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हैलो… हिन्दी आता है क्या ? (Hello ! Do you know Hindi ?)

    ऑफ़िस से आते समय थोड़ा पहले ही घर के लिये उतरना पड़ा तो सिग्नल पर एक आदमी टकराया और बोला “हैलो… हिन्दी आता है क्या?” हमने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और चुपचाप चल दिये कि जैसे अपने को नहीं किसी और को बोला हो।

     कई बार ऐसे व्यक्ति मिले हैं, जो कि उत्तर भारतीय लोगों को निशाना बनाते हैं और उनसे मदद के नाम पर ठगी करते हैं, इसलिये अब तो हम बिल्कुल मदद नहीं करते हैं, हाँ इसमें अगर कोई जरूरतमंद होता है तो भी उसकी जानबूझकर मदद नहीं कर पाते हैं।

    ये वाक्ये केवल बैंगलोर में ही नहीं भारत में लगभग सभी जगह होते हैं। अगर बात करने रूक जाओ तो उसकी आँखों मॆं विशेष चमक आ जाती है और पता नहीं कहाँ से उसका परिवार भी प्रकट हो जाता है जिसमें अमूमन उसकी पत्नी और एक याद दो बच्चे होते हैं, जो कि फ़टॆहाल होते हैं। और फ़िर शुरू होता है खेल रूपये ऐंठने का । कहा जाता है हम दूर दराज से आये हैं और यहाँ काम नहीं मिल पाया है और अब खाने के भी पैसे नहीं है, खाने के ही पैसे दे दीजिये, घर वापस जाना है कैसे जायें समझ नहीं आ रहा । इस सबसे ही माजरा समझ में आ जाता है कि इन लोगों ने लोगों के हृदय को झकझोर कर रूपये ऐंठने का धंधा बना रखा है ।

    क्योंकि जहाँ तक मैं सोचता हूँ आज भी दूर दराज के गाँव का कोई भी व्यक्ति शहर कुछ करने आयेगा तो पहली बात तो वह अकेला आयेगा ना कि अपने परिवार के साथ, और अगर वह कुछ करना चाहता है तो बड़े शहरों में इतना काम होता है कि कोई न कोई काम मिल ही जाता है, और अगर कोई काम न करना चाहे तो वह अलग बात है।

    गाँव का व्यक्ति कभी भी अपने स्वाभिमान से डिगेगा नहीं, कि उसे भीख माँगनी पड़ जाये, वह भूखे रह लेगा या वापिस बिना टिकट जैसे तैसे अपने गाँव वापिस चले जायेगा, किंतु शायद ही वह अपने स्वाभिमान से समझौता करेगा, हो सकता है कि कुछ लोगों की परिस्थितियाँ अलग हों। किंतु इतने सारे लोगों की परिस्थितियाँ तो एक जैसी नहीं हो सकतीं।

त्यौहार पर सीधे पहली गाड़ी पकड़कर अपने घर अपने जड़ की तरफ़ भागते हैं, अब आप कैसे समझोगे युवराज !

विकास नहीं होगा तो युवराज बाहर जाकर मजदूरी भी करनी पड़ेगी और भीख भी मांगना पड़ेगी। सभी युवराज आप जैसे सुनहरी किस्मत लेकर पैदा नहीं हुए हैं, अगर युवराज आपने कभी भूख और गरीबी को झेला होता तो शायद यह आप तो कभी नहीं कहते। आप और आपकी संपत्ति ५ वर्ष में २०० से १००० गुना तक बढ़ जाती है परंतु उनके ऊपर कोई आयकर जाँच नहीं होती है और एक व्यापारी जो कि अपनी मेहनत से काम करता है और किसी को घूस देने को मना कर देता है तो झट से सारी सरकारी मशीनरी उसके पीछे पड़े जाती है।

आपके मुँह से विकास की बातें अच्छी नहीं लगतीं, आप पहले कांग्रेस की भारत में उपलब्धियाँ गिनायें कि भारत देश को आगे विकास की राह पर ले जाने के लिये क्या क्या किया, चलो किया भी तो भी गिनायें, जनता को समझ तो आना चाहिये कि क्या क्या कर सकते थे और कितना किया । और अभी भी केवल विकास की भाषा बोल रहे हैं, नहीं युवराज अब ऐसी भाषा से जनता बहकने वाली नहीं है। ऐसी पार्टी से कैसे भारत देश के विकास की उम्मीद की जा सकती है जिनकी सरकार के दर्जन भर मंत्री जेल में हों और बहुत सारे दागी मंत्री हों। खुद केंद्रीय मंत्री आंदोलनकारियों को लात घूसे चलायें तो अब क्या बतायें।

आप बताओ विकास कैसे करोगे, जैसे कोई निजी कंपनी जब अपना उत्पाद किसी को बेचने जाती है तो उसके फ़ायदे बताती है, उस उत्पाद से कंपनी को फ़ायदा होगा तभी ना कंपनी खरीदेगी, जैसे सरकार, जब कोई भी चीज खरीदती है तो पूछा जाता है कि आपने कहाँ कहाँ उत्पाद बेचा है और उन लोगों को कितनी सुविधा हुई, उत्पाद कैसा चल रहा है । आपको समझना पड़ेगा कि जनता अब बेवकूफ़ नहीं रह गई है, जनता के पास सूचना है कि कब कहाँ क्या क्या हुआ और क्या क्या हो रहा है।

विकास के रास्ते पर देश को प्रदेश को कैसे ले जाओगे, उसका मास्टर प्लॉन बताओ तभी युवाओं और जनता की समझ में आयेगा। जब खुद दागी लोगों को आप टिकट देते हो, दागी मंत्री होते हैं, दागी मोटर पर घूम लेते हैं, तब प्रदेश में माफ़िया राज कहना कुछ ठीक नहीं लगता।

जो लोग घर से दूर पड़ें मजदूरी और नौकरी कर रहे हैं, उनके और उनके परिवार के दिल से पूछो कि क्या वे दूसरे प्रदेश में सुखी हैं, नहीं अलबत्ता लगभग सबका जबाब होगा कि अगर हमारे यहाँ भी घर में प्रदेश में अवसर होता तो बाहर तो नहीं आते, चाहे दो पैसे कम कमाते और दो पैसे कम बचाते।  किसी को भी घर के बाहर रहना अच्छा नहीं लगता अब आप को क्या पता युवराज जब ये सब आपके ऊपर बीतती तो आपको पता लगता। और वैसे भी भारत में कोई भी कहीं भी जाकर रह सकता है और कमा सकता है इसलिये यह बात बेमानी सी है कि आप केवल इतना कहकर मतदाता को बहका रहे हैं। और खुद पार्टी को हाशिये पर ले जाने की तैयारी कर चुके हैं।

बाहर जो भी रह रहे हैं पढ़े लिखे या अनपढ़ जो नौकरी कर रहे हैं या मजदूरी कर रहे हैं, पता है बाहर केवल पैसा कमाने आये हैं, त्यौहार पर सीधे पहली गाड़ी पकड़कर अपने घर अपने जड़ की तरफ़ भागते हैं, अगर यहीं रहना होता तो घर की तरफ़ नहीं जाते।

अब बात करें महाराष्ट्र की तो अगर मुंबई में बाहर का आदमी नहीं होगा तो मुंबई के चक्के थम जायेंगे, फ़ल फ़ूल और सब्जियाँ तो मिलनी ही बंद हो जायेगी, क्योंकि वहाँ ये सब काम तो अधिकतर बाहर वाले ही कर रहे हैं। ऑटो जो कि मुंबई के  परिवहन के मुख्य साधनों में से एक है बंद हो जायेंगे। दर्जी नहीं मिलते मुंबई में, दर्जी भी थोड़ी अच्छी कमाई के लिये मुंबई आते हैं, मैंने अपनी ऑखों से देखा है, दर्जी अपनी मशीन दुकान के बाहर लगाता है और रात को वहीं उसी मशीन के पास अपनी चादर बिछाकर सो जाता है, रहने के लिये कोई जगह नहीं लेता है क्योंकि उसमें भी पैसे खर्च होते हैं, और वह पैसे बचाकर अपने परिवार को भेजता है। नाई, नाई भी अधिकतर वहीं से हैं जहाँ से आप बोल रहे हो, परंतु क्या करेंगे वे भी घर पर कमाई १ हजार भी नहीं हो पाती और मुंबई में कम से कम १०-१२ हजार कमा लेते हैं, दुकान में ही सो जाते हैं, सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करते हैं, और पैसे बचाकर घर पर भेजते हैं, क्योंकि घर पर बुजुर्ग हैं जिन्हें दवा की जरूरत है छोटे भाई बहन हैं जिनको आगे पढ़ना है, घर में काम करवाना है, कम से कम अपने परिवार को सहारा तो देते हैं।

अगर आपने युवराज यह सब चीजें बहुत करीब से देखी होतीं तो शायद आपको पता होता कि विकास का क्या महत्व है। आपको वोट देने में कोई बुराई नहीं है परंतु विकास की राह तो बताईये कि हाँ हम गाँव और शहरों में कैसे विकास लायेंगे हमे दागी लोगों को टिकट नहीं देंगे, सरकारी मशीनरी की मदद से लोगों को स्वरोजगार में मदद करेंगे। केवल विकास की बातों से कुछ नहीं होगा।

यह दर्द है ऐसे ही एक दुखहारे का जिसके प्रदेश में कांग्रेस ने लगभग ४५-५० वर्ष शासन किया परंतु वहाँ प्रगति के नाम पर कुछ नहीं हुआ, और कुछ अपना करने की कोशिश भी की तो सरकारी तंत्र से कोई सहायता नहीं मिली और मजबूरी में बाहर नौकरी कर रहा है, नौकरी याने कि जो किसी का नौकर है, तो जब मालिक अपनी पर आता है तो वह बेचारा मजदूर बन जाता है। अगर उस प्रदेश में विकास के लिये कुछ महत्वपूर्ण काम किये गये होते तो वह दुखहारा भी अपने घर अपने प्रदेश अपनी माटी से उतना ही प्यार करता है जितना आप युवराज आप वोट से करते हो।

लिव-इन रिलेशनशिप मतलब बराबर का खर्चा

आजकल लिव-इन रिलेशनशिप का फ़ंडा कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है, अभी हाल ही में एक परिचित से बात हो रही थी, तो उसने बताया कि उसके साथ काम करने वाली एक लड़की से उसकी बात हो रही थी।
उस लड़की ने बताया कि वह पिछले दो साल से लिव-इन रिलेशन में रह रही है और साथ ही होस्टल का किराया भी भरती है, जब भी लड़की के घरवाले बैंगलोर मिलने को आते हैं, वह होस्टल चली जाती है और उनके वापिस जाते ही वह वापिस उस फ़्लैट में शिफ़्ट हो जाती है। तो उसने पूछा कि शादी क्यों नहीं कर लेते हो जब दो वर्षों से लिव-इन में रह रहे हो, उसका जबाब था कि जब जिंदगी बिना टेन्शन के चल रही है और अभी शादी की जरूरत भी महसूस नहीं हो रही तो शादी क्यों कर ली जाये।
फ़िर उससे पूछा कि खर्चा कैसे करते हो, तो वह बोली कि तुम दोस्त लोग कैसे फ़्लैट शेयर करके रहते हो और खर्चा बांटते हो बस वैसे ही हम अपना खर्चा बांटते हैं, हरेक खर्च में हम दोनों बराबर के हिस्सेदार होते हैं, शादी नहीं होने के बाबजूद शादीशुदा जिंदगी का लुत्फ़ उठाते हैं, घर के हर काम में भागीदारी करते हैं।
लड़का और लड़की दोनों उत्तर भारत के रहने वाले हैं, और दोनों ही संस्कारी परिवार से हैं। परंतु आजकल के खुलेपन में शायद अपनी मर्यादाओं को भुल गये लगते हैं, उनकी सोचने की दिशा बदल गई है।
हम तो यह सोचते हैं कि अगर लिव-इन में रहना जरूरी है तो घर वालों से पर्दा क्यों, जो भी करो खुलेआम करो । किसी से डरने की जरूरत ही क्या है ?

बिस्तर पर कैसे और किसके साथ नींद में होते हैं, नींद को कभी जाना है ?

बिस्तर पर लगभग गिरा ही था और नींद के आगोश में पूरी तरह से खो चुका था, चादर की वह सल वैसी ही रही, जैसी पहले थी, और बस वह सल के साथ बिस्तर पर ढ़ह चुका था। जब नींद आती है तो वह सोने की जगह नहीं देखती। एक समय था जब बिस्तर पर एक भी सल हो मजाल है, परंतु आज इतने वर्षों में जिंदगी के इतने सारे रंग और रास्ते देखने के बाद थकान इतनी बड़ चली है कि उसे उस सल का भी ध्यान नही रहा जिससे उसे हमेशा से चिढ़ रही है।
बचपन में उसने पढ़ा था कि भगवान राम या भरत अब याद नहीं, इतने नाजुक थे कि एक बार बिस्तर पर लंबा सा बाल पड़ा रह गया था तो उनके शरीर पर लाल रंग की रेखा उभर आई थी, खैर उभर तो इसलिये ही आई होगी कि वे भी भरपूर नींद के आगोश में थे। अगर तकलीफ़ होती तो उठकर बाल नहीं हटा देते।
इसलिये मानना है कि नींद जिंदगी का सबसे बड़ा नशा है, किसी के पास कितनी भी दौलत आ जाये परंतु वह बिना नींद के रह नहीं सकता, उसे नींद लेना बहुत जरूरी है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बिस्तर पर तभी जाते हैं जब नींद आ रही होती है और बिस्तर पर लेटते ही नींद के आगोश में खो जाते हैं, हमारे हिसाब से तो वे बहुत ही खुशकिस्मत लोग होते हैं, क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि ऐसे लोग अपना पूरा काम निपटाने के बाद इतमिनान से चिंतन करके पूरी तरह सोने की मानसिक चेतना के साथ जाते हैं।
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो कि बिस्तर पर तो चले जाते हैं क्योंकि सोने का समय हो गया है, परंतु नींद उनकी आँखों से कोसों दूर होती है, तरह तरह के नायाब नुस्खे अपनाते हैं नींद बुलाने के लिये परंतु नींद है कि आने का नाम ही नहीं लेती, हमें ऐसा लगता है कि ऐसे लोग दो प्रकार के हो सकते हैं एक वे जिनके पास कोई काम नहीं होता और थकान नहीं होती और दूसरे वे जिनको आज और कल दोनों की बहुत ज्यादा चिंता रहती है और उसी चिंता में घुले जाते हैं।
कुछ लोग उसके जैसे होते हैं, जो कि काम के बोझ के मारे होते हैं जो मजदूरों की तरह काम करते हैं और घर के लिये निकलने पर पूरी नींद में होते हैं, ये काम को बेहतरीन तरीके से करते हैं, परंतु इनके पास काम इतना होता है कि खुद के लिये सोचने का समय ही नहीं होता बस ये सोचते हैं कि नींद लेकर शरीर को रिचार्ज कर लिया जाये और अगले दिन के लिये ऊर्जा इकठ्ठी कर ली जाये।
अब वह बोल रहा था कि कम से कम बिस्तर की सल तो निकाल कर सोयेगा, नहीं तो उसे रात में २ बजे उठकर वह सल हटाना पड़ती है, मैं सोच रहा था क्या नींद में भी इतना अनुशासन जरूरी है ?

प्रोड़क्टिव मेन अवर्स बर्बाद और आभिजात्य वर्ग की मानसिक मजदूरी

अभी दो दिनों से कार्यालय जा रहे हैं, नहीं तो घर से ही काम कर रहे थे। इन दो दिनों में आना जाना और कई लोगों से मिलना हुआ।

घर से काम करने में यह तो है कि घर पर परिवार को समय ज्यादा दे पाते हैं, परंतु काम करने में थोड़ी बहुत अड़चनें भी आती हैं, खैर हमेशा परिवार के साथ रहते हैं, और आने जाने का लगभग २ घंटे का समय भी बचता है, जो कि कहीं और निवेश कर दिया जाता है।

कल जब बस स्टॉप पर बस पकड़ने के लिये खड़े थे तो ऐसा लगा कि सदियाँ बीत गईं हैं सफ़र किये हुए, और बस का इंतजार और बस के इंतजार में खड़े लोग पता नहीं कितने सारे प्रोड़क्टिव मेन अवर्स बर्बाद हो रहे थे और हम कुछ कर नहीं सकते थे, केवल देख सकते थे। व परिवार को जो समय दिया जा सकता है, वह भी कम्यूटिंग में निकल जाता है।

कोई भाग रहा है कोई दौड़ रहा है, कोई मुस्करा रहा है कोई टेंशन में है, सबकी अपनी अपनी दुविधाएँ हैं तो सबके अपने अपने सुख दुख हैं।

रोजी रोटी जो न कराये वह कम है, एक लड़की अपने मित्र का एस.एम.एस. पढ़ पढ़कर दुखी हो रही है, उसके ब्वॉय फ़्रेंड ने एस.एम.एस. में कहा है कि मैं तुम्हारे लिये बहुत सारा समय निकाल सकता हूँ परंतु मेरी और भी प्रायोरिटीज हैं, प्लीज समझा करो और मुझसे ज्यादा एक्स्पेक्ट मत करो, मैं सोचने लगा कि वाह लड़के भी आजकल इतना साफ़ साफ़ मैसेज भेजने की हिम्मत रखते हैं।

नहीं तो हम तो सोचते थे कि केवल लड़कियाँ ही साफ़ साफ़ बोलती हैं 🙂 खैर जब लिफ़्ट के पास होते हैं तो सबके हाथों में मोबाईल देखते हैं, अधिकतर आई फ़ोन लिये दिखते हैं, तो अपने ऊपर कोफ़्त होती है कि अपन इतने आधुनिक क्यों ना हुए.. और जिनके पास ब्लैक बैरी है तो पता चल जाता है कि कंपनी ने दिया है कि बेटा २४ घंटे खाते पीते उठते जागते चलते फ़िरते काम करते रहो। इससे यह तो समझ में आ गया कि आई फ़ोन वाला वर्ग विलासिता भोगी हो सकता है और ब्लैक बैरी वाला अच्छे कपड़ों में मानसिक मजदूर।

अच्छा है कि अपन अभी इन दोनों वर्गों से दूर हैं, या भाग रहे हैं, पहले जब कंपनी लेपटॉप देती थी तो लगता था कि २४ घंटे मजदूरी के लिये दे रही है, परंतु धीरे धीरे अब समय बदल गया है और अब सबको ही लेपटॉप ही दिया जाता है, अब डेस्क्टॉप का जमाना लद गया।

खैर आभिजात्य वर्ग की मानसिक मजदूरी कितने लोग देख पाते होंगे पता नहीं, जो ब्लैकबैरी और लेपटॉप में उलझा रहता है।

म्यूचल फ़ंड क्या करें, क्या न करें ? (Mutual Funds DOS and DON’TS)

म्यूचयल फ़ंड क्या करें, क्या न करें ?

Grow your investment

एकदम कमाई की उम्मीद न करें। अपने निवेश को बढ़ने के लिये समय दीजिये। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे कि एक पौधा लगाया फ़िर उसकी सिंचाई की और जब तक बड़ा ना हो जाये तब तक इंतजार किया, पौधे को भी पेड़ बनने में समय लगता है, वैसे ही निवेश से कमाई के लिये भी वक्त लगता है। रातों रात कहीं से भी निवेश में कमाई नहीं होती है। साथ ही आपको पर्याप्त अनुमान होना चाहिये कि आपके निवेश कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन अपने फ़ंड स्कीम के एन.ए.वी. को रोज न देखिये, रोज एन.ए.वी. देखने से अच्छा है कि कुछ समय अंतराल में देखा जाये।

अपने निवेश की सारी जानकारी एक डायरी में लिखें जिसमें कि म्यूचयल फ़ंड स्कीम नाम, फ़ोलियो नंबर इत्यादि सब दर्ज करें।

यह भी सुनिश्चित कर लें कि फ़ंड हाऊस के पास आपके सारे संपर्कों की जानकारी होनी चाहिये, जैसे कि पत्राचार का पता, मोबाईल नंबर, ईमेल पता। अगर इनमें से कुछ भी बदलता है तो फ़ंड हाऊस को एकदम सूचना देनी चाहिये।

अपने सारे निवेशों में नामांकन जरूर करें, साथ ही यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि नामिनी को निवेश के बारे में बतायें या ना बतायें।

Mutual Fund Investment म्यूचयल फ़ंड में निवेशक होने से आप अपने निवेश का स्टेटमेंट प्रथम बार निवेश करने के बाद प्राप्त करने के पात्र हैं, और उसके बाद नियमित रूप से कम से कम छ: महीने की अवधि में मिलना चाहिये। अगर आपको कोई स्टेटमेंट नहीं मिला है तो फ़ंड हाऊस के ग्राहक संबंध केन्द्र से थोड़ी पूछताछ करने की चेष्टा करें । आपको स्टेटमेंट आराम से मिल जायेगा।

एक बार फ़ंड हाऊस से मिलने वाले सारे पत्राचार को जरूर देख लें। अगर आपको लगता है कि स्कीम अपने निवेश के मूल रूप से कुछ अलग कर रही है तो अपने वितरक या सलाहकार से विचार विमर्श करके देख लें कि यह बदलाव आपके निवेश के उद्देश्य के अनूकूल है या नहीं। अगर नहीं, तो तुरंत किसी और स्कीम में निवेश करें और जो कि आपके लक्ष्य को पूर्ण करती दिखे और स्कीम बदल लें।

अगर आपके निवेश अपने लक्ष्य प्राप्त कर लें, तो अपने निवेश को निकाल लें, यहाँ तक कि आपको लगे कि आगे आने वाले वर्षों में निवेश काफ़ी अच्छा हो जायेगा तब भी निकाल लें। हमेशा याद रखें कि आप अपने निवेश के प्रति भावुक रहें ना कि अपने स्टॉक और फ़ंड स्कीम के लिये।

झारखंड धनबाद का पहला दलित डॉन बन रहा है या यूँ भी कह सकते हैं कि बन चुका है। (First Dalit Don or Robin Hood – Dhulu Mahato)

झारखंड धनबाद का पहला दलित डॉन बन रहा है या यूँ भी कह सकते हैं कि बन चुका है।
परिचय है – धुलु महतो, उम्र ३५ वर्ष बाघमारा से विधायक हैं । धनबाद के कोयला क्षैत्र के उभरते हुए डॉन हैं। और इनकी कहानी भी किसी फ़िल्मी हीरो से कम नहीं है।
dhulu mahato
 [फ़ोटो द वीक पत्रिका के ऑनलाईन एडीशन से लिया गया है]
धुलु महतो का अपनी कमाई को अपने साथ काम करने वालों के साथ साझा करने के कारण वे बहुत लोकप्रिय हैं, कहा जाता है कि लगभग आधी कमाई वे अपने साथ काम करने वालों में बाँटते हैं, और उनकी रोज की कमाई लगभग २० लाख रुपये बताई जाती है, धुलु महतो इस बात को मानने से इंकार करते हैं, और कहते हैं कि भगवान करे मेरी कमाई और बड़ती जाये और २० लाख हो जाये।
इंटर पास करने के बाद भारत कुकिंग कोल लिमिटेड के सिनिधि कोलिरि में सन १९९४ में मजदूरी से काम करना शुरू किया था और जल्दी ही धुलु महतो मजदूरों के लोकप्रिय नेता बन गये, वे मजदुर जो कि रेल्वे वेगनों और ट्रक में कोयले की खदान से कोयला ढ़ोते थे। सन २००० में राबड़ी सरकार के एक मंत्री समरेश सिंह ने उनका प्रभाव देखा और धुलु महतो को चीता फ़ोर्स का प्रमुख बना दिया। यह एक ऐसा ग्रुप था जो कि समरेश सिंह के लिये कोयला खदान क्षैत्र से “टैक्स” याने कि उगाही का काम करता था। और पुलिस जब भी चीता फ़ोर्स के लोगों को रंगदारी लेने के जुर्म में ले जाती तो धुलु महतो पुलिस पर दबाब बनाकर उनको छुड़ा लाता था।
सन २००५ में बाघमारा से धुलु महतो ने झारखंड वनांचल कांग्रेस से विधायक के लिये चुनाव लड़ा और हार का सामना करना पड़ा परंतु धुलु को मिले वोटों की संख्या जो कि २५,००० थी, से सब चकित थे। सन २००९ में ठीक चुनाव के पहले भूतपूर्व मुखयमंत्री बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा में आ गये और वापस से बाघमारा से चुनाव लड़ा और सरकार में मंत्री रहे और लगातार दो बार के विधायक रहे जलेश्वर महतो को लगभग ३०,००० वोटों से हरा दिया। जलेश्वर महतो का तो यह भी कहना है कि धुलु महतो स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सहयोग से कोयला कंपनी को लूट कर कंगाल कर रहे हैं।
लेकिन लोग धुलु महतो को वहाँ का रॉबिनहुड कहते हैं, जब वे अपनी टोयोटो फ़ोर्चूनर में कहीं जाते हैं तो एक दर्जन से ज्यादा गाड़ीयाँ उनके आसपास रहती हैं। कहा जाता है कि जब उनकी पत्नी सावित्री देवी धनबाद के मेयर का पर्चा दाखिल करने गईं थीं तो लगभग ३०,००० बाईक सवार उनके समर्थन में उनके साथ गये थे, हालांकि सावित्री देवी का नामांकन ३० वर्ष से कम उम्र होने के कारण रद्द कर दिया गया था। पर इससे धुलु महतो के प्रभाव की झलक देखने को मिलती है।
जानकार बताते हैं कि अगर धुलु महतो का प्रभाव इसी तरह बड़ता रहा तो जल्दी ही सुरेश सिंह जो कि अभी धनबाद का डॉन है, का प्रभुत्व खत्म हो सकता है। धनबाद के ५० खदानों में से २५ खदानों पर धुलु महतो का राज चलता है, यह कहना है भाजपा के नेता कुमार अभिषेक का, उनका तो यह भी कहना है कि धुलु महतो ने एक दर्जन एके-४७ और एके-५७ कोलकाता से खरीदी हैं।
एक भा.कु.को.लि. के अधिकारी का कहना है कि हर माह धुलु महतो अपने विधानसभा क्षैत्र से लगभग २०,००० टन कोयला खदानों से फ़्लोर प्राईज पर लेते हैं, और यह लगभग पिछले दो वर्षों से चल रहा है, धुलु हर टन पर १,२०० रुपये बनाते हैं। धुलु महतो की शिकायत कई बार उच्च पुलिस अधिकारियों से की गई परंतु कोई कार्यवाही नहीं की गई, यह कहना है भाजपा सांसद पी.एन.सिंह का।
पुलिस का कहना है कि धुलु महतो बिल्कुल साफ़ हैं उनका कभी भी किसी भी खून, अपहरण या बलात्कार में हाथ नहीं रहा है। धुलु महतो एक ऐसे डॉन हैं या बन रहे हैं जो कि धनबाद के गरीबों के लिये काम कर रहे हैं और उनकी मदद कर रहे हैं। धुलु महतो भी कहते हैं कि मैं कोई अपराधी नहीं हूँ। मैं एक बहुत ही साधारण इंसान हूँ और मेरा धन बनाने वाली गतिविधियों से कोई सारोकार नहीं है, जबकि मेरे विरोधी कहते हैं कि मैं इन सबमें शामिल हूँ। यहाँ तक कि मेरी डॉन बनने की कोई इच्छा भी नहीं है। परंतु हाँ मैं यह कहता हूँ कि मेरी चीता फ़ोर्स उनको जरूर ठीक करेगी जो कि गरीबों को परेशान करते हैं।
सूत्रों के अनुसार धुलु महतो के बढ़ते प्रभाव ने उनके दुश्मनों को भी एक कर दिया है।
धुलु महतो का धनबाद और आसपास के क्षैत्र में प्रभाव बड़ता ही जा रहा है
[यह लेख द वीक में छपे लेख पर आधारित है, जो कि ३१ अक्टूबर को द वीक पत्रिका में छपा है]

इंडियाप्लाजा की अच्छे ऑफ़रों पर घटिया सर्विसेस (Bad services on Great offers by Indiaplaza.com)

लगभग एक सप्ताह होने आया इंडियाप्लाजा से ईमेल पर एक ऑफ़र आया था, और ऑफ़र बहुत अच्छा लगा, मैंने सोचा कि इससे अच्छी डील और कहीं नहीं मिलेगी, तो फ़टाफ़ट ऑनलाईन ऑर्डर कर दिया।

इसके पहले भी कई अन्य साईटों पर ऑनलाईन ऑर्डर कर चुके हैं, तो उसका अनुभव पहले से ही था, उसके मुकाबले इंडियाप्लाजा के साथ खरीदारी का अनुभव बहुत ही खराब रहा।

जैसे ही हमने भुगतान किया एक नया पेज खुला जिस पर ट्रांजेक्शन रिफ़ेरेन्स नंबर दिया गया, यह तो अच्छा हुआ कि हमने उसे पीडीएफ़ बनाकर सहेज लिया, जो कि मैं अधिकतर ऑनलाईन ट्रांजेक्शन करने के बाद करता हूँ, और तब तक सहेज कर रखता हूँ जब तक कि समान मुझे मिल नहीं जाता है। इधर ट्रांजेक्शन पूरा हुआ नहीं कि हमने सोचा कि अब ईमेल से संपूर्ण जानकारी भेज दी गई होगी। परंतु कोई ईमेल इंडियाप्लाजा की तरफ़ से नहीं आया। हमने सोचा शायद थोड़ी देर बाद आयेगा, परंतु ईमेल न आना था और न ही आया ।

दो दिन पहले एक ईमेल इंडियाप्लाजा से ईमेल आया कि शिपिंग में देरी हो रही है और कल शिपिंग होगी, हमने सोचा कि चलो इंडियाप्लाजा वालों ने इतना तो ध्यान रखा कि देरी के लिये ईमेल लिख दिया। खैर अभी तक तो हमें समान नहीं मिला है और न ही कोई अन्य ईमेल देरी के लिये मिला है।

अगर किसी अन्य ऑनलाईन साईट पर ऑर्डर किया होता तो वे बिल के साथ साथ कूरियर का रिफ़रेन्स नंबर भी ईमेल कर देते हैं। जिससे आप कूरियर ऑनलाईन ट्रेक कर सकते हैं।

उम्मीद है कि एक दो दिन में समान मिल जाना चाहिये, आगे टिप्पणी में बताते हैं कि कब समान आता है।

बैंकों के अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी भारतीय रिजर्व बैंक के लिये आसान नहीं होगी (Bank Account Number Portability will not be easy task for RBI)

बैंकों के अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी भारतीय रिजर्व बैंक के लिये आसान नहीं होगी, यह बैंकों के लिये तकनीकी रूप से बहुत बड़ी चुनौती होगा, अभी बैंकें जितने भी सॉफ़्टवेयरों का उपयोग कर रही हैं, उसमें बैंकें अकाऊँट नंबर में अधिकतम अंकों का उपयोग कर रही हैं, और एक और व्यवहारिक समस्या है कि कई बैंकों में एक ही अकाऊँट नंबर अभी पाया जा सकता है।
बैंक पोर्टेबिलिटी
अभी बैंकों के अकाऊँट नंबर यूनिक नहीं हैं, इसलिये यह भारतीय रिजर्व बैंक के लिये बड़ी समस्या होगी, और व्यवहारिक तौर पर उतना आसान भी नहीं है। ऐसा लगता भी नहीं कि इस बैंक अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी का कोई फ़ायदा होने वाला है, क्योंकि अकाऊँट कोई सा भी हो या खाता नंबर कोई सा भी हो, बैंक का नाम तो बदल ही जायेगा।
कुछ और बातें भी हैं, खाताधारक का बैंक बदलने पर IFSC  कोड भी बदल जायेगा, जिससे उसे NEFT & RTGS में समस्या होगी, इसके लिये खाताधारक को सभी जगह बैंकों के नाम भी बदलने होंगे।
बैंकों के अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी बहुत ही मुश्किल साबित होगा भारतीय रिजर्व बैंक के लिये, क्योंकि अभी भारतीय बैंकों में अकाऊँट नंबर में अधिकतम १६ नंबर तक का उपयोग किया जाता है, और उन नंबरों से कैसे भी तकनीकी तौर पर दूसरी बैंकों के साथ मैपिंग करना बहुत मुश्किल है।
भारतीय वित्त बाजार में केवल अकाऊँट नंबर से काम नहीं चलता है, वहाँ बैंक का नाम भी देना जरूरी होता है, और तो और कोर बैंकिंग सुविधा के बावजूद ग्राहक से शाखा की जानकारी ली जाती है, जबकि वह ग्राहक उस शाखा का ग्राहक ना होकर बैंक का ग्राहक है।
मोबाईल नंबर और बैंक अकाऊँट नंबर पोर्टिबिलिटी दोनों ही बहुत अलग चीज हैं, जब से मोबाईल आया है क्या आपको कभी अपने किसी भी फ़ार्म पर यह बताने को कहा जाता है कि मोबाईल कौन सी कंपनी का है और कौन सा सर्विस प्रोवाईडर है, नहीं ना, परंतु बैंकों के लिये ऐसा नहीं है। अगर आप डीमैट खाता भी खुलवाने जायेंगे तो वहाँ फ़ॉर्म पर बैंक का नाम, शाखा, IFSC  कोड और अकाऊँट नंबर सभी जानकारी ली जायेगी।
अब देखते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक क्या निर्णय लेती है, वैसे अगर यह निर्णय आया भी तो फ़िर बैंकिंग क्षैत्र में तकनीकी तौर पर भारी फ़ेरबदल की जरूरत होगी।

क्या ब्लॉग / नेट से पैसे कमाना वाकई आसान है ? (Earning money by Blog / Net is really Simple ?)

    क्या वाकई घर से काम (Work from home) करने के पैसे मिल सकते हैं, कुछ डाटा एन्ट्री (Data Entry) जॉब्स या फ़िर कोई ऐड क्लिक या फ़िर कोई सर्वे। सब माया का मकड़जाल लगता है, और जितना विज्ञापन में सरल दिखाया जाता है उतना सरल होता भी नहीं है।
      अभी कुछ दिन से एक हमारे नॉन-टेकी मित्र पीछे पड़े हैं कि यार इंटरनेट पर तो खजाना है, लोग कितना कमा रहे हैं और तुम हो कि ना तुम कमा रहे हो और ना ही हमें कमाने के गुर सिखा रहे हैं। हमने तो मजाक में कह भी दिया “भई अगर तुमको खजाना नजर आता है तो तुम लूट लो, देखो हमें तो यह पता है कि हाँ कमा सकते हैं, परंतु कैसे ? यह नहीं पता” । और जो कोई कमा भी रहा है तो वो कैसे और कितना कमा रहा है नहीं बताता । अपने यहाँ भारतियों में एक पेटदर्द की बीमारी है कि अगर उसकी कमाई पर कोई अंतर ना भी पड़ रहा हो तो भी वह बतायेगा नहीं कि कैसे कमाई की जा रही है, बिल्कुल वैसे ही ये नेट की कमाई का चक्कर है। वैसे यह सेवा बहुत से लोग मोटी सी फ़ीस लेकर भी करते हैं, परंतु उनके साथ भी यही है कि फ़ीस तो ले ही लेते हैं और काम भी अच्छा नहीं करते हैं, अरे भई अगर उन्हें भी पैसा कमाना आता नेट से तो वे ये काम ही क्यूँ करते, अपनी साईट बनाकर ही नहीं कमाते।
    इतना कहने के बावजूद भी वे हमारे पीछे पड़े हैं, बताओ भई कहाँ से कैसे कमाया जाता है, लोग विज्ञापन लगाकर हजारों डॉलर कमा रहे हैं, हमने भी कहा भई अगर हमें पता होता तो तुमको जरूर बता देते।
    फ़िर कुछ दिनों बाद गूगल पर माथापच्ची करके आये और बोले कि ये देखो भारत के टॉप १० ब्लॉगर जो कि हजारों डॉलर कमा रहे हैं, ये देखिये Top 10 Indian blogger, highest earning bloggers । अब हम क्या बतायें कि भले ही आईटी में हैं परंतु इस तकनीक से अंजान हैं । और उस भले मानस को समझाया कि अपने भारतीय अगर कुछ करते हैं तो किसी से साझा नहीं करते। खुद पानी पीने के लिये खुद ही कुआँ खोदना पड़ता है, अब हम पढ़ते हैं और फ़िर बताते हैं कि कैसे कमाई की जा सकती है।
    मित्रों अगर कोई अपने ब्लॉग से कमा रहे हों और अगर बताना चाहते हों तो बतायें, शायद हम अपने मित्र की मुश्किल दूर कर सकें। उनके लिये समस्या है कि अंग्रेजी में हाथ कमजोर है और इस बाबत हिन्दी में बहुत ही कम लेख (content) हैं, जिससे कि कोई नॉन-टेकी व्यक्ति सीख सके। इंतजार है… किसी के जबाब का, नहीं तो हम तो पढ़ ही रहे हैं, अब मित्र है उसके लिये तो भई सब करना पड़ेगा।