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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

व्यापार करने का भारतीय तरीका (The Indian way of doing Business)

व्हाईट हाऊस की फ़ेन्स वायर को जोड़ने के ठेके के लिये तीन ठेकेदार आये, जिसमें एक जापान से, दूसरा भारत से और तीसरा चीन से था।

तीनों व्हाईट हाऊस की टूटी हुई फ़ेन्स वायर को देखने गये।

whitehouse

जापानी ठेकेदार ने अपना नाप लेने वाले फ़ीता निकाला और उससे कुछ नाप लेने लगा, उसके बाद पेन्सिल लेकर कुछ गणित करने लगा। फ़िर बोला “ठीक है” मैं इस काम को $900 में कर दूँगा। ($400 लगने वाले सामान के, $400 कारीगरों के, $100 मेरा लाभ)

फ़िर चीन के ठेकेदार ने भी उसी तरह से सब नापजोख किया और बोला कि मैं यह काम $700 में कर दूँगा। ($300 लगने वाले सामान के, $300 कारीगरों के, $100 मेरा लाभ)

भारतीय ठेकेदार ने बिना नापजोख किये फ़िर व्हाईट हाऊस के अधिकारी की तरफ़ देखकर बोला “$2700”।

उस अधिकारी को बहुत आश़्चर्य हुआ और बोला कि तुमने इन लोगों की तरह कुछ नापा भी नहीं और कुछ गणित भी नहीं किया फ़िर तुमने ये हिसाब कैसे किया ?

भारतीय ठेकेदार ने चहककर बोला “$1000 मेरे, $1000 आपके, और इस चीन वाले को हम लोग फ़ेन्स वायर जोड़ने के लिये दे देंगे।”

सरकारी अधिकारी का जबाब था “ठीक है, ये ठेका आपका”।

कृपया सभी ब्लॉगर बंधु ऑनलाईन वोट करें “यथार्थ” जी लिटिल चेम्प प्रतियोगी के लिये

बनारस से यथार्थ रस्तोगी जी लिटिल चेम्प में भाग ले रहा है और जो लोग इस प्रोग्राम को देखते होंगे वे तो उसके हुनर से परिचित होंगे ही। इतनी सी उम्र में उसके गले का कमाल, उसकी सुरीली आवाज। आज और कल रात “जी लिटिल चेम्प” पर इसका प्रसारण है रात को ९.३० बजे। आप एक लोगिन से दो बार अपने वोट ऑनलाईन दे सकते हैं,  आप भी देखिये इस जूनियर मास्टर को और सहयोग करें जीतने में। टेलेन्ट तो उसमें बहुत है परंतु वोटिंग का भी उतना ही महत्व है। ज्यादा से ज्यादा वोटिंग करने की अपील करता हूँ।

यहाँ से अपना यूजर आईडी रजिस्टर करें और वोट करें “यथार्थ” के लिये। वोटिंग शुरु होगी आज रात याने २ अक्टूबर, १० बजे से सोमवार याने कि ५ अक्टूबर सुबह १० बजे तक।


सभी ब्लॉगर बंधुओं से सहयोग अपेक्षित है।
रस्तोगी समाज का होने के नाते मैं “यथार्थ” को वोटिंग करने के लिये सबसे जोरदार अपील करता हूँ। आपके एक वोट से वह नन्ही प्रतिभा जीत सकती है बस आप सबका आशीर्वाद चाहिये। आपके आशीर्वाद के इंतजार में लगे हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३४

ह्रदयनिहितारम्भम़् – यक्षिणी अकेले में बैठकर प्रिय के काल्पनिक सहवास से मन बहलाती थी। आचार्य मल्लिनाथ ने यहाँ आरम्भ का अर्थ कार्य किया है, जिसका अर्थ है कि यक्षिणी पति के साथ चुम्बन, अलि़ड़्गन आदि कार्य वाले रति सुख का आन्नद

ले रही है। काम की दश अवस्थायें मानी गयी हैं यहाँ कवि ने तीसरी अवस्था का उल्लेख किया है। यहाँ सड्कल्पावस्था  का वर्णन किया गया है।


सव्यापाराम़् – विरहिणी स्त्रियों का दिन तो किसी न किसी प्रकार काम आदि करते हुए व्यतीत हो जाता है, परन्तु रात्रि में कोई कार्य न होने के काराण उसे रात्रि व्यतीत करना कठिन हो जाता है।

सुखयितुम़् – वियोगिनियों को यदि प्रियतम का सन्देश प्राप्त हो जाये तो अत्यन्त सुख मिलता है।

अवनिशयनम़् – प्रोषितभर्तृका को सती धर्म का पालन करने के लिये पलंग पर सोने का निषेध होने से भूमि पर सोने का विधान है; अत: यक्षिणी भी पृथ्वी पर ही सोती है।
चौथी कामदशा जागरणावस्था होती है।

आधिक्षामाम़् – रोग दो प्रकार के बताये ग्ये हैं – आधि तथा व्याधि । आधि मानसिक तथा व्याधि शारीरिक रोग के लिये आता है, विरहिणी यक्षिणी आधि रोग से पीड़ित है; इसलिये यह अत्यन्त क्षीण हो गयी है।

संनिषण्णैकपार्श्वाम़् – प्राय: विरहिणी स्त्रियाँ रात्रि को करवट बदल-बदलकर व्यतीत करती हैं, किन्तु यक्षिणी एक करवट से पडी हुई रात्रि व्यतीत करती है। इसके दो कारण हो सकते हैं –

(१) यक्षिणी रात्रि में अपने प्रियतम के ध्यान में इतनी मग्न हो जाती है कि उसे अपने शारीरिक कष्ट का ध्यान नहीं रहता और वह करवट तक नहीं बदलती।

(२) वह विरह में इतनी दुर्बल हो गयी है कि करवट बदलने की सामर्थ्य ही उसमें नहीं रही हो; अत: सारी रात एक ही करवट से पड़ी रहती है।

स्वाइन फ़्लू पर एक मस्त कार्टून

आज ही ईमेल से स्वाइन फ़्लू पर एक मस्त कार्टून प्राप्त हुआ है आप भी देखिये –

swineflu

चित्र बड़ा करने के लिये चित्र पर क्लिक करें।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३३

भावगम्यम़् – यक्षिणी पत्नी-विरह से युक्त अपने पति की कृशता देख तो नहीं सकती थी, परन्तु अनुमान के द्वारा ही चित्र खींचा करती थी। संस्कृत साहित्य में विरह से पीड़ित के लिए विनोद के चार साधन वर्णित किये गये हैं – १. सदृश वस्तु का अनुभव, २. चित्रकर्म ३. स्वप्न

दर्शन, ४.प्रिय के अंग से स्पृष्ट पदार्थों का स्पर्श करना।


सारिका – प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं के यहाँ तथा कुलीन परिवारों में मनोरञ्ज्न आदि के लिये तोता, मैना, हंस आदि पक्षी पाले जाते थे और उनसे विरह काल में मनोरञ्जन होता था। यक्ष के यहाँ भी पालतू पक्षी थे और यक्ष विचार करता है कि उसकी प्रिया सारिका आदि के साथ बातें करके अपना समय व्यतीत करती होगी।

उद्रातुकामा – क्योंकि यक्ष-पत्नी देवयोनि की थी, इसलिये गान्धार ग्राम में गाने की इच्छा रखती थी, जबकि मनुष्य षड्ज या मध्यम ग्राम में गाते हैं। जैसा कि कहा है –
षड्जमध्यमनामानौ ग्रामौ गायन्ति मानवा:।
न तु गान्धारनामानं स लभ्यो देवयोनिभि:॥
स्वर भेद को ग्राम कहते हैं। ग्राम तीन प्रकार के होते हैं – षड्ज, मध्यम, गान्धार।

तन्त्रीमार्द्राम़् – यक्ष पत्नी कभी-कभी अपने प्रिय के नाम के चिह्नों से युक्त रचे हुए पदों के गाने की इच्छा करती होगी तथा वीणा बजाने के साथ उसे प्रियतम की स्मृति होती होगी जिस कारण आँसू आने से उसके तार भीग जाते होंगे।

मूर्च्छना – स्वरों के आरोह-अवरोह क्रम को मूर्च्छना कहते हैं। संगीतशास्त्र में सात स्वर माने गये हैं – षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। इन स्वरों तथा तीन ग्रामों के मेल से ये मूर्च्छना २१ प्रकार की होती है।

देहलीदत्तपुष्पै: – जिस दिन प्रियतम विदेश जाता है, उसी दिन नायिका देहली की पूजा करती है और वहाँ पुष्प रखती है कि मेरा प्रियतम इतने महीनों के लिये गया है। अत: मास बीतने पर एक पुष्प उठाकर दूसरी ओर रख देती है। उत्कण्ठा के क्षणों में वह पुष्पों को गिनती है कि अब आने के कितने महीने शेष रह गये हैं। यह वियोग के क्षणों में मन बहलाने का साधन है।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३२

गाढोत्कण्ठाम़् – विरह वेदना से उत्पन्न प्रिय या प्रिया से मिलन की उत्कट इच्छा ही उत्कण्ठा कहलाती है। उत्कण्ठा का लक्षण इस प्रकार है –
रागेष्वलब्धविषयेषु वेदना महती तु या।
संशोषणी तु गात्राणां तामुत्कण्ठां विदुर्बुधा:॥
अर्थात जिससे प्रेम हो उसके न मिलने पर मन में ऐसी वेदना होने लगती है कि जिससे शरीर सूखता जाता है, उसे उत्कण्ठा कहते हैं।

बालाम़् –  षोडशी नवयुवती को कहते हैं। स्त्रियाँ १६ वर्ष तक बाला, ३० वर्ष तक

तरुणी, ५० वर्ष तक प्रौढ़ा तथा उससे ऊपर वृद्धा कहलाती है।


शिशिरमथिताम़् – आचार्य मल्लिनाथ ने शिशिर का अर्थ शीत ऋतु लिया है। विश्व कोश में शिशिर का अर्थ पाला भी है जो कि अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि पाला कमलिनी को मार देता है।

अन्यरुपाम़् – यक्ष मेघ को बताता है कि उसकी प्रिया वियोग में इतनी दुर्बल हो गयी होगी कि उसका रुप जो कि पूर्व वर्णित (तन्वी श्यामा आदि) से अत्यन्त बदल गया होगा इसलिए उसे ध्यानपूर्वक देखकर पहिचानना।

असकलव्यक्ति – जैसा कि पीछे बताया गया है कि प्रेषितभर्तृका नायिका श्रृंगार नहीं करती है। अत: यक्षिणी ने भी श्रृंगार नहीं किया होगा तथा बालों को नहीं सँवारा होगा। इस कारण लटकते हुए बालों ने उसके मुख को ढक लिया होगा, जिससे वह पूर्ण रुप से दिखाई नहीं देगा।

बलिव्याकुला – बलि का अर्थ होता है – देवताओं की आरधाना; क्योंकि यक्षिणी का पति शाप के कारण बाहर गया था इसलिए सकुशल लौट आने के लिये सम्भवत: यक्षिणी बलि कार्य करती हो।

ब्लॉगवाणी वापिस शुरु हिन्दी ब्लॉगरों को शुक्रिया अदा करना चाहिये…. धन्यवाद मैथिलीजी

आज सुबह मैं अपने ब्लॉग पर ही विचरण कर रहा था कि एकाएक ब्लॉगवाणी का कोड वापिस से नजर आ गया और फ़िर ब्लॉगवाणी साईट खोली तो वापिस से वह अपनी जगह पर अपनी नई पोस्टों के साथ हमारा मुस्कराकर अभिवादन कर रही थी।

बधाई हो ब्लॉगवाणी के संचालको आपको कि आपने हिन्दी के प्रति प्रेम और सम्मान प्रदर्शित किया और हिन्दी ब्लॉगजगत के आव्हान पर आप वापिस से ब्लॉगवाणी को ले आये। आपको बहुत बहुत धन्यवाद।
एक विनम्र निवेदन है कि ऐसे बुरा न मानें यह तो समाज है और इसमें हरेक तरह के लोग होते हैं अगर गुण्डे न होंगे तो पुलिस की जरुरत ही न होगी उससे पता नहीं कितने लोगों की रोजी रोटी पर असर पड़ेगा। कृप्या अपना बड़्प्पन बनाये रखें।

ब्लोगवाणी का ब्लॉग पढ़ें।


कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३१

कलबतनुताम़् – यहाँ कलभ को उपमान बनाया गया है; क्योंकि कलभ और मेघ दोनों में ऊँचाई तथा वर्ण की समानता है तथा मेघ इच्छानुसार रुप धारण करने वाला है। यहाँ तनु का अर्थ शरीर न लेकर छोटा लिया गया है। बत्तीस साल की उम्र वाले हाथी के बच्चे को कलभ



कहा जाता है।

तन्वी – संस्कृत काव्यों में तनुता को सौन्दर्य माना गया है। कोमलांगी, कृशांगी आदि के लिये भी तन्वी पद प्रयुक्त होता है।

निम्ननाभि: – कामसूत्र के अनुसार गहरी नाभिवाली स्त्री में कामवासना का आधिक्य होता है।

चकितहरिणीप्रेक्षणा – मुग्धा नायिका की आँखें डरी हुई हरिणी के समान होती हैं। आचार्य मल्लिनाथ ने इस पर टीका करते हुए लिखा है कि एतेनास्या: पद्मिनीत्व व्यज्यते। पद्मिनी का लक्षण इस प्रकार है –
भवति कमलनेत्रा नासिका क्षुद्ररन्ध्रा अविरलकुचयुग्मा चारुकेशी कृशाड़्गी।
मृदुवचनसुशीला गीतवाद्यानुरक्ता सकलतनुसुवेशा पद्मिनी पद्मगन्धा॥
स्त्रियों के चार भेद माने गये हैम – पद्मिनी, हस्तिनी, शड़्खिनी और चित्रिणी।

परिमितकथाम़् – पतिव्रता स्त्री पति के दूर चले जाने पर श्रृंगार आदि छोड़ देती है तथा आकर्षित करने वाले वस्त्रों का भी त्याग कर देती है और कम बोलती है। कालिदास की यह नायिका भी पतिव्रता हैं और इसको प्रेषितपतिका नायिका कहा है। याज्ञवल्क्य स्मृति में इस प्रकार की नायिका के लिए क्रीड़ा, हास्य आदि का निषेध किया है –
क्रीड़ां शरीरसंस्कारं स्माजोत्सवदर्शनम़्।
हास्यं परगृहे यानं त्यज्येत़् प्रोषितभर्तृका॥
चक्रवाकीम़् इव – यह प्रसिद्ध है कि चकवा – चकवी दिन के समय साथ साथ रहते हैं, परन्तु रात्रि में एक – दूसरे से बिछुड़ जाते हैं। रात्रि वियोग का कारण किसी मुनि का शाप बताया गया है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि वियोग का कारण है – इन्होंने सीता जी के वियोग में रोते हुए रामचन्द्र जी का उपहास किया था। संस्कृत साहित्य में इनका दाम्पत्य प्रेम आदर्श माना जाता है।

ओहो ब्लॉगवाणी बंद हो गया पर हमारी क्या गलती थी….

                   आज सुबह उठकर ब्लॉगवाणी साईट खोली, नये हिन्दी चिट्ठे पढ़ने के लिये पर ये क्या ये तो अलविदा का सन्देश ब्लॉगवाणी के तंत्रजाल पर। कल ही किसी महाशय की पोस्ट पढ़ी थी जिसमें ब्लॉगवाणी  की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाये गये थे, पोस्ट पढ़कर बुरा तो लगा कि इन महाशय को शायद ब्लॉगवाणी का हिन्दी चिट्ठों के प्रति योगदान पता नहीं होगा इसलिए यह उसके और उसके पीछे जुड़ी टीम की मेहनत को नजर अंदाज कर रहे हैं। ब्लॉगवाणी साईट के मालिकों ने कभी भी इसका उपयोग अपने व्यावसायिक गतिविधियों के लिये नहीं किया, केवल हिन्दी के प्रति प्रेम और हिन्दी के प्रति सम्मान और जन जन ब्लॉगरों के बीच में से एक लेखक का निकालना ही उनका यह हिन्दी एग्रीगेटर चलाने का उद्देश्य था। पर कुछ नासमझ हमारे ही भाई बंद लोग उनकी गतिविधियों के पीछे पड़ गये जैसे वे उनके घर की मुर्गी हो जिसे कुछ भी बोल सकते हों या उनका चिट्ठे को कुछ व्यावसायिक नुकसान हो रहा हो।
                अब इन नासमझ लोगों को क्या कहें कि वाणी से कुछ भी किया जा सकता है अगर मीठी होगी तो सब आपके पास आयेंगे और बुरी होगी तो सब दूर भागेंगे। केवल शब्द की जादूगरी से बनती हुई बात को बनाया जा सकता है और बिगाड़ा भी जा सकता है। मेरा ब्लॉगवाणी के संचालकों से विनम्र निवेदन है कि इन जैसे ब्लॉगरों को नजरअंदाज कर अपने हिन्दी के प्रति प्रेम और सम्मान को बनाये रखें और इस बेहतरीन हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर को शुरु कर इसे इतिहास का पन्ना न बनने दें।

alvidablogvaani