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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १४

सृष्टि संहार के समय शिव द्वारा किया जाने वाला नृत्य प्रसिद्ध है, उसे ताण्डव नृत्य कहते हैं। नाट्यशास्त्रियों ने नृत्य और नृत्त में अन्तर किया है। दशरुपक में लिखा है – “अन्यद़् भावाश्रयं नृत्यं नृत्तं ताललयाश्रयम़्” अर्थात़् भाव पर आश्रित अंगसञ्चालन नृत्य कहलाता है तथा ताल व लय पर आश्रित हस्त-पाद के सञ्चालन को नृत्त कहते हैं।
पशुपते: – पशु के स्वामी। यहाँ पशु से अभिप्राय सामान्य पशु से नहीं है, अपितु शैव दर्शन के अनुसार

पदार्थ के तीन भेद हैं – पशु, पाश और पति। अविद्या रुपी पाश से बद्ध जीवात्मा को पशु, पाश के समान बन्धन करने के कारण अविद्या को पाश तथा अविद्यापाश से मुक्त शिव को पति कहते हैं।

गजासुर (गज का रुप धारण करने वाले असुर) को मारकर शिव ने रक्त से सने हुए चर्म को भुजाओं से धारण करते हुए ताण्डव नृत्य किया था। और यक्ष मेघ से कहता है कि तुम गजासुर की गीली चर्म बनकर शिव की इच्छा पूर्ति करना; क्योंकि गजासुर के गीले चर्म को शिव को ओढ़े हुए देख कर पार्वतीजी डर जाती हैं और वह ताण्डव नृत्य भी नहीं देख सकतीं। यदि तुम गीले चर्म का सा स्थान ले लो तो पार्वतीजी भी निर्भय होकर ताण्डव नृत्य देख सकेंगी। शिवपुराण में यह कथा रुद्र सं. – युद्ध खण्ड अ. ५७ में आयी है।
योषित – यह शब्द सामान्यत: साधारण स्त्री का वाचक है।
अभिसारिका – जो स्त्री रात के अन्धकार में अपने प्रियतम से मिलने उसके घर अथवा किसी विशेष संकेत स्थल पर जाती है। यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि तुम अभिसारिकाओं को बिजली चमकाकर उन्हें मार्ग तो दिखलाना, परन्तु वर्षा या गर्जन करके उन्हें भयभीत न कर देना; क्योंकि वे अभिसारिकाएँ एक तो स्वभावत: ही डरपोक होती हैं तथा दूसरे छिपकर अपने प्रेमी के पास रमण करने जा रही हैं। इससे उन्हें लोक निन्दा आदि का भय बना रहता है। ऐसे में मेघ गर्जन आदि से और भी अधिक भयभीत हो जायेंगी।
सूचिभेद्य – इतना प्रगाढ़ अन्धकार जो कि सुई से छेदा जा सके। जब धागे में गाँठ पड़ जाती है, तब उसे सुईं की नोक से खोलते हैं। इससे गाँठ की सूक्ष्मता और घनिष्ठता सूचित होती है।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १३

कण्ठच्छवि: – कण्ठ के समान कान्ति वाला, यह विशेषण मेघ के लिये आया है। कहने का आशय यह है कि क्षीर सागर के मंथन के समय कालकूट नामक विष भी निकला था, जिसका पान शिव ने किया था। परिणामत: उनका कण्ठ विष के प्रभाव से नीला पड़ गया था। इसी कारण उन्हें नीलकण्ठ भी कहा जाता है।
चण्डिश्वरस्य पुण्यं धाम – यह कहने का अभिप्राय उज्जयिनी पुरी में स्थित महाकाल मंदिर

से है। कहीं-कहीं चण्डेश्वरस्य पाठ भी मिलता है। इसका अर्थ है – चण्डस्य ईश्वर: अर्थात चण़्उ नाम के गण स्वामी। यक्ष का मेघ से आग्रह है कि वह उज्जयिनी में स्थित शिव के महाकाल मन्दिर में अवश्य जाये। महाकाल को देखकर मुक्ति मिल जाती है, ऐसा भी प्रसिद्ध है –

आकाशे तारकं लिङ्गं पाताले हाटकेश्वरम़्।
मृत्युलोके महाकालं दृष्टवा मुक्तिमवाप्नुयात़्॥
महाकाल शिवलिङ्ग १२ ज्योतिर्लिङ्गों में से एक है। शिव पुराण में कहा गया है –
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम़्।
उज्जयिन्यां महाकालमो~ड्कारं परमेश्वरम़्॥
और कहा सन्ध्या समय तक वहीं महाकाल मंदिर में रुके रहना तथा सन्ध्या के समय होने वाली शिव की पूजा में सम्मिलित होकर गर्जन करके नगाड़े का कार्य करना, जिसमें तुम गर्जन के विशेष फ़ल को प्राप्त करोगे।

ताऊ.इन पर मेरा याने कि विवेक रस्तोगी का साक्षात्कार आज दोपहर ठीक ३.३३ पर और एक छोटी सी बात

आज हमारा साक्षात्कार प्रकाशित होगा दोपहर ठीक ३.३३ पर ताऊ रामपुरिया के ब्लॉग पर, आईये हमसे मिलिये और जानिये हमारे बारे में।
हम अभी मेघदूतम और कालिदास पर एक श्रंखला लिख रहे हैं, क्योंकि मेरा सोचना था कि इन बातों को आम लोगों के लिये सहज रुप में यह जानकारी उपलब्ध होना चाहिये। इसके बाद मैं शिवाजी सामंत के ऐतिहासिक उपन्यास “मृत्युंजय” दानवीर कर्ण की जीवन गाथा

के उपर लिखने की सोच रहा हूँ। कोई जानकार व्यक्ति कृपया मुझे बतायें कि पुस्तक के कुछ अंश प्रकाशित करना कहीं किसी कॉपीराईट का उल्लंघन तो नहीं है और अगर है तो कृपया उसका रास्ता मुझे बतायें।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १२

प्रार्थनाचाटुकार: – प्रिया के रमण करने से थक जाने पर प्रेमी फ़िर रमण करने के लिये उसकी खुशामद करता है, मीठी-मीठी बातें करता है तथा थकान को दूर कर शरीर में ताजगी उत्पन्न करता है, उसी प्रकार शिप्रा नदी का पवन प्रेमियों के समान रमणियों की सम्भोग-थकान को दूर कर रहा है।
खण्डिता नायिका – जो पति के चरित्र पर सन्देह करती है

तो नायक उसे प्रसन्न करने के लिए मीठी-मीठी बातें बनाते हैं। साहित्य दर्पण में खण्डिता नायिका का लक्षण इस प्रकार किया है –

पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसंयोगचिह्नित:।
सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्ष्याकषायिता॥
अर्थात दूसरी स्त्री से संभोग से चिह्नित होकर प्रिय जिसके पास जाता है, ईर्ष्या से युक्त उस नायिका को ’खण्डिता’ कहते हैं।
परन्तु आचार्य मल्लिनाथ ने पूर्वोक्त खण्डिता नायिका की कल्पना का खण्डन किया है। उनका कथन है कि खण्डिता नायिका के साथ पहले जब रति ही नहीं हुई, फ़िर रति की थकावट दूर करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।
कवि ने उज्जयिनी के वैभव का वर्णन करते हुए लिखा है –
समुद्र में जल तो रहता ही है तथा उसमें रत़्न भी रहते हैं, परन्तु विशाला के बाजारों में रत़्नों के ढेरों को देखकर ऐसा अनुमान होता है कि समुद्र के सारे रत़्न निकालकर इस बाजार में ही रख दिये गये हैं। अब समुद्र में केवल जलमात्र ही शेष बचा है और उसका रत़्नाकर नाम अयथार्थ हो गया है।
नलगिरि: – प्रद्योत के हाथी का नाम नलगिरि बताया है, जबकि कथासरित्सागर में नलगिरि के स्थान पर नडागिरि बताया है और यह राजा चण्डमहासेन का हाथी था।
प्राचीन काल में स्त्रियाँ सिर धोने के बाद केशों को सुगन्धित द्रव्यों के धुएँ से सुखाती थीं।

मुंबई में नहीं सुधरा तो वो आदमी कहीं भी नहीं सुधर सकता – एक ऑटो वाले का डायलॉग

कल हम ऑफ़िस से आ रहे थे तो जिस ऑटो में हम आये वह एक जौनपुरी ड्रायवर चला रहा था। हम हमारे मित्र जो कि हमारे साथ ही था उससे बात कर रहे थे। तो ड्रायवर बोला कि हमें रास्ता बता देना क्योंकि हम इस जगह केवल एक बार ही गये हैं। बस थोड़ी देर में तो वह हमसे खुल गया।
मैं अपने मित्र को किस्सा बता रहा था कि बोरिवली में जिस जगह पर हम पहले रहते थे मैं एक बार ऑटो में बैठ्कर गया तो वह ऑटो वाला हमसे बोला कि “साहब हम पिछले पंद्रह सालों से ऑटो चला रहे है,

कहते हुए शर्म आती है कि पंद्रह सालों से ऑटो चला रहे हैं पर इस जगह हम आज तक नहीं आये हैं।” बस वो ऑटो वाला उचक पड़ा कि कुछ लोग बोलते हैं कि हमने मुंबई का कोना कोना छान लिया है परंतु अपने कमरे के बगल में कौन रहता है उसका नाम भी नहीं पता होता है।

मुंबई में आकर सबको ईमानदार बनना पड़ता है अनुशासन में रहना पड़ता है नहीं तो उसका कुछ नहीं हो सकता है। और जो मुंबई में नहीं सुधरा तो वो आदमी कहीं भी नहीं सुधर सकता है। हमने भी अच्छे अच्छे उज्जड़ों को यहां सुधरते देखा है। तभी तो हम कहते हैं कि “मुंबई मेरी जान”।
mumbaimerijaan

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ११

उज्जयिनी के लिये मेघदूतम़् में महाकवि कालिदास ने लिखा है –
यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि अवन्ति देश में पहुँचकर उज्जयिनी
में अवश्य जाना –
प्राप्यावन्तीनुदयनकथाकोविदग्रामवृद्धाऩ़्
पूर्वोद्दिष्टामुपसर पुरीं श्रीविशालां विशालाम़् ।
स्वल्पीभूते सुचरितफ़ले स्वर्गिणां गां गतानां
शेषै: पुण्यैर्हतमिव दिव: कान्तिमत्खण्डमेकम़्॥
अनुवाद : – जहाँ के ग्रामों के वृद्ध जन उदयन की कथाओं के जानने वाले हैं, ऐसे अवन्ति प्रदेश को प्राप्त कर, पहले बतायी गयी, सम्पत्ति से सम्पन्न, उज्जयिनी नाम की नगरी में जाना, (जो) मानो पुण्य कर्मों के फ़ल के कम हो जाने पर पृथ्वी पर आये हुए स्वर्ग वालों के (देवताओं के) शेष पुण्यों के द्वारा लाया गया स्वर्ग का एक उज्जवल टुकड़ा है।
उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धाऩ़् – कवि ने उदयन की कथा की और संकेत किया है। यह कथा मूल रुप से गुणाढ़्य की वृहतकथा में मिलती है, परन्तु यह ग्रन्थ पैशाची में लिखा है और अपने मूलरुप में आज अप्राप्य है। इसका संस्कृत अनुवाद सोमदेव ने कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र ने वृहत्कथा-मञ्जरी नाम से किया है। कथासरित्सागर में यह कथा लम्बक २ से ८ तक विस्तृत रुप से वर्णित है। संक्षेप में कथा इस प्रकार है – “पृथ्वी पर वत्स नाम का एक देश है, जिसमें कौशाम्बी नाम की नगरी है। वहां परीक्षित का पौत्र जनमेजय का पुत्र शतानीक राजा था। उसके सहस्त्रानीक नामक पुत्र था। सहस्त्रानीक की पत़्नी का नाम मृगावती था। उनके पुत्र का नाम उदयन था। उदयन ने उज्जैन के राजा चण्डमहासेन की पुत्री वासवदत्ता का अपहरण कर उससे विवाह किया। उसके बाद मगध के राजा प्रद्योत की पुत्री पद्मावती से विवाह कर लिया। उसके वासवदत्ता से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम नरवाहनदत्त रखा।
इसके अतिरिक्त यह कथा भास के सवप्नवासवदत्तम़् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायणम़् नामक नाटकों में भी लगभग इसी रुप में मिलती है।

मिश्रधन की शक्ति देखिये इस दुनिया का आठवां आश्चर्य – एक कहानी (Power of Compounding – 8TH WONDER OF THE WORLD – A Tale)

लंबे समय में अगर धन को रिकरिंग जमा किया जाता है तो उसकी शक्ति को
प्रदर्शित करती यह कहानी –

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १०

मेघ को नायक और निर्विन्ध्या नदी को नायिका बनाते हुए कालिदास कहते हैं कि नायिका के कमर पर बाँधी हुई करधनी, झन-झन करती हुई कामोद्दीपक मानी जाती है। तरंगों के चलायमान होने पर शब्द करते हुए पक्षियों की पंक्तियाँ निर्विन्ध्या की करधनी मानी गयी है।
प्रणयवचनम़् – जिस प्रकार नायिका कमर की करधनी की झंकार बढ़ाकर मदमाती चाल से बार बार नाभी प्रदर्शन द्वारा नायक प्रणय का निमन्त्रण देती है, उसी प्रकार

निर्विन्ध्या भी तरंगों के चलने से शब्द करते हुये पक्षियों की पंक्तियों से, पत्थरों पर लड़खड़ा कर बहने से अर्थात मदमाती चाल से तथा बार बार भँवरों के प्रदर्शन से अपने नायक मेघ को प्रणय का निमन्त्रण दे रही है।हाव भाव के द्वारा ही प्रेमिका प्रेमी को प्रणय का प्रथम वचन कहती है, मुख से नहीं बोलती, अपितु इस प्रकार अंग प्रदर्शन करती है ये ही उसके प्रणय वचन है।

नदी को विरहणी नायिका का आरोप किया गया है, इसलिए उसकी क्षीण जलधारा को वेणी कहा गया है। प्राचीन काल में विरहिणी स्त्रियाँ केशों की केवल एक वेणी बनाती थीं। रतिरहस्य के अनुसार यहाँ पाँचवी कामावस्था का वर्णन किया गया है –
नयनप्रीति: प्रथमं चित्राऽऽसड़्गस्ततोऽथ सड़्कल्प:।
निद्राच्छेदस्तनुता विषयनिवृत्तिस्त्रपानाश:॥
उन्मादो मूर्च्छा मृतितित्येता: स्मरदशा: दशैव स्यु:।
अर्थात पहली नेत्र प्रीति, दूसरी चित्र की आसक्ति, तीसरी संकल्प, चौथी निद्रानाश, पाँचवी कृशता, छठी शब्द स्पर्श आदि विषयों की निवृत्ति, सातवीं लजजानाश, आठवीं पागलपन, नवीं मूर्च्छा और दसवीं मृत्यु – इस प्रकार दस कामावस्थायें हैं।
काली सिन्धु – मालवा में काली सिन्धु नाम की एक छोटी पहाड़ी नदी है, जो कि चम्बल की सहायक है। यह नदी जिला धार, तहसील बागली में बरझेरी ग्राम के पास विन्ध्य पर्वत के २३७० फ़ीट ऊँचे शिखर से निकलती है।

क्या मेरे दिन अच्छे चल रहे हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा आप ही बतायें…

अभी इस बार की पूछी गई ताऊ पहेली में हम द्वितिय विजेता और विवेक सिंह जी द्वारा जारी की गई प्रहेलिका में भी विजेता घोषित हुए हैं।
पर हमारे बेटेलाल की तबियत कुछ नासाज चल रही है, सर्दी, जुकाम, बुखार सब है डाक्टर को भी दिखाया और दवाई भी दिलाई, डाक्टर ने तो म्यूनिसिपल हस्पताल को रिफ़र कर दिया कि वहाँ टॉमीफ़्लू की गोलियां मुफ़्त मिलती हैं,

पर साथ ही कहा कि अगर आपका बच्चा किसी के संपर्क में नहीं आया है तो यह एक साधारण फ़्लू ही है। हम भी सोचे कि तीन दिन तो बीमारी का असर होता ही है, एक – दो दिन बाद देखते हैं।

फ़िर घूमते घूमते हमारे पैर में छाला पड़  गया और बहुत ही तकलीफ़देह हो गया है हमारे लिये तो। पर आज सुबह उस नामुराद को फ़ोड़ कर हम फ़िर घूम आये। अब तकलीफ़ कम है।
कल हमारे बेटेलाल के कम्प्यूटर में विन्डोज का logon process वाला बग आ गया चूँकि विन्डोज एक्सपी है और उस पर हमारा कुछ डाटा भी नहीं है इसलिये फ़टाफ़ट से फ़ोर्मट कर वापिस संस्थापित कर दिया, और अपनी पैन ड्राईव से गेम्स वापिस कम्प्यूटर को ट्रांसफ़र कर दिये गये। हम भी खुश कि हमारा लेपटॉप अब बेटेलाल से फ़्री हो गया और हम ब्लॉगिंग कर सकेंगे, और बेटेलाल भी खुश कि अब अपने कीबोर्ड और माऊस से गेम खेलने को मिलेंगे। हमारे बेटेलाल के मनपसंद गेम – हरक्यूलिस, रोडरेश, मारियो और भी बहुत सारे।
तो बस फ़ोकट में २ दिन हम्माली करते हुए निकल गये। और ऊपर से घरवाली का डायलाग कि लोगों को पांच दिन काम करने के बाद दो दिन की छुट्टी मिलती है और हमें वो दो दिन पांच दिन से भी ज्यादा काम करना पड़ता है। तो हम भी राहत देने के भाव से बोलते हैं कि चलो डियर दोपहर को काली दाल की खिचड़ी ही बना लो कम से कम पेट की ज्वाला तो शांत हो जायेगी और तुम्हें ज्यादा काम भी नहीं करना पड़ेगा।
तो बस ऐसे ही एक और सप्ताहांत निकल गया।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ९

वेत्रवती – प्राचीन कालीन वेत्रवती को आधुनिक युग की बेतवा नाम से जाना जाता है और उसके किनारे विदिशा नगर था जो दशार्ण देश की राजधानी था। यह विन्ध्याचल के उत्तर से निकलती है तथा भिलसा (प्राचीन काल का विदिशा)  में होती हुई कालपी के निकट यमुना नदी में मिल जाती है।
विदिशा नगरी में वेश्याएँ स्वच्छन्द विहार करती हुई, पर्वत की कन्दराओं में पहुँचकर वहाँ के नागरिकों के साथ रमण

करती थीं। वेश्याएँ अपने शरीर पर इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य इतनी मात्रा में लगाती थीं कि जिससे उस पर्वत की कन्दराएँ सुगन्धित हो उठती थीं।
उज्जयिनी – उज्जयिनी प्राचीन काल में अवन्ति देश की राजधानी थी, यह शिप्रा नदी के तट पर स्थित है और यहाँ पर महाकाल शंकर का मन्दिर है। अनेक स्थलों पर इसे राजा विक्रमादित्य की राजधानी भी कहा गया है। इसे विशाला तथा अवन्ति भी कहते हैं। मोक्ष प्रदान करने वाली सात पुरियों में इसकी भी गणना की गयी है –
अयोध्या मथुरा मायाकाशी काञ्ची ह्मवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:॥
इस प्रकार इस श्लोक से प्रकट होता है कि कालिदास का उज्जयिनी के प्रति विशेष झुकाव है; क्योंकि मेघ के सीधे मार्ग में उज्जयिनी नहीं आती है, फ़िर भी यक्ष उससे आग्रह करता है कि तू उज्जयिनी होकर अवश्य जाना, भले ही तेरा मार्ग वक्र हो जाये।
उज्जयिनी का वर्णन – उज्जयिनी की सुन्दरियाँ शाम को महलों पर खड़ी होती हैं या घूमती हैं। (यक्ष मेघ से कह रहा है -)जब तुम्हारी बिजली चमकेगी तो उनकी आँखें भय के कारण चञ्चल हो उठेंगी, अत: यदि तुमने इन दृश्य को नहीं देखा तो वास्तव में तुम जीवन के वास्तविक आनन्द से वञ्चित रह जाओगे।