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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

मिश्रधन की शक्ति देखिये इस दुनिया का आठवां आश्चर्य – एक कहानी (Power of Compounding – 8TH WONDER OF THE WORLD – A Tale)

लंबे समय में अगर धन को रिकरिंग जमा किया जाता है तो उसकी शक्ति को
प्रदर्शित करती यह कहानी –

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १०

मेघ को नायक और निर्विन्ध्या नदी को नायिका बनाते हुए कालिदास कहते हैं कि नायिका के कमर पर बाँधी हुई करधनी, झन-झन करती हुई कामोद्दीपक मानी जाती है। तरंगों के चलायमान होने पर शब्द करते हुए पक्षियों की पंक्तियाँ निर्विन्ध्या की करधनी मानी गयी है।
प्रणयवचनम़् – जिस प्रकार नायिका कमर की करधनी की झंकार बढ़ाकर मदमाती चाल से बार बार नाभी प्रदर्शन द्वारा नायक प्रणय का निमन्त्रण देती है, उसी प्रकार

निर्विन्ध्या भी तरंगों के चलने से शब्द करते हुये पक्षियों की पंक्तियों से, पत्थरों पर लड़खड़ा कर बहने से अर्थात मदमाती चाल से तथा बार बार भँवरों के प्रदर्शन से अपने नायक मेघ को प्रणय का निमन्त्रण दे रही है।हाव भाव के द्वारा ही प्रेमिका प्रेमी को प्रणय का प्रथम वचन कहती है, मुख से नहीं बोलती, अपितु इस प्रकार अंग प्रदर्शन करती है ये ही उसके प्रणय वचन है।

नदी को विरहणी नायिका का आरोप किया गया है, इसलिए उसकी क्षीण जलधारा को वेणी कहा गया है। प्राचीन काल में विरहिणी स्त्रियाँ केशों की केवल एक वेणी बनाती थीं। रतिरहस्य के अनुसार यहाँ पाँचवी कामावस्था का वर्णन किया गया है –
नयनप्रीति: प्रथमं चित्राऽऽसड़्गस्ततोऽथ सड़्कल्प:।
निद्राच्छेदस्तनुता विषयनिवृत्तिस्त्रपानाश:॥
उन्मादो मूर्च्छा मृतितित्येता: स्मरदशा: दशैव स्यु:।
अर्थात पहली नेत्र प्रीति, दूसरी चित्र की आसक्ति, तीसरी संकल्प, चौथी निद्रानाश, पाँचवी कृशता, छठी शब्द स्पर्श आदि विषयों की निवृत्ति, सातवीं लजजानाश, आठवीं पागलपन, नवीं मूर्च्छा और दसवीं मृत्यु – इस प्रकार दस कामावस्थायें हैं।
काली सिन्धु – मालवा में काली सिन्धु नाम की एक छोटी पहाड़ी नदी है, जो कि चम्बल की सहायक है। यह नदी जिला धार, तहसील बागली में बरझेरी ग्राम के पास विन्ध्य पर्वत के २३७० फ़ीट ऊँचे शिखर से निकलती है।

क्या मेरे दिन अच्छे चल रहे हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा आप ही बतायें…

अभी इस बार की पूछी गई ताऊ पहेली में हम द्वितिय विजेता और विवेक सिंह जी द्वारा जारी की गई प्रहेलिका में भी विजेता घोषित हुए हैं।
पर हमारे बेटेलाल की तबियत कुछ नासाज चल रही है, सर्दी, जुकाम, बुखार सब है डाक्टर को भी दिखाया और दवाई भी दिलाई, डाक्टर ने तो म्यूनिसिपल हस्पताल को रिफ़र कर दिया कि वहाँ टॉमीफ़्लू की गोलियां मुफ़्त मिलती हैं,

पर साथ ही कहा कि अगर आपका बच्चा किसी के संपर्क में नहीं आया है तो यह एक साधारण फ़्लू ही है। हम भी सोचे कि तीन दिन तो बीमारी का असर होता ही है, एक – दो दिन बाद देखते हैं।

फ़िर घूमते घूमते हमारे पैर में छाला पड़  गया और बहुत ही तकलीफ़देह हो गया है हमारे लिये तो। पर आज सुबह उस नामुराद को फ़ोड़ कर हम फ़िर घूम आये। अब तकलीफ़ कम है।
कल हमारे बेटेलाल के कम्प्यूटर में विन्डोज का logon process वाला बग आ गया चूँकि विन्डोज एक्सपी है और उस पर हमारा कुछ डाटा भी नहीं है इसलिये फ़टाफ़ट से फ़ोर्मट कर वापिस संस्थापित कर दिया, और अपनी पैन ड्राईव से गेम्स वापिस कम्प्यूटर को ट्रांसफ़र कर दिये गये। हम भी खुश कि हमारा लेपटॉप अब बेटेलाल से फ़्री हो गया और हम ब्लॉगिंग कर सकेंगे, और बेटेलाल भी खुश कि अब अपने कीबोर्ड और माऊस से गेम खेलने को मिलेंगे। हमारे बेटेलाल के मनपसंद गेम – हरक्यूलिस, रोडरेश, मारियो और भी बहुत सारे।
तो बस फ़ोकट में २ दिन हम्माली करते हुए निकल गये। और ऊपर से घरवाली का डायलाग कि लोगों को पांच दिन काम करने के बाद दो दिन की छुट्टी मिलती है और हमें वो दो दिन पांच दिन से भी ज्यादा काम करना पड़ता है। तो हम भी राहत देने के भाव से बोलते हैं कि चलो डियर दोपहर को काली दाल की खिचड़ी ही बना लो कम से कम पेट की ज्वाला तो शांत हो जायेगी और तुम्हें ज्यादा काम भी नहीं करना पड़ेगा।
तो बस ऐसे ही एक और सप्ताहांत निकल गया।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ९

वेत्रवती – प्राचीन कालीन वेत्रवती को आधुनिक युग की बेतवा नाम से जाना जाता है और उसके किनारे विदिशा नगर था जो दशार्ण देश की राजधानी था। यह विन्ध्याचल के उत्तर से निकलती है तथा भिलसा (प्राचीन काल का विदिशा)  में होती हुई कालपी के निकट यमुना नदी में मिल जाती है।
विदिशा नगरी में वेश्याएँ स्वच्छन्द विहार करती हुई, पर्वत की कन्दराओं में पहुँचकर वहाँ के नागरिकों के साथ रमण

करती थीं। वेश्याएँ अपने शरीर पर इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य इतनी मात्रा में लगाती थीं कि जिससे उस पर्वत की कन्दराएँ सुगन्धित हो उठती थीं।
उज्जयिनी – उज्जयिनी प्राचीन काल में अवन्ति देश की राजधानी थी, यह शिप्रा नदी के तट पर स्थित है और यहाँ पर महाकाल शंकर का मन्दिर है। अनेक स्थलों पर इसे राजा विक्रमादित्य की राजधानी भी कहा गया है। इसे विशाला तथा अवन्ति भी कहते हैं। मोक्ष प्रदान करने वाली सात पुरियों में इसकी भी गणना की गयी है –
अयोध्या मथुरा मायाकाशी काञ्ची ह्मवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:॥
इस प्रकार इस श्लोक से प्रकट होता है कि कालिदास का उज्जयिनी के प्रति विशेष झुकाव है; क्योंकि मेघ के सीधे मार्ग में उज्जयिनी नहीं आती है, फ़िर भी यक्ष उससे आग्रह करता है कि तू उज्जयिनी होकर अवश्य जाना, भले ही तेरा मार्ग वक्र हो जाये।
उज्जयिनी का वर्णन – उज्जयिनी की सुन्दरियाँ शाम को महलों पर खड़ी होती हैं या घूमती हैं। (यक्ष मेघ से कह रहा है -)जब तुम्हारी बिजली चमकेगी तो उनकी आँखें भय के कारण चञ्चल हो उठेंगी, अत: यदि तुमने इन दृश्य को नहीं देखा तो वास्तव में तुम जीवन के वास्तविक आनन्द से वञ्चित रह जाओगे।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ८

किरात आदि कुछ विशेष जातियाँ जंगल में घूमती रहती हैं। उनकी स्त्रियाँ लकड़ी, फ़ल, शहद आदि एकत्र करने के लिये इधर-उधर घूमती रहती हैं। वहीं जंगल में पत्तों की शय्या बनाकर कुंञ्जों में अपने पति के साथ रमण

करती हैं। यक्ष मेघ से उन कुञ्जों को देखकर आनन्द लेने का संकेत करता है।

मेघों की गति – मेघ जब जल से युक्त रहते हैं तो उनकी गति धीमी रहती है। वर्षा द्वारा जल बरसा देने पर वे हल्के हो जाते हैं और उनकी गति तीव्र हो जाती है।
रेवा – नर्मदा का ही दूसरा नाम रेवा है। यह आम्रकूट पर्वत से निकलती है। भारतवर्ष की पवित्र सात नदियों में से यह भी एक है। एक स्थल पर इस प्रकार कहा गया है – ’गंगा स्नानेन यत्पुण्यं रेवादर्शनेन च।”’ अर्थात गंगा स्नान करने जितना पुण्य रेवा के दर्शन करने मात्र से मिलता है।
नर्मदा जामुन के निकुञ्जों में होकर बहती है। आषाढ़ मास में जामुन के फ़ल पकते हैं। निकुञ्ज नर्मदा के वेग को मन्द कर देते हैं तथा जामुन का फ़ल उसके जल में मिश्रित हो जाता है, जिस कारण उसका जल स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है।
आयुर्वेद के अनुसार वमन करने के बाद कफ़ का शोषण करने के लिये लघु, कड़वा और कषाय पानी पिलाने से वात प्रकोप नहीं होता।
मानयिष्यन्ति – प्राय: पुरुष स्त्रियों का आलिंगन करने के लिये उतावले रहते हैं और वे ही अपनी ओर से पहल किया करते हैं। परन्तु जब मेघ की गर्जना को सुनकर भयभीत होकर स्त्रियाँ स्वयं ही अपनी ओर से पहल करके अपने प्रिय सिद्ध पुरुषों का आलिंगन करेंगी, तो सिद्ध पुरुष बहुत ही प्रसन्न होंगे। इस कारण मेघ को धन्यवाद देंगे और उसके कृतज्ञ होंगे।
शुक्लापाङ्ग – मोरों की आंखे के कोये (कोने) श्वेत होते हैं इसलिये इन्हें शुक्लापाङ्ग भी कहते हैं।
ऐसा भी प्रसिद्ध है कि वर्षा ऋतु में मयूर जब मस्त होकर नाचते हैं, तो उनकी आंखों से आँसू गिरते हैं, जिन्हें पीने से मोरनी गर्भवती हो जाती हैं।

irctc.co.in रेल्वे का मिला जुला खेल या इस सरकारी तंत्र के पास संसाधनों Infrastructure की कमी

हम irctc.co.in साईट का उपयोग करते ही रहते हैं क्योंकि हम या हमारे घर में से या फ़िर हमारे किसी न किसी परिचित का टिकिट हम करवाते ही रहते हैं। इस पर भी बहुत बड़ा खेल चल रहा है कहने को तो इंटरनेट के जरिये बहुत ही अच्छी सुविधा मुहैया करवा दी है परंतु अभी भी इसमें बहुत सारे झोल हैं। जिससे irctc या रेल्वे संसाधनों की कमी बताकर तो हाथ नहीं झाड़ सकती है। और जो भी यात्री इंटरनेट से टिकिट करवाते हैं उनके लिये तो कुछ विशेष

छूट होनी चाहिये क्योंकि इससे उनका मेनपावर बच रहा है, जैसे बैंकों में एटीएम से राशी निकास में बैंक को कम खर्च उठाना पड़ता है परंतु अगर ग्राहक बैंक कैश काऊँटर से जाकर निकासी करेगा तो ज्यादा खर्चा होगा, बैंकों ने अपना खर्च कम करने के लिये एटीएम की संख्या बढाना शुरु किया था।

irctc को नियमित ग्राहकों को लुभाने के लिये कोई अच्छी स्कीम देनी चाहिये पर वह तो उन ग्राहकों से ज्यादा शुल्क लेने में लगी है, जो रेल्वे के मेनपावर को बचा रहा है, वाह री मेरी अनपढ़ रेल्वे को चलाने वाली सरकार, तानाशाह डिपार्ट्मेंट।
अगर मुझे मुंबई राजधानी से रतलाम से दिल्ली की यात्रा करनी है और अगर रतलाम से दिल्ली कोटे में सीट उपलब्ध है और अगर मैं irctc से टिकिट करवाता हूँ तो वेटिंग का टिकिट प्राप्त होगा परंतु अगर मैं रेल्वे स्टेशन जाकर रिजर्वेशन करवाता हूँ और तो मुझे कन्फ़र्म टिकिट मिलेगा। पता नहीं क्या खेल है यह या तो इनके सोफ़्टवेयर में ही कुछ प्राब्लम है या फ़िर कोई खेल है।
अब तत्काल की ही बात लें, तत्काल टिकिट रिजर्वेशन के लिये २ दिन पहले खुलता है सुबह आठ बजे, अगर मुझे मुँबई से उज्जैन जाना है तो मुझे उसके लिये अवन्तिका एक्सप्रेस का टिकिट लेना होता है, टिकिट विन्डो को देखे भी अब मुझे शायद दो साल से ज्यादा समय हो गया अब तो irctc से या फ़िर एजेन्ट से करवाते हैं। पीक टाईम पर सुबह चार पाँच बजे से तत्काल टिकिट के लिये लाईन लगना शुरु हो जाती है और फ़िर टिकिट विन्डो वाले लोगों की तानाशाही, टिकिट विन्डो खोलते ही पाँच मिनिट बाद हैं और इतने में तो खेल हो जाते हैं। जैसे अवन्तिका एक्सप्रेस में स्लीपर में १८३ और ३एसी में ४४, २एसी में १४ सीटें तत्काल के लिये आरक्षित होती हैं। इतनी सीटें होने पर भी लगभग ८.०२ बजे ही वेटिंग आ जाता है, और irctc पर server failure का एरर मैसेज मुँह चिढ़ा रहा होता है।
इस एरर मैसेज के लिये हमने कई बार ग्राहक सेवा से संपर्क कर खीज उतारने की कोशिश की पर हमेशा जबाब मिलता कि कृप्या दोबारा कोशिश करें, पर अगर आप एजेन्ट को टिकिट करने के लिये देते हैं तो हमेशा कन्फ़र्म मिलता है, पता नहीं इन एजेन्टों के साथ रेल्वे की क्या सेटिंग है। एजेन्ट पीक टाईम पर रिजर्वेशन चार्ज ६०० रुपये तक लेते हैं भले ही टिकिट ४५० रुपयों का हो।
पता नहीं रेल्वे का सोफ़्टवेयर इस सरकारी तंत्र से कब बाहर निकल पायेगा पर फ़िर भी हम ईमानदारी से टिकिट मिलने की आशा करते हैं, आशा करते हैं कि कोई रेल्वे का अधिकारी इसे पढ़ेगा और व्यवहारिक रुप से खोजबीन कर कुछ सुधार करेगा।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ७

प्रेमाश्रु – ग्रीष्म ऋतु की भयंकर गर्मी पर्वत को तपा डालती है तथा जब प्रथम वर्षा की बूँदें उस पर गिरती हैं तो उसमें से वाष्प निकलती है। आषाढ़ में लम्बे समय के बाद पर्वत जब मेघ से मिलता है, तो उसकी बूँदों से पर्वत से गर्म-गर्म वाष्प निकलती है। कवि ने कल्पना की है कि वे विरह के आँसू निकल रहे हैं।
पत्थरों से टकराने के कारण नदियों का जल हल्का व
स्वास्थ्यकारी माना जाता है।
इन्द्रधनुष वल्मीक के भीतर स्थित महानाग की मणि के किरण समूह से उत्पन्न होता है। कुछ इसे शेषनाग के कुल के सर्पों के नि:श्वास से उत्पन्न बताते हैं। वराहमिहिर ने इन्द्रधनुष की उत्पत्ति के विषय में इस प्रकार लिखा है – ’सूर्यस्य विविधवर्णा: पवनेन विघट्टिता: करा: साभ्रं वियति धनु:संस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनु:।’ अर्थात जो सूर्य की अनेक वर्णों की किरणें वायु से बिखरी हुई होकर मेघ-युक्त आकाश में धनुष के आकार की दिखलायी देती हैं, उसे इन्द्रधनुष कहते हैं।
ग्रामीण स्त्रियाँ नागरिक स्त्रियों की अपेक्षा भोली-भाली होती हैं तथा वे कटाक्षपात आदि श्रृंगारिक चेष्टाओं से अनभिज्ञ रहती हैं।
आम्रकूट पर्वत – आम्रकूट नाम वाला पर्वत, इसका यह नाम सार्थक है, क्योंकि इसके आस-पास के जंगलों में आम के वृक्ष अधिकता में पाये जाते हैं। यह विन्ध्याचल पर्वत का पूर्वी भाग है। यहाँ से नर्मदा नदी निकलती है। आधुनिक अमरकण्टक को आम्रकूट माना जाता है।
विमखो न भवति – कोई भी व्यक्ति पहले किये गये उपकारों को नहीं भूलता है और फ़िर यदि कोई मित्र, जिसने उसके ऊपर उपकार किये हैं, उसके पास आता है तो वह उन पूर्व उपकारों को सोचकर उसका स्वागत करता है तथा यथासम्भव सहायता भी करता है।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ६

विरहणी स्त्रियों का चित्रण – जिन स्त्रियों के पति परदेश चले गये हैं, ऐसी स्त्रियां शारीरिक श्रृंगार नहीं करती हैं। ऐसी स्थिती में उनके केश  बिखरे होने के कारण मुख और आंखों पर आये हुए हैं। वे स्त्रियाँ मेघ को देखने के कारण उन केशों के अग्रभाग को ऊपर से पकड़े होंगी।
प्राचीन काल में आधुनिक युग के समान आवागमन के साधन नहीं थे, इसलिये व्यक्ति वर्षा ऋतु अपने घर व्यतीत करते थे। शेष आठ माह घर
से बाहत अपना व्यापार, नौकरी आदि करते थे। इसी कारण हिन्दुओं के प्राय: सभी त्योहार (होली को छोड़्कर) इसी वर्षा ऋतु में होते हैं। दीपावली मनाने के बाद व्यक्ति बाहर चले जाते थे और वर्षा आरम्भ होने के साथ ही अपने घर लौट आते थे। इस कारण आकाश में मेघ को देखकर उनकी पत़्नियों को यह विश्वास होने लगता था कि अब उनके पति लौटने वाले हैं।
पुत्र को जन्म देने कारण पत़्नी को ’जाया’ कहा जाता है।
कुसुमसदृशं – पुष्प के समान (कोमल) प्राण वाले। उत्तररामचरितमानस में भी स्त्रियों के चित्त को पुष्प के समान कोमल बताया गया है।
शिलीन्ध्र को कुकुरमत्ता भी कहते हैं। ग्रामों में प्राय: छोटे छोटे बच्चे साँप की छत्री भी कहते हैं। यह वर्षा ऋतु में पृथ्वी को फ़ोड़ कर निकलते हैं। कुकुरमुत्तों के उगने से पृथ्वी का उपजाऊ होना माना जाता है।
मानस सरोवर हिमालय के ऊपर, कैलाश पर्वत पर स्थित है। कैलाश पर्वत हिमालय के उत्तर में स्थित है। कहते हैं कि इसको ब्रह्मा ने अपने मन से बनाया था। इसलिए इसे मानस या ब्रह्मसर भी कहा जाता है। वर्षाकाल से भिन्न समय में मानसरोवर हिम से दूषित हो जाता है और हिम से हंसों को रोग लग जाता है। इसलिये वर्षाकाल में ही राजहंस मानसरोवर जाते हैं तथा शरदऋतु के आगमन के साथ ही मैदानों में आ जाते हैं।
काव्यों में हंसों का कमल-नाल खाना प्रसिद्ध है। वे इसका दूध पीते हैं।
राजहंस – एक श्वेत पक्षी जिसकी चोंच और पैर लाल होते हैं, जो नीर-क्षीर-विवेक के लिये प्रसिद्ध है।

गणपति विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर सीधे मुँबई से विवेक रस्तोगी..

अनंत चतुर्दशी पर वैसे तो मुँबई में छुट्टी का ही माहौल रहता है, गणपति उत्सव मुँबई का सबसे बड़ा त्यौहार होता है। भीड़ और उनकी श्रद्धा और उनकी भक्ति देखते ही रह जायेंगे। छोटे बड़े गणपति मुँबई के रास्तों से अपने विसर्जन स्थलों पर रवाना हो गये हैं, गणपति विसर्जन के लिये २ बजे से निकलना शुरु हो गये थे, हम अपने ऑफ़िस से निकलने में थोड़ा लेट
हो गये, करीबन ५ बजे निकले फ़िर करीबन ४५ मिनिट बाद ऑटो मिला और फ़िर एक घंटे में ट्रेफ़िक के कारण बड़ी मुश्किल से घर पहुँचे। लगता था जैसे जनसैलाब सड़कों पर उमड़ आया है, सड़कों पर दौड़ने वाले वाहन तो जैसे गायब ही हो गये।
बस हर जगह गणपति विसर्जन के लिये  जाते हुए लोगों के हुजूम, गुलाल से सारोबार, डांस करते हुए, बड़े बड़े स्पीकर के साथ वाहन और कई जगह प्रसाद बँट रहा था उसके लिये लंबी लगी हुई लाईन और जगह जगह स्वागत मंच। बचपन से लेकर पचपन से ज्यादा तक के लोग पूरे आनंद के साथ भाग ले रहे  हैं।
सप्तमी पर हम लोग दादार चौपाटी पर गणपती विसर्जन देखने गये थे, उस दिन गौरी गणपति था और बहुत संख्या में लोग पहुँचे थे। बड़े तामझाम के साथ मंडल अपने गणपति को लेकर जा रहे थे, एक मंडल में तो बहुत बड़े ड्रम लड़के और लड़कियाँ अपने कमर पर बाँध कर बजा रहे थे हम तो देखकर ही दंग रह गये। उनके पीछे लेझिम के साथ नृत्य करते हुए लोग।
कुछ फ़ोटो मैंने अपने मोबाईल से खींचे हैं फ़ोटो क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है, फ़िर भी देखिये –

03092009174723 03092009174533
गणपति विसर्जन के लिये ले जाते हुए
 03092009174604 03092009181950
सड़कों पर भीड़
29082009193035 29082009222108
वर्ली सी लिंक ब्रिज दादर चौपाटी से
03092009181032
ट्रेफ़िक

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ५

यक्ष का प्रिया विरह – यक्ष कितना दुर्बल हो गया है अपनी प्रिये से दूर होकर कि उसके हाथ में जो स्वर्ण कंकण पहन रखा था वह ढ़ीला हो जाने के कारण गिर पड़ा था, जिससे उसकी कलाई सूनी हो गई थी।
कालिदास के अनुसार – आषाढ़ के प्रथम दिन से ही वर्षा का प्रारम्भ होता है।
वप्रक्रीड़ा उस क्रीड़ा को कहते हैं जब प्राय: मस्त सांड, हाथी, भैंसे
आदि पशु टीले की मिट्टी को सींग से उखाड़ते हैं, इसे उत्खातकेलि भी कहते हैं।
सुखी किसे माना जाता है – प्रिया से युक्त वयक्ति को, धन से युक्त को नहीं।
अर्घ्य किसी विशेष व्यक्ति, अतिथि या देवता आदि को दिया जाता है।
गुह्यक और यक्ष ये दो अलग अलग देवयोनियाँ मानी जाती हैं, परंतु कालिदास ने इन दोनों को एक-दूसरे का पर्यायवाची माना है।
अत्यधिक काम-पीड़ित व्यक्ति अपना विवेक खो बैठते हैं और उन्हें जड़-चेतन में भी भेद प्रतीत नहीं होता। प्राय: काम-पीड़ित व्यक्ति विरह के क्षणों में अपनी प्रिया के फ़ोटो, वस्त्रादि से बातें करते हैं।
पुराणों के अनुसार प्रलयकाल में संहार करने वाले मेघों को पुष्करावर्तक कहते हैं। इसी कारण पुष्कर और आवर्तक को मेघ जाति में श्रेष्ठ माना जाता है।
अलका – यह धन के देवता कुबेर की राजधानी मानी जाती है। इसमें बड़े-बड़े धनी यक्षों का निवास बताया गया है। यह कैलाश पर्वत पर स्थित मानी जाती है। इसके वसुधारा, वसुस्थली तथा प्रभा ये अन्य नाम भी कहे जाते हैं।
पुराणों के अनुसार कुबेर की राजधानी अलका के बाहर एक उद्यान था जिसे गन्धर्वों के एक राजा चित्ररथ ने बनाया था। उस अलका के महल, बाह्य उद्यान में रहने वाले शिव के सिर पर स्थित चन्द्रमा की चाँदनी से प्रकाशित होते रहते थे।
पवनपदवीम़् – क्योंकि वायु सदा आकाश में ही चलती है, इस कारण आकाश को वायु मार्ग भी कहते हैं।