इसी का नाम दुनिया है : हमारे मित्र का उवाच –

हमारे मित्र हैं, जिनसे वर्षों हो चुके हैं मिले हुए उनके उवाच ( मनीष हाड़ा उवाच J

इसी का नाम दुनिया है :

* कोई दूसरा चमचागिरी करे तो वो जी-हुजूरी है,हम करें तो वो उच्चाधिकारी के लिए सम्मान है.
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कोई दूसरा टिप न दे तो वो कंजूस है,हम टिप न दें तो हम पैसे की कीमत समझने वाले हैं.
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कोई दूसरा “आउट” हो जाये तो वो पी के उधम मचाने वाला गैर-जिम्मेदार शख्स है,उन्ही हालत मैं हम पार्टी की जान हैं.
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कोई दूसरा कहीं लेट पहुंचे तो वो वक़्त का पाबन्द नहीं, हम वक़्त के गुलाम थोड़े ही हैं.
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कोई दूसरा मुंह फाड़े तो उसे अपनी जुबान पर काबू नहीं है,हम ऐसा करें तो इसलिए क्योंकि हम मुक्त संवाद में आस्था रखते हैं.
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कोई दूसरा नुक्ताचीनी करे तो वो खुन्दकी है,हम ऐसा करें तो हम पारखी निगाह रखते हैं.
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कोई दूसरा कोई नुकसान करे तो वो गैर-जिम्मेदार है,उसे कमाना नहीं पड़ता न, वही नुकसान हम करें तो आखिर गलती इंसान से ही होती है.
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कोई दूसरा चुगली करता है, हम वही कहते हैं जो सच है.

मुंबई ब्लॉगर मीट दिनांक २५ अप्रैल २०१० पहली रिपोर्ट – ब्रेकिंग न्यूज

आज मुंबई ब्लॉगर मीट की गई, जिसमें विभारानी, बोधिसत्व, आभा मिश्रा, विमल कुमार, अभय तिवारी, राज सिंह, अनिल रघुराज, यूनुस खान, अनीता कुमार, घुघुती बासुती, ममता, जादू, रश्मि रविजा, विवेक रस्तोगी ने शिरकत की। जल्दी ही रिपोर्ट प्रकाशित की जायेगी 🙂


अभी कुछ फ़ोटो से काम चलाइये –

क्रम से – विभरानी, रश्मि रविजा, विमल कुमार, बोधिसत्व, अभय तिवारी
क्रम से – विमल कुमार, बोधिसत्व, अभय तिवारी, अनिल रघुराज, अनीता कुमार, आभा मिश्र

२ सेव और ३ सेव कितना होता है ५ सेव, और दूसरा अध्यापक उनको शिक्षा देता है ४ केला और १ केला ५ केला होता है, अभी दोनों गणित सिखा रहे हैं, दोनों में कोई अंतर है,

२ सेव और ३ सेव कितना होता है ५ सेव, और दूसरा अध्यापक उनको शिक्षा देता है ४ केला और १ केला ५ केला होता है, अभी दोनों गणित सिखा रहे हैं, दोनों में कोई अंतर है, तो एक कहेगा नहीं कोई अंतर नहीं है, दोनों बराबर सिखा रहे हैं, दूसरा कहेगा नहीं बहुत बड़ा अंतर है ये तो सेव है, और ये तो केला है। तो केला और सेव को लेकर झगड़ा शुरु !!! और मूल सिद्धांत जो गणित सीखना है वो रह गया । तो उसी प्रकार भक्ति में भी कई बार मूल सिद्धांत को छोड़कर किस प्रकार से उस गणित को समझाना है इस मसले को लेकर मतभेद उत्पन्न हो जाता है। तो इसीलिये सर्वप्रथम दृष्टि यह है कि दूसरों में दोष देखना ।


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मेरे छोटे पहलवान के फ़ोटो, उसकी फ़ुटबॉल के फ़ोटो और मेरी एक किताब

मेरे छोटे पहलवान का फ़ोटो





मेरे छोटे पहलवान का फ़ुटबॉल के साथ फ़ोटो

पहलवान की फ़ुटबॉल के फ़ोटो

मेरी एक किताब जो कि अधूरी है.. पढ़ना


सुबह का अलार्म अच्छा लगता है क्या “किर्र किर्र” ? आप भी बताईये अपने अनुभव…. ? हमने तो इस पर विजय प्राप्त कर ली :)

रोज सुबह उठने के लिये अलार्म की आवाज अच्छी लगती है क्या ?
अलार्म की “किर्र किर्र” किसे अच्छी लगती है, जब हमने सुबह घूमने जाने का निर्णय लिया था तब तो अलार्म दुश्मन जैसा जान पड़ता था कि “हाय” अभी तो मीठी नींद चल ही रही थी, अभी तो सोये ही थे और ये मुआ अलार्म बज पड़ा और जैसे ही अलार्म की किर्र किर्र कान में पड़ती, हम उसका टेंटुआ ऐसा दबाते कि जैसे किसी दुश्मन का दबाते हों, पर ये मुआ अलार्म तो रोज ही बजता जाता है। अगर दुश्मन का टेंटुआ दबाते तो वो शायद ही उठ पाते पर ये अलार्म जान पर ही आ पड़ता है।
अब धीरे धीरे अलार्म की जरुरत खत्म हो गयी है, हमारी जैविक घड़ी अब सक्रिय हो गई है। इसलिये अब अलार्म का “किर्र किर्र” करने का भाने या न भाने का संबंध ही खत्म हो गया है।
अब हमारी तो जैविक घड़ी अपनी सक्रियता से चल रही है, और हम तो अलार्म बजने के पहले ही उठ पड़ते हैं।
आप बताईये अपने अनुभव कि कैसा अनुभव है अलार्म का ….?

पिछले दिनों के कुछ फ़ोटो, उज्जैन प्रवास के दौरान पढ़ी गई किताबें, नेहरु प्लेटिनोरियम और ट्रेन की यात्रा

   कुछ किताबें जो हमने अपने उज्जैन प्रवास के दौरान घर पर पढ़ीं – 

 

ताराघर मुंबई के अंदर का एक फ़ोटो –

ताराघर के बाहर के फ़ोटो और उज्जैन जाते समय ट्रेन से खींचा गया एक फ़ोटो और वर्ली सी लिंक का बस में से खींचा गया फ़ोटो –

         

उच्च रक्ताचाप, चाय बिस्किट, चाय की नाट और पेट पर अत्याचार

    रोज की दिनचर्या बदलती जा रही है सुबह की सैर और दवाईयाँ जीवनचर्या में शामिल हो गई है। बिना मसाले की सब्जियाँ, बिना घी की रोटी, अचार बंद, पापड़ बंद, मिठाईयाँ बंद, नमकीन बंद, तला हुआ बंद सब कुछ बंद, ये डॉक्टर है या क्या, सब कुछ बंद कर दिया, अब न खाने में स्वाद है और न ही खाने की इच्छा होती है, हम भी पक्के हैं कार्य के दिनों में यह सब पालन करते हैं और बाकी के दो दिन जमकर यही सब उड़ा लेते हैं।

    अगर बाकी के दो दिन भी पूरा वही खाना खा लिया तो बस समझो कि अपन तो बहुत ही जल्दी सन्यासी होने वाले हैं, अरे जब कुछ खाना ही नहीं है तो नौकरी किसलिये करनी है, मजा में अपने शहर में जाकर ताजी हवा में रहें, इस महानगरी की दौड़ा दौड़ी से तो निजात मिलेगी।

    दिनभर में चाय ४-५ आ जाती है पर अब हम २ पर टिक गये हैं, और चाय वाले समय अपनी सीट से गायब होने में ही अपनी भलाई समझते हैं। या फ़िर ये है कि आधी चाय ले ली जाये अब आती है तो मना तो करते नहीं बनता ना। क्योंकि चाय की नाट बुरी होती है।

    दोपहर को खाना लेकर जाते हैं, मजे में खाना खाते हैं पर समस्या शुरु होती है ४बजे के बाद, लोगों को भूख लगने लग जाती है और चिप्स, बिस्किट और नमकीनों के पैकेट अपनी डेस्क पर ही खुलने शुरु हो जाते हैं, और हम अपने क्यूबिकल वालों को देखते रहते हैं, सोचते रहते हैं कि ये मुए कितनी कैलोरी खाते हैं, जैसे मेरी बंद हो गई है इन सबकी बंद हो जायेगी एक दिन।

    चिप्स के पैकेट या नमकीन के पैकेट लाकर बिल्कुल हमारे सामने ला देंगे और फ़िर मुस्कराते हुए चिढ़ाते हुए कहेंगे ले लो विवेक एक या दो से कुछ नहीं होगा और अगर गलती से अपना ईमान डोल गया तो बस क्यूबिकल की दूसरी साईड से आवाज आ जायेगी विवेक हाई बी.पी. है क्या कर रहे हो ?सबकी सोची समझी साजिश जैसी लगती है। परंतु क्या करें हम तो बेचारे हो जाते हैं।

    लिखने में ब्रेक हो गया था हमारे पारिवारिक मित्र के यहाँ रात्रिकालीन भोजन पर गये थे जहाँ दबाकर दाल ढ़ोकली और खरबूजे का पना खाया गया। विशेषकर आज बहुत दिनों बाद दो चीजें भोजन में मिली एक तो घी और दूसरी मसाला युक्त भुनी हुई हरी मिर्चें

    फ़िर शाम को ऑफ़िस से निकले तो गेट के बाहर ही कितने ही स्टॉल वाले खड़े रहते हैं, अब नाम हमसे बताया नहीं जायेगा नहीं तो यह पोस्ट पढ़ने के बाद हमारे उपर इल्जाम लगने लग जायेंगे कि खूब ऐश चल रही है और भी बहुत कुछ फ़लाना ढ़िमकाना …। फ़िर भीकाजी फ़ूडजंक्शन पड़ता है और समोसे आलूबड़े और भी गरम व्यंजनों की खुश्बुओं से अप्रभावित हुए बिना हम निकल लेते हैं सिग्नल के पास मूवी टाईम की ओर ऑटो पकड़ने के लिये, परंतु बीच में फ़िर एक सूखी भेलपूरी वाला मिल जाता है तो हम ५ रुपये में एक भेलपूरी ले लेते हैं ये सोचते हुए कि इसमें तो तला गला कुछ है नहीं खाया जा सकता है। कभी कभी उसके आगे भी रुक जाते हैं जहाँ एक पानी बताशे वाला है और इस बात पर तो हमारे एक मित्र ने घर पर शिकायत भी कर दी थी और खूब हंगामा हुआ था, और वह आज भी हमें धमकी दे देता है कि घर पर बोल दूँगा। पर फ़िर भी हम पर कोई असर नहीं है।

    “दाल ढ़ोकलीहमने बहुतायत में खा ली है और हमारा पेटेंट डायलॉग बोल देते हैं कि आज पेट पर अत्याचार कर दिया है, इसलिये यहीं विराम देते हैं। बाकी किसी ओर दिन… जब खाने पर लिखने का मन होगा ।

मुंबई महानगरी में मित्रों के आपसी रिश्तों की गर्मी जो कि मोबाईल और मिलने से भी ज्यादा जरुरी है .. और चोकोलावा केक… यम्मी

    रोज ही जिंदगी दौड़ती जा रही है, अपनी रफ़्तार से । कहने को तो मुंबई में रहते हैं, रफ़्तार जिंदगी की देखते ही बनती है, गर कभी रफ़्तार से छुट्टी मिल जाये तो मानो लॉटरी खुल गयी हो । सप्ताहांत पर पूर्ण विश्राम और अपने पारिवारिक मित्रों के साथ मेलजोल। पर एक बात है मुंबई में सामाजिक दायरा खत्म सा होता दिखता है, हमारे बहुत सारे मित्र हैं, जिसमें सभी श्रेणी के मित्र हैं जिगरी, लंगोटिया, नौकरी के दौरान जिनसे मन मिले इत्यादि।

    अभी २ दिन पहले ही हमने अपने एक मित्र को फ़ोन लगाया तो पता चला कि उनका मोबाईल व्यस्त है और आवाज आ रही है थोड़ा वेड़ानी काल करा। मोबाईल भी करो तो अपना कॉल वेटिंग पर, बात हो जाये वही बहुत है, मिलना तो दूर की बात है, और फ़िर यहाँ की सभ्यता सीख गये हैं कि अगर मोबाईल व्यस्त है तो अपने आप ही काट दिया जाये और फ़िर याद रखकर बाद में वापिस से बात की जाये या फ़िर उसका फ़ोन आ जाये, पर फ़ोन आ जाये तो बहुत ही धन्य हैं आप कि आपके मित्र ने इतनी व्यस्तता के बीच आपसे बात करना जरुरी समझा, फ़िर एक बात यह भी है कि जब वह फ़्री हो और आप व्यस्त हों तो फ़िर अपन फ़ोन काटते हैं और एस.एम.एस. करते हैं कि अभी व्यस्त हूँ, थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ और वापसी में मित्र का एस.एम.एस. आ जाता है ओके। तो अपने मित्रता के संबंधों में भी बहुत सारी चीजें आ गयी हैं। पर फ़िर भी केवल दिल की बात है कि घनिष्ठता कम नहीं हुई है, क्योंकि हम लोगों ने मतलब मित्रों ने आपस में बहुत सारे ऐसे पल बिताये हैं जो कि हमें बहुत करीब ले आये हैं और एक दूसरे की परेशानी समझते हैं। इन छोटी सी बातों का हमारे मधुर संबंधों में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।

    यहाँ मुंबई में रिश्ते भी समय सीमा के भीतर निपटा लिये जाते हैं जिससे दोनों पार्टी खुश, क्योंकि सभी का समय कीमती है।

    हमारे जिगरी मित्र से फ़ोन पर बात हो रही थी अरे वोही जिनका मोबाईल व्यस्त आ रहा था, उन्होंने अपने ऑफ़िस से फ़ोन किया था हमारे मोबाईल पर। तो बस हम भी बेतकल्लुफ़ हो लिये क्योंकि अपने पैसे भी नहीं लग रहे थे और अपने मित्र से दिल की बात भी कर रहे थे। वैसे भी आजकल फ़ोन पर बात करना बहुत ही सस्ता हो गया है, पहले फ़ोन पर बात करने के पहले सोच लेते थे कि केवल ५ मिनिट ही बात करेंगे पर अब मोबाईल की कॉल दर सस्ती हो गईं हैं तो अब उतना सोचना नहीं पड़ता और हाँ अवश्य ही आमदनी भी इसका एक कारण है।

    हमने मित्र को बोला कि आ जाओ शनिवार को हमारे यहीं रुकना और रविवार को निकल लेना। क्योंकि मिले हुए लगभग १ वर्ष से ज्यादा हो चुका है, महानगर में एक तरफ़ का समय किसी के यहाँ जाने का हमारे लिये तो कुछ ज्यादा ही लगता है, कि दूसरे शहर ही जा रहे हों। हमारा मानस जो दूसरे शहर का है वह तो बदल नहीं सकता है ना !!! हमारे मित्र बोले कि शनिवार को तो त्रैमासिक ऑडिट आ रहा है और रिव्यू भी है ४-५ मुश्टंडे हैडऑफ़िस से आ रहे हैं, सारी खबर लेने के लिये। तो शाम को ४-५ तो आराम बज जायेंगे, उसके बाद आ जाते हैं, हमने आगे रहकर मनाकर दिया कि अगर ८ बजे तक आओगे फ़िर क्या खाक करोगे यहाँ आकर, केवल खाना खाकर निकल लोगे, क्यों भला हम तुम्हें इतनी तकलीफ़ दें। क्योंकि रविवार को रुकने का पहले ही मना कर चुके थे, उनको उनकी श्रीमती को उनकी दीदी के घर ले जाना था, हमने सलाह दी थी कि अगले रविवार पर टलवा दिया जाये ये दीदी के यहाँ का कार्यक्रम तो हमारे मित्र बोले दादा !!! पिछले ४-५ रविवार से यही कर रहा हूँ, और अगर इस बार नहीं ले गये तो समझो कि शनिवार को ऑफ़िस में रिव्यू और रविवार को घर में !!!

फ़िर बात हुई कि चलो अब किसी और रविवार का कार्यक्रम बनाया जायेगा।

विशेष – कल डोमिनोज पिज्जा खाया गया था और वहाँ पर सभी को चोकोलावा केक बहुत पसंद आया, अगर चॉकलेट के शौकीन हों तो जरुर चखें।

ये वॉचमेन को सारे बच्चे “मामा” क्यों बोलते हैं ? असुरक्षा की भावना पर एक प्रश्न … सभी के लिये …

    आज बाजार जाते समय हम जैसे ही अपनी बिल्डिंग से बाहर निकलने लगे तभी वॉचमेन के पास कोई बच्चा आया और मामा कहकर कुछ बात कहने लगा। तो हमारी पत्नी जी ने हमारी तरफ़ मुखतिब होते हुए बोला कि ये सारे बच्चे लोग वॉचमेन को मामा क्यों कहते हैं। अनायास ही हमारे मुँह से इसका क्या जबाब निकला होगा …

जरा अंदाजा लगाईये….






जिससे इनकी मम्मी सुरक्षित रहें !!!

बात मजाक की हो गई, (कृप्या महिला मंडल इस पर कोई बबाल न करे और आपसी पति पत्नी की नोंकझोंक मानकर भुला दे)

परंतु अगर मजाक की बात छोड़ दी जाये तो वाकई यह एक ज्वलंत प्रश्न है कि हम हमारे बच्चों को मामा बोलना क्यों सिखाते हैं, क्या यह हमारी असुरक्षा की भावना को कम करता है या कुछ और….. ?

पानी की विकराल समस्या और व्यक्तिगत रुप से पहल जरुरी, प्रतिबद्धता दिखाना पड़ेगी

    पानी याने कि जल हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है, पानी अगर समाज में सौहार्द और समृद्धि लाता है तो उसके उलट याने कि पानी न होने की दशा में पानी समाज का सौहार्द बिगाड़ता भी है और रही बात समृद्धि की तो बिना सौहार्द किसी समाज में समृद्धि नहीं आ सकती।

    जीवित प्राणियों की संख्या धरती पर दिनबदिन बड़ती ही जा रही है और साथ ही पानी की खपत भी, हम पानी की खपत करने में हमेशा से आगे रहे हैं परंतु पानी को बचाने में या पानी को कैसे पैदा किया जाये उसके लिये प्रयत्नशील नहीं हैं। अगर हम लोग इस दिशा में प्रयत्नशील नहीं हुए तो जिस भयावह स्थिती का सामना करना पड़ेगा वह कोई सोच भी न पायेगा।

    आज अगर लूट भौतिकतावादी वस्तुओं की है जो कि विलासिता की श्रेणी में आती हैं, अगर हम लोग पानी को बचाने में सफ़ल नहीं हुए तो पानी भी जल्दी ही विलासिता की श्रेणी में शुमार हो जायेगा। सब कहते हैं, नारा लगाते हैं जल ही जीवन है, जल बिन सब सून, जल अनमोल है। परंतु उपयोग करते समय शायद यह सब भूल जाते हैं और अपने अहम को संतुष्ट करने के लिये पानी का दुरुपयोग करते हैं।

    अपनी इच्छाशक्ति की कमी के चलते हुए ही हम पानी के दुरुपयोग को रोक नहीं पा रहे हैं, अगर आज भी ईमानदारी से जल के क्षरण को रोक लें । प्रण करें कि जितना पानी हम रोज उपयोग कर रहे हैं, उसे अनमोल मानते हुए बचायें और पूरे समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करें। जितना पानी का उपयोग आज कर रहे हैं, कोशिश करें कि उसका आधा पानी में ही अपनी सारी गतिविधियों को समाप्त कर लिया जाये।

    नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब पानी के लिये तरसना होगा और ये पानी की टंकियां और पानी के पाईप हमारी धरोहर होंगी, हमारी आगे की पीढ़ियाँ पानी के उपयोग से वंचित हों। आज हमारे लिये उस भयावह स्थिती का अंदाजा लगाना बहुत ही कठिन है, क्योंकि हमारे पास पानी है। उस समय हो सकता है कि पानी केवल आर्थिक रुप से संपन्न लोगों की बपौती बनकर रह जाये और वे पानी को बेचकर उसके बल पर ही आर्थिक रुप से संपन्न हों, जैसे रेगिस्तान में पानी के कुओं से पानी बिकता है वैसे ही इस शहरी सभ्यता में भी पानी बिकने लगे। जो कि मानव सभ्यता के लिये बहुत बड़ा सदमा होगा।