किरण अंधकार सुबह रात …. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी
भकभकाती गर्मी में …. मेरी कविता ….. विवेक रस्तोगी
पिस रहा हूँ मानसिक दबाब के ….. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी
मेरा आसमां …. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी
ऑनसाईट जाने की खुशी, परिवार की
“ऐ मिडम इधर का सेठ किधर है, अपुन के भाई को बात करने का है”
“पत्नि कौन है”, “पति कौन है” एक वाक्य में एस.एम.एस. द्वारा अभिव्यक्ति
आज सुबह उठने के बाद मोबाईल में झांका तो पाया एक एस.एम.एस. हमारा इंतजार कर रहा है, जो कि सही मायने में “पत्नि कौन है”, “पति कौन है” एक वाक्य में अभिव्यक्ति है।
हमने भी मनन किया, कब ? (आज सुबह घूमते समय आज कान में कानकव्वा न लगाकर सोचने के लिये समय दिया और इसलिये कानकव्वे द्वारा सुनने वाला लेक्चर भी आज मिस हो गया )और पाया कि वाकई बात तो सही है।
“पत्नि कौन है” – पत्नि वो है जो पति को टोक टोक कर उसकी सारी आदतें बदल दे और फ़िर कहे “तुम पहले जैसे नहीं रहे।”
“पति कौन है” – पति वो है जो पत्नि को टोक टोक कर उसकी आदतें बदलना चाहता है और फ़िर कहे “तुम कभी बदल नहीं सकतीं।”
क्या यह एक वाक्य की अभिव्यक्ति सही है, आप भी अपने विचार बैखोफ़ होकर लिखें, अपनी पत्नि या पति से !!!
बिजनेस वर्ल्ड के ५ अप्रैल के अंक के साथ माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस और टूल्स की मुफ़्त डीवीडी
कल हमने बिजनेस वर्ल्ड का ५ अप्रैल का अंक लिया तो साथ में मिली माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस और टूल्स की मुफ़्त डीवीडी।
निम्न सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं इस डीवीडी में –
१. माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस २०१०
२. शेयर पाईंट २०१०
३. माइक्रोसॉफ़्ट प्रोजेक्ट २०१०
४. माइक्रोसॉफ़्ट विसियो २०१०
५. विन्डोज एक्स पी एस.पी. ३
६. माइक्रोसॉफ़्ट सिक्योरिटीज एसेन्शियलस
७. इंटरनेट एक्सप्लोरर ८
८. विन्डोज लाईव एसेन्शियलस
आज ही अपनी प्रति खरीद लें और अपना कम्प्य़ूटर अपडेट कर लें।
जन्मदिन पर दिनचर्या उज्जैन में [दाल बाफ़ले, मिठाई, बाबा महाकाल के दर्शन, रामघाट पर झम्मकलड्डू] भाग २
जबेली का नाश्ता पूरा होने के बाद हमसे पूछा गया कि अब खाने में क्या पसंद करेंगे हम तो बस इंतजार ही कर रहे थे कि हमसे पूछा जाये और हम झट से कहें “दाल बाफ़ले”। बस हमने झट से कह दिया “दाल बाफ़ले”।
फ़िर बाफ़ले का आटा बाजार से लाया गया और दाल और बैंगन के भुर्ते की तैयारी की जाने लगी साथ में चावल ये हमारे मालवा का विशेष भोजन है, जिसके लिये हम हमेशा भूखे ही रहते हैं, बाफ़ले का घी जो कि बाफ़ले की रग रग में घुसा हुआ था, हमारे हाई बी.पी. और बड़े हुए कोलोस्ट्रॉल को मुँह चिढ़ा रहा था।
फ़िर हाथ से मीड़कर बाफ़ले में दाल मिलाकर मजे में अपनी देसी स्टाईल से खाने का आनंद लेने लगे, आज पेट के साथ साथ आत्मा भी तृप्त हो रही थी। आत्मा और मन आनंदित हो रही थी, दिल प्रफ़ुल्लित हो रहा था बाफ़ले के हर गस्से के साथ। अब ज्यादा बात नहीं करेंगे नहीं तो सभी ब्लॉगर्स हमसे अभी यहीं दाल बाफ़ले बनवा लेंगे। 🙂
कार्यक्रम बनाया गया कि पहले कुछ जरुरी खरीददारी की जाये फ़िर मिठाई ली जाये और फ़िर महाकाल और रामघाट चला जाये। मिठाई में हमने बंगाली मिठाई और काजूकतली ली दोनों ही हमें बेहद पसंद हैं, भले ही डॉक्टर ने मना किया हो परंतु कभी कभी तो उनकी मनाही को ताक पर रखा जा सकता है और मिठाई आनंद लेकर खाई जा सकती है। 😉
फ़िर समान घर पर रखकर चल दिये हम बाबा महाकाल के दर्शन करने के लिये, अपनी बाइक पर, पुराने उज्जैन की गलियों से निकलते हुए हमें सालों पुरानी यादें ताजा होने लगीं। जब महाकाल घाटी पहुँचे तो पता चला कि एकाकी मार्ग घोषित कर दिया गया है, तो हमने अपने पुराने रास्ते जो कि चौबीस खंबा माता मंदिर के पास से होकर महाकाल जाता है, उससे महाकाल पहुँचे और बाबा के दर्शन बड़े मजे में हुए। हम बाबा महाकाल के दर्शन करने के लिये रात को शयन आरती के पहले ही जाना पसंद करते हैं, क्योंकि उस समय एक तो भीड़ भी नहीं रहती और फ़िर आराम से दर्शन हो जाते हैं, शाम की ठंडक भी रहती है। बाबा महाकाल के दर्शन करने के बाद वहीं महाकाल प्रांगण में चल दिये हम बाबा बाल विजय मस्त हनुमान के दर्शन करने के लिये। सालों पहले हम बाबा महाकाल और बाल विजय मस्त हनुमान की आरती में रोज शामिल होते थे, सब बाबा का प्रताप है और आशीर्वाद है।
बाबा के दर्शन करने के बाद रामघाट चल दिये, रामघाट से भी बहुत ही गहरा लगाव है मेरा, रामघाट ऐतिहासिक और पौराणिक है। अभी तो खूब चहल पहल थी पर आज से सालों पहले यही रामघाट सुनसान रहता था और घाट भी कच्चा ही था हम साईकिल से लगभग रोज ही रामघाट जाते थे। बड़ा अच्छा लगा कि रामघाट पर चहल पहल रहने लगी है। वहाँ झम्मकलड्डू वाला खड़ा था, जो कि हमारी और हमारे बेटे की पहली पसंद है, हमने लिया काला खट्टा और बेटेलाल ने लिया पंचरंगा, जिसे शुद्ध हिन्दी में बर्फ़ का गोला भी कहा जाता है। आजकल तो रामघाट पर बोटिंग भी हो रही है। चलो अच्छा है कि हमारा उज्जैन प्रगति पर है, सिंहस्थ आने को केवल सात वर्ष बाकी है।
घर वापिस लौटते समय महफ़ूज भाई का फ़ोन आया परंतु हम ज्यादा बात नहीं कर पाये क्योंकि हम बाजार में थे और फ़िर घर पहुँचकर बात करना ही भूल गये और थकान में चूर होकर शरीर निढ़ाल हो गया था।
फ़िर वापिस से आज याने कि चार अप्रैल को मुंबई प्रस्थान कर रहे हैं, और फ़िर मुंबईया लाईफ़ में एन्ट्री करने जा रहे हैं। ये सुकून भरे क्षण हमेशा याद रहते हैं, अपने मम्मी पापा के साथ और उज्जैन में बिताये हुए….
