कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २४
उगते हैं, परन्तु यहाँ स्वर्णकमल कहने का अभिप्राय यह है कि उषाकाल में सूर्य की किरणों से उनकी छटा सुनहरी हो जाती है।
नमस्ते कल्पवृक्षाय चिन्तितान्न्प्रदाय च।विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये॥
जलती हुई कार पर एक आटोवाले का विश्लेषण !!
कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २३
पग में आकाश को नाप लिया। तीसरे पग के लिये जब कोई स्थान न रहा तब बलि ने अपना सिर विष्णु के समक्ष रख दिया। विष्णु ने तीसरे पग में उसे नापकर बलि को पाताल भेज दिया।
झाबुआ की कुछ यादें नवरात्र गरबा डांडिया की….
रोज शाम को गरबा की प्रेक्टिस करने वालों की और सीखने वालों की भीड़ लगी होती थी। चूँकि झाबुआ गुजरात से बिल्कुल लगा हुआ है इसलिये पारंपरिक गुजराती गरबा वहाँ देखने को मिलता है।
कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २२
के कूप में उन्हें डाल दिया, इससे वे पुन: जीवन धारण करके उन देवताओं को पीड़ित करने लगे। तब फ़िर विष्णु और ब्रह्मा ने गाय और बछ्ड़ा बनकर त्रिपुर में प्रवेश करके उस रसकूपाऽमृत को पी लिया, तदन्तर शिव ने मध्याह्न में त्रिपुर-दहन किया।
हंसद्वारम़् – पौराणिक प्रसिद्धि के अनुसार वर्षा ऋतु में हंस मानसरोवर जाने के लिये क्रौञ्च रन्ध्र में से होकर जाया करता हैं। इसी कारण इसे ’हंस द्वार’ कहा जाता है।
भृगुपतियशोवर्त्म – परशुराम भृगु ने कुल में प्रमुख पुरुष माना जाता है, इसलिये इसे भृगुपति या भृगद्वह कहा जाता है। क्रौञ्चारन्ध्र को परशुराम के यश का मार्ग कहा जाता है। इस विषय में दो कथाएँ प्रचलित हैं –
क्रौञ्चरन्ध्रम़् – महाभारत में इसे मैनाक पर्वत का पुत्र बताया गया है। इसकी भौगोलिक स्थिती अस्पष्ट है।
तिर्यगायामशोभी – क्रौञ्च पर्वत का छिद्र छोटा है और मेघ बड़ा है; अत: उस छिद्र में से मेघ नहीं निकल पायेगा। उसमें से निकलने के लिये उसके तिरछा होकर जाने की कल्पना कवि ने विष्णु के वामन अवतार से की है। तिरछा होने पर उसका आकार लम्बा हो जायेगा, जिससे वह विष्णु के फ़ैले हुए पैर के समान प्रतीत होगा।
कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २१
के अ. १४० में आयी है कि एक बार हास परिहास में पार्वती जी ने शिव के दोनों नेत्र बन्द कर लिये, जिससे सम्पूर्ण संसार में अन्धकार व्याप्त हो गया। तब शिव ने ललाट में तृतीय नेत्र का आविर्भाव किया। शिव का यह नेत्र क्रोध के समय खुलता है; क्योंकि कामदेव भी तृतीय नेत्र की अग्नि से ही भस्म हुआ था।
शरभा: – शरभ का अर्थ स्पष्ट नहीं है। आठ चरणों से युक्त यह एक प्राणी विशेष होता है। आजकल यह प्राप्त नहीं होता है। प्रो. विल्सन ने शरभ को शलभ का रुपान्तर माना है और उसका अर्थ टिड्डा किया है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकशिपु को चीरकर मार डाला। जब इतने पर भी उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उनके क्रोध से लोक संहार का भय उपस्थित हो गया, तब देवताओं ने महादेव ने महादेव से प्रार्थना की। तब महादेव ने शरभ का रुप धारण कर नृसिंह को परास्त कर संसार को संरक्षण प्रदान किया।
संरम्भोत्पतनरभसा: – यह शरभ का विशेषण है। शरभ को सिंह का प्रतिपक्षी कहा जाता है तथा इसे सिंह से भी शक्तिशाली माना जाता है; अत: मेघ की गर्जन को सिंह की दहाड़ समझकर अहंकार के कारण शरभ का मेघ पर आक्रमण करना स्वाभाविक है। अत: कवि यहाँ मेघ पर आक्रमण की कल्पना करता है।
चरणन्यासम़् – पूर्वी देशों में ऐसी मान्यता है कि पर्वत आदि स्थानों पर देवों तथा सन्तों आदि के निशान होते हैं। शम्भुरहस्य में शिव के पैरों के चिह्नों को श्रीचरणन्यास कहा जाता है। चरणन्यास को कुछ लोग हरिद्वार में हर की पैड़ी स्थान मानते हैं।
परीया: – हिन्दू धर्म में देव आदि की परिक्रमा का विशेष विधान है। इसमें श्रद्धा के साथ भक्त लोग अपने दायें हाथ की ओर देवमूर्ति करके उसका चक्कर लगाते हैं, इसे परिक्रमा कहते हैं।
कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २०
समझ लिया। उन्होंने मुनि का अपमान किया। मुनि ने भी अपने तेज से उन सभी को भस्म कर दिया। जब वे नहीं लौटे तो अंशुमान ने उनकी भस्मी खोजी तथा मुनि से प्रार्थना की। तब मुनि ने कहा यदि गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आ जाये तो इनका उद्धार हो सकता है। इस पर राजा भगीरथ घोर तपस्या करके गंगाजी को पृथ्वी पर लाये तथा अपने पितरों का उद्धार किया। इसलिये गंगा को सगर पुत्रों के लिये स्वर्ग की सीढ़ी कहा जाता है।
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाम – पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा ने भगीरथ ने कहा कि तुम तपस्या करके शिव को प्रसन्न करो, जिससे कि वे स्वर्ग से गिरती हुई गंगा को सिर पर धारण कर लें। राजा भगीरथ ने वैसा ही किया। इससे यहाँ कवि ने कल्पना की है कि जब शिव ने गंगा को सिर पर धारण कर लिया, तब पार्वती का भी सौतिया डास से भृकुटि तान लेना स्वाभाविक था। इसे देखकर गंगा ने अपने झाग से पार्वती का उपहास किया, परन्तु गंगा ने प्रौढ़ा नायिका के समान पार्वती की उपेक्षा करके शिव के केश पकड़ लिये।
ऐरावत: पुण्डरीको वामन: कुमुदोऽञ्जन: ।पुष्पदन्त: सार्वभौम: सुप्रतीकश़्च दिग्गजा: ॥
कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १९
गाण्डीव अर्जुन के धनुष का नाम है। कहा जाता है कि यह धनुष सोम ने वरुण को तथा वरुण ने अग्नि को दिया था। खाण्डव को जलाने के समय अग्नि से
रेवतीलोचनाड़्काम़् – रेवती बलराम की पत़्नी का नाम है। बलराम को सुरा अत्यन्त प्रिय थी। रेवती उसकी सहचरी होती थी। अत: जब रेवती मद्य प्रस्तुत करती थी तो उसके नेत्रों का प्रतिबिम्ब मद्य में पड़ता था। इसलिये बलराम को और भी अधिक अभीष्ट हो जाती थी। इस प्रकार की शराब छोड़ना यद्यपि बलराम के लिये कठिन था। किन्तु सरस्वती के जल के लिये उसने यह भी छोड़ दी थी।
सरस्वती एक प्रसिद्ध प्राचीन नदी है, जो कुरुक्षेत्र के पास होकर बहती थी। आज यह प्राय: लुप्त है।
अनुकनखलम़् – कनखल एक पुराना तीर्थ स्थल है, जो हरिद्वार के पास स्थित है। स्कन्दपुराण में कनखल की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है –
खल: को नात्र मुक्तिं वै भजते तत्र मज्जनात़् ।अत: कनखलं तीर्थं नाम्ना चक्रुर्मुनीश्वरा: ॥
हरिद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलपर्वते ।स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥
आखिर काला अक्षर भैंस कब तक रह पायेगा, हिन्दी दिवस पर विशेष, कृप्या बिहारी लोग बुरा न मानें…..!!
आज ही हमें एक ईमेल प्राप्त हुआ जो कि विशेषत: बिहारियों के लिये आया था – बिहार में साक्षरता अभियान – Literacy Campaign in Bihar.
कृप्या बिहारी लोग बुरा न माने उनकी सभी भैसें अपनी जगह सुरक्षित हैं यह नई भैंसे
आयात की गई हैं, और ये लालू का चारा भी नहीं खायेंगी।
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