जब हाईवे पर एक सफेद वर्दी वाले ने हमें हाथ दिया

कल बैंगलोर में यातायात के सफेद वर्दीधारी कुछ ज्यादा ही मुस्तैद नजर आ रहे थे, पहले लगा कि कोई बड़ा अफसर या मंत्री आ रहा होगा। परंतु हर जगह दोपहिया वाहनों और टैक्सी वालों को रोककर उगाही करते देख समझ आ गया कि इनको दिसंबर का टार्गेट पूरा करना होगा, नोटबंदी के चलते इनको नवंबर में भारी नुक्सान हुआ है। भले ही चालान क्रेडिट कार्ड या ऑनलाईन भरने की सुविधा हो, परंतु हर चालान तो एक नंबर में न ये काटेंगे और न ही पकड़ाये जाने वाला कटवायेगा। जब 500 या 1000 की जगह 100 या 200 में ही काम चल जायेगा तो कौन इतनी माथापच्ची करेगा। आजकल तो हालत यह है कि इनके पास भी जो क्रेडिट कार्ड मशीन होती है, उसकी भी टांय टांय फिस्स हुई होती है, या तो नेटवर्क फैलियर का मैसेज आता है या फिर सर्वर लोड का मैसेज या टाईम आऊट। Continue reading…

 

हानिकारक बापू

हानिकारक बापू – यह गाना है आमिर खान की फिल्म दंगल का, जबसे हमारे बेटेलाल ने यह गाना सुना है, तब से वे इसे कई बार सुन चुके हैं और लगभग याद ही कर लिया है। अब आलम यह है कि जब भी हम या घरवाली कुछ कहने को होते हैं तो बस इस गाने को गाना शुरू कर देते हैं। हमें भी उत्सुकता हुई कि आखिर यह गाना बना ही क्यों ?

फिल्म की कहानी और ट्रेलर से इतना पता चला कि मुख्य अभिनेता आमिर खान जो कि एक पहलवान की भूमिका में हैं और घर में बेटे होने का इंतजार कर रहे होते हैं, परंतु उनके घर में केवल लड़कियाँ ही पैदा हो रही होती हैं, और ये स्वर्ण पदक जीतने में नाकामयाब रहे तो अपना यह सपना अपने बेटे से पूरा करवाना चाहते हैं। पर एक दिन उनकी दो लड़कियों नें दो गाँव के छोरों को धो दिया तो पहलवान पिता ने सोचा कि पदक तो बेटी भी ला सके है और बस पहलवान पिता दोनों बेटियों के पीछे लग गया कि अब तो ये छोरियाँ ही स्वर्ण पदक लायेंगी। Continue reading…

 

पैसे सरकार नहीं बैंक दे रही है

आज बैंक गया पैसे निकालने के लिये लगभग 2 बजे, जब बैंक पहुँचा तो उम्मीद के मुताबिक भीड़ नहीं थी, सोचा कि या तो समस्या खत्म हो गई है या फिर बैंक के पास पैसा खत्म हो गया है। खैर गार्ड से पूछा – भई, पैसा निकल रहा है न। उसने हमको ऐसे देखा कि जैसे हमने कोई एलियन सा सवाल पूछ लिया हो, हमें लगा कि उसे हमारा प्रश्न समझ नहीं आया, हमने इस बार अंग्रेजी में पूछा, कि शायद हिन्दी न आती हो। तो हमें कहा कि सारे टोकन बँट चुके हैं, अब पैसा कल मिलेगा। Continue reading…

 

जबरदस्त किताब का नाम है “दिल्ली दरबार”

बहुत दिनों बाद कोई जबरदस्त किताब पढ़ने के मिली और उस जबरदस्त किताब का नाम है “दिल्ली दरबार” (Dilli Darbaar) लेखक हैं सत्य व्यास। जब कोई किताब अमूमन हम पढ़ते हैं तो हमारी घरवाली और बेटेलाल हमारे पास आकर बैठ जाते हैं और हमें उनको सुनानी पड़ती है। हमें पता नहीं कि ऐसा क्यों करते हैं ये लोग, लगता है कि पढ़ने में आलस करते हैं, जब हम कहते हैं कि तुम लोग पढ़ने लिखने के आसली, तो हमें कहते हैं मक्खन लगाते हुए कि नहीं वो आप पढ़ते अच्छा हो। खैर हम पहले दिन 60-61 पन्ने पढ़ के सुना दिये। Continue reading…

 

#BergerXP IndiBlogger Meet बर्जर पैंट्स की नयी इन्नोवेटिव तकनीक

बर्जर पैंट #BergerXP मैंने इसका नाम बरसों पहले सुना था, शायद 25 वर्ष पहले, और तब से ही हमारे घर में हम बर्जर पैंट का ही इस्तेमाल करते हैं। करीबन 15 वर्ष पहले घर की मरम्मत करवाई गई थी, उसके बाद हमने अपने पैंटर को कहा कि अब इतना अच्छा काम करवाया है, अब अच्छा सा पैंट कर दो कि घर अच्छा लगे। उन्होंने ही हमें सुझाया कि बर्जर पैंट्स का सिल्क पैंट का उपयोग करो, अभी अभी ही बाजार में आया है और बहुत ही अच्छा है। एक बार कर लो और फिर जब भी दीवाल गंदी लगे, धो लो। तबसे हमारे यहाँ घर में हमेशा ही जब भी पैंट होता है, हम बर्जर पैंट्स के सिल्क पैंट का ही उपयोग करते हैं।

bergerxp badge

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इस बार की बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट #BergerXP IndiBlogger Meet में शामिल होने का मौका मिला। ब्लॉगर मीट का आयोजन ललित अशोक होटल में किया गया, और जब मीट में पहुँचे तो कई ब्लॉगर पहले से ही पहुँच चुके थे। कई ब्लॉगर्स से पहली बार ही मिलना हुआ और कई ब्लॉगर्स से पहले भी मिलना हो चुका था। कल फरीदा रिजवान से सबसे पहले मिला वे 21 वर्ष से स्तन कैंसर के स्टैज 3 कैंसर की सर्वाइवर हैं और उनका फोटो मैंने रेसीडेंसी रोड पर एक सिग्नल पर लगा हुआ देखा था, तो उन्हें बधाई भी दी।

इसके बाद बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट की वॉल पर फोटो भी खींचे गये और 251 लाईक वाली एक इन्सटॉग्राम की फ्रेम भी बहुत घूम रही थी। बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट की शुरूआत लजीज खाने से हुई, और फिर सैशन शुरू होने के पहले ही हॉल में एक गुब्बारा और एक धागा दे दिया गया। बैठने के बाद सबसे पहले कहा गया कि अब खड़े हो जाओ और फिर शुरू हुआ एक वार्मअप सैशन जिससे कि ब्लॉगर्स सो न जायें और फिर गुब्बारे को फुलाकर धागे से बाँधने को कहा गया। असली खेल तो अब बताया कि सब लोग अपने गुब्बारे के धागे को अपने पैरों में बाँध लें और फिर एक दूसरे के गुब्बारे को फोड़ें, अगर आपका गुब्बारा फूट गया है तो आप नहीं फोड़ सकते और जिसने अपना गुब्बारा सबसे आखिरी तक बचा लिया, वह विजेता। खैर हम गुब्बारे को ज्यादा देर तक नहीं बचा पाये।

बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट में सबसे अच्छी बात यह लगी कि बिना स्लाईड के ही कंपनी की एवं पैंटिंग इंडस्ट्री की सारी जानकारी बहुत ही आसान शब्दों में दे दी गई। बताया गया कि पैंट करने के पहले क्या क्या करना होता है और इसके लिये बर्जर पैंट्स ने बहुत सी मशीनों को हमारी सुविधा के लिये बाजार में उतारा है। हमें तो सबसे अच्छी मशीन लगी घिसाई करने वाली, इससे घिसाई के बाद जो कण उड़ते हैं और पूरे सामान को गंदा करते हैं और साथ ही हमारे शरीर के अंदर भी चले जाते हैं तथा इससे कई बार हमें खाँसी की समस्या भी हो जाती है, तो इस मशीन में एक पाईप लगा है, जिससे घिसाई की 80-90 प्रतिशत धूल मशीन में ही चली जाती है और प्रदूषण भी नहीं फैलता है।

बर्जर पैंट्स की लगभग सारी ही मशीनों के बारे में हमने समझा और जाना, साथ ही हमें समझ आया कि तेजी से बर्जर पैंट्स का व्यापार इन नयी इन्नोवेटिव तकनीक का उपयोग करने से और भी बड़ेगा। पिछले साल लगभग 1.5 लाख इन्क्वायरी आई थीं, जिसमें से लगभग 90 हजार घरों की विजिट की गई और 15 हजार घरों ने बर्जर पैंट्स की इस सुविधा का लाभ उठाया। इस वर्ष यह आँकड़ा 20 प्रतिशत से अधिक हो चुका है, जो कि पिछले वर्ष 10 प्रतिशत था। बर्जर पैंट्स कंपनी फोर्ब्स इंडिया की सूचि में सातवें स्थान पर है जो कि अपने आप ही एक सकारात्मक बात है। पैंटिंग के बारे में ज्यादा जानकारी जानना चाहते हैं तो बर्जर पैंट्स की वेबसाईट पर जाकर जानकारी ले सकते हैं।

इस #BergerXP IndiBlogger Meet में मुझे #BergerXP ने मुझे Social Media Kingpin of the Day! भी चुना।

बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट

बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट

 

छोटी और बड़ी सोच के अंतर

जो लोग छोटे पदों पर होते हैं उन्हें ज्यादा क्यों नहीं दिखाई देता और जो लोग बड़े पदों पर होते हैं वे ज्यादा लंबी दूरी का क्यों देख पाते हैं। वो कहते हैं न कि सोच ही इंसान के जीवन का नजरिया बदल देती है। पर यहाँ समस्या सोच की नहीं है समस्या है पहुँच की, आप जितनी ऊँचाई पर होंगे उतना ज्यादा देख पाओगे, और धरातल पर केवल धरातल की चीजें ही दिखाई देंगी। पता नहीं कब सोचते सोचते यह विचार मेरे जहन में कौंध आया और मन ही मन इस बात पर शोध चलता रहा। समझ जब आया जब रोज की तरह ऑफिस जा रहा था। उस समझ में एक और समझ आ गई कि क्यों और किस तरह लोगों से बचकर चलना चाहिये, कैसे लोग आपको जगह देते हैं और कैसे आपकी जगह लेकर आपसे आगे बढ़ जाते हैं और हम केवल देखते ही रह जाते हैं।

हमारा जीवन और जीवन में होने वाली घटनाएँ बिल्कुल सामान्य यातायात की तरह हैं, जहाँ सड़क पर दूर दूर तक अवरोध हैं और हमें उन अवरोधों को एक एक करके पार करना है।

अगर हम पैदल होंगे तो हमें दिखाई देने वाले अवरोध और रास्ते पूर्णत धरातल पर होंगे, पर पैदल चलने वाले के लिये फुटपाथ बना है, और पैदल चलने वाला सड़क पर भी चल सकता है। जब पैदल चलने वाला फुटपाथ पर चलता है तो उसका अनुभव धरातल से जुड़ा होता है, वह आसपास की हर घटना या चीजों को बहुत ही करीब से देख रहा होता है या महसूस कर रहा होता है और यही जमीनी अनुभव कहलाता है, यही हम अगर व्यावसायिक भाषा में कहें तो जो लोग बुनियादी कार्य कर रहे हैं उन्हें पर तरह का अनुभव होता है।

अगर हम साईकिल या मोटर साईकिल पर होंगे तो हम फुटपाथ पर नहीं चल सकते हमें सड़क पर ही चलना होगा, अनावृत होने से कार, जीप, बस और ट्रक का भी सामना करना होगा। यहाँ भी बाईक सवार को उतना ही दिखाई देगा जितना कि वह बाईक से देख सकता है, अब ये निर्भर करता है कि किस रफ्तार की मशीन उसकी बाईक में लगी है, वह कितनी तेजी से दूरी तय कर सकती है, उसे कितने अच्छे से अपना वाहन चलाना आता है और कैसे अपने से बड़े वाहनों के बीच जगह बनाते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचता है। बाईक वाले पैदल चलने का दर्द समझ सकते हैं क्योंकि वे भी कभी कभी पैदल चलते हैं या फिर वे अभी अभी बाईक सवार बने हों या फिर भूल भी सकते हैं अगर वे लंबे समय से बाईक सवार हैं।

कार जीप वाले लोग अपने आसपास के वाहनों का ध्यान जरूरी रखेंगे नहीं तो उनके साथ साथ ही दूसरे का भी ज्यादा नुक्सान हो सकता है, उन्हें दूसरे से ज्यादा अपने वाहन की ज्यादा चिंता होती है। जैसे कि लोग खुद के सम्मान की ज्यादा चिंता करते हैं, और दूसरे से थोड़ी दूरी हमेशा बनाये रखते हैं, क्योंकि टकराव हमेशा ही बुरा होता है, टकराव से हमेशा ही बुरा प्रभाव पड़ता है। कार सवार को जमीनी अनुभव से गुजरे हुए समय हो गया होता है और बाईक का अनुभव उसके लिये हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है।

तो कहने का मतलब इतना ही है कि जब तक जमीनी तौर पर जुड़कर काम करते हैं तो आप उन सब चीजों को बहुत अच्छे से समझ सकते हैं और हमेशा ही अपने से बड़े वाहनों या पदों पर बैठे हुए व्यक्ति से या तो डरेंगे या उनकी स्थिति को समझने की कोशिश करेंगे, परंतु जैसे ही जमीनी स्तर से ऊपर उठते हैं वैसे ही इंसान बदल जाता है और वैसे ही उसके देखने की दिशा बदल जाती है।

उम्मीद है बात जो कहना चाह रहा था, पहुँच गई होगी, नहीं तो हम टिप्पणियों में भी बात आगे बढ़ा सकते हैं।

 

दौड़ते रहें, स्वस्थ्य रहें, सुखी रहें

कल Neeraj Jat के फेसबुक स्टेटस पर आदरणीय Satish Saxena जी ने बताया था कि कैसे दौड़ना शुरू करना है, वॉक रन वॉक रन और कौन कौन से दिन करना है, शनिवार या रविवार को 8 किमी या उससे अधिक करना सुझाया था, कल बरसात भी थी, ठंड भी थी, और रजाई भी थी, तो हम आलस कर गये। आज सुबह मौसम बढ़िया था, सुबह उठकर निकल लिये कम से कम 8 किमी दौड़ने का इरादा था, परंतु स्वेटशर्ट पहनकर दौड़ने से 8 किमी पूरा नहीं कर पाये, स्वेटशर्ट पूरी गीली हो गई और इतनी भारी शर्ट पहनकर दौड़ना बहुत मुश्किल लग रहा था, तो जैसे तैसे 6.8 किमी दौड़ लगभग 48 मिनिट में पूरी की और घर आ गये। एवरेज फिर भी 7.10 मिनिट किमी का रहा, जो कि ठीक ही है। Continue reading…

 

बैंक के आगे लंबी कतारें और एटीएम के शटर डाऊन

अभी एक मित्र बैंक से आ रहे हैं, बहुत लंबी लाईन थी और बैंक में एक समय में एक ही बन्दे को अन्दर जाने दे रहे थे। अंदर जाकर देखा कि 1 ही लाईन है, जमा और भुगतान दोनों की। उन्हें पुराने नोट जमा करने थे, उसमें उन्हें 2 घंटे लग गये, उन्होंने देखा कि कुछ वृद्ध लोग भी लाईन में लगे हैं, महिलायें भी लगी हैं, तो उनसे रहा नहीं गया। अपना पैसा जमा करने के बाद, वे बैंक मैनेजर के केबिन में गये और बोले कि बाहर इतनी लंबी लाईन लगी है और आपने केवल एक ही काऊँटर खोल रखा है, आखिर बात क्या है, आप के बैंक की समस्या क्या है

बैंक मैनेजर ने कहा – सर मुझे भी एक काऊँटर खोलने की शर्मिंदगी है, परंतु मैं भी क्या करूँ, मेरे पास स्टॉफ भी है, पर देने के लिये रूपये नहीं हैं। इसलिये केवल एक काऊँटर खोला है और काऊँटर पर जो बंदा बैठा है उसको कहा है कि आराम से काम करो, जल्दी करोगे, तो हमें बैंक के बाहर बोर्ड लगाना होगा कि बैंक में नगद नहीं है, आप समझिये कि हम बहुत ही डेंजरस सिचुएशन में बैठे हुए हैं, अगर नगद खत्म होने का बोर्ड लगाया तो हमारे बैंक की साख चली जायेगी, और हमारे पास रूपये उतनी मात्रा में आ नहीं रहे, जितनी डिमांड है। अगर मेरे पास नगद होता तो मैं सारे स्टॉफ को केवल नगद के ही काम में लगा देता, परंतु ऐसा नहीं है। मुझे पता है कि जनता गुस्सा हो रही है, उनको तकलीफ हो रही है, ऐसा नहीं है कि बैंक में ऊपर वालों को ये सब पता नहीं है, उनको भी सब पता है, और वो ही हमें अनाधिकारिक तौर पर मौखिक आदेश दे रहे हैं।

आज तो फिर भी ठीक है, कि आज शुक्रवार है, कल शनिवार है, पता नहीं कल क्या होगा, क्योंकि कल बैंक खुला है, और हमारे पास उतना नगद नहीं है, जितनी डिमांड है। मैंने तो अपने ऊपर वालों को कह दिया है कि हमें कल 11 बजे ही बैंक बंद करनी पड़ जायेगी, क्योंकि नगद की जितनी डिमांड है उतनी आपूर्ति नहीं है।

हमारे मित्र ने कहा – आप उन बंदों को रोकिये जो 24 हजार के चैक लेकर आ रहे हैं, तो बैंक ज्यादा लोगों को नगद दे पायेगा। तो बैंक मैनेजर ने कहा कि उनको भी नहीं रोक सकते, और कहा कि एक ही बंदा 4 बेयरर चेक 24 हजार के लेकर लगा है, तो उसको भी मना नहीं कर सकते हैं। उनको बोला कि कम निकाल लो, तो वे बोलते हैं कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है, तो बैंक भी नहीं बना सकती है।

बता सही है, मैनेजर अपनी जगह ठीक है और ग्राहक अपनी जगह ठीक है। बस अब जनता का नगद से भरोसा ही उठने लगा है क्योंकि जब खाते में पैसा है पर खर्च करने के लिये निकाल नहीं सकते हैं। सारे एटीएम के शटर डाऊन हैं, कहीं भी आज मुझे कोई एटीएम काम करता नहीं दिखा और बैंकों के आगे लंबी कतारें लगी देखी जा सकती हैं।

हमारे पास भी अभी थोड़े से 100 रूपये के नोट हैं, उम्मीद हैं कि जब तक स्थिती सुधरेगी तब तक हमारा काम उनसे चल जायेगा, नहीं तो वाकई बहुत मुश्किल होने वाली है।

 

दौड़ना क्यों (अपने लिये) ?

दौड़ना क्यों (अपने लिये) ?

बहुत अहम सवाल है, आखिर दौड़ना क्यों, सवाल का ऊपर ही जबाब दिया है जी हाँ अपने लिये, और किसी के लिये नहीं केवल अपने लिये। कल रात को हाथ की कलाई और पैर के घुटनों में थोड़ा दर्द था, ये हड्डी वाला दर्द भी हो सकता है, परंतु हमने रात को हाथ पैरों की तेल से मालिश की और सुबह सब ठीक हो गया। रात को ही मन था कि सुबह दौड़ना है भले 4,5,6,7,8,9 या 10 किमी, पर दौड़ना है, लक्ष्य कम से कम 4 किमी का और अधिकतम 10 किमी दौड़ने का निर्धारित किया था ।

दौड़ना क्यों

दौड़ना क्यों

सुबह उठा तो दौड़ने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी परंतु फेसबुक पर एक रनर के द्वारा शेयर किया गया फोटो ध्यान आ गया और उसको ध्यान में रखकर दौड़ने के लिये तैयार हो गया। उस फोटो में संदेश था कि क्यों घर में बैठकर बोर हो रहे हो, चलो थोड़ा प्रकृति में और दौड़कर आयें, जिससे शरीर भी ठीक रहे। दौड़ने के लिये बहुत सारे फेक्टर कार्य करते हैं, अगर आप सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं तो ट्विटर, फेसबुक, स्त्रावा पर रनर्स को अपना दोस्त बनायें, वे सभी अपने अनुभव साझा करते रहते हैं, जिससे आपको दौड़ने के बारे में बहुत कुछ पता चलता रहेगा और दौड़ने के लिये हमेशा ही तैयार रहेंगे।

अकेले दौड़ना वाकई बहुत मुश्किल कार्य होता है, इसके लिये या तो आप अपने साथ किसी और को भी दौड़ायें, परंतु थोड़े दिनों बाद ही ये युक्ति भी काम नहीं आयेगी, क्योंकि दोनों के दौड़ने की रफ्तार कम ज्यादा होगी तो साथ रहेगा जरूर, परंतु दौड़ नहीं पायेंगे। अपने स्मार्ट फोन का उपयोग करें और साथ में कुछ सुनते जायें, गाने सुनने का शौक है तो गाने सुनते जायें, पॉडकॉस्ट भी डाउनलोड करके सुन सकते हैं। मेरी आदत दौड़ते हुए पॉडकॉस्ट सुनने की है, मुझे लगता ही नहीं कि मैं दौड़ भी रहा हूँ, ऐसा लगता है कि कोई मुझसे बात कर रहा है, या मैं किसी और ही चीज में व्यस्त हूँ, और दौड़ना केवल एक प्रक्रियाभर है। गाने सुनते हुए दौड़ना मेरे लिये बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि गाने बदलते रहते हैं और उनके स्वर दौड़ने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं। पॉडकॉस्ट अपनी पसंद के डाउनलोड कर सकते हैं, मुझे फाईनेंस, लाईफ स्टाईल, फैक्ट्स, पर्सनलिटी इम्प्रूवमेंट इत्यादि के चैनल बहुत पसंद हैं। मेरा सबसे पसंदीदा चैनल है टैड रेडियो ऑवर।

अपने लिये दौड़ने से आप दिनभर खुश रहते हैं, आपको अपना वजन कम लगने लगता है। भूख खुलकर लगती है, अपने खुद के ऊपर गर्व होने लगता है कि जो अधिकतर जनता नहीं कर सकती वो आप कर सकते हैं। जब किसी कठिन चढ़ाई या घूमने के लिये जाते हैं तो आपका यह स्टेमिना आपके बहुत काम आता है। इस बार मैं घूमने गया तो 4-5 घंटों तक चलने और खड़े होने पर मुझे किसी भी प्रकार से थकान का अनुभव ही नहीं हुआ। रोज कम से कम 35 मिनिट तेज वॉक या दौड़ना चाहिये। चलने की जगह दौड़िये, दौड़ना बहुत आसान है, मेरी पिछली पोस्ट दौड़ना कैसे शुरू करें को पढ़कर समझ सकते हैं कि कैसे दौड़ा जाये। 35 मिनिट इसलिये कि रोज हमें हमारे दिल को जो कि धड़कता है उसकी रफ्तार 140 पल्स तक ले जानी चाहिये, हमारे दिल याने ह्रदय की धड़कने की सामान्य गति 60-100 पल्स प्रति मिनिट होती है। दौड़कर हम कॉर्डियो व्यायाम करते हैं, जिससे दिल अपने भरपूर रफ्तार से धड़कने को परख लेता है, और यह व्यायाम हमें रोज ही करना चाहिये।

दौड़ना शुरू करें, दौड़ना आपके जीवन में खुशियाँ भर देगा।

 

मरने के पहले और मरने के बाद क्या करना चाहते हो ?

मरने के पहले और मरने के बाद क्या करना चाहते हो ?

मरने के पहले –

है न अजीब सवाल, एक ऐसा सवाल जिसका उत्तर शायद किसी के पास भी तैयार नहीं, मृत्यु हमारे जीवन में कोई बीमारी नहीं है, यह भी जीवन की एक विशेषता है। अंग्रेजी में इसे ऐसे कहना ठीक होगा Death is not a Bug its feature of Life. Continue reading…