यह एटिका वेल्थ के ईमेल का अनुवादित स्वरूप है।
जिनका स्लोगन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है – “What is good for the client is also good for the firm” – T Rowe Price Jr.
IDBI Federal Childsurance Engineer Advertisment –
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जिनका स्लोगन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है – “What is good for the client is also good for the firm” – T Rowe Price Jr.
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शाम को बस में बैठते लोगों की दिन भर की भड़ास सुनने को मिलती है, अगर दो लोग हैं तो आपस में चिकिर चिकिर और और अगर अकेला है तो फ़ोन पर या फ़िर मन ही मन में पर भड़ास तो निकलती ही रहती है।
कल भी कुछ ऐसा ही हुआ, दो बंदे आई.टी. कंपनी के थे और धड़ाधड़ चिकिर चिकिर कर रहे थे।
यार आज मेरा मैनेजर पूरा माथा खा गया पूरे दो घंटे रेंटिंग पर डिस्कसन कर रहा था, अच्छा भला वर्क फ़्रोम होम कर रहा था, पर ये रेटिंग के डिस्कसन के कारण ऑफ़िस आना पड़ रहा है, जिंदगी में पहले बार २ घंटे का कम्यूटिंग कर रहा हूँ, ऑफ़िस आओ तो काम तो होता नहीं है, मैनेजर से डिस्कसन में ही टाईम निकल जाता है। मुझे बोलता है कि थोड़ी देर बाद फ़िर डिस्कसन के लिये बैठते हैं, मैंने तो कह दिया मेरा एक अर्जेंट कॉनकाल है, मैं नहीं आ पाऊँगा, तो बोलता है कि चलो कल आओगे तो ब्रेन स्टोर्मिंग करेंगे, मैंने तुरत फ़ुरत कह दिया, बोस कल मैं ऑफ़िस नहीं आ रहा हूँ, कल मैं वर्क फ़्रॉम होम कर रहा हूँ। यहाँ ऑफ़िस आकर काम नहीं होता केवल डिस्कसन होता है।
दूसरे ने पूछा डिस्कसन में क्या बोला मैनेजर – तो पहला बोला अरे भाई साल भर की जो ऐसी तैसी करी है, उसकी बाल की खाल खींचते हैं, अगर अच्छा काम करो तो बोलते हैं कि ऐसा करते तो और अच्छा होता और अगर कोई काम समय पर नहीं होता है तो बस बंबू, कैसे भी करके मैनेजर खरीखोटी सुनायेगा। उसे ज्यादा रेटिंग नहीं देना है क्योंकि उसके पास भी टार्गेट होता है और उसके लिये तो उसे बकरा फ़ँसाना ही होता है।
ये अच्छा है कि एक बंदे को हायर करो और फ़िर उसे तीन चार लोगों के वर्कलोड से लोड कर दो और उसकी अच्छी बैंड बजाओ, जब हायर करो तब बोलो कि वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन, तो मैंने उनको बोल दिया था कि आई नीड वन मंथ लीव, आई हैव टू गो माई नैटिव, तो ये बोले थे कि ज्वॉईन कर लो, प्रोजेक्ट लो और नैटिव से ही काम कर लेना, नो नीड टू कम टू ऑफ़िस, मैंने उनको कह दिया सर देयर इस कनेक्टिविटी प्रॉब्लम सो इट विल नॉट बी पॉसिबल।
अब यह हालत है कि ऑफ़िस आओ तो पूरे ५ घंटे बर्बाद होते हैं दिन के, और पर्सनल लाईफ़ की तो बैंड बज गई है। दस बजे ऑफ़िस आओ तो साढ़े दस तक तो सैटल ही हो पाते हैं फ़िर थोड़ा काम करो, और साथ में ऑफ़िस आये हैं तो कुछ कलीग्स मिलने आ जाते हैं, कभी कोई अपनी स्क्रिप्ट की प्रॉब्लम लेकर आ जाता है और कभी अपन किसी के पास डिस्कसन के लिये चले जाते हैं, कब दो बज जाते हैं पता ही नहीं चलता है, फ़िर लंच के लिये चले जाओ और फ़िर आने के बाद छ: बजे तक जितना काम होता है बस उतनी ही प्रोडक्टिविटी होती है, घर से काम करो तो प्रोडक्टिविटी बराबर रहती है।
प्रोजेक्ट मैनेजर को बिल्ड की डिलिवरी हमेशा २ वीक पहले चाहिये होती है और उसके एक वीक पहले से जान खाना शुरू देता है, जब उसको बोलो कि आईपी सेटअप करने में ही एक दिन चला गया था, क्लाईंट की कनेक्टिविटी नहीं थी, तो उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बस उसको उसकी डिलीवरी टाईम पर चाहिये, ये नहीं कि क्लाईंट को ब्लैम करके डिलीवरी डेट आगे बढ़ा ले, बस जो काम करे उसकी तबियत बजाओ बैंड, यह तो सोच लिया और दिमाग में सैट हो गया है कि ऐसा ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है और जिस दिन अपना दिमाग सटक गया उसी दिन पेपर डाल दूँगा, फ़िर भले ही हाथ में दूसरा ऑफ़र हो या नहीं हो, फ़िर बाद में आई विल सर्च इन मार्केट, लेकिन इनको झेलना मुश्किल है।
बातें तो बहुत सारी हुईं, जितनी याद रही लिख दी, वैसे हर आई.टी. वाले का अपना दर्द होता है जो आई.टी. वाला ही अच्छे से समझ सकता है। वहीं बस के टेप में गाना बज रहा था –
“पहला नशा पहला खुमार,
नया प्यार है नया इंतजार,
कर लूँ मैं क्या अपना हाल ऐ दिले बेकरार….”
पिछले कुछ समय से उज्जैन का नाम लगातार समाचार चैनल में देख रहे होंगे वो भी धार्मिक नगरी के तौर पर नहीं, भ्रष्टाचारियों को पकड़ने को लेकर। नगरनिगम के चपरासी से क्लर्क तक से १० करोड़ से ज्यादा की संपत्ती की बरामदगी हुई है और संख्या ५०-६० करोड़ तक जा पहुँची है।
हमें यह तो पता था कि नगरनिगम में भ्रष्टाचार होता है क्योंकि बिल्कुल घर के पास है और वहाँ की संचालित गतिविधियाँ किसी से छूप नहीं पाती हैं। किसी भी काम को करवाने के लिये बिना पैसे दिये काम नहीं होता है। अब लोकायुक्त का तो बहुत काम बड़ गया है, क्योंकि अभी तो उन्होंने केवल चपरासी और क्लर्कों को ही पकड़ा है, और वो बिचारे पकड़े इसलिये गये कि उन्हें यह नहीं पता होगा कि भ्रष्टाचार की रकम को ठिकाने कैसे लगाना है। अब जब पड़े लिखे भवन इंजीनियर और नक्शा इंजीनियरों के यहाँ उनकी संपत्ती खंगाली जायेगी तो हो सकता है कि ये तो अभी तक जितनी रकम मिली है उसके रिकार्ड टूट जायें।
उज्जैन में हर १२ वर्ष में सिंहस्थ का आयोजन होता है, जिसमें करोड़ों रूपये सरकार द्वारा सिंहस्थ के लिये दिये जाते हैं, पिछले सिंहस्थ में लगभग ४०० करोड़ रूपये उज्जैन की सड़कों के लिये दिये गये थे, जिसमें यह हाल था कि सिंहस्थ के बाद सड़क ६ महीने भी नहीं टिक पाई, अगर ईमानदारी से उस रकम को खर्च किया जाता तो जनता सरकार को बधाई देती। अब यह सारा खेल समझ में आ रहा है। जब चपरासी और बाबुओं के पास इतना मिल रहा है तो अधिकारियों के पास तो समझ ही सकते हैं। आखिर धार्मिक नगरी उज्जैन में करोड़ों रूपया आता है और इन कर्मचारियों के पेट में चला जाता है।
कुछ दिन पहले झाबुआ से हमारे मित्र का फ़ोन आया कि फ़लाना जो है ऑडी में घूमता है और यहाँ के रेड्डी बंधु हो रहे हैं, फ़िर उनका मामला सब जगह उठा, परंतु बाद में ठंडा हो गया। अब ये करोड़ों के घपले करने वाले भी कभी हमारे मित्र थे, मतलब कॉलेज के जमाने में, तब कभी सोचा नहीं था कि कभी भविष्य में ऐसा भी होगा।
हमारी तो महाकालेश्वर से प्रार्थना है कि “हे महाकाल, जितने भी भ्रष्टाचारी, उज्जैन की पावन धरती पर हैं, उन्हें भस्म कर दो और उज्जैन को सारी सुख सुविधाओं से महरूम रखने वाले इन लोगों के प्रति कोई रहम मत करो”।
ये पुरानी पोस्टें भी देखें पसंद आयेंगी –
सावन का महीना और महाकाल बाबा की सवारी
सावन के महीने में भगवान महाकालेश्वर के रुप :-
आजकल बड़े बाजारों से ही खरीदारी की जाती है, फ़ायदा यह होता है कि हरेक चीज मिल जाती है और लगभग हरेक ब्रांड की चीजें मिल जाती हैं, तो अपनी पसंद से ले सकते हैं, चीजों को हाथ में लेकर देख सकते हैं। जबकि किराने की दुकान पर चीजों को बोलकर लेना होता है तो क्या क्या नया बाजार में आया है पता ही नहीं चलता है।
सब ठीक चल रहा था परंतु कुछ दिनों पहले पोलिथीन पर सरकार का फ़रमान क्या आया, आम आदमी के लिये आफ़त हो गई, अब अपने साथ पोलिथीन या थैले लेकर जाओ नहीं तो ये बड़े बाजार वाले लोगों को पोलिथीन के लिये १ रूपये से लेकर ५ रूपये तक का भुगतान करो। और लगभग सभी बाजार अपने थैले लाने पर कुछ छूट देते हैं या प्वांईंट्स आपके मेम्बरशिप कार्ड में जोड़ देते हैं।
जब काऊँटर पर जबरदस्त भीड़ होती है तो कैशियर बैग के प्वाईंट्स क्रेडिट करना भूल जाता है परंतु अगर पोलिथीन ली है तो उसके पैसे झट से बिल में जोड़ देता है। और अगर शिकायत करो तो जवाब होता है कि भीड़ बहुत थी तो भूल गये, तो हमने कहा भई अगर भीड़ में भूल जाते हो तो पोलिथीन बैग्स के भी पैसे लेने भूल जाया करो। कैशियर खिसिया गये और चुप हो गये।
खैर है छोटी सी बात परंतु हम भारतीय ग्राहक क्यों अपना हक छोड़ें, और ऐसा पता नहीं कितने ग्राहकों के साथ होता होगा, इसलिये एक शिकायत ईमेल से कर दी गई है। पता नहीं इन लोगों के कान भी होते हैं या नहीं, सुनेंगे या नहीं।
वैसे तो जिंदगी सीखने का नाम है और सीख कभी भी ली जा सकती है, उम्र का कोई बंधन नहीं होता । सीख किसी भी उम्र के व्यक्ति से ली जा सकती है जो कि जीवन में आगे बड़ते हुए हमेशा शिक्षा का काम करती है। कुछ सीखें जो इस वर्ष सीखीं –
अपने आप को हमेशा तैयार रखो, कभी भी बाजार जाना पड़ सकता है।
कभी भी अपनी तरफ़ से कोई भी बात किसी को भी ज्यादा न बताओ, जितना पूछा जाये केवल उतना ही बताओ।
किसी पर भी आँख मूँदकर भरोसा मत करो।
पहली बार में किसी भी व्यक्ति से मत खुलो, पता नहीं वह किस गुट का हो।
बुरा समय हो तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।
किसी पर भी अपनापन मत लादो, सबको अपने हिसाब से जिंदगी जीने दो।
समय बलवान हो तो कोई भी पहलवान बन सकता है।
कभी किसी से भी ज्यादा की उम्मीद मत करो।
जब भी किसी से प्यार करो ये जरूर सोच लो कि बस अब वह जाने वाला है।
जिस चीज से भागोगे, वह तुमसे दूर नहीं होगी और तेजी से नजदीक आ जायेगी। इसलिये बेहतर है कि दो दो हाथ कर लिया जाये।
किसी भी ईमेल भेजने से पहले एक बार पढ़ लिया जाये।
जो भी हो, खरी खरी आमने सामने बात कर लेनी चाहिये।
सारी बातें जो सीखी हैं वे कहीं न कहीं लिखी हुई मिल ही जायेंगी, परंतु कभी ध्यान नहीं दिया, पर वो एक कहावत है ना कि “ठोकर खाकर ही ठाकुर बनते हैं”, तो इतनी बातों के लिये तो ठाकुर बन ही गये हैं। और भी बहुत सारी सीखें हैं पर उन्हें लिखने के लिये शब्द नहीं मिल रहे।
ऐसे ही एक पोस्ट बहुत पहले लिखी थी, यह भी देखिये –
नववर्ष की शुभकामनाएँ ।
पता नहीं दिल कब मानेगा कि हाँ अब शरीर को ठंड लगती है, देखने से पता चलता है हाथ और पैर के बाल ठंड के मारे एक दम सीधे खड़े हैं जैसे किसी जंगल में किसी ने कोई तरकीब से बाँस के पेड़ उगा दिये हों। पहले जब ठंड पड़ती थी तो ऊन की वो ५-६ किलो की रजाई में घुसने का मजा ही कुछ और था परंतु याद आया वो तो बचपन था, जैसे जैसे किशोर हुए वो गोदड़ी गायब हुई और राजस्थानी रजाई आ गई, जब पहली बार राजस्थानी रजाई देखी थी तो ऐसा लगा था कि ये मारवाड़ी मजाक कर रहा है भला कभी इतनी पतली रजाई में ठंड भागती है क्या ? फ़िर भी हम ४ रजाई ले आये सबके लिये एक एक….
राजस्थानी रजाई का ही कसूर है उसने हमें सिखाया कि ठंड खत्म हो रही है, नहीं तो इसके पहले तो कंबल भी ओढ़ लेते थे और उसके रोएँ की चुभन इतनी अच्छी लगती थी क्योंकि अगर वह हटा देते तो ठंड लगती, चुपचाप कभी ट्रेन में कभी रेल्वे स्टेशन पर तो कभी बस स्टैंड में वह कंबल ओढ़े हाथ में चाय की कुल्हड़ से चाय पीते हुए और हाथ जो कंबल के बाहर होते थे वो हिमालय की हवाओं से ठंडे होते थे, उन हाथों को गर्म करने के लिये कभी अलाव के ऊपर रखते तो कभी कंबल के अंदर करके रगड़ से ठंडा करने की कोशिश करते । फ़िर हाथों के लिये कार्तिक मेले से दस्ताने लिये थे, परंतु वे रेग्जीन के दस्ताने हाथ और ठंडे करते थे तो माँ ने ऊन का दस्ताना बुन दिया था, जिसे कभी उतारने की इच्छा ही नहीं होती थी।
किशोरावस्था से जवानी तक आते आते स्वेटर और पुलोवरों का फ़ैशन खत्म हो चला था, अब जर्किनों का फ़ैशन था, स्वेटर में तो छन छान कर ठंडी हवा भी लगती थी परंतु जर्किन में बाहरी ठंडी हवा का कोई नामो निशां नहीं था। कभी भेड़ की फ़र वाली जर्किन कभी दोहरी तरफ़ वाली जर्किन, एक जर्किन खरीदो और दो जर्किनों के मजे लो। कभी पापा की जर्किन पहन लो कभी भाई की, कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले पूरे परिवार को एक साथ अपना सामना करना सिखाती थी, और सबका साईज एक हो जाता था। माँ ने इतने सारे हॉफ़ स्वेटर बनाये थे खासकर कुछ स्वेटर तो मेरे मनपसंदीदा थे जिनपर की गई डिजाईन तो माँ ने अपने आप की थी परंतु वे डिजाईन मन को ऐसे भाये कि उन्हें कभी जुदा नहीं कर पाया।
आज न वो स्वेटर पास हैं, न ही वो जर्किन, जर्किन तो हैं परंतु अकेले पहनना पड़ती है, न पापा हैं यहाँ ना भाई है यहाँ कि मेरी जर्किन में गर्मी बड़ जाये और न वो माँ का बुना हुआ हॉफ़ स्वेटर मेरे पास है, परंतु हाँ उन सबकी गर्मी मेरे पास है, तभी तो मैं आज भी कहता हूँ और नहीं मानता हूँ कि मुझे ठंड लग रही है…..