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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १६

प्राप्त्तवानीरशाखम़् – ग्रीष्म ऋतु आने पर नदी का प्रवाह कम हो जाता है और किनारे छोड़ देता है, किन्तु फ़िर भी झुकी हुई बेंत की शाखायें उसका स्पर्श किये रहती हैं।
सलिलवसनम़् – यहाँ कवि ने कल्पना की है कि जिस प्रकार कोई प्रियतम नवयुवती के नितम्बों से वस्त्र खिसकता है और वह नवयुवती उस वस्त्र को अपने हाथों में पकड़ लेती है

उसी प्रकार मेघ ने अपनी प्रेयसी गम्भीरा के जल रुपी वस्त्र को उसके नितम्बों से हटा दिया है। उसका कुछ भाग ही गम्भीरा के हाथ में रह गया है। इस प्रकार यहाँ कवि ने मेघ में नायक का, गम्भीरा में नायिका का, वानीर शाखा में हाथ का, जल में नील वस्त्र का और तट में नितम्ब का आरोप किया है। (गम्भीरा नाम की एक छोटी सी नदी, जो कि मालव देश में ही बहती है और क्षिप्रा की सहायक नदी है।)

देवगिरी पर्वत – इस पर्वत पर भगवान कार्तिकेय स्थायी रुप से निवास करते हैं, वहीं कार्तिकेय का मन्दिर भी है।
व्योमगड़्गा – गंगा को आकाश, पृथ्वी, और पाताल तीनों लोकों में स्थिति मानी जाती है तथा क्रमश: देवता, मनुष्य और नागों का सन्ताप हरती है। इसलिये इसे  त्रिपथगा भी कहते हैं तथा क्रमश: आकाश गंगा, भागीरथी गंगा और भोगवती गंगा भी कहते हैं।
नवशशिभूता – यहाँ नवशशिभूता शब्द का प्रयोग करके महाकवि ने पौराणिक कथा की और संकेत किया है, समुद्र मंथन के समय उत्पन्न हलाहल का शिव ने पान किया था तथा उसके प्रभाव को शान्त करने के लिये समुद्र मंथन से निकले हुये चन्द्रमा को उन्होंने धारण किया था। इसलिये इन्हें नवशशिभूता कहते हैं।
वैदिक साहित्य में यद्यपि शिव और चन्द्रमा का उल्लेख है, परन्तु शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करने का उल्लेख नहीं है, वाल्मीकि रामायण में समुद्र मंथन की कथा है, परन्तु शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करने का वर्णन नहीं है। यह वर्णन विष्णुपुराण १/९/८२-९७ में वर्णित है।

घर में घरवाली के हाथ की जलेबी…..म्म्म्म़् और अपने हाथ के पोहे, आनंद ही कुछ और है….

अभी हम कुछ दिन पहले समान खरीदने रिलायंस फ़्रेश गये थे तो वहीं गिट्स का जलेबी पैक दिखाई दे गया जिसके साथ जलेबी मेकर फ़्री था बस हम वह पैक घर पर ले आये। तो हमारी घरवाली ने बस हमारा सिर ही नहीं फ़ोड़ा इतना तेज गुस्सा आ रहा था उनको, पर चलो आज उनका मूड बनाया कि तुम जलेबी बनाओ और पोहे हम बनाते हैं, क्योंकि हमें ऐसा लगता है

कि हम से अच्छे पोहे कोई बना ही नहीं सकता है। 🙂

जलेबी शुरु में भले ही अपने आकार में  न बनी पर बाद में जलेबी ने आकार लेना शुरु कर दिया और छक कर पोहे जलेबी खाये, फ़िर बाद में ध्यान आया कि अरे फ़ोटो लेना भूल गये नहीं तो ब्लॉग पर चिपका देते। वैसे हमारी घरवाली का कहना है कि हमें एक ही चीज अच्छी बनानी आती है वह है पोहा, चलो हम तो अपनी पीठ इसी बात पर ठोंक लेते हैं और जलेबी बनाने पर हमने भी अपनी घरवाली की तारीफ़ कर दी नहीं तो अगली बार वो भी हमें ही बनाना पड़ेगी। 🙂 ये था इस स्प्ताहांत का हमारा नाश्ता।
jalebi poha

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १५

चिरविलसनात्खिन्न्विद्युत्कलत्र: – विलसन का सामान्य अर्थ चमकना है, परन्तु यहाँ विद्युत को मेघ की पत़्नी कहा है। इसलिए इसका अर्थ रतिक्रीड़ा करना, इठलाना, आदि भी किया जा सकता है अर्थात जिस प्रकार पत़्नी अपने पति की गोद में लेटकर, इठलाती रहती है और काम क्रीड़ा को बढ़ाकर, उसमें सहयोग कर, फ़िर थक कर सो जाती है, उसी प्रकार विद्युत भी इठलाकर तुम्हारी काम-क्रीड़ा बढ़ाक

र, रतिक्रीड़ा कर थक कर सो जायेगी। उस दशा में तुम उसे विश्राम देना।

कोई भी सज्जन यदि अपने मित्र के किसी भी कार्य को अपने हाथ में ले लेता है तो वह उस कार्य की सिद्धी होने तक प्रयत्न करता है, वह उस कार्य को करने में मन्द नहीं पड़ता। यक्ष मेघ से कहता है, इसी प्रकार तुमने भी अपने मित्र का जो कार्य अपने हाथ में लिया है, उसे पूरा करने के लिये जो मार्ग शेष बचा है, उसे प्रात: सूर्योदय होते ही पूरा करने के लिये पड़ना।
ज्ञातेऽन्यास्ड़्गविवृते खण्डितेर्ष्याकषायिता – अन्य स्त्री के सहवास से विकृत (चिह्नित) देखकर जो ईर्ष्या से क्रुद्ध हो उठती हो, उसे खण्डिता नायिका कहते हैं, कहने का अभिप्राय यह है कि पति के लिये पत़्नी श्रंगार करके बैठी थी, परन्तु वह किसी अन्य स्त्री के साथ रात्रि में सहवास करके प्रात: घर आया है, उसके होठों पर लाली तथा कपोलों पर सिंदूर लगा है, उसे देख कर पत़्नी जल-भुन जाती है, ऐसी स्त्री को पति चाटुवचनों से पैरों में गिरकर प्रसन्न करता है।
कररुधि स्यादनल्पाभ्यसूय: – कमलिनी सूर्य के पत़्नी के रुप में प्रसिद्ध है। यहाँ उसे खण्डिता नायिका के रुप में प्रस्तुत किया गया है। कामुक क्रीड़ाओं में विघ्न डालने वाले को कोई भी नहीं चाहता है। सूर्य ने रात्रि कहीं अन्यत्र व्यतीत की है, प्रात: जब आया तो उसका कपोल सिन्दूर से लाल था; अत: उसे देखकर कमलिनी तो पड़ी, उस पर पड़ी हुई ओस की बूँदे ही उसके आँसू हैं। सूर्य को उसके आँसू पोंछने हैं, अत: आँसू पोंछने के लिये कर (किरण) बढ़ाया है; अत: यदि मेघ उसके कार्य में विघ्न डालकर उसके कर को रोक देता है, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हो जायेगा। सूर्य से द्वेष करना शास्त्र-विरोधी है, उससे कल्याण का नाश तठा रौरव नरक की प्राप्ति होती है।

लगता है कि नवभारत टाइम्स ने न सुधरने की कसम खा रखी है या ये लोग हिन्दी को मजाक समझते हैं..

बहुत दिनों से नियमित ही मात्राओं की गलतियाँ, नवभारत टाइम्स में देखने को मिलती हैं पर लगातार दो दिन गलतियाँ मतलब नवभारत टाइम्स में ही कहीं कोई समस्या है, ये लोग हिन्दी को गंभीर रुप से नहीं लेते हैं और बिना प्रूफ़ रीडिंग के प्रिंट प्रोडक्शन में डाल देते हैं।
कल के नवभारत टाइम्स में मुख्य पृष्ठ में “राहुल की सादगी”

समाचार में “स्तिथि” लिखा है जब कि “स्थिति” होना चाहिये और आज भारत के क्रिकेट मैच जीतने पर मुख्य पृष्ठ पर फ़ोटो प्रकाशित किया है “विनिंग बोलिंग”, इसमें “आशिष नेहरा” लिखा है जबकि सही तरीके से पृष्ठ ९ खेल समाचार पर “आशीष नेहरा” लिखा गया है, एक बार नहीं कई बार लिखा गया है। अगर यह त्रुटि है तो इसके लिये जिम्मेदारी तय की जाना चाहिये। क्योंकि हिन्दी भाषियों के लिये मुंबई में और कोई विकल्प भी नहीं है।

हम तो दैनिक भास्कर, नईदुनिया और दैनिक जागरण का यहाँ आने का इंतजार कर रहे हैं। क्योंकि हिन्दी समाचार पत्र प्रकाशित करना इनके लिये मजबूरी नहीं वरन उनका पेशा है और हिन्दी के मानक का बहुत ध्यान रखते हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १४

सृष्टि संहार के समय शिव द्वारा किया जाने वाला नृत्य प्रसिद्ध है, उसे ताण्डव नृत्य कहते हैं। नाट्यशास्त्रियों ने नृत्य और नृत्त में अन्तर किया है। दशरुपक में लिखा है – “अन्यद़् भावाश्रयं नृत्यं नृत्तं ताललयाश्रयम़्” अर्थात़् भाव पर आश्रित अंगसञ्चालन नृत्य कहलाता है तथा ताल व लय पर आश्रित हस्त-पाद के सञ्चालन को नृत्त कहते हैं।
पशुपते: – पशु के स्वामी। यहाँ पशु से अभिप्राय सामान्य पशु से नहीं है, अपितु शैव दर्शन के अनुसार

पदार्थ के तीन भेद हैं – पशु, पाश और पति। अविद्या रुपी पाश से बद्ध जीवात्मा को पशु, पाश के समान बन्धन करने के कारण अविद्या को पाश तथा अविद्यापाश से मुक्त शिव को पति कहते हैं।

गजासुर (गज का रुप धारण करने वाले असुर) को मारकर शिव ने रक्त से सने हुए चर्म को भुजाओं से धारण करते हुए ताण्डव नृत्य किया था। और यक्ष मेघ से कहता है कि तुम गजासुर की गीली चर्म बनकर शिव की इच्छा पूर्ति करना; क्योंकि गजासुर के गीले चर्म को शिव को ओढ़े हुए देख कर पार्वतीजी डर जाती हैं और वह ताण्डव नृत्य भी नहीं देख सकतीं। यदि तुम गीले चर्म का सा स्थान ले लो तो पार्वतीजी भी निर्भय होकर ताण्डव नृत्य देख सकेंगी। शिवपुराण में यह कथा रुद्र सं. – युद्ध खण्ड अ. ५७ में आयी है।
योषित – यह शब्द सामान्यत: साधारण स्त्री का वाचक है।
अभिसारिका – जो स्त्री रात के अन्धकार में अपने प्रियतम से मिलने उसके घर अथवा किसी विशेष संकेत स्थल पर जाती है। यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि तुम अभिसारिकाओं को बिजली चमकाकर उन्हें मार्ग तो दिखलाना, परन्तु वर्षा या गर्जन करके उन्हें भयभीत न कर देना; क्योंकि वे अभिसारिकाएँ एक तो स्वभावत: ही डरपोक होती हैं तथा दूसरे छिपकर अपने प्रेमी के पास रमण करने जा रही हैं। इससे उन्हें लोक निन्दा आदि का भय बना रहता है। ऐसे में मेघ गर्जन आदि से और भी अधिक भयभीत हो जायेंगी।
सूचिभेद्य – इतना प्रगाढ़ अन्धकार जो कि सुई से छेदा जा सके। जब धागे में गाँठ पड़ जाती है, तब उसे सुईं की नोक से खोलते हैं। इससे गाँठ की सूक्ष्मता और घनिष्ठता सूचित होती है।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १३

कण्ठच्छवि: – कण्ठ के समान कान्ति वाला, यह विशेषण मेघ के लिये आया है। कहने का आशय यह है कि क्षीर सागर के मंथन के समय कालकूट नामक विष भी निकला था, जिसका पान शिव ने किया था। परिणामत: उनका कण्ठ विष के प्रभाव से नीला पड़ गया था। इसी कारण उन्हें नीलकण्ठ भी कहा जाता है।
चण्डिश्वरस्य पुण्यं धाम – यह कहने का अभिप्राय उज्जयिनी पुरी में स्थित महाकाल मंदिर

से है। कहीं-कहीं चण्डेश्वरस्य पाठ भी मिलता है। इसका अर्थ है – चण्डस्य ईश्वर: अर्थात चण़्उ नाम के गण स्वामी। यक्ष का मेघ से आग्रह है कि वह उज्जयिनी में स्थित शिव के महाकाल मन्दिर में अवश्य जाये। महाकाल को देखकर मुक्ति मिल जाती है, ऐसा भी प्रसिद्ध है –

आकाशे तारकं लिङ्गं पाताले हाटकेश्वरम़्।
मृत्युलोके महाकालं दृष्टवा मुक्तिमवाप्नुयात़्॥
महाकाल शिवलिङ्ग १२ ज्योतिर्लिङ्गों में से एक है। शिव पुराण में कहा गया है –
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम़्।
उज्जयिन्यां महाकालमो~ड्कारं परमेश्वरम़्॥
और कहा सन्ध्या समय तक वहीं महाकाल मंदिर में रुके रहना तथा सन्ध्या के समय होने वाली शिव की पूजा में सम्मिलित होकर गर्जन करके नगाड़े का कार्य करना, जिसमें तुम गर्जन के विशेष फ़ल को प्राप्त करोगे।

ताऊ.इन पर मेरा याने कि विवेक रस्तोगी का साक्षात्कार आज दोपहर ठीक ३.३३ पर और एक छोटी सी बात

आज हमारा साक्षात्कार प्रकाशित होगा दोपहर ठीक ३.३३ पर ताऊ रामपुरिया के ब्लॉग पर, आईये हमसे मिलिये और जानिये हमारे बारे में।
हम अभी मेघदूतम और कालिदास पर एक श्रंखला लिख रहे हैं, क्योंकि मेरा सोचना था कि इन बातों को आम लोगों के लिये सहज रुप में यह जानकारी उपलब्ध होना चाहिये। इसके बाद मैं शिवाजी सामंत के ऐतिहासिक उपन्यास “मृत्युंजय” दानवीर कर्ण की जीवन गाथा

के उपर लिखने की सोच रहा हूँ। कोई जानकार व्यक्ति कृपया मुझे बतायें कि पुस्तक के कुछ अंश प्रकाशित करना कहीं किसी कॉपीराईट का उल्लंघन तो नहीं है और अगर है तो कृपया उसका रास्ता मुझे बतायें।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १२

प्रार्थनाचाटुकार: – प्रिया के रमण करने से थक जाने पर प्रेमी फ़िर रमण करने के लिये उसकी खुशामद करता है, मीठी-मीठी बातें करता है तथा थकान को दूर कर शरीर में ताजगी उत्पन्न करता है, उसी प्रकार शिप्रा नदी का पवन प्रेमियों के समान रमणियों की सम्भोग-थकान को दूर कर रहा है।
खण्डिता नायिका – जो पति के चरित्र पर सन्देह करती है

तो नायक उसे प्रसन्न करने के लिए मीठी-मीठी बातें बनाते हैं। साहित्य दर्पण में खण्डिता नायिका का लक्षण इस प्रकार किया है –

पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसंयोगचिह्नित:।
सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्ष्याकषायिता॥
अर्थात दूसरी स्त्री से संभोग से चिह्नित होकर प्रिय जिसके पास जाता है, ईर्ष्या से युक्त उस नायिका को ’खण्डिता’ कहते हैं।
परन्तु आचार्य मल्लिनाथ ने पूर्वोक्त खण्डिता नायिका की कल्पना का खण्डन किया है। उनका कथन है कि खण्डिता नायिका के साथ पहले जब रति ही नहीं हुई, फ़िर रति की थकावट दूर करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।
कवि ने उज्जयिनी के वैभव का वर्णन करते हुए लिखा है –
समुद्र में जल तो रहता ही है तथा उसमें रत़्न भी रहते हैं, परन्तु विशाला के बाजारों में रत़्नों के ढेरों को देखकर ऐसा अनुमान होता है कि समुद्र के सारे रत़्न निकालकर इस बाजार में ही रख दिये गये हैं। अब समुद्र में केवल जलमात्र ही शेष बचा है और उसका रत़्नाकर नाम अयथार्थ हो गया है।
नलगिरि: – प्रद्योत के हाथी का नाम नलगिरि बताया है, जबकि कथासरित्सागर में नलगिरि के स्थान पर नडागिरि बताया है और यह राजा चण्डमहासेन का हाथी था।
प्राचीन काल में स्त्रियाँ सिर धोने के बाद केशों को सुगन्धित द्रव्यों के धुएँ से सुखाती थीं।

मुंबई में नहीं सुधरा तो वो आदमी कहीं भी नहीं सुधर सकता – एक ऑटो वाले का डायलॉग

कल हम ऑफ़िस से आ रहे थे तो जिस ऑटो में हम आये वह एक जौनपुरी ड्रायवर चला रहा था। हम हमारे मित्र जो कि हमारे साथ ही था उससे बात कर रहे थे। तो ड्रायवर बोला कि हमें रास्ता बता देना क्योंकि हम इस जगह केवल एक बार ही गये हैं। बस थोड़ी देर में तो वह हमसे खुल गया।
मैं अपने मित्र को किस्सा बता रहा था कि बोरिवली में जिस जगह पर हम पहले रहते थे मैं एक बार ऑटो में बैठ्कर गया तो वह ऑटो वाला हमसे बोला कि “साहब हम पिछले पंद्रह सालों से ऑटो चला रहे है,

कहते हुए शर्म आती है कि पंद्रह सालों से ऑटो चला रहे हैं पर इस जगह हम आज तक नहीं आये हैं।” बस वो ऑटो वाला उचक पड़ा कि कुछ लोग बोलते हैं कि हमने मुंबई का कोना कोना छान लिया है परंतु अपने कमरे के बगल में कौन रहता है उसका नाम भी नहीं पता होता है।

मुंबई में आकर सबको ईमानदार बनना पड़ता है अनुशासन में रहना पड़ता है नहीं तो उसका कुछ नहीं हो सकता है। और जो मुंबई में नहीं सुधरा तो वो आदमी कहीं भी नहीं सुधर सकता है। हमने भी अच्छे अच्छे उज्जड़ों को यहां सुधरते देखा है। तभी तो हम कहते हैं कि “मुंबई मेरी जान”।
mumbaimerijaan

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ११

उज्जयिनी के लिये मेघदूतम़् में महाकवि कालिदास ने लिखा है –
यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि अवन्ति देश में पहुँचकर उज्जयिनी
में अवश्य जाना –
प्राप्यावन्तीनुदयनकथाकोविदग्रामवृद्धाऩ़्
पूर्वोद्दिष्टामुपसर पुरीं श्रीविशालां विशालाम़् ।
स्वल्पीभूते सुचरितफ़ले स्वर्गिणां गां गतानां
शेषै: पुण्यैर्हतमिव दिव: कान्तिमत्खण्डमेकम़्॥
अनुवाद : – जहाँ के ग्रामों के वृद्ध जन उदयन की कथाओं के जानने वाले हैं, ऐसे अवन्ति प्रदेश को प्राप्त कर, पहले बतायी गयी, सम्पत्ति से सम्पन्न, उज्जयिनी नाम की नगरी में जाना, (जो) मानो पुण्य कर्मों के फ़ल के कम हो जाने पर पृथ्वी पर आये हुए स्वर्ग वालों के (देवताओं के) शेष पुण्यों के द्वारा लाया गया स्वर्ग का एक उज्जवल टुकड़ा है।
उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धाऩ़् – कवि ने उदयन की कथा की और संकेत किया है। यह कथा मूल रुप से गुणाढ़्य की वृहतकथा में मिलती है, परन्तु यह ग्रन्थ पैशाची में लिखा है और अपने मूलरुप में आज अप्राप्य है। इसका संस्कृत अनुवाद सोमदेव ने कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र ने वृहत्कथा-मञ्जरी नाम से किया है। कथासरित्सागर में यह कथा लम्बक २ से ८ तक विस्तृत रुप से वर्णित है। संक्षेप में कथा इस प्रकार है – “पृथ्वी पर वत्स नाम का एक देश है, जिसमें कौशाम्बी नाम की नगरी है। वहां परीक्षित का पौत्र जनमेजय का पुत्र शतानीक राजा था। उसके सहस्त्रानीक नामक पुत्र था। सहस्त्रानीक की पत़्नी का नाम मृगावती था। उनके पुत्र का नाम उदयन था। उदयन ने उज्जैन के राजा चण्डमहासेन की पुत्री वासवदत्ता का अपहरण कर उससे विवाह किया। उसके बाद मगध के राजा प्रद्योत की पुत्री पद्मावती से विवाह कर लिया। उसके वासवदत्ता से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम नरवाहनदत्त रखा।
इसके अतिरिक्त यह कथा भास के सवप्नवासवदत्तम़् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायणम़् नामक नाटकों में भी लगभग इसी रुप में मिलती है।