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आरक्षण फ़िल्म को सरकार बना रही है विवादास्पद.. (Reservation Film… Controversial)

    आरक्षण फ़िल्म को लेकर आजकल बहस चल रही है, आजकल न्यूज चैनल पर सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। ब्रेकिंग न्यूज में आ रहा है कि मायावती ने फ़िल्म देखने की इच्छा जाहिर की और उत्तरप्रदेश में रिलीज पर रोक लगा दी है, तो प्रकाश झा ने मायावती को उत्तर दिया है कि ९ अगस्त से पहले प्रिंट देना उनके लिये संभव नहीं है।

    इधर प्रकाश झा, अमिताभ बच्चन, मनोज वाजपेयी और दीपिका पादुकोण हर न्यूज चैनल पर टॉक शो भी कर रहे हैं और न्यूज रूम में जाकर आरक्षण फ़िल्म के बारे में बातें भी कर रहे हैं। महाराष्ट्र में पहले ही विरोध जारी है, कतिपय लोग कानून को अपने हाथ में लेकर आरक्षण फ़िल्म के पोस्टरों को फ़ाड़ रहे हैं, कालिख पोत रहे हैं।

    आरक्षण इस तरह इस फ़िल्म को अब ज्यादा पब्लिकसिटी की जरूरत ही नहीं रह गई है और आरक्षण के विषय में लगभग हर विद्यार्थी परिचित है, यह प्रकाश झा का अपना एक दृष्टिकोण है और एक कलाकार के नाते उन्हें अपने दृष्टिकोण रखने का हक बनता है ताकि जनता भी उस दृष्टिकोण को देख सके। पर पता नहीं सरकार और राजनैतिक पार्टियाँ क्यों इतनी डरी हुई हैं, वैसे भी आरक्षण एक संवेदनशील मुद्दा है और इस पर सुलझे हुए तरीके से बहस करने की जरूरत है।

    आरक्षण केवल फ़िल्म नहीं है एक मुद्दा है, और इसे स्वस्थ्य तरीके से लिया जाना चाहिये ना कि कुछ किराये के गुंडे लेकर जनता को गुमराह करना चाहिये।

    आज के आरक्षण के नियमों से कम से कम सामान्य वर्ग के लोग तो खुश नहीं हैं, बस यह समझ लीजिये कि चिंगारी दबी हुई है, और हवा देने की देर है, पर इतना भी यकीन से कह सकते हैं कि एक फ़िल्म चिंगारी को हवा नहीं दे सकती, केवल एक नयी विचारधारा नौजवानों को दे सकती है, जिससे शायद सरकार भी प्रेरित हो।

    खैर अब इंतजार है आरक्षण फ़िल्म का … फ़िल्म अच्छी ही होगी आखिर इतनी बड़ी स्टॉर कॉस्ट जो है ।

बच्चों की बाल सुलभ हरकतें और मानवीय संवेदनाएँ

    बच्चों की बाल सुलभ हरकतें सभी को लुभाती हैं, आज घर वापिस आते समय सामने की सीट पर एक बालक था अपने मम्मी पापा की गोद में, और लगभग ६-८ माह का बालक होगा जो कि खुशी की किलकारियाँ मार रहा था, सभी के मन हर्ष से आह्लादित थे।

    एक अन्जाने बालक के लिये अचानक ही इतने सारे लोगों के मन में प्यार उमड़ आना एक स्वाभाविक मानवीय क्रिया है। कभी बालक वोल्वो के काँच पर हाथ लगाकर खुश होता तो कभी माँ की गोदी में तो कभी पिता के हाथों में।

    पास ही एक कार जा रही थी जिसे एक लड़की चला रही थी, और बस भी सिग्नल पर रुकी हुई थी, तो बह लड़की भी उस बालक की बाल सुलभ हरकतों को देखकर पुलकित हो रही थी, अचानक ही ताजगी की बयार बहने लगती है।

    बस में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी और बस का ए.सी. भी अब थोड़ा कम लगने लगा था, तो बस का माहौल भी गरम और दमघोंटू होने लगा, इसी गरमी और दमघोंटू माहौल को उस बालक ने भांप लिया और जोर जोर से रोने लग गया, तो पिता अपनी गोदी में लेकर खड़े हो गये और बालक को ऊपर का डंडा पकड़ा दिया, नयी चीज के मिलते ही वह थोड़ा कुनमुनाया और फ़िर चुप हो गया, परंतु फ़िर २ मिनिट में ही वापिस से रोना शुरू हो गया, खैर उनका बस स्टॉप आ गया और वे उतर गये।

    पर हाँ जब बालक रोने लगा था तो बस के लगभग सभी यात्रियों को समझ में आ रहा था कि उसके रोने का क्या कारण है, और अभिभावकों की परेशानी सभी समझ रहे थे। इस दौर से मैं भी कई बार गुजर चुका हूँ और आज भी कई बार जब बेटेलाल जिद पर उतर आते हैं, तो बस!! अभी पिछली बार उनके साथ पूरे सफ़र में खेलते हुए समय निकला तो आसपास के सभी लोग आनंदित हो रहे थे।

     इस मानवीय आत्मीयता और संवेदना को आज देखकर बहुत अच्छा लगा। काश कि ये मानवीय संवेदना सभी के दिल में सभी के लिये हमेशा जीवित रहे और संवेदनहीनता खत्म हो जाये।

माइक्रोसॉफ़्ट के डॉस को ३० वर्ष हो गये.. (MS-DOS is 30 Years old today)

    आज एक मेल पढ़ रहा था तो उसमें एक लिंक थी – MS-DOS is 30 Years old today. हम तो डॉस वाले जमाने से ही कम्पयूटर सीखे हुए हैं, इसलिये इस खबर की ओर ध्यान आकर्षित हो गया।

    आज से तीस वर्ष पहले २७ जुलाई, १९८१ को माइक्रोसॉफ़्ट ने QDOS के राईट्स २५,००० डॉलर में सिएटल कम्प्यूटर प्रोडक्ट्स से खरीदे थे। नहीं तो QDOS को 86-DOS के नाम से जाना जाता था, सिएटल कम्प्यूटर प्रोडक्ट्स ने इसका अभिकल्पन इन्टेल के 8086 प्रोसेसर के लिये किया था।

    हमने MS-DOS के 5.0 वर्शन से सीखना शुरू किया था, फ़िर ६.२ वर्शन सीखा, जिसकी command.com 54,645 बाईट्स की होती थी, और अगर command.com फ़ाईल का साईज बदल गया तो इसका मतलब कि DOS की सीडी में वाईरस आ गया है। काली स्क्रीन का फ़ोटो देखकर पुराने लोगों को पुराने दिन याद आ जायेंगे।

 vpc.msdos62v dos62

उस समय जितने भी सॉफ़्टवेयर सीखे थे बहुतों को तो वर्षों से उपयोग नहीं किया परंतु अगर आज भी मिल जाते हैं तो देखकर बहुत खुशी होती है, और उनके कमांड तो ढूँढ़ने भी नहीं पड़ते वो तो ऐसे याद हैं जैसे कि हमारी साँसों में घुल गये हैं।

    वर्डस्टॉर, लोटस १२३, डीबेस, फ़ॉक्स प्रो, अक्षर और भी बहुत सारे सॉफ़्टवेयर थे। खैर आज कम्प्यूटर चलाने के लिये कोई कमांड याद नहीं रखना पड़ता है, सब माऊस से मजे में हो जाता है। अगले तीस वर्षों में कम्प्यूटिंग का विकास देखने लायक होगा।

क्रोधित पक्षी याने के एंग्री बर्ड्स (Angry Birds..)

    कुछ दिनों पहले प्रशांत की एक बज्ज या फ़ेसबुक स्टेटस से एंग्री बर्ड्स  (Angry Birds) नामक खेल का पता चला। हमने इसकी खोजबीन की गूगल महाराज पर तो देखा यह तो क्रोम ब्राऊजर में ऑनलाईन उपलब्ध है, और तो और अगर एक बार खेल शुरू कर लिया जाये तो नेट कनेक्शन बंद भी कर सकते हैं, तो कुछ लेवल ऑफ़लाईन खेल ही सकते हैं।

    खैर ब्लॉगर बांधव की सहायता से फ़ेसबुक के सहारे हमें एंग्री बर्ड्स को संस्थापित करने की लिंक मिल गई और हम खुश हो गये। मुझे याद है कि यह एंग्री बर्ड्स कुछ महीने पहले हमने नोकिया के N8 मोबाईल पर खेला था जब वह लांच हो रहा था।

एंग्री बर्ड्स

    एंग्री बर्ड्स खेल को खेलना किसी नशे से कम भी नहीं है, जब भी समय मिलता है तो हम पिल पड़ते हैं एंग्री बर्ड्स के साथ। यहाँ तक कि हमारे बेटॆ का तो सबसे प्रिय खेल यही है, इस चक्कर में महाराज की पढ़ाई लिखाई भी एक तरफ़ हो गई थी, तो हमने आखिरकार डेस्कटॉप से शार्टकट हटा दिया, प्रोग्राम फ़ाईल से भी प्रोग्राम हटा दिया, अब वे एंग्री बर्ड्स नहीं खोल पाते हैं, हाँ अगर उन्होंने पढ़ाई का कार्यक्रम पूरा कर लिया तो हम उन्हें खुद ही एंग्री बर्ड्स लगाकर दे देते हैं।

    एंग्री बर्ड्स मूलत: एक वीडियो गेम पहेली है, जो कि फ़िनलैंड की रोवियो मोबाईल ने विकसित की है। यह खेल सर्वप्रथम एप्पल के लिये दिसंबर २००९ में विमोचित किया गया था और इसकी खूब बिक्री हुई तो कंपनी ने अन्य टच स्क्रीन उपकरणों के लिये भी इस खेल को विकसित किया ।

    एंग्री बर्ड्स में मूलत: कुछ गुस्सा हुए पक्षी हैं जिन्हें गुलेल के द्वारा नियंत्रित कर सामने खड़े ढांचे को गिराकर उसमें बैठे हुए सूअरों को खत्म करना है। यह एक प्रकार से कूटनीतिक खेल है, जिसमें आपको पूरी योजना के साथ इन सूअरों को मारना होता है। यह खेल दिमाग को तो तेज करता ही है, परंतु इस खेल की लत भी लगाता है।

    इस खेल का छठा एपीसोड हाल ही में बाजार में उतारा गया है “ माईन एन्ड डाईन”, जिसमें १५ लेवल हैं।

आज एंग्री बर्ड्स खेल शायद मोबाईल में खेलने वाला सार्वाधिक लोकप्रिय खेल है।

एंग्रीबर्ड्स को क्रोम ब्राऊजर में खेलने की लिंक –

http://chrome.angrybirds.com/

 

 

तो देर किस बात की है, अब खेलिये एंग्री बर्ड्स और लत ना लग जाये तो कहना ।

वोल्वो में आज का सफ़र..

    आज फ़िर काम से थोड़ा दूर जाना पड़ा तो वोल्वो में लगभग एक घंटा जाने और एक घंटा आने का सफ़र करना पड़ा, वैसे तो सब ठीक रहा। परंतु हम ऐसे ही आज अपने सफ़र का अध्ययन कर रहे थे, तो सोचा कि क्यों ना डिजिटाईज कर लिया जाये। कितनी अच्छी बात हो अगर कोई ऐसा गेजेट आ जाये कि मन की बातों को अपने आप ही टाईप कर ले हाँ इसके लिये उसे मन से परमीशन और पासवर्ड दोनों ही लेने होंगे नहीं तो बहुत गड़बड़ हो सकती है और  तब तो बहुत ही, जब वह पोस्ट बन कर प्रकाशित हो जाये।

    जाते समय हम वोल्वो की आगे वाली सीट पर बैठे जिसमें कि चार सीट आमने सामने होती हैं, पहले से ही एक यात्री बैठी हुई थी हम भी उन्हीं के पास में बैठ लिये, फ़िर भी सामने की दो सीटें खाली थीं, उनमें से एक पर हमने अपना बैगपैक एक सीट पर रख दिया और अपने बैग में से इकॉनामिक टॉइम्स निकाल कर पढ़ने लगे, सामने वाली दो सीटें खाली ही थीं और अधिकतर हम उन पर बैठना पसंद नहीं करते क्योंकि वह वोल्वो  की दिशा के विपरीत होती है और कई बार उससे असहज महसूस होता है।

    थोड़ी देर बाद ही वह यात्री उतर गईं और हमने खिड़की के पास वाली सीट पर कब्जा कर लिया, फ़िर एक और यात्री आईं और वे हमारी पुरानी वाली सीट पर विराजमान हो गईं, उनके साथ ही एक परिवार चढ़ा जिसमें माता, पिता और उनकी लड़की थे, तो वे भी एक एक सीट संभाल कर बैठ लिये और पिता हमारी सामने वाली सीट पर बैठ गये, हमने अपना बैगपैक अपनी गोदी में रखा और अखबार को मोड़कर पढ़ने लगे, तो पीछे वाली साईड से वे सज्जन भी पढ़ने लगे, हम भी कनखियों से देख रहे थे, खैर यह तो सबके साथ होता है।

    थोड़ी देर में यह परिवार उतर गया तो हमने अपना बैगपैक सामने वाली सीट पर रख दिया, तब तक हम अखबार को निपटा चुके थे, और फ़िर एक किताब बैग में से निकाल ली, यह किताब भी शुरू किये बहुत दिन हो गये थे और मात्र छ: पन्ने ही पढ़ पाये थे, वहीं से आगे पढ़ने की कोशिश की तो लय नहीं बैठ रही थी, इसलिये वापिस से पहला पन्ना पलटा और पढ़ने लगे, दो ही पन्ने पढ़ पाये थे कि  तब तक वोल्वो किसी नई सड़क पर दाखिल हो चुकी थी, जो कि हमारे लिये नई थी, तो किताब बंद करके रास्ता देखने लगे और फ़िर धीरे से किताब को बैग में सरका दिया गया। हम अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिये और आगे जाना था, गंतव्य पर बस खाली हो गई और हम पैदल ही चल दिये।

    अपना काम निपटाकर वापिस से बस में चढ़ लिये यह वोल्वो बस नहीं थी, साधारण बस थी क्योंकि उस रूट पर वोल्वो चलती ही नहीं है, पूरी बस भरी हुई थी और सबसे आखिरी वाली सीट मिली, परंतु बस बिल्कुल साफ़ थी, जो कि सरकारी बसों के लिये उदाहरण है। खैर अपने बस स्टॉप पर उतरे और वोल्वो में चढ़ लिये घर जाने के लिये, अबकि बार वोल्वो में पीछे की तरफ़ की सीट पर काबिज हुए और खिड़की के पास वाली पर बैठ लिये, साथ वाली पर बैगपैक रखा, ऊपर ए.सी. को बटन से ठीक किया और फ़िर सोचा कि चलो किताब पढ़ना शुरू किया जाये परंतु थकान इतनी हो चली थी कि पढ़ने की इच्छा नहीं थी और भूख भी लग रही थी।

    पीछे सीट पर एक लड़की बैठी हुई थी जो कि रास्ते में पड़ने वाले एक मॉल में किसी लड़के से मिलने जा रही थी, और बार बार फ़ोन करके या फ़ोन को रिसीव करके अपनी लोकेशन बता रही थी, अब बातचीत को विस्तारपूर्वक नहीं लिखता नहीं तो पोस्ट बहुत लंबी हो जायेगी।

    खैर थोड़ी देर बाद ही हमारी पास की सीट पर फ़िर एक सज्जन आ गये और हमने वापिस से बैग अपनी गोदी में रखा और मोबाईल में कान-कव्वा लगाकर कुछ जरूरी फ़ोन लगाने लगे, पर बैंगलोर में कुछ सड़कों पर मोबाईल के सिग्नल नहीं मिलते हैं, बार बार कनेक्शन एरर करके फ़ोन कट जाता था। सड़क पर ट्रॉफ़िक कम था इसलिये घर जल्दी पहुँच लिये।

अब वोल्वो के बारे में तभी लिखेंगे जब कुछ विशेष होगा।

हॉकर द्वारा पोंगली बनाकर अखबार फ़ेंकना और हमारा अखबार सुबह गायब होना ।

    अखबार तो बचपन से घर पर आते हुए देख रहे हैं, कभी पूरा अखबार प्रेस करा हुआ मिलता था, तो कभी अखबार को हॉकर पोंगली बनाकर उसे ऊपर रबड़ाबैंड लगाकर या सुतली से बांधकर घर में फ़ेंकता था।

    मुंबई में हम बड़ी बिल्डिंग में रहते थे और वहाँ पोंगली बनाकर फ़ेंकना हॉकर के लिये संभव नहीं था, इसलिये हॉकर सबसे पहले लिफ़्ट से सबसे ऊपरी माले पर जाता था और फ़िर वहाँ से फ़्लेटों में अखबार डालते हुए सीढियों से नीचे आता था। कई बार सामने वाले या अगल बगल वाले फ़्लेट का अखबार नहीं आने पर वे लोग चुपके से अखबार उठालेते तो फ़िर अखबार वाले को फ़ोन करना पड़ता, आज अखबार नहीं डाला तो वह वापिस आता और कहता कि अखबार तो डाला था फ़िर मिला कैसे नहीं, इसके बाद फ़्लेट का नंबर भी अखबार पर लिखा मिलता जिससे किसी दूसरे को वह अखबार अपना ना लगे। और सुबह जब अखबार रख कर जाता तो घर की घंटी भी बजा जाता जिससे हमें पता चल जाता कि अखबार आ चुका है।

    अब यहाँ बैंगलोर में पहले हमारा अखबार वाला हमारे फ़्लेट के दरवाजे के सामने प्रेस करा हुआ अखबार रख जाता था, परंतु कुछ दिनों से वह भी अखबार की पोंगली बनाकर फ़ेंकने लगा है। अब फ़िर वही गलतफ़हमी शुरू हुई, पड़ोसी के साथ, हम सुबह ६ बजने से पहले ही बिस्तर छोड़ देते हैं और कई बार पड़ोसी भी, जब तक प्रेस करा हुआ अखबार हमारे दरवाजे पर मिलता था कभी गायब नहीं हुआ परंतु जहाँ पोंगली बनाकर फ़ेंकना शुरू किया वहीं अखबार गायब होने लगा, हम अखबार वाले को फ़ोन करते भई किधर गया हमारा अखबार वो भी हतप्रभ, फ़िर उसी ने पता लगाकर बताया कि आपका अखबार आपका पड़ौसी उठा लेते हैं, उनसे कहिये कि उनका अखबार सुबह ७.३० के बाद आता है और उनका इकॉनामिक्स टाईम्स साथ में नहीं आता है। फ़िर एक दिन हमने खुद देखा और पड़ौसी से बात कर मामला सुलझा लिया, अब सुकून से रोज सुबह पोंगली में अखबार हमें ही मिलता है।

    पोंगली में अखबार फ़ेंकने के कुछ फ़ायदे भी हैं तो नुक्सान भी हैं, फ़ायदे तो केवल हॉकर के लिये है कि उसे हर मंजिल पर जाना नहीं पड़ता है। और फ़ायदा सभी के लिये है, रबड़ बैंड मिलती है, अलार्म नहीं लगाओ तब भी समय का पता चल जाता है।

    बहुत पहले एक फ़िल्म देखी थी जिसमें संजीव कपूर था या कोई और याद नहीं, वह बालकनी में आकर अंगड़ाईयाँ लेता है और हॉकर उसी समय पर पोंगली बना हुआ अखबार फ़ेंकता है, जो सीधा उसके मुँह में घुस जाता है।

अब हमारा अखबार हमारा इंतजार कर रहा है, हम अब अपने अखबार को पढ़ते हैं ।

शहीद चंद्रशेखर आजाद से मेरा तीन वर्षीय नाता

    आज शहीद चंद्रशेखर आजाद का जन्मदिन है, यह शहीद मेरे लिये बहुत ही स्तुत्य और महत्वपूर्ण है, क्योंकि मैंने इनकी जन्मभूमि भाबरा के जिला झाबुआ में महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण की है, जिसका नाम शहीद चंद्रशेखर आजाद महाविद्यालय है। महाविद्यालय के मुख्य द्वार से प्रविष्ट करते ही, बायें हाथ पर शहीद चंद्रशेखर आजाद की संगमरमर से बनी मूर्ती है जिसमें आजाद अपने प्रसिद्ध पोज में हैं, अपने हाथ मूँछ पर फ़ेरते हुए, मूर्ती देखते ही बनती है, बलिष्ठ हाथ, तेजमय चेहरा।

    रोज सुबह महाविद्यालय जाते समय आजाद को देखकर मन में नया जोश भर आना आज भी वहाँ के विद्यार्थियों के लिये कोई नई बात नहीं है।

    आज आजाद का जन्मदिन है, परंतु हमें भान ही नहीं था जब फ़ेसबुक पर देखा तो आजाद और तिलक को याद करने वालों की लाईन लगी देखी, तो सोचा कि हम भी अपने ब्लॉग पर इस याद को उतार देते हैं।

    आज झाबुआ के लिये विशेष दिन भी है, आज भाबरा जो कि शहीद चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली है, वहाँ से “भीली” रेडियो शुरु किया जा रहा है जो कि भीली लोग ही संचालित करेंगे। यह रेडियोनामा ब्लॉग से पता चली।

    भील जाति के लोग आज भी बहुत बहादुर और बलशाली होते हैं, ये बहुत ही सीधे सादे लोग होते हैं, परंतु आज कल की दुनिया की चालाकी का सामना करने के लिये यह भी बहुत चालाक हो चले हैं। ये लोग आज भी टायर सोल की चप्पलें पहनते हैं, शायद कई लोग तो इसके बारे में जानते भी न हों। टायर सोल मतलब कि बड़े वाहनों के टायर काटकाटकर चप्पलें बनायी जाती हैं और उसमें रबड़ की ही बद्दी लगा दी जाती है, आज से १० वर्ष पूर्व यह चप्पल लगभग २-३ रूपयों की मिलती थी, जबकि स्लीपर चप्पल उस समय लगभग २०-२५ रूपयों की मिलती थी।

आजाद के लिये सच्ची श्रद्धांजली होगी भीलों को हर क्षैत्र में प्रोत्साहन देना।

आयकर रिटर्न की ईफ़ाईलिंग और नियोक्ता द्वारा कटा हुआ कर फ़ॉर्म 26A S से देखें। (E-filing of Income Tax Return and Check deducted Tax from employer in form 26A S)

    क्या आपने आयकर रिटर्न भर दिया है, अगर नहीं तो कैसे भरने वाले हैं, हमने इस बार से इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भरना शुरू किया है और बहुत ही आसान लगा।
    आयकर की ईफ़ाईलिंग की वेबसाईट पर जाकर अपने पान नंबर से रजिस्टर करें, और अपनी निजी जानकारियाँ भरें। डाऊनलोड में जाकर संबंधित फ़ॉर्म डाऊनलोड कर लें, जैसे अगर आप केवल नौकरी करते हैं तो आपको आई.टी.आर. १ सहज भरना है, सहज की एक्सेल फ़ाईल डाऊनलोड करें, और जब एक्सेल में फ़ाईल खोलें तो मेक्रो को इनेबल करें नहीं तो एक्सेल फ़ाईल के पुश बटन काम नहीं करेंगे।
एक्सेल में अपनी सही जानकारी भरें जो कि फ़ॉर्म १६ में दी गई है, इसमें तीन टैब दिये हैं –
1. Income Details – इस शीट में फ़ॉर्म १६ के अनुसार आय की जानकारियाँ, नाम और   पता भरिये। Valideate  करिये और Next बटन पर क्लिक कीजिये।
2. TDS – इस शीट में नियोक्ता द्वारा काटे गये टैक्स की जानकारी, सैलेरी के अलावा अगर कहीं TDS कटा है और अग्रिम कर की जानकारी Transaction wise दें।
3. Taxes paid and verification – इस शीट पर अपने बैंक का खाता नंबर और माइकर कोड टंकित करें साथ ही यहाँ पर आपका टैक्स के बारे में पता चलता है कि टैक्स सही है या और जमा करना है या रिफ़ंड है। अगर यह नहीं आ रहा है तो पहली शीट Income Details पर जाकर Calculate Tax बटन पर क्ल्कि करें।
    अब तीसरी शीट पर दिये गये Generate बटन को दबायें तो यह आपकी एक्सेल फ़ाईल की .xml फ़ाईल बना देगा। जो कि Submit Return – Select Assessment Year में जाकर अपना वर्ष चुन लें, अपना फ़ॉर्म चुनें और अगर आपके पास डिजिटल सिग्नेचर है तो Yes करें नहीं तो No ही रहने दें। Next पर क्ल्कि करें, अब Choose file पर क्लिक करें और .xml फ़ाईल को चुनें। और अगर डिजिटल सिग्नेचर हैं तो इसके लिये जावा का संस्थापित होना आवश्यक है और अपनी .pfx फ़ाईल का पता दें। अब Upload बटन दबाकर फ़ाईल को Upload कर दें। जैसे ही फ़ाईल upload हो जायेगी, वैसे ही आपको फ़ॉर्म V की PDF लिंक मिल जायेगी, जिसे डाऊनलोड करके उसका प्रिंट निकालकर उसे आयकर बैंगलोर स्थित स्पेशल सैल के पते पर भेज दें। १२० दिनों के अंदर आपको फ़ॉर्म V आयकर विभाग को भेजना होता है जिसकी रसीद आयकर विभाग द्वारा आपके ईमेल पते पर भेज दी जायेगी। और इसका ऑनलाईन स्टेटस भी आयकर की साईट पर देख सकते हैं। अगर रसीद नहीं मिले तो फ़ॉर्म V वापिस से भेजें और ध्यान रखें कि फ़ॉर्म V केवल साधारण डाक या स्पीडपोस्ट से भेजें, रजिस्टर पोस्ट और कूरियर से डाक स्वीकार नहीं करते हैं। ज्यादा जानकारी के लिये आयकर विभाग की साईट पर देखें।
    अगर आपने डिजिटल सिग्नेचर भी अपलोड किये हैं तो फ़ॉर्म V भरकर भेजने की आवश्यकता नहीं है। सबसे सस्ता डिजिटल सिग्नेचर ईमुद्रा द्वारा दिया जाता है, मैंने भी सोचा था कि डिजिटल सिग्नेचर लूँ परंतु जब मात्र २० रूपये खर्च करने से काम चल जाता है तो उसके लिये ४०० रूपये का खर्चा क्यों किया जाये और डिजिटल सिग्नेचर का आयकर रिटर्न भरने के अलावा कहीं ओर व्यावहारिक उपयोग भी नहीं है।
    याद रखें पासवर्ड कभी भी कहीं भी नहीं लिखें, जैसे बैंक का पासवर्ड महत्वपूर्ण है वैसे ही आयकर की साईट का पासवर्ड महत्वपूर्ण है। कोई भी जानकारी अपलोड की जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल उस लॉगिन की ही है।
    अब आपको अपने नियोक्ता द्वारा जमा किये गये आयकर का विवरण देखना है तो आप पिछले वर्षों का भी विवरण यहाँ ऑनलाईन देख सकते हैं, फ़ॉर्म 26AS के द्वारा।
    My Account – View Tax Assessment ( Form 26A S), पूछी गई जानकारियों को भरें और View Form 26A S पर क्ल्कि करें। यह वेबसाईट एन.एस.डी.एल की साईट से कनेक्ट होकर सारी जानकारी आपको मुहैया करवा देता है।
    तो भूल जाईये ऑफ़लाईन आयकर रिटर्न भरना और भरिये ऑनलाईन रिटर्न, हाँ अगले वर्षों में अगर डिजिटल सिग्नेचर अगर सस्ता होता है या फ़िर उसका कहीं और भी व्यवहारिक उपयोग होता है तो डिजिटल सिग्नेचर भी ले लिया जायेगा।

क्या सरकार को हमसे किसी भी प्रकार का कर लेने का हक है ?

    यह एक बहुत बड़ा सवाल है, क्या सरकार को हमसे किसी भी प्रकार का कर लेने का हक है ? जब सरकार आम आदमी की रक्षा नहीं कर सकती, आम आदमी को मूलभूत सुविधाएँ नहीं प्रदान कर सकती तो सरकार हमसे कर कैसे ले सकती है ?

    जब हमें सड़क अच्छी नहीं मिल सकती, बस अच्छी नहीं मिल सकती और तो और सरकार चलाने वाले जनता के मुलाजिम हैं क्योंकि उनको तन्ख्वाह जनता के जमा किये गये कर से मिलती है, वे मुलाजिम ही जनता से आँखें लड़ाते हुए अपना रूतबा दिखाते हैं और जिस काम की तन्ख्वाह लेते हैं, उसका शुल्क भी जनता से भ्रष्टाचार के रूप में बटोरते हैं और बेचारी निरीह जनता इनके दमन चक्र में पिसी जा रही है, अगर कोई आवाज उठाता है तो सचान को जैसे मारा वैसे मारकर मुँह बंद करवा दिया जाता है या फ़िर बाबा रामदेव के ऊपर जैसा दमनकारी चक्र सरकार ने चलाया, चला दिया जाता है।

    सरकार अपनी ताकत केवल जनता पर दिखा सकती है, सरकार आतंकवाद, माओवाद और नक्सलियों से निपटने में असक्षम है और वहाँ केवल अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकने में लगी है, क्या अगर सरकार सेना की टुकड़ी को नक्सली इलाके में भेज दे तो ये नक्सलवाद एक दिन में खत्म नहीं हो सकता ? या माओवाद खत्म नहीं हो सकता ? हमारे खूफ़िया विभाग समय पर सभी सुरक्षा विभागों को जानकारियाँ दे देते हैं, परंतु उन जानकारियों को फ़ाईलों में दबा दिया जाता है और ढुलमुल रवैया अपनाया जाता है। सुरक्षा विभाग आपस में ही एक दूसरे से बराबर संपर्क में नहीं रहते और समय पर इस प्रकार की जानकारियों का उपयोग नहीं कर पाते, ये लोग असक्षम नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी है।

    इतने सब के बाद भी सरकार को क्या हमसे किसी भी प्रकार का कर लेने का हक है ? सरकार हमसे हरेक चीज में तो कर ले रही है, फ़िर वह खाना, पहनना हो या ऐश करना, उस कर से भी पेट नहीं भरता तो तरह तरह के घोटाले भी सामने आते हैं ? और जनता के साथ धोखा किया जाता है ?

    हम किसी भी प्रकार का कर देने में कोई आपत्ति नहीं है, परंतु हमारे कर के रुपयों से क्या किया जा रहा है, वह तो हमें बताया जाये।

    मानते हैं कि सेना का शासन अच्छा नहीं होता, परंतु अब स्थिती इतनी खराब हो चुकी है कि अगर सेना का शासन लगा दिया जाये तो भी हमें अपने भारत को सुधारने में बहुत समय लगेगा, या फ़िर जनता को ही कानून अपने हाथ में लेकर अपने हिसाब से कानून का पालन करवाना पड़ेगा ?

क्या आप २० रुपये में एक दिन का खाना खा सकते हैं ?

क्या आप २० रुपये में एक दिन का खाना खा सकते हैं ?

    यह प्रश्न बहुत ही व्यवहारिक है, क्योंकि सरकार ने गरीबी रेखा के लिये जो सीमा निर्धारित की है वह है २० रूपये प्रतिदिन, अगर कोई २० रूपये प्रतिदिन से ज्यादा कमाता है तो वह गरीबी रेखा में नहीं आता है।

    भारतीय प्रबंधन संस्थान, बैंगलोर के ७५ छात्रों ने समूहों में बँटकर गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का जमीनी संघर्ष जाना। भारतीय प्रबंधन संस्थान के छात्रों के लिये २० रूपये कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, जब वे चले तो उन्होंने अपने पास केवल २० रूपये ही रखे और खाने की कोई भी सामग्री नहीं रखी।

    जब उन्होंने २० रूपयों में पूरा दिन गुजारा तो उन्हें पैसे की कीमत पता चली और उन्होंने देखा कि गरीबी रेखा के नीचे वाले कैसे जीवन यापन करते होंगे। २० रूपये से ज्यादा की तो एक दिन में नाश्ता या सिगरेट पीने वाले प्रबंधन संस्थान के छात्र सकते में थे, और इन लोगों के लिये मूलभूत सुविधाओं को कैसे जुटाया जाये ये सोचने पर मजबूर थे। मूलभुत सुविधाओं का न होने के लिये सरकार को ही दोषी नहीं माना जा सकत है।

    इस महँगाई के जमाने में उन्हें अगर सब्जी खाना हो तो पत्तेदार सब्जी थोड़ी बहुत आ सकती है, या फ़िर शाम को बची हुई गली सी सब्जी में से उन्हें सब्जी खरीदनी पड़ती है। चावल भी अगर १० रूपये किलो मिले तब जाकर उनके लिये खाना २० रूपये में एक दिन का पड़ेगा। परंतु चावल अगर देखें तो कम से कम २०-२२ रूपये है, वह भी लोकल सोना मसूरी मोटा चावल। अगर गेहूँ ही देखें तो कम से कम १६ रूपये किलो है और पिसवाने का ४ रुपये तो २० रूपये किलो तो आटा भी पड़ता है।

    अपने को तो सोचकर ही पसीने आते हैं, कि कैसे २० रूपये में दिन भर में खाना खाया जा सकता है जबकि १० रूपये की चाय या कॉफ़ी ही बाजार में मिलती है। नाश्ते में भी २० रूपये कम पड़ते हैं।

    वाकई २० रूपये में एक दिन निकालना बहुत मुश्किल है, और गरीबी रेखा के नीचे वालों को तो तब तक दिन निकालने हैं, जब तक कि वे इस गरीबी रेखा को पार नहीं कर लेते।

   भारतीय प्रबंधन संस्थान के छात्रों ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का जीवन स्तर सुधारने और मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिये संकल्प लिया।