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मुंबई से उज्जैन यात्रा बाबा महाकाल के दर्शन और रक्षाबंधन पर सवा लाख लड्डुओं का भोग ४ (Travel from Mumbai to Ujjain 4, Mahakal Darshan)

    सुबह उठते ही नई उमंग थी क्योंकि आज रक्षाबंधन था, कोई बहन नहीं है परंतु खुशी इस बात की थी कि हमारे बेटेलाल की अब बहन घर में आ गई थी और उसने राखी भेजी थी, एक त्यौहार जो हमने कभी मन में तरंग नहीं जगा पाता था वह त्यौहार अब हमारे घर में सबको तरंगित करता है।

    पापा की बहनें हैं और उनकी ही राखियाँ हम भी बाँध लेते हैं, क्योंकि हमें भी भेजी जाती हैं। देखिये राखी के कुछ फ़ोटो और साथ में मिठाई –

Rakhi aur Mithai Harsh aur mere papaji

    फ़िर चल दिये महाकाल के दर्शन करने के लिये, महाकाल पहुँच कर पता चला कि बहुत लंबी लाईन है और ज्यादा समय लगेगा, हमारे पास समय कम था क्योंकि शाम को वापिस मुंबई की ट्रेन भी पकड़नी थी। हमने पहली बार विशेष दर्शन के लिये सोचा जो कि १५१ रुपये का था, और वाकई मात्र ५ मिनिट में बाबा महाकाल के सामने थे, १५१ रुपये के विशेष दर्शन के टिकट से हम तीनों ने दर्शन किये और धन्य हुए। अटाटूट भीड़ थी महाकाल में।

Mahakal bahar se darshan

    महाकाल में रक्षाबंधन पर्व पर सवा लाख लड्डुओं का भोग लगाया जाता है और हरेक दर्शनार्थी को एक लड्डू का प्रसाद दिया जाता है। यह परंपरा हम सालों से देखते आ रहे हैं, जब भी रक्षाबंधन पर उज्जैन होते हैं तो दर्शन करने जरुर जाते हैं और साथ ही लड्डुओं का प्रसाद लेने भी। ये वीडियो फ़ोटो देखिये सवा लाख लड्डुओं के भोग का –

Mahakal sava lakh ladduo ka bhog Mahakal sawa lakh ladduo ka bhog

जय महाकाल

ऊँ नम: शिवाय !

अनुग्रहित करो मुझे …. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

अनुग्रहित करो मुझे

पासंग में अपने लेकर,

अपने संभाषण में

सम्मिलित करो,

जीवन की धारा में

साथ साथ

ले चलो अनुषंगी बनाकर,

कट रहा है

इसे जीने दो

अपनी मौज में

अपने उच्छश्रंखल अवस्था में

रंगीन रंग में

करतल ध्वनि में

जीवन की ताल से

जोड़ते हुए

ले चलो कहीं,

दूर पठारों पर, वादियों में,

झाड़ के झुरमुट में

पतंगों की गुनगुनाहट में

मन की अंतरताल में,

शामिल करलो मुझे

अनुग्रहित करो मुझे।

देखना है रक्त की विजय !!! … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

विषादित जीवन

विषादों से ग्रसित जीवन,

रुधिर के थक्के

जीवन में जमते हुए,

खुली हवा की घुटन,

थक्के के पीछे

नलियों में, धमनियों में,

धक्के मारता हुआ

रुधिर,

थक्के के

निकलने का इंतजार,

खौलता हुआ रक्त,

और

विषादित जीवनमंच,

रेखाएँ खिंचती हुई

हटती हुईं,

जाल बुनता हुआ,

गहराता हुआ,

ठहरा सा

गुमसुम रक्त शिराओं में,

विषादों से लड़ता हुआ,

देखना है

रक्त की विजय !!!

१५ अगस्त के संदर्भ में – वन्दे मातरम और स्वतंत्रता दिवस के सही मायने क्या हम नई पीढ़ी तक पहुँचा पा रहे हैं ? [On the occasion of 15th August….]

    आज स्वतंत्रता दिवस है, भारत को आजाद हुए आज ६३ वर्ष हो चुके हैं, पर महत्वपूर्ण और ज्वलंत प्रश्न यह है कि क्या हम वन्दे मातरम और स्वतंत्रता दिवस के सही मायने नई पीढ़ी तक पहुँचा पा रहे हैं ?

    जब बच्चे स्कूल में १५ अगस्त को स्कूल में भारत का तिरंगा नहीं फ़हरायेंगे और साथ में देशभक्ति से ओतप्रोत गीत और माहौल नहीं मिलेगा तो कैसे उम्मीद करेंगे कि ये भारत की नई पीढ़ी तक देशभक्ति का संदेश पहुँच रहा है। जब तक स्कूल की रैली में झंडे पकड़कर “वन्दे मातरम” “भारत माता की जय” नहीं बोलेंगे, तब तक कैसे ये हमारी नई पीढ़ी स्वतंत्रता और वन्दे मातरम  के सही मायने कैसे सीख पायेगी।

    मुझे याद है कि मैंने जब से होश सम्हाला है तब से कॉलेज से बाहर निकलने के बाद भी जब भी मौका मिलता तो हमेशा परेड ग्राऊँड पर जाकर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्र के सम्मान में समारोह में शरीक होता रहा हूँ।

    क्या उम्मीद रखें हम अपनी नई पौध से, किस देशभक्ति की उम्मीद रखें हम इस नई पीढ़ी से, जबकि आज के स्वतंत्रता के मायने नई पीढ़ी के लिये “इंडिपेन्डेन्स डे” की ५० % से ७०‍ % तक की सेल होती है। सारे अखबारों में पन्ने “इंडिपेन्डेन्स डे सेल” से अटे पड़े हैं, परंतु कहीं भी यह नहीं मिलेगा कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कैसे ये स्वतंत्रता पाई और कैसे वे लोग ये स्वतंत्र आकाश में रह पा रहे हैं।

    जिस तेजी से हमारी नई पौध वापिस से पाश्चात्य संस्कृति की ओर अग्रसर है तो उनसे देशभक्ति की उम्मीद लगाना गलत है। जिस तेजी से पाश्चात्य देशों से आ रही वस्तुएँ हमारी दैनिक उपभोग में आती जा रही हैं और हम हमारी दैनिक उपभोग की वस्तुओं को भूलते जा रहे हैं। जो बच्चे बचपन से जैसा परिवार में देखते आते हैं, उनके संस्कार भी वैसे ही होते हैं।

    आईये हम अपनी नई पीढ़ी को देशभक्ति के सही मायने समझायें और आजादी की कीमत बतायें, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हमारी नई पौध की ऊँगली हमारे ऊपर होगी। उन्हें पता होना चाहिये कि शहीद चंद्रशेखर आजाद ने खुद को गोली क्यों मारी थी, क्या जज्बा था उनका खुद को गोली मारने की पीछे…., उन्हें पता होना चाहिये कि महात्मा गांधी और सरदार पटेल का क्या योगदान था, नई पौध को आजादी के लिये योगदान देने वालों के बारे में पता होना चाहिये ।

जय हिंद !!!

ये गीत सुनिये मेरा पसंदीदा – “दिल दिल हिन्दोस्तां” फ़िल्म “यादों के मौसम”

चौदहवीं रात है, अब चाँद दिखा दे अपना, हम कई दिन से तेरी छत को तका करते हैं … मेरी पसंद … विवेक रस्तोगी

पिछली पोस्ट पर “यादों के मौसम” का “तुझसे बिछुड़कर जिंदा है, जान बहुत शर्मिंदा है” , “जब हिज्र की शब पानी बरसे, जब आग का दरिया बहने लगे..”  गीत सुनवाये थे  आज सुनिये यह गाना –“चौदहवीं रात है, अब चाँद दिखा दे अपना, हम कई दिन से तेरी छत को तका करते हैं ..”

जब हिज्र की शब पानी बरसे, जब आग का दरिया बहने लगे.. मेरी पसंद… विवेक रस्तोगी

पिछली पोस्ट पर “यादों के मौसम” का “तुझसे बिछुड़कर जिंदा है, जान बहुत शर्मिंदा है” ये गीत सुनवाया था, तब श्री पंकज सुबीर जी ने “जब हिज्र की शब पानी बरसे, जब आग का दरिया बहने लगे..” की फ़रमाईश की तो आज सुनिये यह गाना –

तुझसे बिछुड़कर जिंदा है, जान बहुत शर्मिंदा है – एक गीत … मेरी पसंद

सालों पहले “यादों के मौसम” फ़िल्म आयी थी और इसका एक एक गाना मेरी पसंद आज भी है, एक गाना सुनिये – तुझसे बिछुड़कर जिंदा है, जान बहुत शर्मिंदा है – एक गीत … मेरी पसंद

ये गाने इसलिये सुनवा रहा हूँ क्योंकि बहुत ही कम लोगों ने ये गाने सुने हैं –

हमारी रेल संस्कृति

हमारे देश भारत में रेल का महत्व सर्वविदित है, नीचे दर्जे के अफसर से लेकर मंत्रियों संतरियों तक पद की मारामारी होती है अपने प्रभाव के लिये नहीं, उनका उद्देश्य तो सिर्फ धन कमाना है फिर भले ही वह रेलवे पुलिस का अदना सा सिपाही हो या टिकिट चेकर, कलेक्टर हो या फिर कोई बाबू हो या ऊपर ……… कहने की जरुरत नहीं आप खुद ही समझ जाइये आज भी मध्यमवर्गीय समाज इतना सक्षम नहीं हुआ है कि वातानुकुलित कोच में यात्रा कर सके वह तो सामान्य शयनयान में ही यात्रा करता है, फिर भले ही लालूजी ने “गरीब रथ” चला दिये हों, पर फिर भी मध्यमवर्गीय समाज की सोच वही रहेगी, वह भी सोचेगा क्यों आदत बिगाडें भले ही आप आरक्षण करवा लें परंतु आज भी कुछ मार्गों पर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिती है कि कोई और ही आपकी सीट पर कब्जा किये मिलेगा, बेचारे टी.सी. का चेहरा देखकर ऐसा लगेगा कि यह तो उसके लिये भी चुनौती है उसके पास अधिकार तो कहने मात्र के लिये हैं टी.सी. की मेहनत और कर्त्तव्यता किसी को नहीं दिखती बस सभी लोग उसकी कमाई को देखते हैं तो अरे भैया कुछ पाने के लिये कुछ खोना तो पडता ही है भ्रष्टाचार व कार्य में अनियमितता तो सरकारी तंत्र का पर्याय बन गई है, और हमारी रेल भी तो सरकारी है रेल विभाग में भ्रष्टाचार के सामान्य दैनिक उदाहरण जो कि लगभग सभी के साथ बीतते हैं …
१. R.P.F. के सिपाही ने एक व्यक्ति को पटरी पार करने के जुर्म में पकडा और कहा मजिस्ट्रेट सजा सुनायेंगे, पर ये क्या सिपाही थाने पहुँचा तो अकेला, क्योंकि वह व्यक्ति तो इनकी जेब गर्म करके जा चुका था
२. रेल विभाग की खानपान सेवा चाय लीजिये ५ रु., खाना ३५ रु., चिप्स १२ रु., कोल्डड्रिंक २२ रु., की और टैरिफ कार्ड मंगाओ तो पता चलता है कि पेंट्री मैनेजर आता है और कहता है साब बच्चे से गलती हो गई क्योंकि सभी में २‍ या ३ रु. तक ज्यादा ले रहे हैं अच्छी कमाई करते हैं ये खानपान वाले भी
३. शादी का सीजन है और आरक्षण उपलब्ध नहीं है, वैसे तो आफ सीजन में भी नहीं मिलता, अगर हम आरक्षण खिडकी पर पूछेंगे तो जबाब मिलेगा वेटिंग है और वहीं खडे एजेन्ट से कहेंगे तो वह नजरों में आपको तोलकर आपकी कीमत बता देगा जो कि १०० से ८०० रु. तक होती है पर ३०० रुपये शायद सबका फिक्स रेट है और आपको आरक्षित सीट का टिकट मिल जायेगा भगवान जाने रेल विभाग ने कैसा साफ्टवेयर बनवाया है कि उसमें भी सेटिंग है
४. रेल का जनरल टिकट ले लिया और फिर पहुँच गये सीधे रेल पर तो आरक्षण के लिये मिलिये टी.सी. महोदय से, वो कहेंगे सीजन चल रहा है, सेवा पानी करना पड़ेगी और बेचारे वेटिंग वाले वेट करते रह जाते हैं अगला आदमी सेवापानी करके सीट पर काबिज हो जाता है
यह तो महज कुछ ही उदाहरण हैं, हमारी रेल अगर समय पर आ जाये तो गजब हो जाये, आती है हमेशा लेट और अब तो आदर हो गई है, और तो और खुद रेल विभाग को नहीं पता होता कि कितनी लेट है २० मिनिट कहते हैं आती है २घंटे में
हे भगवान मैं थक गया लिखते लिखते पर रेल की महिमा ऐसी है कि खत्म ही नहीं होती, यही तो है हमारी रेल संस्कृति …….