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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

कौन से मूवर्स पैकर्स की सेवायें ली जायें, मुझे अब मुंबई से १२०० किमी दूर जाना है। (Movers n packers services)

   मुझे अगले महीने के मध्य में मुंबई से १२०० कि.मी. दूर अपना समान स्थानांतरण करना है, और इतने सारे मूवर्स एन्ड पैकर्स से पूछा और गूगल के जरिये खोज भी की, तो और भी सांसत में आ गये।

    हमने तकरीबन ५ मूवर्स एन्ड पैकर्स से बात की और कोटेशन लिया पर सबकी शिकायतें हैं, अब समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें और किस की सेवा का उपयोग करें।

अभी तक जिनको बुलाया है वे इस प्रकार हैं –

1. Safe Movers & Packers

2. Sahara Movers & Packers

3. Agarwal Movers & Packers, Hyderabad

4. Agarwal Movers & Packers Pvt. Ltd., (Delhi)

सबसे सस्ता पहला वाला है और सबसे महँगा आखिरी चौथा वाला है।

    और किस तरह से समान को स्थानांतरित किया जा सकता है, यह भी बताईयेगा। बस जरा जल्दी ….।

मुंबई का सफ़र २३/११/२०१० भाग – ३ (Mumbai Travel 23/11/2010 – Part – 3)

भाग – १, भाग – २

    लोकल आखिरकार चर्चगेट स्टेशन पर पहुँच ही गयी, पर लोकल से उतरना भी आसान नहीं है, क्योंकि मैं चर्चगेट पहुँचा था लगभग शाम के ५.४० बजे और शाम ५.०० बजे से रात ९-९.३० बजे तक वहाँ से बोरिवली या विरार के लिये आने वाले लोगों की भीड़ लगी रहती है, और जैसे ही लोकल रुकती है, वैसे ही सीट के लिये लोग लोकल में टूट पड़ते हैं, घमासान मच जाता है, उतरने वाले यात्री चुपचाप दुबके हुए खड़े होते हैं, जब भीड़ का वेग कम हो जाता है तब उतरते हैं, अगर कोई नया व्यक्ति मुंबई में आया होता है और उसे यह सब पता नहीं होता है तो या तो कोई बता देता है और वह चुपचाप वैसा ही करता है नहीं तो बेचारे का मुँह ही टूटता है, और लोगों की गाली अलग खाता है।

    चर्चगेट स्टेशन पर कोई गेट नहीं है बस स्टॆशन का नाम चर्चगेट है, हम बाहर निकल रहे थे, और भीड़ अपने पूरे वेग से लोकल पकड़ने की और प्लेटफ़ॉर्म की और बड़ रही थी, हमें भीड़ को चीरते हुए आगे बड़ना पड़ रहा था। फ़िर उल्टे हाथ की ओर का सबवे पकड़कर सीधे अहिल्याबाई होलकर बस स्थानक तक पहुँचे, इसी सबवे में सड़क की एक लड़ाई का शूट हुआ था, जिसमें संजय दत्त ४-५ गुंडों को मारते हैं।

    सबसे पहले हमने ५ रुपये का छोटा ग्लास गन्ने का रस पिया, लोग कहते हैं कि यह हाईजीनिक नहीं है, परंतु अगर मन हो तो वह कर ही लेना चाहिये, फ़िर बाद में जो होगा वो देखेंगे, परंतु अगर कुछ होना होता तो शायद बहुत सारे लोगों को हो गया होता। फ़िर अपने नोकिया ई ६३ पर गूगल मैप्स खोला और डी.एन.रोड जहाँ जाना था, रास्ता देखा और चल पड़े, वैसे तो फ़ोर्ट का पूरा एरिया पैदल कई बार नापा है, परंतु इस बार कई दिनों बाद जाना हुआ था, तो कहीं गलत रास्ते पर न पहुँच जायें इसलिये गूगल मैप की सहायता ले ही ली।

    बीच में २-३ सिग्नल भी थे जहाँ पर सिगनल लाल बत्ती होने तक लगातार वाहन अपनी पूरी रफ़्तार से चौराहे पार करते रहते हैं, और लाल बत्ती होते ही गजब की रफ़्तार से ब्रेक भी लगा देते हैं। यह देखना भी किसी रोमांच से कम नहीं होता है, बीच में ही फ़ैशन स्ट्रीट भी पड़ती है, जहाँ कम बजट में अच्छी चीजें मिल जाती हैं, मोल भाव करना ही होता है, बस आपको मोलभाव करने में महारत होनी चाहिये। फ़िर पहुँचे हुतात्मा चौक, जिसे शायद हार्निमेन सर्किल और फ़्लोरा फ़ाऊँटेन भी कहा जाता है, जहाँ चारों तरफ़ पुरानी इमारते दिखेंगी परंतु उसमें कार्यालय सारे अंतर्राष्ट्रीय बैंक या कंपनी के होंगे, बहुत सारी भारतीय कंपनियों के भी कार्यालय यहाँ हैं।

डबल डेकर बस     वैसे जितने खुले फ़ुटपाथ मुंबई के इस क्षैत्र में हैं उतने शायद ही कहीं और होंगे। यह फ़ुटपाथों का स्वर्ग है, यहाँ पैदल चलने का अपना अलग ही मजा है, पुरानी इमारतें देखते जाओ, चमकती सड़कों पर डबल डेकर बसें और पुरानी फ़िएट टैक्सी इसका सुखद अहसास बड़ा देती है। डी.एन. रोड पर पहुँचकर जहाँ हमें जाना था, वह इमारत देखते ही याद आ गई, और फ़िर हम अपना काम निपटाने चल दिये।

जारी…

मुंबई का सफ़र २३/११/२०१० भाग – २ (Mumbai Travel 23/11/2010 – Part – 2)

    जब हमने टिकिट ले लिया और अपनी निगाहें उस टीवी स्क्रीन पर जमा रखी थीं फ़िर जब पुल पर आये तो वहाँ पर भी इंडिकेटर में हरेक प्लेटफ़ॉर्म के बारे में सूचना होती है, पहले हम २ नंबर प्लेटफ़ॉर्म की ओर रुख कर रहे थे, परंतु तभी देखा कि ४ नंबर पर फ़ास्ट आ रही है, तो उधर की तरफ़ दौड़ पड़े क्योंकि केवल १ मिनिट ही बचा था। समय से लोकल आ गई और चूँकि यह हम उल्टी तरफ़ जा रहे थे, इस तरफ़ के लिये भीड़ सुबह मिलती है तब लोकल में चढ़ना किसी युद्ध से कम नहीं होता है। मालाड़ से आगे वाली तरफ़ के कूपे में ही चढ़ लिये, जिससे चर्चगेट पर ज्यादा दूर नहीं चलना पड़े, बताओ चलने में भी मन में कितना आलस्य भरा होता है। पर आलस्य के साथ साथ समय की बचत भी कम से कम २-४ मिनिट की ही सही।
    मजे में खिड़की के पास की सीट पर बैठ गये और पहले कुछ जरुरी फ़ोन लगाये फ़िर अपने कानकव्वे को फ़ोन में लगाकर एफ़.एम. सुनने लगे।
    एफ़.एम. के भी १२ चैनल आते हैं, अब हम तो कभी कभी सुनने वाले हैं तो बस जहाँ गाना अच्छा होता रुक जाते या फ़िर जो बतौड़ कर रहा होता वहाँ, इस तरह से ५० मिनिट के सफ़र में जाने कितनी बार चैनल बदल डाले होंगे। एफ़.एम. के किसी चैनल पर ही एक रजनीकांत स्पेशल चुटकुला सुना –
    “बचपन में रजनीकांत मुंबई में खेलने आये थे, और अपना एक खिलौना यहीं भूल गये थे, जिसे लोग आजकल एस्सेल वर्ल्ड के नाम से जानते हैं”|
    वर्षों पहले जब हम दिल्ली में थे तब केवल एफ़.एम. का ही सहारा होता था और दिल्ली में उस समय २-३ एफ़.एम. के चैनल ही आते थे, पर आजकल १२ चैनल यहाँ मुंबई में हैं तो दिल्ली में भी कम तो नहीं होंगे।
    लोकल गोरेगाँव, जोगेश्वरी, अंधेरी, बांद्रा, दादर, मुंबई सेंट्रल, चर्चगेट रुकी। बीच के स्टेशन पर नहीं रुकी क्योंकि फ़ास्ट थी लगभग हर तीन छोटे स्टेशन के बाद एक बड़ा जंक्शन जैसे बड़ा स्टेशन आता है। अगर किसी छोटे स्टेशन पर उतरना हो तो स्लो लोकल पकड़ना होती है। बीच में चर्नी रोड़ और मरीन लाईन्स से दायीं तरफ़ दरिया दिखता है, फ़िर चर्चगेट आने वाला होता है तो वानखेड़े स्टेडियम दिखता है, उस दिन वहाँ वेल्डिंग का काम चल रहा था, प्रतीत होता था कि स्टेडियम का जीर्णोद्धार हो रहा है, ये तो बाद में पता चलेगा कि फ़ायदा अधिकारी का हुआ या जनता का।
जारी…

IFFI गोवा में बीयर २५ रुपये की और चाय ५८ रुपये की वाह !

    आज सुबह अखबार के एक कोने में खबर थी कि A glass of beer is cheaper than a cup of tea at IFFI in Goa | अब बताईये चाय ५८ रुपये की और ठंडी बीयर का गिलास २५ रुपये में, क्या जमाना आ गया है।

बीयर गिलास भरचाय      आयोजक कहते हैं कि अगर चाय पीने वालों को चाय महँगी लग रही है तो वे सड़क पार कर स्थानीय ढाबे पर चाय पी सकते हैं। अब भई जो बीयर के शौकीन होंगे तो वे भला क्यों इतनी महँगी चाय पियेंगे। उससे अच्छा है कि दो गिलास ठंडी बीयर पियें और फ़िल्म फ़ेस्टिवल आयोजन का मजा लें।

    क्यों अविनाश जी सही कह रहे हैं न हम, अब बाकी तो आप ही बतायेंगे कि कौन से स्टॉल पर ज्यादा भीड़ थी, चाय के या बीयर के।

मुंबई का सफ़र २३/११/२०१० भाग – १ (Mumbai Travel 23/11/2010 – Part – 1)

    किसी निजी कार्य की वजह से कई दिनों बाद वापिस मुंबई जाना हुआ, जी हाँ मुंबई जो कि माटुँगा रोड से कोलाबा तक कहलाता है (अगर मैं गलत हूँ तो सुधारियेगा)। मैं रहता हूँ कांदिवली में और कार्यालय है मालाड़ में, जो कि मुंबई महानगरी के उपनगर कहलाते हैं। जब बोरिवली या कांदिवली से लोकल ट्रेन में चढ़ेंगे तो पायेंगे कि कई लोग फ़ोन पर बात करते हुए कह रह होंगे कि आज मुंबई जा रहा हूँ। बाहर से आने वाला व्यक्ति तो बिल्कुल चकित ही होगा कि मुंबई में रहकर भी बोल रहे हैं, कि “मुंबई जा रहे हैं”, वैसे यहाँ अगर चर्चगेट, फ़ोर्ट, नरीमन पाईंट या कोलाबा की तरफ़ जा रहे हैं तो लोग यह भी कहते हुए पाये जाते हैं कि “टाऊन” जा रहा हूँ।
    कार्यालय से चर्चगेट का सफ़र सबसे पहले शुरु हुआ ऑटो से, हम उतरे मालाड़ एस.वी.रोड याने कि स्वामी विवेकानन्द रोड जो कि बोरिवली से शुरु होकर लोअर परेल तक है। और हमेशा इस पर जबरदस्त ट्रॉफ़िक रहता है, क्योंकि इस सड़क की चौड़ाई बहुत ही कम है और वाहनों का दबाब ज्यादा, हालांकि लिंक रोड और पश्चिम महामार्ग (Western Express High Way) से काफ़ी सहारा है, नहीं तो अगर एस.वी.रोड पर फ़ँस गये तो बस फ़िर तो गई भैंस पानी में।
    एस.वी.रोड पर ऑटो से उतरकर मालाड़ स्टेशन शार्टकट से निकले। बहुत कम ऑटो स्टेशन तक जाते हैं क्योंकि वहाँ ट्रॉफ़िक ज्यादा होता है, ऑटो में बैठने वाला भी सोचे कि इससे तो मैं पैदल ही चलकर चला जाता। टिकिट खिड़की पहले माले पर है, गोरेगाँव की तरफ़ वाली, कांदिवली की तरफ़ वाली टिकिट खिड़की के लिये चढ़ना नहीं पड़ता। अपने पर्स से रेल्वे का कार्ड निकाला और ऑटोमेटिक टिकिट वेन्डिंग मशीन पर जाकर अपना टिकिट लिया, चर्चगेट का। आमतौर पर लोकल के टिकिट के लिये लंबी लाईन होती है और कम से कम १५-२० मिनिट लगते ही हैं, अगर व्यक्ति किसी और शहर से आ रहा हो तो सोचेगा कि कम से कम २ घंटे लगेंगे परंतु यहाँ उतनी ही लंबी लाईन १५-२० मिनिट में निपट जाती है, रेल्वे टिकिट खिड़की पर बैठने वाले कर्मचारी अपने इस कार्य में सिद्धहस्त हैं। आजकल तो कंप्यूटर से टिकिट निकालते हैं, तो प्रिंटर को जितना समय लगता है प्रिंट निकालने में उतना ही, नहीं तो इसके पहले तो जब ये खिड़्कियाँ कम्प्यूटरीकृत नहीं हुई थीं, इससे भी जल्दी टिकिट मिलती थी, तब इतनी लाईन को मात्र १० मिनिट लगते थे, पहली बार कम्प्यूटरीकरण के कारण देरी देखी।
    प्लेटफ़ॉर्म नंबर २ और ४ पर चर्चगेट की और जाने वाली लोकल आती हैं, और जहाँ से आप टिकिट लेते हैं, वहीं पर टीवी स्क्रीन पर समय के साथ कौन से प्लेटफ़ार्म नंबर पर लोकल आने वाली है और फ़ास्ट है या स्लो, इतनी सब जानकारी वहाँ पर उपलब्ध होती है। इस जानकारी को देखकर आप अपना निर्णय एकदम ले सकते हैं।

एक और चिट्ठाकार चिट्ठाजगत में, आईये उत्साहित कीजिये (Bubbles)

    हमारे मित्र राहुल खरे जो कि विगत ४-५ वर्षों से थाईलैंड में निवास कर रहे हैं, और हमारे बहुत पुराने मित्र हैं। उनका हिन्दी प्रेम हमसे छिपा नहीं था, एक बार ऐसे ही चैटिंग करते हुए हमने हिन्दी में लिखना शुरु कर दिया, तो बहुत ही आश्चर्यचकित हुए कि आप सीधे चैट बॉक्स में कैसे हिन्दी लिख रहे हैं, हमने उन्हें बाराह के बारे में बताया। बस फ़िर क्या था उन्होंने एकदम से बाराह को अपने संगणक पर संस्थापित किया और हिन्दी में चैटियाने लगे, फ़िर भी उन्हें कुछ जगह समस्या आ रही थी, तो थोड़ी हमने मदद की और बाकी तो राहुल भाई संगणक विशेषज्ञ हैं, उन्होंने खुद ही खोज बीनकर सब कुछ सीख लिया।
    उनका चिट्ठा अथक परिश्रम का ही फ़ल है, वे अब बराबर से हिन्दी में टाईपिंग कर पा रहे हैं, और अपना चिट्ठा बनाकर आज चिट्ठाजगत में शामिल हुए हैं।
    राहुल भाई ने अपने चिट्ठे का नाम रखा है बबल्स (Bubbeles), जहाँ वे अब अपने मन की बातें लिखेंगे, आईये राहुल को उत्साहित कर अपने चिट्ठाजगत परिवार में शामिल करें। राहुल आपको बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

पारंपरिक शिक्षा के परिवेश से कैसे मुक्ति पायें और संवेदनशील मनों को कैसे समझें..[Child Education ???]

विद्यालयों में सजा देना कितना उचित ? कल की पोस्ट पर जो प्रतिक्रियाएँ आईं पर व्यस्त होने के कारण बात को आगे नहीं ले जा पाया। इसलिये चर्चा को आगे बड़ा रहा हूँ।

 

एस.एम.मासूम said…
अध्यापक भी बहुत बार घर के झगड़ों या कभी कभी अपनी किसी ना कामयाबी का गुस्सा छात्रों पे निकलते हैं. इसके लिए अभिभावकों को जागरूक होना पड़ेगा. अच्छा विषय चुना है.

बिल्कुल सही है, केवल अध्यापक ही क्या ये तो हर कहीं की कहानी है, अगर किसी का मूड खराब हो तो समझ जायें कि आज घर पर झगड़ा करके आये हैं। अभिभावकों को जागरुक होना ही पड़ेगा, ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये।
Suresh Chiplunkar said…
क्या बेईज्जती करवाने जाऊँ“? क्या अध्यापक के मारने या डांटने से बेइज्जती हो जाती है? हमने तो बहुत मार खाई स्कूल में, कभी ऐसा नहीं लगा… 🙂 फ़िर नई पीढ़ी अध्यापक की मारके प्रति इतनी संवेदनशील क्यों है? ========= मैं अध्यापक द्वारा हल्की मारके पक्ष में हूं…। हल्की मार का स्तर = बच्चे को कोई स्थाई शारीरिक नुकसान न हो।
जी सुरेश जी, आजकल के बच्चे बहुत ही ज्यादा संवेदनशील हैं, अध्यापक के मारने या डांटने से अपनी इज्जत का प्रश्न जुड़ा हुआ मानते हैं, हमारा जमाना और था, उस समय ये बुद्धु बक्सा नहीं था, कि हम जीवन के इतने पहलुओं से परिचित हो सकें, हम इन सब पहलुओं से धीरे धीरे रुबरु हुए हैं, पर आजकल के बच्चों को जीवन के ये अनुभव बुद्धु बक्से पर बहुत आसानी से मिल जाते हैं, आप ऐसी ऐसी बातें बच्चों से सुन सकते हैं, और आपको उन बातों पर यकीन करने का मन भी नहीं होगा कि बच्चों को यह भी पता है। इसलिये यह पीढ़ी बहुत ही संवेदनशील है, और आगे आने वाली पीढ़ी तो और भी ज्यादा होगी क्योंकि इंटरनेट तेजी से पैर पसार रहा है, और बच्चों के लिये जानकारी की दुनिया के द्वार खुल गये हैं।
अध्यापक द्वारा हल्की मार का प्रश्न ही नहीं है यहाँ तो मार मतलब केवल मार होती है, वो स्थाई शारीरिक नुक्सान हो या नहीं, क्योंकि यह उनके कोमल मन पर सीधी असर करती है। स्थाई शारीरिक नुक्सान की स्थिती में तो यह आज क्रिमिनिल केस बन जायेगा।
शिक्षातन्त्र का त्यक्त पक्ष, विद्यार्थी पलायनवादी क्यों बने?
शिक्षातन्त्र से बहुत जल्दी ही इस मारपीट या बेईज्जती वाली बातों को हटाना होगा, नहीं तो पलायन अवश्यमभावी है।
मैं तो अभी भी अपने शिक्षक का आभारी हूं जो मुझे नियमित रूप से दोदो थप्पड़ लगाते थेनमन उन्हें.. लेकिन क्रूर नहीं थे..
मैं भी अपने शिक्षकों को नमन करता हूँ, क्योंकि वे हमारे हित में हमें सजा देते थे, और शिक्षक की सजा क्रूर कभी होती भी नहीं है, सजा का मतलब केवल इतना समझाना भर होता था कि जो किया है गलत किया है, आगे से ऐसी गलती न हो। पर उस समय हमारे पास जानकारी के इतने साधन मौजूद नहीं थे जितने आज हैं। इसलिये अब यह पारंपरिक शिक्षा पद्धति बदलने की जरुरत महसूस होने लगी है।
मैं तो अपने बच्चों के स्कूल में खुद कहकर आया हूँ कि इन्हें होमवर्क ना करने या गलती करने पर थोडी सजा भी दिया करें। लेकिन वहां देते ही नहीं हैं। आपके बच्चे के ये शब्द चिंतनीय हैं, स्कूल में जाकर पता करें। उसने ऐसा क्यों कहा। प्यार से बारबार पूछने की कोशिश करें। प्रणाम
सजा देना गलत नहीं है, सजा देने का तरीका गलत होता है, जो बात बच्चों को प्यार से समझायी जा सकती है, जरुरी नहीं किस उसे पारंपरिक तरीके से ही समझाई जाये।
बच्चे के शब्दों को मैंने बहुत गंभीरता से लिया और पूरी पड़ताल कर ली है, अब इतनी चिंता की कोई बात नहीं है।

थोड़ी बहुत सजा तो अनिवार्य है पर इतनी न हो के बच्चा भयभीत रहे। इससे उसके मानसिक विकास पर भी असर पड़ता है। शिक्षकों में मानवता का अभाव भी चिंतनीय है। विषय अच्छा है। गंभीर चर्चा मांगता है।

सजा अनिवार्य है, अगर सजा नहीं होगी तो बलपूर्वक हम किसी गलत बात को उनसे रोकने के लिये कह भी नहीं सकते हैं, बस सजा के पारंपरिक तरीकों से आपत्ति है।

Rahul Khare said…
नमस्कार विवेक जी, ये मेरा प्रथम प्रयास है, अगर कोइ गल्ती हो तो माफ़ करे । आप ने जो विषय चयनित किया है वह काफ़ी महत्वपूर्ण है,और मेरा मानना है कि हम सब को मिल जुल कर इस के खिलाफ़ एक आंदोलन की शुरुआत करनी चाहिये। बच्चे बहुत कोमल दिल वाले होते है और शारीरिक रुप से कोइ भी सज़ा उनके मन मे काफ़ी गहराई से जाती है, जो उनका ना केवल शैक्षिक बल्कि मानसिक विकास भी बाधित करती है। अगर कोइ गलती हुई भी है तो भी किसी भी शिक्षक द्वारा बच्चे को शारीरिक रुप से कोइ भी सज़ा देने की कोइ शैली होनी ही नही चहिये। यहा विदेश मे शिक्षक द्वारा बच्चे को शारीरिक दंड देना अपराध है और मेरा मानना है कि अगर हम सब मिल कर प्रयास करे तो ये हमारे अपने देश मै भी मुमकिन है। यहा शिक्षक बच्चे को शारीरिक दंड की जगह उसे अलग अलग तरीको से किसी काम को सही तरह से करना सिखाते है और सुनिश्चित करते है कि वो गल्ती फिर से न हो।

धन्यवाद राहुल, अखिरकार आपने हिन्दी में लिखना शुरु किया और पहली टिप्पणी दी, आंदोलन की शुरुआत की जरुरत तो है पर किस दिशा में यह भी तय किया जाना चाहिये।
सजा का मकसद ही यह होता है कि गलती वापस न हो या बच्चे को पता चले कि जो उसने किया है वह गलत है और आगे से उसका दोहराव न हो।
anshumala said…
विवेक जी बिल्कूल सही कहा आज के बच्चे पहले से कही ज्यादा संवेदनशील है और बातो को कही ज्यादा समझते है और दिल से लेते है | हम उसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते है मेरी बच्ची अभी मात्र साढ़े तीन साल की एक बार मैंने उसको उसके दोस्तों के सामने डाट दिया वो बच्ची जिस पर मेरी डांट का या तो असर नहीं होता था या यु ही जोर से रोने का नाटक करती थी वो उस समय चुपचाप आँखों में आँसू लेकर खड़ी रही और बार बार तिरक्षी नजरो से अपने दोस्तों को देखती रही | ये देख कर मुझे बहुत ही ख़राब लगा की मैंने गलत काम कर दिया उसे ये बात इनसल्टिंग लग रही है | उसके बाद हमेसा मै इन बातो का ख्याल रखती हु | उसके पहले मै सोच भी नहीं सकती थी की इतनी छोटी बच्ची बेईज्जती जैसी बातो को जानती भी होगी | आप के बच्चे के लिए बोलू तो कभी कभी बच्चे अपने माँ बाप को वो बाते नहीं बताते है जितना की अपने दोस्त से या कई बार तो उसके मम्मी पापा या पड़ोस की कोई दीदी या अपनी दीदी , भईया बुआ आंटी को बताते है | इसलिए पता कीजिये की वो ज्यादा समय किसके साथ गुजरता है या बाते करता है उसी के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से उससे बात जानने का प्रयास कीजिये | कई बार बाते काफी गंभीर होती है समय रहते परिवार को पता चल जाये तो हम स्थिति को संभाल सकते है | और आगे की उसकी बातो को जानने के लिए आप उसी व्यक्ति से टच में रह सकते है | पर ध्यान रखियेगा की बच्चे को कभी ना पता चले की उसकी बाते आप तक पहुच रही है |

यह सब हमारे बुद्धु बक्से का कमाल है और आधुनिक जीवन यापन के तौर तरीको का भी, आप खुद सोचिये कि हमारे जमाने में क्या हमें बेईज्जती का मतलब पता था और अगर पता था तो बेईज्जती का क्या मतलब हमें पता था, शायद यह मतलब तो नहीं था जो आज के दौर में बच्चे समझते हैं।
प्रत्यक्ष रुप से मैं खुद ही अपने बच्चे से संवाद कायम रखता हूँ, परंतु पिछले २-३ दिन से उसकी इस बात से परेशान था, परंतु अब पता चला कि यह भी उसकी कल्पनाशीलता का परिणाम है।
विवेक जी बहुत अच्छा विषय उठाया है. आजकल बच्चे संवेदनशील हो गए हैंपर क्यों? क्या कभी किसी ने यह सोचा ? समय बदल गया है ,परिवार बदल गए हैं,रहने का तरीका बदल गया है तो जाहिर है कि बच्चों की परवरिश का तरीका भी बदला है.अब बच्चे घर में भी इतनी दांट या मार नहीं खाया करते जितनी पहले खाया करते थे तो जरुरी है कि परंपरागत शिक्षा का तरीका भी बदलना चाहिए. आप जाकर स्कूल में टीचर्स और स्टाफ से बात कीजिये अगर स्कूल अच्छा है तो मुझे उम्मीद है कि जरुर फायेदा होगा.
शिखाजी, आजकल के बच्चे अपनी हर बात अपने अभिभावकों से करने में हिचकते नहीं है, और हम हैं कि आज भी अपने पितजी से खौफ़ खाते हुए अपनी बातें माताजी के द्वारा ही पहुँचाना उचित समझते हैं। तो मैं इतना कहना चाह रहा हूँ कि समय बहुत तेजी से बदल रहा है, पर इस पारंपरिक शिक्षा के तरीके को कैसे बदला जाये, आप अपने अनुभव बतायें कि कैसे वहाँ पढ़ाई होती है, या किसी और जगह पर, जिससे सही दिशा में सोचा जा सके और कुछ नयी शुरुआत की जा सके।
मैं बच्चों को पीटे जाने के सख्त खिलाफ हूँ, क्यूंकि बचपन मे स्कूल मे तथा घर मे पड़ने वाली मार की वजह से मेरा आत्मविश्वास बहुत कम हो गया था, जिसकी वजह से मुझे आज भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है. मैं तो शिक्षा के क्षेत्र मे आया ही इसलिए हूँ जिससे बच्चों के साथ होने वाले इस तरह के व्यवहार को बदल सकूं. आप तुरंत प्रिंसिपल से जाकर बात कीजिये तथा यदि कोई संतोष जनक उत्तर नहीं मिलता है तो किसी दुसरे स्कूल मे दाखिला दिलवाइये, यह मुद्दा parent meeting मे भी उठाइये. मुझे ताज्जुब है कि यहाँ पर कुछ लोगो ने लिखा है कि उन्होंने खुद ही अध्यापक से कह रखा है कि बच्चे को गलती करने पर मारिये, ऐसे लोगो को अपने दिमाग का इलाज करवाने की जरूरत है. आप हिंसा करेंगे तो बच्चे या तो विरोधी हो जायेंगे या फिर गुमशुम रहने लगेंगे दोनों ही स्थितियां गंभीर है, याद रखिये आगे का समाज इन बच्चों को ही चलाना है | सजा देने के तरीके मे गृहकार्य को पुनः करके लाना या फिर बिषय से सम्बंधित प्रोजेक्ट थमा देना जैसी विधियाँ शामिल होनी चाहिए, ना कि मुर्गा बनाना या बेंत से पीटना. मुझे पता है कुछ अभिभावक बोलेंगे कि बच्चा अगर विरोधी हो जायेगा तो हम और मारेंगे, ऐसी स्थिती मे बच्चा अपने मन मे ठान लेता है जितना मरना चाहो मार लो, इससे ज्यादा कर भी क्या सकते हो” | मे इस बिषय मे बहुत ही जल्द एक पोस्ट लिखूंगा, शायद उसमे अपने विचार पूरी तरह से लिख पाऊँ

बिल्कुल सत्य वचन बच्चा मार खाकर ढ़ीठ हो जायेगा और फ़िर उस पर मार का भी कोई प्रभाव नहीं होगा, इसलिये स्थिती को शांति से ही निपटना होगा। और पारंपरिक शिक्षा पद्धति के साथ साथ पारंपरिक सजा के तौर तरीकों को भी बदलना होगा।
hindizen.com said…
आजकल स्कूलों में बच्चे को ईडियट या दफर कहने पर भी अभिभावक टीचरों के सर पर चढ़ जाते हैं. पच्चीस साल पहले हमारे शिक्षक हमें सिर्फ मारते नहीं थे, वे जो करते थे उसे हम ठुकाईया सुताईकहते थे. बड़ा कठिन समय था वह. आपने पोस्ट के शीर्षक में molestation शब्द क्यों लिखा है? इसका अध्यापकों की मार से क्या लेना? अब यह शब्द केवल कामोत्पीड़न के लिए ही प्रयुक्त होता है.
हमारी भी बहुत ‘ठुकाई’ और ‘सुताई’ हुई है, परंतु आज उसी का परिणाम है कि हम कुछ बन पाये, पोस्ट के शीर्षक मॆं molestation शब्द का अर्थ मारपीट से ही है, परंतु अब उसे कामोत्पीड़न के लिये ही लेते हैं, इस बारे में तो हिन्दी विशेषज्ञों की राय लेनी होगी।
जब हमलोग विद्यार्थी थे , शिक्षकों द्वारा बुरी तरह मारपीट आम बात थी ..मगर कभी नहीं सुना कि किसी विद्यार्थी ने आत्महत्या कर ली वे लोंग गुरुजन को मातापिता की तरह ही सम्मान देते थे और उनकी मार पीत को भी सामान्य रूप में स्वीकार कर लेते थे इससे आगे शिखा से सहमत हूँ कि आजकल हमलोग बच्चों को घर में भी नहीं डांटते हैं , इसलिए उन्हें ये सब सहने की आदत नहीं है समय के साथ पालन पोषण के तरीके बदले हैं तो शिक्षा देने में भी परिवर्तन अपेक्षित है ..!

बिल्कुल हमने भी बहुत सुताई खायी है, और हमें कभी भी बेईज्जती जैसी कोई बात नहीं लगी, और न ही उस दौर में आत्महत्या जैसी कोई बात सुनाई दी, जिसका कारण सुताई रहा हो। परंतु आजकल के कोमल मनों का क्या कहना, शिक्षा में परिवर्तन कैसे किये जायें उसके बारे में अपने विचार दें, या अगर कहीं किये गये हैं तो उसका उदाहरण दें, जिससे चर्चा को आगे बड़ाया जा सके।
रचना said…
Its my humble request please take your child to child psychologist immediately sodomization is in many forms not just physical please dont waste time in thinking and dont go by the fact that he is just a child i hope you understand the gravity of the situation
रचना जी, टिप्पणी के लिये आपका बहुत धन्यवाद अगर आपकी टिप्पणी हिन्दी में होती तो मुझे और ज्यादा अच्छा लगता कि चर्चा जिस भाषा में हो रही है उसी भाषा में विषय पर चर्चा आगे बड़े, फ़िर भी विचारों के प्रगटीकरण के लिये मैं भाषाई बंधनों को नहीं मानता परंतु अगर सभी लोग जिस भाषा में बातें कर रहे हैं, उसी भाषा में बात हो तो सामंजस्य बनता है।
बच्चे से मैंने बात कर ली है और अब सब ठीक है।
पारंपरिक शिक्षा के परिवेश से कैसे मुक्ति पायें और संवेदनशील मनों को कैसे समझें, इस पर चर्चा अगर आगे हो तो कुछ बात बने।

विद्यालयों में बच्चों को सजा देना कितना उचित ? मुझे भी अपने बेटे की चिंता हो रही है… क्या आपको है..? (Molestation in School)

आज बुद्धु बक्से पर एक शो देख रहा था, जिसमें एक बच्चे के अभिभावक बैठे हुए थे, उनकी लड़की जो कि मात्र १२ वर्ष की थी, ने विद्यालय में मिली सजा से आत्महत्या कर ली। अभिभावकों ने बताया की उनकी बेटी को किसी कारण से शिक्षक ने मारा पीटा और बेईज्जती की जिससे उनकी बेटी विद्यालय जाने को भी तैयार नहीं थी। परंतु उन्होंने समझा बुझाकर विद्यालय भेजा और उसने आकर दोपहर में घर पर आत्महत्या कर ली।

जब अभिभावकों ने विद्यालय में जाकर विरोध दर्ज करवाया तो प्रबंधन का रवैया भी रुखा ही रहा और आरोपी शिक्षक पर कोई कार्यवाही नहीं करने की बात की, और उल्टा उनकी बेटी और उनको भला बुरा कहा।

विद्यालयों को बच्चों के प्रति संवेदनशील होना चाहिये, किसी भी सजा का उनके मन पर क्या असर होता है, यह भी विद्यालय को सोचना चाहिये। पढ़ाने वाले शिक्षक पुरानी पीढ़ी के और पढ़ाने का तरीका भी पारंपरिक होता है, जब कि बच्चे आधुनिक परिवेश में रहकर उन चीजों से नफ़रत करते हैं। आज की बाल पीढ़ी बहुत जागरुक है, और पहले से बहुत ज्यादा संवेदनशील भी। आज के बच्चों को बहुत ही व्यवहारिक तरीके से समझाना चाहिये।

क्या विद्यालय पर प्रशासन कोई जाँच करता है, निजी विद्यालय अपने बच्चों को कैसे पढ़ा रहे हैं, उनके साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, कैसे उनको व्यवहारिक शिक्षा दे रहे हैं। निजी विद्यालय आर.टी.आई. (Right for Information) के अंतर्गत आते हैं, पर फ़िर भी पारदर्शितापूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं होती है।

विद्यालयों के इस असंवेदनशील रवैये से आजकल के अभिभावक कैसे निपटें ? अगर किसी को जानकारी हो तो कृप्या बतायें, जिससे सभी अभिभावक जागरुक हों।

[मेरा बेटा भी पिछले दो दिनों से विद्यालय न जाने की जिद कर रहा है, कुछ भी पूछो तो बोलता है कि “क्या बेईज्जती करवाने जाऊँ”, कल मैंने बहुत प्यार से पूछा तो कोई भी कारण स्पष्ट नहीं हुआ, और विद्यालय में पूछने पर भी कुछ पता नहीं चला, अब विद्यालय का वह वक्त जो मेरे बेटे और विद्यालय के शिक्षकों के मध्य गुजरता है, और उस वक्त में वाकई क्या हो रहा है, मुझे पता ही नहीं है, और इसलिये मेरी भी चिंता बड़ती जा रही है, पर अब कुछ तो तरीका ईजाद करना ही होगा।]

मैंने आजतक कितनी रिश्वत दी उसका हिसाब (जितना याद आया)

    आज डी.एन.ए. में एक आलेख आया है कि आम आदमी जन्म से मृत्यु तक भारत में लगभग १ लाख ६९ हजार रुपये की रिश्वत देता है जो कि भारत के हर हिस्से में अलग हो सकती है। तो मैंने भी अभी तक अपने हाथों से दी गई रिश्वत जो कि अपने खुद के कार्य करने के लिये दी, उसका हिसाब लगाना जरुरी समझा कि कम से कम पता तो चले कि हमने अभी तक कितनी रिश्वत दी है।
१. दो घर के लोगों के मनपसंद जगह ट्रांसफ़र करवाये – २५,००० रुपये
२. पहली बार पासपोर्ट बनवाने पर पुलिस को ५० रुपये दिये चाय पानी के
३. एक और स्थानांतरण में १०,००० रुपये की रिश्वत दी।
४. एक और जगह ४०,००० रुपये की रिश्वत दी (नाम नहीं बता सकता और न ही जगह)
५. मुंबई में गैस का कनेक्शन लेने के लिये १५०० रुपये का चूल्हा ६५०० में खरीदा।
६.रेल्वे में टीसी को कई बार सीट लेने के लिये रिश्वत दी है शायद १०,००० या उससे भी ज्यादा दे चुके होंगे।
७. एक और बार पुलिस को ५०० रुपये की रिश्वत दी।
८. एक और जगह २५,००० की रिश्वत दी (नाम नहीं बता सकता और न ही जगह)
९. यातायात पुलिस को २०० रुपये की रिश्वत
अभी तो इतना ही याद है, और याद आता है तो ९ नंबर के आगे बड़ाता जाऊँगा, या फ़िर कभी वापिस से रिश्वत देनी पड़ी तो यहाँ जरुर लिखूँगा।
आजतक की रिश्वत में दी गई रकम होती है लगभग १,१५,७०० रुपये की रिश्वत दे चुका हूँ। क्या आपने कभी हिसाब लगाया है ?
मेरे पास अतिरिक्त ५०० रुपये हैं, जिस रिश्वतखोर को चाहिये वह संपर्क करे ।


रिश्वत की रकम १,१६,४०० रुपये

१०.  ठाणे से मुंबई घर का सामान लाते समय ३५०० रुपये की रिश्वत मांगी गयी थी परंतु केवल २०० रु. की रिश्वत में काम बन गया। 


११. म.प्र.गृह निर्माण मंडल में ५०० रुपये दिये थे।

किसी भी कार्य को शुरु करने के पहले अपने अवयवों की ऊर्जा को एकत्रित करना होता है।

   मानव ऊर्जा हम जब भी कोई नया कार्य शुरु करते हैं, तो उसके बारे में अच्छे और बुरे दोनों विचार हमारे जहन में कौंधते रहते हैं, हम उस कार्य को किस स्तर पर करने जा रहे हैं और उस कार्य में हमारी कितनी रुचि है, इस बात पर बहुत निर्भर करता है। सोते जागते उठते बैठते कई बार केवल कार्य के बारे में ही सोचना उस कार्य के प्रति रुचि दर्शाता है।

     नया कार्य शुरु करने के पहले अपने सारे अवयवों की ऊर्जा एकत्रित करना पड़ती है, और फ़िर कार्य के प्रति ईमानदार होते हुए उस कार्य से जुड़े सारे लोगों के बारे में और उसके प्रभावों के बारे में निर्णय लेकर कार्य को शुरु करना चाहिये।

    हरेक कार्य के सामाजिक प्रभाव होते हैं, और हरेक कार्य के तकनीकी पहलू होते हैं जो कि मानव जीवन पर बहुत गहन प्रभाव डालते हैं।

    पर सबसे जरुरी चीज है अपने अवयवों की संपूर्ण ऊर्जा एकत्रित करके कार्य की शुरुआत अच्छे से की जाये और उसके अंजाम तक पहुँचाने के लिये भी अपनी संपूर्ण ऊर्जा का उपयोग करना चाहिये।