Tag Archives: मेरी जिंदगी

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (नदी किनारे पिकनिक और गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्य सृजन).. My life my experience

नदी किनारे पिकनिक मनाने का आनंद ही कुछ और होता है, नदी हमारे शहर से करीबन १० किमी. दूर थी, वहाँ पर शिवजी का प्राचीन मंदिर भी है और एक गोमुख है जिससे लगातार पानी निकलता रहता है, किवंदती है कि पाण्डवों के प्रवास के दौरान यह गौमुख अस्तित्व में आया था। कहते हैं कि गंगाजी का पानी है, और वह कुंड जिसमें पानी आता है हमेशा भरा रहता है। पानी नदी में प्रवाहित होता रहता है।

नदी के पाट पर बड़े छोटे पत्थर, कुछ रेत और उनके बीच में से निकलता नदी का उनमुक्त जल, जो पता नहीं कब कहाँ निकल आता और कैसा अहसास करा जाता। इसीलिये नदी किनारा हमेशा से मेरा पसंदीदा स्थान रहा है। जब हम मंगलनाथ पर नदी के किनारे बैठते थे तो गजानन माधव मुक्तिबोध की याद आ जाती थी, कहीं पढ़ा था कि मुक्तिबोध मंगलनाथ पर नदी के किनारे बैठकर ही साहित्य सृजन किया करते थे।

केवल इसी कारण से नदी हमारा पसंदीदा स्थान था, पिकनिक मनाने के लिये, सब सामान हम अपने साथ ले जाते थे, हम पाँच मित्र थे जो भी सामान पिकनिक में लगता सब अपने अपने घर से कच्चा ले जाते थे, जैसे कि आटा, दाल, मसाले, सब्जियाँ, पोहे.. इत्यादि। सब अपनी सुविधा के अनुसार घर से निकलते थे हालांकि समय निश्चित किया रहता था, पर उस समय मोबाईल तो क्या लैंड लाईन भी घर पर नहीं था।

हम दो दोस्त साईकल से नदी के लिये निकलते थे, हमारे दो दोस्त सारा समान लेकर स्कूटर से पहले ही पहुँच जाते थे। साईकल से १० किमी जाना और फ़िर शाम को आना पिकनिक के मजे को दोगुना कर देता था। इससे लगता था, अहसास होता था कि हम कितने ऊर्जावान हैं।

सुबह नदी पहुँचकर सबसे पहले शिवजी के दर्शन और अभिषेक करके पिकनिक का शुभारम्भ किया जाता। एक दोस्त रुककर लकड़ियाँ बीनकर इकट्ठी करता और उनका चूल्हा बनाने का बंदोबस्त करता और बाकी के चार हम लोग निकल पड़ते पास के खेतों में भुट्टा ढूँढने, जल्दी ही पर्याप्त भुट्टे लेकर वापिस आते और चूल्हे पर पकाकर रसभरे दानों का आस्वादन करते। भुट्टे का कार्यक्रम समाप्त होते होते फ़िर भूख तीव्र होने लगती तो पोहे बनाने की तैयारी शुरु होने लगती, किसी हलवाई को हम साथ लेकर नहीं जाते थे, सब खुद ही पकाते थे, नाश्ते में पोहे सेव और खाने में दाल बाफ़ले और सब्जी। बाफ़ले पकाने के लिये,  कंडे मंदिर से ही मिल जाते थे। खाना पकाने के बर्तन भी मंदिर से उपलब्ध हो जाते थे।

खुद ही पकाते थे और सब मिलकर खुद मजे में खाते थे। कभी अंताक्षरी खेलते कभी कविताएँ सुनाते कभी एकांकी अभिनय करते कभी अभिनय की पाठशाला चलाते, एक मित्र चित्रकार था तो वह सबका पोट्रेट बनाता। खूब मजे भी करते और अपने अंदर की प्रतिभाओं को भी निखारते, भविष्य में करने वाले नाटकों के मंचन की रुपरेखा बनाते।

क्या दिन थे, अब कभी लौटकर नहीं आयेंगे, बस वे दिन तो बीत ही गये, और उनकी यादें जेहन में आज भी ऐसी हैं जैसे कि ये पल अभी आँखों के सामने हो रहे हैं।

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे … (मामा का मतलब, दो माँ, बोल अब मैं तेरा क्या करुँ)… My life my experience

रात को घर लौटते समय प्रोफ़ेसर कॉलोनी की सड़क पर घुप्प अँधेरे  में से होकर चले जा रहे थे, और मस्ती करते हुए तीनों निकले जा रहे थे, पतझड़ का मौसम था तो पेड़ों के पत्ते सड़क पर बिछे हुए थे, और तीनों के स्पोर्ट्स शूज से उन पत्तों के कुचलने की आवाजों से वह वीरान कॉलोनी और वह सन्नाटा उनकी गप्पों के साथ अजीब सी कर्कश ध्वनि पैदा कर रहा था।

इतने में ही पुलिया के पास थोड़ी लाईट नजर आई, और वहाँ पर एक बुलेट खड़ी थी और तीन चार लोग बैठे थे, सिगरेट के धुएँ के छल्ले दूर से ही नजर आ रहे थे, लगा कि लौंडे लपाटे हैं जो प्रोफ़ेसर कॉलोनी के वीरान सन्नाटे में बीयर और सिगरेट पीने आये हैं, बात सही भी निकली, तीन के हाथ में हेवर्ड्स १०००० बीयर की बोतल थी और चौथे के हाथ में ऐरिस्ट्रोकेट व्हिस्की का अद्धा, पानी की बोतल और गिलास भी।

देखा तो पता चला कि शाहरोज अपने दोस्तों के साथ बैठकर मजा मस्ती कर रहा है, दीपक जो कि उसका खास दोस्त था और भी दो दोस्त… जिन्हें मैं पहचानता नहीं..

जब तक हम उनके पास पहुँचे तब तक सब ठीक था, पर हमारे पास पहुँचते पहुँचते दीपक के चेहरे का रंग बदलने लगा था, उसने तीनों को रोका और पूछा कि “क्यों बे इधर से क्यों आ रहे हो,और किधर जा रहे हो”

तो राकू थोड़ा हड़बड़ाया और बोला “तेरे को इससे मतलब, चल निकल”

अब दीपक खड़ा हुआ और बोला “अबे ओ कॉलेज की नई फ़सल, नाके से पॉलिटेक्निक के पास सुट्टा मार कर आ रहे हो ना ?”

राकू “तो तेरे को क्या ..”

दीपक “और स्साले कमीने तू ही है न जो क…? को छेड़ता है, परेशान करता है”

राकू को देखकर अब तो ऐसा लगा कि जैसे काटो तो खून नहीं..

दीपक “बोल स्साले बोल, अब निकाल आवाज.. तेरी तो मा…..?”

राकू “तेरे को क्या, अपन किसी के साथ भी कुछ करेगा तो क्या स्साले तेरे को जबाब देना पड़ेगा, क्या तूने पूरे गाँव का ठेका ले रखा है”

दीपक “अबे क…? की माँ मेरी बहन है, और तो मैं उसका हुआ मामा, समझा, मतलब समझाऊँ”

राकू के कान से शुन्य सी सांय सांय आवाज आने लगी ऐसा लगा कि कान अपने आप ही एक हजार डिग्री के तापमान के हो गये हों।

दीपक “मामा का मतलब, दो माँ, बोल अब मैं तेरा क्या करुँ”

राकू बेचारा क्या बोलता चुपचाप गर्दन झुकाकर खड़ा रहा ।

दीपक बोला “और सुन राकू अगर आज के बाद  तू उसके आसपास नजर आया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा”

अपुन कुछ बोला नहीं, क्योंकि मुझे पता था कि यह सब चमकाईटिस का ड्रामा है।

शाहरोज खड़ा हुआ और अपुन के पास चलता हुआ आया और आँख मारते हुए बोला “चल निकल, कल मिलते हैं”

कभी कभी अपने दोस्तों को ऐसी चमकाईटिस भी देनी पड़ती है, नहीं तो स्साले बर्बाद हो जायेंगे, इन मायाओं के चक्कर में पड़कर…

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे…(पिटने दे साले को, बहुत लड़कियों को छेड़ने का कीड़ा है उसमें)… My life my experience

रुपेश दौड़ा दौड़ा आया और बोला “तुम दोनों यहाँ गुमटी पर बैठकर धुआँ उड़ा रहे हो और वहाँ इरशाद और उसके दोस्त प्रिंसीपल रुम के सामने अवनीश लम्बू को पटक पटक के मार रहे हैं, चलो जल्दी चलो, वो इरशाद तुमको देखकर ही उसे मारना बंद कर देगा।”

कान्हा बोला “चलो भाई उस इरशाद की तो ऐसी तैसी कर देते हैं”

अपुन बोला “नहीं, पिटने दे साले को, बहुत लड़कियों को छेड़ने का कीड़ा है उसमें, अच्छा है ठुकाई से निकल जायेगा।”

कान्हा झिड़ककर बोला “अबे कौन से जन्म का बदला निकाल रहा है, चल स्साले लम्बू को बचाते हैं, नहीं तो फ़ालतू में उसकी पसलियों की फ़िक्सिंग अपने को ही करवानी पड़ेगी”

अपुन बोला “तो ठीक है न उधर दोस्ती निभायेंगे। पन अभी बिल्कुल नहीं जाने का, मतलब नहीं जाने का”

कान्हा वो आधी सिगरेट एक ही कश में खींच गया। और लकड़ी के डंडे को पकड़कर खड़ा हो गया था, वही लकड़ी उस गुमटी का आधार थी, शायद उसे सिगरेट चढ़ गयी थी।

“स्साले तुझको कितनी बार समझाया कि एक कश में इतनी मत पिया कर, पन मानने का नहीं, करेगा तो अपने मन की।” अपुन बोला

रुपेश वहीं खड़ा खड़ा हम दोनों के चलने का इंतजार कर रहा था, पन अपुन भी गया नहीं। अपुन का उसूल तोड़ा था लम्बू, लड़कियों के पीछे भागने का नहीं, लड़कियों पर एक रूपया खर्चा नहीं करने का, लड़कियाँ पैसा खर्च करे तो ठीक, नहीं तो इस माया के चक्कर में बिल्कुल नहीं पड़ने का

खैर रुपेश का चेहरा देखकर अब रहा नहीं गया और अपुन बोला “चल, देखते हैं, इरशाद ने लम्बू की कितनी ठुकाई की है, और सुन अगर कोई कसर होगी तो अपुन पूरी कर देगा !” “आखिर लड़की का मामला है और लड़की के मामले में चुपचाप मार खा लेना चाहिये और समझदार दोस्तों को उस लफ़ड़े से दूर ही रहना चाहिये”

रुपेश की तरफ़ देखकर अपुन बोला “स्साले, लड़कियों का मामला होने पर पुलिस भी बहुत मारती है, और लोग भी दौड़ा दौड़ा कर मारते हैं”

जब तक हम तीनों कॉलेज के शटर वाले मैन गेट पर पहुँचते तब तक इरशाद एन्ड पार्टी लम्बू की ठुकाई करके निकल चुकी थी, और लम्बू वहीं पानी की टंकी पर अपना मुँह धो रहा था, अपुन को आते ही भड़ककर बोला “स्साले कैसे दोस्त हो, जब जरुरत हो तब काम नहीं आते”

अपुन बोला “देख लम्बू, मैं तेरे को पहले ही समझाया था कि झगड़ा बड़ेगा, बच के रहना, पन तेरे को तो मजनूँ का भूत चढ़ा था, तो जा साले पिट और बन मजनूँ”

लम्बू बोला “अबे ये ही दोस्ती है अपनी या इरशाद की दोस्ती निभा रहा था”

कान्हा बोला “ऐ चल ना ज्यादा नौटंकी मत कर अब तेरे को पहले ही बोला था कि लफ़ड़ा होएगा पन तेरी ठस बुद्धि में कुछ आये तो न !”, “चल गुमटी पर चाय पीते हैं, और इस बार तो पूरी छोटी फ़ोर स्क्वेयर को एक ही कश में खींच डालूँगा, पूरे नशे की ऐसी तैसी कर दी”

संतुष्टि कब किसे कहाँ हुई है, कोशिश एक खोज की ? (Satisfaction…)

    संतुष्टि बड़ी गजब की चीज है, किस को कितने में मिलती है इसका कोई मापद्ण्ड नहीं है और मजे की बात यह की इंसान को हरेक चीज में संतुष्टि चाहिये चाहे वह खाने की चीज हो या उपयोग करने की। इंसान जीवन भर अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने मॆं लगा रहता है। इंद्रियाँ शैतानी रुप लेकर इंसान से अपनी तृप्ती पूर्ण करती रहती हैं।

    किसी को केवल पेट भरने लायक अन्न मिल जाये तो ही संतुष्टि मिल जाती है, और प्रसन्न रहता है, पर इंसान की इंद्रियाँ बड़ी ही शक्तिशाली होती जा रही हैं, और केवल पेट भरने से आजकल कुछ नहीं होता, घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस सब चाहिये, क्यों ? केवल इंद्रियों की संतुष्टि के लिये, अगर यह सब होगा तो गर्व नामक तरल पदार्थ की अनुभूति होती है ? पर इस सब में इंसान अपने भक्ति की संतुष्टि को भुल जाता है।

    वैसे भी संतुष्टि इंसान की इंद्रियों की ही देन है और उसकी सोच पर ही निर्भर करता है कि उसकी इंद्रियाँ उस पदार्थ विशेष की कितनी मात्रा मिलने पर तृप्त होती हैं, उस इंसान की जीवन संरचना का भी इंद्रियों पर विशेष प्रभाव होता है। केवल इंद्रियों की तृप्ति याने संतुष्टि के लिये इंसान बुरे कार्यों के लिए उद्यत होता है, अगर इंद्रियाँ तृप्त होंगी तो बुरे कार्य भी नहीं होंगे।

    इंसान को जीने के लिये चाहिये क्या दो वक्त की रोटी और तन ढ़कने के लिये कपड़ा, और भगवान ने हर इंसान के हाथों को इतनी ताकत प्रदान की है कि वह अपने लिये खुद यह सब कमा सके। परंतु इंसान ने अपनी ग्रंथियों के पदार्थों की संतुष्टि के लिये दूसरों की रोटी पर भी अधिकार करना शुरु कर दिया, अब हमें केवल रोटी की चिंता नहीं होती, हमें चिंता होती है ऐश्वर्य की, पर इंसान की ग्रंथियाँ यह नहीं समझ रहीं कि ऐश्वर्य पाने के चक्कर में वह कितने लोगों की रोटी ग्रन्थी की संतुष्टि से दूर कर रहा है।

    कहाँ ले जायेगी इंद्रियों की तृप्ति के लिये यह संतुष्टि हमें अपने जीवन में यह तो हम भी नहीं जानते ? परंतु इतना तो है कि अगर सही दिशा में सोचा जाये तो कभी न कभी तो खोज के निष्कर्ष पर पहुँचेगें। खोज जारी है अनवरत है… वर्षों से… हम भी उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं…

जन्माष्टमी पर मुंबई की दही हांडी (Dahi Handi in Mumbai)

    सुबह से ही दही हांडी की धूम है मुंबई में, क्योंकि आज जन्माष्टमी त्यौहार है। आप सबको जन्माष्टमी पर्व की शुभकामनाएँ। हम कहीं दूर दही हांडी देखने तो नहीं गये परंतु घर के पास ही एक आयोजन था जिसको देखने जरुर गये और हाथों हाथ वीडियो भी बना लाये, आप सबको दिखाने के लिये। देखिये –

    ऊपर के वीडियो में दो अलग अलग समूह हांडी फ़ोड़ते हुए और नीचे वाले वीडियो में हांडी फ़ोड़ने के बाद गोविंदाओं की मस्ती…

मुंबई की बारिश, जीवन अस्त व्यस्त है, बारिश बड़ी मस्त है, बारिश के बहाने जीवन की कुछ बातें.. (Rain in Mumbai)

    मुंबई में आज लगातार तीसरा दिन है बारिश का, वो भी झमाझम बारिश का। पारिवारिक मित्रों के साथ सप्ताहांत पर बाहर जाने का कार्यक्रम बनाया गया था परंतु बारिश ने सब चौपट कर दिया सुबह से ही बारिश ऐसी जमी कि सब चौपट हो गया। जाना भी दूर था सोचा कि अगर अकेले होते तब तो कोई बात ही नहीं थी, परंतु साथ में बीबी और बच्चा हालत खराब कि कहीं कोई विकेट डाउन न हो जाये, क्योंकि अगले दिन बेटे को स्कूल भी जाना था।
    बारिश भी ऐसी की छतरी भी फ़ेल है, इस बारिश के सामने !! बारिश की फ़ुहारें कभी हल्की कभी तेज और हवा चारों तरफ़ से चलती हुई, छतरी होते हुए भी पूरे भीगे हुए, और जब ऑफ़िस पहुँच जायें तो एक दूसरे को देखें कि “अरे सूखे कैसे आ गये !”
    आज सुबह की ही बात थी, ऑफ़िस पहुँचे वो भी पूरे हल्के से गीले, भीगे हुए, धीमी धीमी बौछारों से, छतरी भी पूरी तरह से बारिश के पानी से तरबतर, लिफ़्ट में गये तो लिफ़्ट में भी ऐसा लगा कि आधा इंच पानी भरा हुआ है, वैसे तो हम रोज ही सीढ़ियों का उपयोग करते हैं, परंतु बारिश में जोखिम नहीं ले सकते क्योंकि सभी जगह फ़िसलन होती है, कब कहाँ रपट जायें कुछ कहा नहीं जा सकता।
    वैसे आजकल मोबाईल पर एस.एम.एस. आ जाते हैं कि फ़लाने समय पर हाईटाइड है, कभी मुंबई पोलिस से कभी हिन्दुस्तान टाईम्स से, पर मुंबई को बारिश से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मुंबई की रफ़्तार कम नहीं होती, तभी तो कहते हैं, “ई है मुंबई नगरिया तू देख बबुआ”।
    बारिश की बात की जाये और गाना न हो तो मजा ना आये, ये देखिये “आज रपट जायें तो हमें न उठइयो”।
    शाम घर के लिये निकलते समय फ़िर बारिश जोरों से आ गई वो भी चारों तरफ़ हवाओं के साथ, बारिश में मुंबई के ट्राफ़िक की हालत बिल्कुल खराब होती है, बड़ी मुश्किल से २५-३० मिनिट बाद ऑटो मिला, सड़क पर गड्डे जिनमें बारिश का शुद्ध पानी भरा हुआ था, पता ही नहीं चलता कि वाहन निकल जायेगा या फ़ँस जायेगा। रास्ते में एक जगह ऐसी पड़ती है जहाँ सड़क के बीचों बीच में सीवर का ढ़क्कन है, और दो दिनों से उसमें से पानी निकलता हुआ देख रहा हूँ, ऐसा लगता है कि जमीन में से फ़व्वारा फ़ूटा हुआ है। वाह रे दरिया से घिरे हुए मुंबई जिसके चारों ओर दरिया हो और अब बीच शहर में भी दरिया जैसा ही हो रहा है।
    घर आकर फ़िर बाजार जाना हुआ तो सड़क की दुर्दशा देखकर मन बैचेन हो गया और कुछ कविता करने को मन मचलने लगा, दो ही पंक्ति बन पाईं, और भी बनी थीं पर घर आते आते भूल गया –
“जीवन अस्त व्यस्त है
बारिश बड़ी मस्त है”
    सड़क पर बने गड़्ड़ो को लांघते हुए निकल रहे थे, तो ऐसा लग रहा था कि ऐसे ही जाने कितने गड्ड़े अपने जिंदगी में भी बने हुए हैं जिनको लांघकर हम निकल लेते हैं और जब वह गड्ड़ा बड़ा होता है तो उसमें पैर रखकर आगे बढ़ना ही होता है बस वैसे ही जिंदगी की कुछ मुश्किलें जिन्हें हम लांघ नहीं पाते, उन मुश्किलों में से निकलना ही पड़ता है। और एक बार जब जूता गीला हो जाता है फ़िर हम बारिश के पानी से भरे गड्ड़ों की परवाह न करते हुए फ़टाफ़ट अपनी मंजिल पर पहुँच जाते हैं वैसे ही जिंदगी के साथ भी होता है, मुश्किलें सहते सहते हमें उनकी आदत पड़ जाती है और हम अपनी जिंदगी में उन मुश्किलों की परवाह किये बिना आगे बड़ते रहते हैं, कभी बुझे मन से कभी प्रफ़ुल्लित होकर अच्छे मन से, केवल समय का फ़र्क होता है।
    एक मुहावरा जो कि पत्नी जी के मुँह से कई बार सुन चुके थे आज फ़िर से सुना “ऐसा लगा कि कोई आज खरहरी खाट से सोकर उठा है”।

मुंबई से उज्जैन यात्रा बाबा महाकाल के दर्शन और रक्षाबंधन पर सवा लाख लड्डुओं का भोग ४ (Travel from Mumbai to Ujjain 4, Mahakal Darshan)

    सुबह उठते ही नई उमंग थी क्योंकि आज रक्षाबंधन था, कोई बहन नहीं है परंतु खुशी इस बात की थी कि हमारे बेटेलाल की अब बहन घर में आ गई थी और उसने राखी भेजी थी, एक त्यौहार जो हमने कभी मन में तरंग नहीं जगा पाता था वह त्यौहार अब हमारे घर में सबको तरंगित करता है।

    पापा की बहनें हैं और उनकी ही राखियाँ हम भी बाँध लेते हैं, क्योंकि हमें भी भेजी जाती हैं। देखिये राखी के कुछ फ़ोटो और साथ में मिठाई –

Rakhi aur Mithai Harsh aur mere papaji

    फ़िर चल दिये महाकाल के दर्शन करने के लिये, महाकाल पहुँच कर पता चला कि बहुत लंबी लाईन है और ज्यादा समय लगेगा, हमारे पास समय कम था क्योंकि शाम को वापिस मुंबई की ट्रेन भी पकड़नी थी। हमने पहली बार विशेष दर्शन के लिये सोचा जो कि १५१ रुपये का था, और वाकई मात्र ५ मिनिट में बाबा महाकाल के सामने थे, १५१ रुपये के विशेष दर्शन के टिकट से हम तीनों ने दर्शन किये और धन्य हुए। अटाटूट भीड़ थी महाकाल में।

Mahakal bahar se darshan

    महाकाल में रक्षाबंधन पर्व पर सवा लाख लड्डुओं का भोग लगाया जाता है और हरेक दर्शनार्थी को एक लड्डू का प्रसाद दिया जाता है। यह परंपरा हम सालों से देखते आ रहे हैं, जब भी रक्षाबंधन पर उज्जैन होते हैं तो दर्शन करने जरुर जाते हैं और साथ ही लड्डुओं का प्रसाद लेने भी। ये वीडियो फ़ोटो देखिये सवा लाख लड्डुओं के भोग का –

Mahakal sava lakh ladduo ka bhog Mahakal sawa lakh ladduo ka bhog

जय महाकाल

ऊँ नम: शिवाय !

अनुग्रहित करो मुझे …. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

अनुग्रहित करो मुझे

पासंग में अपने लेकर,

अपने संभाषण में

सम्मिलित करो,

जीवन की धारा में

साथ साथ

ले चलो अनुषंगी बनाकर,

कट रहा है

इसे जीने दो

अपनी मौज में

अपने उच्छश्रंखल अवस्था में

रंगीन रंग में

करतल ध्वनि में

जीवन की ताल से

जोड़ते हुए

ले चलो कहीं,

दूर पठारों पर, वादियों में,

झाड़ के झुरमुट में

पतंगों की गुनगुनाहट में

मन की अंतरताल में,

शामिल करलो मुझे

अनुग्रहित करो मुझे।

देखना है रक्त की विजय !!! … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

विषादित जीवन

विषादों से ग्रसित जीवन,

रुधिर के थक्के

जीवन में जमते हुए,

खुली हवा की घुटन,

थक्के के पीछे

नलियों में, धमनियों में,

धक्के मारता हुआ

रुधिर,

थक्के के

निकलने का इंतजार,

खौलता हुआ रक्त,

और

विषादित जीवनमंच,

रेखाएँ खिंचती हुई

हटती हुईं,

जाल बुनता हुआ,

गहराता हुआ,

ठहरा सा

गुमसुम रक्त शिराओं में,

विषादों से लड़ता हुआ,

देखना है

रक्त की विजय !!!

मुंबई से उज्जैन यात्रा बाबा महाकाल की चौथी सवारी और श्रावण मास की आखिरी सवारी 3 (Travel from Mumbai to Ujjain 3, Mahakal Savari)

    जब हमने उज्जैन जाने का कार्यक्रम बनाया था तभी यह सोच लिया गया था कि बाबा महाकालेश्वर की चौथी सवारी और जो कि श्रावण मास की आखिरी सवारी भी होगी, के दर्शन अवश्य किये जायेंगे।
    सायं ४ बजे महाकाल की सवारी महाकाल मंदिर से निकलती है जो कि गुदरी चौराहा, पानदरीबा होते हुए रामघाट पहुँचती है, फ़िर रामानुज पीठ, कार्तिक चौक, गोपाल मंदिर, पटनी बाजार होते हुए वापिस महाकाल मंदिर शाम ७ बजे पहुँचती है।
    बाबा महाकाल अपनी प्रजा के हाल जानने के लिये नगर में निकलते हैं, और प्रजा तो उनकी भक्ति में ओतप्रोत पलकें बिछाये इंतजार करती रहती है। पूरा उज्जैन शहर बाबा महाकाल में रमा रहता है। आसपास से गाँववाले पूरी श्रद्धा के साथ उज्जैन शहर में डेरा डाले रहते हैं। उज्जैन में महाकाल की भक्ति की बयार बहती है, हवा से भी केवल महाकाल का ही उच्चारण सुनाई देता है।
    इस बार मैंने अपने मोबाईल से कुछ फ़ोटो और वीडियो लिये हैं, आप भी बाबा महाकाल की सवारी के दर्शन कीजिये और जय महाकाल बोलिये ।
फ़ोटो –
Mahakal Savari Gopal Mandir
गोपाल मंदिर पर श्रद्धालुओं का जत्था
at Mahakal Savari Ujjain Vivek Rastogi and Harsh Rastogiगोपाल मंदिर पर हम अपने बेटेलाल के साथ
वीडियो –

 

 

गोपाल मंदिर का एक दृश्य

 

 

 

 

इन वीडियो मॆं पूरी महाकाल की सवारी का आनंद लिया जा सकता है।
जय बाबा महाकाल
ऊँ नम: शिवाय !