तनख्वाह बड़ी है ? अच्छे तरीके से कैसे उपयोग करें … ? कहाँ निवेश करें ?

    पिछला वर्ष २००८ नौकरीपेशा वर्ग के लिये बहुत मंदी वाला था, जहाँ एक तरफ़ तो अपने खर्चे कम करने पड़े और अपनी बचत में से भी पैसा निकालना पड़ा, और साथ ही कंपनियों द्वारा बाहर निकाले जाने का डर भी।

    कंपनियाँ बड़ी हुई तनख्वाह और बोनस बड़ाने में सक्षम नही थीं और सबने बहुत ही बुरा समय देखा है। खैर, अब ये मंदी का दौर खत्म हो गया है, और समय बदल रहा है और कंपनियाँ भी मंदी के दौर से निकल चुकी हैं।

अंदाजन बढ़ने वाली तनख्वाह के सर्वेक्षण नतीजे –
    सर्वेक्षणों से पता चलता है कि इस वर्ष सबसे ज्यादा वेतन बढ़ौत्तरी होने वाली है। भारत में वर्ष २०१० में वेतन वृद्धि लगभग १०.६ प्रतिशत होने का अनुमान है, जो कि एशिया महाद्वीप में सबसे ज्यादा है और वर्ष २००९ की ६.६ प्रतिशत की वृद्धि से ६० प्रतिशत ज्यादा है। भारतीय कंपनियों के मुकाबले बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वेतन वृद्धि लग्भग ११.४ प्रतिशत होगी।

    ऊर्जा, दूरसंचार, दवाई उद्योग, यांत्रिकी, सेवा और निर्माण, तकनीक और ऑटोमोबाइल कुछ ऐसे क्षैत्र है, जहाँ पर वेतन वृद्धि ११.६ प्रतिशत से १२.८ प्रतिशत तक होने का अनुमान है।

    तकनीक और् आऊटसोर्सिंग क्षैत्र में २००९ के बाद जबरदस्त तरीके से व्यापार में उछाल देखा गया है, लेकिन ये बेहद डरी हुई हैं और इकाई के अंक में ही वेतन वृद्धि देने का अनुमान है जो कि ८.५ प्रतिशत से ८.९ प्रतिशत हो सकता है।

ज्यादा आमदनी: क्या करें ?
    मंदी ने भारतियों को धन की महत्ता सिखाई। तो धन का कैसे अच्छे तरीके से प्रबंधन करें / वेतनवृद्धि को कैसे बेहतर तरीके से उपयोग करें जिससे भविष्य में हमें ज्यादा मुनाफ़ा हो ? यह समय धन को उड़ाने का है या फ़िर उसे बचाने का ? या फ़िर जो मितव्ययिता के उपाय हमने इस मंदी के दौरान सीखे उन्हीं को जारी रखने में समझदारी है ?

    क्या यह बिल्कुल उपयुक्त समय है घर का सामान खरीदने के लिये ? आज लेपटॉप या टीवी जिसकी कीमत ४०,००० है वह शायद छ: महीने बाद ३५,००० हो जायेगी, और कुछ अच्छे ऑफ़र्स भी मिल सकते हैं। मोबाईल फोन या आईपोड के दाम एक तिमाही में ३० प्रतिशत तक कम हो जाते हैं। तो वास्तव में उपभोक्ता वस्तुओं पर बड़ी राशि खर्च करने का उपयुक्त समय नहीं है, लेकिन अगर बिल्कुल ही जरुरत हो तो आपको लेना ही चहिये, बस अच्छी तरह से मोलभाव कर लीजिये जिससे आपको अच्छे ऑफ़र मिल पायें ।

मौजूदा ऋणों की ई.एम.आई. बड़ा दें –
    अगर आपके ऊपर किसी भी तरह का लोन (गृह, शिक्षा, ऑटो, क्रेडिट कार्ड) है तो वेतनवृद्धि के धन से आंशिक पूर्व भुगतान या आप अपने लोन की ई.एम.आई. को बड़ाकर निर्धारित अवधि के पहले चुका सकते हैं, जिससे आपको राहत मिलेगी। (“अधिकतर व्यक्तिगत ऋणों में आंशिक पूर्व भुगतान की सुविधा नही होती है।" )

    हर बार जब भी आप अपनी किस्त का भुगतान करते हैं तो उसका एक हिस्सा लोन के ब्याज में चला जाता है और बाकी का बचा हुआ ऋण की रकम में। ऋण लेने के बाद आमतौर पर पहली किस्त जो भरी जाती है वह आप ब्याज भर रहे होते हैं जो कि आपको पता भी नहीं होता है, और ऋण की किस्त के आखिरी हिस्से को जब भर रहे होते हैं वह ऋण की रकम का हिस्सा होती है। उदाहरण के लिये – अगर आपने ६०,००० रुपये का ऋण लिया है और उसकी मासिक किस्त ई.एम.आई. १५०० रुपये जा रही है तो आप उसे बड़ाकर २००० रुपये करवा लीजिये जिससे बड़े हुए ५०० रुपये आपकी ऋण की रकम कम करने में सहायक होंगे और आपको ब्याज कम भरना पड़ेगा।

    तो जल्दी से ऋण चुकाने में अपनी रकम बड़ाईये और ब्याज में अपना पैसा जाने से बचायें।

निवेश और बचत बढ़ायें –

    अगर आपने ॠण नहीं ले रखा है तो आप अपने धन को म्यूचयल फ़ंड, यूलिप, बांड, शेयर इत्यादि में निवेश कर सकते हैं। म्यूचयल फ़ंड नये निवेशकों के लिये सबसे अच्छा वित्तीय उत्पाद है, जबकि आज के बाजार में निवेश के बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं।

    मैं आपको एस.आई.पी. लेने की सलाह दूँगा, जहाँ आप पूर्व निर्धारित मासिक राशि अपने पसंद के म्यूचयल फ़ंड में निवेश कर सकते हैं। एस.आई.पी. आवर्ती जमा जैसा ही वित्तीय उत्पाद है बस एस.आई.पी. (SIP) बाजार के रिटर्न देने की क्षमता रखता है और आवर्ती जमा (Recurring Deposit) एक निश्चित ब्याज राशि।

    एस.आई.पी. की प्रत्येक मासिक राशि को एक ईंट के तौर पर देखें तो भविष्य में इससे आपको बिल्डिंग बनती नजर आयेगी। नियमित बचत के लिये यह बिल्कुल सही समाधान है।

    ५००० रुपये का एस.आई.पी. अगर १५ वर्षों तक जमा करते हैं, तो १५% के हिसाब से लगभग ३३ लाख रुपये हो जाता है। १५% बहुत कम लगाया है जबकि कई फ़ंडों में यह ६०% तक गया है।

    बहुत सारे फ़ंड हाऊस के फ़ंड अच्छॆ हैं तो आज ही चुनें और निवेश शुरु करें।

    इस वर्ष अच्छे वेतन वृद्धि की उम्मीद है और आप अपने बड़े हुए वेतन को अपने भविष्य के लिये निवेशित करें, क्योंकि पिछले दो वर्षों में आप लोग सीख ही गये होंगे कि खर्चों में कटौती कैसे करना है।

    कुछ तरीके वेतन वृद्धि के लिये मैंने बताये हैं, बाजार में और भी वित्तीय उत्पाद उपलब्ध हैं, जिनमें आप निवेश कर सकते हैं, और अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई को अपने परिवार के भविष्य के लिये सुरक्षित रख सकते हैं। आप पैसा कमाने के लिये कार्य करते हैं और ये वित्तीय उत्पाद आपके पैसे को भविष्य में अच्छे रिटर्न देने के लिये कार्य करते हैं।

51,000 से ज्यादा पेज विजिट हो चुके हैं.. ब्लॉग जगत और पाठकों का शुक्रिया

आज जब अपने ब्लॉग को देख रहे थे तो स्टेटकाऊँटर पर नजर पड़ी तो देखा कि 51,000 से ज्यादा का मीटर नजर आ रहा है तो सोचा कि आज ब्लॉग जगत और पाठकों का शुक्रिया अदा करता चलूँ।

उम्मीद है कि भविष्य में भी आप लोगों का आशीर्वाद और प्यार बना रहेगा।

वो पितृत्व का मेरा अहसास, अनमोल पल मेरी जिंदगी का…

    हरेक पिता के जीवन में पहला पल ऐसा आता है जो कि पिता को पितृत्व का अहसास दिलाता है और वो होता है बच्चे का परिवार में आगमन। क्या आपको याद नहीं आता ?

    मेरे जीवन का वो पल पितृत्व का मैं कभी भूल नहीं सकता, सुबह दस बजे का समय था, मेरी श्रीमती जी आपरेशन थियेटर में थीं, प्राकृतिक प्रसव नहीं था हमें दोनों याने कि जच्चा और बच्चा की चिंता थी।

    थोड़ी देर बाद ही डॉक्टर साहब दौड़े हुए खुद खबर देने आये और गले लगकर बधाई दी “जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ है”, वो पल मेरी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण पल बन गया। उस पल मैं पिता बन चुका था और अचानक ही अपने आप बड़े होने का अहसास होने लगा था, कि अब मैं बाप बन चुका हूँ। अचानक ही जिम्मेदारी का अहसास होने लगा था, कि अभी तक मैं केवल पत्नी की ही जिम्मेदारी थी अब ब्च्चे की भी है। मैंने डॉक्टर से एक बार भी यह नहीं पूछा कि लड़का है या लड़की, लिंग का कोई माइना नहीं होता पिता के लिये, पिता के लिये तो बच्चा एक अनमोल रतन होता है।

    उस पल मेरे आँखों में अचानक ही आँसू आ गये और लगा कि पूरी दुनिया में पटाखे फ़ूट रहे हैं, मेरी खुशी के लिये। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था, और अपनी खुशी को व्यक्त भी नहीं कर पा रहा था।

    थोड़ी देर बाद जब मेरे पापा मम्मी आये तो मैंने उन्हें बताया कि “पापा मैं पापा बन गया”, और अश्रुधारा थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। जिंदगी में इतनी खुशी और पितृत्व का अहसास पहली बार था।

    जिंदगी के उस अनमोल पल को मैं कभी नहीं भुला सकता, आखिर मेरे “पितृत्व” का पल था वह ।

जब बेटा अपने माता पिता को अपने साथ गाँव से शहर ले जाने की जिद करता है, तो पिता के शब्द अपने बेटे के लिये – डॉ. राम कुमार त्रिपाठी कृत “शिखंडी का युद्ध” कहानी “वानप्रस्थ”

पिछले दिनों जब हम उज्जैन प्रवास पर थे तब हमने डॉ. राम कुमार त्रिपाठी कृत “शिखंडी का युद्ध” पढ़ी थी जिसकी एक कहानी “वानप्रस्थ” से ये कुछ शब्दजाल बहुत ही अच्छे लगे। और मन को छू गये।
जब बेटा अपने माता पिता को अपने साथ गाँव से शहर ले जाने की जिद करता है, तो पिता के शब्द अपने बेटे के लिये –
थोड़ी देर बाद माँ के आंसू कम हुए तो बोली, ’बेटे, तुम्हें कैसे समझाऊँ अपने भीतर की बात। तुम्हारे पिताजी ही तुम्हें अच्छी तरह समझा सकते हैं। उनकी बातें तो पूरी तरह से मैं नहीं समझती, लेकिन इतनी जरुर समझती हूँ कि तुमसे वे बहुत ज्यादा प्यार करते हैं, मुझ से कहीं अधिक क्योंकि वे हमेशा मुझे समझाते रहते हैं कि
“अगर हम लोगों का लगाया हुआ वृक्ष आज इतना बड़ा हो गया है कि अपना फ़ल खिलाकर अनेकों को तृप्त कर सकता है, अपनी छाया में अनेकों को विश्राम दे सकता है, तो क्या हम लोगों को उस पेड़ से चिपके रहना चाहिये ? कदापि नहीं ? उचित तो यही होगा कि हर क्षण हर घड़ी उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिये ताकि उसकी डाली पर किसी दुष्ट की कुल्हाड़ी न चले और उसकी छाया घट न जाए। हम लोग तो अब चौथेपन में आ चुके हैं। अभी का जीवन वानप्रस्थ की तरह व्यतीत करना चाहिए था, अत: जंगल न सही घर ही में रहना है, किंतु एकाकी। अपने लगाये पेड़ से दूर। उसकी छाया से दूर ताकि जीवन के अंतिम क्षणों में उसकी हल्की छाया भी कल्पतरु की छाया लगे, हल्का स्पर्श भी अमृत-सा लगे और उसकी तना का रंचमात्र आलिंगन भी अनंत ब्रह्मांड का आलिंगन बन जाये।”

मुंबई ब्लॉगर्स मीट २५ अप्रैल २०१० – सबकुछ एक ही किश्त में, सबकी शिकायत के मद्देनजर.

मुंबई ब्लॉगर्स मीट हुई थी पिछले रविवार २५ अप्रैल २०१० को पर विवरण हम आज लिख पा रहे हैं, वैसे तो विभा रानी जी, रश्मि रविजा जी, जादू जी और हम अपनी एक तुरत फ़ुरत पोस्ट तो लिख ही चुके थे।
ब्लॉगर्स मीटिंग शाम ४ से ७ बजे तक एक स्कूल में रखी गई थी, और मीटिंग को ऊर्जावान बनाने का काम किया था विभा रानी जी, बोधिसत्व जी और आभा जी ने।
हम बिल्कुल ३.४५ दोपहर को अपने घर से निकले क्योंकि जहाँ मीटिंग थी वहाँ का रास्ता केवल हमारे लिये १० मिनिट का था, जब हम ब्लॉगर मीटिंग स्थल पर पहुँचे तो पाया कि जैसे ही हम ऑटो से उतर रहे हैं, विमल कुमार जी अपनी बाईक खड़ी करके हेलमेट उतार रहे थे और वही पहचान गये अरे भई क्या हालचाल हैं, पिछली मुंबई ब्लॉगर्स मीट में विमल कुमार जी से हमारी पहली मुलाकात हुई थी।
फ़िर मुलाकात हुई विभा रानी जी से और उनकी बिटिया कोशी से, कोशी भी ब्लॉगर हैं। विभा रानी जी से हमारा पहली बार परिचय हुआ, विमल कुमार जी ने बताया कि आपके ब्लॉग छम्मकछल्लोकहिस को अभी अवार्ड मिला है। हमने उन्हें बधाई दी।
इतने में ही बोधिसत्व जी और आभा जी भी आ गये, फ़िर हम बोधिसत्व जी और विमल कुमार जी थोड़ा पास ही घूमने चल दिये, तो आप दोनों के इलाहबादी किस्से सुनकर हम चकित हो रहे थे और मन ही मन उनके किस्से सुनकर आनंद भी आ रहा था, और कभी ऐसा लगा ही नहीं कि हम पहली या दूसरी बार मिल रहे हैं।
जब तक हम पहुँचे वापिस स्कूल की कक्षा में जहाँ कि ब्लॉगर्स मीट होनी निश्चित थी, तब तक अनिल रघुराज जी भी आ चुके थे, अनिल रघुराज जी से भी हमारी पहली मुलाकात थी। तभी बोधिसत्व जी के पास फ़ोन आया अभय तिवारी जी का, बस थोड़ी देर में ही अभय तिवारी जी भी आ गये। फ़िर आये अनिता कुमार जी और घुघुती बासुती जी, वैसे तो अनिता कुमार जी से चैट होती रहती है पर साक्षात दर्शन पाकर अच्छा लगा। इतने में रश्मि रविजा जी भी आ गईं, फ़िर आज राज सिंह जी और फ़िर ब्लॉगर फ़ैमिली जी हाँ यूनुस खान, ममता और जादू जी।
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विभा रानी जी, रश्मि रविजा जी, विमल कुमार जी, बोधिसत्व जी, अभय तिवारी जी
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विभा रानी जी, रश्मि रविजा जी, विमल कुमार जी, बोधिसत्व जी, अभय तिवारी जी
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विमल कुमार जी, बोधिसत्व जी, अभय तिवारी जी, अनिल रघुराज जी, अनीता कुमार जी
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अनिल रघुराज जी, अनीता कुमार जी
परिचय का दौर शुरु हुआ, विभा रानी जी ने अपना परिचय दिया उन्होंने बताया कि उनका एक ब्लॉग है बच्चों की कविताओं का जो कि हमें भी बहुत अच्छा लगा।
फ़िर परिचय हुआ हमारा याने कि विवेक रस्तोगी कल्पतरु का तो हमने बताया कि कुछ आध्यात्म पर लिखते हैं और कुछ वित्तीय और कुछ हल्के फ़ुल्के चिठ्ठे।
आभा मिश्रा जी ने अपने ब्लॉग अपना घर के बारे में बताया कि जो भी कुछ लिखने को होता है वह इस ब्लॉग पर लिखती हैं।
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आभा मिश्रा जी
रश्मि रविजा जी ने बताया कि वे दो ब्लॉग लिखती हैं जिसमें एक कहानियों के लिये समर्पित है और दूसरे पर जो भी इच्छा होती है लिखती हैं।
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घुघुती बासुती जी ने अपने ब्लॉग का परिचय दिया और बताया कि कैसे अपने मानस स्तर के लोगों से मेलजोल हुआ। ब्लॉग जगत में आकर सामाजिक वर्जनाओं के बीच अपनी पहचान बनाकर आज वे बहुत खुश हैं, आज उनको लोग उनके खुद की वजह से जानते हैं जो कि केवल उनकी अपनी पहचान हैं, और लोग मिलने के लिये ढूँढ़ते हुए घर तक पहुँच जाते हैं। घुघुती बासुती जी ने फ़ोटो लेने का मना कर दिया था तो हमने उनकी इच्छा का पूरा सम्मान किया और आशा है कि पूरा ब्लॉगजगत इस सम्मान को बनाये रखेगा।
अनीता कुमार जी ने अपने ब्लॉग लेखन की शुरुआत अपने एक लेख से की थी जो लिखा तो किसी के कहने पर था पर उन्हें वह लेख पसंद नहीं आया तो अपना ब्लॉग बनाकर उन्होंने पोस्ट बना दी।
फ़िर यूनुस खान जी के ब्लॉग से आजकल वे वाद्ययंत्रों के बारे में सीख रही हैं, और उन्हीं के कारण गानों में ज्यादा रुचि जागृत हुई, कि गानों के साथ कौन से साज बज रहे हैं ये भी जानने को और सीखने को मिला।
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राज सिंह जी
राज सिंह जी अपना ब्लॉग चलाते हैं राजसिंहासन और वे एक फ़िल्म बना रहे हैं जो कि अगले २६ जनवरी को प्रदर्शित करने की इच्छा रखते हैं, आपने अपनी फ़िल्म के बारे में जानकारियाँ दी।
अनिल रघुराज जी ने अपने ब्लॉग के बारे में बताया और अपने नये वित्तीय हिन्दी पोर्टल अर्थकाम.कॉम [… क्योंकि जानकारी ही पैसा है!] के बारे में बताया कि भारत में धन का उपयोग कैसे करना है उसके जागृति नहीं है और वे अपना योगदान राष्ट्र को इस पोर्टल के माध्यम से दे रहे हैं।
ममता जी ने जादू और अपना परिचय दिया कि वे जादू के साथ इतनी व्यस्त रहती हैं कि जादू का ब्लॉग ही अब उनका ब्लॉग हो चला है, पर फ़िर भी कोशिश रहती है कि अपने ब्लॉग पर कुछ न कुछ पोस्ट करती रहें और नियमित रहें।
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जादू जी, ममता जी
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राज सिंह जी, अनिल रघुराज जी, जादू जी, ममता जी
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यूनुस खान जी, विमल कुमार जी
यूनुस खान जी ने अपने ब्लॉग के बारे में बताया रेडियोवाणी संगीत को समर्पित उनका ब्लॉग है और अभी हाल ही में तीन वर्ष पूर्ण किये हैं और अब वे वाद्ययंत्रों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।
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अभय तिवारी जी और यूनुस खान जी
अभय तिवारी जी और बोधिसत्व जी ने अपने परिचय में ब्लॉग से संबंधित जानकारी दी और साथ में खानपान का दौर भी चलता रहा।
विमल कुमार जी ने बताया कि जो गाना उन्हें लगता है कि इस गाने में कुछ विशेष है या यह गाना सबको सुनाना चाहिये बस अपने ब्लॉग के माध्यम से सुना देते हैं।
वैसे तो रश्मि रविजा जी [मुंबई ब्लॉगर्स मिले कुछ ऐसे, बहुत पुरानी पहचान हो जैसे], अनीता कुमार जी [ ब्लोगर मीट और आलसीराम], जादू जी[‘जादू’ की पहली ब्‍लॉगर्स-मीट ] और विभा रानी जी [ मुंबई ब्लॉगर्स मीट- बोलती तस्वीरें!] ने मुंबई ब्लॉगर मीट पर विस्तार से चर्चा कर दी है उस विस्तार से चर्चा करना मेरे लिये अब मुश्किल हो रहा है क्योंकि समय ज्यादा बीत चुका है और बिल्कुल गजनी स्टाईल में अपने को शार्ट टर्म मेमोरी लोस हो गया है।
पंकज उपाध्याय जी और महावीर सेमलानी जी से हमारी बात हुई थी परंतु आप दोनों ब्लॉगर्स मुंबई के बाहर थे। नीरज गोस्वामी जी से क्षमा चाहेंगे कि हम जान बूझकर नहीं भूले थे, पर ये सबक था हमारे लिये कि अब नहीं भूलेंगे। देवकुमार झा जी आपका भी स्वागत है, मुंबई ब्लॉगर बिरादरी में, आगे से ध्यान रखेंगे । सतीश पंचम जी का जौनपुर जाने का कार्यक्रम निश्चित था, इसलिये वे भी सम्मिलित नहीं हो पाये।
और अंत में एक बात पहली बार हमने बिना किस्त के ये इतनी लंबी पोस्ट लगाई है, सब टिप्पणी पढ़कर हाँफ़ रहे हों परंतु आशा है कि  फ़ोटो देखकर सबकी थकान मिट गई होगी।

उज्जैन की प्रसिद्ध चीजों के बारे में, हमारे मित्र “बल्लू” का एस.एम.एस

हमारे प्रिय मित्र ने एक एस.एम.एस. भेजा था जिसमें उज्जैन की वो लगभग सारी चीजें हैं जिससे हरेक उज्जैनवासी का लगाव हो न हो पर हमारे मित्र मंडल का लगाव बहुत है आप भी पढ़िये उज्जैन की प्रसिद्ध चीजों के बारे में, और यकीन मानिये अगर आप उज्जैन में रहते हैं और नीचे लिखी एक भी चीज को नहीं जानते हैं तो निकल पड़ें, और ढूँढें, और सूचि को पूरा करें –

हमारे मित्र बल्लू का एस.एम.एस. बल्लू हम मित्र को प्यार से बोलते हैं ।

वो महाकालेश्वर का मंदिर
वो टेकड़ी की चढ़ाई
वो भोलागुरु के गुलाबजामुन
वो टॉप एन टाऊन की आईसक्रीम
वो क्षीरसागर स्टेडियम के मैच
वो विक्रमवाटिका की हरियाली
वो जैन की कचौरी
वो पेटिस लक्ष्मी बेकरी वाला
वो नरेन्द्र टाकीज की मूवीज
वो श्री की फ़ेक्टरी
वो शहनाई की शादियाँ
वो गंगा बेकरी के पेस्ट्री
वो बस स्टैंड का पोहा
वो मद्रासी का डोसा
वो आनंद की चाट
वो ओम विलास का समोसा
वो इस्कॉन की रौनक
वो सर्राफ़े की गलियाँ
वो ऐरोड्रम का सन्नाटा
वो राजकुमार की दाल
वो मामा की दुकान का पान
वो बल्लू की दोस्ती
यही सब तो है हमारे उज्जैन की शान

भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

मनीष हाड़ा उवाच


भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर,दूसरा हार्न पर.

यू.पी.

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर, दूसरा खिड़की से बाहर.

पंजाब

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर, दूसरा अखबार पर,पाँव एक्सीलेटर पर.

तमिलनाडु

* दोनों हाथ स्टियरिंग व्हील पर,आँखें बंद, दोनों पाँव ब्रेक पर.

बिहार

* दोनों हाथ इशारे करते हवा में, दोनों पाँव एक्सीलेटर पर, सिर पिछली सीट के सवार से बात करने के लिए एक सौ अस्सी के अंश पर घूमा हुआ.

हरियाणा

* एक घुटना स्टियरिंग व्हील पर,एक हाथ पेसेंजर सीट पर बैठी गर्ल फ्रेंड की पीठ पर, दूसरा उसके गिरहबान में, दूसरा पाँव दक्षता से बारी-बारी एक्सीलेटर, क्लच,ब्रेक पर.

इंदौर.

* एक हाथ हार्न पर-वहां नहीं तो खिड़की से बाहर -दूसरा गियर स्टिक पर,एक कान स्टीरियो सुनता,दूसरा मोबाइल सुनता,एक पाँव एक्सीलेटर पर,एक क्लच पर,ब्रेक पर कोई नहीं,दोनों आँखें बाजू में स्कूटी चलाती लड़की पर.

धार में आपका स्वागत है

गूढ़ ज्ञान :- हमारे मित्र का उवाच –

मनीष हाड़ा उवाच (द्वितीय)

गूढ़ ज्ञान :-

* फैसला करूँ या न करूँ, ये फैसला है; फैसला कर न सकूँ, ये नाकामी है.
* बेवकूफ अगर अनगिनत हों तो उनकी ताक़त को कम कर के आंकना नादानी है.
* कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वाभाविक मूर्खता का मुकाबला नहीं कर सकती.
* आपके चारों ओर हाहाकार है,लेकिन आप शांत हैं तो इसका मतलब है कि स्थिति की गंभीरता आपके पल्ले नहीं पड़ी है.
* किसी चीज पर लिखा हो कि एक ही साइज़ सबको फिट आता है तो इसका मतलब है वो किसी को फिट नहीं होगा.
* इतना आसान कोई काम नहीं होता कि उसे बिगाड़ा न जा सके.
* खुद न करना पड़े तो कोई काम नामुमकिन नहीं होता.
* अगर आप कामयाब नहीं होते,तो इस बात के सारे सबूत नष्ट कर देना ही श्रेयस्कर होता है कि आपने कोशिश की थी.
* अगर आप कुशल कार्यकर्ता हैं तो सबसे ज्यादा काम आपके पल्ले पड़ेगा, आप अतिकुशल कार्यकर्ता हैं तो ज्यादा काम से पल्ला झाड़ने की जुगत आप यक़ीनन कर लेंगे.

मजबूरी इस मानव मन की… मेरी कविता .. … विवेक रस्तोगी

कई बार
कुछ कहने की
इच्छा नहीं
होती
पर फ़िर भी
कहना पड़ता है,
कोई चेहरा
कभी बिगड़ जाता है
आईना
टूट जाता है,
बिगड़े हुए चेहरे
मैं कब तक देखूँ,
मजबूरी इस मानव मन की
चेहरे देखने की
कहने की
पता नहीं
कब खत्म होंगी
ये मजबूरियाँ
ये मानसिक तुष्टियाँ।