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भाग–४ मानव शरीर ही ब्रह्माण्ड

मानवशरीर की ब्रह्माण्ड, यज्ञशाला, ऋषि आश्रम, तीर्थ एवं स्वराज्य रूप में अवधारणा –
    वेदों के सुप्रख्यात व्याख्याकार पं.श्रीपाद सातवलेकर ने अपनी व्याख्या में मानवशरीर को विशेष महत्व प्रदान किया है। सकल ब्रह्माण्ड अंश रूप में इस शरीर में विद्यमान है। इसलिए जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वह इस शरीर में भी है। हमारा शरीर ही यज्ञशाला है। शरीर के भितर होने वाली समस्त क्रियाएँ यज्ञीय क्रिया कलापों के समान हैं। मनाव शरीर ही ऋषियों का आश्रम तथा तीर्थ स्थल है। इस कथन से उन्होंने शरीर की पावनता पर बल दिया है। भावों, विचारों तथा ज्ञान से अपने इस शरीर की पवित्रता को बनाए रखना है।
सप्त ऋषय: प्रतिहिता: शरीरे।
सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम ( यजुर्वेद ३४.५५)
    (शरीरे) मानव शरीर में (सप्त ऋषय: ) सप्त ऋषि (प्रतिहिता: ) स्थापित विद्यमान हैं। (सप्त) सातों ऋषि (सदम) शरीर रूपी घर की (अप्रमादम) बिना प्रमाद के सावधानीपूर्वक (रक्षन्ति) रक्षा करते हैं।

पं. सातवलेकर ने मानव शरीर को अपना स्वराज्य बतलाया है। यह शरीर ही रत्नादि से परिपूरित अपराजेय देवपुरी अयोध्या है और सवकीय आत्मा ही इस स्वराज्य का राजा है। शरीर रूपी यह स्वराज्य सभी को सहज ही स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। धनी हो अथवा निर्धनी, सभी व्यक्ति का अपना स्वराज्य है और आत्मा रूपी राजा का शासन इस पर चलना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य को अपने शरीर के महत्व का बोध कराया गया है।

भाग ३ – वेदाध्ययन की उपयोगिता (Value of Veda Study)

वेदाध्ययन की उपयोगिता –
    भौतिक विज्ञान के इस प्रकर्ष युग में वेद सर्वथा प्रासंगिक हैं। इसका अध्ययन सर्वतोभावेन – सभी प्रकार से उपयोगी है, क्योंकि मानव का सम्पूर्ण जीवन वेदों से अनुप्राणित, ओतप्रोत है। मनुषय का मुख्य प्रयोजन है सुख की प्राप्ति और इसकी सिद्धि में वेद सर्वथा उपकारक हैं। वेदों के सुप्रसिद्ध व्याख्याकार आचार्य सायण का कथन है कि इष्ट की प्राप्ति तथा अनिष्ट के परिहार के उपाय को वेद ही बतलाते हैं। इस तरह लौकिक अभुदय तथा नि:श्रेयस दोनों प्रयोजनों की सिद्धि वेदों से होती है। वास्तव में वेद एक सुव्यवस्थित समन्वित जीवन प्रणाली प्रस्तुत करते हैं। एक – एक दिन का खण्ड-खण्ड करके नहीं, अपितु मानव जीवन की समग्रता सम्पूर्णता पर यहाँ विचार किया गया है। केवल वर्तमान जीवन को सुखी बनाना ही उद्देश्य नहीं है, अपितु भावी ज्कीवन को और अधिक सुखमय बनाना है, अमृतत्व की प्राप्ति करना है और वेद तो अमृतत्वसिद्धि के संविधान हैं। मृत्यु के भय से छुटकारा दिलाकर वेद ही हमें अमरता का बोध कराते हैं।
         अमृतपुत्रा वयम = हम सभी अमृतपुत्र हैं।
    इस तरह वेद परमसुखमयी आह्लादमयी जीवन दृष्टि प्रस्तुत करते हैं”:
 
        इहैव स्तं मा वियौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम।
        क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मौदमानौ स्वे गृहे॥ ऋगवेद १०.८५.४२
    विवाह के पवित्र माड्गलिक अवसर पर नव दम्पती को प्रदान किया गया याह शुभाआशीर्वचन है। यह संसार सुखमय है। सुख प्राप्ति के लिए इसे छोड़ कर कहीं अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं है। सभी प्रकार का वास्तविक सच्चा सुख यहीं पर है। हे यजमानदम्पति ! तुम दोनों (इह – यव) यहीं पर ( स्तम) रहो। (मा) मत (वियौष्टं) वियुक्त अलग होवो। (विश्वम आयु: ) सम्पूर्ण आयु १०० वर्ष ( वि अश्नुतम) प्राप्त करो। (पुत्रै: ) पुत्रों के साथ (नप्तृभि: ) पौत्रों के साथ (क्रीड़न्तौ) खेलते हुए (मोदमानौ) प्रमुदित होते हुए (स्वे गृहे) अपने घर में (स्तम) रहो। रुग्ण दु:खी-दीन होकर नहीं, अपितु बलवान बलिष्ठ अड्गों से बराबर कार्य करते हुए १०० वर्ष तक जीवित रहने की कामना की गई है।
         जीवेम शरद: शतम ( सौ वर्ष हम जीवित रहें)
भद्रं कर्णेभि:श्रृणुयाम देवा भद्रं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:।
स्थिरैरड्गै:स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्येशम देवहितं यदायु:॥ ऋगवेद १.८६.८
    (देवा: ) हे देवगण (कर्णेभि: ) कानों से (भद्रं) मड्गल-शुभ (श्रृणुयाम) हम सुने । (यजत्रा: ) हे यजनीय-पूजनीय देवगण ( अक्षिभि: ) आँखों से (भद्रं)  मड्गलशुभ (पश्येम) हम देखें। (स्थिरै: अड्गै: तनूभि: ) बलिष्ठ अंगों से युक्त शरीरों से (तुष्टुवांस: ) प्रार्थना करते हुए (देहहितं) देव-निर्धारित (यद आयु: ) जो (१०० वर्ष की) आयु है (वि-अशेम) हम अच्छी तरह प्राप्त करें अर्थात इस अवधि में रोगी ना होवें, बराबर निरोगी रहें और ऋषि कामना करता है कि कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा: (इह) इस लोक संसार में (कर्माणि) (निर्धारित) कार्यों
को (कुर्वन एव) करते हुए सम्पन्न करते हुए (शतं समा: ) सौ वर्ष तक (जिजीविषेत) जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए और केवल १०० वर्ष तक ही नहीं, अपितु इससे भी अधिक जीवित रहने की बात कही गई है –
भूयश्च शरद: शतात
(शतात शरद भूय: ) और सौ वर्ष से अधिक जीवित रहें ।
    हमारे वैदिक ऋषि ने तो विश्वायु विश्वधात्री विश्वकर्मा, जबतक चाहें तब तक जीवित रहने की, सब कुछ धारण करने की और सबकुछ करने की बात कही है। वास्तव में मानव-शरीर कर्मभूमि है और कर्म ही जीवन है तथा सिद्धि: कर्मजा-विजयश्री की प्राप्ति कर्म से होती है, इसलिए कर्म करने पर बल दिया गया है तथा कार्य को कभी भविष्य के लिए नहीं टालना चाहिए क्योंकि मनुष्य के कल की बात को कौन जानता है।
न श्व: श्वमुपासीत। को हि मनुष्यस्य श्वो वेद।
    ऋषि अथर्वन का बहुत ही प्रेरणास्पद कथन है कि हमारा यह शरीर ही देवपुरी अयोध्या है, इसमें सभी देवता निवास करते हैं, यह अपराजेय ज्योतिर्मय है। इस पुरी में स्थित आत्मा ही परमदेव, परमात्मा है। इस पुरी का राजा है –
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानांपूरयोध्या

(अष्टचक्रा) आठ चक्रों (नवद्वार) नव द्वारों वाला हमारा यह शरीर ही (देवानां) देवताओं की (पू: ) पुरी (अयोध्या) अयोध्या-अपराजेय है। इसलिए यह शरीर सर्वतोभावेन रक्षणीय है,  इसको स्वस्थ एवं स्वच्छ बनाए रखना है।

भाग २ – वेदों का महत्व, वेदों का स्वरूप

आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:

   (भद्रा:क्रतव:) कल्याण करने वाली बुद्धियाँ (विश्वत:) सभी तरफ़ से (न:) हमारे पास (आ यन्तु) आवें अर्थात ज्ञान की उत्तम धाराएँ हमको प्राप्त होवें।

वेदों का महत्व –

       वेद भारतीय अथवा विश्व साहित्य के उपलब्ध सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। इनसे पहले का कोई भी अन्य ग्रन्थ अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिये कहाज आता है कि वे सम्पूर्ण संसार के पुस्तकालयों की पहली पोथी है और भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के तो वेद प्राचीनतम एवं सर्वाधिक मूल्यवान धरोहर हैं, हमारे स्वर्णिम अतीत को अच्छी तरह प्रकाशित करने वाले विमल दर्पण हैं।

     वेद शब्द का अर्थ ही है ज्ञान और इस तरह वेद दकल ज्ञान-विज्ञान की निधि हैं। परा था अपरा दोनों विद्याओं का निरूपण करते हैं। भगवान मनु का उद्घोष है कि ‘सर्वज्ञानमयो हि स:’ (स: ) वह वेद (सर्वज्ञानमय: ) सभी प्रकार के ज्ञान से युक्त हैं। महर्षि दयानन्द ने वेदों को समस्त सत्य विद्याओं का आकार कहा है। हमारा सम्पूर्ण जीवन, सकल क्रियाकलाप वेदों से ओतप्रोत है, कुछ भी वेद से बाहर नहीं है। इनकी उपयोगिता सार्वकालिक सार्वदेशिक सार्वजनीन है। इसलिए इन वेदों के अध्ययन पर बल दिया गया है और भौतिक विज्ञान के इस अत्यन्त समुन्नत युग में भी वेदों का ज्ञान उपयोगी, अत एवं प्रासंगिक है और इन्हीं वेदों के कारण आज भी हमारी भारतीय संस्कृति संसार में पूजनीया है और भारत देश विश्वगुरू के महनीय पद पर प्रतिष्ठित है।

वेदों का स्वरूप –

    वेद अपौरूषेय, अत एवं नित्य हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार इन वेदों की रचना नहीं हुई है, अपितु ऋषियों ने अपनी सतत साधना तपश्चर्या से ज्ञान राशि का साक्षात्कार किया है और प्रत्यक्ष दर्शन करने के के कारण इनकी संज्ञा ‘ऋषि’ है –

     ऋषिर्दर्शनात (दर्शनात) दर्शन, करने के कारण (ऋषि: ) ऋषि कहते हैं।

      ऋषयो मन्त्रद्रष्टार: (मन्त्रद्रष्टार: ) मन्त्रों को देखने वाले (ऋषय: ) ऋषिलोग (युग के प्रारम्भ में हुए) ।

      साक्षात्कृतधर्माण: ऋषयो बभूवु: (साक्षात्कृतधर्माण: ) धर्म-धारक्रतत्व-सत्य का साक्षात्कार करने वाले (ऋषय: ) ऋषिलोग (बभूवु: ) युग के प्रारम्भ में हुए। प्रत्यक्ष किए जाने के कारण वेद प्रतिपादित ज्ञान सर्वथा संदेहरहित निर्दोष, अत एवं प्रामाणिक है। इनमें किसी भी प्रकार की मिथ्यात्व की सम्भावना नहीं है। इसलिये वेदों कास्वत: प्रामाण्य है, अपनी पुष्टि प्रामाणिकता के लिये वेद किसी के आश्रित नहीं हैं। वेदों का सर्वाधिक महत्व इसी बात में है कि इनके द्वारा स्थूल-सूक्ष्म निकटस्थ दूरस्थ, अन्तर्हित व्यवहित, साथ ही भूत, वर्तमान, भविष्यत, त्रैकालिक समस्त विषयों का नि:संदिग्ध निश्चयात्मक ज्ञान होता है और इसीलिए भगवान मनु ने वेदों को सनातन चक्षु कहा है। यह अनुपम ज्ञाननिधि सुदूर प्रचीन काल से आज तक अपने उसी रूप में सुरक्षित चली आ रही है। इसमें एक भी अक्षर यहाँ तक कि एक मात्रा का भी जोड़ना-घटाना सम्भव नहीं है। आठ प्रकार के पाठों से यह वेद पूर्णत: सुरक्षित है।

PMP, CBAP, ISTQB कौन सा सर्टिफ़िकेशन करना चाहिये ।

    आजकल बहुत सारे प्रोफ़ेशनल सर्टिफ़िकेशन बाजार में उपलब्ध हैं, जैसे कि प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये PMP, बिजनेस अनालिस्ट के लिये CBAP, टेस्टिंग वालों के लिये ISTQB की बाजार में बहुत ज्यादा डिमांड है। सारे लोगों का प्रोफ़ाईल बिल्कुल यही नहीं होता है, कुछ ना कुछ अलग होता है और वे इसी सोच विचार में रहते हैं कि कौन सा सर्टिफ़िकेशन करें, और सही तरीके से बाजार में कोई बताने वाला भी नहीं होता है।

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    अब PMP को ही लें, यह सर्टिफ़िकेशन प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये जरूर है, परंतु उतना ही मतलब का बिजनेस अनालिस्ट के लिये भी है, कई जगह बिजनेस अनालिस्ट प्रोजेक्ट मैनेजर का काम भी करता है और प्रोजेक्ट प्लॉनिंग करता है। PMP सर्टिफ़िकेशन केवल IT प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये ही नहीं होता है, यह हरेक जगह, हर प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये होता है, फ़िर भले ही वह मैन्यूफ़ेक्चरिंग इंडस्ट्री हो या रियल इस्टेट इंडस्ट्री या फ़िर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री।

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    PMP के बारे मे सोचा जाता है कि यह IT प्रोजेक्ट मैनेजर्स के लिये सर्टिफ़िकेशन बनाया गया है, परंतु यह सर्टिफ़िकेशन दरअसल प्रोजेक्ट मैनेजर्स को प्रोसेस, बजट और रिसोर्स मैनेजमेंट इत्यादि सिखाता है, किस तरह से प्रोजेक्ट को सही दिशा में ले जाया जाये, क्या चीजें जरूरी हैं, अगर सही तरह से रिपोर्टिंग होगी तो रिस्क उतनी ही कम होगी।

    वैसे ही अन्य सर्टिफ़िकेशन हैं, CBAP बिजनेस अनालिस्ट के फ़ंक्शन को समझाता है, और ISTQB टेस्टिंग के बेसिक फ़ंक्शन से लेकर एडवांस लेवल तक के तौर तरीके सिखाता है। जिससे किसी भी प्रकार के प्रोजेक्ट के लिये सही तरह से प्लॉनिंग करने में मदद तो मिलती ही है, साथ ही सही तरीके से कैसे डॉक्यूमेन्टेशन किया जाये, यह भी पता चलता है। जिससे प्रोजेक्ट के डॉक्यूमेंट अच्छे बनते हैं और ट्रांजिशन में परेशानी नहीं आती है।

    इन सारे सर्टीफ़िकेशन में पहले का अनुभव जरूरी होता है, तो पहले जाँचें कि आप कौन से सर्टिफ़िकेशन के लिये फ़िट हैं। आपका अनुभव कौन से सर्टिफ़िकेशन के लिये उम्दा है और वह सर्टिफ़िकेशन आपमें वैल्यू एड कर रहा है। इन सर्टिफ़िकेशनों की फ़ीस ज्यादा नहीं होती, परंतु इन सर्टिफ़िकेशन्स से आप अपना काम अच्छे से कर पायेंगे, आपके काम की क्वालिटी अपने आप दिखेगी।

    naukriनई नौकरी के लिये बाजार में उतरेंगे तो ये सर्टिफ़िकेशन बेशक आपके लिये नई नौकरी की ग्यारंटी ना हों, पर नई नौकरी के लिये पासपोर्ट जरूर साबित होंगे, अगर किसी एक पद के लिये १०० लोग दौड़ में हैं और सर्टिफ़िकेशन केवल ५ लोगों के पास, तो उन ५ लोगों के चुने जाने की उम्मीदें बाकी के उम्मीदवारों से अधिक होगी, आपकी प्रतियोगिता उन ५ लोगों से होगी ना कि पूरे १०० लोगों से । अपनी अपनी फ़ील्ड और कार्य के अनुसार अपना सर्टिफ़िकेशन चुनिये और अपने भविष्य का निर्माण कीजिये।

आप इस पोस्ट का वीडियो भी देख सकते हैं –

भाग १ – पाठ्य – गायत्री मन्त्र अथर्ववेद के अनुसार

वेदमाता के पावन अनुग्रह से हमें वैदिक तत्वज्ञान का अमृत – प्राशन करने का सुअवसर प्राप्त हो, यही हम सबके हृदय की एक मात्र कामना है – क्योंकि अथर्ववेद के अनुसार इसी से हमारी अन्य सभी इच्छाओं की परिपूर्ति हो जायेगी –
स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी
द्विजानाम्‍।
आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसं
मह्यं दत्तवा व्रजत ब्रह्मलोकम् ॥
( – मैंने वरदायिनी वेदमाता की स्तुती की है। यह हम सबको पवित्र करने वाली है। हमारी प्रार्थना है कि यह उन सबको पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करे, जो मानवीय संस्कारों से संपन्न हैं। यह हमें लम्बी आयु, प्राणशक्ति, श्रेष्ठ संतानें, पशु समृद्धि तथा ब्रह्मतेज प्रदान करे और अन्त में ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराये ।
अथर्ववेद के अनुसार वास्तव में गायत्री ही वेदमाता है। इस गायत्री मंत्र से हम सभी सुपरिचित हैं, जो इस प्रकार है –
ओऽम् भूर्भुव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात्‍॥
मन्त्र का सामान्य अर्थ इस प्रकार है –
हम सभी (सवितु: देवस्य) सबको प्रेरित करने वाले देदीप्यमान सविता (सूर्य)  देवता के (तत्‍) उस सर्वव्यापक (वरेण्यम्‍) वरण करने योग्य अर्थात्‍ अत्यन्त श्रेष्ठ (भर्ग:) भजनीय तेज का (धीमहि) ध्यान करते हैं, (य:) जो (न:) हमारी (धिय:) बुद्धियों को (प्रचोदयात्‍) सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करता रहता है।
 
इस मन्त्र को गायत्री मन्त्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह गायत्री छन्द में निबद्ध है। ‘गायत्री’ का शाब्दिक अर्थ है गायक की रक्षा करने वाली – ‘गायन्तं त्रायते’ यह वेद का प्रथम छन्द है जिसमें २४ अक्षर और तीन पाद होते हैं। इसके प्रत्येक पाद में आठ-आठ अक्षर होते हैं। इस मन्त्र को देवता के आधार पर सावित्री मन्त्र भी कहा जाता है, क्योंकि इसके देवता सविता हैं। सामान्य रूप से सविता सूर्य का ही नामान्तर है, जो मानव जीवन को सार्वाधिक प्रभावित करने वाले देवता हैं। अधिक गहराई में जाने पर सविता को सूर्य-मण्डल के विभिन्न देवों में से एक माना जा सकता है।
गायत्री मन्त्र हमारी परम्परा में सर्वाधिक पवित्र और उत्प्रेरक मन्त्र है। इसका जप करते समय भगवान्‍ सूर्य के अरूण अथवा बालरूप का ध्यान करना चाहिये। जप करते समय मन्त्र के अर्थ का भलीभाँति मनन करना चाहिये, जैसा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में कहा है – ‘तज्जपस्तदर्थभावनम्‍।’ किसी भी मन्त्र के जप का अभिप्राय है बार – बार उसके अर्थ की भावना करना, उसे मन और मस्तिष्क में बैठाना । किसी न किसी सन्दर्भ में, यह मन्त्र चारों वेदों में प्राप्त हो जाता है। परम्परा के अनुसार इस मन्त्र का साक्षात्कार सर्वप्रथम महर्षि विश्वामित्र ने किया था। वही इस मन्त्र के द्र्ष्टा अथवा ऋषि हैं। वैदिक पारम्परिक मान्यता के अनुसार वेद-मन्त्रों का कोई रचियता नहीं है। सृष्टि के प्रारम्भ, समाधि अथवा गम्भीर ध्यान की अवस्था में ये ऋषियों के अन्त:करण में स्वयं प्रकट हुए थे। जिस ऋषि ने जिस मन्त्र का दर्शन किया, वही उसका द्रष्टा हो गया। इस मन्त्र का जप विश्व भर में व्याप्त किसी भी उपासना-सम्प्रदाय का कोई भी अनुयायी कर सकता है, क्योंकि बुद्धि की प्रेरणा की आवश्यकता तो सभी समान रूप से अनुभव करते हैं। हाँ, ध्यानजप करने से पूर्व शारीरिक शुद्धि कर लेना आवश्यक है।
किसी भी वेदमन्त्र का उच्चारण करने से पूर्व ‘ओऽम्‍’ का उच्चारण करना आवश्यक है। ‘ओऽम्‍’ परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ नाम है – इसमें तीन वर्ण हैं – अकार, उकार और मकार। ‘ओऽम्‍’ के मध्य में लगी तीन (३) की संख्या इसके त्रिमात्रिक अथवा प्लुत उच्चारण की द्योतक है। स्वरों के हृस्व और दीर्घ उच्चारण से हम सभी परिचित हैं – लेकिन वेद में इसके आगे प्लुत उच्चारण की व्यवस्था भी है। हृस्वास्वर के उच्चारण में यदि एक मात्रा का काल लगता है, तो प्लुत में तीन मात्राओं का काल लगता है। ‘ओऽम्‍’ अथवा ओड्‍कार भी विश्व के प्राय: सभी धार्मिक मतों में किसी – न – किसी प्रकार से विद्यमान है ।
‘भू:’, ‘भुव:’ और ‘स्व:’ – ये तीन महाव्याहृतियाँ हैं। ये तीनों शब्द क्रमश: पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग अथवा द्युलोक के वाचक हैं।

जो पढ़ रहा हूँ वह लिख रहा हूँ, वेदों की शिक्षा

आधुनिक शिक्षा अध्ययन .. (Ways of Modern Education..)

    शिक्षा अध्ययन करने के तरीकों में भारी बदलाव आ गया है । पहले अध्ययन के लिये कक्षा में जाना अनिवार्य होता था, पर अब तकनीक ने सब बदल कर रख दिया है। अधिकतर अध्यापन अब ऑनलाइन होने लगा है। किताबों की जगह पीडीएफ फाईलों ने ले ली है।

  ईबुक्स  पहले जब किताबों से पढ़ते थे तब कौन से लेखक की किताब अच्छी है, उसके लिए किसी न किसी पर निर्भर रहना पड़ता था, या फिर अध्यापक ही मार्गदर्शन करते थे। विद्यार्थियों के लिए शिक्षक से परे कोई जहाँ नहीं था। किताब पढ़ने के बाद ही उपयोगिता का पता चल पाता था। जिससे कई बार समय की कमी हो जाती थी,  पर साथ ही ज्ञान बढ़ता था।

    आजकल अध्ययन में फटाफट वाला दौर चल रहा है, जिसमें विद्यार्थियों को पता होता है कि उन्हें क्या पढ़ना है, कितना पढ़ना है, किसे पढ़ना है। विद्यार्थी उससे ज्यादा पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। ऑनलाइन सब कुछ उपलब्ध है। हालांकि पढ़ने के लिये पहले से ज्यादा सुविधाएँ उपलब्ध हैं, एक ही विषय को अलग तरीकों से, ज्यादा माध्यमों से पढ़ा जा सकता है। ज्यादातर नोट्स बनाने की जरूरत नहीं, केवल बुकमार्क किया और कभी भी सुविधानुसार उपयोग कर लिया।

    पहले अनुक्रमणिका से पृष्ठ संख्या देखकर पृष्ठ पलटाते हुए पहुँचते थे, अब तो पीडीएफ फाईलों में केवल क्लिक करके पहुँचा जा सकता है, पहले किसी भी शब्द या वाक्यों को खोजना दुरूह हो जाता था, पर अब पीडीएफ फाईलों में खोजने का कार्य बहुत सरल हो गया है।

    पहले कक्षा में नियत  समय पर जाकर विद्यार्थियों के आने के बाद हीआधुनिक माध्यम पढ़ाई शुरू हुआ करती थी, पर अब सबकुछ वर्चुअल उपलब्ध है, पाठ्यक्रम ईलर्निंग के माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं, वीडीयो ऑडियो का शिक्षा में महत्व बढ़ने लगा है, ईबुक्स का प्रचलन तेजी से बड़ा है। अब इन ईबुक्स, ऑडियो, वीडियो के लिये टेबलेट्स भी उपलब्ध हैं, भारत में कई संस्थान अब टेबलेट के जरिये पढ़ाई करवा रहे हैं। ऑनलाईन माध्यम से सबको फ़ायदा हुआ है, अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच तालमेल और अच्छा हुआ है।

    भारत के अध्यापक कई देशों के लिये ऑनलाईन ट्यूशन भी पढ़ाते हैं, कई अध्यापक स्काईपी से पढ़ा रहे हैं, तो कई अध्यापक गूगल हैंग आऊट का भरपूर उपयोग कर रहे हैं, उनके अपने खुद के फ़ेसबुक पेजेस भी हैं जहाँ विद्यार्थी आपस में  बात तो करते ही हैं, वहीं अपनी समस्याओं को आपस में सुलझाने की अच्छी कोशिशें देखी जा सकती हैं।

    अभी कुछ दिन पहले एक संस्था के ट्विट्स भी देखे, जहाँ पर १४० शब्दों की सीमा में ही विषय के बारे में कहने की कोशिश की गई है या फ़िर उत्तर को कई ट्विट्स में दिया गया है, इस तरह से तकनीक का पढ़ाई में भरपूर उपयोग हो रहा है।

ईलर्निंग    किसी भी विषय पर यूजर कंटेन्ट चाहिये तो स्क्रिब्ड हमेशा उपलब्ध है, जहाँ पर बहुत से अनछुए कंटेन्ट मिल जायेंगे, बहुत सी प्रेजेन्टेशन थोड़े फ़ेर बदल के बाद उपयोग में ली जाने वाली मिल जायेंगी। अगर आपको कोई किताब खरीदनी है तो आप गूगल बुक्स पर उसका प्रिव्यू देखकर अपना निर्णय ले सकते हैं।

    आशा है कि हमारे भारत के संस्थान आधुनिक तकनीक का अच्छे से फ़ायदा उठायें और भारत की उन्नति में मुख्य भुमिका का निर्वाहन करें।

वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी भारतीयों के लिये..

    हिन्दी दिवस हमें क्यों मनाने की जरूरत पड़ी, ये बात समझ से परे है, हमने तो आजतक अंग्रेजी दिवस या किसी और भाषा का दिवस मनाते नहीं देखा । यह ठीक है कि भारत पर कभी ब्रतानिया साम्राज्य शासन किया करता था, परंतु हमने आजाद होने के बाद भी अपनी भाषा का सम्मान वापिस नहीं लौटाया और हम ब्रतानिया साम्राज्य की भाषा पर ही अटके रहे, क्यों ? यह एक बहुत ही विकट प्रश्न है, जिसके लिये हमें गहन अध्ययन की जरूरत है। इसके पीछे केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति की ही कमी नहीं कही जा सकती, इसके पीछे भारतीय मानस भी है जो अपनी भाषा में कभी मजबूत नहीं दिखे, जब लगा कि केवल अंग्रेजी भाषा ही सांभ्रात भाषा है तो अपनी भाषा में उन्हें वह सम्मान समाज ने नहीं दिया।

    जब दूसरे देश अपनी भाषा से इतना प्यार करते हैं और अंग्रेजी भाषा को अपने संस्कार और अपने परिवेश में आने की इजाजत ही नहीं देते हैं, तो हम क्यों ऐसा नहीं कर सकते ? ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी भाषा ने उन देशों में पैर पसारने की कोशिश नहीं की, कोशिश की परंतु वे लोग कामयाब नहीं हो पाये । अब वैश्वीकरण के युग में भी वे देश अंग्रेजी भाषा को नकारने में लगे हुए हैं, और अपनी भाषा में ही काम करने के लिये दृढ़ हैं, हाँ जमीनी तौर पर कुछ कठिनाइयाँ बेशक आती होंगी, परंतु कम से कम वहाँ की जनता अपनी भाषा में हर सरकारी कार्य को समझती तो है।

    हमारे यहाँ भारत में सबसे पहले तो साक्षरता का यक्ष प्रश्न है, फ़िर अधिकतर सरकारी कार्यों में कार्यकाज की भाषा अंग्रेजी है, और जहाँ पर आम भारतीय जनता को रोज दो चार होना पड़ता है। वे उस भाषा में अपने कागजात बनवाने के लिये मजबूर होते हैं, जो भाषा उनको आती ही नहीं है और किसी ओर के भरोसे वे अपने महत्वपूर्ण कागजारों पर हस्ताक्षर करने को बाध्य होते हैं ।

    हिन्दी कब हमारी आम कामकाज की भाषा बन पायेगी, और वैश्वीकरण का हवाला देने वाले कब समझेंगे कि आधारभूत दस्तावेजों के लिये हमारी खुद की भाषा हमारे देश के लिये उपयुक्त होगी । कम से कम हमारे देश के लोगों को अपने दस्तावेज तो पढ़ने आयें, कामना यही है कि हमारे आधारभूत दस्तावेज तो कम से कम हमारी अपनी हिन्दी भाषा में हों।

म्यूचयल फ़ंड में डाइरेक्ट या रेग्यूलर प्लॉन किसमें निवेश करें ?(Where to Invest Mutual fund Direct or Regular plan)

    म्यूचयल फ़ंड में डाइरेक्ट प्लॉन के जरिये निवेश करना एक अच्छा विकल्प है। पर डाइरेक्ट प्लॉन में तभी निवेश करें जब आपको म्यूचयल फ़ंड के बारे में अच्छी जानकारी है, अगर आपको म्यूचयल फ़ंड के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है तो बेहतर है कि आप डाइरेक्ट प्लॉन ना लें और किसी ब्रोकर, एजेन्ट या डिस्ट्रीब्यूटर से ही प्लॉन लें।
    डाइरेक्ट प्लॉन इसी वर्ष १ जनवरी २०१३ से शुरू हुआ है, और यह इस प्लॉन में निवेश करने वालों के लिये म्यूचयल फ़ंड हाऊस ने अपनी लागत कितनी कम की है और निवेशक को कितना फ़ायदा पहुँचाया है यह भी निकट भविष्य में पता चलेगा । फ़ंड हाऊस के हर म्यूचयल फ़ंड स्कीम में अब दो प्लॉन होंगे । एक तो वही पुराना रेग्यूलर प्लॉन और दूसरा डाइरेक्ट प्लॉन जिनकी एन.ए.वी. भी अलग अलग होंगी। डाइरेक्ट प्लॉन में निवेश करने वाले निवेशक को लंबी अवधि में अच्छा फ़ायदा होने की उम्मीद है, परंतु कितना अंतर होगा यह फ़ंड हाऊस कितनी लागत कम करता है और कितना अधिक फ़ायदा निवेशक को देता है।
    रेग्यूलर प्लॉन और डाइरेक्ट प्लॉन की एन.ए.वी. में अभी केवल .१०% से १.२५% तक का अंतर देखने को मिला है। पर यह अंतर पिछले ७-८ महीने का ही है, अगर फ़ंड हाऊस अपनी लागत कम कर डाइरेक्ट निवेशक को ज्यादा फ़ायदा देंगे तो लंबी अवधि में यह अंतर ३ से ५ प्रतिशत तक हो सकता है । हालांकि फ़ंड हाऊस डिस्ट्रीब्यूटर्स, ब्रोकर और एजेन्टों को खुश करने के लिये ज्यादा फ़ायदा भी डाइरेक्ट निवेशक को नहीं देने वाले हैं, अभी भी जिन निवेशकों ने किसी एजेन्ट के जरिये निवेश कर रखा है वे अपने निवेश को डाइरेक्ट प्लॉन में स्विच कर सकते हैं। निवेशक अधिकतर केवल यह कदम इसी दशा में करता है जब उसे डिस्ट्रीब्यूटर्स, ब्रोकर और एजेन्टों से मदद नहीं मिलती । खैर हमने तो अधिकतर यही देखा है कि अभी हमारे निवेशकों में इतनी जागरूकता नहीं है कि वे खुद जाकर फ़ंड के बारे में समझें, जो भी उनके आसपास उन्हें बेचने आ जाता है तो त्वरित निर्णय में म्यूचयल फ़ंडों की खरीदारी की जाती है।
    रेग्य़ूलर प्लॉन में म्यूचयल फ़ंड  लेने से डिस्ट्रीब्यूटर्स, ब्रोकर और एजेन्टों को उनका कमीशन मिलता है जो कि उनके लिये जरूरी भी है, क्योंकि वे उसी कमीशन की कमाई से निवेशक को सुविधाएँ भी देते हैं जैसे कि पता बदलना, बैंक का बदलना, निवेश को एक फ़ंड से दूसरे फ़ंड में स्विच करना, नामांकित करना, निवेश खाते में बदलाव, फ़ोन नंबर बदलना इत्यादि।
    डाइरेक्ट प्लॉन में म्यूचयल फ़ंड लेने पर निवेशक को खुद ही यह सारे कार्य करने पड़ते हैं, वैसे आजकल यह सुविधा बहुत अच्छी हो गई है, लगभग सभी म्यूचयल फ़ंडों में बहुत सारी सुविधाएँ ऑनलाईन / फ़ोन के द्वारा ही उपलब्ध हैं। अगर फ़िर भी परेशानी है तो इन म्यूचयल फ़ंडों के ग्राहक सेवा पर फ़ोन करके परेशानी सुलझायी जा सकती हैं।

खाद्य सुरक्षा बिल / घोटाला / रेटिंग एजेन्सियाँ / जीडीपी / फ़ायदे

    कोल स्कैम घोटाला २६ लाख करोड़ का हुआ (विश्लेषकों के अनुसार), सरकार (सीएजी) के अनुसार १.८६ लाख करोड़ नंबर सामने आया । नया खाद्य सुरक्षा बिल के लिये जो राशि सरकार ने उजागर की है वह है १.२५ लाख करोड़ रूपये जो कि सरकार के ऊपर भार है, मतलब यह देखिये कि भारत के ६१ करोड़ लोगों के लिये १.२५ करोड़ रूपये भारी पड़ रहे हैं, परंतु कोलगेट घोटाला जो कि इससे कहीं ज्यादा था तब सारी रेटिंग एजेंसियाँ चुप बैठी थीं, तब हमारा जीडीपी पर पड़ने वाला फ़र्क क्या इन रेटिंग एजेंसियों को समझ नहीं आ रहा था । जब जनता के लिये सरकार खर्च कर रही है तो रेटिंग एजेंसियों को लगने लगा कि इससे भारत में कुछ हद तक सुधार की गुंजाइश है तो एकदम से “रेटिंग गिर सकती है” का बयान आ गया।

    हालांकि सरकार का कहना है कि जीडीपी १% तक कम हो सकती है परंतु यह सरकारी आँकड़ा है, अगर सही तरीके से इस आँकड़े को देखा जाये तो यह आँकड़ा ३% के भी ऊपर है, जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक बहुत बड़ा बोझ होगा। क्या रेटिंग एजेन्सियों ने कभी भारत में हुए बड़े घोटालों से होने वाली हानि का आकलन हमारी अर्थव्यवस्था के लिये किया है, अगर नहीं तो वाकई इसके पीछे की वजह जानने वाली है। क्यों हमारे भारत के बड़े बड़े घोटालों का आर्थिक विश्लेषण कर रेटिंग कम नहीं की गई, क्या इसका कुछ हिस्सा इन रेटिंग एजेन्सियों की जेब में भी जाता है ?

    जितने भी बड़े बड़े घोटाले हुए हैं, वे पिछले ९ वर्ष में प्रतिवर्ष ३% जीडीपी के घोटाले हुए हैं, अगर हमारा लक्ष्य ५.२% है तो वह आराम से ३% ज्यादा होता और हम ८.२% के जीडीपी की रफ़्तार से बढ़ रहे होते । रूपये की गिरते साख के चलते यही लक्ष्य ४.८% पर फ़िर से निर्धारित किया गया है। हालांकि जितने भी वित्तीय आँकड़े बताये जाते हैं वे सब एक बहुत बड़े आंकलन पर दिये जाते हैं, जिसकी तह में कोई नहीं जाना चाहता। क्या हमारी अर्थव्यवस्था की वाकई कोई बेलेन्स शीट है। कम से कम हमें पता तो चले कि इतना पैसा अगर टैक्स से सरकारी खजाने में आ रहा है तो वह खर्च किधर हो रहा है।

    सरकारी खजाने के खर्च से जीडीपी पर सीधा असर पड़ता है। अब इस १.२५ लाख करोड़ के खाद्य बिल से कितना फ़ायदा गरीब लोगों को मिलता है, वह तो भविष्य ही बतायेगा, और कितना फ़ायदा इन गरीब लोगों के हाथों में अन्न पहुँचाने वालो को होगा यह भी भविष्य ही बतायेगा। वाकई अन्न गरीबों तक पहुँचता है या फ़िर एक नया खाद्य घोटाले की नींव सरकार ने रखी है।

    परंतु अगर वाकई ईमानदारी से इस योजना को लागू किया जाता है और पूरा का पूरा पैसे का फ़ायदा गरीबों तक पहुँचता है, तो इसके फ़ायदे भी बहुत हैं, यह कुपोषण से लड़ने में मददगार होगा, सरकार पर स्वास्थ्य योजनाओं के मद में किये जाने वाले खर्च में आश्चर्यजनक रूप से कमी आयेगी। स्वास्थ्य सुविधाएँ और भी बेहतर हो सकेंगी, स्तर अच्छा होगा। निम्न स्तर के व्यक्ति भी अच्छे स्वास्थ्य के चलते बेहतर कार्य कर सकेंगे, बुनियादी स्तर की शिक्षा का फ़ायदा ले सकेंगे। अपनी मेहनत करके भारत के विकास में अतुलनीय योगदान दे सकेंगे।

रूपये की विनाशलीला देखने के लिये तैयार हैं ?

    आजकल सब और चर्चा में डॉलर और रूपया है और जब से रूपया १०० रूपया पौंड को पार किया है तब से पौंड भी चर्चा में है। कल ही एक परिचित से बात हो रही थी, तो वे कहने लगे कि हमारे भारत पर तो ब्रिटिश का शासन था फ़िर हमारे ऊपर यह डॉलर क्यों हावी है, हमारे विनिमय तो पौंड में होना चाहिये। हमने उन्हें समझाया कि डॉलर को विश्व में मानक मुद्रा का दर्जा मिला हुआ है, डॉलर से लड़ने के लिये यूरोपीय देशों ने यूरो मुद्रा की शुरूआत की थी, नहीं तो उन्हें सब जगह डॉलर से उस देश की मुद्रा का विनिमय करना पड़ता था। अब उन्हें यूरो मुद्रा का विनिमय यूरोपीय देशों में नहीं करना पड़ता है।

    डॉलर क्यों पटकनी दे रहा है रूपये को, यह समझने की कोशिश करें तो लुब्बा लुआब यह है कि हमने आयात ज्यादा किया और निर्यात कम किया, याने कि विदेशी मुद्रा जो कि मानक मुद्रा डॉलर है वह हमारे खजाने से ज्यादा गई और मानक मुद्रा डॉलर हमारे खजाने में कम आई, खैर इस बात का ज्यादा मायने भी नहीं है क्योंकि डॉलर हमारे रूपये के मुकाबले अभी ओवररेटेड है, अगर वाकई असली दाम इसका देखा जाये तो लगभग २० रूपये होना चाहिये। और डॉलर अभी तीन गुना ज्यादा दाम पर व्यापार कर रहा है।

Rupees vs USD

USD Vs INR

    हमारी जीडीपी याने कि सकल घरेलू उत्पाद लगातार कम होती जा रही है, हमने पिछले ९ वर्षों में  मान लो कि रत्न आभूषण ५०० अरब डॉलर के आयात किये और लगभग ३५० करोड़ के रत्न आभूषण हमने निर्यात किये तो हमें पिछले ९ वर्षों में लगभग १५० करोड़ का विशुद्ध घाटा हुआ है। इसी प्रकार पेट्रोलियम और गैस में जमकर घाटा हुआ है, कुछ अंदरूनी कलह के कारण और कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों की जिद के कारण । भारत विश्व में उत्पादित सोने और पेट्रोल के बहुत बड़े भाग  का उपयोग करता है।

    स्वतंत्रता के बाद से भारत का रूपया कभी राजनैतिक कारणों से तो कभी व्यापारिक कारणों से तो कभी आर्थिक नीतियों से मात खाता आया है, हमारे भारत के पास बेहतरीन काम करने वाले लोग हैं, बेहतरीन वैज्ञानिक हैं, पर उन्हें भारत के लिये उपयोग करने के लिये ना ही राजनैतिक इच्छाशक्ति है और ना ही आर्थिक जगत की इच्छाशक्ति है। अगर कुछ और बड़ी कंपनियाँ भारत की बाहर व्यापार करने लगें तो डॉलर की नदियों का मुख भारत की और होगा।

    अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियाँ अपने लाभ का एक बड़ा हिस्सा मानक मुद्रा याने कि डॉलर में विनिमय कर भेज देती हैं। हम भारतवासियों को भी समझना होगा कि हमें घरेलू उत्पादों का ज्यादा उपयोग करना चाहिये, जिन उत्पादों से डॉलर बाहर जा रहा है, उन उत्पादों को उपयोग करने से बचना चाहिये।

    मुद्रा गिरने से हमारे भारत के आर्थिक हालात बेहद खराब हो सकते हैं, इसका सीधा असर बैंक में बड़े बड़े ऋण पर पड़ेगा, बाहर पढ़ने वाले विद्यार्थियों पर पड़ेगा ये दो बड़े भार होंगे हमारी अर्थव्यवस्था पर, वैसे ही राष्ट्रीयकृत बैंकें ४ % से ज्यादा एन.पी.ए. याने कि जो ऋण डूब चुके हैं, से लड़ रही हैं, और अब यह व्यक्तिगत मुश्किलें बड़ाने वाला दौर होगा, अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर कुछ ही दिनों में दिखना शुरू हो जायेगा, जब पेट्रोलियम पदार्थों के भाव आसमान छूने लगेंगे तो इसका सीधा असर हमारी दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर पड़ते देर नहीं लगेगी। जब रूपया ३३% गिर चुका है तो अब पेट्रोलियम के भाव में ३३% की तेजी का अंदाजा लगा ही सकते हैं। सरकार भी कब तक राजनैतिक कारणों से रूपये के गिरने के कारण महँगाई से जनता को बचा पायेगी, और अगर यह भार जनता पर नहीं डाला गया तो भारत के खजाने पर सीधा असर पड़ेगा।

    हमारा कैश इन्फ़्लो तो उतना ही रहने वाला है वह तो डॉलर के महँगे होने से या रूपये के गिरने से ज्यादा नहीं होने वाला है, तो अब भविष्य के संकेत ठीक नहीं है, जितनी बचत अभी तक कर लेते थे, अब वह बचत भी बहुत कम होने वाली है। अभी भी अगर इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो रूपये की विनाशलीला देखने के लिये तैयार रहना होगा।