#BergerXP IndiBlogger Meet बर्जर पैंट्स की नयी इन्नोवेटिव तकनीक

बर्जर पैंट #BergerXP मैंने इसका नाम बरसों पहले सुना था, शायद 25 वर्ष पहले, और तब से ही हमारे घर में हम बर्जर पैंट का ही इस्तेमाल करते हैं। करीबन 15 वर्ष पहले घर की मरम्मत करवाई गई थी, उसके बाद हमने अपने पैंटर को कहा कि अब इतना अच्छा काम करवाया है, अब अच्छा सा पैंट कर दो कि घर अच्छा लगे। उन्होंने ही हमें सुझाया कि बर्जर पैंट्स का सिल्क पैंट का उपयोग करो, अभी अभी ही बाजार में आया है और बहुत ही अच्छा है। एक बार कर लो और फिर जब भी दीवाल गंदी लगे, धो लो। तबसे हमारे यहाँ घर में हमेशा ही जब भी पैंट होता है, हम बर्जर पैंट्स के सिल्क पैंट का ही उपयोग करते हैं।

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इस बार की बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट #BergerXP IndiBlogger Meet में शामिल होने का मौका मिला। ब्लॉगर मीट का आयोजन ललित अशोक होटल में किया गया, और जब मीट में पहुँचे तो कई ब्लॉगर पहले से ही पहुँच चुके थे। कई ब्लॉगर्स से पहली बार ही मिलना हुआ और कई ब्लॉगर्स से पहले भी मिलना हो चुका था। कल फरीदा रिजवान से सबसे पहले मिला वे 21 वर्ष से स्तन कैंसर के स्टैज 3 कैंसर की सर्वाइवर हैं और उनका फोटो मैंने रेसीडेंसी रोड पर एक सिग्नल पर लगा हुआ देखा था, तो उन्हें बधाई भी दी।

इसके बाद बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट की वॉल पर फोटो भी खींचे गये और 251 लाईक वाली एक इन्सटॉग्राम की फ्रेम भी बहुत घूम रही थी। बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट की शुरूआत लजीज खाने से हुई, और फिर सैशन शुरू होने के पहले ही हॉल में एक गुब्बारा और एक धागा दे दिया गया। बैठने के बाद सबसे पहले कहा गया कि अब खड़े हो जाओ और फिर शुरू हुआ एक वार्मअप सैशन जिससे कि ब्लॉगर्स सो न जायें और फिर गुब्बारे को फुलाकर धागे से बाँधने को कहा गया। असली खेल तो अब बताया कि सब लोग अपने गुब्बारे के धागे को अपने पैरों में बाँध लें और फिर एक दूसरे के गुब्बारे को फोड़ें, अगर आपका गुब्बारा फूट गया है तो आप नहीं फोड़ सकते और जिसने अपना गुब्बारा सबसे आखिरी तक बचा लिया, वह विजेता। खैर हम गुब्बारे को ज्यादा देर तक नहीं बचा पाये।

बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट में सबसे अच्छी बात यह लगी कि बिना स्लाईड के ही कंपनी की एवं पैंटिंग इंडस्ट्री की सारी जानकारी बहुत ही आसान शब्दों में दे दी गई। बताया गया कि पैंट करने के पहले क्या क्या करना होता है और इसके लिये बर्जर पैंट्स ने बहुत सी मशीनों को हमारी सुविधा के लिये बाजार में उतारा है। हमें तो सबसे अच्छी मशीन लगी घिसाई करने वाली, इससे घिसाई के बाद जो कण उड़ते हैं और पूरे सामान को गंदा करते हैं और साथ ही हमारे शरीर के अंदर भी चले जाते हैं तथा इससे कई बार हमें खाँसी की समस्या भी हो जाती है, तो इस मशीन में एक पाईप लगा है, जिससे घिसाई की 80-90 प्रतिशत धूल मशीन में ही चली जाती है और प्रदूषण भी नहीं फैलता है।

बर्जर पैंट्स की लगभग सारी ही मशीनों के बारे में हमने समझा और जाना, साथ ही हमें समझ आया कि तेजी से बर्जर पैंट्स का व्यापार इन नयी इन्नोवेटिव तकनीक का उपयोग करने से और भी बड़ेगा। पिछले साल लगभग 1.5 लाख इन्क्वायरी आई थीं, जिसमें से लगभग 90 हजार घरों की विजिट की गई और 15 हजार घरों ने बर्जर पैंट्स की इस सुविधा का लाभ उठाया। इस वर्ष यह आँकड़ा 20 प्रतिशत से अधिक हो चुका है, जो कि पिछले वर्ष 10 प्रतिशत था। बर्जर पैंट्स कंपनी फोर्ब्स इंडिया की सूचि में सातवें स्थान पर है जो कि अपने आप ही एक सकारात्मक बात है। पैंटिंग के बारे में ज्यादा जानकारी जानना चाहते हैं तो बर्जर पैंट्स की वेबसाईट पर जाकर जानकारी ले सकते हैं।

इस #BergerXP IndiBlogger Meet में मुझे #BergerXP ने मुझे Social Media Kingpin of the Day! भी चुना।

बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट

बर्जर पैंट्स इंडीब्लॉगर मीट

 

छोटी और बड़ी सोच के अंतर

जो लोग छोटे पदों पर होते हैं उन्हें ज्यादा क्यों नहीं दिखाई देता और जो लोग बड़े पदों पर होते हैं वे ज्यादा लंबी दूरी का क्यों देख पाते हैं। वो कहते हैं न कि सोच ही इंसान के जीवन का नजरिया बदल देती है। पर यहाँ समस्या सोच की नहीं है समस्या है पहुँच की, आप जितनी ऊँचाई पर होंगे उतना ज्यादा देख पाओगे, और धरातल पर केवल धरातल की चीजें ही दिखाई देंगी। पता नहीं कब सोचते सोचते यह विचार मेरे जहन में कौंध आया और मन ही मन इस बात पर शोध चलता रहा। समझ जब आया जब रोज की तरह ऑफिस जा रहा था। उस समझ में एक और समझ आ गई कि क्यों और किस तरह लोगों से बचकर चलना चाहिये, कैसे लोग आपको जगह देते हैं और कैसे आपकी जगह लेकर आपसे आगे बढ़ जाते हैं और हम केवल देखते ही रह जाते हैं।

हमारा जीवन और जीवन में होने वाली घटनाएँ बिल्कुल सामान्य यातायात की तरह हैं, जहाँ सड़क पर दूर दूर तक अवरोध हैं और हमें उन अवरोधों को एक एक करके पार करना है।

अगर हम पैदल होंगे तो हमें दिखाई देने वाले अवरोध और रास्ते पूर्णत धरातल पर होंगे, पर पैदल चलने वाले के लिये फुटपाथ बना है, और पैदल चलने वाला सड़क पर भी चल सकता है। जब पैदल चलने वाला फुटपाथ पर चलता है तो उसका अनुभव धरातल से जुड़ा होता है, वह आसपास की हर घटना या चीजों को बहुत ही करीब से देख रहा होता है या महसूस कर रहा होता है और यही जमीनी अनुभव कहलाता है, यही हम अगर व्यावसायिक भाषा में कहें तो जो लोग बुनियादी कार्य कर रहे हैं उन्हें पर तरह का अनुभव होता है।

अगर हम साईकिल या मोटर साईकिल पर होंगे तो हम फुटपाथ पर नहीं चल सकते हमें सड़क पर ही चलना होगा, अनावृत होने से कार, जीप, बस और ट्रक का भी सामना करना होगा। यहाँ भी बाईक सवार को उतना ही दिखाई देगा जितना कि वह बाईक से देख सकता है, अब ये निर्भर करता है कि किस रफ्तार की मशीन उसकी बाईक में लगी है, वह कितनी तेजी से दूरी तय कर सकती है, उसे कितने अच्छे से अपना वाहन चलाना आता है और कैसे अपने से बड़े वाहनों के बीच जगह बनाते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचता है। बाईक वाले पैदल चलने का दर्द समझ सकते हैं क्योंकि वे भी कभी कभी पैदल चलते हैं या फिर वे अभी अभी बाईक सवार बने हों या फिर भूल भी सकते हैं अगर वे लंबे समय से बाईक सवार हैं।

कार जीप वाले लोग अपने आसपास के वाहनों का ध्यान जरूरी रखेंगे नहीं तो उनके साथ साथ ही दूसरे का भी ज्यादा नुक्सान हो सकता है, उन्हें दूसरे से ज्यादा अपने वाहन की ज्यादा चिंता होती है। जैसे कि लोग खुद के सम्मान की ज्यादा चिंता करते हैं, और दूसरे से थोड़ी दूरी हमेशा बनाये रखते हैं, क्योंकि टकराव हमेशा ही बुरा होता है, टकराव से हमेशा ही बुरा प्रभाव पड़ता है। कार सवार को जमीनी अनुभव से गुजरे हुए समय हो गया होता है और बाईक का अनुभव उसके लिये हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है।

तो कहने का मतलब इतना ही है कि जब तक जमीनी तौर पर जुड़कर काम करते हैं तो आप उन सब चीजों को बहुत अच्छे से समझ सकते हैं और हमेशा ही अपने से बड़े वाहनों या पदों पर बैठे हुए व्यक्ति से या तो डरेंगे या उनकी स्थिति को समझने की कोशिश करेंगे, परंतु जैसे ही जमीनी स्तर से ऊपर उठते हैं वैसे ही इंसान बदल जाता है और वैसे ही उसके देखने की दिशा बदल जाती है।

उम्मीद है बात जो कहना चाह रहा था, पहुँच गई होगी, नहीं तो हम टिप्पणियों में भी बात आगे बढ़ा सकते हैं।

 

दौड़ते रहें, स्वस्थ्य रहें, सुखी रहें

कल Neeraj Jat के फेसबुक स्टेटस पर आदरणीय Satish Saxena जी ने बताया था कि कैसे दौड़ना शुरू करना है, वॉक रन वॉक रन और कौन कौन से दिन करना है, शनिवार या रविवार को 8 किमी या उससे अधिक करना सुझाया था, कल बरसात भी थी, ठंड भी थी, और रजाई भी थी, तो हम आलस कर गये। आज सुबह मौसम बढ़िया था, सुबह उठकर निकल लिये कम से कम 8 किमी दौड़ने का इरादा था, परंतु स्वेटशर्ट पहनकर दौड़ने से 8 किमी पूरा नहीं कर पाये, स्वेटशर्ट पूरी गीली हो गई और इतनी भारी शर्ट पहनकर दौड़ना बहुत मुश्किल लग रहा था, तो जैसे तैसे 6.8 किमी दौड़ लगभग 48 मिनिट में पूरी की और घर आ गये। एवरेज फिर भी 7.10 मिनिट किमी का रहा, जो कि ठीक ही है। Continue reading…

 

बैंक के आगे लंबी कतारें और एटीएम के शटर डाऊन

अभी एक मित्र बैंक से आ रहे हैं, बहुत लंबी लाईन थी और बैंक में एक समय में एक ही बन्दे को अन्दर जाने दे रहे थे। अंदर जाकर देखा कि 1 ही लाईन है, जमा और भुगतान दोनों की। उन्हें पुराने नोट जमा करने थे, उसमें उन्हें 2 घंटे लग गये, उन्होंने देखा कि कुछ वृद्ध लोग भी लाईन में लगे हैं, महिलायें भी लगी हैं, तो उनसे रहा नहीं गया। अपना पैसा जमा करने के बाद, वे बैंक मैनेजर के केबिन में गये और बोले कि बाहर इतनी लंबी लाईन लगी है और आपने केवल एक ही काऊँटर खोल रखा है, आखिर बात क्या है, आप के बैंक की समस्या क्या है

बैंक मैनेजर ने कहा – सर मुझे भी एक काऊँटर खोलने की शर्मिंदगी है, परंतु मैं भी क्या करूँ, मेरे पास स्टॉफ भी है, पर देने के लिये रूपये नहीं हैं। इसलिये केवल एक काऊँटर खोला है और काऊँटर पर जो बंदा बैठा है उसको कहा है कि आराम से काम करो, जल्दी करोगे, तो हमें बैंक के बाहर बोर्ड लगाना होगा कि बैंक में नगद नहीं है, आप समझिये कि हम बहुत ही डेंजरस सिचुएशन में बैठे हुए हैं, अगर नगद खत्म होने का बोर्ड लगाया तो हमारे बैंक की साख चली जायेगी, और हमारे पास रूपये उतनी मात्रा में आ नहीं रहे, जितनी डिमांड है। अगर मेरे पास नगद होता तो मैं सारे स्टॉफ को केवल नगद के ही काम में लगा देता, परंतु ऐसा नहीं है। मुझे पता है कि जनता गुस्सा हो रही है, उनको तकलीफ हो रही है, ऐसा नहीं है कि बैंक में ऊपर वालों को ये सब पता नहीं है, उनको भी सब पता है, और वो ही हमें अनाधिकारिक तौर पर मौखिक आदेश दे रहे हैं।

आज तो फिर भी ठीक है, कि आज शुक्रवार है, कल शनिवार है, पता नहीं कल क्या होगा, क्योंकि कल बैंक खुला है, और हमारे पास उतना नगद नहीं है, जितनी डिमांड है। मैंने तो अपने ऊपर वालों को कह दिया है कि हमें कल 11 बजे ही बैंक बंद करनी पड़ जायेगी, क्योंकि नगद की जितनी डिमांड है उतनी आपूर्ति नहीं है।

हमारे मित्र ने कहा – आप उन बंदों को रोकिये जो 24 हजार के चैक लेकर आ रहे हैं, तो बैंक ज्यादा लोगों को नगद दे पायेगा। तो बैंक मैनेजर ने कहा कि उनको भी नहीं रोक सकते, और कहा कि एक ही बंदा 4 बेयरर चेक 24 हजार के लेकर लगा है, तो उसको भी मना नहीं कर सकते हैं। उनको बोला कि कम निकाल लो, तो वे बोलते हैं कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है, तो बैंक भी नहीं बना सकती है।

बता सही है, मैनेजर अपनी जगह ठीक है और ग्राहक अपनी जगह ठीक है। बस अब जनता का नगद से भरोसा ही उठने लगा है क्योंकि जब खाते में पैसा है पर खर्च करने के लिये निकाल नहीं सकते हैं। सारे एटीएम के शटर डाऊन हैं, कहीं भी आज मुझे कोई एटीएम काम करता नहीं दिखा और बैंकों के आगे लंबी कतारें लगी देखी जा सकती हैं।

हमारे पास भी अभी थोड़े से 100 रूपये के नोट हैं, उम्मीद हैं कि जब तक स्थिती सुधरेगी तब तक हमारा काम उनसे चल जायेगा, नहीं तो वाकई बहुत मुश्किल होने वाली है।

 

दौड़ना क्यों (अपने लिये) ?

दौड़ना क्यों (अपने लिये) ?

बहुत अहम सवाल है, आखिर दौड़ना क्यों, सवाल का ऊपर ही जबाब दिया है जी हाँ अपने लिये, और किसी के लिये नहीं केवल अपने लिये। कल रात को हाथ की कलाई और पैर के घुटनों में थोड़ा दर्द था, ये हड्डी वाला दर्द भी हो सकता है, परंतु हमने रात को हाथ पैरों की तेल से मालिश की और सुबह सब ठीक हो गया। रात को ही मन था कि सुबह दौड़ना है भले 4,5,6,7,8,9 या 10 किमी, पर दौड़ना है, लक्ष्य कम से कम 4 किमी का और अधिकतम 10 किमी दौड़ने का निर्धारित किया था ।

दौड़ना क्यों

दौड़ना क्यों

सुबह उठा तो दौड़ने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी परंतु फेसबुक पर एक रनर के द्वारा शेयर किया गया फोटो ध्यान आ गया और उसको ध्यान में रखकर दौड़ने के लिये तैयार हो गया। उस फोटो में संदेश था कि क्यों घर में बैठकर बोर हो रहे हो, चलो थोड़ा प्रकृति में और दौड़कर आयें, जिससे शरीर भी ठीक रहे। दौड़ने के लिये बहुत सारे फेक्टर कार्य करते हैं, अगर आप सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं तो ट्विटर, फेसबुक, स्त्रावा पर रनर्स को अपना दोस्त बनायें, वे सभी अपने अनुभव साझा करते रहते हैं, जिससे आपको दौड़ने के बारे में बहुत कुछ पता चलता रहेगा और दौड़ने के लिये हमेशा ही तैयार रहेंगे।

अकेले दौड़ना वाकई बहुत मुश्किल कार्य होता है, इसके लिये या तो आप अपने साथ किसी और को भी दौड़ायें, परंतु थोड़े दिनों बाद ही ये युक्ति भी काम नहीं आयेगी, क्योंकि दोनों के दौड़ने की रफ्तार कम ज्यादा होगी तो साथ रहेगा जरूर, परंतु दौड़ नहीं पायेंगे। अपने स्मार्ट फोन का उपयोग करें और साथ में कुछ सुनते जायें, गाने सुनने का शौक है तो गाने सुनते जायें, पॉडकॉस्ट भी डाउनलोड करके सुन सकते हैं। मेरी आदत दौड़ते हुए पॉडकॉस्ट सुनने की है, मुझे लगता ही नहीं कि मैं दौड़ भी रहा हूँ, ऐसा लगता है कि कोई मुझसे बात कर रहा है, या मैं किसी और ही चीज में व्यस्त हूँ, और दौड़ना केवल एक प्रक्रियाभर है। गाने सुनते हुए दौड़ना मेरे लिये बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि गाने बदलते रहते हैं और उनके स्वर दौड़ने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं। पॉडकॉस्ट अपनी पसंद के डाउनलोड कर सकते हैं, मुझे फाईनेंस, लाईफ स्टाईल, फैक्ट्स, पर्सनलिटी इम्प्रूवमेंट इत्यादि के चैनल बहुत पसंद हैं। मेरा सबसे पसंदीदा चैनल है टैड रेडियो ऑवर।

अपने लिये दौड़ने से आप दिनभर खुश रहते हैं, आपको अपना वजन कम लगने लगता है। भूख खुलकर लगती है, अपने खुद के ऊपर गर्व होने लगता है कि जो अधिकतर जनता नहीं कर सकती वो आप कर सकते हैं। जब किसी कठिन चढ़ाई या घूमने के लिये जाते हैं तो आपका यह स्टेमिना आपके बहुत काम आता है। इस बार मैं घूमने गया तो 4-5 घंटों तक चलने और खड़े होने पर मुझे किसी भी प्रकार से थकान का अनुभव ही नहीं हुआ। रोज कम से कम 35 मिनिट तेज वॉक या दौड़ना चाहिये। चलने की जगह दौड़िये, दौड़ना बहुत आसान है, मेरी पिछली पोस्ट दौड़ना कैसे शुरू करें को पढ़कर समझ सकते हैं कि कैसे दौड़ा जाये। 35 मिनिट इसलिये कि रोज हमें हमारे दिल को जो कि धड़कता है उसकी रफ्तार 140 पल्स तक ले जानी चाहिये, हमारे दिल याने ह्रदय की धड़कने की सामान्य गति 60-100 पल्स प्रति मिनिट होती है। दौड़कर हम कॉर्डियो व्यायाम करते हैं, जिससे दिल अपने भरपूर रफ्तार से धड़कने को परख लेता है, और यह व्यायाम हमें रोज ही करना चाहिये।

दौड़ना शुरू करें, दौड़ना आपके जीवन में खुशियाँ भर देगा।

 

मरने के पहले और मरने के बाद क्या करना चाहते हो ?

मरने के पहले और मरने के बाद क्या करना चाहते हो ?

मरने के पहले –

है न अजीब सवाल, एक ऐसा सवाल जिसका उत्तर शायद किसी के पास भी तैयार नहीं, मृत्यु हमारे जीवन में कोई बीमारी नहीं है, यह भी जीवन की एक विशेषता है। अंग्रेजी में इसे ऐसे कहना ठीक होगा Death is not a Bug its feature of Life. Continue reading…

 

दौड़ना कैसे शुरू करें। (How to Start Running)

दौड़ना कैसे शुरू करें। (How to Start Running)

दौड़ना तो हर कोई चाहता है परन्तु सभी लोग लाज शर्म के कारण और कोई क्या कहेगा, इन सब बातों की परवाह करने के कारण दौड़ नहीं पाते हैं। दौड़ना चाहते भी हैं तो कुछ न कुछ बात उनको रोक ही देती है, और दौड़ने के पहले हम तेज चलने लगते हैं, कि ऐसे ही स्टेमिना बनेगा और दौड़ पायेंगे। कई बार हम दौड़ इसलिये नहीं पाते क्योंकि हमें झिझक होती है कि हमारे पास दौड़ने वाले जूते नहीं हैं, टीशर्ट और लोअर नहीं है, दौड़ने का समय नहीं है इत्यादि इत्यादि। यकीन मानिये ये सब बहाने हैं, और अगर आप दौड़ना चाहते हैं तो एक उत्साहवर्धन करने वाले व्यक्ति की और आपके अपने आत्मविश्वास, लगन और मेहनत की कमी है।

मैं लगभग पिछले 10 वर्षों से दौड़ने की कोशिश में लगा हुआ था, परन्तु बहुत सारी चीजों के कारण संभव नहीं हो पाता था, जैसे कि मैं थक जाता हूँ, मैं दौड़ नहीं सकता, मेरी साँस फूल जाती है, मेरे पैर दर्द करने लगते हैं, मेरे पैर सही नहीं पड़ते हैं।

दौड़ना बहुत आसान है, दौड़ने का मतलब यह नहीं है कि लगातार दौड़ना है, थक जायें तो थोड़ा पैदल चल लें या अपने दौड़ने की गति सुविधानुसार धीमी कर लें। लगभग सभी यही समझते हैं कि दौड़ना मतलब कि केवल दौड़ते ही रहना, तो यह गलत भ्रांति है। जो लोग 10,21 या 42 किमी भी दौड़ते हैं वे भी जब तक पूरी तरह से प्रेक्टिस न हो लगातार नहीं दौड़ सकते हैं।

दौड़ना कैसे शुरू करें –

सबसे पहले दौड़ने का मन बनायें और अपने आप को दौड़ने के लिये मानसिक तौर पर तैयार करें। सुबह का समय सबसे बेहतर है दौड़ने के लिये, इसलिये कोशिश करिये कि सुबह जल्दी उठिये और पाँच या साढ़े पाँच बजे तक घर से दौड़ने के लिये निकल जाये। सुबह पंछियों के कलरव को ध्यान से सुनें, जीवन का संगीत सुनाई देगा, सुबह की हवा आपको ताजगी का अहसास करवायेगी।

सौ कदम गिनकर चलें और फिर पचास कदम गिनकर ही दौड़ें, पचास कदम दौड़ने के बाद सौ कदम चलें, ऐसे करके सात दिनों तक यही दोहरायें। सात दिनों में आप पायेंगे कि आप पचास कदम आराम से दौड़ने लगे हैं। एक सप्ताह बाद से याने कि आठ से पंद्रह दिन तक सौ कदम पैदल चलें और सौ कदम दौड़ें याने कि केवल 50 कदम दौड़ने में बढ़ायें। और इसी तरह दौड़ने के कदम हर सप्ताह बढ़ाते जायें, बीच में जब भी आपको लगे कि आपको थकान लग रही हैं, आराम चाहिये, दौड़ते नहीं बन रहा है तो पैदल चलने लग जाइये।

सबसे पहले अपने दिमाग से यह निकाल दें कि दौड़ना मतलब कि दौड़ते ही रहना, जब भी आपको लगे कि आपका शरीर अब दौड़ नहीं पा रहा है तो आप पैदल चलना शुरू कर दें। यह भी ध्यान रखें कि दौड़ने में थकान मतलब कि मानसिक थकान होती है, शारीरिक थकान भी होती है, पर मानसिक थकान आपको थका देती है और कहती है कि बस बहुत हुआ, अब नहीं दौड़ो, जबकि शारीरिक थकान में आपको मानस को मजा आता है, आपका शरीर कहेगा कि बस अब मत दौड़ो पर आपको दौड़ के बाद की थकान से आपको मानस को मजा आयेगा।

जब आप दौड़ना शुरू करेंगे तो यह भी सोचेंगे कि बहुत ही कम लोग दौड़ते हैं, पर यह ध्यान रखें कि जो भी कार्य आप करते हैं या करने की शुरूआत करते हैं, उससे संबंधित गतिविधियाँ दिखाई देने लगती हैं, या लोग दिखने लगते हैं। पहले जब मैंने दौड़ना शुरू किया था, तब केवल मैं अकेला ही दौड़ता हुआ दिखाई देता था, पर मैंने देखा धीरे धीरे बहुत से लोग दौड़ रहे हैं। यह हो सकता है कि पहले मुझे ये लोग दिखाई नहीं देते थे, परंतु अब दिखाई देते हैं। पर अब यह देखकर खुशी होती है कि जो लोग पैदल चलते थे, वे हमें देखकर दौड़ने लगे हैं, यह संख्या एकदम से नहीं बढ़ी, धीरे धीरे बढ़ी, अब कम से कम रोज ही 10 लोगों को दौड़ते हुए देखना सुखद लगता है जो कि पहले पैदल चलते थे।

दौड़ने के पहले क्या करें-

दौड़ने के पहले कुछ हल्का फुल्का व्यायाम कर लें, जिससे शरीर गर्म हो जाये। सुबह उठने के बाद एक या दो केला खा लें, पानी पी लें। बहुत ज्यादा पानी भी न पियें। दौड़ने जाने के पहले ही निवृत्त हो लें। थोड़ा सा एनर्जी ड्रिंक पी लें।

दौड़ते समय क्या करें –

दौड़ते हुए बहुत पसीना निकलता है जिससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है, इसलिये दौड़ते समय पानी घूँट घूँट पीते रहें, जिससे शरीर में पानी की कमी न हो। अगर पाँच किमी से ज्यादा दौड़ रहे हैं तो एनर्जी ड्रिंक जरूर पी लें, पारले जी बिस्किट भी खा सकते हैं।

दौड़ने के बाद क्या करें –

दौड़ने के बाद एकदम से रूके नहीं, बैठे नहीं, थोड़ी दूर पैदल चलते रहें या फिर धीमी गति से दौड़कर शरीर को ठंडा होने दें। कूल डाऊन व्यायाम करें, जिससे आपके शरीर की माँसपेशियों को मजबूती मिलेगी और यह आपके शरीर के लिये बहुत अच्छा भी होगा क्योंकि दौड़ने के बाद आपका शरीर गरम होता है और शरीर का हर अंग अपने अधिकतम उपयोग की स्थिती में होता है। खूब पानी पियें और 10-15 मिनिट में ही नाश्ता कर लें। केला जरूर खा लें, इससे आपकी सोडियम की कमी पूरी हो जायेगी, जो कि दौड़ में पसीने के साथ आपके शरीर से निकल गया होता है। 35-40 मिनिट में ही नहा लें।

थकान कैसे दूर करें –

जब लंबी दूरी की दौड़ पूरी करते हैं तो अच्छी खासी थकान हो जाती है, उसके लिये शरीर को आराम की भी जरूरत होती है। आप पैरों की तेल से मालिश कर लें, पैरों को ठंडे पानी में डुबोकर रखें। पैरों को किसी से दबवा लें। जिस दिन सुबह दौड़कर आयें उस दिन दोपहर को 2-3 घंटों की नींद जरूर लें। जिससे पैरों के टूटे हुए टिश्यू को जुड़ने में मदद मिलेगी।

दौड़ने के लिये हमें कठिन व्यायाम भी करने चाहिये, जिससे हमारे हाथ, पैरों, कंधे और जाँघ की माँसपेशियाँ मजबूत हों और वे हमारे दौड़ने में सहायक हों। जब माँसपेशियाँ मजबूत होंगी तो आप तेजी से दौड़ पायेंगे या धीमे धीमे ज्यादा दूरी तक दौड़ पायेंगे।

अभी दौड़ने पर बहुत चर्चा बाकी है, तो आगे इसी विषय पर लिखने की कोशिश जारी रहेगी। अनुभवी लोग अपने सुझाव दें जिससे हम नये दौड़ने वालों के लिये कोई परेशानी न हो।

 

पेट पर मोटापे का टायर

आजकल हम हमारी दुनिया में आसपास देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकतर मोटे ही हैं, बहुत ही कम लोग होंगे जिनके पेट पर मोटापे का टायर न हों।
 
खान पान हमारा पिछले 50 वर्षों में बदला है, पहले आम आदमी मोटा नहीं होता था, सही बात तो यह है कि मोटे केवल वही होते थे जिनके पास पैसा होता था और खाने पीने का शौक होता था। याने कि राजा रानी वाला खाना, राजसी भोज।
 
और वैसे ही राजसी खाने वालों को ही हाई बीपी, डायबीटीज, कोलोस्ट्रॉल, हार्टअटैक इत्यादि बीमारियाँ होती थीं, इसीलिये इन बीमारियों को कभी अमीरों की बीमारी कहा जाता था।
 
उस समय आम आदमी क्या खाता था, आलू, चावल, शकरकंदी इत्यादि ही खाते थे, जिससे मोटापा नहीं बड़ता था, भाड़ के भुने आलू और शकरकंदी आज भी गाँव देहात में मिल जाते हैं, जो कि बिल्कुल सही भोज है।
 
पर धीरे धीरे इंड्स्ट्रीयलाईजेशन ने पूरे समाज की दिशा ही बदल दी, राजसी भोज वाली चीजें भी आम व्यक्ति अपने भोजन में लेने लग गया, और धीरे धीरे इन 50 वर्षों में राजसी बीमारियाँ आम बीमारियाँ हो गई हैं।
 
अगर हमको ये राजसी बीमारियाँ याने की अमीर लोगों की बीमारियों से बचना है या ठीक रहना है तो हमें पुरानी वाली खुराक पर लौटना चाहिये, वह आज भी उतनी ही कारागार है, जितनी पहले थी।
 
हमें हमारी पीढ़ी को आज से ही खानपान की सही आदतें सिखानी होंगी, नहीं तो वे इन अमीर लोगों की बीमारियों में जल्दी ही घिर जायेंगे।
 
जितनी जल्दी हो सके हमें सबसे पहले अपने मोटापे से मुक्ति पा लेनी चाहिये, उपाय बोलने सुनने में जितना सरल लगता है, व्यवहारिकता में उतना ही कठिन है। हमें प्राकृतिक वस्तुओं का उपभोग करना चाहिये याने कि फल एवं सब्जियों का, अच्छे से धोकर, जरूरत लगे तो उबालकर खाना चाहिये। उबालकर केवल वही सब्जियाँ खानी चाहिये जो लगे कि वे धोकर अच्छे से साफ नहीं होंगी। जैसे कि फूलगोभी, ब्रोकली।
 
कच्ची सब्जियों में मुझे सबसे ज्यादा पसंद है शिमला मिर्च, जी हाँ बहुत ही जबरदस्त स्वाद होता है। एक बार आदत लग गई तो आप कभी भी शिमला मिर्च को कच्चा खाने का मोह त्याग नहीं पायेंगे।
 
#OldisGold #StayHealthy #StarchFood

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चीनी समान का बहिष्कार

भारतियों पहले कामचोरी छोड़ो, काम करना सीखो और घर में अपने समान के लिये इतनी जगह बनाओ, सस्ती चीजों को उपलब्ध करवाओ, ये चीनी समान का बहिष्कार करने से कुछ नहीं होगा, चीन नहीं तो कोरिया या फिर कहीं और का समान खरीदोगे।

चाईना के समान का बहिष्कार करने वालों पहले यह सुनिश्चित करो कि भारत की तकनीक की रीढ़ चीन समान पर न हो, बताओ कि कौन सी चीज मैक इन इंडिया है –

  1. राऊटर
    2. मोडेम
    3. लेन केबल
    4. एडाप्टर
    5. डिश
    6. मोबाईल
    7. मोबाईल टॉवर में लगने वाला समान
    8. कैमरे
    9. द्रोन

और भी बहुत कुछ समान होगा। घर पर उपयोग किये जा रहे समान –

  1. टीवी
    2. फ्रिज
    3. वाशिंग मशीन
    4. लेपटॉप
    5. मोडेम
    6. मोबाईल
    7. गेम्स (सोनी, माइक्रोसॉफ्ट)
    8. कार में लगने वाले समान
    9. बाईक में लगने वाले समान
    10. किचन में बहुत से समान

महफूज भाई का कहना है कि –

ज़र्रे ज़र्रे में इंडिया के चाइना है…

काजल कुमार जी का कहना है –

मैं तो सभी पर Made in India लिख कर ही प्रयोग करता हूं जी

हमने लिखा –

हम use in india करते हैं जी

दिवांशु निगम लिखते हैं –

जिसके ऑप्शन इंडिया में उपलब्ध हैं, उसमें तो करना शुरू करें , बाकी भी होगा । धीरे धीरे ही होगा ।

दूसरी बात, आज के युग में कोई देश अकेले सब कुछ नहीं बना सकता । एक दुसरे पर निर्भरता रहती ही है । चीन की भी है पर उसे झटका लगना ज़रूरी है ।

यहाँ तो बड़ी मुश्किल से कुछ मिलता है जो मेड इन चीन ना हो , पर कोशिश कर रहे हैं । अगर हम थोड़ा भी कर पाए तो बहुत होगा ।

बाकी सब कुछ इंडिया में बनने का वेट करते रहे तो शायद अगले कई सदियों तक करेंगे ।

अपने अपने सोचने का तरीका है । बीते दिनों रविश कुमार मेरी जैसी सोच वालों को महामूरख कह दिए । शायद वो महात्मा गांधी को भी कह देते जब तक पूरे देश में पहनने के बराबर खादी ना बना पाओ तब तक विदेशी कपड़ों का बहिष्कार मत करो ।

मजेदार बात ये भी है कि बात बात पर पतंजलि प्रोडक्ट्स का विरोध करने वाले भी आजकल यही ज्ञान दे रहे हैं । सब माया है

और इस पर हमने प्रतिक्रिया दी –

कृप्या ऑप्शन बतायें, हम तो कोशिश हमेशा करते हैं कि भारतीय कंपनियों के ही उत्पाद खरीदें, पर धीरे धीरे लगभग सभी जगहों पर विदेशी कंपनियों का कब्जा होता जो रहा है, यहाँ तक कि मॉल में खरीदने की जगह हम सामान छोटी दुकान से खरीदने शुरू कर दिये, परंतु यह भी दीगर बात है कि हम अमेजन के डिस्काऊँट को इग्नोर तो नहीं कर सकते तो जो भी पैक आईटम हैं वो ग्रोसरी अमेजन से ही मँगाते हैं। हमारी देशी कंपनी फ्लिपकार्ट ग्रोसरी वाले मामले में फेल हो गई और उन्होंने ग्रोसरी स्टोर बंद ही कर दिया।

पतंजलि के उत्पाद ही सबसे पहले अमेजन पर खाली होते हैं, तो इससे भी पता चलता है कि पतंजलि के उत्पादों की माँग बहुत ही ज्यादा है।

पतंजलि के आऊटलेट्स पर उनके खुद के उत्पाद उपलब्ध नहीं हैं, बहुत मारामारी है, हम नवदर्शनम का आटा खाते हैं, सबसे बढ़िया आटा है, परंतु यहाँ उपलब्धता की बहुत मारा मारी है। केवल मेक इन इंडिया से कुछ नहीं होगा, उसकी सप्लाय भी अच्छी करना होगी और इसके लिये सरकार को ही कोई अच्छा इनिशियेटिव लेना चाहिये।

कमल शर्मा जी का कहना है –

चीन को झटका देने के लिए पहले देश में अच्‍छी क्‍वॉलिटी की चीजें बनाओ और वह भी सस्‍ते प्राइस पर। भारतीय कंपनियों ने सदैव लूटा। स्‍कूटर तक लड़की के जन्‍म लेने के समय बुक करवाना पडता था और शादी के समय मिल पाता था। तत्‍काल चाहिए तो कंपनियां ही लूटती थी। यह तो एक उदाहरण मात्र है। पी वी नरसिंहाराव ने अर्थव्‍यवस्‍था को खोला और विदेश से कंपनियां भारत आई तो क्‍या स्‍कूटर और क्‍या कार..सब कुछ धड़ाधड मिलने लगा और देसी कंपनियों एंटी डम्पिंग से लेकर विदेशी कंपनियों को भगाने की गुहार लगाती है। कामचोर कर्मचारी निजीकरण से डरते हैं और निजी वाले विदेशी से।

 

यारों का यार हमारा सरदार

दोस्त बहुत हैं पर गहरे दोस्त कम ही होते हैं, एक के बारे में लिखो तो दूसरे दोस्तों को बुरा लग सकता है, परंतु हम फिर भी अपने एक गहरे दोस्त के बारे में लिखते हैं, हमें पता है कि हमारे अन्य गहरे दोस्त हमारी बातों को ध्यान से पढ़ेंगे और हमें और ज्यादा प्यार करेंगे। अन्य दोस्तों की मैं कह नहीं सकता हूँ जिसमें से कुछ लोग तो बुरा भी मान जायेंगे और कुछ हौसलाफजाई करेंगे। Continue reading…