All posts by Vivek Rastogi

About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

देखा पापा टीवी पर विज्ञापन देखकर IDBI Life Childsurance Plan लेने का नतीजा, “लास्ट मूमेंट पर डेफ़िनेटली पैसा कम पड़ेगा”।

हाल ही में आप सभी लोग टीवी पर आई.डी.बी.आई. फ़ेडेरल जीवन बीमा कंपनी का बच्चों के जीवन बीमा का  एक विज्ञापन बहुत देख रहे होंगे “देखा पापा, ऐसा वैसा प्लॉन लोगे तो लास्ट मूमेंट पर पैसा कम पड़ सकता है” और फ़िर कहता है कि “आई.डी.बी.आई. लाईफ़ चाईल्ड्श्योरेंस प्लॉन खरीदें – प्लॉन जो फ़ैल न हो”।
विज्ञापन वाकई बहुत ही भावनात्मक है, विज्ञापन एजेन्सी ने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। मुझे लगता है कि आप सभी लोग भी इस भावनात्मक विज्ञापन से जरूर प्रभावित हुए होंगे और बच्चों के लिये इस प्लॉन को लेने की सोच रहे होंगे।
बद्किस्मती से जिसने भी यह प्लॉन बनाया है उसे हम शून्य (0) देंगे क्योंकि यह प्लॉन निवेशक के लिये अच्छा नहीं है। एक मित्र ने भी यह विज्ञापन देखा और फ़ोन करके पूछा कि विज्ञापन बहुत अच्छा है, पर यह देखकर बताओ कि उत्पाद अच्छा है या नहीं ? मुझे यह प्लॉन खरीदना चाहिये या नहीं ?
मैं वेबसाईट पर गया और उनका ब्रॉऊशर डाऊनलोड किया, और उनके चार्जेस को देखकर संत्रस्त हो गया । ( जो कि कभी भी निवेशक को बताये ही नहीं जाते हैं।) ये देखिये –
idbichildsuranceplanअगर @10% भी इस प्लॉन से मिलता है जो कि बीमा कंपनी द्वारा प्रदर्शित और विज्ञापित किया जा रहा है, तो भी आपको शायद ही सकारात्मक रिटर्न्स मिल पायेंगे, और इस बात पर हम यह कह सकते हैं, अगर आप यह प्लॉन खरीदते हैं तो “लास्ट मूमेंट पर डेफ़िनेटली पैसा कम पड़ेगा”।

सबसे बढ़िया है कि एस.आई.पी. से म्यूचयल फ़ंड में निवेश किया जाये और परिवार को सुरक्षित रखने के लिये टर्म प्लॉन लिया जाये। यह काफ़ी समय से आजमाया हुआ समीकरण है पर दुर्भाग्य से केवल 5% लोग ही इसे समझते हैं।
एक और सलाह, अगर पिछले ३-४ वर्षों में आपने कोई भी बच्चों का बीमा प्लॉन खरीदा है तो उसका वापिस से विश्लेषण कर लेना चाहिये और अगर जरूरत पड़े तो उस बीमा को खत्म करके म्यूचयल फ़ंड में एस.आई.पी. के जरिये निवेश करें। आपको लंबे समय में इस प्लॉन से तो अच्छा रिटर्न मिलेगा।

यह एटिका वेल्थ के ईमेल का अनुवादित स्वरूप है।

जिनका स्लोगन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है – “What is good for the client is also good for the firm” – T Rowe Price Jr.

IDBI Federal Childsurance Engineer Advertisment –

IDBI Federal Childsurance Doctor Advertisment –

बिहार की लिट्ठी ऑन व्हील्स बैंगलोर में (Littionwheels.com in Bangalore)

पिछले ४ दिनों से यहीं घर के पास एक नई प्रकार की खाने की चीज दिखी जो कि दक्षिण भारत की नहीं थी, यह थी बिहार की लिट्ठी चोखा। दाम भी कम और चीज भी बेहतरीन, लिट्ठी हमने पहली बार पटना में फ़्रेजर रोड पर कहीं खाई थी, हमें तो वही स्वाद लगा। अब बैंगलोर में अगर बिहारी स्वाद मिल रहा हो तो और क्या चाहिये, आज दोपहर का भोजन बनी यही लिट्ठी चोखा, लिट्ठी छोला और लिट्ठी चना, लेने गये थे एक प्लेट दाल बाटी परंतु दाल खत्म हो गई तो हमने कहा बाकी का सब बाँध दो 🙂
खास बात कि पूरी योजनाबद्ध तरीके से इसकी शुरूआत की गई है और फ़ेसबुक, ट्विटर और वेबसाईट बनाई गई है।
litti
उम्मीद है कि कुछ और भी चीजें इसी तरह से खाने को मिलें जैसे कि पोहे जलेबी ।

आई.टी. वालों का दर्द उनकी ही जबानी..वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन… (Pain of IT guys.. by there own..)

शाम को बस में बैठते लोगों की दिन भर की भड़ास सुनने को मिलती है, अगर दो लोग हैं तो आपस में चिकिर चिकिर और और अगर अकेला है तो फ़ोन पर या फ़िर मन ही मन में पर भड़ास तो निकलती ही रहती है।

कल भी कुछ ऐसा ही हुआ, दो बंदे आई.टी. कंपनी के थे और धड़ाधड़ चिकिर चिकिर कर रहे थे।

यार आज मेरा मैनेजर पूरा माथा खा गया पूरे दो घंटे रेंटिंग पर डिस्कसन कर रहा था, अच्छा भला वर्क फ़्रोम होम कर रहा था, पर ये रेटिंग के डिस्कसन के कारण ऑफ़िस आना पड़ रहा है, जिंदगी में पहले बार २ घंटे का कम्यूटिंग कर रहा हूँ, ऑफ़िस आओ तो काम तो होता नहीं है, मैनेजर से डिस्कसन में ही टाईम निकल जाता है। मुझे बोलता है कि थोड़ी देर बाद फ़िर डिस्कसन के लिये बैठते हैं, मैंने तो कह दिया मेरा एक अर्जेंट कॉनकाल है, मैं नहीं आ पाऊँगा, तो बोलता है कि चलो कल आओगे तो ब्रेन स्टोर्मिंग करेंगे, मैंने तुरत फ़ुरत कह दिया, बोस कल मैं ऑफ़िस नहीं आ रहा हूँ, कल मैं वर्क फ़्रॉम होम कर रहा हूँ। यहाँ ऑफ़िस आकर काम नहीं होता केवल डिस्कसन होता है।

दूसरे ने पूछा डिस्कसन में क्या बोला मैनेजर – तो पहला बोला अरे भाई साल भर की जो ऐसी तैसी करी है, उसकी बाल की खाल खींचते हैं, अगर अच्छा काम करो तो बोलते हैं कि ऐसा करते तो और अच्छा होता और अगर कोई काम समय पर नहीं होता है तो बस बंबू, कैसे भी करके मैनेजर खरीखोटी सुनायेगा। उसे ज्यादा रेटिंग नहीं देना है क्योंकि उसके पास भी टार्गेट होता है और उसके लिये तो उसे बकरा फ़ँसाना ही होता है।

ये अच्छा है कि एक बंदे को हायर करो और फ़िर उसे तीन चार लोगों के वर्कलोड से लोड कर दो और उसकी अच्छी बैंड बजाओ, जब हायर करो तब बोलो कि वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन, तो मैंने उनको बोल दिया था कि आई नीड वन मंथ लीव, आई हैव टू गो माई नैटिव, तो ये बोले थे कि ज्वॉईन कर लो, प्रोजेक्ट लो और नैटिव से ही काम कर लेना, नो नीड टू कम टू ऑफ़िस, मैंने उनको कह दिया सर देयर इस कनेक्टिविटी प्रॉब्लम सो इट विल नॉट बी पॉसिबल।

अब यह हालत है कि ऑफ़िस आओ तो पूरे ५ घंटे बर्बाद होते हैं दिन के, और पर्सनल लाईफ़ की तो बैंड बज गई है। दस बजे ऑफ़िस आओ तो साढ़े दस तक तो सैटल ही हो पाते हैं फ़िर थोड़ा काम करो, और साथ में ऑफ़िस आये हैं तो कुछ कलीग्स मिलने आ जाते हैं, कभी कोई अपनी स्क्रिप्ट की प्रॉब्लम लेकर आ जाता है और कभी अपन किसी के पास डिस्कसन के लिये चले जाते हैं, कब दो बज जाते हैं पता ही नहीं चलता है, फ़िर लंच के लिये चले जाओ और फ़िर आने के बाद छ: बजे तक जितना काम होता है बस उतनी ही प्रोडक्टिविटी होती है, घर से काम करो तो प्रोडक्टिविटी बराबर रहती है।

प्रोजेक्ट मैनेजर को बिल्ड की डिलिवरी हमेशा २ वीक पहले चाहिये होती है और उसके एक वीक पहले से जान खाना शुरू देता है, जब उसको बोलो कि आईपी सेटअप करने में ही एक दिन चला गया था, क्लाईंट की कनेक्टिविटी नहीं थी, तो उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बस उसको उसकी डिलीवरी टाईम पर चाहिये, ये नहीं कि क्लाईंट को ब्लैम करके डिलीवरी डेट आगे बढ़ा ले, बस जो काम करे उसकी तबियत बजाओ बैंड, यह तो सोच लिया और दिमाग में सैट हो गया है कि ऐसा ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है और जिस दिन अपना दिमाग सटक गया उसी दिन पेपर डाल दूँगा, फ़िर भले ही हाथ में दूसरा ऑफ़र हो या नहीं हो, फ़िर बाद में आई विल सर्च इन मार्केट, लेकिन इनको झेलना मुश्किल है।

बातें तो बहुत सारी हुईं, जितनी याद रही लिख दी, वैसे हर आई.टी. वाले का अपना दर्द होता है जो आई.टी. वाला ही अच्छे से समझ सकता है। वहीं बस के टेप में गाना बज रहा था –

“पहला नशा पहला खुमार,

नया प्यार है नया इंतजार,

कर लूँ मैं क्या अपना हाल ऐ दिले बेकरार….”

हे महाकाल! भ्रष्टाचारियों ने उज्जैन को बदनाम करके रख दिया ।

पिछले कुछ समय से उज्जैन का नाम लगातार समाचार चैनल में देख रहे होंगे वो भी धार्मिक नगरी के तौर पर नहीं, भ्रष्टाचारियों को पकड़ने को लेकर। नगरनिगम के चपरासी से क्लर्क तक से १० करोड़ से ज्यादा की संपत्ती की बरामदगी हुई है और संख्या ५०-६० करोड़ तक जा पहुँची है।

हमें यह तो पता था कि नगरनिगम में भ्रष्टाचार होता है क्योंकि बिल्कुल घर के पास है और वहाँ की संचालित गतिविधियाँ किसी से छूप नहीं पाती हैं। किसी भी काम को करवाने के लिये बिना पैसे दिये काम नहीं होता है। अब लोकायुक्त का तो बहुत काम बड़ गया है, क्योंकि अभी तो उन्होंने केवल चपरासी और क्लर्कों को ही पकड़ा है, और वो बिचारे पकड़े इसलिये गये कि उन्हें यह नहीं पता होगा कि भ्रष्टाचार की रकम को ठिकाने कैसे लगाना है। अब जब पड़े लिखे भवन इंजीनियर और नक्शा इंजीनियरों के यहाँ उनकी संपत्ती खंगाली जायेगी तो हो सकता है कि ये तो अभी तक जितनी रकम मिली है उसके रिकार्ड टूट जायें।

उज्जैन में हर १२ वर्ष में सिंहस्थ का आयोजन होता है, जिसमें करोड़ों रूपये सरकार द्वारा सिंहस्थ के लिये दिये जाते हैं, पिछले सिंहस्थ में लगभग ४०० करोड़ रूपये उज्जैन की सड़कों के लिये दिये गये थे, जिसमें यह हाल था कि सिंहस्थ के बाद सड़क ६ महीने भी नहीं टिक पाई, अगर ईमानदारी से उस रकम को खर्च किया जाता तो जनता सरकार को बधाई देती। अब यह सारा खेल समझ में आ रहा है। जब चपरासी और बाबुओं के पास इतना मिल रहा है तो अधिकारियों के पास तो समझ ही सकते हैं। आखिर धार्मिक नगरी उज्जैन में करोड़ों रूपया आता है और इन कर्मचारियों के पेट में चला जाता है।

कुछ दिन पहले झाबुआ से हमारे मित्र का फ़ोन आया कि फ़लाना जो है ऑडी में घूमता है और यहाँ के रेड्डी बंधु हो रहे हैं, फ़िर उनका मामला सब जगह उठा, परंतु बाद में ठंडा हो गया। अब ये करोड़ों के घपले करने वाले भी कभी हमारे मित्र थे, मतलब कॉलेज के जमाने में, तब कभी सोचा नहीं था कि कभी भविष्य में ऐसा भी होगा।

mahakal3 mahakal1 mahakal2

हमारी तो महाकालेश्वर से प्रार्थना है कि “हे महाकाल, जितने भी भ्रष्टाचारी, उज्जैन की पावन धरती पर हैं, उन्हें भस्म कर दो और उज्जैन को सारी सुख सुविधाओं से महरूम रखने वाले इन लोगों के प्रति कोई रहम मत करो”।

ये पुरानी पोस्टें भी देखें पसंद आयेंगी –

सावन का महीना और महाकाल बाबा की सवारी

सावन के महीने में भगवान महाकालेश्वर के रुप :-

महाकाल स्थित श्रीनागचंद्रेश्वर नागपंचमी और हमारी यादें
मुंबई से उज्जैन यात्रा बाबा महाकाल की चौथी सवारी और श्रावण मास की आखिरी सवारी 3 (Travel from Mumbai to Ujjain 3, Mahakal Savari)
महाकाल बाबा की शाही सवारी १७ अगस्त को और महाकवि कालिदास का मेघदूतम में महाकाल वर्णन..
उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – १

पोलिथीन के रूपये फ़ट से डेबिट और बैग के देने में आनाकानी

आजकल बड़े बाजारों से ही खरीदारी की जाती है, फ़ायदा यह होता है कि हरेक चीज मिल जाती है और लगभग हरेक ब्रांड की चीजें मिल जाती हैं, तो अपनी पसंद से ले सकते हैं, चीजों को हाथ में लेकर देख सकते हैं। जबकि किराने की दुकान पर चीजों को बोलकर लेना होता है तो क्या क्या नया बाजार में आया है पता ही नहीं चलता है।

सब ठीक चल रहा था परंतु कुछ दिनों पहले पोलिथीन पर सरकार का फ़रमान क्या आया, आम आदमी के लिये आफ़त हो गई, अब अपने साथ पोलिथीन या थैले लेकर जाओ नहीं तो ये बड़े बाजार वाले लोगों को पोलिथीन के लिये १ रूपये से लेकर ५ रूपये तक का भुगतान करो। और लगभग सभी बाजार अपने थैले लाने पर कुछ छूट देते हैं या प्वांईंट्स आपके मेम्बरशिप कार्ड में जोड़ देते हैं।

जब काऊँटर पर जबरदस्त भीड़ होती है तो कैशियर बैग के प्वाईंट्स क्रेडिट करना भूल जाता है परंतु अगर पोलिथीन ली है तो उसके पैसे झट से बिल में जोड़ देता है। और अगर शिकायत करो तो जवाब होता है कि भीड़ बहुत थी तो भूल गये, तो हमने कहा भई अगर भीड़ में भूल जाते हो तो पोलिथीन बैग्स के भी पैसे लेने भूल जाया करो। कैशियर खिसिया गये और चुप हो गये।

खैर है छोटी सी बात परंतु हम भारतीय ग्राहक क्यों अपना हक छोड़ें, और ऐसा पता नहीं कितने ग्राहकों के साथ होता होगा, इसलिये एक शिकायत ईमेल से कर दी गई है। पता नहीं इन लोगों के कान भी होते हैं या नहीं, सुनेंगे या नहीं।

दादी माँ की तिरुवातिरा त्यौहार की (तमिल) कहानी

आज रविवार को ऑफ़िस के लिये निकले तो अपने नियत समय पर ही निकले परंतु ट्राफ़िक ना होने की वजह से थोड़ा जल्दी ऑफ़िस पहुँच लिये। ऑफ़िस पहुँचे तो ऐसे ही बात हो रही थी कि एक टीममेट जो कि तमिलनाडु से है बोले कि आज तो तिरुवातिरा त्यौहार है। हमने कम से कम ३-४ बार पूछा तब जाकर नाम समझ में आया। साधारणतया: हर बार यही होता है क्योंकि उनका उच्चारण और हमारा उच्चारण बहुत ही अलग होता है।
अब हमने पूछा कि तिरुवातिरा त्यौहार क्या होता है, तो हमारे टीम के सदस्य ने कहा मेरी दादी ने इसके बारे में कहानी सुनाई थी वह सुनाती हूँ, हम भी ध्यान से सुनने लगे।
एक बार एक राज्य था जो कि कावेरी नदी के किनारे था और वहाँ बाढ़ आ गई, तो उस राज्य के राजा ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि सभी घरों से कम से कम एक व्यक्ति नदी के किनारे रेत को इस तरह से लगाया जाये कि बाढ़ का पानी राज्य में ना आने पाये। और जो राजा का आदेश नहीं मानेगा वह दंड का भागी होगा। सभी घरों से एक एक व्यक्ति इस काम में लग गये। उसी राज्य में एक बुढ़िया रहती थी जो कि मिठाई बनाकर बेचकर अपना गुजारा करती थी और उसका कोई बेटा भी नहीं था, वह सोच में पड़ गई कि क्या किया जाये। मेरे बस में रेत को नदी के किनारे लगाना है नहीं और मेरे घर में कोई भी नहीं है, शाम को मुझे दंड मिलना निश्चित है।
तभी बुढ़िया ने अपने आराध्य देव शिवजी का ध्यान किया और उनकी पूजा करने लगी और साथ ही साथ दंड की भी चिंता कर रही थी, तो शिवजी एक गड़रिये के भेष बनाकर बुढ़िया माँ के सामने प्रकट हुए और कहा कि बुढ़िया माँ मैं तुम्हारा काम कर सकता हूँ पर उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा, तो बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास तो रूपये पैसे नहीं हैं, मेरे पास तो केवल मिठाईयाँ हैं, मेरे काम के एवज में ये मिठाई ले सकते हो। शिवजी तैयार हो गये और मिठाई खाने में मस्त हो गये। शिवजी मिठाई खाने में मगन हो गये और काम को भूल गये, बुढ़िया को चिंता होने लगी। शाम को जब राजा राज्य के भ्रमण पर निकला तो देखा कि बुढ़िया को दी गई जगह पर रेत नहीं लगाई गई है, तो राजा ने पूछा कि यह कौन है जिसने अपना कार्य पूरा नहीं किया है, तो बुढ़िया बोली कि ये मेरी जगह है और इस चरवाहे ने तय किया था कि मिठाई के बदले में यह मेरा काम करेगा परंतु यह केवल मिठाई खाता रहा और काम नहीं किया।
चरवाहा अभी भी मिठाई खाने में मगन था, राजा ने चरवाहे से पूछा कि तुमने बुढ़िया माँ का काम क्यों नहीं किया और बुढ़िया माँ को धोखा दिया तुम्हें तो सजा मिलनी चाहिये। राजा ने जोर से बेंत से चरवाहे के पीठ पर मारा तो इतनी जोर से लगा कि जैसे बस खून ही निकलने वाला हो, और वहाँ खड़ी प्रजा भी उसी तरह कराहने लगी, सारी प्रजा को भी उतनी ही तेज पीड़ा हुई, राजा ने बेंत फ़ेंकी और चरवाहे से पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं, चरवाहे ने अपना असली शिव रूप सामने लाया और संपूर्ण राज्य को आशीर्वाद दिया कि आज के बाद इस राज्य में कावेरी नदी की बाढ़ से राज्य परेशान नहीं होगा, और आज का दिन तिरुवातिरा के नाम से मनाया जायेगा और आज के दिन जिन मिठाईयों का सेवन मैंने किया है, वही मिठाईयाँ बनाई जायेंगी।
दादी माँ की कहानी सुनकर इतना मजा आया कि मैंने सोचा कि लिख दी जाये। खैर दादी माँ की कहानी होती ही मजेदार हैं। ऐसा लगता है कि सब सामने ही घट रहा है।

वर्ष २०११ में जिंदगी जो सीख सिखा गई ।

वैसे तो जिंदगी सीखने का नाम है और सीख कभी भी ली जा सकती है, उम्र का कोई बंधन नहीं होता । सीख किसी भी उम्र के व्यक्ति से ली जा सकती है जो कि जीवन में आगे बड़ते हुए हमेशा शिक्षा का काम करती है। कुछ सीखें जो इस वर्ष सीखीं –

अपने आप को हमेशा तैयार रखो, कभी भी बाजार जाना पड़ सकता है।

कभी भी अपनी तरफ़ से कोई भी बात किसी को भी ज्यादा न बताओ, जितना पूछा जाये केवल उतना ही बताओ।

किसी पर भी आँख मूँदकर भरोसा मत करो।

पहली बार में किसी भी व्यक्ति से मत खुलो, पता नहीं वह किस गुट का हो।

बुरा समय हो तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।

किसी पर भी अपनापन मत लादो, सबको अपने हिसाब से जिंदगी जीने दो।

समय बलवान हो तो कोई भी पहलवान बन सकता है।

कभी किसी से भी ज्यादा की उम्मीद मत करो।

जब भी किसी से प्यार करो ये जरूर सोच लो कि बस अब वह जाने वाला है।

जिस चीज से भागोगे, वह तुमसे दूर नहीं होगी और तेजी से नजदीक आ जायेगी। इसलिये बेहतर है कि दो दो हाथ कर लिया जाये।

किसी भी ईमेल भेजने से पहले एक बार पढ़ लिया जाये।

जो भी हो, खरी खरी आमने सामने बात कर लेनी चाहिये।

सारी बातें जो सीखी हैं वे कहीं न कहीं लिखी हुई मिल ही जायेंगी, परंतु कभी ध्यान नहीं दिया, पर वो एक कहावत है ना कि “ठोकर खाकर ही ठाकुर बनते हैं”, तो इतनी बातों के लिये तो ठाकुर बन ही गये हैं। और भी बहुत सारी सीखें हैं पर उन्हें लिखने के लिये शब्द नहीं मिल रहे।

ऐसे ही एक पोस्ट बहुत पहले लिखी थी, यह भी देखिये –

जिंदगी जीने के ये ३० नियम पिछले साल कहीं से मिले थे पर अब भी कुछ ही नियमों को धारण कर पाये हैं, बचे हुए नियम इस वर्ष पूरे करने की तमन्ना है, देखिये..

नववर्ष की शुभकामनाएँ ।

न्यू ईयर का हंगामा और फ़लाना ढ़िमकाना ब्रांड व्हिस्की

न्य़ू ईयर का हंगामा बरप रहा था, वह कोई बहुत बड़ी सिटी तो नहीं परंतु हाँ उसके लिये तो शायद बहुत बड़ी थी क्योंकि शायद उसके सपने भी उतने बड़े ही थे या यों कह लो कि उसके सपने बहुत छोटे थे। रात घिर रही थी, हर जगह न्यू ईयर का शोर मच रहा था। वह भी अपने एक दोस्त के साथ पौवा लगाकर घर लौट रहा था, सोचा कि अब और कोई दोस्त तो है नहीं इस शहर में, घर पर जाकर सोकर ही न्यू ईयर मना लिया  जाये ।
फ़िर भी आस में एक चौराहे पर खड़े होकर गुमटी दिखते ही कश लगाने की एक गहरी इच्छा मन में आ गई, कि शायद कोई होस्टल में रहने वाला कोई उसका दोस्त नयू ईयर की पार्टी में ले चले, परंतु किस्मत इतनी जोरदार नहीं थी, तभी उसके साथ पढ़ने वाला जो कि अब आजकल इसी शहर में था मिल गया, और वह किराये के मकान में रहता था। न्यू ईयर की पार्टी के लिये समान खरीदने जा रहा था जैसे कि व्हिस्की, रम जौर मुर्गा।
बस उसके लिये क्या था बोला कि चलो आज न्यू ईयर पर व्हिस्की मारेंगे और मुर्गा सूतेंगे। ठेके पर व्हिस्की लेने पहुँचे तो पता चला कि फ़लाना ब्रांड नहीं है और केवल एक ढ़िमकाना ब्रांड है जो कि उसके गले से उतरता नहीं था, पर दोस्त बोला कि चल आज ये ही सही। पूरा खंबा और पीने वाले दो लोग, धीरे धीरे गटकाते हुए न्यू ईयर की चीयर्स होती रही।
पीने के बाद उसे थोड़ा तबियत नासाज लग रही थी और सोचा कि इधर ही कै कर ली जाये परंतु फ़िर सोचा कि ये साले क्या सोचेंगे कि पीने के बाद हजम भी नहीं हुई और मुँह से निकाल कर चल दिया। छोड़ो  जैसे तैसे सारा इल्जाम उस ढ़िमकाने ब्रांड पर लगाया, कितना गन्दा ब्रांड है और आज के बाद कभी इस ब्रांड की व्हिस्की नहीं पीने का और इसीलिये इस ब्रांड को पीता नहीं था। कितनी भी कम पियो चढ़ती तो जरूर है, जब सरूर सिर पर होता है तो सब कुछ नाचने लगता है। सोच समझकर बोलना और सोच समझकर सुनना, कहीं गलत बोल न दिया जाये और कहीं गलत सुन ना लिया जाये
खैर उसको क्या उसका तो न्यू ईयर हो गया था, एक नई सीख के साथ कि ढ़िमकाने ब्रांड की व्हिस्की नहीं पीनी चाहिये।
नव वर्ष की शुभकामनाएँ ।

कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले…

    पता नहीं दिल कब मानेगा कि हाँ अब शरीर को ठंड लगती है, देखने से पता चलता है हाथ और पैर के बाल ठंड के मारे एक दम सीधे खड़े हैं जैसे किसी जंगल में किसी ने कोई तरकीब से बाँस के पेड़ उगा दिये हों। पहले जब ठंड पड़ती थी तो ऊन की वो ५-६ किलो की रजाई में घुसने का मजा ही कुछ और था परंतु याद आया वो तो बचपन था, जैसे जैसे किशोर हुए वो गोदड़ी गायब हुई और राजस्थानी रजाई आ गई, जब पहली बार राजस्थानी रजाई देखी थी तो ऐसा लगा था कि ये मारवाड़ी मजाक कर रहा है भला कभी इतनी पतली रजाई में ठंड भागती है क्या ? फ़िर भी हम ४ रजाई ले आये सबके लिये एक एक….

    राजस्थानी रजाई का ही कसूर है उसने हमें सिखाया कि ठंड खत्म हो रही है, नहीं तो इसके पहले तो कंबल भी ओढ़ लेते थे और उसके रोएँ की चुभन इतनी अच्छी लगती थी क्योंकि अगर वह हटा देते तो ठंड लगती, चुपचाप कभी ट्रेन में कभी रेल्वे स्टेशन पर तो कभी बस स्टैंड में वह कंबल ओढ़े हाथ में चाय की कुल्हड़ से चाय पीते हुए और हाथ जो कंबल के बाहर होते थे वो हिमालय की हवाओं से ठंडे होते थे, उन हाथों को गर्म करने के लिये कभी अलाव के ऊपर रखते तो कभी कंबल के अंदर करके रगड़ से ठंडा करने की कोशिश करते । फ़िर हाथों के लिये कार्तिक मेले से दस्ताने लिये थे, परंतु वे रेग्जीन के दस्ताने हाथ और ठंडे करते थे तो माँ ने ऊन का दस्ताना बुन दिया था, जिसे कभी उतारने की इच्छा ही नहीं होती थी।

    किशोरावस्था से जवानी तक आते आते स्वेटर और पुलोवरों का फ़ैशन खत्म हो चला था, अब जर्किनों का फ़ैशन था, स्वेटर में तो छन छान कर ठंडी हवा भी लगती थी परंतु जर्किन में बाहरी ठंडी हवा का कोई नामो निशां नहीं था। कभी भेड़ की फ़र वाली जर्किन कभी दोहरी तरफ़ वाली जर्किन, एक जर्किन खरीदो और दो जर्किनों के मजे लो। कभी पापा की जर्किन पहन लो कभी भाई की, कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले पूरे परिवार को एक साथ अपना सामना करना सिखाती थी, और सबका साईज एक हो जाता था।  माँ ने इतने सारे हॉफ़ स्वेटर बनाये थे खासकर कुछ स्वेटर तो मेरे मनपसंदीदा थे जिनपर की गई डिजाईन तो माँ ने अपने आप की थी परंतु वे डिजाईन मन को ऐसे भाये कि उन्हें कभी जुदा नहीं कर पाया।

    आज न वो स्वेटर पास हैं, न ही वो जर्किन, जर्किन तो हैं परंतु अकेले पहनना पड़ती है, न पापा हैं यहाँ ना भाई है यहाँ कि मेरी जर्किन में गर्मी बड़ जाये और न वो माँ का बुना हुआ हॉफ़ स्वेटर मेरे पास है, परंतु हाँ उन सबकी गर्मी मेरे पास है, तभी तो मैं आज भी कहता हूँ और नहीं मानता हूँ कि मुझे ठंड लग रही है…..

नये प्रकार के वायरस से सावधान (Alert from new type of Virus)

अभी पिछले ५-६ दिनों से बहुत परेशान था, कोई वायरस नेटवर्क से हमारे ऑफ़िशियल लेपटॉप में घुस गया था और यह वायरस तनिक आधुनिक किस्म का था, हमने सीमेन्टिक एन्टीवायरस को अपडेट किया और फ़िर निकालने की कोशिश की। बड़ी देर लगभग सारी फ़ाईल ढूँढ़ने के बाद केवल दो फ़ाईलें इन्फ़ेक्टेड बतायीं वे हमने हटा दीं।
पर थोड़ी देर बाद ही हमारी आई.टी. टीम से फ़ोन आया कि हमारे लेपटॉप में वाईरस निवास कर रहा है तो उसे हटाना होगा, हमने बताया कि हमने यह प्रक्रिया अपनाई है, तो उन्हें उसके स्क्रीनशॉट्स भी दे दिये परंतु पता चला कि वाईरस महाशय अभी भी लेपटॉप में निवास कर रहे थे। फ़िर उन्होंने कुछ टूल्स हमारे लेपटॉप पर संस्थापित किये और उन्होंने भरपूर कोशिश की, सारी कूकीस, कैच फ़ाईल्स, टेम्परेरी इंटरनेट फ़ाईल्स भी हटा दी। परंतु कुछ भी नहीं हुआ, इसमें शक यह था कि यह वाईरस या तो स्क्रीनशॉट्स लेकर कहीं भेज रहा है या फ़िर लेपटॉप से डाटा को किसी गुप्त एफ़टीपी के जरिये कहीं भेज रहा है।
अंतत: निर्णय लिया गया कि लेपटॉप को रिईमेज किया जाये और हमें कहा गया कि अपना सारा डाटा सुरक्षित कर लीजिये, हमने फ़टाफ़ट कर लिया और अंतत: रिईमेज ही करना पड़ा। अब इस वायरस से मुक्ति पा चुके हैं, परंतु हमें यह पता चला है कि यह वाईरस तेजी से कंप्यूटरों को निशाना बना रहा है और यह वायरस नेटवर्क के जरिये फ़ैलता है।
जीटॉक ऑन था तो यह वाईरस अपने आप जितने भी संपर्क सामने स्क्रीन पर होते हैं उन्हें मैसेज अपने आप भेज देता है और मैसेज विन्डो को अपने आप बंद भी कर देता है। कहीं ना कहीं मैमोरी भी खाता ही होगा, क्योंकि हमें इसके बाद से अपना लेपटॉप धीमा होने का अहसास हुआ था।
अगर आपको भी इस प्रकार के मैसेज जीटॉक पर या कहीं और से आयें तो सावधान उस पर गलती से भी क्लिक ना करें, नहीं तो अपना सिस्टम फ़ोर्मेट करने को तैयार रहें। क्योंकि अभी तक इसका कोई एन्टी डोज नहीं आया है।
कुछ इस तरह के मैसेज यह भेजता है –