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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

चैन्नई में तीन हिन्दी ब्लॉगरों की मुलाकात.. साधक उम्मेद सिंह जी और पीडी से हुई बातों का ब्योरा..

   शनिवार ३० जनवरी को शाम को हमने उम्मेद सिंह जी से बात की और अगले दिन सुबह ८.३० बजे हमारे होटल में मिलना तय हुआ, फ़िर पीडी से बात हुई तो पीडी बोले हम तो कभी भी आ सकते हैं, आप चिंता न करें।

    सुबह हम लगभग ७ बजे उठे और रोज के उपक्रम से निवृत्त होकर चुके ही थे कि अचानक हमारा मोबाईल फ़ोन घनघनाया, फ़ोन किसी मोबाईल से था तो हमें लग गया जरुर साधक उम्मेद सिंह जी का फ़ोन है, बात हुई तो उधर से साधक उम्मेद सिंह जी की ही आवाज थी। उन्होंने कहा कि हम आपके साथ ज्यादा समय बिताना चाहते हैं जरा जल्दी आ जायें क्या, हमने कहा अरे आपका स्वागत है, बिल्कुल आ जाईये, तो साधक जी बोले फ़िर खोलिये आपके कमरे का दरवाजा हम सामने ही खड़े हैं।

    हमने कमरे का दरवाजा खोला तो साधक जी जैसे ही रुबरु हुए, वे बोले “अरे आप तो बहुत सुंदर हैं।”

   फ़िर बहुत सारी बातें हुईं गीता, उपनिषद, धार्मिक, साहित्यिक, ब्लॉग जगत और जीवन सभी बातों पर साधकजी की गजब की पकड़ है।

    फ़िर अविनाश वाचस्पति जी को फ़ोन लगाया उस समय शायद वो उठे ही थे या हमने उठा दिया था, उनसे भी हमारी और साधकजी की बहुत बातें हुईं।

    साधकजी की ब्लॉग के तकनीकी पक्ष की बहुत सारी जिज्ञासाएँ थीं जिसे हमने शांत करने का प्रयास किया और उन्हें बताया कि हम कैसे विन्डोज लाईव राईटर उपयोग करते हैं, और इसमें क्या क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं, लिंक कैसे बनाते हैं, फ़ोटो कैसे लगाते हैं इत्यादि।

    तब फ़िर हमने वापस प्रशान्त उर्फ़ पीडी को फ़ोन लगाया तो वे बस उठे ही थे, हमने उन्हें अपना होटल का पता बताया तो पीडी बोले कि हम बस आधे पौने घंटे में पहुँचते हैं, वो बराबर पौने घंटे में आ पहुँचे फ़िर एक बार साधकजी और पीडी के साथ चर्चाओं का दौर शुरु हो गया। तब तक नाश्ते का समय हो चुका था और बहुत जोर से पेट में चूहे कूद रहे थे, तो जाने के पहले हमने बोला कि एक फ़ोटो खींचकर नुक्कड़ पर लगा देते हैं, और साधकजी ने अपनी छ: लाईने लिख दीं।

कुछ फ़ोटो हमारे लेपटॉप से –

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    फ़िर चल दिये पास ही स्थित सरवाना भवन वहाँ जाकर पहले रसगुल्ला और फ़िर इडली छोटी वाली जो कि प्लेट में १४ आती हैं और फ़िर कॉफ़ी, पर पीडी चाय कॉफ़ी नहीं पीते हैं।

    नाश्ता निपटाकर वापिस आये और थोड़ी देर बाहर की हवा में खड़े होकर आनंदित होकर बातें कर रहे थे। साधक जी को शाम को ही जयपुर निकलना था, तो वे हमसे विदा लेकर चल दिये फ़िर मिलने का वादा करके और फ़ोन पर बराबर संपर्क में रहने के बादे के साथ।

    मैं और पीडी वापिस कमरे में आये और फ़िर ब्लॉग जगत के बारे में बातें हो ही रही थीं और साथ में पीडी के मिनी लेपटॉप पर उनके फ़ोटो देख रहे थे, कि पाबला जी का फ़ोन आ गया और फ़िर पाबला जी से भी बातें हुईं, जो कि उन्होंने नुक्कड़ की पोस्ट देखकर ही लगाया था।

    बहुत सारी अपनी जिंदगी की बातें हुईं, फ़िर पीडी भी दोपहर को विदा लेकर चल दिये कि फ़िर जल्दी ही मुलाकात होगी।

चैन्नई की कुछ फ़ोटो सत्यम सिनेमा, नार्थ का ढ़ाबा और सरवाना भवन का प्रसिद्ध मसाला दूध..

आज जब दोपहर को खाने के लिये निकले तो बीच में सत्यम सिनेमा रोज ही
बीच में पड़ता है वहाँ १० से ज्यादा स्क्रीन्स हैं, वहाँ तमिल फ़िल्म का
एक बड़ा पोस्टर लगा हुआ था, इतना बड़ा पोस्टर मैंने पहली बार इधर ही देखा
है, भले ही हम मुंबई मायानगरी के रहने वाले हैं, परंतु वहाँ हमने इतना
बड़ा पोस्टर नहीं देखा।

फ़िर एक उत्तर भारतीय एक ढ़ाबा मिल गया जहाँ हमने आलू के परांठे सूते
और साथ में नमकीन लस्सी, मजा आ गया।

फ़िर शाम को सरवाना भवन में खाने को गये वहाँ खाया दही पूरी, छोले
भटूरे और यहाँ का प्रसिद्ध मसाला दूध फ़िर सादा पान वाह !!!

लगता है कि गूगल के सर्वर पर कुछ समस्या चल रही है…

अभी दो – तीन दिन से लगातार भारतीय समय के अनुसार तार १२ बजे के आसपास
अचानक ही गूगल और उसकी सुविधाएँ काफ़ी धीमी तरीके से कार्य करने लगती
हैं।

जरा बताईये आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है क्या…

ये मैं ईमेल के जरिये पहली पोस्ट डाल रहा हूँ।

क्यों हमारा मन अशांत होता है जब कोई अपना हमसे रुठ जाता है… एक विश्लेषण… क्यों हमारी कार्य क्षमता अपने आप खत्म हो जाती है…

    यह बात में कई सालों से सोच रहा हूँ कि हमारा मन क्यों अशांत होता है जब कोई अपना हमसे रुठ जाता है। या कोई अपना बीमार होता है या उसे कोई परेशानी होती है।

    हमें कोई परेशानी नहीं होती है परंतु फ़िर भी मन अशांत रहता है किसी कार्य में मन नहीं लगता है, स्वस्थ्य होते हुए भी शरीर अस्वस्थ्य जैसा लगने लगता है, दिल तो बैठ ही जाता है और किसी अनहोनी की आशंका से हमेशा धाड़ धाड़ हथौड़ा बजता रहता है।

    हमारी कार्य करने की क्षमता अपने आप खत्म हो जाती है, भूख लगनी बंद हो जाती है, नींद नहीं आती है, सिर भारी रहने लगता है, उल्टी जैसा होता है और भी पता नहीं क्या क्या, सभी नहीं लिख पाऊँगा।

    प्यार किसी अपने से हो यह जरुरी नहीं, जहाँ आत्मिक जुड़ाव होता है वहाँ पर भी यही होता है, वो आत्मिक जुड़ाव किसी इंसान से भी हो सकता है, किसी भौतिकवादी वस्तु से भी हो सकता है।

    जिससे हम आत्मिक रुप से जुड़े होते हैं, जिससे हम सच्चा प्यार करते हैं, जिसे हम खुश देखना चाहते हैं, जो हमारी रग रग में बसा होता है, जिसे हमारा रोम रोम पुकारता है। यह सब उसके लिये होता है, क्योंकि कहीं न कहीं हमें कुछ खोने का डर होता है।

    और जैसे ही वह डर खत्म हो जाता है, सब अपने आप ठीक हो जाता है, कार्य करने की क्षमता आ जाती है जोश के साथ कार्य करने लगते हैं, जोर से भूख लगने लगती है, गहरी नींद आती है।

आपके साथ भी ऐसा होता है क्या …..

हाँ हम भी इन्सान हैं, अपनी कमजोरियों को सुनना हमें भी अच्छा नहीं लगता बुरा लगता है

हाँ हम भी इंसान हैं भले ही किसी से भी कितना भी प्यार करें पर बुरा तो लगता है भले ही वह बोले हमें या दुनिया का कोई ओर व्यक्ति।

कोई भी अपनी कमजोरियों को सुनना पसंद नहीं करता है और अपनी कमजोरियों को सब छुपाते हैं मैं कोई भगवान तो नहीं हूँ जो अपनी कमजोरियों के सामने आने पर असहज महसूस न करुँ। गुस्सा आना तो स्वाभाविक है, और ऐसे कितने लोग होंगे जो ऐसी परिस्थिती में अपने ऊपर काबू रख पाते होंगे। शायद कोई नहीं।

बढ़ती महत्वाकांक्षाएँ रिश्तों में दरारें भी ला सकती हैं और अपनापन खत्म भी कर सकती हैं, इंसान को अपनी इच्छाएँ सीमित ही रखनी चाहिये कि अगर कोई इच्छा अगर पूरी भी न हो तो ज्यादा दुख न हो।

हमने तो अपने जीवन के शुरुआत से कभी भी अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति ही नहीं की, जो मिलता गया बाबा महाकाल का आशीर्वाद से होता गया। और आज भी केवल उतनी ही चीजों की जरुरत महसूस होती हैं, जो कि जिंदा रहने के लिये बहुत जरुरी होती हैं। क्योंकि विलासिता का जीवन न हमें रास आया और भगवान न करे कि हमें विलासिता देखनी भी पड़े।

सभी बुराईयों की शुरुआत की लकीर विलासितापूर्ण जीवन से ही शुरु होती है, जब इंसान की आँखों पर पट्टी बँध जाती है, और वह केवल और केवल अंधे होकर भागता रहता है, जो कि उसका है ही नहीं, केवल क्षणिक सुख के लिये।

न साथ कुछ लाये हैं न लेकर जायेंगे, खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाना है, फ़िर भी इस नश्वर संपत्ति का मोह, वो भी इतना अधिक नहीं होना चाहिये, अपने मन की इस गंदगी को अपने मन के खोह में ही छिपाकर रखना चाहिये, ऐसी खोह में जिसे कोई देख न सके।

केवल अपने पास इतना रखना चाहिये कि अपनी जिंदगी आराम से निकल जाये, ज्यादा मोह भी बुराई की जड़ है। हमेशा अपनी हद में रहना चाहिये, जिससे आप को पता रहे कि आप किसी का मन नहीं दुखा रहे हैं, और अपनी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन भी नहीं कर रहे हैं।

क्या आपने आज का चांद देखा है, नहीं तो अभी देखिये कितना चमकीला है शायद ही पहले आपने देखा होगा..

क्या आपने आज का चांद देखा है, नहीं तो अभी पहले जाकर देखिये फ़िर ब्लॉग पढ़िये नहीं तो आलस करा नहीं कि इतना अच्छा मौका चूक जायेंगे।
आज माघ पूर्णिमा है और आज साल का सबसे ज्यादा चमकीला चांद निकला है। तकरीबन ३०% ज्यादा चमकीला है। अब हम फ़ोटो नहीं लगा पा रहे हैं, अगर कहीं मिलता है तो हम बाद में लगा देंगे।
पूर्णिमा को अमृत बरसता है, और पूर्णिमा के दिन अमृत बरसता है और हम अपने पापाजी मम्मीजी के  साथ खीर बाहर आंगन में रखकर अमृत बरसने का इंतजार करता था, पता नहीं अमृत बरसता था या नहीं पर हम तो केवल खीर का ही इंतजार करते थे।

चित्र सौजन्य श्री रवि कुमार रावतभाटा

क्या खोया क्या पाया अपनी अभी तक की जिंदगी में…. अपना खुद का निजी हिसाब किताब..

आज ऐसे ही अपनी बीती हुई जिंदगी का मतलब निजी हिसाब किताब कर रहे थे। तो हमने पाया कि बहुत कुछ हमने खोया है और बहुत कुछ पाया है।

और शायद जो खोया है अब हमें मिल भी नहीं सकता है और जो हमने पाया है कभी भी हमसे छिन सकता है या खो सकता है, शायद यह सभी के साथ होता है।

जो खोया है वह है हमने अपनों के करीब रहने का सुख, खुद के लिये समय और परिवार के लिये नितांत निजी समय, पर अपने खुद में इतना उलझ गये हैं कि ये सब बेमानी हो गया है। और जो मिला वो है अपने आप की दुनिया, नेट की दुनिया, जिसे हम कभी भी खो सकते हैं। वैसे तो इस नश्वर शरीर का भी कोई भरोसा नहीं है, परंतु प्यार तो हो ही जाता है।

इसीलिये तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है इस दुनिया को “दुखालयम”, मतलब कि दुखों का घर। इस भौतिक दुनिया में दुखों के बिना जीवन संभव नहीं है।

खैर हमने खोया भगवान की भक्ति को भी, पर फ़िर भी उनके प्यारे भक्तों के मधुर धुनों और बातों को सुनते रहते हैं, नेट से शायद हमने सबसे अच्छी चीज यही पायी है। हम भले ही कितनी दूर हों पर भगवान की मधुर बातें उनके चर्चाकारों द्वारा की गई हमारे पास सभी जगह उपलब्ध हैं।

शायद बाहरी तौर पर केवल इतना ही प्रकट कर सकते हैं, क्योंकि और ज्यादा हम बताना नहीं चाहते हैं। खोते तो सभी हैं और पाते भी सभी हैं, हम कोई अनोखे थोड़े ही हैं, ये तो बस माया का खेल है। अगर कुछ बताना चाहें अपने खोये पाये के बारे में तो अवश्य टिप्पणी में बतायें।

दिल और मन का विश्लेषण, आपके ऊपर क्या हावी रहता है, दिल या मन। दिल तो पागल है दिल दीवाना है / मन तो पागल है मन दीवाना है… (An Analysis of your Internal thoughts..)

    दिल जो केवल वही बात मानने को तैयार होता है जो कि व्यक्ति आत्मिक रुप से ग्रहण कर सकता हो, और उससे किसी को दुख नहीं पहुंचता हो, जो दिल चाहता है वह अगर उसे नहीं मिलता हो तो भी वह संतुष्ट रहता है कि चलो शायद अपना नहीं था।

     मन जो केवल वही बात मानता है जिसे मन चाहता है, जो कि व्यक्ति बाहरी रुप से ग्रहण करता है, फ़िर उससे किसी को कितनी भी चोट लगती हो उससे मन को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, अगर चाही वस्तु मन को नहीं मिली तो हमें बहुत बुरा लगता है और असंतुष्ट असहज रहता है। मन जो चाहता है हासिल करना चाहता है, फ़िर चाहे वह बुरा हो या भला, इससे मन को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।

    जब हम कहते हैं कि अपने दिल के बात बताऊँ तो वह एक सच्ची बात होती है, परंतु जब हम मन की बात करते हैं तो वह हमारे ऊपरी आवरण के अहम को संतुष्ट को करने वाली बात करते हैं।

    अगर दिल की बात पूरी नहीं होती है तो हमें बुरा नहीं लगता है, कि चलो कोई बात नहीं कहकर अपना दिल बहला लेते हैं। परंतु अगर मन की बात पूरी नहीं होती है तो गहरी टीस हमेशा मन के किसी कोने में पलती रहती है और धीरे धीरे अहम के रुप में परिवर्तित होती जाती है।

    दिल और मन कहने को हम एक रुप में ही कहते हैं, परंतु दोनों के कर्म और सोच बिल्कुल अलग हैं, दिल अगर साधु प्रकृति का है तो मन दुष्ट प्रकृति का है।

    दिल और मन का विश्लेषण कैसा लगा, आपके ऊपर क्या हावी रहता है, दिल से बताईयेगा मन से नहीं।

    तभी तो मैं कहता हूँ कि दिल तो पागल है दिल दीवाना है / मन तो पागल है मन दीवाना है…

काश कि हम पतले ही रहते मोटे न होते, और अब ….. हाल बुरा है…. और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का !!!

पता नहीं कि हम मोटे हैं या स्वस्थ्य, किस श्रेणी में रखे जाते हैं, पर हाँ सभी लोग जिसे भी जब भी मौका लगता है भाषण जरुर पिला डालता है कि भाई बहुत हैल्थी हो गये हो, लगता है कि खाते पीते घर के हो।

हम भी हमारे पुराने दिन याद करते हैं जब कभी हम पतले हुआ करते थे, कभी हमारी कमर का नाप २८-३० इंच का हुआ करता था, और अब ज्यादा नहीं है पर फ़िर भी बताने में शर्म आती है। सोचते हैं कि काश कुछ ४-६ इंच कम हो जाये।

सोचते भी हैं कि रोज खूब चलें, दौड़ें, जिम मॆं जायें, ये करें वो करें, ये न खायें और कुछ ऐसा खायें जिससे किसी तरह से पतला हुआ जा सके पर हे भगवान !!! कुछ नहीं हो रहा है। कुछ भी शुरु करो तो अपने मन के सातों घोड़ों को काबू में रखना मुश्किल होता है, और समय निकालना भी। क्योंकि चर्बी चढ़ाने के लिये समय हमें बहुत मिल जाता है परंतु कम करने के लिये समय निकालना बहुत मुश्किल होता है, दुनिया का सबसे बड़ा सत्य यही है। शायद सभी लोग मेरी बात से सहमत भी होंगे। हम पीना चाहते हैं, जीना चाहते हैं, खाना चाहते हैं, परंतु कैसे मोटे होकर !!!!

सोचते भी हैं शुरु भी करते हैं परंतु कुछ दिन करने के बाद सब वही ढ़ाक के तीन पात, थोड़े दिन सुबह घूमने गये पूरे जोश के साथ फ़िर वो जोश और जुनून उतर गया और आ गये वापिस अपनी वाली पर, फ़िर जिम जाना शुरु किया फ़िर वो भी बंद कर दिया, अब ये हालत है कि कोई पूछता है कि भई नया क्या शुरु किया है, तो अपनी बगलें झाँकने लगते हैं। अब तो हम यही बोलने लगे हैं हाँ सुबह ५-७ किलोमीटर घूम लेते है और दौड़ भी लेते हैं, उठने के पहले। 🙂

अब और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का। शायद मोटे लोग ओह !!!! माफ़ कीजियेगा हैल्थी लोग ही कुछ नया नुस्खा बताकर मेरी मदद करेंगे और अपनी भी।

एन.सी.सी. के साथ गणतंत्र दिवस की कुछ यादें जो हमेशा रहेंगी पर क्या नयी पीढ़ी इस महत्व को समझ पायेगी या इसे केवल छुट्टी ही मानेगी मौज मस्ती के लिये… (My unforgettable experience on Republic Day with NCC)

    जब हम कॉलेज में पढ़ते थे तो साथ में एन.सी.सी. में भी थे और उस समय मिलेट्री का जुनून था, कि बस कैसे भी करके मिलेट्री में जाने का मौका मिल जाये, पर नहीं जा पाये। पर जितना हम एन.सी.सी. में कर सकते थे उतना किया।

    मैं एन.सी.सी. में अपने कॉलेज का सीनियर अंडर ऑफ़िसर था और मुझे शुरु से ही अनुशासन पसंद था इसलिये मुझे एन.सी.सी. में मजा भी बहुत आता था, गणतंत्र दिवस आने के पहले ही हम लोग अपनी ड्रिल का जबरदस्त अभ्यास करते थे, वैसे तो ड्रिल हर सप्ताह दो दिन होती थी, पर गणतंत्र दिवस का मौका विशेष होता था, क्योंकि वह जिले के परेड ग्राऊँड पर होता था और हम हमारी प्लाटून का नैतृत्व करते थे। हालांकि यह मौका हमें केवल दो बार मिला गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर आज भी हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है जब हम उन दिनों को याद करते हैं। पुलिस बैंड के साथ कदम से कदम मिलाते हुए कम से कम १० दिन अभ्यास करना पड़ता था और एक दिन पहले मोक ड्रिल होती थी, पूरे दो घंटे का कार्यक्रम होता था, जिसमें पूरे जिले के गणमान्य लोग और स्कूल के बच्चे और जिले के लोग आते थे।

    हम अपने अभिभावकों को भी बुलाया करते थे कि आईये देखिये आपका बेटा एक प्लाटून का नैतृत्व कर रहा है, जिले के परेड ग्राऊँड में। हमें टू नॉट टू बंदूकें दी जाती थीं जिसे लेकर हम परेड ग्राऊँड में परेड करते थे और सलामी देते थे। अपनी ड्रेस को चरक करते थे, जितने भी केम्प हमने किये थे सब के बैज अपने सीने पर सजा लेते थे, बैल्ट भी पोलिश की हुई होती थी, टोपी का बैज धातु चमकाने की पोलिश से चमकाते थे,  जूते बिल्कुल ऐसे पॉलिश करते थे जिसमें अपना मुँह तक देख पायें (हमारे हवलदार की भाषा में जो कि मिलिट्री से होते थे)।

    हम परेड ग्राऊँड पर जाकर खड़े हो जाते थे, पहले परेड के अतिथि परेड का निरिक्षण करते थे जिसमें कौन सा प्लाटून किसका है और उसे कौन नैतृत्व कर रहा है, बताया जाता था,  फ़िर सलामी होती थी और फ़िर राष्ट्रीय गान और फ़िर ड्रिल जिसमें मुख्य मंच के सामने से अतिथि को और राष्ट्रीय ध्वज को सलामी सम्मान देते हुए निकलते थे।

    आज भी वो दिन याद करते हैं तो हमारी आँखें चमक उठती हैं, सीने में देशभक्ति की ज्वाला जलने लगती है। अफ़सोस कि हम मिलिट्रि में न जा पाये।

    पर हम तक तो ठीक था, पर अब आज की भावी पीढ़ी, भविष्य के कर्णधारों को इस बात का कैसे अहसास होगा पता नहीं, वे अपने देश के लिये कभी भक्त भी बनेंगे या नहीं, क्योंकि देशभक्ति एक जज्बा होता है जो कि एक समूह से आता है, न कि घर पर बैठकर टी.वी. और चैट करने से।

    देशभक्ति के कार्यक्रमों में शामिल होना पड़ता है नहीं तो भावी पीढ़ी के लिये तो मौज मस्ती के लिये छुट्टी से ज्यादा कुछ नहीं है हमारे गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस।

    आप बतायें कि आप आखिरी बार कब परेड ग्राऊँड पर गये और अपने बच्चों को लेकर कब गये। या घर पर रहते हैं तो टी.वी. पर भी देखना पसंद नहीं करते हैं।