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अच्छी कंपनी पहचानते कैसे हैं?

शेयर बाज़ार पर ज्ञान की बकवास — भाग 3

अच्छी कंपनी पहचानते कैसे हैं?

शाम का समय था। बाहर हल्की हवा चल रही थी। पड़ोस में कहीं प्रेशर कुकर की सीटी बज रही थी और ड्राइंग रूम में टीवी पर कोई एक्सपर्ट बहुत तेज़ आवाज़ में चिल्ला रहा था — “ये स्टॉक अगले तीन महीने में डबल हो सकता है!”
बेटेलाल पूरे ध्यान से टीवी देख रहे थे। फिर अचानक बोले —
“डैडी… ये लोग हर दूसरे शेयर को मल्टीबैगर क्यों बोलते हैं?”

मैंने आईपैड को नीचे रखा और मुस्कुराया।
“क्योंकि टीवी पर सपना बेचना आसान है बेटेलाल… लेकिन असली निवेश करना मुश्किल।”

बेटेलाल थोड़ा और पास खिसक आये।

और बोले – “तो फिर अच्छी कंपनी पहचानते कैसे हैं?”

मैंने अपनी ब्लैक कॉफी उठाई और कहा —
“देखो, शेयर खरीदने से पहले सबसे बड़ी गलती लोग ये करते हैं कि वो सिर्फ शेयर देखते हैं… कंपनी नहीं।”

“मतलब?”

“मतलब अगर किसी दुकान के बाहर बहुत भीड़ लगी हो, तो क्या सिर्फ भीड़ देखकर तुम दुकान खरीद लोगे?”

“नहीं।”

“तो फिर लोग सिर्फ भागते हुए शेयर देखकर पैसा क्यों लगा देते हैं?”

बेटेलाल हल्का सा हँसे और बोले — “क्योंकि सबको जल्दी अमीर बनना है।”

मैंने कहा — “और शेयर बाज़ार जल्दी अमीर बनने वालों को सबसे जल्दी सबक सिखाता है।”

कुछ पल कमरे में खामोशी रही। घर के बाहर चिल्ड्रन पार्क से बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी।

मैंने धीरे से कहा —
“अच्छी कंपनी पहचानने का पहला तरीका है — समझो कि कंपनी करती क्या है।”

बेटेलाल तुरंत बोले — “हैं जी?”

मैं हँस पड़ा।

“हाँ जी। अगर तुम्हें कंपनी का बिज़नेस ही समझ नहीं आता, तो सिर्फ किसी यूट्यूबर के भरोसे पैसा लगाना खतरनाक है।”

मैंने टेबल पर रखे मखाने के बिस्किट का डिब्बा उठाया।

“मान लो कोई कंपनी बिस्किट बनाती है। अब सोचो — क्या लोग रोज़ बिस्किट खाते हैं?”

“हाँ।”
“क्या आने वाले दस साल में भी खाएँगे?”
“हाँ।”
“बस। इसका मतलब बिज़नेस समझने में आसान है।”

फिर मैंने कहा —
“लेकिन अगर कोई कंपनी ऐसा काम कर रही हो जिसका नाम समझने में ही पाँच मिनट लग जाएँ, तो पहले सीखो… फिर निवेश करो।”

बेटेलाल अब ध्यान से सुन रहे थे।

“डैडी, लोग हमेशा कहते हैं कि कंपनी के ‘फंडामेंटल’ अच्छे होने चाहिए। ये फंडामेंटल क्या होता है?”

मैंने कहा —
“फंडामेंटल मतलब कंपनी की असली सेहत।”

“जैसे?”

“जैसे डॉक्टर पहले आदमी की रिपोर्ट देखता है — ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट… वैसे ही निवेशक कंपनी की रिपोर्ट देखते हैं।”

“और उसमें क्या देखते हैं?” बेटेलाल ने पूछा

मैंने उंगलियों पर गिनाना शुरू किया —
“कंपनी लगातार पैसा कमा रही है या नहीं… उस पर बहुत कर्ज़ तो नहीं… उसकी बिक्री बढ़ रही है या नहीं… और सबसे जरूरी — कंपनी का मालिक/प्रमोटर ईमानदार है या नहीं।”

बेटेलाल बोले — “मतलब मालिक या प्रमोटर को भी देखना पड़ता है?”

मैंने तुरंत कहा —
“सबसे ज्यादा वही देखना पड़ता है।”

मैंने कहा – याद है एक मेरे मित्र जो कहते हैं कि फलां कंपनी का प्रमोटर चोर है, इसमें पैसा मत लगाना, तो उनका कहने का मतलब यही होता है कि वे ईमानदार नहीं हैं।

टीवी पर अचानक किसी घोटाले की खबर फ्लैश हुई।

मैंने स्क्रीन की तरफ इशारा किया —
“देखो, खराब बिज़नेस से ज्यादा नुकसान खराब मालिक करवाता है।”

बेटेलाल कुछ सेकंड तक चुप रहे।

फिर बोले —
“लेकिन डैडी, छोटे निवेशक को कैसे पता चलेगा कि मालिक अच्छा है या नहीं?”

मैंने कहा —
“बहुत आसान तरीका है। देखो कि कंपनी सालों से क्या कर रही है, और आज क्या बोल रही है।”

“मतलब?”

“अगर कोई कंपनी हर साल बड़े-बड़े वादे करे लेकिन नतीजे कमजोर हों, तो सावधान रहो।”

फिर मैंने हँसते हुए कहा —
“आजकल कुछ कंपनियाँ बिज़नेस कम करती हैं… प्रेजेंटेशन ज्यादा बनाती हैं।”

बेटेलाल हँस पड़े।

मैंने आगे कहा —
“याद रखना बेटेलाल, शेयर बाज़ार में कहानी बेचना आसान है… लेकिन लगातार मुनाफा कमाना मुश्किल।”

बाहर अब हल्का अंधेरा होने लगा था। घरवाली रसोई से आवाज़ लगा रही थी —
“कॉफी फिर से गरम करनी पड़ेगी क्या?”
मैंने जवाब दिया — “बस दो मिनट!”

फिर मैं बेटेलाल की तरफ मुड़ा।
“एक और जरूरी चीज़ समझो।”

“क्या?”

“अच्छी कंपनी का शेयर हमेशा सस्ता नहीं होता।”

बेटेलाल तुरंत बोले — “हैं जी?”
मैंने कहा —
“लोग सोचते हैं 20 रुपये वाला शेयर सस्ता है और 3000 वाला महँगा। जबकि सच इसका उल्टा भी हो सकता है।”

“कैसे?”

मैंने कहा —
“अगर 20 रुपये वाली कंपनी खराब है, कर्ज़ में डूबी है और बिज़नेस खत्म हो रहा है… तो वो महँगी है, चाहे भाव छोटा हो।”

“और 3000 वाला?”

“अगर कंपनी शानदार है, लगातार बढ़ रही है और भविष्य मजबूत है… तो वो सस्ती हो सकती है, चाहे कीमत बड़ी लगे।”

बेटेलाल अब धीरे-धीरे असली बात समझने लगे थे।

उन्होंने पूछा —
“तो डैडी, क्या सिर्फ सस्ता शेयर देखकर खरीदना गलत है?”

मैंने मुस्कुराकर कहा —
“बिल्कुल। शेयर बाज़ार में ‘सस्ता’ और ‘महँगा’ सिर्फ भाव से तय नहीं होता… गुणवत्ता से तय होता है।”

कमरे में अब हल्की पीली रोशनी जल चुकी थी। टीवी अब म्यूट पर चल रहा था लेकिन नीचे लाल-हरी लाइनें लगातार भाग रही थीं।

मैंने धीरे से कहा —
“याद रखना बेटेलाल… अच्छा निवेश वही है जहाँ तुम्हें रात में नींद भी अच्छी आये।”

वो कुछ देर तक चुप बैठे रहे। फिर बोले —
“डैडी, अगली बार क्या सीखेंगे?”

मैंने मुस्कुराकर कहा —
“अगले भाग में समझेंगे — लोग नुकसान में शेयर क्यों बेच देते हैं और मुनाफे वाले शेयर जल्दी क्यों बेच देते हैं।”

क्रमशः…

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ये शेयर ऊपर-नीचे आखिर होता क्यों है?

शेयर बाज़ार पर ज्ञान की बकवास — भाग 2

“ये शेयर ऊपर-नीचे आखिर होता क्यों है?”

सुबह का समय था। बाहर हल्की धूप निकल चुकी थी। ड्राइंग रूम में टीवी म्यूट पर चल रहा था और नीचे स्क्रीन पर लाल अक्षरों में लिखा आ रहा था — “मार्केट में भारी गिरावट”

बेटेलाल सामने लैपटॉप खोले बैठा था। चेहरे पर वही चिंता थी जो बोर्ड परीक्षा के रिज़ल्ट वाले दिन बच्चों के चेहरे पर होती है।

“डैडी…” उसने धीरे से कहा, “कल जो शेयर मैंने खरीदा था, आज नीचे क्यों चला गया?

मैंने चाय का कप उठाया और मुस्कुराया।

“बस? इतनी सी बात से डर गये?”

“इतनी सी बात?” बेटेलाल लगभग चौंक पड़े।
“सुबह उठते ही पाँच हज़ार का लॉस दिखा रहा है अकाउंट में!”

मैं हल्का सा हँसा।

“यही तो शेयर बाज़ार है बेटेलाल। यहाँ आदमी पहले पैसा नहीं खोता… पहले उसकी नींद जाती है।”

कुछ पल के लिए कमरे में हल्की खामोशी रही। बाहर से पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही थी, जिससे मन हमेशा ही प्रफुल्लित रहता है।

मैंने कहा,
“देखो, सबसे पहले ये समझो कि शेयर की कीमत ऊपर-नीचे क्यों होती है। इसका सीधा जवाब है — मांग और आपूर्ति।” 

बेटेलाल थोड़ा आगे झुक गये और बोले “हैं जी!”

मैंने समझाना शुरू किया और कहा “हाँ जी!”

“मान लो मोहल्ले में अचानक सबको आम पसंद आने लगे। लेकिन आम सीमित याने लिमिटेड हैं। अब लोग ज्यादा खरीदेंगे तो आम की कीमत बढ़ेगी या घटेगी?”

“बढ़ेगी,” बेटेलाल ने तुरंत कहा।

“बस यही शेयर बाज़ार है।”

मैंने आगे कहा,
“अगर लोगों को लगता है कि कोई कंपनी भविष्य में अच्छा करेगी, तो लोग उसके शेयर खरीदने लगते हैं। खरीदने वाले ज्यादा हुए तो शेयर ऊपर जाएगा। अगर डर फैल गया कि कंपनी का भविष्य खराब है, तो लोग बेचने लगेंगे। बेचने वाले ज्यादा हुए तो शेयर नीचे आएगा।”

बेटेलाल ध्यान से सुन रहे थे।

“लेकिन डैडी,” उसने पूछा, “लोग अचानक डरते क्यों हैं?”

मैंने टीवी की तरफ इशारा किया।

“क्योंकि बाजार सिर्फ नंबर नहीं देखता। बाजार खबरें भी देखता है… राजनीति भी… युद्ध भी… बारिश भी… और कभी-कभी तो सिर्फ अफवाह भी।”

“मतलब?”

“मतलब अगर किसी बड़ी कंपनी का मालिक अचानक इस्तीफा दे दे, तो लोग डर सकते हैं। अगर सरकार कोई नया नियम ले आए, तो भी बाजार हिल सकता है। अगर दुनिया में कहीं युद्ध हो जाए, तब भी शेयर नीचे आने लगते हैं।”

बेटेलाल थोड़ा सोच में पड़ गये, और बोले बहुत सारे फैक्टर्स को मार्केट कंसीडर करता है।

मैंने कहा,
“शेयर बाज़ार दुनिया का सबसे बड़ा डर और उम्मीद मापने वाला थर्मामीटर है।”

तभी बिजली हल्की सी गई और इन्वर्टर की बीप सुनाई दी।

मैंने हँसते हुए कहा,
“देखा? अभी अगर बिजली दो घंटे चली जाए तो तुम्हारा मूड खराब हो जाएगा। ठीक वैसे ही बाजार का मूड भी बदलता रहता है।”

बेटेलाल अब मुस्कुराने लगे और पूछा,
“डैडी, ये लोग ‘बुल मार्केट’ और ‘बियर मार्केट’ क्यों बोलते हैं?”

मैंने कहा,
“अच्छा, कभी बैल को हमला करते देखा है?”

बेटेलाल बोले – “हाँ।”

मैंने कहा – “वह अपने सींग नीचे से ऊपर मारता है। इसलिए जब बाजार ऊपर जाता है तो उसे बुल मार्केट कहते हैं।”

बेटेलाल ने आगे पूछा – “और बीयर?”

मैंने कहा – “भालू अपने पंजे ऊपर से नीचे मारता है। इसलिए जब बाजार गिरता है तो उसे बीयर मार्केट कहते हैं।”

बेटेलाल अचानक हँस पड़े और बोले –  “मतलब पूरा बाजार जानवरों पर चल रहा है?”

फिर बोले ये बीयर और बुल लोगों को क्यों बोलते हैं।

मैंने कहा – जो बाजार की आने वाली गिरावट को पहचानता है तो वह ऊपर भाव से शेयर बेचना शुरू कर देता है, यह कहलाते हैं बीयर याने कि मंदेड़िए।

और जो बाजार की ऊपर जाने वाली चाल समझते हैं, तो वे शेयर खरीदकर मार्केट को ऊपर ले जाते हैं, याने कि डिमांड बनाते हैं, जिससे शेयर के भाव बढ़ते हैं, ये कहलाते हैं बुल याने कि तेजड़िये।

मैं भी हँस पड़ा।

“कभी-कभी तो इंसानों से ज्यादा समझदार वही लगते हैं।”

बाहर अब धूप और तेज हो चुकी थी। मैंने कहा, “जरा पर्दा खींच दो, स्क्रीन पर चमक पड़ रही है।”

बेटेलाल पर्दा खींचते हुए बोले,
“तो डैडी, क्या हर गिरता शेयर खराब होता है?”

मैंने तुरंत कहा,
“नहीं। यही सबसे बड़ी गलती लोग करते हैं।”

मैंने टेबल पर रखा थर्मस उठाई।

“अगर कल यही बोतल 1000 रुपये की थी और आज 700 में मिल रही है, तो क्या बोतल खराब हो गई?”

बेटेलाल बोले –

“नहीं।”

“तो फिर अच्छी कंपनी का शेयर नीचे आने पर लोग घबराते क्यों हैं?”

बेटेलाल अब खुद ही जवाब समझने लगे थे।

मैंने कहा,
“क्योंकि बाजार में लोग कीमत देखते हैं, मूल्य नहीं।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

दूर कहीं किसी घर से आरती की आवाज़ आने लगी थी।

मैंने धीरे से कहा,
“याद रखना बेटेलाल, बाजार रोज़ तय करता है कि शेयर की कीमत क्या है… लेकिन समय तय करता है कि उसकी असली कीमत क्या थी।”

वह कुछ सेकंड तक चुप बैठा रहा।

फिर बोला,
“तो डैडी, क्या मुझे रोज़ अपना पोर्टफोलियो नहीं देखना चाहिए?”

मैं हँस पड़ा।

“अगर तुमने खेत में बीज बोया है, तो क्या हर घंटे मिट्टी खोदकर देखोगे कि पौधा निकला या नहीं?”

बेटेलाल बोले – “नहीं।”

मैंने कहा – “बस वही निवेश है।”

फिर मैंने थोड़ा गंभीर होकर कहा,

“आजकल मोबाइल ऐप्स ने निवेश आसान कर दिया है। लेकिन एक नई बीमारी भी दे दी है — हर पाँच मिनट में पोर्टफोलियो देखने की बीमारी।”

बेटेलाल हँसते हुए बोले,
“वो तो मुझे भी हो गई है।”

“ज्यादातर नए निवेशकों को होती है,” मैंने कहा।
“लेकिन याद रखो — बाजार का शोर जितना ज्यादा सुनोगे, निर्णय उतने खराब होते जाएंगे।”

अब कमरे में हल्की शांति थी।

टीवी पर एंकर अभी भी तेजी से कुछ बोल रहा था, लेकिन आवाज़ म्यूट थी।

मैंने कहा,
“कभी-कभी शेयर बाज़ार हमें कंपनी से ज्यादा खुद के बारे में सिखाता है। हमें पता चलता है कि हम कितने लालची हैं… कितने डरपोक हैं… और कितने अधीर हैं।”

बेटेलाल अब शायद पहली बार शेयर बाज़ार को सिर्फ पैसे की जगह मानवीय व्यवहार की तरह समझ रहे था।

उसने आखिर में पूछा,
“डैडी, तो अगली बार क्या सीखेंगे?”

मैंने मुस्कुराकर कहा,

“अगले भाग में हम समझेंगे — लोग शेयर चुनते कैसे हैं, और आखिर ‘अच्छी कंपनी’ पहचानने का पहला तरीका क्या होता है।”

क्रमशः…

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शेयर बाज़ार आखिर है क्या?

शेयर बाज़ार पर ज्ञान की बकवास — भाग 1

“शेयर बाज़ार आखिर है क्या?”

सुबह का समय था। ड्राइंग रूम में खिड़की से हल्की हवा आ रही थी। चाय की भाप ऊपर उठ रही थी और सामने बेटेलाल मॉनिटर में लाल-हरी लाइनें देखकर परेशान हो रहा था।

“डैडी,” उसने अचानक पूछा, “ये शेयर बाज़ार आखिर है क्या? लोग कहते हैं यहाँ पैसा बनता भी है और डूबता भी है। सच क्या है?”

मैं मुस्कुराया। “बेटेलाल, शेयर बाज़ार अपने आप में कोई जादू नहीं है। यह बस दुनिया का सबसे बड़ा भरोसे का बाज़ार है।”

“भरोसे का बाज़ार?” बेटेलाल ने आश्चर्य से पूछा।

“हाँ,” मैंने कहा, “मान लो तुम्हारे मोहल्ले में एक आदमी मिठाई की दुकान खोलता है। दुकान अच्छी चलती है, लेकिन उसे बड़ा कारखाना बनाना है। उसके पास पूरे पैसे नहीं हैं। अब वह क्या करेगा?”

बेटेलाल बोले – “कर्ज़ लेगा?”

मैंने कहा – “वह एक रास्ता है। लेकिन दूसरा रास्ता यह है कि वह लोगों से कहे — ‘आप मेरे व्यापार में थोड़ा पैसा लगाओ और बदले में इस दुकान में आपका हिस्सा होगा।’ यही हिस्सा शेयर कहलाता है।”

बेटेलाल अब थोड़ा समझने लगे।

मैंने आगे कहा, “जब कोई कंपनी अपने छोटे-छोटे हिस्से लोगों को बेचती है, तो वही शेयर बाज़ार में ट्रेड होते हैं। यानी जिसने शेयर खरीदा, वह उस कंपनी के छोटे से हिस्से का मालिक बन गया।”

“तो क्या मैं भी बड़ी कंपनियों का मालिक बन सकता हूँ?” बेटेलाल ने उत्साह से पूछा।

“बिल्कुल,” मैंने कहा, “अगर तुम किसी कंपनी का एक शेयर भी खरीदते हो, तो तकनीकी रूप से तुम उसके हिस्सेदार हो।”

बेटेलाल ने तुरंत मोबाइल उठाया। “तो लोग फिर डरते क्यों हैं?”

मैंने चाय का कप नीचे रखते हुए कहा, “क्योंकि लोग शेयर नहीं खरीदते… लोग सपने खरीदते हैं। और सपनों की कीमत रोज़ बदलती है।”

कुछ पल के लिए बेटेलाल शांत हो गये।

मैंने आगे समझाया — “देखो, बाज़ार में हर दिन लाखों लोग अपनी उम्मीद और डर लेकर आते हैं। अगर लोगों को लगता है कि कंपनी भविष्य में अच्छा करेगी, तो उसके शेयर ऊपर जाते हैं। अगर डर लगता है कि नुकसान होगा, तो शेयर नीचे आने लगते हैं।”

“यानी यह सिर्फ गणित नहीं, निवेशकों के इमोशन भी हैं?”

“बिल्कुल,” मैंने कहा, “शेयर बाज़ार आधा अर्थशास्त्र है और आधा मनोविज्ञान।”

बाहर अब धूप और तेज हो चुकी थी। हमने कहा पंखा थोड़ा तेज कर लो।

बेटेलाल ने पूछा, “लेकिन डैडी, टीवी वाले हर समय ‘मार्केट क्रैश’, ‘रिकॉर्ड हाई’, ‘बुल रन’ क्यों बोलते रहते हैं?”

मैं हँस पड़ा। “क्योंकि डर और लालच सबसे ज्यादा बिकते हैं। समाचार चैनलों को पता है कि आदमी सनसनी देखता है, उसे कुछ शांत तरीके से बताया जायेगा तो उसे वह मजा नहीं आयेगा, जो मजा सनसनी देखने, सुनने में आता है।”

फिर बेटेलाल बोले “तो डैडी, क्या शेयर बाज़ार जुआ है?”

मैंने गंभीर होकर कहा, “नहीं! जुआ वह है जहाँ परिणाम का कोई आधार नहीं होता। लेकिन शेयर बाज़ार में कंपनी का व्यापार, मुनाफा, भविष्य, तकनीक, प्रबंधन — सब कुछ मायने रखता है।”

बेटेलाल हतप्रभ होते हुए, फिर आगे पूछने लगे “फिर लोग नुकसान क्यों करते हैं?”

मैने गर्दन सामने मॉनिटर की और देखते हुए कहा “क्योंकि वे बिना समझे भीड़ के पीछे भागते हैं।”

मैंने बाहर लगे आम के पेड़ की ओर इशारा किया।
“देखो उस पेड़ को। अगर कोई आदमी रोज़ उसकी जड़ खोदकर देखे कि फल आया या नहीं, तो पेड़ मर जाएगा। निवेश भी ऐसा ही है। अच्छे निवेश को समय चाहिए।”
बेटेलाल बहुत ध्यान से सुन रहे था।

मैंने कहा, “दुनिया के बड़े निवेशक शेयर को सिर्फ नंबर नहीं मानते। वे उसे व्यापार समझते हैं। अगर तुम किसी कंपनी का शेयर खरीद रहे हो, तो खुद से पूछो — क्या मैं इस कंपनी का छोटे हिस्से का मालिक बनना चाहता हूँ?”

“लेकिन डैडी,” उसने पूछा, “इतनी सारी कंपनियों में सही कंपनी पहचानें कैसे?”

मैं मुस्कुराया। “यही तो सीखने की यात्रा है। शेयर बाज़ार पैसे से पहले धैर्य सिखाता है।”

फिर मैंने बेटेलाल को एक बहुत ही सरल सा उदाहरण दिया।
“मान लो दो दुकानदार हैं। पहला रोज़ जोर-जोर से चिल्लाता है कि उसकी दुकान सबसे अच्छी है। दूसरा चुपचाप ही अपनी दुकान चला रहा है, लेकिन हर साल उसका व्यापार बढ़ रहा है। समझदार निवेशक किसे चुनेगा?”

“दूसरे को,” बेटेलाल ने तुरंत कहा।

“बस यही शेयर बाज़ार का पहला सिद्धांत है। शोर नहीं, गुणवत्ता यानी क्वालिटी देखो।”

मैंने आगे कहा, “भारत में करोड़ों लोग अब शेयर बाज़ार में आ रहे हैं। मोबाइल ऐप्स ने निवेश आसान बना दिया है। लेकिन आसान चीज़ें अक्सर खतरनाक भी होती हैं। क्योंकि अब लोग ज्ञान से ज्यादा ‘टिप्स’ पर भरोसा करने लगे हैं।”

“यानी व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी?” बेटेलाल हँस पड़े।

“बिल्कुल,” मैंने भी हँसते हुए कहा, “आजकल हर दूसरा आदमी खुद को मार्केट गुरु समझता है।”

फिर मैं थोड़ा गंभीर हुआ।
“याद रखना बेटेलाल, शेयर बाज़ार में सबसे बड़ा हथियार जानकारी नहीं, अनुशासन है। यहाँ कई लोग तेज़ी से पैसा कमाते हैं, लेकिन टिकते वही हैं जो अपने लालच पर नियंत्रण रखते हैं।”

बेटेलाल ने धीरे से पूछा, “तो क्या एक आम आदमी भी अमीर बन सकता है?”

मैंने शांत स्वर में कहा, “हाँ। लेकिन रातों-रात नहीं। शेयर बाज़ार खेत की तरह है, कैसीनो की तरह नहीं। यहाँ बीज बोना पड़ता है, इंतज़ार करना पड़ता है, और हर मौसम की मार भी झेलना पड़ती है।”

कुछ देर दोनों मौन रहे।
दूर कहीं से मंदिर की घंटी सुनाई दी और शंख के आवाज भी आई।

बेटेलाल ने आखिर में पूछा, “डैडी, तो अगली बार क्या सीखेंगे?”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “अगले भाग में हम समझेंगे — शेयर की कीमत ऊपर-नीचे क्यों होती है, और आखिर ये ‘बुल’ और ‘बीयर’ कौन होते हैं जिनसे पूरा बाजार डरता है।”

क्रमशः…

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