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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – ४

मेघदूतम़् में यक्ष को एक वर्ष अपनी यक्षिणी से दूर रहने का शाप मिला है, यक्ष रामगिरी पर्वत के आश्रम में निवास करता है और यक्षिणी अलकापुरी हिमालय पर निवास करती है।
शाप का कारण – कवि ने शाप का कारण यक्ष द्वारा अपने कार्य से असावधानी करना बताया है, परंतु साफ़ साफ़ नहीं बताया गया है कि शाप
का कारण क्या था। कुछ विद्वानों के अनुसार –

  • ब्रह्मपुराण में शाप का कारण स्वामी की पूजा के लिये फ़ूलों का न लाना बताया गया है।
  • कुबेर के उद्योगों की ठीक प्रकार से रक्षा न करना मानते हैं।
  • यक्ष ने अपने गण की प्रथा के अनुसार सुहागरात को अपनी पत़्नी पर गणपति के अधिकार को सहन नहीं किया, अत: गण के नियम के अनुसार उसे एक वर्ष का प्रवास अंगीकार करना पड़ा।

शाप की अवधि देवोत्थान एकादशी को जब विष्णु भगवान शेष शय्या से उठेंगे उसी दिन मेरा शाप खत्म होगा। अत: यह स्पष्ट होता है कि यक्ष को शाप देवोत्थान एकादशी के दिन ही दिया गया होगा।
कवि ने यक्ष का नाम भी नहीं दिया है क्योंकि उसने स्वामी की आज्ञा का पालन नहीं किया और ऐसे व्यक्ति का नाम देना परम्परा से निषिद्ध था।
यक्ष देवताओं की ही श्रेणी है। ’अष्टविकल्पो देव:’ इस उक्ति के अनुसार – ब्रह्मा, प्रजापति, इन्द्र, पितृगण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और पिशाच ये देवताओं के आठ भेद हैं। यक्षों का कार्य कुबेर के उद्यान की रक्षा करना है।
रामगिरि पर्वत जहाँ यक्ष ने एक वर्ष व्यतीत किया था, प्रसिद्ध टीकाकार वल्लभ मल्लिनाथ ने इस रामगिरि कोचित्रकूट माना है।
ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिये ग्रन्थ के आरंभ में मंगलाचरण किया जाता है। मंगलाचरण तीन प्रकार का होता है –
१. आशीर्वादात्मक
२. नमस्क्रियात्मक
३. वस्तुनिर्देशात्मक
’आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम़्’ यहाँ इस काव्य में तीसरे प्रकार का अर्थात वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण अपनाया गया है।
सम्पूर्ण काव्य में मन्दाक्रांता छन्द का प्रयोग हुआ है, जिसके प्रत्येक पाद में १७ अक्षर होते हैं। वे मगण, भगण, नगण, तगण, और दो गुरु इस क्रम में होते हैं तथा चौथे, दसवें, सत्रहवें अक्षर पर यति होती है।
मेघदूत में विप्रलम्भ श्रंगार का वर्णन है।

ऑटो वाले का बेहतरीन डायलॉग

ऑफ़िस से घर आने के लिये ऑटो में बैठे तो उसने एक बेहतरीन डायलॉग बोला जो कि हमने उससे २-३ बार उससे सुना कि हमें याद
हो जाये और हम उसे ब्लॉग पर डाल सकें। वैसे तो ये फ़िल्मी डायलॉग लगता है परंतु हमें याद नहीं आ रहा –
“हम तो बावन पत्तों में एक पत्ते हैं, वो भी गुलाम के और गुलाम भी हुकुम का, आपके हुकुम का”
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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – 3 (महाकवि कालिदास की सात रचनाएँ भाग – २)

५. मालविकाग्निमित्र – यह श्रंगार रस प्रधान ५ अंकों का नाटक है। यह कालिदास की प्रथम नाट्य कृति है; इसलिए इसमें वह लालित्य, माधुर्य एवं भावगाम्भीर्य दृष्टिगोचर नहीं होता तो विक्रमोर्वशीय अथवा अभिज्ञानशाकुन्तलम में है। विदिशा का राजा अग्निमित्र

इस नाटक का नायक है तथा विदर्भराज की भगिनी मालविका इसकी नायिका है। इस नाटक में इन दोनों की प्रणय कथा है। “वस्तुत: यह नाटक राजमहलों में चलने वाले प्रणय षड़्यन्त्रों का उन्मूलक है तथा इसमें नाट्यक्रिया का समग्र सूत्र विदूषक के हाथों में समर्पित है।”

कालिदास ने प्रारम्भ में ही सूत्रधार से कहलवाया है –
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम़्।
सन्त: परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढ: परप्रत्ययनेयबुद्धि:॥
अर्थात पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों को बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।
वस्तुत: यह नाटक नाट्य-साहित्य के वैभवशाली अध्याय का प्रथम पृष्ठ है।
६. विक्रमोर्वशीय – यह पाँच अंकों का एक त्रोटक (उपरुपक) है, इसमें राजा पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी की प्रणय कथा वर्णित है। इसमें श्रंगार रस की प्रधानता है, पात्रों की संख्या कम है। इसकी कथा ऋग्वेद (१०/२५) तथा शतपथ ब्राह्मण (११/५/१) से ली गयी है। महाकवि कालिदास ने इस नाटक को मानवीय प्रेम की अत्यन्त मधुर एवं सुकुमार कहानी में परिणत कर दिया है। इसके प्राकृति दृश्य बड़े रमणीय हैं।
७. अभिज्ञानशाकुन्तलम़् – अभिज्ञानशाकुन्तलम़् न केवल संस्कृत-साहित्य का, अपितु विश्वसाहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है। यह कालिदास की अन्तिम रचना है। इसके सात अंकों में राजा दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रणय-कथा निबद्ध है। इसका कथानक महाभारत के आदि पर्व के शकुन्तलोपाख्यान से लिया गया है। कण्व के माध्यम से एक पिता का पुत्री को दिया गया उपदेश आज २,००० वर्षों के बाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उस समय में था।
भारतीय आलोचकों ने ’काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला’ कहकर इस नाटक की प्रशंसा की है। भारतीय आलोचकों के समान ही विदेशी आलोचकों ने भी इस नाटक की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। जब सन १७९१ में जार्जफ़ोस्टर ने इसका जर्मनी में अनुवाद किया, तो उसे देखकर जर्मन विद्वान गेटे इतने गद्गद हुए कि उन्होंने उसकी प्रशंसा में एक कविता लिख डाली थी।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – 3 (महाकवि कालिदास की सात रचनाएँ भाग १)

कालिदास ने कितने ग्रन्थों की रचना की, यह भी एक विवादित प्रश़्न है। इस विवाद का कारण है संस्कृत साहित्याकाश में एक से अधिक कालिदासों का होना। राजशेखर (१० भीं शताब्दी ई.) तक कम से कम तीन

कालिदास हो चुके थे –

एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो न केनचित़्।
श्रृङ्गारे ललितोद़्गारेकालिदास्त्रयी किमु॥
यह निर्विवाद रुप से सिद्ध है कि सात रचनाएँ तो निश्चित रुप से उसी कालिदास की हैं जो अग्निमित्र के समय में थे, शेष रचनाएँ अन्य कवियों की हैं, जिन्होंने सम्भवत: कालिदास की उपाधि धारण की होगी। इन सात रचनाओं में तीन नाटक, दो महाकाव्य तथा दो गीति काव्य हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –
१. ऋतुसंहार – यह कालिदास की सर्वप्रथम रचना मानी जाती है; क्योंकि इसकी शैली उस स्तर की नहीं है, जिस स्तर की अन्य रचनाओं की है। वस्तुत: ऋतुसंहार का मुख्य उद्देश्य भारतवर्ष की ऋतुओं से परिचय कराना था, श्रृंगार की प्रधानता नहीं। इसमें छ: सर्ग और १४४ श्लोक हैं, जिसमें कवि ने बड़े ही मनोरम ढंग से ग्रीष्म से प्रारम्भ करके बसन्त तक छ: ऋतुओं का वर्णन किया है। शरद वर्णन निस्सन्देह ऋतुसंहार का श्रेष्ठ अंश है।
२. मेघदूत – मेघदूत कालिदास की एक सशक्त रचना है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यदि कालिदास की अन्य रचनाएँ न होतीं, केवल अकेला मेघदूत ही होता तो भी उनकी कीर्ति में कोई अन्तर न पड़ता। संस्कृत-साहित्य के गीति-काव्यों में सर्वप्रथम इसकी ही गणना होती है। कालिदास की कल्पना की ऊँची उड़ान और परिपक्व कला का यह एक ऐसा नमूना है, जिसकी टक्कर का विश्व में दूसरा नहीं है। मेघदूत ’मंदाक्रांता’ में लिखा हुआ १२१ श्लोकों का एक छोटा सा काव्य है। इसके दो भाग हैं – पूर्वमेघ और उत्तरमेघ।
३. कुमारसम्भव – यह महाकवि कालिदास का प्रथम महाकाव्य है। इसकी रचना ऋतुसंहार तथा मालविकाग्निमित्र के बाद तथा रघुवंश और अभिज्ञानशाकुन्तलम़् से निश्चित रुप से पहले की है। कुमारसम्भव के १७ सर्गों में शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय के जन्म तथा उसके द्वारा देवसेना का सेनापति बन कर तरकासुर के वध की कहानी वर्णित है। काव्यशास्त्रों में उदाहरण केवल आटः सर्गों तक ही मिलते हैं तथा नाम के अनुसार कुमार का जन्म अष्टम सर्ग में ही हो जाता है और यहीं काव्य का उद्देश्य भी पूर्ण हो जाता है। कुछ विद्वान तो केवल सप्तम सर्ग तक ही कालिदास की रचना मानते हैं; क्योंकि अष्टम सर्ग में कवि ने जगज्जननी माता पार्वती के सम्भोग श्रंगार का जितना सूक्ष्म वर्णन किया है, वैसा कालिदास जैसे कवि अपने आराध्य देव का नग्न चित्रण नहीं कर सकते थे। इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि श्रंगार के नग्न वर्णन के कारण पार्वती जी क्रुद्ध हो गयी थीं और उन्होंने कालिदास को शाप दे दिया था। इसी कारण यह ग्रन्थ अपूर्ण ही रह गया था। सच्चाई चाहे जो हो, परन्तु इस काव्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। कुमारसम्भव के सारे प्रेम का वेग मंगल-मिलन में समाप्त हुआ है।
४. रघुवंश – कुछ विद्वान रघुवंश को कालिदास की अन्तिम कृति मानते हैं। परन्तु ध्यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि अभिज्ञानशाकुन्तलम़् इनकी अन्तिम कृति थी और रघुवंश उससे पहली। इसमें १९ सर्ग हैं, जिसमें महाकवि ने सूर्यवंशीय राजा दिलीप से अग्निवर्ण तक २९ राजाओं का वर्णन किया है। रघुवंश एक चरित्र महाकाव्य है। इसमें दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम आदि राजाओं को आदर्श सम्राटों के रुप में चित्रित किया गया है। इसी प्रकार इन्दुमती, सीता, कुमुद़्वती आदि रानियों का भी वर्णन है। अलंकारों और रसों का पुष्ट परिपाक इस महाकाव्य में सर्वत्र देखने को मिलता है। कालिदास जिस श्लोक के कारण दीपशिखा कालिदास कहलाये वह श्लोक भी रघुवंश में ही इन्दुमती स्वयंवर में है। उपमा, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों की छटा के साथ वीर, करुण, वीभत्स, श्रंगार, आदि रसों की छटा भी दर्शनीय है।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – २

          महाकवि कालिदास के बारे में और भी किवदंतियां प्रचलित हैं-
          एक किंवदन्ती के अनुसार इनकी मृत्यु वेश्या के हाथों हुई। कहते हैं कि जिस विद्योत्तमा के तिरस्कार के कारण ये महामूर्ख से इतने बड़े विद्वान बने, उसकी ये माता और गुरु के समान पूजा करने लगे। ये देखकर उसे बहुत दु:ख हुआ और उसने शाप

दे दिया कि तुम्हारी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ से ही होगी।

      एक बार ये अपने मित्र लंका के राजा कुमारदास से मिलने गये। उन्होंने वहाँ वेश्या के घर, दीवार पर लिखा हुआ, ’कमले कमलोत्पत्ति: श्रुयते न तु दृश्यते’ देखा। कालिदास ने दूसरी पंक्ति ’बाले तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम़्’ लिखकर श्लोक पूर्ण कर दिया। राजा ने श्लोक पूर्ति के लिये स्वर्णमुद्राओं की घोषणा की हुई थी। इसी मोह के कारण वेश्या ने कालिदास की हत्या कर दी। राजा को जब यह ज्ञात हुआ तो उसने भी आवेश में आकर कालिदास की चिता में अपने प्राण त्याग दिये।
    परन्तु कालिदास की रचनाओं का अध्ययन करने पर यह किंवदन्ती नि:सार प्रतीत होती है; क्योंकि इस प्रकार के सरस्वती के वरदपुत्र पर इस प्रकार दुश्चरित्रता का आरोप स्वयं ही खण्डित हो जाता है।
    एक अन्य जनश्रुति के अनुसार कालिदास विक्रमादित्य की सभा के नवरत़्नों में से एक थे । इस किंवदन्ती का आधार ज्योतिर्विदाभरण का यह श्लोक है –
धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशकुर्वेतालभट्टं घटखर्परकालिदासा:।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते: सभायां रत़्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
     वैसे तो कालिदास के काल के बारे में विद्वानों में अलग अलग राय हैं परंतु कालिदास के काल के बारे में एक तथ्य प्रकाश में आया है, जिसका श्रेय डॉ. एकान्त बिहारी को है। १८ अक्टूबर १९६४ के “साप्ताहिक हिन्दुस्तान” के अंक में इससे सम्बन्धित कुछ सामग्री प्रकाशित हुई। उज्जयिनी से कुछ दूरी पर भैरवगढ़ नामक स्थान से मिली हुई क्षिप्रा नदी के पास दो शिलाखण्ड मिले, इन पर कालिदास से सम्बन्धित कुछ लेख अंकित हैं। इनके अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि “कालिदास अवन्ति देश में उत्पन्न हुए थे और उनका समय शुड़्ग़ राजा अग्निमित्र से लेकर विक्रमादित्य तक रहा होगा।”  इस शिलालेख से केवल इतना ही आभास होता है कि यह शिलालेख महाराज विक्रम की आज्ञा से हरिस्वामी नामक किसी अधिकारी के आदेश से खुदवाया गया था।
      शिलालेखों पर लिखे हुए श्लोकों का भाव यह है कि महाकवि कालिदास अवन्ती में उत्पन्न हुए तथा वहाँ विदिशा नाम की नगरी में शुड़्ग़ पुत्र अग्निमित्र द्वारा इनका सम्मान किया गया था। इन्होंने ऋतुसंहार, मेघदूत, मालविकाग्निमित्र, रघुवंश, अभिज्ञानशाकुन्तलम़्, विक्रमोर्वशीय तथा कुमारसम्भव – इन सात ग्रंथों की रचना की थी। महाकवि ने अपने जीवन का अन्तिम समय महाराज विक्रमार्क (विक्रमादित्य) के आश्रय में व्यतीत किया था। कृत संवत के अन्त में तथा विक्रम संवत के प्रारम्भ में कार्तिक शुक्ला एकादशी, रविवार के दिन ९५ वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हुई। कालिदास का समय ईसा पूर्व ५६ वर्ष मानना अधिक उचित होगा।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १

मैंने महाकवि कालिदास का खण्डकाव्य ’मेघदूतम’ पढ़ा, और बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ मिली जो हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई हैं, जो कि मुझे लगा कि वह पढ़ने को सबके लिये उपलब्ध

होना चाहिये।

कालिदस
एक जनश्रुति के अनुसार कालिदास पहले महामूर्ख थे। राजा शारदानन्द की विद्योत्तमा नाम की एक विदुषी एवं सुन्दर कन्या थी। उसे अपनी विद्या पर बड़ा अभिमान था। इस कारण उसने शर्त रखी कि जो किई उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा उसी से ही वह विवाह करेगी। बहुत से विद्वान वहाँ आये, परंतु कोई भी उसे परास्त न कर सका; इस ईर्ष्या के कारण उन्होंने उसका विवाह किसी महामूर्ख से कराने की सोची। उसी महामूर्ख को खोजते हुए उन्होंने जिस डाल पर बैठा था, उसी को काटते कालिदास को देखा। उसे विवाह कराने को तैयार करके मौन रहने को कहा और विद्योत्तमा द्वारा पूछे गये प्रश़्नों का सन्तोषजनक उत्तर देकर विद्योत्तमा के साथ विवाह करा दिया। उसी रात ऊँट को देखकर पत़्नी द्वारा ’किमदिम ?’ पूछने पर उसने अशुद्ध उच्चारण ’उट्र’ ऐसा किया।
विद्योत्तमा पण्डितों के षड़़यन्त्र को जानकर रोने लगी और पति को बाहर निकाल दिया। वह आत्महत्या के उद्देश्य से काली मन्दिर गया, किन्तु काली ने प्रसन्न होकर उसे वर दिया और उसी से शास्त्रनिष्णात होकर वापिस पत़्नी के पास आकर बन्द दरवाजा देखकर ’अनावृत्तकपाटं द्वारं देहि’ ऐसा कहा। विद्योत्तमा को आश़्चर्य हुआ और उसने पूछा – ’अस्ति कश़्चिद वाग्विशेष:’। पत़्नी के इन तीन पदों से उसने ’अस्ति’ पद से ’अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा’ यह ’कुमारसम्भव’ महाकाव्य, ’कश़्चिद’ पद से ’कश़्चित्कान्ताविरहगरुणा’ यह ’मेघदूत’ खण्डकाव्य, ’वाग’ इस पद से ’वागर्थाविव संपृक़्तौ’ यह ’रघुवंश’ महाकाव्य रच डाला।

चम्पू की कविता CHAMPU KI KAVITA

एक ईमेल में यह कविता आई थी, अच्छी लगी आप भी देखिये –

        Pareshaan thi Champu ki wife

        Non-happening thi jo uski life

        Champu ko na milta tha aaram

        Office main karta kaam hi kaam

       

        Champu ke boss bhi the bade cool

        Promotion ko har baar jate the bhul

        Par bhulte nahi the wo deadline

        Kaam to karwate the roz till nine

       

        Champu bhi banna chata tha best

        Isliye to wo nahi karta tha rest

        Din raat karta wo boss ki gulami

        Onsite ke ummid main deta salami

       

        Din guzre aur guzre fir saal

        Bura hota gaya Champu ka haal

        Champu ko ab kuch yaad na rehta tha

        Galti se Biwi ko Behenji kehta tha

       

        Aakhir ek din Champu ko samjh aaya

        Aur chod di usne Onsite ki moh maya

        Boss se bola, "Tum kyon satate ho ?"

        "Onsite ke laddu se buddu banate ho"

       

        "Promotion do warna chala jaunga"

        "Onsite dene par bhi wapis na aunga"

        Boss haans ke bola "Nahi koi baat"

        "Abhi aur bhi Champus hai mere paas"

       

         "Yeh duniya Champuon se bhari hai"

        "Sabko bas aage badhne ki padi hai"

        "Tum na karoge to kisi aur se karunga"

        "Tumhari tarah Ek aur Champu banaunga"

      

         (WAKE UP CHAMPU)

उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – २

१७ अगस्त बाबा महाकाल की शाही सवारी का दिन, इस बार सवारी का अगला सिरा और पिछला सिरा लगभग ७ किलोमीटर लंबा था, पहले शासकीय पूजा होती है फ़िर राजा महाकाल अपनी यात्रा मंदिर से लगभग शाम ४ बजे शुरु करते हैं, वहाँ से सवारी रामघाट पहुँचती है क्षिप्रा नदी के किनारे, वहाँ पूजन कर फ़िर सवारी अपने निर्धारित मार्ग से गोपाल मंदिर और फ़िर वापिस महाकाल लगभग शाम १०.४५ बजे पहुँच जाती है।

राजा महाकाल की शाही सवारी में उनके सारे मुखौटे साथ में चलते हैं जो कि वे अपनी पिछली सवारी में धारण कर चुके होते हैं, शाही सवारी में सबसे आगे पुलिस बैंड, घुड़सवार पुलिस, हाथी, अखाड़े, मलखम्ब, स्थानीय लोग, स्थानीय भक्त मंडल, गणमान्य नागरिक फ़िर राजा महाकाल की पालकी होती है। सवारी मार्ग के दोनों तरफ़ स्थानीय लोगों द्वारा स्वागत मंच भी बनाये गये थे, जहाँ से माईक से उदघोषणा भी की जा रही थी और राजा महाकाल की आगवानी भी की जा रही थी।

राजा महाकाल की शाही सवारी का वीडियो देखिये –


हमारे बेटेलाल को तो बड़ा मजा आया, उन्हें सवारी मार्ग में हमने अपना हाथ पकड़कर खड़ा कर दिया, इसके पहले उन्हें हम अपनी गोद और कंधे की सवारी करवा चुके थे। किसी मंडल ने अपनी झांकी बहुत अच्छे से सजायी थी तो किसी के समूह में भगवान के भेष धारण कर लोग चल रहे थे, बिल्कुल सजीव लग रहे थे, एक मंडल ने तो भगवान कृष्ण का इतना सुंदर भेषप्रबंधन किया था कि वो तो सजीव ही लग रहे थे। पूरा सवारी मार्ग फ़ूलों से पटा पड़ा था, सब सवारी में शामिल लोगों और राजा महाकाल का स्वागत फ़ूलों से कर रहे थे।

इस बार तो रिकार्डतोड़ भीड़ थी, सवारी मार्ग में तो प्रशासन का भीड़ प्रबंधन लगभग नहीं के बराबर था जबकि उज्जैन प्रशासन को सिंहस्थ के कारण भीड़ प्रबंधन का बहुत अच्छा अनुभव है, फ़िर भी आम आदमी को धक्के खाने के लिये छोड़ दिया गया था।सवारी मार्ग में पैर रखने की जगह नहीं थी, मार्ग के दोनों ओर के भवनों के छज्जे पर भी लोग टकटकी लगाये खड़े थे, कोई जगह ऐसी नहीं थी कि जहाँ जगह खाली छूट गयी हो, हर जगह मानव ही मानव। गाँव वाले केवल राजा महाकाल की शाही सवारी के दर्शन के लिये आये थे तो उनके पास उनकी गठरी या नया प्रचलन बैग था, और वे उसे लेकर ही राजा महाकाल के दर्शन की आस लिये थे।

हमने भी अपने बेटेलाल को अपने घर का पता याद करवाया और आपात स्थिती से निपटने के लिये उनकी जेब में अपने घर का पता और फ़ोन नं रख दिया और समझा दिया कि अगर हमसे अलग हो भी जाओ तो घबराना मत किसी भी पुलिस अंकल को पकड़ लेना और अपना पता बता देना नहीं तो उनको बोल देना कि मेरी जेब में मेरा पता है, मुझे घर पहुँचवा दीजिये। हमारे बेटेलाल भी खुश कि आज उनकी इतनी चिंता हो रही है। सवारी में पहुँचने के बाद भी बेटेलाल पता याद कर रहे थे अगर कहीं कोई कन्फ़यूजन होता तो झट हमसे वापिस पता पूछ लेते।

राजा महाकाल की सवारी के दर्शन करने के बाद हम वापिस अपने घर को लौट चले तो भी अद्भुत जनसैलाब था। शाही सवारी में आज से कुछ सालों पहले मतलब सिंहस्थ के पहले इतनी भीड़ नहीं आती थी। बहुत आराम से राजा महाकाल के दर्शन होते थे और हम भी अपनी मित्र मंडली के साथ राजा महाकाल की यात्रा में शामिल हुआ करते थे, पर धीरे धीरे आस्था का सैलाब उमड़ने लगा और अब यह यहाँ उज्जैन के लिये लोकोत्सव हो गया है। जिसमें शामिल होकर हरेक जन अपने को धन्य मानता है।

“राजाधिराज महाकाल महाराज की जय”

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भाग – १ के लिये यहाँ चटका लगाईये।

राजा महाकाल की सवारी के ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ चटका लगाईये।


उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – १

      हम उज्जैन गये थे 5 दिन की छुट्टियों पर, और खासकर गये थे महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन करने के लिये। पहले ही दिन १४ अगस्त को जन्माष्टमी थी, हम अपनी धर्मपत्नी के साथ निकले भ्रमण पर, दर्शन किये गये गोपाल मंदिर के जहां गिरधर गोपाल की बहुत ही सुन्दर, मनभावन रुप के दर्शन हुए, और पूरा गोपाल मंदिर जगमगा रहा था, भव्य लाईटिंग की गई थी। गोपाल मंदिर सिंधिया परिवार ने बनवाया था और आज भी यह ट्रस्ट उन्हीं के पास है, शाही सवारी वाले दिन और बैकुण्ठ चतुर्दशी “हरिहर मिलन” वाले दिन आज भी सिंधिया परिवार से आकर महाकाल बाबा की आगवानी और पूजन करते हैं। इस बार शाही सवारी पर ज्योतिरादित्य सिंधिया आगवानी के लिये आये थे।

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       फ़िर चले हम महाकाल बाबा के दर्शन करने के लिये थोड़ी सी भीड़ थी, फ़िर भी बहुत जल्दी दर्शन हो लिये, और फ़िर वही क्रम साक्षी गोपाल, बाल विजय मस्त हनुमान के दर्शन और फ़िर क्षिप्रा नदी का किनारा। परम आनंद की अनुभूति होती है।

        फ़िर १६ अगस्त को हम गये क्षिप्राजी की आरती में । क्षिप्रा नदी बहुत प्राचीन नदी है, महाकवि कालिदास के मेघदूतम में भी इसका वर्णन मिलता है, क्षिप्रा का मतलब होता है “ब्रह्मांड में सबसे तेज बहने वाली नदी”। फ़िर वहाँ से सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी और शक्तिपीठ माँ हरसिद्धी की आरती में, माँ हरसिद्धी की सवारी सिंह मंदिर के बाहर शोभायमान था और माँ हरसिद्धी के दर्शन करके आत्मा तृप्त हो गई, हम आरती के समय गये थे और भव्य आरती में शामिल होकर आनंद में भक्तिभाव से सारोबार हो गये। कहते हैं कि ये जागृत शक्तिपीठ है और आप इसका अहसास यहाँ संध्याकालीन आरती में शामिल होकर कर सकते हैं। फ़िर चल दिये घर की ओर महाकाल बाबा के शिखर दर्शन करके। कहते हैं कि महाकाल बाबा के दर्शन से जितना पुण्य मिलता है, शिखर दर्शन से उसका आधा पुण्य मिलता है।

        घर जाते समय सवारी मार्ग की रौनक तो देखते ही बनती थी, पूरा सवारी मार्ग दुल्हन की तरह से सजाया गया था, भव्य लाईटिंग थी और भव्य मंच स्वागत के लिये। वहीं बीच में छत्री चौक पर फ़ेमस कुल्फ़ी खाई जो कि बहुत फ़ेमस है, और हमारे बेटेलाल को बहुत पसंद है।

महाकाल की शाही सवारी का वर्णन अगले भाग में –

महाकाल की शाही सवारी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिये चटका लगायें।

15 अगस्त पर हम छुट्टी पर थे, इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से हारेगा तू हर बाज़ी जब खेलें हम जी जन से

15 अगस्त पर हम छुट्टी पर थे और ये पोस्ट हम छापना ही भूल गये अब पढ़ लीजिये।

इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से
हारेगा तू हर बाज़ी जब खेलें हम जी जन से

यह गाना है अमिताभ बच्चन की फिल्म "मैं आजाद हूं" से है जो की सुदेश भौ्सले ने गाया है | यह गाना नौजवानों में एक नया जोश भर देता है|