झंझावत की तरह वह जैसे आया था, वैसे ही मुड़ा और बिजली की तेजी से राजप्रासाद की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। केवल एक सीढ़ी शेष रही थी। लेकिन वहीं रुककर वह पुन: पीछे मुड़ा और वर्षा की धारा की तरह क्षण-भर में उन समस्त सीढ़ियों को उतरकर वह फ़िर हमारे पास आया। मेरे पास आकर मेरे कुण्डलों की ओर एकटक देखते हुए वह बोला, “तुम्हारे ये कुण्डल जन्मजात हैं क्या ?”
“हाँ ।“ मैंने उसकी कंजी आँखों में गहराई से झाँकते हुए उत्तर दिया।
“इन कुण्डलों के कारण तू बहुत ही सुन्दर लगता है। इतना सुन्दर कि ’तू इन चाचाजी का पुत्र है’ इस बात पर किसी को भी विश्वास नहीं होगा। क्यों चाचाजी ?” मेरे कन्धे पर हाथ रखकर उसने मुड़कर खिलखिलाकर हँसते हुए पिताजी से प्रश्न किया । वे असमंजस में कोई उत्तर न देकर ज्यों के त्यों खड़े रहे।
युवराज दुर्योधन जैसे आया था, वैसे फ़िर तेजी से पैर रखता हुआ चला गया।
सीढ़ियों को चढ़ने का कष्ट न हो इसलिए शोण को वे अपने कक्ष में पहुँचा आये। महाराज धृतराष्ट्र से मिलने के लिए हम उस भव्य राजाप्रासाद की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। उन सीढ़ियों पर चढ़ते समय मेरे मन-मन्दिर में स्मृतियों का घण्टा घनघनाने लगा। किसी समय पिताजी ने यों ही कुरुवंश के पराक्रमी पूर्वजों की कहानियाँ सुनायीं थीं, वे कहानियाँ मन की अथाह गहराई से अचानक उफ़नकर ऊपर आने लगीं। मेरा मन भय, कौतूहल, आदर, संकोच, श्रद्धा आदि अनेक विचित्र भावों से भर आया।
सूर्यवंश के पराक्रमी महाराज हस्ती ने ही यह नगर, यहाँ गंगा का विपुल और स्वच्छ जल देखकर बहुत बरसों पहले बसाया था। उनके प्रपौत्र महाराज कुरु इतने पराक्रमी निकले कि प्रजाजन उनके नाम से ही पहले के सूर्यवंश को कुरुवंश के रुप में जानने लगे। उनके वंशजों को वे कौरव कहने लगे। महापराक्रमी उन महाराज कुरु ने ही ये प्रासाद बनवाया था।
जिस सूर्यवंश में बुद्धिमान मनु, पुरुषश्रेष्ठ पुरुरवा, इन्द्र को भी शरण में आने को विवश करनेवाले नहुष, अपनी दिग्विजय से समस्त आर्यावर्त को कँपा देने वाले ययाति, उनके पराक्रमी पुत्र यदु और पुरु, जनमेजय, अहंयाती, देवातिथि, दुष्यन्त, भरत, हस्ति और अजमीढ़-जैसे प्रतापी महाराज हो गये थे, उस सूर्यवंश को अपने कर्तृव्य से प्रजाजनों से विस्मृत करा देने वाले महाराज कुरु भला कितने पराक्रमी और गुणसम्पन्न होंगे ! कैसे थे वे महाराज कुरु ? लेकिन महाराज कुरु ही क्यों ? उनके पश्चात भी इस राजप्रासाद में क्या कम पराक्रमी लोग रहे थे ? विदूरथ, अन्श्वन, परीक्षित, भीमसेन, परिश्रवस आदि एक से एक बढ़कर पराक्रमी महाराजाओं की एक माला ही इस ’कुरु’ वंश में तैयार हो गयी थी। महाराज परीक्षित तो सचमुच ही कुरुकुलावतंस थे। एक मत्स्य-कन्या से विवाह करने वाले परिश्रवस महाराज के पुत्र शान्तनु ने तो कुरुवंश में एक नया ही आदर्श स्थापित कर दिया था। इतने विशाल राज्यवैभव को तृण के समान त्याग देने वाले उनके भाई महाराज देवापी तो कुरुवंश-परम्परा के साक्षात चरम उत्कर्ष ही थे।