तक का हमने टिकिट लिया, मास्टर को भी टिकिट कितने का है पता नहीं था, उसने अपना चार्ट देखा और ७ रुपये का टिकिट पकड़ा दिया। हमने भी छुट्टे ७ रुपये दे दिये।
    जगह खाली हुई तो हम सीट पर ठस लिये, फ़िर मास्टर पीछे से चिल्लाते हुए आया किसने टिकिट नहीं लिया है, हमारे आगे की सीट वाला १० का नोट दिखाते हुए बोला, हमें एक टिकिट दीजिये कांदिवली स्टेशन से राजन पाड़ा, मास्टर ने ३ रुपये वापिस दिये तो वह व्यक्ति बोला कि ६ रुपये लगते हैं, मास्टर ने फ़िर से अपने चार्ट में देखा और चुपचाप १ रुपया वापिस कर दिया और ६ रुपये का टिकिट दे दिया। जबकि उस व्यक्ति की यात्रा हमसे ज्यादा बस स्टॉपों की थी, पर हम फ़िर भी चुपचाप रहे कि छोड़ो १ रुपये में क्या होता है, फ़ालतू चिकचिक होगी और दिमाग का भाजीपाला होएंगा।
    हम तो उस व्यक्ति को जागरुक उपभोक्ता ही कहेंगे कि उसने अपना १ रुपया बचाया और चूँकि हमें इस रुट का पता ही नहीं था, इसलिये उसने हमसे १ रुपया ज्यादा ले लिया, पर बेस्ट की बसों में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं कि आप अपना किराया जान सकें, जैसे कि रेल्वे स्टेशन पर पूरा चार्ट लगा होता है, यात्री किराये की राशि देख सकता है।
    भले ही वह १ रुपया उस मास्टर की जेब में नहीं जा रहा हो, परंतु बेस्ट की जेब में तो जा ही रहा था। ऐसा कई बार होता है जब नया मास्टर नये रुट की बस में चलता है, परंतु इस सबमें यात्री की क्या गलती है। अगर मास्टर नया है तो पहले उसे प्रशिक्षण देना चाहिये तभी बस के नये रुट में भेजना चाहिये, नहीं तो ऐसे ही नये मास्टर लोगों की जेब से १ रुपया ज्यादा निकालते रहेंगे और बेस्ट को फ़ायदा होता रहेगा।

कौन से मूवर्स पैकर्स की सेवायें ली जायें, मुझे अब मुंबई से १२०० किमी दूर जाना है। (Movers n packers services)

   मुझे अगले महीने के मध्य में मुंबई से १२०० कि.मी. दूर अपना समान स्थानांतरण करना है, और इतने सारे मूवर्स एन्ड पैकर्स से पूछा और गूगल के जरिये खोज भी की, तो और भी सांसत में आ गये।

    हमने तकरीबन ५ मूवर्स एन्ड पैकर्स से बात की और कोटेशन लिया पर सबकी शिकायतें हैं, अब समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें और किस की सेवा का उपयोग करें।

अभी तक जिनको बुलाया है वे इस प्रकार हैं –

1. Safe Movers & Packers

2. Sahara Movers & Packers

3. Agarwal Movers & Packers, Hyderabad

4. Agarwal Movers & Packers Pvt. Ltd., (Delhi)

सबसे सस्ता पहला वाला है और सबसे महँगा आखिरी चौथा वाला है।

    और किस तरह से समान को स्थानांतरित किया जा सकता है, यह भी बताईयेगा। बस जरा जल्दी ….।