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भारत की आधारभूत समस्याएँ और उसके समाधान.. सैनिटरी नैपकीन और पानी
मोबाईल की आत्मकथा – निबंध
मैं मोबाईल हूँ आज मैं आपको अपनी आत्मकथा सुनाता हूँ, बहुत लंबी यात्रा करके आज मैंने वर्तमान युग को आधुनिक सुविधाओं से युक्त कर दिया है। आज दुनिया में कोई भी मेरे बिना अपने दैनिक कार्यों की कल्पना नहीं कर सकता है, मैं आज की दुनिया का सबसे तेज संचार व्यवस्था का माध्यम हूँ।
मेरा अविष्कार वर्ष १९७३ में मोटोरोला के अनुसंधानकर्ता मार्टिन कूपर ने किया था, मार्टिन कूपर को “मोबाईल का पितामह” भी कहा जाता है। मार्टिन कूपर ने ३ अप्रैल १९७३ को बेल प्रयोगशाला के प्रतिद्वन्दी डॉ. एंगेल से पहली बार मोबाईल से फ़ोन पर बात की थी। १९७९ में एन.टी.टी. ने जापान में अपना पहला वाणिज्यिक सेलुलर नेटवर्क स्थापित किया था। १९८१ में पूर्णत: स्वचलित मोबाईल प्रणाली डेनमार्क, फ़िनलैंड, नार्वे और स्वीडन में शुरू हुई थी। फ़िर तो १९८० के मध्य से कई देशों ने मेरी शुरूआत की जैसे ब्रिटेन, मेक्सिको और कनाडा।
वर्ष १९८३ में मोटोरोला ने अमेरिका में 1G नेटवर्क स्थापित किया। उस समय मेरी क्षमता केवल ३० मिनिट बात करने तक ही सीमित थी उसके बाद मुझे १० घंटे चार्ज करना पड़ता था। उस समय बाजार में मेरी बहुत जबरदस्त माँग थी जबकि बैटरी बहुत कम चलती थी, मेरा वजन ज्यादा था और बैटरी कम चलने के कारण बात भी कम हो सकती थी, परंतु फ़िर भी हजारों खरीददार मेरे इंतजार में थे।
वर्ष १९९१ में फ़िनलैंड के रेडियोलिंजा 2G नेटवर्क की शुरूआत की थी, मोबाईल पर एस.एम.एस की शुरूआत वर्ष १९९३ में फ़िनलैंड से हुई थी, 2G सेवा के दस वर्ष बाद 3G सेवा एन.टी.टी. डोकोमो ने जापान में शुरूआत की थी। अब 4G भी सेवा में आ चुका है और 5G परीक्षण के दौर में है।
मोबाईल से बात की जा सकती है, एस.एम.एस. भेजे जा सकते हैं और अब तो मोबाईल से क्या क्या नहीं किया जा सकता है, अब स्मार्ट फ़ोन का दौर है, अब टच स्क्रीन फ़ोन से संगीत सुन सकते हैं, कैमरे का उपयोग कर सकते हैं, इंटरनेट का उपयोग कर सकते हैं।
अभी मोबाईल बनाने में मुख्य छ: कंपनियाँ हैं सेमसंग, नोकिया, एपल, ZTE, एल.जी., हुवाई ।
आज के इस आधुनिक दौर में मैंने सारी सुविधाएँ दे दी हैं, अब बैंक से पैसे ट्रांसफ़र करने हो तो मोबाईल से किये जा सकते हैं, किसी भी बिल का भुगतान करना हो या ट्रेन, प्लेन का टिकट बुक करना हो वह भी मोबाईल से किये जा सकते हैं। मेरी सुविधाओं में दिन प्रतिदिन उन्नति हो रही है, और नई नई सुविधाओं का उपयोग दुनिया कर पायेगी।
बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है
कल दोपहर का भोजन करने के बाद हमेशा की तरह थोड़ा टहलने निकला था, मौसम सुहाना था, बहुत दिनों बाद मुँबई में धूप देख रहा था, जैसे धरती पर अचानक ही रुपहली सुनहली चादर किसी ने बिछा दी हो, सारी प्रकृति खिलखिला उठी थी, और मैं उसी प्रकृति में अनमना सा चला जा रहा था, मन कहीं दिमाग कहीं और दिल कहीं ओर व्यस्त था, समझ नहीं आ रहा था कि ये सब एक जगह कब आयेंगे, बस अन्मयस्कता पर मुस्कराहट का दामन ओड़े घूम रहा था। बहुत अजीब होता है जब ऐसे किसी ओर चोले को ओड़ना पड़ता है। सारा वातावरण अंजान ही लगता है ।
लौटते हुए अचानक ही बारिश शुरु हो गई और अचानक ही बारिश ने अपने अंदर सारे विचारों को समा लिया, पहले बारिश का हर तरह से मजा लेते थे, परंतु अब बारिश भी प्रकृति के नियम की मजबूरी लगने लगी है, मुंबई की बारिश भी तेज होती है, पता नहीं होता कि कब कितनी तेज बारिश होगी, इसलिये छाता हमेशा अपने पास रखना पडता है, पर आज नहीं था, खैर बारिश में ही दौड़ते हुए, सीमेंट के फ़र्श में भी गड्डे होते हैं, और वही आजकल के आधुनिक गड्ढे हैं, जिसमें बारिश का पानी भर जाता है और आधुनिक लोग उसी में छप छप कर बारिश का आनंद ले लेते हैं। खैर भीगते भीगते अपनी सीट पर पहुँचे। सबने पूछा अरे पूरे भीग गये, हम केवल मुस्करा दिये.. क्योंकि हमें भी पता था और उनको भी कि पूरे नहीं भीगे हैं अभी १५ मिनिट में बदन की गर्मी से ये बारिश की देन सूख जायेगी।
अगर किसी से बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है, “अरे आज गर्मी बहुत है”, “आज बारिश जबरदस्त है”, “आज बारिश नहीं है, थोड़ा अच्छा लग रहा है”, “आज अच्छी ठंड है”, “कल का मौसम अच्छा था, आज थोड़ा चिपचिपा लग रहा है” इत्यादि। पर कई बार और कई मौकों पर संवाद आगे नहीं बढ़ पाता, सब अपनी अपनी परेशानियों में अपने अंदर ही इतने व्यस्त होते हैं, कि वे प्रकृति का मजा ले ही नहीं पाते।
आज सुबह उठकर खिड़की से बाहर का ऩजारा देखा बाहर फ़िर से बारिश हो रही है, और इतनी तेज कि बारिश की एक एक बूँद ऊपर से नीचे तक श्रंखलाबद्ध तरीके से गिरती हुई दिखाई दे रही है, बूँदों की लय को देखकर मन रम जाता है, ऐसा लगता है कि ये ऊपर से ही साथ साथ आने की, आगे पीछे चलने की कसमें खाकर आई हों। सामने महाकाली गुफ़ा के जंगल की हरियाली और उसके पीछे पवई की भव्य इमारतें इस दृश्य को और भी विहंगम बना देते हैं। अभी मेरे पास दृश्य को कैद करने के लिये कोई उपकरण नहीं है, नहीं तो यह दृश्य मैं अवश्य कैद करना चाहता था। आज प्रकृति के बीच नहीं जा पाये, मनोरम दृश्य और बहती हुई हवाओं के आज निकट से साक्षी नहीं हो पाये।
कुछ लम्हें.. लिफ़्ट, संवाद, अखबार और समय
सुनहली सुबह को उठकर नित्यक्रम से निवृत्त होकर, घूमने के लिये प्रकृति के बीच निकल पड़ना, प्रकृति के बीच घूमने का एक अपना ही अलग आनंद होता है, जब मैं अपने अपार्टमेंट के फ़्लेट से बाहर निकलता हूँ तो वहाँ केवल चार फ़्लेट, दो लिफ़्ट और एक सीढ़ियों के दरवाजे होते हुए भी हमेशा सन्नाटा ही पसरा हुआ पाता हूँ, सीढ़ियों से उतरने की सोचता नहीं, क्योंकि आठ माला उतरने से अच्छा है कि लिफ़्ट से ही उतर लिया जाये, वैसे ही आने में भी । कई बार सोचता हूँ कि अगर लिफ़्ट का अस्तित्व ना होता तो मुँबई में क्या केवल चार माले के घर ही होते, तब इतनी सारी बाहर से आई हुई जनता कैसे और कहाँ रहती, परंतु कुछ चीजों ने जिंदगी के कई प्रश्नों को हल कर दिया है।
अपार्टमेंट से बाहर पहुँचते ही, झट से सुरक्षाकर्मी सलाम ठोंकता है और हम छोटे वाले दरवाजे से होते हुए हाईवे पर आ जाते हैं, दरवाजे के बाहर सीधा हाईवे ही है, सड़क पार एक छोटा सा उद्यान है, जहाँ सुबह लोग अपनी कैलोरी जलाने आते हैं, पर फ़िर भी वहाँ एकांत का सन्नाट पसरा हुआ है, यहाँ पर फ़िर भी लोग सुबह एक दूसरे को देखकर मुस्करा लेते हैं, सुप्रभात, जय राम जी की कह लेते हैं, पर कई शहरों में तो आपस में रोज देखने के बाद भी कभी कोई संवाद ही नहीं होता, संवाद पता नहीं किस घुटन में जीता है, जहाँ आपस में या खुद में ही लगता है कि शायद संवाद मौन है, और मौन ही संवाद है।
वापिस आकर पसीने में भीगे हुए, ताजा अखबार और दूध की थैली खुद ही दरवाजे से उठाकर लाते हैं, फ़िर अपने फ़्लेट में डाइनिंग टेबल की कुर्सियों को खींचकर पहले जूते मोजे उतारते हैं और फ़िर रोज की तरह पंखा चालू करना भूल गये होते हैं तो पंखा चालू करके, अपने पसीने पर गर्वित होते हुए अखबार पढ़ने लगते हैं, जैसे पसीना बहाकर पता नहीं किस पर अहसान करके आये हैं। अखबार भी क्या चीज है, जरा से पन्नों में दुनिया भर की खबरें भरी होती हैं, पर खबरें केवल वही होती हैं जो मीडिया हमें पढ़ाना चाहता है, हमारे भारत विकास की खबरें कहीं नहीं हैं, या भारत को विकास की और कैसे अग्रसर कैसे किया जाये, परिचय भी नहीं है जो लोग विकास का कार्य कर रहे हैं, पता नहीं कैसा अखबार है, बस इनमें उन्हीं लोगों का जिक्र है जो कुछ ना कुछ लूट रहे हैं, या लूटने की तैयारी कर रहे हैं। मुझे तो अब इन खबरों से ऊबकाई आने लगती है।
तैयार होकर ऑफ़िस जाने का समय हो गया है, बारिश में लेदर के जूते पहनने का मन नहीं करता, आखिर महँगे जो आते हैं, बारिश में सैंडल में ही जाना ठीक लगता है, जिसको जो समझना हो समझे । अपार्टमेंट से बाहर निकलते ही फ़िर वही मुंबई की चिल्लपों कहीं मुलुन्ड वाली बस तो कहीं वाशी जाने वाली बस, अब हम जिधर जाते हैं उधर की बस मिलना मुश्किल होता है, तो ऑटो ही पकड़ना होता है और ऑटो पकड़ना भी एक युद्ध ही होता है, जितने भी यात्री वहाँ खड़े होते हैं, सब पहचान के होते हैं और आपस में एक दूसरे को जानते हैं, अगर उसी तरफ़ वे यात्रा कर रहे होते हैं तो खुशी खुशी उन्हें ड्रॉप भी कर देते हैं, पता नहीं मुंबई में ऐसी क्या चीज है जो आदमी को बदल देती है, शायद समय !! क्योंकि समय की सबके पास कमी है और सब अपने समय का सदुपयोग करना चाहते हैं ।
केवल आपने खुद को ही सुरक्षित कर रखा है या परिवार को भी..
अब आगे मित्र से बात जारी रही, हमने पूछा अब एक बात बताओ कि आपने आपातकाल के लिये क्या व्यवस्था कर रखी है, वह बोला अरे अपने एक इशारे पर सारे काम हो जाते हैं, हमने कहा भई हकीकत की धरातल पर उतर आओ और सीधे सीधे साफ़ शब्दों में बताओ, अगर बीमारी का क्षण आ गया या फ़िर मान लो बीमारी ऐसी है कि चिकित्सालय में भी ना रहना पड़े और चिकित्सक ने घर पर ५० दिन का आराम बता दिया या मान लो बिस्तर पर एक वर्ष तक रहना पड़ा, उस दिशा में क्या करोगे, क्योंकि आपको वेतन के साथ तो ५० दिन की छुट्टी मिलना मुश्किल है, आप वेतन के साथ ज्यादा दिन की छुट्टी पर नहीं रह सकते, तब आप अपने परिवार का खर्च कैसे उठाओगे ?
मित्र ने कहना शुरू किया कि बीमारी के लिये हमने मेडिक्लेम ले रखा है और दूसरी स्थिति के लिये हमने कभी सोचा ही नहीं कि ऐसा भी हो सकता है या यह भी कह सकते हैं कि हमें इस स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है हमें पता नहीं। वैसे हमें लगता है कि हमें इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। हमने कहा भाई परिस्थितियाँ कभी किसी को बताकर इंतजार करवाकर नहीं आतीं, बेहतर है कि हम उन परिस्थितियों का आकलन करके पहले से ही उसकी व्यवस्था करके रख लें, ताकि हम उन परिस्थितियों से बेहतर तरीके से निपट सकें।
अब मित्र ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि कैसे निपटा जा सकता है ? हमने उनसे पूछा कि ये बताओ तुमने मेडिक्लेम कितना ले रखा है, वे बोले हमने अपना मेडिक्लेम २ लाख रूपये का ले रखा है। हमने पूछा और परिवार का मेडिक्लेम, वे बोले नहीं परिवार का मेडिक्लेम नहीं ले रखा है, हमने उनसे कहा कि आपातकाल केवल तभी नहीं आता जब खुद बीमार हों, परिवार का कोई भी सदस्य बीमार हो सकता है तो बेहतर है कि परिवार के लिये एक मेडिक्लेम लो जिसमें सारे सदस्य बीमित हों।
हमने कहा कि आप कम से कम ५ लाख का फ़ैमिली फ़्लोटर
मेडिक्लेम बीमा लो, आजकल वैसे ५ लाख भी कम पड़ते हैं, पर फ़िर भी आपात स्थिति से निपटने के लिये बहुत हैं, फ़ैमिली फ़्लोटर मेडिक्लेम का फ़ायदा यह है कि परिवार के चारों सदस्य ५ लाख से बीमित हैं और चारों में से कोई भी एक ५ लाख तक फ़ायदा उठा सकता है या फ़िर एक से ज्यादा सदस्य भी, बस चारों सदस्य मिलकर ५ लाख तक का ही चिकित्सकीय व्यय से बीमित हैं और उससे ज्यादा लेना है तो उसके लिये आजकल टॉप अप सुविधा भी उपलब्ध है, जो कि आप हर वर्ष अपने हिसाब से कम ज्यादा कर सकते हैं।
अब आगे बतायेंगे कि कैसे दूसरी स्थिति से निपटा जाये “चिकित्सक ने घर पर ५० दिन का आराम बता दिया और करना भी जरूरी है, उस दिशा में क्या करोगे ?” क्या आपने भी कभी सोचा है ? तो बताइये ?
सकारात्मक और नकारात्मक खबरें समाचार चैनलों पर..
थोड़ा समय मिला तो समाचार देखे,
एक पट्टी घूम रही थी.. (निजी समाचार चैनल पर)
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मदद करने वाली पंचायतों का उत्तराखंड सरकार सम्मान करेगी ।
अभी तक तबाही से उबरे भी नहीं हैं, बचाव कार्य पूरे भी नहीं हुए हैं और इनके राजनीति चालू हो गई है।
जनता बचाव कार्य से खुश नहीं . (निजी समाचार चैनल पर)
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यहाँ पर दो तीन परिवार को समाचार चैनल लेकर बैठा हुआ था, जिनके खुद के परिजन इस आपदा का शिकार हुए, वे सरकार को बद इंतजामी के लिये कोस रहे थे.. जैसे टीवी चैनल कोपभवन ही बन गया हो। ( यहाँ कोसने की जगह क्या ये लोग वहाँ आपदा प्रबंधन में अपने स्तर पर मदद नहीं कर सकते थे, और किसी और के अपने को बचा नहीं सकते थे).. टीवी एंकर तो अपने चेहरे पर इतना अवसाद लिये बैठा था, जैसे उसे वाकई बहुत दुख हुआ हो ।
बचाव कार्य बहुत अच्छा है (सरकारी दूरदर्शन चैनल पर)
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सरकारी चैनल राज्यसभा और डीडी न्यूज पर दिखाया जा रहा था, किस तरह लोगों को बचाया जा रहा है, और एक ग्रामीण बचाव कार्य से खुश था उसका अनुभव टीवी पर दिखाया गया, जिससे लगा कि शायद निजी चैनल वालों का सरकार से बैर है।
सरकारी चैनल पर बचाव के बारे में सकारात्मक बातें दिखायीं जा रही हैं, जिनसे हर्ष होता है, परंतु वहीं निजी सरकारी चैनल नकारात्मक बातें दिखायीं जा रही हैं, जिनसे मन अवसादित होता है, निजी चैनल तो वही दिखाते हैं जो जनता देखना चाहती है और सरकारी चैनल वह दिखाते हैं जो सरकार जनता को दिखाना चाहती है, या एक पहलू यह भी हो सकता है कि तथ्यों का असली चेहरा शायद सरकारी लोग दिखा पाते हों, क्योंकि नकारात्मक बातें कहने वाले बहुत मिल जायेंगे परंतु सकारात्मक बातें कहने वाले बहुत कम, मतलब कि सरकारी समाचार चैनल वालों को सकारात्मक खबरें बनाने का दबाब तो रहता ही है, और उसके लिये ऐसे लोगों को ढूँढ़ना और भी दुष्कर कार्य होता होगा, यह तो एंकरों का क्षैत्र है इसके बारे में वही लोग अच्छे से बता सकते हैं, अपना डोमैन तो है नहीं, कि अपन अपने अनुभव पर विश्लेषण ठेल दें।
डीडी वन पर जो ऐंकर थे उन्हें पहले कहीं किसी निजी न्यूज चैनल पर समाचार पढ़ते हुए और इस तरह की समीक्षाओं/वार्ताओं में जोर जोर से चिल्लाते हुए देखा है, उनके हाथ चलाने के ढंग से ही समझ में आ रहा था कि वे अपने शो का नियंत्रण किसी ओर को देना ही नहीं चाहते हैं, और ना ही किसी की सुनना चाहते हैं, बस सब वही बोलें जो वे सुनना चाहते हैं या यूँ कहें कि अपने शब्द दूसरे के मुँह में डालने की कोशिश कर रहे हों।
मन ही मन सोचा कि इनको क्या ये भी अपने कैरियर के लिये इधर से उधर स्विच मारते होंगे, जहाँ अच्छा पैसा और पद मिला अच्छा काम मिला उधर ही निकल लिये, फ़िर थोड़े दिनों बाद कहीं और किसी निजी समाचार चैनल पर नजर आ जायेंगे।
पर यह तो समझ में आया सकारात्मक और नकारात्मक खबरों का असर बहुत होता है, तो इस मामले में हमें सरकारी समाचार चैनल बहुत पसंद आया, श्रेय इसलिये देना होगा कि उनको ग्राऊँड लेवल पर जाकर बहुत काम करना पड़ता है और निजी चैनल वालों के लिये यह बहुत आसान है क्योंकि नकारात्मक कहने के लिये एक ढूँढों हजार मिलते हैं।
शिक्षा काल की दोस्ती भविष्य में..
गुरू द्रोण और द्रुपद दोनों ने एक साथ महर्षि अग्निवेश के आश्रम में धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की, तब दोनों अच्छे मित्र हुए..
उस समय द्रुपद ने द्रोण से कहा था .. “प्रिय द्रोण, तुम मेरे अत्यंत प्रिय मित्र हो, जब मैं आने पिता की राजगद्दी पर बैठूंगा, उस समय मेरे राज्य का तुम भी उपभोग करना । मेरे भोग, वैभव और सुख सब पर तुम्हारा अधिकार होगा।”
धनहीन अवस्था में द्रोण जब द्रुपद के पास मदद की आस लेकर गये तब द्रुपद राजगद्दी पर आसीन हो चुके थे, तब द्रुपद ने द्रोण से घृणापूर्वक कहा “आश्रम का जीवन समाप्त हो चुका। गुरू आश्रम में बहुत विद्यार्थी साथ रहते, खेलते और शिक्षा प्राप्त करते हैं। मगर दरिद्र धनवान का, मूर्ख विद्वान का और कायर शूरवीर का मित्र नहीं हो सकता ।”
उपरोक्त कथा से दोस्ती के एक और रूप का पता चलता है । जिसमें दोस्ती नाम मात्र की नहीं है, दोस्त जो राजा बन चुका है उसका घमंड दिखाई पड़ता है। और इस तरह की दोस्ती आजकल बहुतायत में देखी जा सकती है, खासकर पढ़े लिये नौजवान पीढ़ी में ।
दोस्ती के ऐसे रूप युग युग से देखने में आ रहे हैं, आज भी देखने में आते हैं, दोस्ती जो शिक्षा के काल में पल्लवित होती है वह धीरे धीरे भौतिक वस्तुओं और पद की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ दोस्ती केवल तभी रह सकती है जबकि मित्रों के बीच आपस में बहुत प्रेम हो, भौतिक वस्तुओं और पद की लालसा ना हो। आपस का फ़ायदा एक अलग बात है, परामर्श भी एक अलग बात है, परंतु केवल फ़ायदे के लिये मित्रता बनाये रखना शायद बहुत दुष्कर होता है।
हमारे आज भी ऐसे मित्र हैं जो बचपन से हैं और इन सब चीजों से दूर हैं, इसे खुशनसीबी ही कही जायेगी। आज भी उनके बीच जाकर मन प्रसन्न हो जाता है। दोस्ती निभाना बहुत कठिन और तोड़ना बहुत आसान होता है।
दोस्तों में आपस में जो तालमेल होता है वह शायद ही कहीं देखने को मिलता है, दोस्तों को हमारी अधिकतर गुप्त बातें पता होती हैं, हमारे सुख दुख में सबसे पहले दोस्त ही खड़े होते हैं, रिश्तेदार बाद में आते हैं।
जो द्रुपद जैसे दोस्त होते हैं ऐसे लोगों का वाकई में दोस्त ना होना अच्छा है। परंतु कुछ बहुत अच्छे दोस्ती के उदाहरण भी हैं जैसे कृष्ण और सुदामा । कृष्ण जी ने खुद अपने हाथों से सुदामा जी के पैर धोये थे और इतना सम्मान दिया कि सुदामा व्याकुल हो उठे थे।
बिना पेन कार्ड के म्यूचयल फ़ंड माइक्रो निवेश सुविधा (Without PAN !!! Invest in Micro Investment Facility)
बिना पेन कार्ड के म्यूचयल फ़ंड में निवेश करना बहुत मुश्किल है, वह भी जब से नियामक ने KYC के नियम म्यूचयल फ़ंड खरीदने के लिये लागू कर दिये हैं, तब २०११ में नियामक ने म्यूचयल फ़ंड खरीदने के लिये जिन लोगों के पास पेन कार्ड नहीं थे उन लोगों के लिये नियामक ने माइक्रो निवेश सुविधा उपलब्ध करवाई ।
अभी हाल ही में रिलायंस म्यूचयल फ़ंड ने भी माइक्रो निवेश सुविधा (Micro Investment Facility) उपलब्ध करवाई है, जो कि बाजार में १४ जून से आम निवेशक के लिये उपलब्ध है।
माइक्रो निवेश सुविधा के तहत निवेशक वर्षभर में ज्यादा से ज्यादा केवल ५०,००० रूपये का निवेश कर सकता है, फ़िर भले ही वह निवेश सिप (SIP – Systematic Investment Plan) या फ़िर एक मुश्त (LumpSum Investment) हो, पर कुल मिलाकर दोनों या एक निवेश ५०,००० रूपयों से ज्यादा नहीं होना चाहिये। और यह ५०,००० रूपये अप्रैल से मार्च के मध्य ही निवेशित होने चाहिये, याने कि अगर किसी को अपना निवेश जारी करना है तो उसे वित्तीय वर्ष का पालन करना होगा ।
इस सुविधा को केवल वही निवेशक ले सकेगा जिसके पास अधिकृत रूप से पेन कार्ड नहीं है, और अगर अगर निवेशक उस वित्तीय वर्ष के मध्य में इस योजना से निकास करता है तो वह उस ५०,००० रूपये की लिमिट में नहीं आयेगा।
यह सुविधा केवल व्यक्तिगत, एन आर आई, अल्पवयस्क संरक्षक के साथ, एकल स्वामित्व वाले व्यवसाय एवं संयुक्त खाते को उपलब्ध है। पहले खातेधारी के पास पेन कार्ड नहीं होना आवश्यक शर्त है । अन्य श्रेणियाँ जैसे PIO, HUF, QFI, Non-Individuals इस सुविधा का उपयोग नहीं कर सकते हैं।
म्यूचल फ़ंड क्या करें, क्या न करें ? (Mutual Funds DOS and DON’TS) |
माइक्रो निवेश सुविधा में निवेश करने के लिये निवेशक को निम्न दस्तावेज निवेशक सुविधा केन्द्र पर जमा करने होंगे –
१. साधारण आवेदन पत्र
२. PAN Exempt KYC Reference No (PEKRN) acknowledgement issued by KRA. For more details click here
यहाँ निवेशक को ध्यान रखना चाहिये कि वह एक वित्तीय वर्ष में केवल ५० हजार रूपये ही निवेश कर सकता है।
ऊपर दिये गये उदाहरण में एक्स महाशय एकमुश्त और सिप के जरिये एक वित्तीय वर्ष में जो निवेश कर रहे हैं, वह ५०,००० रूपये से कम है इसलिये यह वैधानिक है, परंतु वाय महोदय का निवेश एक वित्तीय वर्ष में ५०,००० रूपयों से ज्यादा हो रहा है इसलिये इनका आवेदन पत्र ही अस्वीकार कर दिया जायेगा।
और उसका घर का सपना, सपना ही रह गया
एक किस्सा बताते हैं, एक बार नौकरीशुदा आदमी ने सोचा चलो अपने गृहनगर में नये फ़्लैट बन रहे हैं, और अपनी पहुँच में हैं तो क्यों ना उसमें एक फ़्लैट ले लिया जाये, पता लगाया गया बंदा भारत के दूसरे कोने में रहता था, उसने अपने पापा को कहा कि आप इसके बारे में पता कीजिये, पापा ने कहा कि उसका एक दलाल है जो कि अपने वो किराने वाली दुकान वाले का भाई ही है, और वह कह रहा है कि १० लाख में मिल जायेगा, और पूरे १० लाख पर लोन भी हो जायेगा और उसने १ बीएचके ५०,००० रूपये देकर पापा के मार्फ़त फ़्लैट बुक करवा लिया ।
जब वह बंदा एक महीने बाद अपने गृहनगर गया तो जब उसने दलाल और बिल्डर से बात की तो पता चला कि लोन तो केवल ७.६५ लाख पर ही होगा, बाकी तो ब्लैक में देना है, मतलब कि लगभग २.३५ लाख जेब से लगाने होंगे, बंदे ने कहा कि मेरे पास तो केवल १० लाख का २०% याने कि २ लाख रूपये हैं, और एक पैसा ऊपर देने के लिये नहीं है, और आपने बुक करवाते समय पूरी जानकारी नहीं दी। तो बिल्डर और दलाल दोनों ने कहा कि आप चिंता मत करो आपको २.३५ लाख का पर्सनल लोन दिलवा देंगे, बंदे ने कहा भई गृहऋण का ब्याज होता है १० % और पर्सनल लोन का ब्याज होता है १५-१६%, ये ऊपर का ५-६% कौन भुगतने वाला है, मैं तो यह ऊपर का ब्याज नहीं दूँगा, तो दलाल और बिल्डर दोनों भड़क गये कि एक तो हम आपको ऋण दिलवा रहे हैं और आप नाटक कर रहे हैं ।
उस बंदे की अपने गृहनगर में बहुत सी बैंकों में अच्छी पहचान भी थी और बैंक वालों से दोस्ती भी थी, जब वह अपने बैंक के मैनेजर दोस्तों से मिला तो पता चला कि अभी तक इस बिल्डर को किसी भी राष्ट्रीयकृत और निजी बैंक ने एनओसी नहीं दी है, और उन्होंने बताया कि बिल्डर ऐसे ही प्रोजेक्ट के नाम पर पैसा बाजार से उठाते हैं और बैंक से ऋण दिलवा कर लोगों को फ़ँसवा देते हैं, फ़िर २-३ फ़्लोर बनाकर बिल्डिंग बनाना बंद कर देते हैं और अधिकतर ऋण की किश्तें जो कि बैंक से उन्हें लेनी होती हैं, वे इस प्रकार रखते हैं कि २-३ फ़्लोर तक ही उनके पास सारी रकम आ जाये। एक बार सारी रकम आ जाती है तो ये लोग भाग लेते हैं और जनता को अच्छा खासा चूना लगा देते हैं। इस तरह के बहुत सारे केस हो चुके हैं, और जनता को पता ही नहीं चल पाता है।
मैनेजर मित्र की बातें अक्षरश: सत्य थीं, क्योंकि बैंक से ऋण लेने का फ़्लो बिल्डर ने दिया था वह बिल्कुल वैसा ही था केवल २ फ़्लोर बनने के पहले ही वह सारा पैसा बैंक से लेता, और भाग लेता ।
अब उस बंदे ने निश्चय किया कि वह इस फ़्लैट को नहीं लेगा और अपने पैसे उन्हें वापिस करने के लिये कहेगा जो कि उसने बुकिंग के नाम पर दिये थे, परंतु उन्होंने पैसे देने से मना कर दिया और कहा कि आप अपनी तरफ़ से कैंसिल कर रहे हैं, इसलिये एक भी पैसा वापिस नहीं मिला । हालांकि उस बंदे के भी अच्छे कॉन्टेक्ट्स थे परंतु उसने सोचा कि यह केस लीगल तरीके से ही लड़ा जाये, क्योंकि उसके अभिभावक उसके गृहनगर में अकेले रहते थे।
तब उसने अपने कुछ ब्लॉगर मित्रों की सहायता से मार्गदर्शन प्राप्त किया और बिल्डर और दलाल की शिकायत कलेक्टर और एस.पी. ऑफ़िस में की, जब वह बंदा कलेक्टर से मिलने गया तो कलेक्टर ने कहा कि अगर हमें भी आज फ़्लैट खरीदना है तो ब्लैक में पैसा देना ही होगा, बंदे को कलेक्टर की बात सुनकर बहुत आघात लगा। फ़िर भी वह कलेक्टर और एसपी ऑफ़िस में अपने आवेदन पर आवक लेकर आ गया और फ़िर वह तो वापिस अपनी नौकरी के लिये चला गया, उसने अपने पापा को फ़िर एक सप्ताह बाद कहा कि फ़िर से उसी आवेदन की फ़ोटोकॉपी करवाकर उस पर फ़िर से आवक ले आये और उस पर लिख दे Reminder 1 फ़िर Reminder 2 भी भिजवाया और एक सप्ताह बाद ही तहसीलदार की कोर्ट से नोटिस आ गया।
तहसीलदार की कोर्ट में वादी तरफ़ से कोई उपस्थित नहीं हुआ परंतु दलाल खुद से आगे होकर आया और कहा कोर्ट के बाहर ही सैटलमेंट कर लेते हैं, और आधे रूपये में कोर्ट के बाहर सैटलमेंट कर लिया, वह भी इसलिये कि अभिभावकों को परेशानी होती। नहीं तो उसे उसके पूरे पैसे वापिस जरूर मिल जाते, परंतु कुछ चीजें होती हैं जो पैसे से बढ़ कर होती हैं।
उस बंदे ने २५ हजार केवल यह समझकर सीखने के लिये खर्च कर दिये कि फ़्लैट लेने के पहले क्या चीजें जरूरी हैं और जरूरी चीजें पहले ही पता कर ली जायें, जब पैसा एक नंबर में कमाया जाता है तो फ़िर २ नंबर में क्यों दिया जाये। खैर उसका घर का सपना, सपना ही रह गया ।




