ऑपरेशन सफेद सागर नेटफ्लिक्स पर देखा, हालांकि देखे हुए समय हो गया, पर दिमाग बहुत सी चीजों में व्यस्त रहा, पर एक बात दिमाग से बार बार टकरा रही थी तो सोचा जब तक लिखेंगे नहीं, यह पीछा नहीं छोड़ेगी।
जिस तरह से एयरफोर्स को केंद्र में रखकर यह सीरीज बनाई गई है, वह काबिलेतारीफ है। जिस खूबी से अनुशासन, आपसी सम्मान, जिद और बहादुरी दिखाई है, ऐसा अप्रतिम शौर्य कहीं और देखने को नहीं मिलेगा।
देखते देखते कई बार मन में यही सवाल आया कि 40 घंटे साप्ताहिक काम करने वाले कितने मौज में रहते हैं, जबकि जो सेना हमारी बॉर्डर की रक्षा कर रही है, वे हमारे लिए 24 घंटे मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही है, और वह भी अपनी जान हथेली पर लेकर, जबकि 40 घंटे वाले मजदूर जो भी काम करते हैं, वे भी जान हथेली पर लेकर केवल उतने ही समय घूमते हैं, जब वे घर से ऑफिस आना जाना करते हैं। क्योंकि अपने यहाँ सड़क और ट्रैफिक दोनों अविश्वसनीय रूप से बदतर हैं। बस यही लगता है कि जो वर्दी रक्षा के लिए मिली है, वे खुद ही इसे सम्माननीय बनाते हैं।
सेना के पास तो कच्ची सड़कों पर चलने के लिए बड़े suv वाहन रहते हैं, टैंक रहते हैं, वे फुल्ली इक्विप रहते हैं, क्योंकि उनको पता है, जहां उनको जाना है उधर सड़कें हैं ही नहीं।
खैर एक बात जो हमेशा परेशान करती है कि सैनिक के परिवार का हमेशा ही सब कुछ दाँव पर लगा होता है, पर वे फिर भी जिंदादिली से जीते हैं। और यही जज्बा उन्हें बाकी सारे लोगों से अलग बनाता है।
एक बात और मेरे जहन में अटक गई कि जब फाइटर प्लेन की पत्नी कहती है कि गुस्सा तो बहुत सी बातों पर हमें भी आता है, शिकायतें तो हमें भी बहुत रहती हैं, पर मैं उनको लिखकर एक डायरी में लिख देती हूँ, पर कभी भी सॉर्टी के दौरान कोई गुस्सा नहीं, क्योंकि जिस परिस्थिति में ये फ्लाई करते हैं, उसमें सेकंडों में निर्णय लेने होते हैं, और अगर घर पर की गई कोई शिकायत उनके दिमाग में रह गई तो उन्हें निर्णय लेने में परेशानी हो सकती है।
बस यही बात दुनिया में सभी को समझ लेनी चाहिये, कि बहुत से घर परिवार की शिकायतें इंतजार कर सकते हैं, पर काम करने वाले लोग भले वे स्त्री हों या पुरूष उन्हें शांत मन से काम करने का वातावरण बनाना घर पर हर एक सदस्य की जिम्मेदारी है।
बैंगलोर के अस्पतालों की एक बात अच्छी लगी कि बड़े अस्पतालों के लगभग सारे डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन कंप्यूटराइज होते हैं, जो कि उस डिपार्टमेंट के रिसेप्शन से प्रिंट करके दिए जाते हैं।
यह समस्या हो नहीं रही कि बीमारी क्या लिखी, डायग्नोस क्या लिखा है, और कौन सी दवाई लिखी। सब साफ साफ अंग्रेजी में समझ में आता है।
वरना पहले तो डॉक्टर की लिखाई घसीटामार है, यह सबको पता है। लगभग दो वर्ष पहले एक प्रसिद्ध हिमिटियोलॉजिस्ट से मिलने जाना हुआ था, उनके पास रखे लेपटॉप टैबलेट देखकर हैरान था, उस समय की जो भी एडवांस तकनीक थी, सब उपलब्ध थी, और तो और जो हम बातें कर रहे थे, वह भी ट्रांस्क्रिप्ट होकर स्क्रीन पर आ रही थी, जो गड़बड़ हो रही थी, तो डॉक्टर हाथ के डिजिटल पैन से ठीक भी कर रहे थे।
यह है पारदर्शिता, जिससे मरीज को सब समझ में आ जाये, और मरीज कहीं से भी अपनी दवाई खरीदने के लिए स्वतंत्र रहे। नहीं तो पास के मेडिकल से लेना मजबूरी होती थी कि वो घिसिपिटी राइटिंग उनको ही समझ आती थी। अभी हाल ही में एक अस्पताल में जाना हुआ, तो एक इंप्रूवमेंट और देखने को मिला वे ड्रग का नाम भी लिखकर दे रहे थे, यह बड़ी बात है।
और उनके एप्प पर लॉगिन करने पर मरीज अपने सारे बिल, प्रिस्क्रिप्शन, xray reports, लैब टेस्ट रिपोर्ट सब कभी भी देख सकता हैं। बताओ आपने कभी इतनी पारदर्शिता कहीं देखी।
चीन ने अपनी करेंसी के साथ एक कमाल का खेल खेला है… और शायद भारत भी उससे कुछ सीख सकता है।
हम सबने CNY, RMB और Yuan जैसे शब्द सुने हैं।
लेकिन चीन की currency व्यवस्था को थोड़ा ध्यान से देखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है।
चीन ने अपनी currency को दुनिया के लिए खोल तो दिया, लेकिन पूरी तरह खोल नहीं दिया।
अब थोड़ा समझिए कि मामला क्या है।
चीन के अंदर चलने वाला RMB और चीन के बाहर इस्तेमाल होने वाला RMB व्यवहार में दो अलग-अलग बाजारों में काम करता है।
चीन के domestic market में इसे आमतौर पर CNY कहा जाता है।
और Hong Kong, Singapore और दूसरे offshore financial centres में इसका एक बड़ा offshore market बना दिया गया, जिसे CNH के नाम से जाना जाता है।
यानी…
एक ही RMB, लेकिन दो अलग-अलग playgrounds।
और यहीं चीन की असली strategy शुरू होती है।
चीन ने अपने domestic financial system पर capital controls बनाए रखे।
मतलब कोई भी व्यक्ति या संस्था मनमाने तरीके से पैसा China के अंदर-बाहर नहीं ले जा सकती।
लेकिन दूसरी तरफ China ने Hong Kong जैसे financial centre में RMB का offshore market विकसित किया।
इससे विदेशी कंपनियां RMB में trade कर सकती हैं, RMB deposits रख सकती हैं, RMB bonds खरीद सकती हैं और RMB में financing भी कर सकती हैं।
Hong Kong इस पूरे सिस्टम में China और दुनिया के बीच एक तरह का financial bridge बन गया।
IMF और BIS दोनों ने China के इस onshore-offshore model को विस्तार से study किया है।
अब सवाल आता है—
चीन ऐसा क्यों कर रहा है?
क्योंकि international currency बनने का मतलब केवल यह नहीं है कि विदेशी लोग आपकी currency में shopping करें।
असल फायदा तब है जब…
आपका दूसरा देश आपसे सामान खरीदे और आपकी currency में payment करे।
आपकी कंपनियां दूसरे देशों में investment करें और उसी currency में transaction करें।
दूसरे देशों के central banks आपकी currency को reserve के रूप में रखने लगें।
और सबसे महत्वपूर्ण…
आपको हर international transaction के लिए Dollar की जरूरत कम पड़ने लगे।
मान लीजिए China ने किसी देश को $10 billion का सामान बेचा।
अगर payment Dollar में होती है तो Chinese company को पहले RMB को Dollar में convert करना पड़ेगा।
लेकिन अगर payment RMB में हो गई तो?
Dollar बीच से गायब।
Currency conversion cost कम।
Dollar dependency कम।
Chinese companies का exchange-rate risk कम।
और धीरे-धीरे दुनिया के दूसरे देशों के पास RMB जमा होने लगता है।
अब उन देशों के सामने समस्या आती है—
“मेरे पास RMB आ गया… अब इसका करूं क्या?”
China ने इसका भी इंतजाम किया।
RMB में bonds, investments, trade settlement, banking और offshore financial products का ecosystem बनाया।
और फिर currency के साथ-साथ financial infrastructure भी export किया।
यही वजह है कि RMB का international use धीरे-धीरे बढ़ा है।
2026 में BIS की एक नई study ने भी RMB के global FX trading में बढ़ते international role को 2025 के global survey के आधार पर analyse किया है।
लेकिन यहां चीन का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।
China ने capital account को पूरी तरह free नहीं किया।
यानी वह यह नहीं कह रहा कि—
“लीजिए भाई, Yuan ले जाइए, जब चाहें China में लगाइए और जब चाहें निकाल लीजिए।”
China अभी भी capital flows पर काफी control रखता है।
इसका फायदा?
अगर अचानक दुनिया भर का पैसा China में आने लगे तो उसका पूरा असर domestic economy पर पड़ेगा।
और अगर किसी crisis में विदेशी निवेशक अचानक अपना पैसा निकालने लगें तो currency और financial system पर भारी दबाव आ सकता है।
China इस risk को काफी हद तक control कर सकता है।
यानी उसने एक तरह से कहा—
“Trade के लिए दरवाजा खोलो, लेकिन capital के लिए दरवाजा पूरा मत खोलो।”
और यही China का RMB experiment इतना interesting बनाता है।
BIS के अनुसार CNY और CNH markets के बीच अलग-अलग dynamics रहे हैं और capital controls ने दोनों markets को कुछ हद तक अलग रखा है।
अब असली सवाल—
क्या भारत भी ऐसा कर सकता है?
मेरी नजर में जवाब है—
हाँ… और भारत इसकी तरफ पहले से बढ़ रहा है।
RBI ने 2023 में Internationalisation of INR पर एक पूरा Inter-Departmental Group report जारी किया था।
और मजेदार बात यह है कि उस report में RMB internationalisation को बाकायदा एक case study के रूप में analyse किया गया है।
RBI ने साफ लिखा है कि China ने capital controls बनाए रखते हुए भी RMB को internationalise किया और bilateral currency swaps तथा local currency settlement जैसे mechanisms का इस्तेमाल किया।
भारत ने भी अब इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
Special Rupee Vostro Accounts (SRVA)
Local Currency Settlement
Bilateral currency arrangements
और UPI/RuPay जैसे payment infrastructure के international expansion के जरिए।
RBI के अनुसार UAE, Indonesia, Maldives और Mauritius जैसे देशों के साथ local currency settlement arrangements पर काम हुआ है।
और 2026 में RBI की updated FAQ भी साफ करती है कि INR में international trade settlement existing foreign-currency system का replacement नहीं, बल्कि एक additional mechanism है।
तो क्या भारत China की तरह INR और offshore INR का अलग ecosystem बना सकता है?
बिल्कुल।
और शायद इसका एक natural location भी हमारे पास है—
GIFT City, Gujarat.
कल्पना कीजिए…
भारत में domestic INR market अपने rules के साथ चले।
GIFT City में एक deep offshore/international INR market विकसित हो।
विदेशी कंपनियां वहां INR accounts, bonds, derivatives और trade-finance products इस्तेमाल करें।
भारत दूसरे देशों के साथ INR में trade settlement बढ़ाए।
और धीरे-धीरे दूसरे देशों के central banks तथा businesses के पास INR liquidity जमा होने लगे।
फिर एक दिन कोई भारतीय exporter यह न कहे—
“Dollar में payment करो।”
बल्कि कहे—
“INR में payment कर दो।”
यहीं से currency की international journey शुरू होती है।
लेकिन एक बात समझना बहुत जरूरी है।
Currency को international बनाना सिर्फ सरकार के आदेश से नहीं होता।
इसके लिए चाहिए—
बड़ी और competitive economy।
बड़ा international trade।
Deep bond market।
Liquid foreign exchange market।
विश्वसनीय banking system।
Stable inflation।
विश्वसनीय institutions।
और सबसे महत्वपूर्ण—
दुनिया को INR रखने की वजह।
China के पास manufacturing और global trade network ने RMB को internationalise करने का natural आधार दिया।
भारत के पास IT services, pharmaceuticals, engineering, energy, digital payments और increasingly global supply chains हैं।
इसलिए भारत का रास्ता China की exact copy होना जरूरी नहीं है।
बल्कि भारत अपना model बना सकता है।
और शायद यही ज्यादा समझदारी होगी।
क्योंकि मुझे लगता है—
Dollar को हटाना लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
लक्ष्य होना चाहिए कि दुनिया के पास Dollar के अलावा विकल्प भी हों।
अगर भारत धीरे-धीरे ऐसा ecosystem बना पाए जिसमें कोई Dubai का businessman, Singapore की company, African importer या Southeast Asian bank यह सोचने लगे कि—
“INR रखना भी काम का है।”
तो समझिए…
रुपया सिर्फ भारत की currency नहीं रहेगा।
वह धीरे-धीरे एक international financial currency बनने लगेगा।
और तब शायद असली सवाल यह नहीं होगा कि—
“₹ की कीमत Dollar के मुकाबले कितनी है?”
बल्कि सवाल होगा—
“दुनिया के कितने transactions में ₹ इस्तेमाल हो रहा है?”
यही किसी currency की असली ताकत है।
आपको क्या लगता है—भारत को China के RMB model से सीखना चाहिए या हमें पूरी तरह अपना अलग रास्ता बनाना चाहिए?
रिश्वत लेने वाला तो अपराधी है ही… लेकिन मजबूरी में देने वाला क्या है?
हाल ही में Bribes dot fyi नाम की एक वेबसाइट खूब चर्चा में रही। इसे दिल्ली के एक बीटेक स्टूडेंट आर्यन निषाद ने बनाया था। कॉन्सेप्ट बहुत सीधा और साफ़ था—अगर किसी सरकारी दफ़्तर में आपसे घूस मांगी गई, तो बिना अपनी पहचान उजागर किए बताइए कि किस शहर, किस डिपार्टमेंट में, कितनी रकम मांगी गई।
देखते ही देखते साइट पर लाखों हिट्स आने लगे और शिकायतों की बाढ़ आ गई। लेकिन डेटा और ट्रैफ़िक का दबाव, प्राइवेसी की चुनौतियां और लीगल ज़िम्मेदारियां संभालना एक अकेले छात्र के बस के बाहर हो गया, जिसके चलते आख़िरकार सबमिशन बंद करने पड़े।
आर्यन ने पहले भी बताया था कि यह लगभग अकेले चलाया जा रहा प्रोजेक्ट था और होस्टिंग कैपेसिटी तक खत्म हो गई थी। बाद में एक निवेशक और भ्रष्टाचार विरोधी एक्टिविस्ट डॉ अनिरुद्ध मालपानी ने वित्तीय सहायता देने की पेशकश की, व अब वे नया समाधान ढूंढ रहे हैं।
अब डॉ मालपानी इस पर तकनीकी तौर पर experts की सहायता ले रहे हैं, और लोग इस प्रकार के सोल्यूशन को डेवलप करने के लिए मुफ्त में तैयार हैं, किसी ने ऑनियन पर रूट करने का सुझाव दिया, जिससे शिकायतकर्ता का आईपी कैप्चर ही नहीं किया जा सकेगा। और एक बंदे ने पेशकश की है कि वो वियरेबल छोटे कैमरे और माईक स्पेशल डिजाइन करके मदद कर सकता है।
ऐसी ही एक और वेबसाइट अभी सामने आई है bribes डॉट ऑनलाइन, वे भी यही काम कर रहे हैं।
समस्या यह है कि नियम ही इस तरह से डिजाइन हैं कि वह रिश्वत रिपोर्ट करने वालों को सुरक्षा नहीं देता।
कानून का पेंच और एक आम नागरिक की मजबूरी Prevention of Corruption Act के तहत रिश्वत देना भी एक अपराध माना जाता है। हालांकि कानून में एक क्लॉज़ यह है कि अगर किसी को मजबूर करके रिश्वत ली गई हो और वह 7 दिनों के भीतर इसकी सूचना जांच एजेंसी को दे दे, तो वह बच सकता है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है? राशन कार्ड बनवाना हो, ज़मीन की रजिस्ट्री, पेंशन या जन्म प्रमाणपत्र लेना हो, बाबू का सीधा जवाब होता है—”काम तो हो जाएगा, पर ऊपर तक कुछ सेवा-पानी लगेगा।”
अब आम नागरिक के पास दो ही रास्ते बचते हैं: या तो पैसे दो और घर जाओ, या फिर महीनों-सालों तक दफ्तरों की धूल फांको। वह खुशी से नहीं, सिस्टम की लाचारी में पैसे देता है।
टेक्नोलॉजी: भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा हथियार Bribes dot fyi का विचार बहुत ताकतवर था। यह साबित करता है कि रिश्वत की लड़ाई केवल फाइलों से नहीं, टेक्नोलॉजी से लड़ी जा सकती है:
Tamper-proof Records: डिसेंट्रलाइज्ड आर्किटेक्चर और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स से शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रह सकती है।
Evidence Collection: वेरिफाइड डिजिटल एविडेंस (ऑडियो/वीडियो) से बाबूओं की मनमानी पर सीधा वार हो सकता है।
Auto Legal Drafts: शिकायत दर्ज होते ही संबंधित विजिलेंस विभाग के लिए आधिकारिक कंप्लेंट का तैयार होना।
अपराधी नहीं, गवाह बनाने की ज़रूरत है अगर ₹500 की घूस देने वाला नागरिक इस डर से चुप बैठ जाए कि उल्टा उसी पर मुकदमा ठोक दिया जाएगा, तो रिश्वत लेने वाले तक पहुंचेगा कौन?
जब तक मजबूरी में पैसे देने वाले को कानूनी सुरक्षा देकर यह नहीं कहा जाएगा कि—”तुम अपराधी नहीं, मुख्य गवाह हो”, तब तक भ्रष्ट तंत्र की जड़ें नहीं हिलेंगी।
Bribes dot fyi भले बंद हो गया हो, पर उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है:
क्या हम ऐसा डिजिटल सिस्टम नहीं बना सकते जिससे अगली बार कोई भी बाबू रिश्वत मांगने से पहले 10 बार सोचे कि कहीं उसका डिजिटल रिकॉर्ड तो नहीं बन रहा?
भ्रष्टाचार तभी तक फलता-फूलता है जब तक घूस लेना आसान और उसकी शिकायत करना जान जोखिम में डालने जैसा मुश्किल हो।
यह ज़बाब है, उस ट्वीट का जिसमें बोला गया कि इतनी समस्या है तो पाकिस्तान बांग्लादेश चले जाओ, ट्वीट का फोटो लगाया हुआ है।
और यह उस ज़बाब को मैंने यहाँ हिन्दी में लिखा है –
भाई, मैं अपना टैक्स यहीं देता हूँ।
इस देश में।
इस्लामाबाद में नहीं। ढाका में नहीं।
तो मैं अपनी प्रॉब्लम की तुलना किसी और के फेल हुए एग्जाम पेपर से क्यों करूँ?
यह ऐसा है जैसे आपका मकान मालिक टपकती छत को नज़रअंदाज़ करके कहे, “कम से कम बगल वाली बिल्डिंग तो पूरी तरह गिर गई। शुक्र मनाओ और चुप रहो… या निकल जाओ।”
तुम देश को नहीं बचा रहे हो।
तुम बस सबसे पुरानी PR स्क्रिप्ट चला रहे हो:
“कुछ ठीक मत करो। बस सबसे बुरे पड़ोसियों की तरफ इशारा करो और उसे देशभक्ति कहो।”
मातृभूमि के प्रति असली भक्ति यह नहीं है कि टैक्सपेयर्स से यह कहा जाए कि जब वे पूछें कि उनका पैसा क्यों काम नहीं कर रहा है तो वे चले जाएँ। यह यहाँ की बेकार की प्रॉब्लम को ठीक करना है क्योंकि हम यहीं रहते हैं, कमाते हैं और टैक्स देते हैं।
हम कहीं नहीं जा रहे हैं। हमने बस “पाकिस्तान और बुरा है” को एक इकोनॉमिक पॉलिसी के तौर पर मानना छोड़ दिया है।
HNI इंडियन पेरेंट्स अपनी पैसिव इनकम से अपने GenZ बच्चों को बर्बाद कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर रहे हैं।
असल में, उन्होंने बस पूरी तरह से बेरोज़गार, आलसी बच्चों की एक पीढ़ी तैयार कर दी है।
अगर आप आज किसी भी Tier-1 या Tier-2 शहर में जाएं तो आपको बहुत सारे 25 साल के Gen Z बच्चे बड़ी मुश्किल में फंसे हुए मिलेंगे।
ईगो का जाल: वे ब्लू कॉलर या ग्राउंड लेवल सेल्स की नौकरियां करने से मना कर देते हैं क्योंकि इससे परिवार की इज़्ज़त को नुकसान पहुंचता है।
लाइफस्टाइल का जाल: वे एंट्री लेवल ₹30,000 की कॉर्पोरेट नौकरी करने से मना कर देते हैं क्योंकि उससे उनके कैफे, फ्यूल और वीकेंड ट्रिप के महीने के बेसिक खर्च भी पूरे नहीं होते।
हक का जाल: वे उस पारंपरिक फैमिली बिज़नेस को संभालने से मना कर देते हैं जिसने असल में उनकी दौलत बनाई थी क्योंकि उन्हें वह अच्छा नहीं लगता या बहुत बोरिंग है।
तो वे असल में क्या करते हैं? बिल्कुल कुछ नहीं।
वे सुबह 11 बजे उठते हैं। वे अपने माता-पिता के बनाए पैसिव रेंटल यील्ड पर जीते हैं। हो सकता है कि वे दिन में 4 घंटे अपने पिता के ऑफिस में AC केबिन में बैठकर डायरेक्टर-डायरेक्टर का खेल खेलते हों और चले जाएं।
और इसके लिए 100% माता-पिता ही ज़िम्मेदार हैं।
बच्चों को आरामदायक ज़िंदगी देने और पैसिव इनकम से गुज़ारा करने के उनके जुनून ने परिवार के एक्टिव एम्बिशन को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। पिता 55 साल की उम्र में भी दिन में 10 घंटे मेहनत कर रहे हैं, जबकि 25 साल का बेटा ज़िंदगी को एक ऑल-इनक्लूसिव रिसॉर्ट की तरह ले रहा है।
अगर आपके पिता आपके कम्फर्ट ज़ोन को फंड कर रहे हैं, तो आप महीने के अलाउंस पर बस एक बड़ी लायबिलिटी हैं।
इससे भी बुरी बात यह है कि भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को शहर से बाहर जाकर स्ट्रगल करने नहीं देते। उनका पूरा लॉजिक यही होता है कि जब आपके पिता यहां पहले से ही काफी कमा रहे हैं तो क्यों जाएं?
US में, बच्चों को अपनी सर्वाइवल स्किल्स बनाने के लिए बाहर धकेला जाता है। भारत में, हम अपने बच्चों का आराम से दम घोंट रहे हैं।
कई माता-पिता नहीं चाहते कि उनके बच्चे दूसरी कंपनी में काम करें क्योंकि सैलरी उनकी पॉकेट मनी से भी कम होती है
और वे उन्हें अपने ऑफिस में भी काम नहीं करने देते
दोनों ही मामलों में, ये माता-पिता अपने बच्चों की काम करने की काबिलियत खत्म कर रहे हैं
USA और जापान में, माता-पिता अपने बच्चों को खुद से बड़ा होना सिखाते हैं।
भारत में, माता-पिता सोचते हैं कि मेरा बच्चा क्यों परेशान है। मैं उसकी सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए यहाँ हूँ।
यह कर्म चक्र है… मुश्किल समय मज़बूत इंसान बनाता है, मज़बूत इंसान अच्छा समय बनाता है, अच्छा समय कमज़ोर इंसान बनाता है, और कमज़ोर इंसान मुश्किल समय बनाता है। बहुत कम कर्म योगी और धर्म योगी ही इस उलझे हुए घेरे को तोड़ पाते हैं।
मारवाड़ी में एक कहावत है कि ऐसा व्यापार बनाओ जो 3 पीढ़ियों तक बिना किसी मुश्किल से चलता रहे।
There’s a proverb in Scottish, Father Buys, Son Builds, Grandson sells and his children begs. Parents needs to get this.
हमने अपनी संपत्ति के लिए वसीयत बनाई है… लेकिन अपने इलाज के लिए?
“गरिमापूर्ण मृत्यु के लिए जिंदा वसीयत (Living Will)।”
“जिंदा वसीयत” आखिर होती क्या है?
मैंने इसके बारे में पढ़ा तो लगा कि यह विषय हममें से बहुत से लोगों के लिए जानना जरूरी है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को अचानक ऐसा ब्रेन स्ट्रोक या दुर्घटना हो जाती है कि वह खुद बोलने, समझने या निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है।
वह ICU में है। Ventilator लगा है। कई तरह के life-support systems चल रहे हैं। डॉक्टरों को लगता है कि बीमारी से ठीक होना और वापस आने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है।
अब सवाल है—आखिर फैसला कौन करेगा?
पत्नी? बच्चे? भाई? डॉक्टर?
और अगर परिवार के लोगों की राय अलग-अलग हो तो? यहीं आती है Living Will, जिसे कानूनी भाषा में Advance Medical Directive (AMD) कहा जाता है।
यह संपत्ति वाली Will नहीं है।
यह उस समय के लिए आपकी पहले से लिखी हुई इच्छा है, जब भविष्य में आप खुद अपनी medical treatment के बारे में बोलने या निर्णय लेने की स्थिति में न हों।
आप पहले से बता सकते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में आप किस प्रकार का life-sustaining treatment चाहते हैं और किन परिस्थितियों में उसे जारी नहीं रखना चाहते। भारत में इस विचार को 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मान्यता दी। कोर्ट ने माना कि व्यक्ति की autonomy, dignity और medical treatment को स्वीकार या अस्वीकार करने की इच्छा को महत्व दिया जाना चाहिए। लेकिन 2018 की प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि practically इसे लागू करना आसान नहीं था।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को सरल किया। Advance Medical Directive को दो गवाहों की मौजूदगी में बनाया जा सकता है और उसे notary या gazetted officer से attest कराया जा सकता है। इसकी copy नामित व्यक्ति, family physician और स्थानीय custodian के पास रखी जा सकती है।
और अब महाराष्ट्र ने अप्रैल 2026 में इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है।
राज्य ने urban local bodies के स्तर पर Living Will के records को digitally preserve करने की व्यवस्था शुरू की है। Municipal Commissioners और Municipal Councils/Nagar Panchayats के Chief Officers को custodian की भूमिका दी गई है। यानी कागज पर लिखी इच्छा को उस समय ढूंढना आसान हो सके, जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो।
लेकिन इस पूरी कहानी को समझने के लिए मार्च 2026 का Harish Rana case शायद सबसे महत्वपूर्ण है। Harish Rana 2013 में एक दुर्घटना के बाद वर्षों से permanent vegetative state में थे। मेडिकल बोर्डों ने पाया कि उनकी स्थिति irreversible थी और जिस clinically assisted nutrition and hydration से उनका जीवन चल रहा था, उससे underlying brain damage ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए life-sustaining treatment हटाने की अनुमति दी।
लेकिन यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात है— सुप्रीम कोर्ट ने “मृत्यु की अनुमति” नहीं दी।
Court ने यह भी स्पष्ट किया कि treatment हटाने का मतलब patient को छोड़ देना नहीं है।
उसे उचित palliative और end-of-life care मिलनी चाहिए, ताकि treatment हटाने की प्रक्रिया में दर्द, तकलीफ और असम्मान न हो।
यानी सवाल यह नहीं है कि— “जीवन चाहिए या मृत्यु?”
सवाल कहीं ज्यादा कठिन है— “जब इलाज से जीवन वापस नहीं आ रहा हो, केवल मृत्यु की प्रक्रिया को टाल रहा हो, तब मरीज की अपनी इच्छा क्या थी?”
और शायद इसी वजह से Living Will महत्वपूर्ण है।
हम अपने बच्चों के लिए property की Will बनाते हैं।
Bank accounts के nominee बनाते हैं।
Insurance लेते हैं।
Retirement corpus बनाते हैं।
लेकिन शायद एक चीज भूल जाते हैं— अगर किसी दिन हम खुद अपने बारे में फैसला लेने की स्थिति में न रहें, तो हमारे शरीर और इलाज के बारे में फैसला कौन करेगा?
Living Will शायद मृत्यु की तैयारी नहीं है।
यह उससे ज्यादा परिवार को एक कठिन निर्णय से बचाने की तैयारी है।
क्योंकि उस समय हमारे अपने लोग भावनाओं से टूटे होंगे।
एक तरफ उम्मीद होगी— “शायद ठीक हो जाए…”
दूसरी तरफ डॉक्टर कह रहे होंगे— “Recovery की संभावना बहुत कम है।”
और बीच में होंगे ICU के बिल, लगातार treatment, machines और परिवार का मानसिक संघर्ष।
ऐसे समय में अगर मरीज की अपनी स्पष्ट इच्छा पहले से लिखी हुई हो, तो कम से कम परिवार को यह सवाल नहीं सताएगा— “वह खुद क्या चाहता था?”
मेरे लिए Living Will की सबसे खूबसूरत परिभाषा शायद यही है— यह मृत्यु को बुलाने का दस्तावेज नहीं है। यह उस समय अपनी आवाज़ को सुरक्षित रखने का दस्तावेज है, जब शायद हम खुद बोल नहीं पाएंगे।
और शायद हमें अपनी financial planning के साथ एक और planning शुरू करनी चाहिए— Life Planning.
आपने इस विषय के बारे में पहले सुना था? और क्या आपको लगता है कि 50 की उम्र के बाद Will की तरह Advance Medical Directive पर भी परिवार में बातचीत होनी चाहिए?
मैंने सोच लिया है, कि इस विषय पर परिवार में बात करेंगे और कोई राजी हो न हो, मैं अपने लिए तो यह will बना ही सकता हूँ।
Flag और Pennant Pattern क्या होते हैं, और क्यों ये अक्सर Trend के बीच थोड़े आराम के बाद अगली तेज़ चाल का संकेत देते हैं
सोमवार की सुबह मौसम बड़ा सुहावना था। खिड़की के बाहर पेड़ों की पत्तियाँ चमक रही थीं। स्टडी रूम में हमेशा की तरह हमारा PC Trading Terminal चालू था। तीनों मॉनिटर पर अलग-अलग शेयरों के Charts खुले हुए थे।
टेबल पर गर्म ब्लैक कॉफी रखी थी।
बेटेलाल आज एक Chart को बड़े ध्यान से देख रहे थे।
कुछ देर बाद बोले—
“डैडी… ये शेयर पहले बहुत तेजी से ऊपर गया।”
“फिर अचानक कुछ दिन तक बस इधर-उधर घूमता रहा।”
“और उसके बाद फिर तेजी से ऊपर निकल गया।”
“ऐसा क्यों हुआ?”
मैं मुस्कुराया।
“क्योंकि Market भी बिना रुके मैराथन नहीं दौड़ता।”
“बीच-बीच में थोड़ा आराम भी करता है।”
“और उसी आराम का नाम है Flag और Pennant Pattern।”
बेटेलाल उत्सुक होकर बोले—
“दोनों में फर्क क्या है?”
मैंने पहला Chart खोला।
“देखो… यहाँ पहले एक लंबी हरी चाल आई।”
“इसे Flag Pole कहते हैं।”
“मतलब झंडे का डंडा?”
“बिल्कुल।”
“उसके बाद कीमत थोड़ी देर के लिए नीचे की ओर एक छोटे से Channel में चलने लगी।”
मैंने दो समानांतर रेखाएँ खींचीं।
“यही Flag है।”
“मतलब तेज दौड़ने के बाद थोड़ी देर आराम?”
“बिल्कुल।”
मैंने आगे कहा—
“अब दूसरा Chart देखो।”
इस बार लंबी तेजी के बाद कीमत बहुत छोटे Triangle जैसी आकृति में सिमटने लगी।
“ये तो Triangle जैसा लग रहा है।”
“हाँ।”
“लेकिन यह बहुत छोटा होता है और हमेशा एक मजबूत Trend के बाद बनता है।”
“इसे Pennant कहते हैं।”
बेटेलाल मुस्कुराए।
“मतलब Flag में छोटा Channel…”
“और Pennant में छोटा Triangle।”
“शाबाश!”
मैंने कॉफी की चुस्की ली।
“लेकिन सबसे जरूरी बात अभी बाकी है।”
“क्या?”
“Flag और Pennant दोनों Continuation Pattern हैं।”
“मतलब?”
“मतलब ये अक्सर उसी दिशा में Breakout देते हैं जिस दिशा में पहले Trend चल रहा था।”
“अगर पहले तेजी थी…”
“तो Breakout भी अक्सर ऊपर होता है।”
“और अगर पहले गिरावट थी?”
“तो Breakdown नीचे होने की संभावना ज्यादा रहती है।”
मैंने एक Bullish Flag दिखाया।
Price ऊपर गया।
फिर थोड़ा नीचे आया।
Volume भी कम हो गया।
फिर अचानक एक बड़ी हरी Candle के साथ Breakout हुआ।
Volume भी बढ़ गया।
मैंने कहा—
“यही आदर्श Bull Flag है।”
बेटेलाल ने पूछा—
“Volume बीच में कम क्यों हो गया?”
मैंने कहा—
“क्योंकि उस समय Market आराम कर रहा था।”
“नई खरीदारी का इंतजार था।”
“और जैसे ही Buyers फिर सक्रिय हुए…”
“Volume बढ़ गया और Trend आगे बढ़ गया।”
फिर मैंने एक Bear Flag दिखाया।
“यहाँ पहले तेज गिरावट हुई।”
“फिर थोड़ा ऊपर की ओर छोटा Channel बना।”
“और उसके बाद फिर गिरावट शुरू हो गई।”
“मतलब यह भी Continuation Pattern है।”
“बिल्कुल।”
कुछ देर दोनों Charts देखते रहे।
बेटेलाल ने पूछा—
“डैडी… अगर Flag बनते ही खरीद लें तो?”
मैं हँस पड़ा।
“यही जल्दीबाज़ी नुकसान कराती है।”
“क्यों?”
“क्योंकि हर Flag सफल नहीं होता।”
“Breakout का इंतजार करो।”
“Volume देखो।”
“Closing देखो।”
“फिर फैसला लो।”
मैंने कहा—
“याद है हमने Fake Breakout पढ़ा था?”
“हाँ।”
“यहाँ भी वही नियम लागू होता है।”
“Confirmation सबसे जरूरी है।”
बाहर हल्की हवा चल रही थी।
मैंने धीरे से कहा—
“याद रखना बेटेलाल…”
“Market में सबसे मजबूत चाल वही होती है…”
“जो थोड़ी देर रुककर आगे बढ़ती है।”
“बिना रुके दौड़ने वाला Trend अक्सर जल्दी थक जाता है।”
बेटेलाल मुस्कुराए।
“मतलब खिलाड़ी भी टाइम-आउट लेते हैं…”
“और Market भी।”
मैंने हँसते हुए कहा—
“और समझदार Investor वही है…”
“जो उस टाइम-आउट को पहचान ले।”
बेटेलाल ने कॉफी का आखिरी घूंट लिया।
फिर बोले—
“डैडी… अगली बार क्या सीखेंगे?”
मैंने स्क्रीन पर एक कप जैसा Pattern बनाते हुए कहा—
“अगले भाग में समझेंगे — Cup and Handle Pattern क्या होता है, और इसे सबसे भरोसेमंद Bullish Patterns में क्यों गिना जाता है।“