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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के लिये जवाबदेही

प्राकृतिक संसाधन क्या होते हैं, जो हमें प्रकृति से मिलते हैं, प्रकृति प्रदत्त होते हैं। हमें इसका उपयोग बहुत ही सावधानीपूर्वक करना चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं है।

गाजर इस विषय के संबंध में कल अपने केन्टीन में एक पोस्टर देखा था जिसमें दिखाया गया था कि एक गाजर को तैयार होने में लगभग ६ माह लगते हैं और उसको जमीन से निकालकर पकाने तक मात्र कुछ ही मिनिट लगते हैं, और हम कई बार सलाद या सब्जी फ़ेंक देते हैं, जिसमें केवल कुछ सेकण्ड ही लगते हैं, यह प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग ही तो है जिसे केवल जिम्मेदारी से आम व्यक्ति ही रोक सकता है। गाजर तो केवल एक उदाहरण है ऐसी कई वस्तुएँ हैं जिनका हम धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं।

PTI12_14_2011_000112B इसके बाद एक ट्रेनिंग में जाना हुआ जो कि बैंकिंग की थी, उसमें भी बताया गया कि कैसे वित्तीय संस्थाएँ प्राकृतिक संसाधनों को बचाने में अहम योगदान कर रही हैं, जो कि हर राष्ट्र के लिये बहुत ही अहम है, वित्तीय संस्थाएँ एवं नियामक देश की विदेशी मुद्रा को जाने से रोकते हैं, जो कि राष्ट्र के लिये संसाधन है।

OLYMPUS DIGITAL CAMERA         आज सुबह अखबार में एक कहानी पढ़ रहे थे जो कि इस प्रकार थी – एक गुरूजी अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिये प्रेरित करते थे परंतु शिष्य केवल सुनते थे उस पर अमल नहीं करते थे, एक दिन गुरू जी ने व्रत रखा और शाम को अपने एक शिष्य को कहा व्रत तोड़ने के लिये मुझे नीम की दो पत्तियों की जरूरत है जाओ ले आओ। थोड़ी देर बाद शिष्य आया और उसके हाथ में नीम की पूरी टहनी देखकर गुरूजी रुआंसे हो गये और उन्होंने कहा कि मुझे केवल दो पत्तियों की जरूरत थी पूरी टहनी की नहीं, यह आदेश मैंने तुम्हें दिया था तो इस प्राकृतिक संसाधन के दुरुपयोग का जिम्मेदार में हुआ इसलिये अब इसका प्रायश्चित स्वरूप आज मैं व्रत नहीं तोड़ूँगा। शिष्यों को बहुत दुख हुआ।

थैला काश कि सब प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अपनी जवाबदेही समझें। जैसे सब्जी लेने जायें या बाजार कुछ भी समान लेने जायें तो अपने थैले साथ ले जायें जिससे पोलिथीन का कम से कम उपयोग करके हम प्रकृति को नुकसान से बचा सकें।

अब IRCTC की वेबसाईट अच्छा काम कर रही है।

कल काफ़ी दिनों बाद रेल्वे के आरक्षण के लिये IRCTC की वेबसाईट पर जाना हुआ। हालत यह थी की अपना यूजर आई डी और पासवर्ड भी याद करने में काफ़ी समय लगा। खैर IRCTC की वेबसाईट की रफ़्तार पहले जैसी तेज थी, बस जब तत्काल का समय होता है तभी या तो मंद हो जाती थी या फ़िर बंद हो जाती थी। परंतु कल आलम अलग था, हम तो पौने आठ से ही लॉगिन करके बैठे थे, पुरानी आदत जो थी 🙂 अब आदत इतनी जल्दी जाती भी नहीं है।

खैर जैसे ही आठ बजे वैसे ही IRCTC को जोर का झटका लगा और एक Error message हमारे सामने आ गया, सारे अरमान धूमिल होते नजर आये। खैर साथ में हम indianrail.gov.in साईट पर भी सीट की उपलब्ध संख्या पर नजर रखे हुए थे। पहले १८४ सीटें मात्र ३-४ मिनिट में ही खत्म हो लेती थीं परंतु जब कल देखा तो लगभग ८.१० तक मात्र १० सीट ही आरक्षित हुईं थीं। फ़िर भी वेबसाईट मंदगति से चलती रही और आखिरकार आरक्षण हो ही गया।

तत्काल में आरक्षण जब से एक दिन पहले हुआ है तब से लगता है कि सुविधाएँ अच्छी हुई हैं और Quick Book भी  8 – 10 सुबह बंद रहने लगा है, वरना तो पहले Quick Book ही सहारा था। खैर हमारे मित्र बहुत खुश हुए कि आरक्षण मिल गया क्योंकि मुंबई उज्जैन अवंतिका एक्सप्रैस में हमेशा मारा मारी रहती है। हमारे मित्र आज सुबह बाहर से प्रवास करके आज मुंबई लौटे हैं, बड़ी लंबी फ़्लाईट थी, लगभग २० घंटे की, तो कल सुबह उज्जैन पहुँच जायेंगे।

धन्यवाद रेल्वे को जो आम आदमी की उसे याद आई, और IRCTC को भी धन्यवाद कि अपना Infrastructure अच्छा किया जिससे कम से कम वेबसाईट चल रही है।

आठ साल बाद फ़िल्म देखने का असर

वर्षों बाद सिनेमा हॉल में जाना बिल्कुल नया अनुभव लगा, ऐसा लगा कि शायद फ़िल्म देखने सिनेमा पहली बार गये हैं। सिनेमा हॉल बदल गये हैं, सिनेमा हॉल की जगह बदल गई है यहाँ तक की फ़िल्मों में भी बहुत कुछ बदल गया है।

मुझे याद है बचपन से जैसे हर बच्चे को सिनेमा हॉल में जाना एक भिन्न प्रकार का अनुभव होता है और जो आकर्षण सिनेमा हॉल में होता है फ़िल्मों के लिये वह अद्भुत होता है, जो अनुभव मैंने शायद पहली बार किया था, वही अनुभव आज शायद मेरे बेटे ने किया होगा।

मुझे अपने शहरों के सिनेमा हॉल अभी,  तक याद हैं, जिनमें में अपने बाल, किशोरावस्था में गया था। पहले साईकिल से जाते थे और साईकिल स्टैंड पर १ रूपये स्टैंड का किराया होता था फ़िर टिकट के लिये लाईन में लगते थे और हमेशा १५ मिनिट पहले टॉकीज जाते थे जिससे वहाँ लगे उस फ़िल्म के सारे पोस्टर और आने वाली फ़िल्मों के पोस्टर इत्मिनान से देख सकें। उन पोस्टरों में पता नहीं क्या होता था पर जो आकर्षण उन पोस्टरों में शायद मेरे लिये था, वह शायद सब के लिये होता था, तभी तो टॉकीज के अंदर लॉबी में भी पोस्टर देखने की इतनी भीड़ होती थी।

टॉकीज जाकर फ़िल्म देखना मित्र समूह में विशेष बात मानी जाती थी, और अपनी कॉलर ऊपर करके उस फ़िल्म के डॉयलाग बोलना हेकड़ी ! वह जमाना ही कुछ और था अब जमाना बदल गया है।

जब छात्र थे तब कोशिश रहती थी कि सबसे आगे की सीट पर बैठें, और कम कीमत में फ़िल्म देखकर पैसे बचाकर अगली फ़िल्म भी देख लें। फ़िर जैसे जैसे बड़े हुए हमारी सीट टॉकीज में पीछे खिसकती गई, पहले फ़र्स्ट फ़िर स्टॉल, फ़िर स्पेशल स्टॉल फ़िर पहली मंजिल पर बालकनी और उसके पीछे बॉक्स कई बार दोस्तों के साथ फ़ैमिली बॉक्स का भी लुत्फ़ उठाया जिसमें सोफ़े हुआ करते थे

कुछ टॉकीज बेहद प्रसिद्ध थे और उस समय तो टॉकीजों में भी अच्छे से अच्छे होने की प्रतियोगिता चलती थी, म.प्र. का सबसे बड़ा टॉकीज होने का गौरव, पहला डॉल्बी साऊँड होने का गौरव या फ़िर म.प्र. में सुविधा के हिसाब से सबसे अच्छा टॉकीज होने का गौरव।

उस जमाने में हमारे शहर में लगभग १० टॉकीज थे, आज पता नहीं कितने हैं, कुछ टॉकीज तोड़कर तो उसमें आधुनिक बाजार बना दिये गये हैं। कुछ टॉकीज ऐसे थे जिनमें जाना हम अपनी शान के खिलाफ़ समझते थे और कुछ टॉकीज ऐसे थे जहाँ केवल अश्लील याने कि एड्ल्ट फ़िल्में ही चला करती थीं, जहाँ जाना मतलब कि अपनी इज्जत की ऐसी तैसी करना। आज भी याद है एक टॉकीज है “मोहन” जिसमें केवल “एडल्ट” फ़िल्में ही लगती थीं, उसमें लगी “जाँबाज” और हम मित्र मंडली के साथ देखने गये और फ़िल्म के बाद बाहर निकले तो दोस्तों के कुछ रिश्तेदारों ने “मोहन” से निकलते देख लिया और जो हंगामा हुआ, वो तो भला हो कि “एडल्ट” नहीं थी, कुछ टॉकीज ऐसे होते थे कि जिसमें जाना और वापिस घर आना रूतबे का का सबब हुआ करता था।

नये दौर का सिनेमा, चाय पकौड़े और समोसे से पॉपकार्न के टोकरे, शीतपेय का जमाना आ गया है। सब बदल गया है, देखने वाले भी बदल गये हैं और दिखने वाले भी।

आखिरी फ़िल्म जयपुर में प्रसिद्ध टॉकीज “राज मंदिर” में “खाकी” देखी थी और कल लगभग ८ वर्ष बाद “अग्निपथ” सिनेमेक्स में देखी।

देखा पापा टीवी पर विज्ञापन देखकर IDBI Life Childsurance Plan लेने का नतीजा, “लास्ट मूमेंट पर डेफ़िनेटली पैसा कम पड़ेगा”।

हाल ही में आप सभी लोग टीवी पर आई.डी.बी.आई. फ़ेडेरल जीवन बीमा कंपनी का बच्चों के जीवन बीमा का  एक विज्ञापन बहुत देख रहे होंगे “देखा पापा, ऐसा वैसा प्लॉन लोगे तो लास्ट मूमेंट पर पैसा कम पड़ सकता है” और फ़िर कहता है कि “आई.डी.बी.आई. लाईफ़ चाईल्ड्श्योरेंस प्लॉन खरीदें – प्लॉन जो फ़ैल न हो”।
विज्ञापन वाकई बहुत ही भावनात्मक है, विज्ञापन एजेन्सी ने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। मुझे लगता है कि आप सभी लोग भी इस भावनात्मक विज्ञापन से जरूर प्रभावित हुए होंगे और बच्चों के लिये इस प्लॉन को लेने की सोच रहे होंगे।
बद्किस्मती से जिसने भी यह प्लॉन बनाया है उसे हम शून्य (0) देंगे क्योंकि यह प्लॉन निवेशक के लिये अच्छा नहीं है। एक मित्र ने भी यह विज्ञापन देखा और फ़ोन करके पूछा कि विज्ञापन बहुत अच्छा है, पर यह देखकर बताओ कि उत्पाद अच्छा है या नहीं ? मुझे यह प्लॉन खरीदना चाहिये या नहीं ?
मैं वेबसाईट पर गया और उनका ब्रॉऊशर डाऊनलोड किया, और उनके चार्जेस को देखकर संत्रस्त हो गया । ( जो कि कभी भी निवेशक को बताये ही नहीं जाते हैं।) ये देखिये –
idbichildsuranceplanअगर @10% भी इस प्लॉन से मिलता है जो कि बीमा कंपनी द्वारा प्रदर्शित और विज्ञापित किया जा रहा है, तो भी आपको शायद ही सकारात्मक रिटर्न्स मिल पायेंगे, और इस बात पर हम यह कह सकते हैं, अगर आप यह प्लॉन खरीदते हैं तो “लास्ट मूमेंट पर डेफ़िनेटली पैसा कम पड़ेगा”।

सबसे बढ़िया है कि एस.आई.पी. से म्यूचयल फ़ंड में निवेश किया जाये और परिवार को सुरक्षित रखने के लिये टर्म प्लॉन लिया जाये। यह काफ़ी समय से आजमाया हुआ समीकरण है पर दुर्भाग्य से केवल 5% लोग ही इसे समझते हैं।
एक और सलाह, अगर पिछले ३-४ वर्षों में आपने कोई भी बच्चों का बीमा प्लॉन खरीदा है तो उसका वापिस से विश्लेषण कर लेना चाहिये और अगर जरूरत पड़े तो उस बीमा को खत्म करके म्यूचयल फ़ंड में एस.आई.पी. के जरिये निवेश करें। आपको लंबे समय में इस प्लॉन से तो अच्छा रिटर्न मिलेगा।

यह एटिका वेल्थ के ईमेल का अनुवादित स्वरूप है।

जिनका स्लोगन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है – “What is good for the client is also good for the firm” – T Rowe Price Jr.

IDBI Federal Childsurance Engineer Advertisment –

IDBI Federal Childsurance Doctor Advertisment –

बिहार की लिट्ठी ऑन व्हील्स बैंगलोर में (Littionwheels.com in Bangalore)

पिछले ४ दिनों से यहीं घर के पास एक नई प्रकार की खाने की चीज दिखी जो कि दक्षिण भारत की नहीं थी, यह थी बिहार की लिट्ठी चोखा। दाम भी कम और चीज भी बेहतरीन, लिट्ठी हमने पहली बार पटना में फ़्रेजर रोड पर कहीं खाई थी, हमें तो वही स्वाद लगा। अब बैंगलोर में अगर बिहारी स्वाद मिल रहा हो तो और क्या चाहिये, आज दोपहर का भोजन बनी यही लिट्ठी चोखा, लिट्ठी छोला और लिट्ठी चना, लेने गये थे एक प्लेट दाल बाटी परंतु दाल खत्म हो गई तो हमने कहा बाकी का सब बाँध दो 🙂
खास बात कि पूरी योजनाबद्ध तरीके से इसकी शुरूआत की गई है और फ़ेसबुक, ट्विटर और वेबसाईट बनाई गई है।
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उम्मीद है कि कुछ और भी चीजें इसी तरह से खाने को मिलें जैसे कि पोहे जलेबी ।

आई.टी. वालों का दर्द उनकी ही जबानी..वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन… (Pain of IT guys.. by there own..)

शाम को बस में बैठते लोगों की दिन भर की भड़ास सुनने को मिलती है, अगर दो लोग हैं तो आपस में चिकिर चिकिर और और अगर अकेला है तो फ़ोन पर या फ़िर मन ही मन में पर भड़ास तो निकलती ही रहती है।

कल भी कुछ ऐसा ही हुआ, दो बंदे आई.टी. कंपनी के थे और धड़ाधड़ चिकिर चिकिर कर रहे थे।

यार आज मेरा मैनेजर पूरा माथा खा गया पूरे दो घंटे रेंटिंग पर डिस्कसन कर रहा था, अच्छा भला वर्क फ़्रोम होम कर रहा था, पर ये रेटिंग के डिस्कसन के कारण ऑफ़िस आना पड़ रहा है, जिंदगी में पहले बार २ घंटे का कम्यूटिंग कर रहा हूँ, ऑफ़िस आओ तो काम तो होता नहीं है, मैनेजर से डिस्कसन में ही टाईम निकल जाता है। मुझे बोलता है कि थोड़ी देर बाद फ़िर डिस्कसन के लिये बैठते हैं, मैंने तो कह दिया मेरा एक अर्जेंट कॉनकाल है, मैं नहीं आ पाऊँगा, तो बोलता है कि चलो कल आओगे तो ब्रेन स्टोर्मिंग करेंगे, मैंने तुरत फ़ुरत कह दिया, बोस कल मैं ऑफ़िस नहीं आ रहा हूँ, कल मैं वर्क फ़्रॉम होम कर रहा हूँ। यहाँ ऑफ़िस आकर काम नहीं होता केवल डिस्कसन होता है।

दूसरे ने पूछा डिस्कसन में क्या बोला मैनेजर – तो पहला बोला अरे भाई साल भर की जो ऐसी तैसी करी है, उसकी बाल की खाल खींचते हैं, अगर अच्छा काम करो तो बोलते हैं कि ऐसा करते तो और अच्छा होता और अगर कोई काम समय पर नहीं होता है तो बस बंबू, कैसे भी करके मैनेजर खरीखोटी सुनायेगा। उसे ज्यादा रेटिंग नहीं देना है क्योंकि उसके पास भी टार्गेट होता है और उसके लिये तो उसे बकरा फ़ँसाना ही होता है।

ये अच्छा है कि एक बंदे को हायर करो और फ़िर उसे तीन चार लोगों के वर्कलोड से लोड कर दो और उसकी अच्छी बैंड बजाओ, जब हायर करो तब बोलो कि वी नीड यू वेरी अर्जेंटली टैल मी व्हेन यू कैन ज्वॉईन, तो मैंने उनको बोल दिया था कि आई नीड वन मंथ लीव, आई हैव टू गो माई नैटिव, तो ये बोले थे कि ज्वॉईन कर लो, प्रोजेक्ट लो और नैटिव से ही काम कर लेना, नो नीड टू कम टू ऑफ़िस, मैंने उनको कह दिया सर देयर इस कनेक्टिविटी प्रॉब्लम सो इट विल नॉट बी पॉसिबल।

अब यह हालत है कि ऑफ़िस आओ तो पूरे ५ घंटे बर्बाद होते हैं दिन के, और पर्सनल लाईफ़ की तो बैंड बज गई है। दस बजे ऑफ़िस आओ तो साढ़े दस तक तो सैटल ही हो पाते हैं फ़िर थोड़ा काम करो, और साथ में ऑफ़िस आये हैं तो कुछ कलीग्स मिलने आ जाते हैं, कभी कोई अपनी स्क्रिप्ट की प्रॉब्लम लेकर आ जाता है और कभी अपन किसी के पास डिस्कसन के लिये चले जाते हैं, कब दो बज जाते हैं पता ही नहीं चलता है, फ़िर लंच के लिये चले जाओ और फ़िर आने के बाद छ: बजे तक जितना काम होता है बस उतनी ही प्रोडक्टिविटी होती है, घर से काम करो तो प्रोडक्टिविटी बराबर रहती है।

प्रोजेक्ट मैनेजर को बिल्ड की डिलिवरी हमेशा २ वीक पहले चाहिये होती है और उसके एक वीक पहले से जान खाना शुरू देता है, जब उसको बोलो कि आईपी सेटअप करने में ही एक दिन चला गया था, क्लाईंट की कनेक्टिविटी नहीं थी, तो उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बस उसको उसकी डिलीवरी टाईम पर चाहिये, ये नहीं कि क्लाईंट को ब्लैम करके डिलीवरी डेट आगे बढ़ा ले, बस जो काम करे उसकी तबियत बजाओ बैंड, यह तो सोच लिया और दिमाग में सैट हो गया है कि ऐसा ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है और जिस दिन अपना दिमाग सटक गया उसी दिन पेपर डाल दूँगा, फ़िर भले ही हाथ में दूसरा ऑफ़र हो या नहीं हो, फ़िर बाद में आई विल सर्च इन मार्केट, लेकिन इनको झेलना मुश्किल है।

बातें तो बहुत सारी हुईं, जितनी याद रही लिख दी, वैसे हर आई.टी. वाले का अपना दर्द होता है जो आई.टी. वाला ही अच्छे से समझ सकता है। वहीं बस के टेप में गाना बज रहा था –

“पहला नशा पहला खुमार,

नया प्यार है नया इंतजार,

कर लूँ मैं क्या अपना हाल ऐ दिले बेकरार….”

हे महाकाल! भ्रष्टाचारियों ने उज्जैन को बदनाम करके रख दिया ।

पिछले कुछ समय से उज्जैन का नाम लगातार समाचार चैनल में देख रहे होंगे वो भी धार्मिक नगरी के तौर पर नहीं, भ्रष्टाचारियों को पकड़ने को लेकर। नगरनिगम के चपरासी से क्लर्क तक से १० करोड़ से ज्यादा की संपत्ती की बरामदगी हुई है और संख्या ५०-६० करोड़ तक जा पहुँची है।

हमें यह तो पता था कि नगरनिगम में भ्रष्टाचार होता है क्योंकि बिल्कुल घर के पास है और वहाँ की संचालित गतिविधियाँ किसी से छूप नहीं पाती हैं। किसी भी काम को करवाने के लिये बिना पैसे दिये काम नहीं होता है। अब लोकायुक्त का तो बहुत काम बड़ गया है, क्योंकि अभी तो उन्होंने केवल चपरासी और क्लर्कों को ही पकड़ा है, और वो बिचारे पकड़े इसलिये गये कि उन्हें यह नहीं पता होगा कि भ्रष्टाचार की रकम को ठिकाने कैसे लगाना है। अब जब पड़े लिखे भवन इंजीनियर और नक्शा इंजीनियरों के यहाँ उनकी संपत्ती खंगाली जायेगी तो हो सकता है कि ये तो अभी तक जितनी रकम मिली है उसके रिकार्ड टूट जायें।

उज्जैन में हर १२ वर्ष में सिंहस्थ का आयोजन होता है, जिसमें करोड़ों रूपये सरकार द्वारा सिंहस्थ के लिये दिये जाते हैं, पिछले सिंहस्थ में लगभग ४०० करोड़ रूपये उज्जैन की सड़कों के लिये दिये गये थे, जिसमें यह हाल था कि सिंहस्थ के बाद सड़क ६ महीने भी नहीं टिक पाई, अगर ईमानदारी से उस रकम को खर्च किया जाता तो जनता सरकार को बधाई देती। अब यह सारा खेल समझ में आ रहा है। जब चपरासी और बाबुओं के पास इतना मिल रहा है तो अधिकारियों के पास तो समझ ही सकते हैं। आखिर धार्मिक नगरी उज्जैन में करोड़ों रूपया आता है और इन कर्मचारियों के पेट में चला जाता है।

कुछ दिन पहले झाबुआ से हमारे मित्र का फ़ोन आया कि फ़लाना जो है ऑडी में घूमता है और यहाँ के रेड्डी बंधु हो रहे हैं, फ़िर उनका मामला सब जगह उठा, परंतु बाद में ठंडा हो गया। अब ये करोड़ों के घपले करने वाले भी कभी हमारे मित्र थे, मतलब कॉलेज के जमाने में, तब कभी सोचा नहीं था कि कभी भविष्य में ऐसा भी होगा।

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हमारी तो महाकालेश्वर से प्रार्थना है कि “हे महाकाल, जितने भी भ्रष्टाचारी, उज्जैन की पावन धरती पर हैं, उन्हें भस्म कर दो और उज्जैन को सारी सुख सुविधाओं से महरूम रखने वाले इन लोगों के प्रति कोई रहम मत करो”।

ये पुरानी पोस्टें भी देखें पसंद आयेंगी –

सावन का महीना और महाकाल बाबा की सवारी

सावन के महीने में भगवान महाकालेश्वर के रुप :-

महाकाल स्थित श्रीनागचंद्रेश्वर नागपंचमी और हमारी यादें
मुंबई से उज्जैन यात्रा बाबा महाकाल की चौथी सवारी और श्रावण मास की आखिरी सवारी 3 (Travel from Mumbai to Ujjain 3, Mahakal Savari)
महाकाल बाबा की शाही सवारी १७ अगस्त को और महाकवि कालिदास का मेघदूतम में महाकाल वर्णन..
उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – १

पोलिथीन के रूपये फ़ट से डेबिट और बैग के देने में आनाकानी

आजकल बड़े बाजारों से ही खरीदारी की जाती है, फ़ायदा यह होता है कि हरेक चीज मिल जाती है और लगभग हरेक ब्रांड की चीजें मिल जाती हैं, तो अपनी पसंद से ले सकते हैं, चीजों को हाथ में लेकर देख सकते हैं। जबकि किराने की दुकान पर चीजों को बोलकर लेना होता है तो क्या क्या नया बाजार में आया है पता ही नहीं चलता है।

सब ठीक चल रहा था परंतु कुछ दिनों पहले पोलिथीन पर सरकार का फ़रमान क्या आया, आम आदमी के लिये आफ़त हो गई, अब अपने साथ पोलिथीन या थैले लेकर जाओ नहीं तो ये बड़े बाजार वाले लोगों को पोलिथीन के लिये १ रूपये से लेकर ५ रूपये तक का भुगतान करो। और लगभग सभी बाजार अपने थैले लाने पर कुछ छूट देते हैं या प्वांईंट्स आपके मेम्बरशिप कार्ड में जोड़ देते हैं।

जब काऊँटर पर जबरदस्त भीड़ होती है तो कैशियर बैग के प्वाईंट्स क्रेडिट करना भूल जाता है परंतु अगर पोलिथीन ली है तो उसके पैसे झट से बिल में जोड़ देता है। और अगर शिकायत करो तो जवाब होता है कि भीड़ बहुत थी तो भूल गये, तो हमने कहा भई अगर भीड़ में भूल जाते हो तो पोलिथीन बैग्स के भी पैसे लेने भूल जाया करो। कैशियर खिसिया गये और चुप हो गये।

खैर है छोटी सी बात परंतु हम भारतीय ग्राहक क्यों अपना हक छोड़ें, और ऐसा पता नहीं कितने ग्राहकों के साथ होता होगा, इसलिये एक शिकायत ईमेल से कर दी गई है। पता नहीं इन लोगों के कान भी होते हैं या नहीं, सुनेंगे या नहीं।

दादी माँ की तिरुवातिरा त्यौहार की (तमिल) कहानी

आज रविवार को ऑफ़िस के लिये निकले तो अपने नियत समय पर ही निकले परंतु ट्राफ़िक ना होने की वजह से थोड़ा जल्दी ऑफ़िस पहुँच लिये। ऑफ़िस पहुँचे तो ऐसे ही बात हो रही थी कि एक टीममेट जो कि तमिलनाडु से है बोले कि आज तो तिरुवातिरा त्यौहार है। हमने कम से कम ३-४ बार पूछा तब जाकर नाम समझ में आया। साधारणतया: हर बार यही होता है क्योंकि उनका उच्चारण और हमारा उच्चारण बहुत ही अलग होता है।
अब हमने पूछा कि तिरुवातिरा त्यौहार क्या होता है, तो हमारे टीम के सदस्य ने कहा मेरी दादी ने इसके बारे में कहानी सुनाई थी वह सुनाती हूँ, हम भी ध्यान से सुनने लगे।
एक बार एक राज्य था जो कि कावेरी नदी के किनारे था और वहाँ बाढ़ आ गई, तो उस राज्य के राजा ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि सभी घरों से कम से कम एक व्यक्ति नदी के किनारे रेत को इस तरह से लगाया जाये कि बाढ़ का पानी राज्य में ना आने पाये। और जो राजा का आदेश नहीं मानेगा वह दंड का भागी होगा। सभी घरों से एक एक व्यक्ति इस काम में लग गये। उसी राज्य में एक बुढ़िया रहती थी जो कि मिठाई बनाकर बेचकर अपना गुजारा करती थी और उसका कोई बेटा भी नहीं था, वह सोच में पड़ गई कि क्या किया जाये। मेरे बस में रेत को नदी के किनारे लगाना है नहीं और मेरे घर में कोई भी नहीं है, शाम को मुझे दंड मिलना निश्चित है।
तभी बुढ़िया ने अपने आराध्य देव शिवजी का ध्यान किया और उनकी पूजा करने लगी और साथ ही साथ दंड की भी चिंता कर रही थी, तो शिवजी एक गड़रिये के भेष बनाकर बुढ़िया माँ के सामने प्रकट हुए और कहा कि बुढ़िया माँ मैं तुम्हारा काम कर सकता हूँ पर उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा, तो बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास तो रूपये पैसे नहीं हैं, मेरे पास तो केवल मिठाईयाँ हैं, मेरे काम के एवज में ये मिठाई ले सकते हो। शिवजी तैयार हो गये और मिठाई खाने में मस्त हो गये। शिवजी मिठाई खाने में मगन हो गये और काम को भूल गये, बुढ़िया को चिंता होने लगी। शाम को जब राजा राज्य के भ्रमण पर निकला तो देखा कि बुढ़िया को दी गई जगह पर रेत नहीं लगाई गई है, तो राजा ने पूछा कि यह कौन है जिसने अपना कार्य पूरा नहीं किया है, तो बुढ़िया बोली कि ये मेरी जगह है और इस चरवाहे ने तय किया था कि मिठाई के बदले में यह मेरा काम करेगा परंतु यह केवल मिठाई खाता रहा और काम नहीं किया।
चरवाहा अभी भी मिठाई खाने में मगन था, राजा ने चरवाहे से पूछा कि तुमने बुढ़िया माँ का काम क्यों नहीं किया और बुढ़िया माँ को धोखा दिया तुम्हें तो सजा मिलनी चाहिये। राजा ने जोर से बेंत से चरवाहे के पीठ पर मारा तो इतनी जोर से लगा कि जैसे बस खून ही निकलने वाला हो, और वहाँ खड़ी प्रजा भी उसी तरह कराहने लगी, सारी प्रजा को भी उतनी ही तेज पीड़ा हुई, राजा ने बेंत फ़ेंकी और चरवाहे से पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं, चरवाहे ने अपना असली शिव रूप सामने लाया और संपूर्ण राज्य को आशीर्वाद दिया कि आज के बाद इस राज्य में कावेरी नदी की बाढ़ से राज्य परेशान नहीं होगा, और आज का दिन तिरुवातिरा के नाम से मनाया जायेगा और आज के दिन जिन मिठाईयों का सेवन मैंने किया है, वही मिठाईयाँ बनाई जायेंगी।
दादी माँ की कहानी सुनकर इतना मजा आया कि मैंने सोचा कि लिख दी जाये। खैर दादी माँ की कहानी होती ही मजेदार हैं। ऐसा लगता है कि सब सामने ही घट रहा है।

वर्ष २०११ में जिंदगी जो सीख सिखा गई ।

वैसे तो जिंदगी सीखने का नाम है और सीख कभी भी ली जा सकती है, उम्र का कोई बंधन नहीं होता । सीख किसी भी उम्र के व्यक्ति से ली जा सकती है जो कि जीवन में आगे बड़ते हुए हमेशा शिक्षा का काम करती है। कुछ सीखें जो इस वर्ष सीखीं –

अपने आप को हमेशा तैयार रखो, कभी भी बाजार जाना पड़ सकता है।

कभी भी अपनी तरफ़ से कोई भी बात किसी को भी ज्यादा न बताओ, जितना पूछा जाये केवल उतना ही बताओ।

किसी पर भी आँख मूँदकर भरोसा मत करो।

पहली बार में किसी भी व्यक्ति से मत खुलो, पता नहीं वह किस गुट का हो।

बुरा समय हो तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।

किसी पर भी अपनापन मत लादो, सबको अपने हिसाब से जिंदगी जीने दो।

समय बलवान हो तो कोई भी पहलवान बन सकता है।

कभी किसी से भी ज्यादा की उम्मीद मत करो।

जब भी किसी से प्यार करो ये जरूर सोच लो कि बस अब वह जाने वाला है।

जिस चीज से भागोगे, वह तुमसे दूर नहीं होगी और तेजी से नजदीक आ जायेगी। इसलिये बेहतर है कि दो दो हाथ कर लिया जाये।

किसी भी ईमेल भेजने से पहले एक बार पढ़ लिया जाये।

जो भी हो, खरी खरी आमने सामने बात कर लेनी चाहिये।

सारी बातें जो सीखी हैं वे कहीं न कहीं लिखी हुई मिल ही जायेंगी, परंतु कभी ध्यान नहीं दिया, पर वो एक कहावत है ना कि “ठोकर खाकर ही ठाकुर बनते हैं”, तो इतनी बातों के लिये तो ठाकुर बन ही गये हैं। और भी बहुत सारी सीखें हैं पर उन्हें लिखने के लिये शब्द नहीं मिल रहे।

ऐसे ही एक पोस्ट बहुत पहले लिखी थी, यह भी देखिये –

जिंदगी जीने के ये ३० नियम पिछले साल कहीं से मिले थे पर अब भी कुछ ही नियमों को धारण कर पाये हैं, बचे हुए नियम इस वर्ष पूरे करने की तमन्ना है, देखिये..

नववर्ष की शुभकामनाएँ ।