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पेट पर मोटापे का टायर

आजकल हम हमारी दुनिया में आसपास देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकतर मोटे ही हैं, बहुत ही कम लोग होंगे जिनके पेट पर मोटापे का टायर न हों।
 
खान पान हमारा पिछले 50 वर्षों में बदला है, पहले आम आदमी मोटा नहीं होता था, सही बात तो यह है कि मोटे केवल वही होते थे जिनके पास पैसा होता था और खाने पीने का शौक होता था। याने कि राजा रानी वाला खाना, राजसी भोज।
 
और वैसे ही राजसी खाने वालों को ही हाई बीपी, डायबीटीज, कोलोस्ट्रॉल, हार्टअटैक इत्यादि बीमारियाँ होती थीं, इसीलिये इन बीमारियों को कभी अमीरों की बीमारी कहा जाता था।
 
उस समय आम आदमी क्या खाता था, आलू, चावल, शकरकंदी इत्यादि ही खाते थे, जिससे मोटापा नहीं बड़ता था, भाड़ के भुने आलू और शकरकंदी आज भी गाँव देहात में मिल जाते हैं, जो कि बिल्कुल सही भोज है।
 
पर धीरे धीरे इंड्स्ट्रीयलाईजेशन ने पूरे समाज की दिशा ही बदल दी, राजसी भोज वाली चीजें भी आम व्यक्ति अपने भोजन में लेने लग गया, और धीरे धीरे इन 50 वर्षों में राजसी बीमारियाँ आम बीमारियाँ हो गई हैं।
 
अगर हमको ये राजसी बीमारियाँ याने की अमीर लोगों की बीमारियों से बचना है या ठीक रहना है तो हमें पुरानी वाली खुराक पर लौटना चाहिये, वह आज भी उतनी ही कारागार है, जितनी पहले थी।
 
हमें हमारी पीढ़ी को आज से ही खानपान की सही आदतें सिखानी होंगी, नहीं तो वे इन अमीर लोगों की बीमारियों में जल्दी ही घिर जायेंगे।
 
जितनी जल्दी हो सके हमें सबसे पहले अपने मोटापे से मुक्ति पा लेनी चाहिये, उपाय बोलने सुनने में जितना सरल लगता है, व्यवहारिकता में उतना ही कठिन है। हमें प्राकृतिक वस्तुओं का उपभोग करना चाहिये याने कि फल एवं सब्जियों का, अच्छे से धोकर, जरूरत लगे तो उबालकर खाना चाहिये। उबालकर केवल वही सब्जियाँ खानी चाहिये जो लगे कि वे धोकर अच्छे से साफ नहीं होंगी। जैसे कि फूलगोभी, ब्रोकली।
 
कच्ची सब्जियों में मुझे सबसे ज्यादा पसंद है शिमला मिर्च, जी हाँ बहुत ही जबरदस्त स्वाद होता है। एक बार आदत लग गई तो आप कभी भी शिमला मिर्च को कच्चा खाने का मोह त्याग नहीं पायेंगे।
 
#OldisGold #StayHealthy #StarchFood

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चीनी समान का बहिष्कार

भारतियों पहले कामचोरी छोड़ो, काम करना सीखो और घर में अपने समान के लिये इतनी जगह बनाओ, सस्ती चीजों को उपलब्ध करवाओ, ये चीनी समान का बहिष्कार करने से कुछ नहीं होगा, चीन नहीं तो कोरिया या फिर कहीं और का समान खरीदोगे।

चाईना के समान का बहिष्कार करने वालों पहले यह सुनिश्चित करो कि भारत की तकनीक की रीढ़ चीन समान पर न हो, बताओ कि कौन सी चीज मैक इन इंडिया है –

  1. राऊटर
    2. मोडेम
    3. लेन केबल
    4. एडाप्टर
    5. डिश
    6. मोबाईल
    7. मोबाईल टॉवर में लगने वाला समान
    8. कैमरे
    9. द्रोन

और भी बहुत कुछ समान होगा। घर पर उपयोग किये जा रहे समान –

  1. टीवी
    2. फ्रिज
    3. वाशिंग मशीन
    4. लेपटॉप
    5. मोडेम
    6. मोबाईल
    7. गेम्स (सोनी, माइक्रोसॉफ्ट)
    8. कार में लगने वाले समान
    9. बाईक में लगने वाले समान
    10. किचन में बहुत से समान

महफूज भाई का कहना है कि –

ज़र्रे ज़र्रे में इंडिया के चाइना है…

काजल कुमार जी का कहना है –

मैं तो सभी पर Made in India लिख कर ही प्रयोग करता हूं जी

हमने लिखा –

हम use in india करते हैं जी

दिवांशु निगम लिखते हैं –

जिसके ऑप्शन इंडिया में उपलब्ध हैं, उसमें तो करना शुरू करें , बाकी भी होगा । धीरे धीरे ही होगा ।

दूसरी बात, आज के युग में कोई देश अकेले सब कुछ नहीं बना सकता । एक दुसरे पर निर्भरता रहती ही है । चीन की भी है पर उसे झटका लगना ज़रूरी है ।

यहाँ तो बड़ी मुश्किल से कुछ मिलता है जो मेड इन चीन ना हो , पर कोशिश कर रहे हैं । अगर हम थोड़ा भी कर पाए तो बहुत होगा ।

बाकी सब कुछ इंडिया में बनने का वेट करते रहे तो शायद अगले कई सदियों तक करेंगे ।

अपने अपने सोचने का तरीका है । बीते दिनों रविश कुमार मेरी जैसी सोच वालों को महामूरख कह दिए । शायद वो महात्मा गांधी को भी कह देते जब तक पूरे देश में पहनने के बराबर खादी ना बना पाओ तब तक विदेशी कपड़ों का बहिष्कार मत करो ।

मजेदार बात ये भी है कि बात बात पर पतंजलि प्रोडक्ट्स का विरोध करने वाले भी आजकल यही ज्ञान दे रहे हैं । सब माया है

और इस पर हमने प्रतिक्रिया दी –

कृप्या ऑप्शन बतायें, हम तो कोशिश हमेशा करते हैं कि भारतीय कंपनियों के ही उत्पाद खरीदें, पर धीरे धीरे लगभग सभी जगहों पर विदेशी कंपनियों का कब्जा होता जो रहा है, यहाँ तक कि मॉल में खरीदने की जगह हम सामान छोटी दुकान से खरीदने शुरू कर दिये, परंतु यह भी दीगर बात है कि हम अमेजन के डिस्काऊँट को इग्नोर तो नहीं कर सकते तो जो भी पैक आईटम हैं वो ग्रोसरी अमेजन से ही मँगाते हैं। हमारी देशी कंपनी फ्लिपकार्ट ग्रोसरी वाले मामले में फेल हो गई और उन्होंने ग्रोसरी स्टोर बंद ही कर दिया।

पतंजलि के उत्पाद ही सबसे पहले अमेजन पर खाली होते हैं, तो इससे भी पता चलता है कि पतंजलि के उत्पादों की माँग बहुत ही ज्यादा है।

पतंजलि के आऊटलेट्स पर उनके खुद के उत्पाद उपलब्ध नहीं हैं, बहुत मारामारी है, हम नवदर्शनम का आटा खाते हैं, सबसे बढ़िया आटा है, परंतु यहाँ उपलब्धता की बहुत मारा मारी है। केवल मेक इन इंडिया से कुछ नहीं होगा, उसकी सप्लाय भी अच्छी करना होगी और इसके लिये सरकार को ही कोई अच्छा इनिशियेटिव लेना चाहिये।

कमल शर्मा जी का कहना है –

चीन को झटका देने के लिए पहले देश में अच्‍छी क्‍वॉलिटी की चीजें बनाओ और वह भी सस्‍ते प्राइस पर। भारतीय कंपनियों ने सदैव लूटा। स्‍कूटर तक लड़की के जन्‍म लेने के समय बुक करवाना पडता था और शादी के समय मिल पाता था। तत्‍काल चाहिए तो कंपनियां ही लूटती थी। यह तो एक उदाहरण मात्र है। पी वी नरसिंहाराव ने अर्थव्‍यवस्‍था को खोला और विदेश से कंपनियां भारत आई तो क्‍या स्‍कूटर और क्‍या कार..सब कुछ धड़ाधड मिलने लगा और देसी कंपनियों एंटी डम्पिंग से लेकर विदेशी कंपनियों को भगाने की गुहार लगाती है। कामचोर कर्मचारी निजीकरण से डरते हैं और निजी वाले विदेशी से।

यारों का यार हमारा सरदार

दोस्त बहुत हैं पर गहरे दोस्त कम ही होते हैं, एक के बारे में लिखो तो दूसरे दोस्तों को बुरा लग सकता है, परंतु हम फिर भी अपने एक गहरे दोस्त के बारे में लिखते हैं, हमें पता है कि हमारे अन्य गहरे दोस्त हमारी बातों को ध्यान से पढ़ेंगे और हमें और ज्यादा प्यार करेंगे। अन्य दोस्तों की मैं कह नहीं सकता हूँ जिसमें से कुछ लोग तो बुरा भी मान जायेंगे और कुछ हौसलाफजाई करेंगे। Continue reading यारों का यार हमारा सरदार

कला, साहित्य और राजनीति

कला, साहित्य और राजनीति तीनों पृथक कलायें हैं परन्तु इसके घालमेल से व्यक्ति सफलता के चरम शिखर तक जा पहुँचता है। संघर्ष हर कोई करता है, योग्यता भी हर किसी में होती है। निसंदेह कुछ लोगों को छोड़कर जो कि अपवाद होते हैं। परन्तु जो केवल एक ही चीज पकड़कर आगे बढ़ता है वह हमेशा ही संघर्ष करता रहता है। यह विचार कुछ लोगों में गफलत जरूर पैदा कर सकता है।

वैसे ही जब मैं किसी एक और विचार को सुन रहा था, जब एक वरिष्ठ साहित्यकार जो कि किसी बड़े सम्मान से नवाजे जा चुके थे और उन्होंने अपना घर पर पार्टी का आयोजन किया, तो सबसे पहले उनके घर पर एक बड़ी साहित्यकारा नेत्री पहुँच गईं, और उन दोनों की गुफ्तगू चल रही थी, साहित्यकार महोदय मद्यपान और धूम्रपान कर रहे थे, और सामने के सोफे पर ही नेत्री बैठी थीं। एक बात हमें बहुत मुद्दे की लगी, जब नेत्री ने कहा कि यह मुकाम आपने बहुत संघर्ष से पाया है, तब साहित्यकार महोदय कहते हैं कि नहीं आप गलत हैं, असल में आज जिस मुकाम पर मैं हूँ केवल अपनी चालाकी के कारण, तो नेत्री जी उनकी बात से असहमत थीं, तो साहित्यकार महोदय ने उनको कहा कि आप क्या सभी लोग असहमत होंगे परंतु सच यही है कि मैं केवल अपनी चालाकी के कारण यहाँ तक पहुँचा। Continue reading कला, साहित्य और राजनीति

QNET कंपनी से बचकर रहें

QNET कंपनी का टाईम्स ऑफ इंडिया में दो दिन पहले ही पूरे मुख्य पेज का एक विज्ञापन आया था, मैं तो उस विज्ञापन को देखकर ही हतप्रभ था, कि फिर एक बड़ी पैसे घुमाने वाली कंपनी, उत्पादों के सहारे कैसे भारत में एक बड़ी एन्ट्री कर रही है। यह सब पौंजी स्कीम कहलाती है, जिसमें कि आपको कुछ लोगों को अपने नीचे लोगों को जोड़ना होता है, जिसके बदले आपको उन पैसों से कमीशन दिया जाता है जिन पैसों से वे लोग आपके नीचे उस कंपनी के लिये आपसे जुड़ते हैं। अगर उस कंपनी के उत्पाद भी देखेंगे तो आपको पता चल जायेगा कि यह कंपनी उत्पाद के लिये नहीं बल्कि सीधे सीधे मनी रोटेटिंग का काम मल्टी लेवल मार्केटिंग के सहारे कर रही है। Continue reading QNET कंपनी से बचकर रहें

भाग–९ अपनी पहचान के लिये वेदाध्ययन (Study Veda for your own identity)

    भारतीय परम्परा में ज्ञान का मुख्यत: अभिप्राय है स्वयं को ही जानना-पहचानना और आत्मज्ञान ही है सर्वोच्च ज्ञान। ऋषि याज्ञवल्क्य अपने उपदेश पर आत्मज्ञान पर बल देते हैं।
आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:
    अपनी आत्मा ही देखने योग्य है जो परमात्मा से भिन्न नहीं है और इस एक तत्व को जान लेने से सब कुछ स्वत: जाना गया हो जाता है।
तस्मिन विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति
    (तस्मिन) उस एक परमतत्व के (विज्ञाते) जान लेने पर (सर्वं) सब कुछ (विज्ञातं) जाना गया (भवति) हो जाता है। कुछ भी जानने के लिये शेष नहीं रह जाता । इस तरह वेद अमरत्व का बोध कराते हैं। यही एकत्व का ज्ञान सभी को विद्वेषभावरहित बना कर स्नेहसूत्र में जोड़ने वाला है। सभी में सम्प्रीति सहयोग का भाव होगा और अपने-अपने कार्यों को करते हुए सभी सुखी रहेंगे।
    वैदिक ऋषियों का यह अध्यात्म-ज्ञान विश्व मानवता के कल्याण हेतु अनुपम महनीय योगदान है। इसीलिए समष्टिगत कल्याण हेतु सम्पूर्ण मानव समाज की रक्षा हेतु सभी के लिए वेदों का अध्ययन परमावश्यक है। इस दृष्टि से वेद आज और भी अधिक उपयोगी एवं प्रासंगिक हैं।

भाग-८ वेदाध्ययन में सभी का अधिकार (Learning Veda right for all)

    ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत अनुपम ज्ञानराशि वेदों की उपयोगिता सार्वकालिक सार्वदेशिक सार्वजनीन है। ऋषियों ने बिना किसी भेद-भाव के समान रूप से वेदों का उपदेश सभी के लिए किया है। मानव मात्र का कल्याण करना समाष्टिहित ही उनका प्रयोजन था। एक ही परमात्मा की सन्तानें होने के कारण सभी मनुष्य मूलत: समान हैं। ऋषि का सुस्पष्ट कथन है –
यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय
    (यथा) जिस प्रकार (मैं) (इमां कल्याणीं) इस कल्याण करने वाली (वाचं) वाणी को (जनेभ्य: ) मनुष्यों के लिये (आवदानि) बोलता हूँ उस वाणी को उसी प्रकार मैं (ब्रह्मराजन्याभ्यां) ब्राह्मण और क्षत्रियों के लिये (च शूद्राय) और शुद्र के लिये ( च अर्याय) और श्रेष्ठ स्वामी वैश्य के लिये (च स्वाय) अपने स्थान पर रहने वाले गृहस्थ के लिये (च अरणाय) और भ्रमण करने वाले परिव्राजक संन्यासी के लिये भी कहता हूँ।

यहाँ पर ऋषि ने कल्याणकारी उपदेश समान रूप से सभी के लिये दिया है। मनुष्यों में जो वर्णभेद है वह कर्मों के कारण है। सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से है। इसलिए वेदों के अध्ययन में जाति-वर्णगत, लिंगगत कोई भेद नहीं है। इसका तो प्रत्यक्ष प्रमाण वागाम्भृणी, काक्षीवती घोषा, अपाला, गार्गी इत्यादि ऋषिकाएँ एवं ब्रहमवादिनियाँ हैं। ऐतरेय ब्राह्मण के ऋषि रूप में इतरा दासी के पुत्र महिदास ऐतरेय प्रसिद्ध हैं। वेदों की यहा समन्वयात्मक दृष्टि सर्वथा अनुकरणीय एवं प्रेरणास्पद है।

भाग–७ वेदों में पर्यावरण चेतना (Environmental consciousness in Vedas)

    हमारे वैदिक ऋषि मनीषी पर्यावरण रक्षण के प्रति बहुत ही जागरूक सावधान रहे हैं। पर्यावरण रक्षण का अभिप्राय ही है स्वयं की रक्षा। अत: स्वकीय रक्षाहेतु यह पर्यावरण रक्षणीय है, इसी दृष्टि से उन्होंने प्रकृति की दैवतभाव से उपासना की। सहज रूप से कल्याणकारिणी वरदायिनी यह प्रकृति पूजा के योग्य है, इसको नियन्त्रित, वश में नहीं करना है, इसके सन्तुलन को बाधित नहीं करना है। उपासना से यह इच्छित फ़ल प्रदान करने वाली है।
 
एक ही परम तत्व सर्वत्र ओतप्रोत है – सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुष्श्च
    (जगत: ) जंगम-गमनशिल चेतन (च) और (तस्थुष: ) स्थावर अचेतन की (आत्मा सूर्य: ) आत्मा सूर्य है अर्थात सूर्यरूपी परमात्मा सभी चेतन और अचेतन पदार्थों में परिव्याप्त है, उससे बाहर कुछ भी नहीं है। सब कुछ परमात्मस्वरूप होने से केवल मनुष्यों की नहीं, अपितु पशु-पक्षियों, लता-वनस्पतियों सभी की रक्षा हो जाती है और एक सुखमय आह्लादमय रहने योग्य संसार बन जात्ता है। ऋषियों ने इसी दृष्टि से नदी, अश्मा, वनस्पतियों की भी दैवतभाव से प्रार्थना की है।
    भौतिक प्राकृतिक पर्यावरण रक्षण के साथ ही ऋषियों ने आन्तरिक पर्यावरण स्वच्छता पर, उदात्त जीवन मूल्यों के रक्षण पर बल दिया है और इस तरह वर्तमान में पर्यावरण प्रदूषण की विश्व व्यापी गम्भीर विषम समस्या का समाधान वेदों से प्राप्त हो जाता है –
‘अग्निमीळे पुरोहितम’
    (पुरोहितम अग्निम) पुरोहित अग्नि की (ईळे) में प्रार्थना करता हूँ।

वैदिक ऋषिक में यह अग्नि केवल पाचक दाहक प्रकाशक ही नहीं, अपितु यह सर्वज्ञ सर्वान्तर्यामी अग्रगामी नेतृत्व करने वाला सर्वाधिक रमणीय धनों को देने वाला है। अत:  जातवेदस वैश्वानर पुरोहित देव इत्यादि रूप में यह अग्नि प्रार्थनीय है।

भाग–६ वेदों में देश-प्रेम राष्ट्रीय चेतना (Patriotism and Cosmopolitanism in Vedas)

    देशप्रेम राष्ट्रीयता की उदात्त शिक्षा वेद प्रदान करते हैं। मनुष्यों में राष्ट्रीय चेतना जागरित करने वाले अनेक मन्त्र हैं –
माता भूमि: पुत्रोsहं पृथिव्या: । अथर्ववेद १२.१.१२
    (भूमि: ) भुमि हमारी माता है। (अहं ) मैं (पृथिव्या: ) पृथिवी का पुत्र हूँ।
नमो मात्रे पृथिव्यै । यजुर्वेद ९.२२
    (मात्रे पृथिव्यै) माता पृथिवी को (नम: ) नमस्कार है। वेदों के इन वचनों से मातृभूमि के प्रति आत्मीय भावना होती है और इस पर रहने वाले हम सभी बहन-भाई हैं। अत: हम सभी को परस्पर मेल-मिलाप से रहना चाहिये। परस्पर एक दूसरे के हित का ध्यान रखना चाहिये।

विश्वबन्धुत्व की भावना –

विश्वमानुष, बन्धुत्व, भाईचारा का उदात्त पाठ हमें वेद पढ़ाता है।
यत्र विश्वं भवत्येकनीडम
(यत्र) जहाँ पर (विश्वं) सम्पूर्ण संसार (एकनीडम) एक घोसला (भवति) हो जाता है।
    ईशावास्यमिदं सर्वम (इदं सर्वम) यह सबकुछ (ईशावास्यम) ईश्वर परमात्मा से परिव्याप्त है। पुरुष एवेदं सर्वम (इदं सर्वम) यह सब कुछ (पुरुष:एव) परमपुरुष परमात्मा ही है।
    सर्वं खल्विदं ब्रह्मा (इदं सर्वम) यह सम्पूर्ण जगत (खलु) निश्चित रूप से ब्रह्मा ही है इत्यादि रूप से सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
    वसुधैव कुटुम्बकम जैसी उदात्त भावना जागरित करने में वेदों का ही योगदान है और इसी का फ़ल है सर्वकल्याण समष्टि का हित – सर्वे भवन्तु सुखिन: – सभी सुखी होवें।
    संकुचित क्षुद्र स्वार्थ भावना से ऊपर उठकर सर्वहित प्रेरणा वेदों से मिलती है। वेद सर्वहित सम्पादक महौषधि हैं।
    इस तरह वेद समस्त मानवता को एक सूत्र में संग्रठित करते हैं और सकल विश्व के लिये वेदों का यह अनुपम योगदान है।

भाग–५ वेदों की पारिवारिक / सामाजिक जीवन दृष्टि (Social and Family vision in Vedas)

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह एकाकी, अकेले नहीं, अपितु परिवार में, समाज में रहता है और सुखमय जीवनयापन करना मनुषय की सहज स्वाभाविक अभिलाषा होती है। एतदर्थ वेदों में पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया गया है । सुख समृद्धि की प्राप्ति हेतु ही ऋषियों ने ४ प्रत्यक्ष देवों को प्रस्तुत किया है। देव का अभिप्राय ही है जिनसे हमें वांछित फ़ल की प्राप्ति होती है । देवों दानात दान, इच्छित फ़ल प्रदान करने के कारण ही देव कहलाते हैं। प्रत्यक्ष देवता ४ हैं –
१. माता २. पिता ३.आचार्य ४.अतिथि
मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव अतिथिदेवो भव
    तैत्तिरीयोपनिषद शिक्षावल्ली में विद्याध्ययन की सम्पूर्ति पर गुरुकुल से घर जाने वाले छात्रों को दिया गया यह उपदेश सभी मनुष्यों को इन प्रत्यक्ष देवों की सेवा सुश्रूषा के लिए प्रेरित कर रहा है। पारिवारिक-सामाजिक बन्धन को सुदृढ़ एवं प्रगाढ़ कर रहा है। इनकी सेवा करने से निश्चित रूप से अभीष्ट की सिद्धि होती है।
    सच्चा सुख तो वास्तव में परिवार में है। अकेले रहने में कोई सुख नहीं है। इसलिये भगवती वेद श्रुति कहती है कि प्रारम्भ में वह परमात्मा अकेला था, उसे कुछ अच्छा नहीं लगा –
एकाकी स न रेमे
    और पुन: उसने संकल्प किया कि मैं अकेला हूँ, बहुत हो जाऊँ, प्रजाओं की सृष्टि करूँ –
एकोsहं बहु स्याम, प्रजायेय
    इस तरह उस एक परमात्मा ने आत्मरमणार्थ, क्रीड़ा के लिए नामरूपात्मिका इस सृष्टि की रचना की। सृष्टि की रचना करके वह परमात्मा इसमें प्रवेश कर गया, इसलिए सच्चिदानंद परमात्मा से उद्भूत यह सृष्टि आनन्दबहुला है –
तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत
    (वह परमात्मा) (तत सृष्टवा) उस जगत की रचना करके (तद एवं अनुप्र-अविशत) उसी में प्रवेश कर गया। सर्वं खल्विदं, ब्रह्म (इदं सर्वं) यह सब कुछ (खलु) निश्चित रूप से (ब्रह्म) ब्रह्म है। इसका यही अभिप्राय है कि सच्चा सुख जो प्रत्येक मनुष्य को अभीष्ट है, परिवार में है और वेद पारिवारिक व्यवस्था का बहुत ही सुन्दर वर्णन प्रस्तुत करते हैं। परिवार के सभी सदस्यों में परस्पर सौहार्द सौमनस्य सहयोग का भाव होवे, प्रेमपूर्वक मधुर वाणी बोलते हुए मिलजुल कर एक साथ रहने की, एक साथ चलने की, मिल कर कार्य करने की बात वेदों में कही गयी है। सभी का खाना-पीना एक साथ होवे, आपस में द्वेष-अलगाव की भावना न होवे और इस प्रकार अभीष्ट लक्ष्य को सिद्ध करने के लिये प्रेरित किया गया है।
    माता-पिता, पत्नी, भाई-बहनों को परस्पर व्यवहार की विधि-रीति को वेद बतलाता है।
अनुव्रत: पितु: पुत्रो मात्रा भवतु संमना:।
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम॥ अथर्ववेद
३.३०.२
    (पुत्र: ) पुत्र (पितु: ) पिता के (अनुव्रत: ) अनुकूल आचरण वाला (भवतु) होवे। (मात्रा) माता (संमना: ) सभी सन्तानों के प्रति समान मन-स्नेह वाली (भवति) होवे (जाया) पत्नी (पत्ये) पति के प्रति (मधुमतीं) मधुर-मीठी (शान्तिवाम) शान्ति सुख प्रदान करने वाली (वाचं) वाणी (वदतु) बोले।
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा
    (भ्राता) एक भाई (भ्रातारं) दूसरे भाई से (मा द्विक्षत) द्वेष ना करे। (उत) और (स्वसा) एक बहन (स्वसारम) दूसरी बहन से द्वेष ना करे।     यहाँ पर वेद पारिवारिक सुख-शान्ति और समृद्धि के लिए एक सद्व्यवहार की प्रेरणा दे रहा है। यह सर्वथा सार्थक है। पुत्र के लिये आवश्यक है कि वह अपने पिता के विचारों को जानकर तदानुसार कार्य करे, वह आज्ञाकारी होवे। माता ममता स्नेह की मूर्ति होती है, उसकी गोद को पहली पाठशाला कहा गया है। सभी सन्तानों के प्रति उसका स्नेह वात्सल्य होना चाहिए। वेद ने पत्नी को ही घर कहा है।
    जायेदस्तम (जाया) पत्नी (इत) ही (अस्तम) घर है।  इसलिए घर की समृद्धि में पत्नी का विशेष उत्तरदायित्व है। गृहस्वामी पति की वह अपनी प्रिय मधुर वाणी से थकावट दूर करे। इसी प्रकार भाई-बहन सभी आपस में मिल-जुल कर रहें और अपने निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन करते हुए परिवार को सुखी बनावें।
    इसी प्रकार सामाजिक एकता समरसता सह-अस्तित्व पर वेद बल देता है।
समानी प्रपा सह वोsन्नभाग: – अथर्ववेद ३.३०.६
    हे मनुष्यों (व: ) आप सभी की (प्रपा) पानीयशाला (समानी) समान-एक होवे। (अन्नभाग: ) अन्न का भाग वितरण समान होवे।
केवलाघो भवति केवलादी – ऋगवेद १०.११७.६
    (केवल-आदी) देवल अकेला खाने वाला (केवल अघ: भवति) केवल पाप को भोगने वाला होता है।
पुमान पुमांसं परिपातु विश्वत:
    (पुमान) एक मनुष्य (मुपांसं) दूसरे मनुष्य की (विश्वत: ) सभी तरफ़ से (परिपातु) रक्षा करे। इस प्रकार वेद सभी मनुष्यों के सह अस्तित्व, सहचरित्र पर बल देता है। सभी सुखी-समृद्ध रहें। ऋग्वेद के अन्तिम मन्त्र में यही कामना की गई है।
समानीव आकूति: समाना हृदयानि व:।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति॥ ऋग्वेद १०.१९१.४

हे मनुष्यों (व: ) आप सभी को (आकूति: ) विचार संकल्प (समानी) समान होवें। (व: ) आप सभी के (हृदयानि) हृदय (समाना) समान होवें (व: ) आप सभी के (मन: ) मनन-चिन्तन (समानम अस्तु) समान होवें। (यथा) जिससे (व: ) आप सभी का (सुसह-असति) एक साथ रहना होवे। सह अस्तित्व के लिये चिन्तन-मनन, भावना तथा संकल्प में समानता-एकरूपता आवश्यक है।